Skip to main content

Full text of "Patanjala-Yogasutra-Bhasya Vivaranam of Sankara-Bhagavatpada"

See other formats


1 ¶1111.1001 77. पका 1811 
77 


,9/ 3 


०॥५ा^1^-07 ५6५५1747 4 


(र .* ल) शव र्ण लााक 


।:} 6 


च 5251978{0216878 


20.4६ ^ ऽदा ९4144 54.57, 
लाषिण कु द्वद कव्व ऽद, काक. -्फ (०14८ 


9 . नर, 
9. २. ८5 पविता 34 
(गि कुत्5ण ‰ दका क्वं (वद, क्का वा्॥ 2010८ 


प्र 556 


(00 “पधा 0९, ^ व ऽ(णाऽ 124 रश, 
^ 0245. 
1952 
1166 २8. 12.12 


& 
2 , 
५१ [ि। ¢ 

च 
^ | (1 9 
१ ~ ~ ५ ५ 


॥ 


। „५ 
गह 1169 द^3 १, [0 एवि, ह ए, 
१.07, ^ 07 ^9- 4. 


ज < (८. 
~: 7 1: 4 
[ वि 4 1. 

= गा) 


॥) 





| 12204 


प0एत्लााठप 





(16 6017111६ 01 (24725 {001 "10 {07 ८0115106 21107 ६१६ 
१४९५0 07 एप्णाल्व्पजाा ० {16 + 21005 पा्प्ञ्लाएऽ 7 कविदाहा। 
187५265 01 5४१] €615 11८ 11110500, 10९01616, ऽ८1९१८९ €९., 
९271४ 11 102४, 1948. 17770012 ‰12105671015 [101211८5 7 111६ 
1120785 77651066 ५९7€ 76वु ६५८ 10 ऽत 8 115४ ०1 पाएण0757164 
71211056 17015 पा कदा {107 3्ठपाः 01 0हा7ष् (८01510€ा्व 9 1116 
(00श्दाा7ाला६ 107 एप01168110. 11€ प्लागाथ$ ऽ८616187$ 91 17६ 
(21076 10121278.18 9€11011"5 92125४81101 22102110, 1211016, 
21016€ 007011९ णाता {75 वद्वृ्ल्ञा, =, 115 151 35 ७६1] 25 8 अणा 
115६ ०1 प0एप01181€त 72151015 171 10€ ©0श्लाणाालाौ 0161081 
1(21015611015 [1.10 ४, 20785, एला€ (गदापा € ग7160 200 2 
{1121196 ऽलुट्ल्मा ता ाशाप्रऽ८ा10८5 5४112016 0 एपात2 10) ५५25 
1124€. {10€ ©0श€ाफ्ाा€ा६ 10 पाहा दा०ा2तपा)0 1०. 340913/48- 
10, तप्ता, ५२६८५ 4-4-14, (जाश पात 31 एला (०- 
711111६८ ण (€ (पा2107 ०7 (€ (0ण्लाा्ाधा६ 0 ला४७। &1४५5- 
1005 [1097४, 20725, 25 176 ऽद्लाादा$, 0 116 7121 ऽदृल्ल॑छ॥ 
07 112705671005 5011891९ ठि 07177 2710 107 €51172 {7 {1८ 
60०5१ 01 एप ]1८81{101. 


0९ {0ााल ह व< {€ प्ाल्यााणदाऽ 91 11८ (जाप) 1६८:-- 


1. 57 1. 1. दिशा8$वा25 पा 1119, ४.4, 8.1. 
2. ,, २. 2. ऽप 21181, ए.4., ८.1. 
३. ,, (. भि. ९२21861 भ71व्‌तप (लाड, ए.4.,.8 1. 
4 १, र. 1527001, (व). 
9. [27. वि. ४ला1६218ा2112184%2, 14.4.; एप. 9, 
6. ७71 24. 1₹372111}2 ‰२३० वतप, ४.4. 
7. +» #. 2720112219 58571. 
8. +; पि. ४१८२६ [२२०, 1.4. 
9. ,, प्र. 96508 4$$27्91. 
10. ,, 351 शला 21६58 4 $‰211887. 
11. ,, अ. (81120028 (61121, ४.4., 1.7. 
12. 01. @. ^ त$प2 [शध्ा०ा), ८.4., प, 0. 
13. 7. @. पणा 2२३12, भ.6., ०, एप्त. 
14. +, 4, 5219731), पव.^., एप्त, 09. 1... 


19. 571 एगशक) 2२81112 52571. 
16. +, ऽ. ६, रशा212.112 6285111. 


11 


17. 7. #. <वा पश्च, ४.५. ०. एप्त, (शवा. ), 
18. ^ टि प]-पा-ा श शत 1८020 4023760. 

19. 571 २. 70. 107. 

20. +, ऽ. ७00], ३.4... ए... 

21. ,, (1, (0ाता25€री12781)) ,५.; 1... 


४४1 [€ द्दत्छप्ठा) 9 ऽ 25 #ला1 21658 49#$#211881, 
2114 [21. (, [द पा)1121) 1२१8, 111€ 200४८ हाला ऽ (्जाप्रप्तं ८० ४८ 
प्र€ा10€75 0१ {11९ हला (या [1६८ {07 1950-51 2150 ४0 आली 
116 {10110 णाह इदप र€1€ 200९ ब ७0, = क1०. 7297 -7/ 
५0-3, एता1., {/-19--5--'50 91 0४१, ला10. ०. 15875" / 
50-4, 200., 3/--7-०--50, 


0, 4. (142100987878119 ९111817, ४४.५., एप्त. ०. 

अ ऽ, 60४14879] पाप, ०.4. 8.1. 1. -8., 2.467.4४४. 
(391, ©. 911711४35211100ा $, 7.4,, ए.1.., आ,7,, 2110 ८.४. 
{27. धा गाा1712 पअ प55911 प 1121, 11 .4., एप्त. 7. 

5171 , ४. 51070 2२80, 2.4. 2.1. 

6, 11161031, (01६८ ०1 [101610४5 (€५1610€, 7484725. 


1 


¶1€ ग्ाहालाः§ 0 घ्रा (ला 0वा1€त 11110 5) 
(०८९९5 {07 प्९ ण्याप [418४3६९5, 5 वा, तवा, व दपण, 
ता 20०, 1121459 21871, 11217201 त 15111116 [-218४2ए65. {11९४ 
पाल वपा € प्राजा ० 185, 1949, 24 1420785 271 21 9110९ 
{0 शन्ूा7716€ 11€ ॥ाक्ाध5ला 1015 पत्‌ 712}६€ 2 5६1६८101. = € तद्ज. 
71€ा142110115 07 1116 (ग711{{९€ णा € 2८८८01९0 0#{1€ ष्टा ( 
271 1116 ५९८१५६५ 10 ९811 {165€ ए71168॥015 85 116 "144. 12245 
(00४ रल 01. 52 रा5.9,” 210 20011 ८ 
(17810, @0ध्लाा1€0६ (0 पाला181 प शाणऽल 1015 1101213, 1124785, 
5 ध[1€ @ला६] {16107 ०1 {16 एपा1लम०ा5§ पावला 11115 56165. 


(16 {01101 7ष्ट 71181056 [015 एला (कषरा प? 07 एपिाल्शठा 
017 1949-50, 


८५५. {014 (7 ७0" दवि 0 ^. 
74 ६८6 1.87२^ ९१, 114 245 
^. 

13791 ऽप 
411015४8 # 21061४8 पा 91 
6 {211216612119.1 31 

(00६6६ {4274371 

(९121 2८7४३ 22{{2#६171 
61217211 [खा 


0 


+. 


श > 4 


>> 


++ 


अ ~ 


>, ~ >> &० § {~ 


111 
ा.्जा 


41150113 ४ 0 प्राप 
21072 पि 1ह्13ए(प्णप 

{भा ४14$52 ४1125910 
62 12815212. ४ {59.%2171४ 
12068 1.21:52128 51101211 


94. भि ऽर 


४1527212. व्राकढा1- (1 21112521352012112 ) 
20272४2 वि 201षट 

प्ा112262111256971 

28727185 प्[18 ४ 1-- ला द णात 

पि $2%251त0120॥2 (द ्णतरात्याा 


21.41.241. र 


8410112 (158 

(8) ४251111858त 171 

(9) 110४159 दा 

1181125272111 

-4116.14 २0.781 

दवता) 

14212 ्रावाा--( 8812012060118112 ) 


1९4 विवि 
1.61त002 द ताठाा 
९2{{31088ा11 
4 € ४२585171 
४1४1ता12. ४ 21092 ४152४२६२] 
92741127211215272 
9प04525178. 


11.4.11 1.4 बिन ^ 1.5 


1 111-4.1-4 572 
1170--5 2711 
1211414-4.1-3010781 
ऽ2ग21-^1- नि 22४ 


1४ 


५ ए * २०7 त {^ 10 14 त ९14 52.९5 0118 


11. 


12. 


न 


5 ० 9 > © @» >> (> १ 


©, + >> 


8.47 ^ 8 ४47 114 4.1. 1184४, 74141028 


41111. 
921201ात7 ४21४2 0णा31 (121291६5) 
{30. (.#€5) 
{20. (4719€1113. ) 
129. (5४23812.521 ) 


९251987 200 

{001८211275978 प ४8एप 

111पल्लामाा0 ग ्0ण्ठा 111 8029४781 

1 2125भाापता8ााा 

21127212112{3 3711 । 

(२) 27 तालु ४1258 ति2{गल्डाा 

(9) एपा६४३ (वाढव विद्द्भो 

(८) 10120202 5५10278 #11258 [पि2 {2९9 

एदल 12८वृप््लाऽ (गाध्लणा) ` 9 हग 7 116€ 
2146725 एण र्€ा51८$ 1.0 

एरव121821 ^ (1712111 


ल्त 
{20118102 {3111115279 77४ 
1212025207211201201011 च 
1२221101112.1112 2212015 पतव एड 
1२2126६ 50212 ४ 1125ता0प 
(िद्ा1129#8 30 0 2119 ४2120212] प 


114 प ^पतता 
पि 1४152518 92767212 
(8) 2001६ ० {4710*1€0&€ 
(9) ०1 5015 
(€) 72072 [वा प्रा ४201 220082६ 
(०) 45252 (-21प्रा2 [पामा 


~ (३) 2721208 लाकवा8 ४1398. 1892070112 


(0) 5272011€1418 (112०० 
(€) 1.3४2.111 

द€ण्लाठा9 [र पावश्यो]1 
21121618 ४1158. 
61019 2०002. 1९81718.931)3 


9, ~ => ^ ९० ~ 


। णक 


¢+ © ‰@ 0 „> 


|, 


54 ऽव 


^5९३52.5172 111 {116010४7 1[प512110105 
1२2137117९29{8 

2718110 21:21108171 

& $ ८0217 210026111 

(2 00४1162 40701782 

(३) (-0][वत्वााप 

(9) 5211€70078 #11858 

नि वााद्रपह्ाा-- 5४02814 21142 
1221545218 

४1 प्रावा 22. ४ 2109 
9878112 [28772102 

81120211 ५8 


पाह 1950, गि 116 ऽप्रण-ल्माााा1१८€ 0 14 कषा, 
(ल णत दकि 4 पालौ आ 16 71001 0 [ण], 1950, ०६ 


21201725. 


{€ 10110४18 ०6०§ छटा {वहथा ए 0 = 0४762110 आ (€ 
४211005 18126८5 00117 1950-51. 


च 


4 ¢> {~ 


42111. 
{21681712 921127- ४ 2104198-4 {{8*21121 
४210015 2# 9[भ्तफश) 
410012४8 ४2100752 ४7३, ४०1. 3 


{तल्प 
9219262812527121 दाप 
410112४8 ४ अतिङ 
4011702 %202एदधाप 


१.१, (1.4:38। 
410#2611112111211 
व द1४23212. पणा रसा2ऽद्राप 
9 पाठाद्वा 12 [.2102। 
(2) {२2118017011:2 
(9) 21852517 | 


114.1.4 ४.21 .4 ; 
45 26111152 
21212 5219581716८4#8 


1. 


४1 


९ १,१।।१॥..१ 
५ 210#8 52178 ऽ व ्वा3112 


पद 1951-52, गार पाल ऽप्-८गाां((८८5 0774 शा, 
तल भणत 4.4 ८1.44 + फलौ, त पाल प्ली ^], 


1951. 


76 00 णणष् 00०६§ कटा € ला ४ {0 एप्णाद्म0 7 


111९ ४8171005 10109065. 


©, ¢ ‰> ¢ १७ {~ 


= ~ © ४3 (~ 


6212 


>~ & ~ 


2. 


(^. 
920121151241 
27712902 द2] 54४15122 (शमा 
81127418 5ररततद्ाक्षाा 
[7001111४ 71६8 {9771 
41111012 ४2 21001४80), ४०. 4 
112{{1 92218111 

1.८ 
1379012 ४1त#2 ऽपतद 8४वााणप 
९2212 [धत ता 
210 $व्लाावद पावा 
[रपाकः [<2172 
{21211131 | प [2112 

7.8, (1,9.१४ 

€४1€7212111--(-2116121:212 १21 
227 1218-४ 0६25 प्ौ2-23025४2- ४1४8112 09 541 58त1र818- 


1141.4 ४ 2.14 
1]1४21005211४2421700 
40५४212 ४ (तदपा 
282110257021४25प्(12. 10 21312212 लगा ४ 
15212112080411817 
14 पनि ^ 14 
5208 प701211259%8171 
^. २4.81८. 
5४५२(1-ला- प्तप 


1६ 1115 10€त 02४ {116€ एषाद्वप्रलाा ० पा०5६ ० प्€ 17100 
तावा पऽ610८5 (ऋ 06 ल्म जपि € पर णा #€875, 


४11 


3071€ 07 10€ ए27प्रञ८ा015 {बला प 0 एप्पल ०7९ 
1€ु165€९11६€त 9# 51616 ९०01€§ 77 1८ [डप अते ताल्वा 
111९ 7115121665 {921६ 37९ {0णात 10 ह्या (करणाति 701 0€ (०7 दत्त फ़ 
८०78710 पाल्या श्रा जल ९०0१८81८ लवा05 ॥2४९, 10 
दण्ट, {171६ पीला ०८5४ ४0 5५४९८8४ 601766४ 76841085. {16 #700 
1680105 21€ 87 17 10्0तं 078 दर€ा§ भातं ८०व््८ा 16241085 112४८ 
१९८ ऽप्६६७॥€त्‌ [प 5४३१८ 01865. = पशाला कारि 16801115 
276 {0पत्‌, 117 72४८ एदा 1१८ [च {116 {00110६68 ९अल॥ 11 11€ 
८256 07 2 ट्प 001८5 7 +€ 16 (07८ 1624115 112४८ (दला 
&1*€0 17 {76 {060101€ 0 10601 20721€व 111 (1€ (ल्प 115] 


16 @©0ग्ा171€11 07 1124125 {18 ५€ {0 € 11271९६ {0 7191- 
ल्ट (16 €ात्रःल ऽता ०1 ए पणिा८४(0ाा 21० ४0166 15 3 पा1*€ 
0 €्ल्छालाा$ 7 शा पाल वकृभाालाऽ, 9 ४1203 27९ ४८ 0 
{17€ ॥ाला10€ा§ 017 {16€ एदा ६ (गााा11116€ ४10 508ाततं 10 21115 आ 
ऽ९1€6110् {116 दऽ 10४5 0 एषित्वा. 1 02४८ 4150 10 
{11211 {116 ४271005 ९411075, "५110 21€ €>6€ा15 171 पला 01 पलत, 
01 7९2411४ 60156४08 10 लवा पाट = ्शप्रऽला 10६5 81 5६6 पला 
11700६11 11८ 21655. {€ 27105 7169565 (08६ 118४€ 60-02९६६६ 
1 एह [€ पाञप्ऽला105 1 त्ा€ 0८5६ पाडा 00551016 2150 
0१९5६४९ $ ३१८5 {07 {11€ 0216८ €10€त 0 पद्य आ (८वा- 
7911182 छप {€ (०01६665 71806 11 ॥1€ 70035. 


1115 €411101 01 2121212४ ०९१52212 5२-#४1४2 7211271 
15 0560 0 2 517 1€ ए2ए€ा 7190 प्5ऽता 101 27165 *€त 1 (16 0र्ाा- 
ला 07161121 श गापञदा 10८5 [.1018$, 1180725, 2710 ५९5८10९ 
110 २२, 80. 2283. 


. {16 अब्€ ० {16 पशापऽला 15 10 क" > १३१. 11 (नाभ 
161 1201105 ण 20 [77165 0 2 ए2हु€ वात 15 1 26४81891 
€112180लाऽ. {116 (८०410101 ० प्रह प्राभापऽला10६.15 ६०००, {015 
५४25 {72567106 111 ॥1€ १९7 {918-19 -जा1 & 1ाथापऽ6ा 101 91 वा 
पि22%218 9100010४ ° णता, विक्ा€ा1, व171818, 
11212027 [315171८ † 


#/ 11€ा1 {11९ ए7655-600 ४३§ 1&{६€ ५१? 9# 5112. 5.12 5825111 
0 ल्वा, 1 ५५25 एप्त पाभ लाह 25 10 त्मात्िपक 2६ 01६ 
21266 17 72&€ 168 25 1041681९ 7 (€ 0०त्ा०€, (णक 
116 52116 पाव्ा1056ा 10 ३5 2४21129६ 7 116 4 तङढाः [101279४ 511 
9. 2. एप ऽव 100 € 01655-तणफ 10 तकमा 
वणा (0 12४८ 1८ (जह्प््तु पी प्ट पाक्ापडल [आ प2£ [078र 
एप 11 ६5 पपत 181 90 प्ल प1871प४्5८10८5 414 10६ वापा मि 
€20]1 0, = @71 [ल्वा द 9 (णक ज 16 शागाप्रऽला ¢ ७25 


४11} 


2४11201९ ५४111 {१€ 07160112] [िडा४5८ 1065 [णिग ङ, व पोरकातापा, 
1 7६९5८ {€ (पाः ० {1121 [णश 10 5६ 716 8 8115- 
71960 ९०१४ ०1 {184 2871 00110 ला € 11६ [ग्ल ० (लमा 
पक ५२5 1106८64. [7 प्1€ 71९81111, 671 2. ऽ. ए 2719 52571 
1171561{ ५५२5 211€ 10 ध{560शदाः प्ण ध€ (11551 0011101) 25 
{0०५1 211€7 2 {€ 2265 25 101९त्‌ वप च्16€ {0ण॑-701€ 11 086 223. 
४४ ॥116€ ््5८11१्तं ८०0 (0 116 0718] भशापञ्<ा17015 
1.1ए्दा्, नार्वा, ३5 (६८८।१४्व्‌, 1६ ५३5 {0षाात 1० 2६1६6 
१1011 16 01655600 25 शप{{€त 0 प्ल लवात्ल, ए%तलणध); (0 € 
07161281 217-1९81 प1त1€, 2 {€ 0105 56 102४ णट्ला 
111501८९ कत (11६ 600915४ 92 (1्15610€त 116 52016 पाताल 
1011617 {171€ शाह 81720 हदाला† ० € {0108  आापााधय 
11151216९5 91 [वधल ० (्छापिणपा४ छटा णात 17 8 पाणिः ० 
72126९8 आ {{€ 210 प्रऽदा1ए६, 810 21 गा [ला ४४८ 0द्टा) ८011६८1९त 
0 {1€ €61107 20 10॥्टव 11 € {001-101९5, 1 +भ ०६८ ० "६ 
(07210 9 {€ कदया६०] कोधृणापञल1006 [10279 वव४द्ावापा), 0 
1९६ 1716 [10 एर ्रह्न [16€ ल्छपतं 87411 € {0 19४८ 116 76€55-6070$ 
९०11२{त्‌ ३८ 115 [था 115 70 अप्राह प्फ ६० वलापाप्रतलाऽ, 
10 7९01 ५५३5 7९८61 ४८व {शिण [7 आत्‌ 1८1८८ 1६ ५25 101 {0551016 
{0 18४९ {116 20वा114६€ ०1 60112110 (1€ 07655-600 10) कात 
ाठा1156710॥ २४६1201९ 21 (11 र्वातपा, 


$ 117091८5 16 तप {0 ऽप नि274#208 दपरा10००व10४त्‌ (10 
16171} [दा 1115 क्ाापऽला 0 10 (15 [तदाक 107 {72056100 27 
2150 10 571 #. [२, [६31$#81125014278 585171१1, 2147 ०1 1115 
110 10) ल्ल {16 ४७1 {17011 {6 1655. 


(0४, 00116181 1130 08011015 | ~, (प बि ¬2२.4 54 24 पि, 
1107818, 1241725, @८)1८101 41107, 
12--3- 19952, | 1184185 00४, 07161६81 §दा1€5. 


+ 


ॐ 

77 ८.74 
५५ स्तुवे पतञ्जरिं व्यासं राङ्करं च सुनित्रयम्‌ । 
कर्तृ सूत्रस्य भाष्यस्य क्रमद्विवरणस्य च |" 


517 72 21079274०4०द5॥1*4/722121द, ण [11त। 5९९5 70४ 116€ [1६ 
0 0प01ल्डणाो 0 {1€ 75६ {€ त प्रह 11करकाठ< 0211116 
71९1101 6९125 15 & 76८10८5 87 [11८९1९55 शठा] 01) 1०4८ {07 
1€ एल 01 710 1655 2 €ा5011 11197 176 हा€ तौ ऽ {2179012 2921203. 
116 155्€ ०1 {1€ 211107517170 ०1 ध1€ 71€5ऽ€ा1६ छार 15 ०0011655 
60170 ४€751281 471 वाल्य € 12४ € तार्टाहुा८९ ०1 00 ०1 
5८101275 85 {0 \*1€॥[1€7 111€ 2011101 15 {€ 3122 2४810203 1151 
07 5017116€ [तटाः 5832 ८27‰8. 1६ 025 {0 € लाा1€ा110९1८तं 11 11115 
601111661107, {1184 €00110४€75ए 51111 (€ा147€5 707 1116 शप्ला 574 
01 {716 गाह्य ष्लपऽ ग पता प्€ [८5 0716 15 2 (पादाता 
--11९ 117104141111105, 1281711९[‡ {1€ ४०९०578 817 {€ ४ 0०९2012558. 
5412714115 = त्प्राजा[110 का € ४०६४ऽप्र2 अत ४६५5 
2५11107511109 9 ॥1€ ४ 0६801252 276 51111 प156॥1[€0 155५065 6०६ 
ए (0105, = पणल्वाला 16€ 200 01 106 ४०६य्ऽपौ2 15 16 
5216 1972311, 111€ 1110575 8117107 0 {7€ }181201125#8 07 8 
तदिद 0€0501 01 {116 ऽवा वाट वातं शीलाः प्री वपत्ाला 
1116 ४0९६25प741118 52 15 106 58716 ४९02४२82, 1116 [012 
20111017 97 111€ 1317807125 0783 017 50ा1€ [15167 7811651८ 27€ 517 
00) ६5105. = कधपापता०पवड 17106€वै अआ€ 17€ 17०९5 वपत॒ 
27076115 0 56101875 छ) ऽपली उत नीलाः वृण्टऽ्ठ5. (1८ 
{0169178 18615 51९0 2 20०0५ ०{ ४§रदापि] 11६ जा) {६5८ 1551165, 21 
ल015ऽद्पुप्दा({# 0९5 {€ ९८0 (छपा 9 3 11056 
1171८7651€व 1 इश १६५6 ज्हा5. 


4111/107 0† {८ 0८257170. 


€ ९९८१ हाद111118 ता 27 0111050६, 23141711181}, 11 111६ 
ए7प्221042 01 115 ४३।८१३7020 ४३, एणोाप€ € 01185151 (11€ ०६९ 
{07 10704740 7675 10 {16 घ्11€€ 5851785, ४३1१३, ४‰2.- 
{7218113 21 + 0९३ 95 {16 76€870६611४€ 7116815 {07 116 [पा 106८207 91 
{€ 11९८ £121क5, 19161 ९९42 (00), ४९६ (5€६५1) 2110 
2101145 (11710). 


८५ कायवाग्बुद्धिविषया ये मलः समवस्थिताः । 


चिकरित्सालक्षणाध्यात्मरान्ैस्तेषां विश्युद्धयः ॥ "१ 
1 


04 


4 & 2111, 11९76 15 १९ 2001167 एटाऽ९, {16567५60 0 {72 प्ठ), पणत 
गरदादिऽ {0 22127197 25 12४10 €50€ाटव 176 पला{9, शला] 21 
„ 01951631 1 प्रएपा1॥९5 ना व्री 0 प्€15 07 ८०६, ४‰ २२27212. ० 
७2148, 8710 02115 पि 25 १€ €5णतणातलः ०7 {1656€ 162 55115 
112 [1216९ 107 {77व+व्वकद ए, = ¶6€ ४८756 17 वुप्€51101 71115 
{105-- 


योगेन चित्तस्य, पदेन वाचां, मङं इारीरस्य च वैकेन । 
योऽपाकरोत्‌ तं प्रवरं मुनीनां पतन्ञाटिं प्रञ्चलिरानतोऽस्ि ॥ 


¶12६ 41901211 ५25 4 पहुल्‌ उ प्ठात ० ऽश्ार्दाणह्‌ 111 (16 111६6 
0605 01 (दाधा, ४०६२ 80 060ात06€ 15 2701४ 6001760 0४ 
1810190९ ४३, 7 1115 2111 09 {116 ४०६६३७2 01 ८81571211. [71 0116 
21 1116 77621019 ८75९5 07 (1115 2111 [€ {185 21 21{0010्727001९21 
166761८९, प्रा € {85 (60171076 11756] 10 22180 1211-0, 
61205) 1€ 100115€0--111 1651६८६ ०7 19911 ८01105९0 111६6 
0106€ा€ा1६ 075 1 € (11८6 {0ाला€1110160 5257125 {01 1116 
पा 17८81107] 01 116 141८1702. 


५८ वाक्‌ चेतेवपुषां मरः फणभृतां मेत्रैव येनोदृपृतः ॥ 


4.16 11९56 61258105 01 22181311 11 {116 (11166 त10€ा€६ 52511725 
27€ 8611211 776 10 9 721771€ 0४ (216्22021)102119 10 1115 
(०011 097# 0 116 (अआ वत्वऽद्रीावि, 1 8 1206810४ १६८५९ 011 
2६187421, णठ 1€ ९प]८दु1ऽ€5 85 11€ 3४11107 ० € ४०६२5, 
{116 11701252 214 {16 (81712 70181158ा19[ 18, ९८00108 (116 10९2. 
01 {€ 71७५०] ०1 (€ {117८6 [पापा 11८5. 


८ पातञ्ञठमहामाष्यचरकप्रतिसंस्कृतेः । 
मनोध।क्रायदोष्राणां हर््रऽहिपतये नमः | * 


{1 718 101 € ०६ ०1 21966 {0 ३तवत्‌ 2 10६6 2 ल्क त0ा छा पा15 
४€ाऽ९. {116 5८1६८ 9 प्ाह्वाला€ एग0पाप९ | 0$ 52८ ^ ९11४658, 
०15८191€ 9 8145४211 (1९#7 15 1€ {लदा {€व्‌ 10 25 (०706270 
57156110, 0९८5९ [[1९८ प्ोप(द्ाल्त्‌ इलला८९ ९५25 उ€ा0४प।त्त 9४ 
21971811, पतला 111९ 255प्ा1८तु ॥ङ्€ 01 (वाभ्य. 1 0€ प7व110 
\०१५ 64127010 7€ [९75 10 {11€ ०६०5१72 ; {1121 ऽप८ौ1 २ 11646 ° 
1€{617ह 10 1८ ४०६०५19 15 7101 वृ पााद्वि111271 15 1९87 णि 
111€ ९४1१६८९ 01 31012, 10 ५565 {15 पातुध्रना१६त 200६]1अण 
10 7€{€ए {0 1€ ४०९३572) 11 006६ 1 1{€ ए<{0ा४ ४€ऽ6€5 
०1 1{11€ ८1111. 


।४ ङब्दानामनुशासनं विदधता पातञ्चले कुवैता 
वृत्ति राजमृगाङ्कपंज्ञकमपि व्यातन्वता वेधके |" 


¶। 


ला ्छाशतंण् आत ऋ0वपण+गाट लणपयात् ० 2०1} 91115 
पाला ता (वाय्णतइवोञच 2 2206675 0 पपा€ अ) 
१६४१९८६९५्‌ वृ्म€ा, [0 11€ [3 70720] प९8 ०1 चि2ह९३2. 313{{2. 
(7 ध12¶01हप्ठपऽ 5{०॑लाा€६ ०1 १26६८52 11६ 27211 15 1176 
8५11107 017 (878९४ 7३८८०1४ 51115 तिक्रा 60०70४ला§$, 11 15 
21771081 111€ 135६ ५07 01 (€ 0४८5110. 10 {€ (०८८४ ०1 


वोद्धार्थस्य वाच्यत्वनिरूपणं, ॥८ 596-- 

५ तदुक्त चरके पतद्घलिना-. 

! सेन्द्रियं चेतनं दभ्यं निरिन्दियमचेतनम्‌ । ! " 

ए प्री 00, ए111]६ हन्पु0पारत11 {06 ४ 27161165 91 54010, {€ 8210 
6165 {7001 (87018 {क 1६6. 
८५ चरके ऽप्युक्तम्‌--" सामाम्यमेकत्वकरं विशेषस्तु परथक्तवदक्‌ 1! इति । 
एतद्रीजमध्युक्तं तत्रैव -- तुल्यार्थता हि सामान्ये विशेषश्च विपयैयः । इति ॥' 
& ५070 7712 € ३04९व 676 011 {116 52] 5{&7106216€ 0 {1115 
76 लि ला५८ 0# ६6६2, वा २४०८ 701088151॥ 97 ४1८ उणौठा ०1 
111€ 11211012 598. पला 116 {8६८5 छल 7191६ 01 22127121, 11 15 
2.5 &००५ 25 010९0, 1112६ 11€ {हि ८१1८८ 15 {0 1॥€ 0111081 22197- 
1211 41त 101 ६0 219 १ऽ८५५१०-८०८अ7 [217 01 8 18 ३६९. ऽ० ०६९- 
71006 15 € दश्दाा८€ 01 १26९८52. {07 {४1971811 1121 € 1185 
€>{78 ८६८ ५0181015 {छा 21] 175 {६10४911 = 0115, 16 2121025 - 
0113598, {16 ४0वञप्र्द 210 प्ल (दप्५]६०) 170 10 वप्ाह्छा 
115 0701प5€ 6121165 [ता € एत्ायााद्वा11025212, ॥0 
भणण ४८ आद टि 7 हाच्छाला तला 77 11८ जा0काण 
23865. [1 15 110६४९7 1{71प्९, {121 (1९ अ{द्{लााह€ा( 11 1116 [.3हप्- 
77127] ६ 2700९478 10 11016६46 112६ (2728 15 € व 9 
106 07 274 101६ ० € द प्(©ा, द्वात 0 (115 4८८51100, ५८ 5021 
९००५€ 70६ {0 00112116, [६ (1015६ [6 क्दण्टः १८ वलाः 1112, 
20 11067 01 10512165 € 0€ लवं 10 770४6 11181 श्ल 0 
11 15 तप्ऽछ पाडा {0 € 10 ६116 (1115 91 8 17181 0 11€ 1121116 
01 |€ ॐप्ी0ा, बात 1४ 15 [[ला€07€ 00551016 11181 (वबा 21६8 15 768] 
111€ 7121116 ०1 {€ अप््ी0ा, 16€7€ {47106 ५11 1115 011. (18 
16 15 {€ १५०८ 97 8 {1९21156 [प नक 210 15 ३550८121€0 क 
(€ 50 ८9 (ला ४६३5 वप्01६त 15 10 फटण्ला [कणत ध0प्र, 


{2712912078त0ा11 ज्ञ या 1115 281871411647118 8150 ०98 ५४९७ 
{1121 22127211 15 8 5771727 @274, ९/125#0/0/2 210 ८द7/76&व८व#द 11 
07९, 2.5 116. 1185 (071905€तै € < 71 ४०१2, {16 01654 11 
४ $ 21६81214 9710 ॥1€ ८11९0 11 ४ वापर. 


५ सूत्राणि योगश्ाह्चे वेयकराल्ञेः च वार्तिकानि ततः । 
कृत्वा पतज्ञलिपुनिः प्रचारयामास जगदिदं त्रातुम्‌ ॥ 


+ 11 


116 छात "12704" 11 (15 *€75€ वाट्वाा5 71 {116 (0116 "2 
८0171009 € 11212075 $$. (4 1€ा€ 15 1४5 2 (्छाप्राापक 
[वताता 2४॥€011८३1९व 9 पप्ा०॥5§ 2प11017118॥१्८ 1 ल्त 5, 2००४६ 
2०६३१] 21115 (6011111 प्प्रठा§ 10 06 प्दिपऽ ०1 ०० 27 {८८02 
65104८5 115 €7061-1112 17 ठाद 10 ४2410108. ६८८ 1४ 15 
0111# 7€25012916€ 10 (00ल[प्र्त<-11]] अपाला टप्पा ८८§ 10 11€ 
८0117279 276 0८ ह्-{02६ 10८ 21114007 म 1/८ ०4459112 75 
{11८ 5111८ © 010 041, 1/1८ 2111101 ० ६/८ 2{41120/1254 2. 


441/10# ० 1412 ८04 4571720/12590. 


(1616 216 2150 111111115{81€2016 €४।५६॥५८§ 10 510 {112६ (17 
2111107 ०1 € ४०६६5प1.20125४२ 15 ध1€ 58716 ४८०२४१३5, {€ 
८्दा८07२{९तव वपल ०१ ॥€ ए181185प{745, ४३८25272 
115 23012111 [85 1115 {10171226 (० (€ ४४252, 1116 21107 21 {6 
ए372111145्725 210 [18175 [1711 85 € 11681101 9 1116 
17011050 07 1.01 22203. = 410 10 1115 (्गाााला11819 
६८४2. ४15278412 00 116 ४०६३51{72012ए2, 11८ 11615 (0 (€ 
8011107 01 116 6010500 फ़ {€ ण्टा‡# ऽवाण€ €011116€॥ ४€02४ ६52. 
1116 1060६11 गा प्ल वपा0मऽ 9 पाल ४००52012 ६#2 2100 111६ 
78171125 प्र(85 10110४5, ॥ऋला€{0ा€, 25 8 5111101८ (छाना, 11 € 
21110171 01 #२८३52111111578 15 १०६ ६811६ 0 वृ््०ा, ५ 
116 (प्त {01 (16 ४०६११118 ० ४1] 127115४, श टा८ 11६ 
४ 0&850{720112592 15 4९३९710८ 25 १ भदा11201€ प्1111-०८८अ 5५००१६१ 
०६ 07 {€ 161116८८ 91 #€8 ४25 (०1९९8110 1 115 7011० 
01*€7510९त्‌ शहलाऽ 0 116 ण1द्वड€, {ठ णता 15 तापात्‌ ०५६४ {€ 
८111171८, {०0 {07 प्1€ {ग द्ा7०5॥ 07 01113, 11135 2150 € ८11८ 1€1€ 
0 ४2 01 (गा ्रिपफवप्रता ० ४९५३४४२५2१ऽ 2४007812. 1116 1105६ 
प्र255811201द १0० ०7 (€ पलक ०६ (€ अप्रौ075 ° £ 
- ४ 025६८72012594 27 (16€ ए37211111250612 15 ई पा71151€त्‌ 0 ए2४2- 
६7१६ ४8100217 1121६, ९0 51165 ८ तला (क 7651 
९0116161 17 [15 (जाता ९०1[८्तं 212 0 (06 [दहापाा०त [| 0§द 
१४16) 16 5295 ^ योगसुत्रभ।ष्ये वेदान्तसूरकृदु क्तत्वात्‌ », {111९85९ 7<€.{८1ल11665 
[गा ४0 +€ (गालणञ०ा, 1112४ 1/1 1८101 ० 17९ ०4०5 71172615000 
25 {८८८४१९5८ 20114८८८ 2८2 5 @व 72/10, {11८ 01107 ० 1८ 
न ५ च म = = _ भ 

1. ब्रह्मस्युत्ररकरत तस्म वद्व्यास्ाय वधस | 

ज्ञानश्चक्यवताराय नमो भगवतो हरेः ॥ 
2. नत्वा पतज्ञलिमूषिं वेदव्यासेन भाषिते | 
सं्िप्तस्पष्टबहथौ भाष्ये व्याख्या विधास्यते ॥ 
3. श्रीपातज्ञरुभाष्यदुग्धजूपिर्विज्ञानरल्ञाकरो 
बेदव्यासयुनान्द्रब् द्धिखनितो योगीन्द्रपेयाम्तः | 


111 
@10/111105170105, १९10८ 974 +0751012एत्व॑ 25 20 ८्वा112प्0या जा 
7.07 चि22$218. 
1111107 0 107९ 1-044511726/1054#0८72/274110. 

प्रला€ 276, 11८८४15९, 5५06६ ह70पात्‌$ 0 0६11९४६ ध ६९ 
21107 21 (€ ४1४2741): {00 1§ € 5211€ 25 587{द41210112 ए ६४2{- 
१६०१३. 111€ 01] द्व] €तुलात८, [0 फट्ण्टा, [1 5प0ए0। ० (1115 
पतलणपित्वप्ठय 15 116 उपमा ० (€ (०ण्ाला 81 ५८६ लात ५ 
८26 0200, 25 {0पपत्‌ 70 € दाप्ञला ए, (0प्रहूा 1 पाऽ 96€ (छा 
९९५९ 771 {1€ 52716 07९21], 2६ त्र तदाद ० प्ट (नुनीणा5 
0 छपा प्रागा 1005 15 101 21085 060ातु॑पृप्टऽप्ला 06 ९010- 
7171011 15 पदाति पल 5476 25 {1056 10प्ा1त 10 पष्ट धतृताठश्- 
1€08&&0 071८5 07 57878, 111६९ ॥16€ ९2405 01 ॥1€ ॥7451/12770- 
17042, 87 १९ प[ण०८मीि ३८२९5 १1३६ {16 कजा 15 फ भात 
011262920दत4, ०18८ ्€ ०7 ऽपे कणत 2६4४8204. [६ 15 
10 पट्टा 7४6, 11121, एणीा€€85 17 € ४५€ ०1 ?219712115 दपाठा 
51117 ०1 ॥1€ ४०६०57६ वात ४ €त2४१२५३०७ऽ ३प््ा0ा5[19 ० ८६ 
% ०९६5प८12012.5%2, 1€लिहा66§ 10 छाल शता {5 0682710 ०४ {11 
{77010 गए पला 9 (1€5€ ४४७६5 0 ॥आला) ६० [८ 1{0ात्‌, 
10 51८11 77651 ४त्‌ ६1241101, 0721 0८ 11161, 1125 0€€1 {726८0 
2550618117 1171 5०182, 8 त्जाााला1व7# 01 {11€ ४0६52 
0112592. वि९ण४८ा (11९1८55, प 5011€ 01 1165 ५१९३६11€556€85, 01) {116 
5016 21111011 01 {11€ पालवृप्ा*५०५४[ अ{वरहहप्टत 0 6€ (6010101, 
1 714४ 710६ € पा€वऽ०ा201€ ४० लतव 12८ ऽवप 1६412*5 20111075140 
07 {1115 #1४078108 € ०८८६१४९५, [आ = §ऽ0पत ९४५८१८८8 {0 {16 €०07- 
21 ३7८ 010 पद्ा( ८० [द्, एभ्प््लपद्व$ 0 11056, ४10 0६116६५८ 
1112६ ९211411४ 1170९९5 11 ३1] 6172171 (5८८2 {107211171130एका1) , 

एिप्राील 8 601710871501 97 1716 00011 5€ा1€11665 01 50116 
0117 २८1६70५ 160्८्वं (गाला†21165 01 = ऽशी(दात 0) {€ (वा 
102१2 (0711534 214 ०0 € ष्टी नृण © = 20451811108 
तवाप्ा25पा72 १1 (1८ उलो ऽाप{€ा1८८ 91 ॥1€ 716560६ शठा 
1€४८०1§ 2 पिपा 165016९ 810 5५६६८55 ॥1€ € 01 8 (0पा- 
1101) 2111107 [लात्‌ प्रला. (16 10111८8] 12716 # 1४812112, ४९तै 


1. इत्ति श्रीगोविन्दभगवप्पूञ्यपादशिष्यस्य परमहसपरि्रास- 
काचायस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतो श्रीपातज्ञखयोगश्चास्त्रविवरणे प्रथमः पाद्‌ः। 
2. (०7276 {€ 10110 ५17 -अआमिदयतद्क्षरमलयाद्य्टाध्याया 
छान्दोग्योपनिषत्‌ । तस्याः संक्षेपतः अथजिज्ञासुभ्यः ऋलजुविवरणमस्पम्रन्थ- 
मदम।रभ्यत । (1270062 (0४1158५. 
_ , अथ “ आभ्यास्िकान्‌ योगान्‌ ` इयाद्यध्यात्मपटलस्य संक्षेपतो 
विवर्ण प्रस्तूयत । 270४510४ [)113117025प्१7६. 


अथेयादिपतज्जल्योगशास्लविवरणमारभ्यते । १०६२५०८२. 
0125 ४९४1९ ९72108. 


31४ 


7 8] {1९56 (०ाापाला[द्षा१65, 1702718 पदा 57 (0 धा 
511९8९€511011. 47, 17 € प्रध्ाा८70प5 र{इहा६८§1 ६0 ४०६३. {0प्पप 
111 11६ 3721111185॥/12011 58, (€ 77 ॥1€ ४070 ०4०९5८70 एं ण 
1111071४ €(10गलत्‌, वात ध1८€ 58716 ९०7 15 {0पा प ४५९ 1 (16 
0165 ५०६ 2150 7 योगराल्नविवरणमारभ्यते, [{.25119, {१८ 51४1८ 91 
1116 77९56111 +४07६, शात्‌ {11€ पा 2ा1€7 0 €>0051॥10 2150 0६97 1116 
0272616 15116 ऽ{वाा0 ०१ 52125 (11775, 411 ८1656 ९४१५६८९5 
ए०1॥॥ 10 6त्ढ§ अप्ा0्जा ० ल 0656४ ४०६३५४72. 
0112598 ४1४874112. 
47; 00{९८11010. 

९1205 116 5ता1एट्छ६ वाहा 26215 ४602४१४ ३52/5 
8४1110751110 017 {116 ४ ०६९0125४ 27 8727215 8109109 01 6 
# 0210115 $#2४1४ध17114 15 1116 18८ त12{ 11८5९ 5१ ्€ ॥€461€75 [18४ 
01511115560 ४0&242752118 ९5 01171010, 25 51९ ९51९ ़ # 352 171 
1116 5742 एतेन योगः प्रयुक्तः (11-1-3) 910 25 €प0प्पतैल्व 9 
5 वौ धा2 101 1115 0८542 07 1116 5वा16 5177. = [॥ 1712 € 25567160 
11181 1८ 15 लम्ाटााद] $ 17120126, 13, 11८1641016 पीर 17८ श्ल 
70675013, 110 ॥8५८ 50 लसल ४०1८६ पला 2018ह०ा्ा) 10 
४ 0९202751, 5० ॥2४८ एला तह दप्र7075 01 2 66590 20५4 2 
07/10 # ०४८८110 11 ४ ०९४. | 
4/2 ०९९८17011, ८०॥4द माठ. = 72711101 0 ०८ कादं [7८2 11{0. 

10 215 लाह (115 0701८10, 1६ 185 ६0 0€ दोट्वय [$ एकाह व 
प्रत्‌ पढ 111६ वपता०75 9 (€ 7978 इप्र्व दवतं (16 645८ [12.५८ 
101 01104 ०1/12 71९1५४६ {11€ » 0&248153112, 101 [12४८ {16€$ ५८६[६7६0 
‰ ०६ 0/1८11101८ वर क 2५00८, 21 1६851 ०7 211 0० पाल [14५८ 3719 
21860115 (0 ५ ०६२५६75818. 171 ध्€ 58716 ०७०८ #८21# 1५६ 124/14- 
1002102 116171८0 (© 20०४९, 53701212, 17€ ध प€ तणा ए 01 ६1६ 
1६87 01 ४९0३४ ‰258 1185 पा121110100081४ २८८९1९0 ०९२ 25 †1€ 


1. € [गा[फापह 76 507ा6€ 0 ध वर्दाला€८९5-- 

() अत एव पद्मकदीनामासनविशेषाणामुपदेश्ो योगश्चन्े । 
पतला 016 5८८ स्मरन्ति च (1४ -1-10). 

भ, म भ स, (~ ६, ५ [नन 

() एषैव च योगश्चा्ेषु यागिनामनेकशरीर्योगक्रिया । प्ण्तटः 

८ ८८ भ्रदीपवद्विशचस्तथा हि दशेयति (1ए-;४-15). 
४५ व्‌ [क 

(५) योगङ्चक्चेषु (अथ तच्वदशेनाभ्युपायो योगः ' इति सम्य 
ग्दशेनाभ्युपायत्वनेव योगोऽङ्गीक्रियते । धध८य ५४८ 59४ एतेन योगः प्रस्युक्तः 
(11--3) 

2. सम्यग्द्शौनामभ्युपायो हि योगो वेदे विहितः) ‹श्रोततव्यो 
मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः: इति । "त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरम्‌ 
इयादिना च आसनादिकल्पनापुरस्सरं बहुपरपच्च योगविधानं शेत खतसे- 


च्४ 


1020 ६2६ 1€त5 ६0 11€ [त 26२ 07 € एवा {5६16 71" दद, 
€ {25 पद्वभल्पं (1121 ०९२ 15 २८८९९0८ 9% {1९ ४८५8 25 9 11169118 
{07 1116 7<411531011 ० वतप पपत त्त प्त्पाहा०प§ १६61६८८5 
{01 € 02715245 111 5प्00. € 125 2150 ९512101151९त 1४ 
0९कजाप ५०६ 113 ॥16 ४ 0६्वगाइ वा, 5 ०८९९0१6 त ए2 ह दात 
८168719 07९.प्णा #1€ [1165 97 0€111276811011 06५४८) 1€ & ९८९१21९ 
2110 1116 101-2८८९718.91€ 250६८#§ ° ४028.1 {11115 $ 758 णत 
€493.74, [दा 7101 एलाह 81120755 9 ४०९8 061ादण्ट [0 
€{161८8[ 18 पाछा 9 02 804 ४८५8118 27 + {10ृला६8ा 16015 
51050710€ 10 2 5४९६} 51110100 01 € {*५० कद^41105, 


प 0110114 ०‡ 00 &1104 {९41110-- 4 ०९1071८क 11010575. 


वि0 गाङ 876 ४$३59 210 50प् [29 शद्रा ए6ादटश्ला§ 11 (1६ 
205616९ ०1 शार ५1311877107# 06 द्ला ४ ०६8 8160 ४८071118, 0011 111८ 
&€8॥ 171€ [61९75 01 ४९02012, 00 1010 कल्व्‌ 0 11€ १४२1६८८ ° 
6271174, 276 21] ० (1€ ऽा1€ ल्या, ४८26250011101572, {1८ 11105- 
{11005 [ला एकह्ला 0 58101818, 107 11518166, 195 &०7€ दण्ट 2 
5९9 [पा वतं ९5120115 ताल एदा 9 प्र८ ४०९६१५३७५॥) 21 
1010. ^८८070178 {0 [रा {€ ४ 02885178 7? 1{5€]{ 15 ३८८1६916 
10 115 €ा1{176€1#, गा 1४ 125 5४067९0 [1 € [18105 ०1 115 50 ९४11५ 
1१65. पाऽ ४16४5 00) ४०९१२7588 2 ४ ९तक्वा19, 35 





पनिषदि दश्यते । लिङ्कानि च वेदिकानि योगविषयाणि सहखशः 
उपरभ्यन्ते, ‹ तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्‌ इति 
£ विद्यामेतां योगविधि च कतस्नम्‌ ` इति चेवमादीनि । योगक्षाल्ञेऽपि 
¢ अथ तत्त्वदकानाभ्युपायो योगः इति सम्यग्दशोनाभ्युपायतवेनैव 
योगोऽङ्गीक्रियते ॥ 

1. निराकरणंतु न साङ्ख्यज्ञानेन वेदनिरपेक्षेण योगमार्गेण 
वा निदभ्रेयसमाधिगम्यत इति । श्रुतिर्हि वैदिकादासेकस्वविज्ञानाद्न्यन्नि- 
दभ्रेयससाधनं वारयति; (तमेव विदित्वा अतिभ्र्युमेति नान्यः पन्था 
विद्यतेऽयनाय › इति । दैतिनो हि ते साङ्ख्या योगाश्च नासमैकस्वदर्धिनः । 
येन स्वंशेन न विरुध्यते तेतेष्टमेव साङ्ख्ययोगस्मरयोः सावकाशत्वम्‌ । 
तद्यथा (असङ्गो हयं पुरुषः? इ्येवमादिश्रातपर्िद्धमेव पुरुषस्य 
 विद्यद्धस्वं निशंणपुरंषनिरूपणेन साङ्ख्येरभ्युपगम्यते ¡ तथा योगैरपि 
(अथ परित्राद्‌ विवणेवासा सुण्डोऽपरिग्रहः› इयेवमादिश्रुतिप्रसिद्धमव 
निवृत्तिनिषठत्वं भन्रञ्यादुपदेशेनादुगम्यते ॥ 


श्प 1 


€30प्व्‌द्छं 10 1[6€ ऽदा€ 7012121 1118 € 5111111त ॥70 1४ 
ए 25 {0110 ५5. 

{16 {० ०/7व(0116 40/17 @1/ढ{@ = 26601417 (0 ४2९57211 
1065 70 3711 दौः (दप्ति धा उप्ाीजा1 ० ४€ ४०६२६25172 
50150760 ३अ५्‌† 13, [$ 716€-€11111€10† {६260615 11१८ प्र 1127$8&810112 
270 2८871811. 071 {€ 00 [18 {€ §6०[€ 9 ध्1€ ०4147210 
1165 7 € ््द्दधठया ग ट सप्र्ीदारतक  € 56-८्9ल्त 
77120/70710, ॥1€ ८०५५८ 91 ध1€ पा)1४ला३€ 050121९6 ¢ 116 » ०६९९ - 
§5172, 2110 15 1116610621075, 1116 50 ८8116 11141101, 02171९6८ 
210 {{1€ ४८ {11111211वऽ. {1115 ५0९5 101 वात ८811101 17170 (१४६ 
{11९ €017€ 6द578 15 171४210, {0 धाह 7170916 76850 1६६ "€ 
62572 ०५1 105€ {5 20111071» ०1४ 11 (21, + 11€1€ 1165 105 1६81 
07001, 10565 1४5 वपता. [7 {€ 765 6256९, 1116 1681 
211700४ 9 € ०९०५7517 15 70१ € 7005प[स{जा 9 {€ एत 
0165 11६८ (€ 2104/ दाद, एप {0 लकणं वरल वता 01 ४०१३, 115 
71015) 115 11610611191 लाटग{5, 19६] 116 21605 21 11 
2721 &08] 1५ 1९६45 (0, दा] $= ‰{४०7#८. = 2770/10010 110 115 
7100106211015 216 070 आ 001 †0 57४९८ 85 1116 हश70ण7त। ०1 
१५1८1 पाऽ लतम) ० ४०६२ ८० ०८ 0956 ; २५ 111८४ 816 1101 
716011४ टका! 1110प्दह्ी पादतल, (1९5८ धङ्‌ 06 २०८९९ 35 
{7प€ {1 111८ 2९ 70६ त्छाद्षतल॑ट्व] 0 0 €४त६16९5; एष [7 
{115 6२5९, {11८ 005 ०1 72/44/17८2 85 116 (०५५९ 01 (116 
1019€-5€ 15 ८0118016 $ ॥1€ ४ €68. दिला {1115 1६ 1011०५५5, 
1118१ {1001 ८16 ४०९०5257 15 प४116€ वप्प्ला 11४1५४९, (16 उ पाला 
611४ 21 #1८ 21440112 ९३ 70 € प८0पटल्तं पणाय 11. 





1. नानेन योगक्चास्त्रस्य हैरण्यगभंपातज्ञलादेः सवथा प्रामाण्यं निरा- 
क्रियते, किन्तु जगदुपादानस्वतन्त्रप्रधानतद्धिकारमह दह ।रपच्छतन्मात्रगो चरं 
प्रामाण्यं नास्तीर्युच्यत । न वैतावतैषामप्रामाण्यं मवितुमहैति। यत्पराणि हि 
तानि. तच्राप्रामाण्येऽप्रामाण्यमरनुधीरन्‌ । न चैतानि प्रधानादिसद्धाव- 
पराणि, किन्तु येोगस्वरूपतस्साधनतद्वान्तरफलविभूतितःपरम रुलकैवस्य- 
व्युल्पादनपराणि । तच किच्चिननिभित्तीकरत्य व्युत्पा्यमिति प्रधानं सविकारं 
निमित्तीकरृत, पुराणष्विब सगेप्रतिसगवंश मन्वन्तरवंशानु चरित तत्मतिषादन- 
परेषु, न तु तद्िवक्षितम्‌ । अन्यपराद्पि चान्यनिमित्तं तत्‌ प्रतीयमानम्‌ 
अभ्युपेयेत यदि न मानान्तरेण विरुध्येत । अस्ति तु वेदान्तश्रुतिभिरस्य 
विरोध इत्युक्तम्‌ । तस्मात्‌ प्रमाणभूतादपि योगशाशान्न प्रधानादिसिद्धिः । 
अत एव योगक्चाखं उत्पादयिता आह स्म भगवान्‌ वाषगण्यः--शुणानां 
परम्र रूप न दृष्टिपथमृच्छति । यत्त रीष्टपथप्राप्त तन्मायेव सुतुच्छकम्‌॥ 
इति । योगे व्युतिपिपाद्यिषतता निमित्तमात्रेणेह्‌ गुणा उक्ताः; न तु 
भावतः, तेषामतास्िकतादियथेः 


शभ) 


ऽत ६ (10८ ज पददा (€ ४०६२5851 15 ५1०६ 
0९एव†प7€ 0] ३6८९८ 1611005. ४2752६910%2, वा €87[$ 
१011167 071 0९६. 125 2116804 + 5८६६९५(लत 2 51111187 3001086}, 
+€) [€ 525 {121 {€ ण[१६॥€ 0 01 11€ 5५05(ध्पा 2 21 
0०1९८15 091 {€ \५४०पत्‌ 15 0८#०0त 1{11€ 56०{0€ ° *#15101, 80 {13 
0षाा5 शाली 2८6 56611 26 पला टं 1055. 11145 5{9(लाप्ला। 1111701165, 
25 ४ ३८३50211 1155 ९11५६160, ("€ {21511 ०1 11€ ००[८८*€ ५०10. 
70, शालय ‰दा§:\&द7039 11४3 ८००८९९५ 1112८ (१९5८ 079९८15 ०7 {11€ 
४०7{त 876 {213९, 11 1{क11द्ाठता115 {0 -2८6९7011118 (116 704/12714 874 
01161 71161 0168 35 1६15९, 210 7 11791 (६56, 1 35 वाच्या {121 {1६ 
धा ०5€ ०1 € ४०६२३578 ९211 701 € 10 10ए0पात्‌ ऽतौ [ल 
11005 [[पऽ70)5. प्ट 11245 प्ाला€{016€ ५०0८1पत८त, 01181 (€ ४ ०६2- 
5251718, 70] पाप€7510०प्‌, 15 पणा†€ ४३ 21 11 15 011 (1056 
1113 ९६८127९ {€ पा्ा12{€ 1110(1४९ ० 01€ 52512 10 0८ 11€ 00510. 
18110 91 {16 2170द/ दद प ६४८ 8172$€0 २५५३१ 210 11६7101९ 
5110४10 10६ € 16116 पणा. । 

411€7 पाप्रऽ लम 0] 116 (०६ एला ऽत {१८ 91 11६ ४ ०६2- 
5751३, 2८257211 125 पलाा०ा5(7216प्‌ं ६11€ 038711101# 01 १ ०९३ 8 प्रप 
९५27३ [४ वरि ८५ ६५४० कृ 350८6151 एव्राल] क, {1 प्राा४ 
7€5€1101271668 = [6{छल्दा) # ०९४ 21५ ४९02118 21त 17€ 1236॥ 112 
2726116€ 0 # ०858 15 27 ९5561118] ल्वा0 ज पाट तव्या 
111८ [10815816 {८८८८ 7८110, ९८६115९ ९ 5€]{-1८2115811011 01 11६ 
(08०15245 ८111101 8118८ \%111710प[ ॥ीट९ ३ ०1 पट वाप्ल्लं [17095 ग 
४०९२ 111६८ +#1770, 11744116, वत, (01644 कात कात 07014/6/076 216 
{16 017८ [17105 [1€ 0/16/106, व/1).6110 21 50117तक. 

029४२ [1 §17, 1116 दपाठा 9 ध1€ व्वा [05 195 2150 
5181६व 11 {€ 53716 60111९५८ ध12६ € ४ ०९२5३57, 15 0५६ 2) €> 
120511४6 €]पत्ध9 10 रा 1८ ऽवा ४0६2, भली 15 लृहागणाार्- 
८३11 71९1764 10 1 ६९८ एएव1158015 11८ ५1९ ऽ ४९।२६५९1772, 270 
€075€व पला {] 171011९5 70 (छित. + ५1111 116€ ४1, {16 
‰0९20275812 15 {1105 1710६ 8 पल्णाव््छाा [10 {€ ४८५01, [पां 
37) 21311187 §८1€1९९. 





1. बहुं हि योगशाख्ञाणां वेदेन सह सवादो दयते । उपनिषदुपा- 
यस्य च तच्त्वज्ञानस्य योगापेक्षास्ति। न जातु योगञ्चाखविहितं यमनियमादिष- 
दिरङ्गमुपायमन्तरङ्गं च धारणादिकमन्तरेण ओंपनिषदात्मतसव साक्षात्कार 
उदेतुम्ेति । तस्मादोपनिषदेन तन्तजानेन अपक्षणात्‌ , सवादबाहुल्याश्च 
बेदेन, अष्टका दिष्मृतिवत्‌ योगस्युतिः प्रमाणम्‌ ॥ 

2. योगशाखे योगनिरूपणं _ अ्चताश्चतरोपरिनषदादयुदिष्टयोगपरपश्च- 


नरप । 
© 


१11 


10€76€ 800९815 (0 [८ {४5 3 607८15५5 01 00 अछा 
1116 57005075 9710 [7{दा16€{€ा5ऽ 01 {€ ४ €तद111848158118, 10८ 011 
200६ (१1€ 305€॥८९ ०1 21 ८01016८ [€।षल्ला # €421{8 800 ४ ०६३, 
9४१ प्ण 15 11076, 20 (€ अद्लवा एत ० ४०६? 5 811 2111105 
100150€715871€ ३८९८55०7 ४ 017 {€ तदा ०1 पाट [02715016 011114- 
17९12. [पतततं 1॥ 1115 101, 1४ ए्त्णा€5 6 $518] लट्वा, एा1$ 
४ 25३, 111६ 5{74९07@ 810 ऽ कताच्छा7, {€ 1750272 0०६. ११९ 
४ €0211120275398 5110 ४त [६४८ एदल) {€ व्प्ा1076 णा 8 7/1659घ 
21] २ &/06क0८ाएवाकक्व [1 (116 9 ०६५०००६7. 


१ 01111011 ०‡ 2040 4114 {९4211 10--70/01 0115 2111114९. 


कला ऽ कौ1र8ा& 570 ४३८25721, ६४०४९ 710104871505 01 1116 
0९02119, [लाहा {1€ ४०९४ 85 दा 8८८९550४ ० {1€ ५८02118 
2110 ०१९८०7८ 1141 [€ {दाप्रंणी ० € ४०९६2518 5 101 10 
70511216 17€ 2700/114 वत्‌ 0 हा एप त0८5, 11 89 ए€ छल (0 
0१६५०, (णौ 11115 15 {€ (01८८८ ए€ा§[0६८॥{४€ 07 11 {1686 
४ ९0211116 {1111165 [18४९ 171700तं # €वृद्वा1{1 1110 ४०९8. 2710 {४८151८त्‌॑ 
0९३ 10 ऽप्ा† (ला ०५१० 0165 ल्त त्लपण॑त््ठा§. = प्रला८८ पाला€ 15 
5111 आजा नप शटल, [वजा पतो (1115 वृपच्टइतना ० (160 
प्गा$ 0०{ ४०९६३ ३0१ ४९02018 15 10 [€ ८011510€९7९0. {11८ {55४९ 
711४ ०6 {व[५€ा 10 ०€ 5€4॥[लव, 11 (ढा 06८ 7070८ 1181१ 2419719], 
1116 भ्टा$ 5001507 01 (€ > 0१6३519, 511६1६5 116 58116 ४16७5. 
(16 ३६({६04€ 97 2:3189]811 10 # ततत, 11६ € 01९, १९५९६५९७ 10 
€ €8ा11116त 81 1€7६10. 


91 11171515 91 {4187121115 > ०९३5॥॥12 21 0 ५०011९5 
€४९15ऽ {1181 [1९ ऽप्र05€1110८8 10 17121) $ 0{ (|€ (वाप्‌1118] {1९01165 91 
\/€0 2111६ 11011151. (५0९ ५1 (€ (1451 {01021 ला{41 50021105 ०1 
^त४९1{३-५९4)1118 111:1 11€ 01] ९6[1*८ एठा 15 वा पडा, 1741146. 
{5 7101९] # 5५६ ९८७॥€प (पातं ३९८९71९त ४ 7140 [४1 1) (€ ऽप्त 


कृताथ प्रति नष्टमप्यनएट तदन्यसाधारणत्वात्‌ . 15118 १३८87क8 17 15 (गणपा 
2$ 8108 एृवकाप्रि वि 01 पाट पाव्य 185 [एलतवलाल तल्प 
11115 57/74 ३१1५ \*11€ द॑प्रलपंवप्ष 15 शञर८६ 17106011, 125 [10०४ 
{1121 11 ारांटञ पाट [पञ 655 01 116 ४४0. प15 लत्िताफाता) 
20 17८ ० प्राह प्राला† लाा॥ ९८ 5{पल्तं 17 071 २५ [0110 ९5.1 








1. कश्च (कृताथ प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्‌? इति 
पातञ्जरसूत्रम्‌ । अनेन च प्रङृतिप्राकृतिकात्मकं जगत्‌ सुक्तापेक्षया नष्ट 
तदितरापेक्षया विद्यमानमेतरेतति पुरुषविशेषापेक्षया तस्य अभावसद्भावो प्रति- 
पायते .। एतच्च तन्मिथ्यासेऽत्रकस्पते । पुरुषविशेषमपेक्ष्य एकस्यैव 
वस्तुनः सद्धावासद्भावयोः शुक्तिरूप्याद दशनात्‌ । तत्र हि काचकाम 
ङादिदोषदूषितनेत्रः पुरुषः शुक्त रूष्यसद्भाव प्रतिप्यते । तदितरस्ु. ञयुक्ति- 


११५ 


(1115 57्11व 51३९5 1124 {1716 ८०{६५।४८ तावि ८८६०5८5 10 €>15४ 
101 ध 08771 कहा {€ कवष 01 16450, 310 (10णषटी 11 15 
11105 1011. €न्1ञ[ला{ (आवद) [छा पत€ ९75८८४८ 1 {116 7९2115९0 
९०५] (९161८), 1८ ५०८5 €> 15६ {07 0पाटा5. = 1115 उाप्ापाणाल्तप5 
€{{ल11८6 27० पजा -हन्यञलाल्€ ०7 176 #0ाठ, पणे 15 [णवै 10 
{1115 ऽ्र7व, 206क 21८211४, 1९245 10 10€ 121511४ ० (76 0710. 
एय, णाला दा ०9८८६ 15 वदत), 11 लटा €6515 107 211 0 €15915 
{96 7016. 4 1€2] 009 ]द्ल॑ [1८ 8 0, ण 178121९९, (८६71 7101 लऽ 
{07 2 [लि 27 5क्रपा91८0४6$ु € (10 -ट्ञजलणौ 107 05, 
पला 1 ला 56, 11 (1515 107 भा 210 15 ऽध्ला 09 9], अत पणा 
11 00€5 1101, 1† 15 7011 -€>151€ा1६ {07 31], 271 15 101 5्€ा) $ 2४. 
[5६ ६16 लगा 15 (€ 62856 07 8 1{815€ 07्ल 07 27 1[[प्रऽ07). 
ऽ {प्रध्]187€60४5 लन 1९८6 उतना -लम[ऽ[दात्€ जा) 116 एन15 9 
एप ० तापिदाला ` [रकाणतवप2ऽ (त्णा511101९5 1८ टार पापा 
51611 {2136€ 09८४5 0 [[051019. = ० {2 [६८ (1८ ९३5९, 0 103181६९, 
० २ (1371 ७7 0९ त्रट्‌ ए13101 (ए110 125 811 11115017 सदनात 0 
&11४९7 00 2 1६५८८ ०7 हाला कला, € 19186 51ण्ला ल21515 0४ 
{07 [ा7ा, 31 15 7101-€9151€711 [07 घ्‌] ताह्ाऽ, 1४5 12197] 0 
0९5८1101 {11€ एठा 235 511:011216005]$ चकला अत्‌ ला 
ल्त दा६ 1185 11116] २८८६८ (€ ४८ तप्त पीट्छा ४ 9 प< 95 
01 (€ ०0¡€५11*€ ०10. 

2120 दए व८्टा १2 1135 11161 [दत्ला ध (८ ए६।९ लापा वप्९ञ- 
६01) 45 10 $ ९2180 द]1 अपप जौला ए1010हु801515 01 ¬ 0&8 1३४८ 
101 0एला]# पला २6 (1८ 25 त (८ भाते 1 लता 


स्वरूपमेव जानन्‌ तत्र रूप्याभावमवगच्छति। न हि पारमाथिकं घटादि पुरुष- 
विशेषं प्रति सद्भावासद्भावौ युगपत्‌ प्राप्रोति । तस्मात्‌ स्वरूपज्ञानपयेन्त- 
मनुवतेमानस्य तत उध्वेमप्रतिभासमानस्य प्रपञ्चस्य वेदान्तिनामिव 
साङ्ख्यादीनामपि अविक्षेषान्मिभ्यास्वं सिद्ध ॥ | 
अथापि कर्मान्न व्यवहरन्तीति चेत्‌ , श्रोतुबद्धिसमाधानाथभिति चूमः। 
स खु प्रथमतः से मिथ्येप्युक्त कथमेतत्‌ घटत इति व्याङुटितमनस्को 
भवेत्‌, तन्मा भूदिति सत्यत्वन्यचहार एव केवलम्‌ । 
आस्मनानाव्वस्य जीवे्रभेदस्य च मुक्तावनभातस्वेनघ प्रपव्चव- 
न्मिथ्यातम्‌। यदि न्यवहारदक्ायाम्‌ एक एवत्मेयभिधीयेत जवेश्धरव्यवस्था 
सुखदुःखादिष्यवस्था च प्रयाससमथेनीया स्यादियभिप्रायेणेव तन्नानाल- 
वणनम्‌ । सक्तौ तु येदान्तिनामिव साङ्ख्यादौनामपि केवलात्मस्वरूपम्रति- 
भास एव सम्मत इति परमाथेतोऽद्वितीयरत्वमात्मनः सिद्धम्‌ ॥ . 
ऽ॥॥258111011६-1¶ 2108719 207015--- 
४ 2102४81014 एतए, 1610111 44115252, 


१, 4 


4015090 211त {7५८07[6त्व्तु व तराता पलप रा 1९5, 17 {1८ 
1९211 [९८11€्८्व्‌ 1{ {6 ॥८ 16€ [गा], पद 125 215५६1८0 110४ 
52112 {12 (€ 50115015 ६1:04 {010 लऽ ० (तेपा २0 ४ ०६६ 
१२४९ 101 ५०1९ ३6 ०६1] 5 व ८01८८56:00 ० 11८ [1८8 [ल{+ 9 ध 
॥प्77181 10100 10 (ता1[लीहायप्‌ इट [15 तत्ता, 9 (0०८८5510) 
{0 11016९5 11 {1111०500 , \+10 118 $ १८ 51९९८८0 8६ 975६ 0 11६ 
10९2 01 ध्1€ 17९2111 01 {1६ भ०ा]प, 510 1521६९6 1८ 07 20 
11101८21 70700510. 


२1201 ४२687#8 [€] 10८05 = 0 0 3६ 1118 1६ 15 
10६ 011४ (€ व0ला 11९ 01 € गक ० (€ पणव (1 135 ६116 
{8८1६ 22070४३] ° 21197121, प्रा 2150 {€ त्लाप्थ वन्लत्ात 
{€ {108114805, 1127€]$# {16 पाक (€ ऽछा [1 {5 प्प २ 
{16 ४0202152 25, {010 णह 116 ऽको (1#25, 7051४्1६(€4 
711172111 ०1 50५5 210 1€60&01560 1[€ धा5[लजा 0६८८0 कण 
21)€ {5४व70, 01 10 12412 ४त्ववा $" ४८६४४, 11115 5 2150 2 
८01८८88101 10 [17411 = {781[, 27 11८ 1५5 €>018171६्व 10५५ 
01{€7 ५5९, 1६ \१०एत 1€ 10८ (0 (गा 76)€०4 ॥16€ 516. 


1२९१८ {1४ 10 {16 ३001९ ० 22187.141115 [६८ ६0010४91 ° 
11९ {151 ०( धल ठति 10 € 577 ताद्व २१0०५४९, 1६ 1712४ 06६ 
ाह५९५, (1121 111८ ९०7 वई या (1८ ऊढ 510 पात्‌ 06 [ल 016160, 
5 5011€ €01:11116€11५1075 8५९ 0016, 111 [16 ६५15८ 7 ५0४15016", 
2110 101 10 (11€ 56156 01 (1011-€>15॥६111* 25 175 ७८६८) 50६९७८८ 
56] 211 1711६ 07€181100 ४ 0पत्‌ ॥€ पताह ४२१ 7) ४८८ ० (16 {266 
11121 1116 4/1 @11/07(/४व (नश अदरने) ०५५५८०।९८५ 0111# {11€ {0117061 
5६056. [प1६्टााल्‌ल्व तड, {1९ 572 ४1 पठा 17 आपा 
{2171९005 €>{5{€06€ 10 1011-€>131€1८९, 0 णाक ऽाप्]1दप्०य5 
+ 15101114} 2॥५ 111४1510111/, जा *४॥16॥ (1६ 1215119 01 1116 +0171 
<27170६ € ५९६५५८८ 35 & (नजा) 25 11 15 101 [८०08016 णप 
1९211८४, [7 315६0८८ 10 111६, 11 125 10 € [५17१६ छपा, 1181, ६४९) 
८०१८९77६ 51161 11 [716 01617110, 1६ {81511} 01 {7८ ५०, (21 
€ १६0५८६५ [व्ण 1. 1 ॥५ [भी ० (८ सगत ठा) 11€ 
गणा ०१ शालप् जा प् 70८, पापा प्रता -€.1९६८०८८ {07 010, 2 
{1105 5{71118॥८०४५ (८२६151€11८८ वात 1601-€>15ला८८ ५1|| ६६211 जातक 
29 वा {71६४५01५ प्ल 16वतोपह पणा ० (1८ 5० 


{06 ४०11५. 

50 प्राप्ता 1५ बायी | ५11'5 १1 (0 ४८८३1६४ २६ +८४६६1९५ 
1 15 » ०६२5१. = 111८५१६९ 1115 कर'20द ५ ६150 1८३15 16511. 
711071# 10 1015 2७९१1 ०1 एता §२८1८ करकट, #४ ह ६0191111 
1116 त1# द सवस्य. जा चैतनाव्वात्‌ प्पतला [-ठ1ः113 तक ५ चतः कमणः 
समानकतृक्रादिच्छाया वा (111----1) +€ दष्ट {1115 प्रदा 


अ 31 


005 शध पगा अथवा सर्वं चेतनावत्‌ । एवं हि आह; कंसकाः सर्प॑न्ति, 
शिरीषोऽयं स्वपिति, सुबर्चैखा आदित्यमनुपर्यैति, आस्कन्द कपिल्केत्युक्ते 
तृणमास्कन्दति, अयन्कान्तभयः सङ्क्रामति, ऋषिः पठति, श्रुणोति ग्रावाण इति । 
(81४६६, 17 113 €3{140211011 01 111८5८६ 5ऽ€ाा1†€116€5 185 7161111 
00567९५ {118६ 2६ (2071211'5 ५९उऽदा1[ए0ा 04 दश्टा अ।त्पलाादा$ 210 
77ठ.71171216 {1111९05 25 5€1111ला{ 15 9256 01 {116 0111050711$ 07 11९ 
1111119 ०1 {€ 50प].1 

0९76 15 51111 2101 1658 [0 णा) 01६० 22187121), ५२1६५ 
४116 12373 प्रादा {125212, 2150 ` 7€1€776 10 35 27$#2087८85711 ५िलाा 
८०16[पञणदष 2070४65 28181215 = पा1१0प06त श 17 ५0९ 
४ €08112-02758114. ¢ 070 आाप्${ 10९४ 06 8210, 21 1116€ ०४5६१, 
६७० .22127121173 211:110151119 ० {115 कणा, २५ [६ 108 ७८ ८०ू]द्व्‌ 
1110 पप६३॥{01. {11€ ल्गालपत्‌्राह ४लाऽ2 11 {16 पठा लिऽ 10 
115 20111017 85 6652, 11€ 500 ०7 {€ ०0. 11 15 २ फल्‌] 
[0 फा [86 पाद ८912 {311 15 0611८४८ ० € प्ल लढा 121101 त 
2.01-6658. <८58, 11€ धप्॥10ा ०1 = 11€ 24781211118518. 62111101 € 
84४ 121 € 11101पए्वद] ०1 अपिप्क्ा 1157116८, 11 1८५ 01 (16 लट्श्य 


९71111८६ (जगत अधारः >, [21111 रि 25 116 बाहा ०1 10८ ४०11५. 
{६ 15 1127€017८ 012115101€ 1५ 5८58 (16 81107 01 11€ त 15 
1011€ 0([1€7 1118 2212] 211, (€ प्ल 01 (१९ 12112012 59४, 
[<€ 876 2150 1107€ (00८1051४€ €*14€11८९६8 11 ऽन 21 1115 
1कला{10८80ाा. ४तरदा2एव वा [115 [वर्या ४1४९ुर2 125 ९116 
८५० ४९75९53 {01 {1८ ९7472 1858.78; 8110 1125 1€1€1766 10 115 
३४८०7 35 818२ ४६॥ 5९52, 17016811 111८ [11६0 1९शदाला1८८ 111 पणात्‌ 
16 1161५ ॥1€ 20५८107, ३६९६2 81219 11 1115 [2६111187 ] ८5. 185 
11167005 61131075 {1011 (९ 28141112711258218, वत 171 111€ 775८ 
; 01 11656 1८ [टल 3 {0 113 21107 25 ५९58121५, ^ 5 116६80.# 0011160 


सवैस्येवेति । आस्माद्वैतदशेनेनेति भावः ॥ 
वेद्ान्तश्चाल्लमरखिक्‌ बिरोकय शेषस्तु जगत आघारः । 
आया पञ्चाश्या बबन्ध परमाथसारमिदम्‌ ॥ 
एतदेवाभिपरेय भगवान्‌ शेष आह-- 
‹ तीर्थ शपचगृहे वा नष्टस्मुतिरपि परियजन्‌ देहम्‌ । 
ज्ञानसमकालमुक्तः केवस्यं याति हतश्चोकः ॥ 

210 
क्ेषोंऽपि खडङृतायापद्चाक्षीत्यामिदमाह-- 
हयमेधक्षतसहसाण्यथ कुरुते ब्रह्मघातरक्षाणि । 
परमाथोवेन्न पुण्येने च पैः स्परडयते तिमः ॥ 
4. तदुक्तं परमाथंसोर शेषनगेन-- मृगतष्णायामुद्क,.. .....1 


3. 


(4 
॥ । 


२२८1 
\ 0, 11 ६1141075 छ प्2९९६8 1311418, 21 2१०फ८त्‌ (वदन 
0/1010 ऽ 07 तपप्८पाप्त 5 हपातडात्€ 1 तला10#18 6९52, 1116 
२६10८ ०01 111९6 एवा61111125818 (४111 2190181, 1116 2000 
५ (11६ [11254 तउ (टलिलाव्ल {0 [प्प ५५ 6९541884 
2159 (1705 एता 96 10६ 101 8 व्८्दृत्ाह् 016 1.0 01 11६ 
5€706€11(5, {1८72 25 08180181, 85 (€ वपद्रा, {106 111 
7८8९8६0 \\+1116] तव ९८52. 2 07 = 116 २8112587 15 दाणि 
0016 0 $ (1९ {विद तात 116 11295 ्णाद्हला & त्मा पफ 
९३1] एवात 71118527दएाण्डाद2ै 0 1६, 80 125 ग<दा160 10 


11 0166 1 [115 [1.3 १5३ (धा ल कठात5 ८ परमाथ॑साराविनरणे 


प्रपञ्चितमस्माभिः १ ऽपठो [ही ल्ञल्या {0 ४८ ?218178711125878, 33 
प2६९5६ 1185, ९६1 ९51 € ९६ [211€त $ {16 पला 01 56९9 फ 
22187121. 22१20119 ४ कवा प।79 21448, (16 तछा ल्ा{9101 
०1 वि?९58, 8150 101119८5 111€ 2011107 ५1 € एवाह 1125572 


५४11 22187]211 21 कलह्िऽ 10 [णा {$ प्ल ॥०ाठा{06 ला 
0/0 0८204. 


+४1८11 21५18115 20101511 ०1 € 80171112 78 15 
ऽ€(11९4, {116 1६५६ ५५७0 ©] २३८९] 2115 अप्ीपतट (० € ४८५8118 
185 ९८1 [10110 प्1६८तव. (16 {५10 ाला1{8 = लाल§ ०1 करर ८- 
०४८९९111 217९ ६11 ८::011८1॥1# 51216 अयाते [70ए0पात्‌ल्व्‌॒ तआ (1८ (278- 
1721075. {16 9151४ ताह फलां 18 86 ०प्॥ 21 प्ट श्र 


0६111111 11 [11८ *८75€-- 
सव्मिव जगदस्य मूहग्रकृतेरिदं कतं येन । 
तं प्रणिपल्येपे् वक्ष्ये परमाथप्तारमिदम्‌ ॥ 
210 {€ 8३८ 1 €गए0पाातद्तं णी € ४५2] प्ञ्दरप्ठा5 101 
5105€0"1९11 *€5९-- 
मृणत्ष्णायामुदकं श्युक्तौ रजतं सुजङ्घगमे रऽ्डवाम्‌ । 
तेमिरिकचन्द्रयुगवत्‌ भ्रान्तं निखिं जगदूपम्‌ ॥ 


ताह पारं 116 50] 15 2150 दलितं 10 0 € ०{{-पृ्ठ्त्‌ 
1पड्ादप्ठा 9 प इघा। छात 116€ श्प्राटाछपऽ 16661005 10 16 
€9.71111४ 21675, 11.1८ *९75€- 


यद्रदिनकर एको विभाति सङिलाशयेधु सर्वषु । 
तद्रत्‌ सकरोपाधिष्ववस्थितो माति परमात्मा ॥ 
01 0179 [दा €5॥ (0 3, 10फ्णला 15 वप्०टा ४८56 0 


{116 एत72ाद111125212, ए91€ा€ 2190311 128 पादू ०८३1] 51260 
1125 प्त 30०६ प्रा प्लश्गाञ0 एलक्ल्ला ४०६३ धात्‌ ४ तद्ध, 


+ % 4111 


प्ि€ 025 ल्ल वल्लव 081: ४08 15 {16 16215 01 21121010 
(71 11 2720181, 1 111९5 (17, 21 २५०८ 4-- ९11017६ 
{८ ऽलाा{1पाला{5 ०1 {16 [07 11 11€ 8184 ६2५४२१६712-- 1121 द्प्€ा 1 
016 91785 १५५९६ {1071 ४ एषु 116 प 11] 7601 त्छा1९ 10 18717, एण र] 
11४९ 7 91155 07 [011 171 11€ ८८1९5111 ०15. 


परमार्थमार्मप्ताधनमारम्याप्राप्य योगमपि नाम । 
घुरटोकमोगमोगी मुदितमना मोदते सुचिरम्‌ ॥ 


४1111 11115 एटाऽ€ प्छ ॥11€ एला 01 21४51211 11115617, 110 01€ 1९60 
०१०५१०८ €४€ा {07 8 1107, 1121 एलर्वह्या ८ {1171675 2४८ 1५151८0 
४५०९३ 10 पील। 07 €ात5, 207 [पा00ा टत 2८40८ 0६163 1110 
0३, 27 11206 ४०६2 5९८०7081 10 ४ ९081{8-0817६212. (11€ 
#€ा४ 5007807 210 €बा1165६ (€त271 पाटा तो ४०२, 15 १ ४118111 
४01417४ 210 00 एदााटण्ला 111 {€ [वाला फ 01 ४0९9 271 ४८८02718 


800 111€ ४९756 <1{€त &००४९ 15 111९ प्रा7ा0€वलाद्र¶€ ९४१८८ ० 1115 
111151111६6त्‌ दि 11 उपलो 8 वाला. 


4 174५€ {०01 


1६ 15 €णंत॥ {0 € 101९0171 78६८5 11121 21] 11९56 21681, 
11157105 210 त1४1706€ वपप८75, 28127181, ४९५३९१३६ अयात्‌ 
€4¶158 7710114 ९8 ५१808 876 21 5९६1160 11 17€ (01 णलठा ०1 {1६ 
पा 9 (0८ 50प, (८ कर्कराम्‌ 01 € त) 8६08. 410 1 5६045 
2. 1111711] (०६11 (€ ९8715 7 8] 10 11111|, {12६ 111€5€ ९7681 
0€7501121111९5 [२१५९ ॐ 1276 81112166, @ 1011८ 106८, 25 {€ 20111015 
० [€ 6 प्रौ, 111८ 31128%3, 27 1116 231125४ 19812102 17 {16 ए ०द्६- 
02759114. ४ 1111६ जारवा 0ण्टाः {115 52६10 (01511180 धा 
ला70८ा१{ तदाऽ, छा 15 आला716€त्‌ ॥० तापर, धा हाला 15 11८ भा 
{€६८€ ° ॥1€ ४०६25३5178, {0 19४८ 8त॑ ऽप्रल 21 1111[01€66५€10६५ 
1111101 91 12351€7-71111त5 25 115 0151117] 855९0 {71 {0161615 | 


71471; ० {2 ०0६25110. 


110४६11 {116 ४०६०७72 ० 22187 [व] 15 प्ा€ दव ८5ौ € 
५01६ 19 > ०६३, 06 18 5011 7101 त्र€ जाहा78107 ° € ऽतं 1८६ &74 
1८ 15 तिव721#241002 (१00 15 8 (दुक्त 25 {1८ 01751 {एणा त 
॥1€ 5८1९1८९. ~ लदिह्ा८€ 11 € ४६६२४३87 7€{€75 10 
पि1728प्$2९३7118 25 [€ 010९ ०1 9० 204 ९२{९९०16211# 
0611165 1{16€ €{5ऽ{<16९ 97 31$ [1६4६८€5507 10 11€ दत, (हिरण्यगभों 
योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः). पीला पणता पट सपर प्ण, 116 
{7162156 ०7 वपि 1780४2६ का0718 पषात्‌1€व 110 ग्लपनं, 1 ५85 
2218711 16 [0ाााप्ट्वं 2 81८ तण्लव7€ 01100 19६ 
100{७{€75 ०१ 1115 71€0€८655075 200 1९. €514011511८0 1६ 00 8 07 
007६. वृ 5 15 लाए 10 06 {6 ८ब] [प्ाादल्दत्ठप ग 24187131 


4 


057 17 ५070 अनुशासन 1751680 07 ज्चासन † {€ ०70६ 
57/72 अय योगानुशासनम , {11115 7011711 15 1112046 तल्य्ा 0४ 12018+2- 
(व7$2 171 115 ऽवा४२व्‌६752112520 12121. = (1€ पपत ० {€ 
1५517655 07 1181177 12121217 25 116 शला ० {€ ऽतंला८्८ जा 
४0६२, 109 एटा ए] त1४०1६१३"5 5{1दाला 10 (16८ लगा 21) 15 
1815860 31 ३05ए्लात्त्‌ ॥$ 0170110 (६ 11८ € क्वा} 0८८८ ० 11६ 
०70 अनुशासन, ५५1}, 1९ 5$5, 5६ ८515, पाता 17.111, 11715611 
१०८५ 101 एदा {0 {ह ट दा्वा( ग फट जाह72101, एण ज} ० 
[0 ्ापाञ्छा, पिप्र्ता प 595 {12६ 77) 116 ८011[0511011 ० 
115 ४०९२५१८, 2812311 ५२5 [0ा01त्वं 9४ 11८ तल्ला 
07656117 10 ॥11€ एठा ए 71211168] 471 ८०11९6{त्‌ (1681156 ° 
0९8, ऋऋालौ [त्वे त्मा पिता 10 ल्गण्ादालत, 25 1 ७४३5 
10प्ात 562{{€7€0 1 [ापौ711 भतं ए†§ 1 ।1€ ४271005 एण2125. {1121 
प्रा वा1#२९2018 ५३5 उ [1€0८6८8507 ° = 28120}211 15 2150 (60110 
7075160 0 5{{€पवा€ा15 0 ४३८४9717 77 ता 17121. पट 
125 ९> 1717६ {116 ९1655101 (साङ्ख्यथोगन्यपाश्रयाः" 0८८011111 171 {11६ 
2/05%4 "11त€† {11९ 5717 पल्युरसामज्ञस्याते (11-11-32) 35 गर्द 17ष् 
10 {11781146६81710112, 2187 1811 81त 01675 (दिरण्यगर्भपतज्ञलिप्रभृतयः). 
1 17€ {70८70127 दव7त्या व १150 {10160 ०0०४९, 1£ 
715 {0 [17911280 15 31) हतक 1दल्व्तीला ता ४०६१५57२, 
पशादा 1८ 50%5  सोगखास्रस्य हेरण्यगर्भपातज्ञलदेः ? 


[1 171€ §त1४व &14 010 2011105 ३150, (01511६60 ०{ पा 
7405, 1121116]#, चर्या, क्रिया, योग तातं ज्ञान) चष्ट का उत जाल 
९६१६1] 0 > ०९४ 416 ९२01६ 21 [दात 10 त कन्तक, 

८८/१८ 0‡ 1/८ “०4057510, 

[116€ ऽ८१ ९१८९८ ५1 » ०६५ ।1[६८€ 111€ £दह1९८८ ज द्वात (7156 - 
525/76) २011116 01 छिपा तास्त एव6, [प ३5 {{1€ 561९11८८ 
711€0161116 {5 ५९८५०1८ ७ {८ 5।पत्‌\. ०1 [छपा तारिलाटा। १5६८६६8, 
1811161 111८ 1211116 91 015615८ (708), {1€ ८१5९8 0 ५15९5€ (1०८ 
1९114 }, 116€ 19{४1€ ० ०० [लप (@०क त) 8110 1116 1116815 91 
०८५१11६ 214 [1८867४11 2०0५ ट्श, एड्ाटु$ व्तणाा715179110ा 
0{ 111€016111€5 (6,0610/"4040) ; । € ३९६१९१८६ 0{ ¬ ०६8 15 7150 ५९४०८ 





1 नञ्च 'दिरणयगभो यागस्य वक्ता नान्यः पुरातनः इति 
याज्ञवल्कयस्मृतेः पतञ्जलिः कथं योगस्य श्ासितेति चेत्‌, अद्धा । अत 
एव तत्र॒ तनत्र पुराणादौ योगस्य विप्रकीणेतया विशिष्य दुप्रौह्याथैसवं 
मन्यमानेन भगवता दया सिन्धुना फणिपतिन। सारं सक्जिधृष्चुणा अनुशासनम्‌ 


आरण्य ) नतु साक्षात्‌ श्चासनप््‌ 1--5872021581185911&19112-221201218 
08152118. त 


9.१, 


{0 > 5८557011 ० {0 वा्ााल६ 01712565, 1121116, {1€ 18076 01) 
(18८ {7011 \९11161 प्‌€४€€ 15 5०५६1१६ (4८+#@), 115 € पऽ८5 (41८00८11, 1९ 
1211176 01 8.21 7९1685९ { ¢ केव), वत्‌ {1८ 1762705 01 5ऽ16]1 161९85८ 
(2110004८) . {11€ ऽव115@2/2 [८४०१८६५ $ 5001111 20 {0116 15 
{1121 {01 शाली 1६16856 01 €ा718116021101 15 5018111 ; (16 ३550617 - 
10 97 ॥16€ 5९९1 ६0५ {€ ऽल्टा (कावक1त0 नर का140०0) , 11 जाल 
४0105, {11€ ८01 त द्प्॑ठा = 017 167110० ० 1116८ 5191९८४८ ऽत 
+ 110 € 001६1४८ पठत 15 (€ 8056 91 50115770 ; {16 तञ 
015८ 015ला7व10ा लणल्ला {€ ६५५० (0४ ८८८०९ %17 
15 {116 71162115 01 लापाद्ल0दप्रठा ; 21 {€ €1त 01 01206 01178118 
11 15 8111 111€ (०१1६९ €1त 1 116 35506181101 01 {€ ऽदय 27 
{11€ 5६९1, ‰‰111611 15 (वाद्व = व१८०१%व, 15 (€ 7181 ला216118{1011, 
015, 17 3 1111८571], 15 (11€ 560{€ ० (€ 5८161८८ ० ४०४. 
(0111८2८5 ¢‡ 1/८ ०4752516. 

0 ९1४९ 8 1076€ १९६०11६ 21121515 01 115 (0116116, 11€ 
प 02525119 01151515 0{ {07 ततद, ध1€ 5411164/:10वद द (01515118 
01 51 57/75, {1€ 5641101100दक८ 18४17 = 59५ 57(705, {1९ 21017417 
6000 2150 ©0111008९4 0 535 4711705 211 {1€ ९7त{‰०0वर42 111 34 
5741705, 

(1€ 5211102/116000, 50 681९0, ४९८६७५6 5016400 15 €2ए0प्ारतद 
11 € 1811, ६1€2{5 ¢ 1€ पट्िफा{10ा ०1 ४०९२; € 4फलाल€ण। 
81216501 1116 111104 (2114८111) ; पाह = आ1€दा1§ 0 वल्ञाव्ा717ष् {1८ 
71370 107) 355प्ा11118 (1९5८ 21175, 00ा71६[#, ८०051011 072611८८ 
(0/74/750) 270 41502550 (८८१2 %@) ; 50716 017 117€ 7168185 ०1 
26011718 ६१€ 51111655 01 {€ त; {71८ {५० 1065 ग <वा 
6211८ 50111/70/7212 87 @50111/7व{ 72, 21011 ए(1 हा 7 [पिदा 
5010-019151015, ॥1€ 7116815 ० त्वाष्ट्रा 80 ॥€ एला€15 
८०7९ 0 ला; कत 1251 ०1 ८72, प्र15 0216, {1001} 
20 ऽ, ४0751119 27त्‌ € [{1प्रा18 ० 01571}. 

{11€ 520/0110/640, 50 21166, 25 11€ +*21105 ऽक4/011व5 07 
7163175 01 ९८1८23८, 07 1111 [0 प्लव, अपरता ४ 02 ६1८ 1217013 
९८७८719९, १९३5 प] &€111/20040, १५61 [६१05 10 ४०६8 पाछा 
धा वपााि1दत्ता ज &८९ईव्ड; {€ पाऽ ० ‰८&८ तात्‌ (एढाााव ; 
00105 {07 पणा] शाशा {© 15 50प्हा 3 [€ ९021565; 
ला181610811011 तात्‌ 115 ८201565 ; 116 0प7 ४070125 ; 17 7४९ [7ताद्त॑ 
1111095 ०१ ४०९६, पदकार ‰2111द, 1179710, 50772, 7121/24#6110 210 
0101/0/0670, 81078 ५ 11€ [्तर्वदात्य] 1€€06§ (60ाल1ल्व्‌ 0 
{1671 

1116 2611170 240, पलाण7द् = 115 18116 {0 16 *2710प्§ 
10/70/7507 ऽपलाापा्ला 00 टा§ 2८व0176व 0४ 11€ 218611511)8 
४0९10, पल्‌ 01 16 वाद ऽप) [६८६ ० (€ #लदद, 15 त८१०६६त ६ 


2 0156085100 01 1176 (1766 त17९6 [पाऽ ० ४ 0६8, एद 7ालाङ़ क0दा0त, 
2, 


अ>४1 


40102110 77त॑ 501104४1, 10हला टाः टित 10 व5 ऽवा104710, ०९ . 
7100106211015 01 50111401 ; 21001 111८९ #10ा ०1 19€ 785६ 2110 
पिपा, ९057116 ४1501, ‰02227/4 ३० 0170€75, पता, ऋ1]€ णदं 
{16 {115 01 501१0007@, ३८ 25 [1८11५९5 10 प्ल पत्रा ४ ०६२ 
11121 1९805 {0 ९५१९८4८ ; 111८ वव 45 111६८ 11272} 2710 [3511४ 
{116 पात्ता2॥€ {प ० ४०१२ 116 8८717210 [10५५1९६९ 
८६11९60 {01064 

[1८ €न८म(+#दव॑ठ, 12५17 115 7271 शठा 116 721 5011- 
1९८ 9 लावा, € 5८816 ० ९०१८८१८ शणााल, ताह ४ छष्ुण 
ए्ा12112011€त 0 ८६ 1ा[प{श10प5 [005 (नारव ङ ४०६२, 
76461165 111100६0 (€ पत्यला ग दण्ट 1010 (ऊ4०४० ० - 
4010), 15 ५६४०९ 10 8 ऽत 01 {€ {५० [015 04 ८7८0140, °; 
{1€ 5181€ 91 € 1ा1्त 118 15 7६ {07 ९2/८८ ; 07 {1६ 0 
१071; 01 116 7भाप्€ 01 171८ 561 {021 {18१15 0 ॥€ [18 
११०14 ; 01 १1८ 51 [9 (191८5 91 12501716 9114 {810 ; ०1 {16 
0/1021112101८0/4540104/0 81 176 01811 ०4 5016 0 द०ा71६6। त 
1015, । । 

{८१८ 2 141८ (0111711111021, [10741 0. 

1656€ {4९85 ४111८॥1 01 {7€ 50] ०1 ४1€ ४०६३5172, 
८0515111 01 (16 7016 ०17 195 ऽप्र725, 376 0714 शा] €तएएरपाप- 
€ 0% {16 07010प्रातु॑ 66+ 91 ४९५०४११५ 111 2 5{${€ 0 71611. 
0५०५ §५८९1९55, 62011811 ए दह्ठता = 2एत दाय एपा17 ता 
16 ४ ९2521012 85४2, 51011 85 1 15, 15 0€८वप्रा पङ 712160८त 05 116 
प्ल्‌ त्छाााला213 0 इवत, वत0ाल्व्‌ [क 9 51316, 010413८ 
16715९0 2{ 01८९ ४४ 5४९ [पता 014 दद्द प्रप्रा. 11115 
(छारा €>0पात्‌111ह 01111 (€ 14९25 01 1८ 00654 
11] € ० ६7८8६ € 10 {11056 110 5ल्€ाल रजता ता > 0६2 
210 15 00५1 {0 [10४८ २ ष्टा 5दपापप्वणाा वताता {0 016८ 2४811 
2016 111€ा4प्र7€ 01 » ०९३. 

दिश्डा 2 11616 5९79८11 ह1०6८ > 1{5 ए8&6ऽ [16 16 वृणा 
01 15 [[प05{1105 80111107 15 ए6प्रात्‌ (0 1071685 21901716 0४ € ९88६ 
0{ 115 8081515 870 {1€ €$ 9 115 €>0061110 ४1 * ९01111८९ 
21100€ ० 18 एणा, ऽ पला ४5 14 15, 7१ 4०८३ 70६ ८8] ९] 0 
वा 20ए07त्लंाणाङ प्लााशाद्ऽ [णा वा, पल्लवा राला पाप 
10९7 [€ 7120९ €ा€ २४00 11८ 5ऽद्तातौ170ह प)ञ्वृप्राञाप्ठा 01 
72010, ९८11८7८ 1116 ८६ऽ€ 107 {11८ ३८६८९1८6 01 {ई८वाव 15 €527011- 
5110 2६ [ला६्॥1 07 ववहुधा1८01§ 70६ पव्‌ 77 अप्रता {18615 ४४1711६ 
६1६ 27ह्षाला1§ ० पल 31161516 वाते पोराा5ा16 56001 -वा6€ ` 201 
1€ {016 0% 5112216 ठप हा चा16€1115 

01/1९" ९५015 #९(९1+८व्‌ 10 114 {41९ (0111111211107 


"{11& {011017९ 27€ {116 क्षा६5 01 जाला ०5 {८7 {0 
171 16 ४1४87402. 


> ४1) 


(1) {16€ धल (41115845. 

(2) 21262 *2082118. | 

(3) ध0८इब्वाादाा20 गा ४20 0 6 (नद0177218. 
(4) #४151५5814518121103510115. 

(५) 3्प्डाा. 

(6) (उवप०7ादवा2 7119578. 

(2) 22111501. 

(8) 12120155. 

(9) 520212111852. 

(10) अग्रता वत्‌ ठ्लऽ. 


011९7 (0111111९11101125 011 ११८ [0/0506/125 00. 

€. 0८ ० [््लाल्छप्णट जाकर पिापा8ल्त्‌ 89 ` 11६ 
1४24028 15 106 लतञलात्€्‌ 0 अ जवहा त्0प्रिप्राल्ा9ा$ 01 {६ 
25201252, जला 15 दाव 0 99 11€ ५0105 (अन्येषां 
व्याख्यानम्‌. 1 1112‡# 70४ 0८ प्रा7९25018016 10 51111156 {70171 {115 
178६ 20 0] (णाल 07 (0147165 510पत्‌ ॥2४८ 06्ल). 
10 €ञ्पंऽ1९०८९. प्ठटषटाः (16 1471६ ०1 लटा चाट ल्जफाला(81क 07 
01 115 81107 {5 101 11610160. 

^ प्राता 1267 (0पाप्राला1271€5 = ्राउफ € 1716€111101दत्‌ पट 
211४2 015818त१्‌ 0 ४६८३8018 उप्त [ट ४ एदटवषद्वाा18 
प [द्वादणाच्ण, 0011 11111670 "11157९0. 

(01717176 07 10८ {04व<प्र1व. 

{1676 276 2150 धाह 0प्ऽ ए7171€तै ल्छाफलात7165 07 1116 
४०९३५५६ 814 2111011 हा {€ एषम १९३६८ ला, 

(1) (11 68116 (रद्य 41112710702 $ 21018 १6€४३. 

(2) ८०७057170क7/16 0४ 212४2021659 01861016 ०1 
#1[712011150. 

(३) ४ ० पि६०11012112, पणत {00 प्५ (2). 

(4) ५ ८भाटत्‌ 10110266 $ (रमपद्वातात३ ४२. 

(5) 000574./47710८017व 77 09 पिका 21114112. 

(6) 51711100 04/1111; 0 11८ ३9१16 दपाठा, 
(2) {1 (116 17० ्वकतादहवाढ 1४ 52102919217811101611- 
01821. । 

11@11015८01 14111, 

{16 7165671 ९1110 त 11€ # ०९२ऽप्79115 ४2 ४1४21212 124 
10 0८ ४६5९0 ० ॥11€ 50]€ 2.ऽ211९7]€ ्ाशा1४611701 त 10८ 66 ण्ल राहा 
0716118] किद्ाप्ञ्ला 1705 [0 सा, 24185, 25 0017 €00115 {0 5८६८५1९ 
01 ॥12010567101 07 (०6 कदत 10 9४०४121८ 7651111. 
410 1121 15 0756, दषा {€ [शापदं ला प्रतौ ५16 0165601 
९५101 15 0256 45 लक्{7€ााल क १६८५१५९, वात ०६ 05 5167६ 11 
2006276 211105६ 1170055101€ {0 ए7€5ला1॥ 2 (०7८ शला ० 11€ 


5४111 


16 ४ 115 20. 0ष्णीणदट्‌ एलदा119[05 {0 {[€ 112प$ला1€ा८€ 01 1८ 
5671096, 07 18६ 15 107€ [1205191६, 1© 11€ ०15010€ा1$ 24 10705४- 
{1४४ वा तष्दााहा+ौ 0 1120 [6३४65 11 16 0दहहफठ पिकाः ा10, 
{0 %0त € ए16€5ला1॥ 016 ५३5 (071९0, 0710 ऽछा 0 ८३५५९ 
{12६ [255९5 0प्ाः ८0776€016751011, {16 (कात्र प्रा त ०1 € ल्त ५85 
5९110 घ्3]$ 0187 प६टत्‌ 1प॥ 71211 12८९5, 1 211 ऽप) 72186९5, 0111015 
01 116 ६८१ {72६ जठ लला = उह 02115, 120 10 1111६ 
{912150८ ४४1] 171€ 5€ा{€16€5 द प्ण एति, 7110 358 
९०15९५८१ ८९ {८ ५४६5 71110851016 †0 131{€ 311 56156 ०५१ ५ प्रहा, 
€ ला€ 1८311 7811 21 11115 12012870 51216 ०1 {11 7120. 
5611701, 21 &† 016€ {17716, €४€॥ <, 1712६ 116 पाातसप्णा, {1 पाातला- 
†२1६€ा1, 7118 0९६ 7116८1४ 2 {1121{ध€55 (89. 

¶{ ६०54 पऽ प्ली दहजपाअ्ष हारा अप्‌ 7076 [ला एपाटछा €007॥ {0 
0118 ६०६ €(€ {116 56811€760 81 पापा 1126 5 5९09781€0 0% 71905 
222९5 11 ९(५€९1, 2114 1715६ [दा 2६ [ला [जद 70186९5. 11 15 
{1८ ऽद 79८८ 81 1९57 ०; 11९ 21122 ४०1३048 11127 & ५०६५ 
५5 {0 1€5{01€ 10४, [४ 1८ 22236175 0 सिंहावलेकन 90 


मण्डूकर्यति 191 €ा 74115 01 11९ 16९६ 10 (लं7 706 719८5 8† 5071९ 
01511 ९1117 51९९, 81 111८५४15 €[€ 28715 0( 816 (लस 11 


{116 60716८1 (णाा{लम्प 81 50716 015 बण [गा 58९९. ५४६ 12५ 10 
5€7611 §€{€८€ $ 5९111616, 27 ९ण्ला [ला $ [हदि €01 
01211517 ह 50९ौ 7 6180९. ७१९३४ 1714९दतं ५85 {1९ [185प7€ {181 
€ पाण्टव, (1८ ८ एषां 17091 दहा 1770 10दतादा प्ता 
02715, {16 (०प्रापा।क$ ०1 1116 {€> 85 प€]] 11181701711160 97 {€ 
॥€>† + {61060 &००५ 5615९. ^ [1 ऽप] 61121665 €7९८।€व 0 ४5 112४८ 
९९ 1०५1621९ 111 §€[18{€ {001-10165 10 211 106 (एलाक तारिप 
716९5, &1*1718£ पा] ६४118 800 116 07181081 7219665 771 पाल 
ऽप] ऽ€ा11€1८९8 शला€ {0पात्‌ 1॥ {16 21056711 270 (16 110 
० 8९६९ 7 € 114110361111 {1121 56874160 पहा 

17 501८६ ० प्रा {8८ धीदा (€ [2४८ पप$ का0०५६ 161६ 10 81016 
1111111६ [४ अ एहि 821 (116 (०ाद्ला हसि 1 धङ्‌ 0८ 1181 67015 
112४९ 7९0८ [7 पल्नगाऽतएपञ भात ल्फ प्राक 02४ 10 06 पप 
८071८८९ $ 50/42/0511 {116 70०८८55 01 ऽतर छा 0 1 7पलणा, 

४८ [2४९ 10 ९६701658 07 1815 10 571 ४. ४2 वलाका, 
क,4., ४ €त81118 6170४, [लप 110 58751, ४ 196र272102 
(011<&९, 0 11115 ष्ट ाह18 णलाऽ0ा 07 0पा ऽ 
10{70त५६10. 


पृञ्यान्‌ पतञ्चलिन्यासशङ्करांल्लीन्‌ गुरून्‌ चमः । 
योगरा{स्रस्य वेदान्तशास््रस्यापि प्रवर्तकान्‌ ॥ 


7010001: < (२2116 .5द5117 
5. कर. 15110117 50511 


| श्रीः ॥ 
॥ प्रास्ताविकम्‌ ॥ 


स्तुवे पतन्ञ डि व्यासं राङ्कुरं च मुनिन्नयम्‌ | 
कत्‌ सूत्रस्य भाष्यस्य क्रमादिवरणस्य च ॥ 


इदमिदनीम्‌ इदम्प्रथमतया मुद्रयित्वा प्रकारापदवीमानीयते मद्राष- 
नगरस्थराजकीयप्राच्यपुस्तकागाराध्यक्षः श्रीपातन्नटयोगशाञ्च[सूत्रमाष्य | 
विवरणाभिषं अन्थरत्नम्‌ ॥ 

अस्य च निभातारः श्रीमगवखादा इति महदिदं प्रमोदस्यानम्‌ ॥ . 


यद्यप्यत्र विवदेयुर्विमश्चकाभिमानिनः- ° विवरणस्यास्य प्रणेतारः 
श्रीभगवत्पादा वा अन्ये वा? इति । किम्त्र॒विशेषितेन, यत्‌ 
एतदोयमूलग्रन्थयोः योगसूत्रतद्भाष्ययोः प्रणेतृविषरयेऽपि सम॑स्सयेव विप्रति. 
पर्तिवहूनां मप्रन्थकैकार्योविंमशंकानाम्‌--' किमयं सूत्रकृत्‌ महामाप्यकर्तव 
पतन्नङिः १ उतान्य: १ इति, किमयं माध्यकृत्‌ ब्रह्मसूत्रकृदेदव्याप्त एव ? 
उतान्यः इति च । ते यथामतिकौशङ बहूनुषटेखवु्िखन्ति च ॥ 


अत्र च इत्य प्रतिमाति--शब्दन्रह्मवित्‌ मगवान्‌ भर्तृहरिः स्वीये 
व।कंधपदीये ब्रह्मकण्ड-- 


^“ कायवागबुद्धिविषया ये मलाः समवस्थिताः । 
[ज क । 9 (५ 
चिकितपालक्षणाध्यात्मश्ञस्तेषां विदयुद्धयः ॥"" 
इति पचेन यत्‌ शचत्रयै करणत्रयगतमठ्त्रयवि्ोधकम्‌ अवेद्यति, तत्‌ 
दा्ञत्रयमपि भगवान्‌ पतञ्जलिः प्रणिनायेति प्रतिपादयति प्राचीनपारम्पर्यागतं 
परिद्धं प्मिदम्‌-- 


‹ योगेन चित्तस्य पदेन वाचां 
मरं शरीरस्य च वैकेन । 
योऽपाकयेत्‌ तं प्रवरं मुनीनां 
पतञ्रटिं प्राज्ञछिशनतोऽस्मि ॥' इति । 


ॐअ 


पातञ्ञल्येगमुत्रहत्तिकृत्‌ भोजदेवे ऽपि-- 
^“ वाक्चेतावपुषां मः फणसूृतां मत्व येनोद्रतः" 
इति पतज्जटिप्ुपमार्नीकृ्य स्वस्य प्रन्यत्रयेण मलत्रयोद्धारकलस्रमाचष्ट ] 


तच्च रात्रय पातज्नलम्‌ , मह्‌ भाष्यम्‌ , चरकप्रतिसस्कृतं च इति 
चरकतन्त्रटकाकृत्‌ चक्रपाणिदत्त अवेदयति-- 


“" पातज्ञरमहामाष्यचरकपरतितस्छृतेः । 
प ५५ च [१ „स्‌ [९ । 1) 
मनोवाद्षायदषाणां ह्रेऽदहिपतये ममः ॥' इति ॥ 


अत्र॒ च भगवदृत्रेयरिष्येण अश्चि्ररोन मह्िंणा प्रणीतमेव वैधकतन्त्र 
विीभूतं चरकनाश्ना पतन्नलिना प्रतिपस्छृतघ्वात्‌ चरकप्रतिततस्कृतपदेन 
ग्यपदिहयते ˆ । ` निरुपपदेन पातज्ञ रमिति पदेन च योगसूत्रमुच्यते । अत एव 
योगसूत्रवृत्तौ भोजः-- ध 


«५ श॒ब्दानामनु्षासनं विदधता पातञ्नरे कुर्वता 
वृत्ति राजमृगाङ्कसंज्ञकमपि ग्यातन्वद्ना वैके ॥" 


इति पातक्चल्पदेन निरुपपदेन योगसूत्र निरदिक्षत्‌ ॥ 


योगे सूत्रस्य, व्याकरणे भाष्यस्य, वैद्यके वार्तिकस्य च कर्मृत्ात्‌ 
पतज्ञठिः सूत्रकृत्‌ , भाष्यकृत्‌ , वर्तिकञच इति पतक्नलिचसिति रामभद्र- 
दीक्षितः प्रतिपादयति-- 


८८ सूत्राणि योगशास्त्र वैदयकशास््रे च वार्तिंकानि ततः । 
कृत्वा पतञ्नलिठुनिः प्रचारयामास जगदिदं त्रातुम्‌ ॥' इति । 


तत्र च पथे ततः इति पदं महामाभ्यप्रणयनानन्तरम्‌ हद्यथैकम्‌ । 
लघुमञ्जूप्रायां “तदुक्तं चरके पतञ्चछिना'' इति पुनःपुनः ` चरकवक्यानि 
उदाहरन्‌ नागेशमदृ: चरकतन्त्र॑पतञ्जलिप्रणीतमवनोधयति । चरकनामक- 
पतन्नटिकृतस्य प्रन्थस्यापि चरकमिति भ्यपदेशः । कतृना्ना भ्रन्धम्यपदेशश्च 
बहुरं दृर॑यते ॥ 

तदित्थं महामाष्यकर्तैव श्रीरोषावतारभूतः पतञ्जलिः योगसूत्रकर्तेति 
निर्णये भवितुमदति सदहदयानाम्‌ ॥ 


एवं ब्रह्मसूत्रकतैव च वेदम्याप्तः योगसूत्रमाप्यकर्तेति नि्णयेऽपि समस्ति 
प्रमाणम्‌ । यतः- 


351. 


^ ब्रहमसुत्रकृते तस्मे वेदव्यासाय वेते । 
ज्ञानशक्त्यवताराय नमो भगवतो हरेः ॥ ” 
इति भामल्याम्‌ , 
५ नसा पतन्नठिपृपि वेदव्यासेन भाषित । 
सक्षिपतस्पष्टवहथा भाष्ये व्याख्या विधास्यत्‌॥ "” 
इति योगभाष्यटीकायां तखविारथां च, ब्रह्मसूत्रकृतं योगभाष्यक्ृतं च वेदन्यास- 
शाब्देन व्यवहरन्‌ श्रीवाचस्पतिमिश्रः ब्रह्मसूत्रकृत्‌ श्रीमनारायणावतारः 
वेदव्यास रव योगभध्य्कत्‌ इस्यवेदयति ॥ 


«५ श्रीपातञ्नलभाष्यदुगधजठपिर्विज्ञानरलाकरः 

वेदव्यासमुनीन््रबुद्धिखनितो योगीन्द्रपेयाृतः । ” 
इति विज्ञानमिक्ुप्रणीतयोगवार्तिकस्यं पवमपि अघुमभिग्रायं परिोषयति ॥ 

ठघुमञ्जूषायाः कलाल्यटीकाकृत्‌ पायगुण्डै्नायभदः (काङीभुदित- 
पुस्तके (३२१) पटे) “योगसूत्र भाध्ये वेदान्तसुत्रकुदुक्तत्वात्‌ `” इति वाक्येन 
स्पष्टमेव योगभाष्यकर्ती (मेव ब्रह्मतूत्रकर्तरिमवगणमयति ॥ 

इत्यमेव ॒विवरणकतौऽपि श्रीपरमेश्वराव्तारभूतः भगवसाद एवेति 
निर्णेतुमस््मवकाशः । यतः प्रस्थानत्रयमप्यप्रन्धेन्विव अत्रापि प्रतिपादम्‌ 
प्रन्थत्तमाप्तौ “इतिं श्रीगोविन्दभगव्पूञ्यपादशिप्यस्य परमहसपरि 
व्राजकाचायेस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतो श्रीपातज्ञल्योगशाक्च(सूत्रभाध्य) 
विवरणे प्रथमः पादः ` इ्यादि स्फुटं विटिखितमादर्शकोरे ॥ 

यपि योगपूत्रतद्धाष्ययोः म्रन्थान्तरेषु पतन्नल्विदव्यास्तकर्वकतष- 
व्यवह्‌(रवत्‌ अत्र विवरणे भगवरत्पादकतृकखन्यवहार; इयदवधि नोपरकम्यते, 
तथाऽपि प्रन्यक्तमप्तै भगवत्पादकृतव्वनिर्देश एव परमे प्रमाणे यावद्रधकानुपलम्भं 
प्रमाणानां स्वतःप्रामाण्यवादिनामल्म. | 


किंञ्च, “भमिस्येतदक्षरमिलयायषाध्यायी छन्दोग्योपनिषत्‌ । 
तस्याः सक्षपताञ्थजज्ञासुभ्यः ऋजुविवरणमल्पग्रन्थमिदमारभ्यते इति 
छन्दोग्योपनिषद्राष्योपक्रम इव, “ अथ 'आध्यासिकान्‌ योगान्‌ ? इत्याचध्या- 
त्मपटरस्य सेक्षेपत। विवरणं प्रस्तूयते ” इति अआपस्तम्बधर्मसूतरीयप्रथम- 
प्रशना्टमपटलतिवरणोपक्रम इव च, अत्रपि 'अथेलयादिपातज्रटयोगङ्चाञ्च- 
विवरणमारम्यतेः इति प्रन्यारम्भशेठीसाटशये, प्रन्धस्य विवरणनाम- 


ॐ311 


साजाव्य, त्रह्सूत्रमाप्ये “' स्मरन्ति च '' (४-१-१०) इत्र ५ अत एवं 
पश्यकादीनामासनविरेषाणापरुपदेशो योगाने ” इति, “ प्रदीपवदावेशस्तथा 
हि दरयति” (४-४-१५) इयत्र “एषैव च योगशाक्चेषु 
योगिनामनेकश्चरीरयोगप्रक्रिया'” इति, “' एतेन योगः प्रसयुक्तः" (२-१-२३) 
इयत्र “ योगज्ञाञ्चेऽपि अथ तत्वदरेनाभ्युपाये योगः ईति सम्यग्दश्शना- 
स्युप।यत्वेनेव योगोऽङ्गीक्रियतेः इति च बह स्थरेष्विव अत्रापि 
ध्योगशाविवरणमारभ्यतेः इति येोगराज्लपदेनैव योगप्रन्यनिर्देशः, 
प्रमेयप्रतिपादनरैरीमाम्ये चेद्ादिकं विमृश्यमनं भगवत्पादध्रणीतव्वं 
विवरणग्रन्थस्य अभ्यूहितु कियन्तमिव अवकारां ददाति । विमरकामिमानिनः 
इयतैव च तुष्येरन्‌ ॥ 


अत्रेयं शङ्का केपराश्चित्‌ उदियात्‌- त्रह्मसूत्रकृत्‌ वेदभ्यास एव योग- 
भाष्यकत, ब्रहमपूत्रमाष्यकृत्‌ भगवत्पाद एव च योगमाष्यविवरणकर्ती इ्यभ्युप- 
गमो न युज्यते, वेदान्तदद्ेने “एतेन योगः प्रल्युक्तः” इति योगदशेन- 
निराकरणात्‌, अप्रमाणलेनाम्युपगतस्य योगसूत्रस्य निराकरवृम्यामरेव वेदग्यास्‌- 
भगव्पाद्‌।म्यां माष्यतद्विवरणत्रणयनायेगात्‌--इति ॥ 


तस्या इत्थं समाधाने प्रतिभाति--योगदशनं न तु सवया निराकृतम्‌ , 
अग्रमाणलवेनाभ्युपगते च, ब्रह्मसूत्रतद्भाष्यकृदृम्याम्‌ । यतः योगब्रलुक््यधिकरण 
एव वेदभ्यापहदयव्रिद मगव्प्पादाः-(सम्थग्दरनाभ्युपायो हि योगो वेदे विहितः- 
“श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः" (ब्ह.उप.२-४-५-)8ति । ^ ्रिर्त्रतं 
स्थाप्य समं शरीरम्‌" (खेताश्च. २-८-) इत्यादिना च आसनादिकल्पना- 
पुरस्सरं वहप्रपञ्च योगविधानं शेताश्चतरोपनिषदि दर्ये । लिङ्गानि च वैदिकानि 
योगत्रिषयाणि सहर उपकम्यन्ते- “नतां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्दरियधार- 
णाम्‌!" (का.उ.२-६.११) इति, “ विद्यामेतां योगविधिं च कृस्स्नम्‌?” इति 
चैवमादीनि । योगशाज्ञेऽपि--' “अथ तत्वदशेनाभ्युपायो योगः" इति 
सम्यग्दज्चनाभ्युपायलेनैव योगोऽङ्गीकरियते' इत्यादिना वाक्येन योगम्‌ ओपनिषद- 
सम्यग्ञानसाधनम्‌ अभ्युपागमन्‌ । ननिराकरणं तु न साङ्ख्यज्ञानेन वेदनिरपेक्षेण 
योगमार्गेण वा निःप्रयप्तमाधिगम्यते इति । श्रुतिर्हि वेदिकादाघैकतविज्ञानादन्य- 
ननिःश्रेयससाधनं व।रयति--““ तमेव विदित्वा अति पर्युभेति नान्यः पन्था 


विचतेऽयनाय" (धर. उ.२.८)१ति, रेतिनो हि ते प्ताङ्ख्या योगाश्च नक्तैकल- 


द्वन; ध्येन वंशेन न विरुध्यते तेनेष्टमेव साङ्स्ययोगस्मृव्योः सावकारात्वम्‌ 


भ. 


33111 

तथया--““असंगो ह्ययं पुरषः" ब,उ. ४-२-१६) इ्येवमादिश्रुतिप्रतिद्धमेव 
पुरृष्य विश्ुद्धवं निशुणपुरुषनिख्पणेन साङ्ख्यैरम्युपगम्यते । तथा च 
योगेरपि-- “अथ प्रि्ाद्‌ विवभैवाा मुण्ड ऽपरिग्रहुः" (जाबाल. ३-५} 
इस्येवमादिश्रतिप्रसिद्धमेषव निदृत्तिनिषटव्वे प्रतञ्यायुपदेशनानुगम्यते' इ्यादिना च 
वाक्येन हेयोपादेयधिषयरविभागेन योगद दीनस्य ग्राह्यत्वं व्यवस्थापयामघुः ॥ 

मगवदादह्टदयवित्‌ भामतीकरद पि तात्रैवाधिकरणे- नानेन योगश्ाक्च- 
स्य हैरण्यगर्मपातज्ञलदेः सर्वथा प्रामाण्ये निराक्रियते । रि तु, जगदुपादानस- 
तन्त्रध्रधानतद्विकारमहदहंकारपश्चतन्मात्रगेचरं प्रामाण्यं नास्तीदयुच्यते | न 
चैतावता रएषामप्रामाण्यं भवितुमर्हति । यदयराणि हि तानि, तत्राप्रामाण्ये 
अप्रामाण्यमदनुवीरन्‌ । न चैतानि प्रधानादिसद्भध्रपराणि | किं तु, योगस्वूप- 
तत्साधन - तदवान्तरफलटविभूति - तप्परमफलेकवल्यन्युपादनपराणि । तच 
किञ्चित्‌ निमित्तीकृत्य ब्युत्पा्यमिति प्रधानं सविकारं निमित्तीकृतम्‌ । पुरणेष्िव 
स्गप्रतित्तमौव॑रामन्वन्तरवनानुचरितं तस्रतिपादनपेरेषु । न तु तद्विवक्षितम्‌ । 
अन्यपरादपि चान्यनिमित्तं तत्‌ प्रतीयमानम्‌ अभ्युपेयेत, यदि न मानान्तरेण 
विरुष्येत । अत्ति हि वेदान्तश्रुतिभिरस्य विरोध इष्युक्तम्‌ | तस्मात्‌ प्रमा 
भूतादपि योगा्रात्‌ न प्रधानादिस्िद्धिः.। अत एव योगशतं ब्युत्पाद्यिता 
आह्‌ स्म भगवान्‌ वाप्गण्यः-- 


“ गुणानां परमं सूपं न दृष्िपथगृच्छति । 
यत्त द्टिपथं प्राप तन्मयेव सुतुच्छकम्‌ ॥' इति । 


व 


गं॑ब्युत्िपाद्यिषता निमित्तमत्रिण इह गुणा उक्ताः, न तु 
भावतः), तेषामताखिकत्वात्‌ इत्यथः । अलोकतिद्धानामपि प्रधानादीनाम्‌ 
अनादिपूतपक्षन्यायामसिसरे्नितनाम्‌ अनुवा्त्मुपपननम्‌ › ८^‹ उपनिषटुपायस्य 
च तच्न्ञानस्य योगपिक्ना अस्ति । न नातु योगराच्विहितं यमनियमादि- 
बहिरङ्कुपायमपहाय अन्तरत च धारणादिकमन्तरेण ओपनिषदासतखसाक्षात्कार 
उदेतुम्हेति ।? “यदि प्रधानादिसत्तापरं योगशा भवेत्‌, भवेत्‌ 
प्रलक्षवदान्तश्रुतिविरोधेनप्रमाणम्‌ । तथा च तद्विहितेष्र यमादिष्वप्यनाश्च।स 
स्यात्‌ । तस्मात्‌ न प्रधानादिपरः तव्‌ । किं तु तनिमित्तीकृल्य 
योगव्युत्पादनपरमिष्युक्तम्‌ । न॒ चाविषये अप्रामाण्यं विषयेऽपि प्रामाण्य 
मुपहन्ति । न हि चक्षू रसादवरप्रमाणे स्पेऽप्यप्रमाणं भवितुमर्हति । 


तस्मात्‌ वेदान्तश्रुतिविरोधात्‌ प्रधानादिरस्याविषयः न प्रामाण्यमिति 
£. 


अप 


परमाः ।' भ्न साङ्ख्यज्ञानेन वेदनिरपक्षणेति- प्रधानादि- 
वरिषयेणेल्ेः । द्वैतिनो दहि ते साङ्ख्या योगाश्च--ये प्रधानादिपरतया 
तत्‌ रान्लं व्याचक्षते इव्यधः ।; इव्यादिग्रन्येन मगवत्पादारायेद्वा्नेन 
योगज्ञाखस्य प्रामाण्यं प्रसतिष्टिपत्‌ । प्रधानादिपरतया साङ््ययोगरान्ञ 
व्थाचक्षाणानमित्र परमनाप्ततम्‌ , न योगादिशाल्ञप्रामाण्यम्‌, इति च 


स्फुटी चकर ॥ 


ततैव परिकेऽपि ““ योगराल्ञे योगनिूपण श्रेता्रतरोपनिषद।युपदिष्ट- 
योगप्रपश्चनरूपम्‌ ” ह्युक्तम्‌ ॥ 


इत्थमोपनिषदाप्मतच्वज्ञानं प्रति शान्नान्तरपेक्षया विशिष्योपकारकताति- 
शयसद्धाबदेव च हेतोः वेदान्तदस्चनप्रवतैको भगवान्‌ बेदभ्याप्तः तद्भाप्यकरत्‌ 
भगत्रत्पादश्च उभयेऽपि योगमाष्य तद्विवरणे च चक्रतुरिति षद्दं 
विश्वसिमः ॥ 

न केवर भगवान्‌ वेदव्यासो मगवत्पादश्च योगभाष्यतद्िवरणकतरौ 
ओपनिषदात्पद्वैतदरनावलम्बिनौ, योगसुत्रक्ृत्‌ भगवान्‌ पतन्नछ्िरिपि हि 
तथेव । यतः तेन “क्तार्थ प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणतात्‌ "' 
(यो. सू. २-२२) इति सूत्रे जगन्मिथ्यालवं व्यवहूतम्‌ । अस्य च सूत्रस्य 
जगन्मिथ्याल्वामिप्रायकतव प्रदर्दितं श्रीमाधवाचर्यैः सूतसंहितातासयदीपिकायां 
यज्ञवैभवखण्डाष्टमप्यायनिवरणावसर--' यथपि ग्यवह्‌।रदशायां प्रकृति- 
प्राकृतलक्षणप्रपञ्चस्य सल्यत्वम्‌ आत्मनानाघ्े च व्यवहरन्ति (साङ्ख्यपातन्नलदयः) 
तथाऽपि कैबल्यदशा्ां स्वरूपप्रकाङष्यतिरेकेण तस्य सवेस्यानवभाने 
वर्णयन्ति । आत्मयाधात्मयज्ञानरक्षणायाः प्रकृतिपुर्षविवेकद्यातेहिं केल्यम्‌ । 
तथािध्ञानेत्तरकाठं प्रकृतिप्रङृताथौलसकं जगत्‌ सवथाऽनवमातं चेत्‌ 
तदस्ति कथं निश्वीयेत ? ्ेयपिद्धेः ज्ञानाधीनत्वात्‌ । अतः आप्यायास्य- 
ज्ञानेन निवतितमेव तत्‌ ¡1 तस्मात्‌ प्रपञ्चस्यानवभातस्य ज्ञाननिवर््त्ेन 
निथ्याखपवरयमम्युपगन्तम्यम्‌ । ज्ञाननिवरयानां क्तिख्प्यादीनां मिध्यात्व- 
दरानात्‌ ॥ 

विच, “कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष् तदन्यसाधारणलतात्‌ 
इति प।तन्चठे सूत्रम्‌ । अनेन च प्रकृतिप्राकृतिक।सकं जगत्‌ सुक्तपिक्षया 
नष्टं तदितरपेक्षया विधमानमेवेति, पुरुषविरोषपक्षया = तस्यामवसद्भाव 
प्रतिपायेते । एतच्च तन्मिथ्य।तेऽवकल्पते । पुरुषविशेषभपेक्ष्य एकस्थव 


१. 9,०१। 


वस्तुनः सद्धावासद्धावयोः शुक्तिरूष्यादौ दशनात्‌ । तत्र हि काचकामखादि- 
दोषदूषितने्तः पुरुषः क्तौ द्प्यसद्धाव प्रतिपद्यते । तदितरस्तु शुक्तिस्व- 
रूपमेव जानन्‌ तत्र दप्याभावमवगच्छति । न हि पारमार्थिकं घटादि 
पुरूषविरोषरं प्रति सद्धावाप्तद्वावौ युगपत्‌ प्रपोति । तसमात्‌ स्वरूपन्ञानपर्थन्त- 
मनुवतमानस्य तत॒ ऊध्वमप्रतिभासमानस्य प्रपश्चस्य वेदान्तिनामिव 
साङ््यादौनामपि अविशेषात्‌ मिथ्यात्वे सिद्धम्‌ । अथापि कसमात्‌ न 
व्यवहरन्तीति चेव्‌--षरेतुवद्धिसमाधाना्मिति ब्रूमः । स खलु प्रथमत एव 
सवं॑मिश्येयुक्ते, कथमेतत्‌ घटत इति. व्याङ्ुहितमनस्को भवेत्‌ › तन्मा भूदिति 
सव्यतन्यवहर एव केवलम्‌ । आलनानाच्वस्य जीवेश्वरभेदस्य च मुक्तावनव- 
भातस्वेनैव प्रपञ्चवन्मिथ्या्वम्‌ | यदि भ्यवह।प्दशायामेक एव॒ अन्मिल्य- 
भिधीयेत, तदा तत्तदुपाधिपरिकल्पनेन जीवेशटरम्यवस्या सुखद ;खादि- 
व्यवस्था च प्रयास्तसमर्थनीया स्यदिव्यमिप्रयेणेव तन्नानात्ववणैनम्‌ । 
मुक्तौ तु वेदान्तिनामिव सांस्यादीनामपि केवरात्मस्वरूपप्रतिमास एव संमत 
इति परमार्थतोऽद्वितीयलगात्मनः सिद्धम्‌? इति ॥ 

यपि पातज्ञलपुत्े (नष्टम्‌! इव्यत्र नागरोऽदरनम्‌ इवयर्थो वणयि 
शक्यते, व्याख्यातं च तथा व्याद्यातृमिः, तथाऽपि मानाधीनघलान्मेयस्तिदधेः 
पुक्तदृष्टवा ददौनगोचरस्य प्रपञ्चस्यासद्धाव पएवेदयत्र॒विवादायेगात्‌ नडः 
अदरानं वाऽ्तु, निदृत्तिग्रीऽस्तु, उभयथाऽपि फलमविशिष्टमिति बोध्यम्‌ ॥ 

एवं महामष्येऽपि पतन्चटिप्रणीते तृतीयाध्यायप्रथमपादप्रथमाह्िके 
“धातोः करमेणः समानकतृकादिच्छायां बा" इति पाणिनिसतरविवरणाबसेरे-- 
““स्वैस्य वा चेतनाषखात्‌ (धा्िकम) अथवा सर्वं चेतनावत्‌ । एवै हि 
आह- क॑सकाः सर्पन्ति, रिरीषोऽये स्वपिति, सुवर्चखा आदिव्यमनुपर्येति, 
आस्कन्द कपिलकेद्युक्ते तृणमास्कन्दति, अयस्कान्तमयस्सक्रामति, ऋषिः 
पटति--भृणोत ग्रावाणः इतिः इत्युक्तम्‌ । तत्र केयटन विदृतम्‌- ““सुर्वस्य 
वेति, आग्मदवितदयनेनेति मावः । ऋषिरिति वेदः । सप्रमावानां चेतन्यं 
प्रतिपादयतीयथैः" इति ॥ 


एवश्च आपपद्वितं महाभाष्ये स्पुटीङृतम्‌ । एवं तत्रैव स्थलान्तरेष्वपि 
आसद्वितमाविष्कृतं, विस्तरमिया उपरम्यते ॥ 

परमाथसारामिवायाम्‌ अयपश्चाशीत्यामपि पतन्नलिना = अद्रैतदरसनं 
स्फुर्टीकृतम्‌ ॥ 


६,९५.५] 
परमार्थसाराभिधश्च म्रन्थः पतन्नटिष्वरूपेणावतीर्गादिरोषकृत इति 
तत्रेव भ्रन्ये अन्तिमश्चेके व्यक्तम्‌- - 
^“ वेदान्तसा।क्षमखिरं विलोक्य शेषस्तु जगत आधारः । 
आयाप्राशरीत्या बबन्ध परमार्थसारमिदम्‌ ॥' इति ॥ 
तत्र च- 
"८ स॒त्यमिवे जगदसत्यं मूटग्रकृतरिदं कृतं येन । 
त प्रणिपत्येपेनद्रं वक्ष्ये परमा्थसारमिदम्‌ ॥'” 
इति उपक्रमे एव॒ जगन्मिथ्या प्रतिज्ञातम्‌ ॥ 
«५ परृगतृष्णायाघुदकं शुक्तौ रजतं भुजङ्गमो र्ञवाम्‌ । 
तेमिरिकचन्दरयुगवत्‌ अन्तं निखिरं जगद्रूषम्‌ ॥ " 
इति सदृष्टान्तम्‌ उपपादितं च ॥ 
५८ यद्दधिनक्र एको विभाति सरिकिशयेषु सर्वे§ । 
तद्वत्‌ पकरोपाधिष्ववस्थिता भाति परमात्मा ॥'” 
इति च आसद्वितमुपवणितम्‌ ॥ 
परमायर्पत्रहमप्रातिमाग॑मूतसम्यश्ानसाधनीमूतो योग इति चोक्तं 
तत्रेव-- 
^ प्रमाथेमारगू्ाषनमारस्याप्राप्य योगमपि नाम । 
सुरठोकमोगभोगी सुदितमना मोदते सुचिरम्‌ ॥' इति ॥ 
जावन्मुक्तिविवेके च विधारण्यश्रीचरणेः परमायस्तारान्तगीतर्डेकदवयं 
शेषकृतविनानूदितम--““एतदेवामिप्रेय भगवान्‌ रेष आह-- 
५ तुर्यै श्वपचगृहे वा नष्टस्मृतिरपि परियजन्‌ देदम्‌ । 
्ञानसमकालपुक्तः कैवल्यं याति इतथोकः ॥ ” इति ॥ 
डषोऽपि खकृताययौपश्चारीलयामिदमाह-- 
ट्यमेधशतसदस्ाण्यथ इस्ते ्रह्यषतरक्षाणि । 
परमाभैविन्न पुण्ये च पपिः स्पृदयते. विमरः ॥ ” इति च ॥ 
८४ तदुक्तं परमाधैसोर शेषनागेन ` इत्यादिना प्रन्थेन परमाथत पदे पदे 
प्रमाणीकसेति श्धुमञ्जूषायां मद्टनगेराः । “ परमथंसारत्रिवरणे प्रपश्चितम- 
स्मामिः ' इति परमा्साख्या्यौनमपि स्वेन कृते ब्रवीति । मगवयतन्न॑ठि- 


+ ५11 


परमभक्तस्य नागेशमद्स्य "नागेश" इति तदीयं नामेव वहतः पतङ्गटि- 
प्रणीतव्वदिव परमा्प्तारम्रन्ये परमस्समादरः । कलास्यटीकाक्ृदपि परमाध- 
सारकतीरं पतञ्ञलिमेव स्पष्टमाचचक्षे ॥ 


एवं च पतञ्ञङिव्यासशङ्कराख्य रशोषदहरिहरावतारभूते महामहिमश।लि 
मुनित्रयमपि ओपनिषदाद्रिततत्वपरिनिष्ठितम्‌ एकाभिप्रायम्‌ एकन अदरैतासानु- 
मवसाधनीभूतयोगविषये सूत्रतद्भाष्यतद्विवरणकतरंवेन योगमन्वमूत्‌ इति 
संशील्यतां सहृदयानां महदिदं प्रमोदस्थानम्‌ इव्यलमियता ॥ 


अस्थ च योगदाज्ञस्य प्रथमे प्रबतको हिरण्यगभः | 
५५ हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः "” 

इति योगिया्ञवल्क्यस्मरणाव्‌ । पतञ्जञछिः तदनुसारेण परदचात्‌ यौगश्चा्स्य 
प्रवर्तकः । अत ए “ अथ योगानुशासनम्‌ ' इति सूत्रयामास । रिष्टस्य 
हि शासनम्‌ अनुरासनम्‌ । अत एव माधवाचायौः प्रोचुः-- “ननु हिरण्यगर्भ 
योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः इति याज्ञवस्क्यस्मृतेः, पतज्ञकिः 
केयं योगस्य शासितेति चेत्‌-- अद्धा । अत एव तेत्र तत्र पुराणादौ योगस्य 
विप्रकीरणतया वििष्य दुप्री्याथैत्वे मन्यमानेन भगत्रता दयाधिन्धुना फणिपतिना 
सारं सन्निषृष्चुणा अनुरासनमार्धम्‌, न तु पक्षात्‌ शासनम्‌ ।' इति 
सर्वदर्यनंग्रहान्तर्मतपातन्नल्दर्शनसंप्रहे ॥ 


^“ पद्युरसामन्नस्यात्‌ ” (२-२-२७) इति ्रहमसूत्रमाष्यगते साङ्हययोग- 
व्यपाश्रयाः! इति पद्‌ व्याचक्षाणेन भामतीकृता स्सांए्ययोगन्यपाश्रयाः' हिरण्यग्- 
पतक्षलिप्रश्तयः, इव्युक्तम्‌ ॥ 


शेवाधगमेष्वेपि चर्याक्रियायोगज्ञाननिरूपकपाद चतुष्टयवधु योगपद 
योगस्वरूपं सविस्तरमुक्तम्‌ । पुराणेतिहासेष्वपि च प्रपश्चितम्‌ ॥ 


इ६ च योगराच्ं चिकिताराललवत्‌ चतुब्यूहम्‌ । यथा हि चिक्रिरसा- 
रान रोगः, रोगहेुः, आरोग्य, मेषञ्य, इति चतुन्यूहव्युत्पादनपरं, तद्वदेव इदमपि ' 
भवरोगचिकिःताशाक्चरूपं योगराच्रं, हेयः, देयदेतुः, हने, हानेप्राय इति 
चतुरवयूहव्युत्पादकम्‌ । दुःखप्रचुरः संसारो हेयः, तस्य अत्रिधानिमित्तः 
्रषटद्यसंयोगो हेतः, विवेकल्यतिरविष्ठवा हानोपायः, विवेकल्यातो च स्यां 
अविधानिवृत्तिः, तनिदृत्तौ आलन्तिको द्रषृददयसंयोगोपसमो हानम्‌, तदेव च 
कैवल्यम्‌ ॥ 


9111 


तदिदं योगशा समाधिप्ताधनविभूतिकैवल्याद्यपाद चतुष्टयविशिष्टम्‌ । 
तत्र॒ प्रथमे पादे (५१) एकपश्चारात्सूत्रोपेते प्राधान्येन प्माधि- 
प्रतिपादनात्‌ समापिपादाभिये, योगोदेशः, तक्षणम्‌, चित्तवृत्तिमेदाः, 
तच्निरोधोपायमूताभ्यापवेराग्ये, चित्तस्थिल्युपायाः केचन, सम्पर्ञाता- 
सम्परज्ञाताभिधो द्विविषो योगः सोपायः सफलः सावान्तरभेदश्च, 
देशरस्य स्वरूपप्रमाणप्रमाववाचकरोपाक्षनतत्फखानि च, इत्यादिकं प्रत्यपादि ॥ 


दितीये (५५) पश्वपश्चराप्ूत्रमण्डिते केवल्यपाधनप्म्यन्दरनसाधन- 
योगसाधनानां प्राधान्येन प्रतिपादनात्‌ साधनपादमिधे, ङ्शतनकररणदवाय 
योगमाधनीमूतः क्रियायोगः, शकरमविपाक्राः; तेषां हेयसप्रमोजकं 
दुःखरूपं, देयतद्धतुमाक्षतद्धेतवः चतारो व्यूहाः; यों प्रति 
हिरङ्गसाधनीमूतं यमादिपच्चकं सावान्तरफठम्‌ , इष्यादिकं प्रल्यपादि ॥ 


तृतीये (५५) पञ्चपश्चाशतसुत्रारङ्कृते योगसाधनानुषठानप्रृत्तस्य 
आनुपरङ्िकतरिमूतेः प्राधान्येन प्रतिपादनात्‌ व्रिभूतिपादाभिपे, धारणादित्रितयं 
योगं प्रति अन्तरङ्कपधनीभुते सेयमस्ञ, संयमस्य रक्ष्याः परिणाममेदाः, 
संयमपताघ्याः श्रद्धदवारा कैवल्यफलकयोगपरतरृ्तिदेतवः अतीतानागतज्ञान- 
सुवनज्ञानकायब्यूहज्नानादिषपाः विभूतयः, इन्द्रियजयादिषरूपाः साक्षा- 
द्योगाङ्गमूताः सिद्धयः, ग्रोगफलभूता तारक्रपंहितविवेकज्ञनपिद्धिः, 
इल्यादिकं भ्रलपादि ॥ 


चतुर्थे (३४) चतुर्जिश्सूत्रमूषिते सकल्योगेश्वर्यम्यो विरतस्य 
सर्वे पषहारद्ररेण कैवल्यस्य प्राधान्येन प्रतिपादनात्‌ केवल्यपादामिपे, दिविध 
केवट्यस्वरूष, कैवस्यभागीयं चित्त, पररोकरः, परलोकगामी क्षणिक्र- 
विज्ञानातिरिक्ताःपा चित्तविक्रारदुखादिमोक्ताः पर्ममेधाख्यसमाधिः, 
प्रापङ्किकं चान्यत्‌ इयादिकं प्र्यपादि ॥ 


एवं पाद चतुष्टयवता(१९५)परञ्चनवव्यप्रिंकशतपतूत्रयुजा योगसूत्रेण सूचितं 
महान्तं प्रमेयरारिं दृदयहारिण्या श्रोत्रपुटपेयया दौल्या विव्रृण्वतः वेदन्याप्त- 
भाष्यस्य परमगम्भीरस्य।नुख्पं प्रसनगम्भीरमिदं विवरणं विरोषतो माभ्याश्चय- 
मभिभ्य्ञयत्‌ परमोपकरारकं योगतिजिज्गासूनाम्‌ । कतृगारात्‌ ` विषयविवेचन- 
रोरीरामणीयकाच पठनमत्रेण हृदयात्रजकं नातीव विशिष्य वक्तव्यतामावहति ॥ 


9 ५.७१ 

अत्र च ग्रन्थे अनितरसताधारण्येन, म्रन्यान्तरेष्वचर्चितामिः वहीमि- 
युक्तिभिः ईश्वरस्थापनं सविरोषम।रचितम्‌ । निरीश्चरादिभिः प्रतिपक्षः 
प्रदर्दिताश्च बहुषो युक्तयः अन्य निरस्ताः ॥ 

अत्र च उदाहृताः प्राचीनग्रन्थास्विमे-- १. दसोपरनिषदः २. भगवद्रीता 
३. महामारते मोक्षधमपतै ४. विष्णुपहल्लनामस्तोत्रम्‌ ५. मनुस्मृतिः 
६, गौतमधमसूत्रम्‌ ७, पाणिनिसूत्रम्‌ ८. महाभाष्यम्‌ ९. शाबरभाष्यम्‌ 
१०. छे।कवर्तिकम्‌ इदय(दयः ॥ 

व्यापतभाष्यस्य प्राचीनमपि व्या्यानं विवरणे कचित्‌ नामनिर्देशे 
विना ^ अन्येषां व्याष्यानम्‌ › इति अनूदितम्‌ ¦! तेन विवरणात्‌ प्रागपि 
कानिचित्‌ भाष्यन्या्यानानि आसन्‌ इति ज्ञायते । पश्चाच्च १. वाच- 
स्पतिमिश्चप्रणीता तच्विारदीनाप्नी माष्यटीका २, त्िज्ञानभि्षुप्रणीतें 
योगवा्तिकापराभिधं मभ्यव्याल्यानम्‌ इद्यपर्‌ भ्याष्याद्रये भाष्यस्य 
मुद्रितमस्ि ॥ 

योगसूत्रोपरि बहथः टौकाः सन्ति मुद्धिताः--१. भोजदेवकृता राज- 
मर्तण्डाभिधा वृत्तिः २. विज्ञानभिक्षुशिष्यभावागणेशकृता योगतूत्रदी पिका 
३. तदनुसारिणी नागोजिभद्रीया वृत्तिः । २. ३. उभयमपीदं विज्ञानमिक्षु- 
मागौनुसारि । ४. श्रीरामानन्दयतिकृता मणिप्रमाद्या वृत्तिः ५. योग. 
सिद्धान्तचन्दिका ६. सूत्राथबोधिनी, इति श्रीनारायणतीर्थविरचितटीकाद्यम्‌ 
७. योगुधाकरो नाम श्रीसदारिषन्रह्मन्दकृता योगसूत्रवृत्तिः इव्याधाः ॥ 


तदिदं पतञ्जल्योगसत्रमाप्यविवरणम्‌ इदंप्रथमतया सुद्रणपदवी- 
मरोपितं मद्रासूनगरस्थराजकीयप्राच्यपुस्तकागारष्यक्षैः । अस्य च मातृका 
एकेव पुस्तकागारस्या संञ्लोधनाय समासादिता, नान्यत्‌ पुस्तकं अन्वेषणेऽपि 
लन्धम्‌ । तत्र च आदरीकोे टेखकप्रमादाद्रा, टेखकेन ठेखनाय निरीक्षि- 
तस्य प्राचीनमूल्पुस्तकस्य सम्बन्धिनां बहूनां पुटानाम्‌ अधरोत्तरविपर्यासाद्रा, 
यतःकुतश्चित्‌ अनिवेचनीयात्‌ हेतोः आदित आरम्य आजन्तं बिंशाति- 
सङ््यकरषु स्थटेषु सान्तव्येन तिडिवितान्‌ मिथोऽनन्वितावयवान्‌ अत एव 
दुर्वोधाथान्‌ प्रन्थभागान्‌ निरीक्ष्य कथमिदं ` सुदा, सुद्वितेऽपि निष्फलमेव 
मवेत्‌ इति चिन्ताभ्याकुलितमानसानामस्माकं दुैचेन महता प्रयासेन वहुपुट- 
व्यवधानतो विरक्तानां विप्रकीणोनां वाक्यानां मिथोऽन्वययेोग्यानाम्‌ 
अक्षररो गवेषणेन सिंहवलोकमण्टरकष्टुलादिनीतिमनुप्रय पश्चिमवाक्यस्य 


1 


वहुदूरस्थेन पूर्ववाक्येनान्वयः, पृ्वाक्यस्य वहदूरस्येन पञ्चिमवाक्येनान्वय 
इति रव्या विप्रकीर्णवाक्यानां व्यलयपिन मिथोयोजने मतिरुदभूत्‌ भगव्रत्पादानु- 
ग्रहवशात्‌ | तथाविधयोजने कृते च मिथेङन्वययोग्या्थत वाक्यानामारेच्य 
प्रमोदभरश्च समजनि । ` एतादृशानाम्‌ अन्विताथानां वाक्यानां मिथो योजन 
कुत्र कथं कृतम्‌? आदशचकोशे कमि पुटव्यवधानतः तानि टिखितान्यासन्‌ 2 
इत्येतत्‌ › ग्रन्थ एव व्रिंरातिसङ्ख्याके$ तत्तद्राक्यघुद्रणस्थटेषु अधः टिपण्यां 
परदर्दितम्‌ । तननिरीक्षणेन च परिरोधनपरिघ्रमः कियानभूदिति 
अवगम्येत सदये; ॥ 


एवे महता प्रयल्तिन शोधने कृतेऽपि मानुषशेमुषसभावसिद्धेन प्रमादेन 


बहवः अद्युद्धयः सम्भन्येरन्‌ । पठनपाठनवदादिव तु ता निरसनीया भवेः 
सूक्ष्मेक्षिकया सहृदयैः, इति सविनये निवे एतावत। उपसंहियते ॥ 


पूज्यान्‌ पतक्नरिन्यासहकरास्तीन्‌ मुनीन्‌ चुम: । 
योगशचा्ञस्य वेदान्त्चास््रस्यापि प्रवेकान्‌ ॥ 
इत्थम्‌ 
‹ शास्त्ररलाकर ° विरुदमूषितः 
 पोरकम्‌ - घु. -शीरामक्ञासत्ी 
मद्रपुरसष्छृतक्खश्ाठ - वदृान्तसाहयाण्यापक्रः 
' न्यायवेदृन्तशिरोमणिः 
एस्‌. अर्‌. कृष्णमूरतिशाखी 
मद्रपुरसस्कृतकरखशाखन्यायतवदान्तध्य्रापकः || 
| दयुभम्‌ ॥ 


॥ सभाष्यविवरणश्रीपातञ्ञख्योगसूत्रविषयायुक्रमणिका ॥ 


१५. 
१६. 
१४७. 
१८. 
१९. 


२०, 


# 


२१. 
२२. 
२३. 
२४६. 
२५. 
२६. 
२७. 
२८. 


॥ प्रथमः समाधिपादः ॥ 

विषयः 
योगशाख्यारम्भः 
योगलक्षणम्‌ 
नियोधकारे चितः स्वरुपमात्राचस्थानम्‌ 
उ्युस्थानकाङे चितो वृत्तिसारूप्यम्‌ 
वृत्तीनां पव्वसङ्ख्यत्वम्‌ 
व्रत््युदेशः 
प्रमाणविभागलक्षणे 
विपययलक्षणम्‌ 
विकर्पलक्षणम्‌ 
निद्रारक्षणम्‌ 
स्मृतिलक्षणम्‌ 
नियोधापायः 
अमभ्यासटक्षणम्‌ 
अभ्यासस्य दढभुमिस्वे उप।यकथनम्‌ 
वैराग्यलक्षणम्‌ 
परवेराग्यलक्षणम्‌ 
संप्रज्ञातसमाधिलक्षृणविभागे 
असप्रज्ञतसमाधिलक्षणम्‌ 
निरोधसमाध्यवान्तरभेदभवप्रययाधिकारिकथनम्‌ 
तदवान्तरभेदोपायप्रययाधिक्रारिकथनम्‌ 
उपायतारतम्यप्रयुक्तफरुतारतम्यम्‌ 
ईैश्रराराधनस्यापि निरोधसमाध्युपायत्नम्‌ 
दृ्रलक्षणम्‌ 
इश्वरस्य सवेज्ञत्वसाधनम्‌ 
इश्वरस्य सवेश्रेष्ठत्वम्‌ 
दरवा चकस्वरूपम्‌ 
ङरप्रणिधानस्वरूपम्‌ 
दैरपणिधानफलम्‌ 


प्रम्‌ 
१ 
९ 
१३ 
१४ 
१५ 
१८ 
१9 
३३ 
२३५ 
३८ 
३९ 
य्‌ 


2) 
४३ 
१9 
4. 
५७ 
४८ 
५० 
५१ 
५२ 
१३ 
५३ 
८५५७ 
७ 
७६ 
७९ 
८० 


विषयः प्रष्ठम्‌ 
२८९. अन्तरायकथनम्‌ ८१ 
३०. तद््थम्‌ अभ्यसनीयविषयकथनम्‌ ८३ 
३१. चित्तपरसादनोपायाः. ९१ 
३२. प्रसन्न चित्तस्थेर्योपाथाः ९२ 
३३. स्थिरचित्तत्ताऽवान्तरफलम्‌ ९.७ 
३४. स्थिरचित्तस्य समापत्तिस्वरूपकरुथनम्‌ 93 
३५. सवितकंसमापत्तिलक्षणम्‌ १०२ 
३६. निर्वितकंसमापत्तिलक्षणम्‌ १०३, १०४ 
३७. सविचारनिर्विचारसमापत्तिरक्षणम्‌ ११० 
३८. सुक्ष्मविषयत्वावधिकथनम्‌ १११ 
३९. उक्तसमापत्तीनां सबीजस्वकथनम्‌ ११३ 
४०. निर्विचायेत्कषेकलम्‌ 9) 
४१. कऋतम्भरप्रज्ञाकथनम्‌ ११४ 
४२. ऋतस्भराया विशेषचिषयत्वम्‌ ११५ 
४३. निविचारसमापत्तिजन्यसंस्काराणामितरसस्छरपरति- 

बन्धकः्वम्‌ ११६ 
४४. नि्बीजसमाधिदशाकालः ११७ 


॥ द्वितीयः साधनपादः ॥ 


१. क्रियायोगस्वरूपकथनम्‌ १२१ 
२. क्रियायोगफटम्‌ १२४ 
३. शोदश १२५ 
ध. द्चक्षानामिययाम्‌र्कत्वम्‌ १२७ 
५. अविद्यालक्षणम्‌ १३२ 
६. अस्मिताखक्षणम्‌ , १३७ 
७, रागलक्षणम्‌ १३९ 
८, देषलक्षणम्‌ १४० 
९. अभिंनिवेशशषलक्षणम्‌ र 
१०. शानां परिचमावस्थाकथनम्‌ १४२ 
११. तदुकृत्तीनां ्यानहैयत्वम्‌ ५ 
१२. कमांश्षयस्य छरैतुत्वम्‌ १४३ 
१३. कमोक्षयविपाकनिरूषणम्‌ १४६ 
१४. बिपाकरूलकथनम्‌ १५८ 


१५. सुखस्यापि दुःखार्मकतया देयत्वम १५९. 


१६. 
१७. 
१८. 
१९. 
२०. 
२९. 


२२. 


२३. 
ग्ध, 


५. 


२६. 


२७, 


२८ 


२९. 


२०. 
२१. 


२२. 


३३. 
३४. 
३५. 
२९. 
२३७० 
३८. 
२९. 
०. 
श १, 
२, 
९३. 
८, 
८५५. 
९. 
७, 
९८, 
४९, 


31111 

विषयः . 
हेयस्वरूपम्‌ 
हेयहेवुस्वरूपम्‌ 
द श्यस्वरूपम्‌ 
टेरैयावान्तरतविभागः 
्रशस्वरूषम्‌ 
टइयस्य द्रधूथत्म्‌ 
मुक्तेतरसंपर्फिस्वाद्रश्यस्यानष्टत्वम्‌ 
संयो गस्वरूपकथनम्‌ 
सयोगहदेतुकथनम्‌ 
हानस्वरूपम्‌ 
हानोपायकथनम्‌ 
उत्पन्नाविवेकप्रज्ञायाः सप्रविधरवम्‌ 
विवेकरूयातिसाधनक्थनम्‌ 
योगाङ्गकथनम्‌ 
यमस्वखूपम्‌ 
यमविशषेष्वरूपम्‌ 
नियमस्वरूपम्‌ 
यमनियमप्रतिबन्धबाधनम्‌ 
वितकरस्वरूपादिकथनम्‌ 
अर्हिसाप्रतिष्ठारसम्‌ 
स्तय 39 
अस्तेय  )) 
ब्रह्मचये 
अपरिप्रह )) 
क्षोचफखम्‌ 
सन्तोषफलम्‌ 
तपःफलम्‌ 
स्वाध्यायफलम्‌ 
इधरपरणिधानषकम्‌ 
आसनस्वरूपम्‌ 
आसनसाधनक्रथनम्‌ 
आसनक्लम्‌ 
प्राणायामसामान्यस्वरूपम्‌ 
प्राणायामविशेषस्वरूपम्‌ 


प्रष्ठम्‌ 
१७१ 

१५७२ 

१५७६ 
१८२ 
१८८ 
१५२ 
१९४ 
१९५ 
२०० 
२०३ 
२०४ 
२०५ 
२०५४ 
२११ 
२१२ 
२१४ 
९१५ 
२१७ 
२१८ 
२२९९१ 


39 


र्र्‌ 


+, 


५१२ 
ग्ग 


१3 


२२५ 
२२९ 
२२७ 


८ ©, 
५ १? = 
५५२१ 


१५. 
१६९. 
१५७. 
१८. 
१९. 
२०, 
२१. 
म्‌२. 
२३. 
२४८. 
२५. 


२८. 


२९. 


11४ 


विषयः 
प्राणायामावान्तरफलटम्‌ 
प्र्ाहरस्वर्पम्‌ ` 
प्रयाहदारफलम्‌ 


॥ तृतीये विभूतिपादः ॥ 


धारणालक्षणम्‌ 

ध्यानलक्षणम्‌ 

समाधिरक्षणम्‌ 

सयमपदाथः 

सयमजयफलम्‌ 
संयमसापेक्षता 
धारणाऽऽदाीनामन्तरङ्गस्वम्‌ 
एषामेव निर्बाजबहिरङ्गतम्‌ 
निरोधपरिणामलक्षणम्‌ 

तेन चिन्तप्रश्षान्तवाहितोक्तिः 
समापिपरिणामलक्षणम्‌ 
एका्रतापरिणामलक्षुणम्‌ 
धमोदित्रयपरिणामरक्षणव्याख्यानम्‌ 
धर्मलक्षणम्‌ 

परिणामान्यत्वे हेतूक्तिः 
परिणामन्रयसयमफुलम्‌ 
श्ब्दायथप्रयययिवेकसयमफलम्‌ 
संस्कारसाक्षास्कृतिफलम्‌ 
प्रययसाक्षात्कृति कछम्‌ 


प्रययसाक्षात्कृतो तददिषयस्यासाक्षाकृतिः 


कायरूपसयमफलम्‌ 
कमसयमरुलम्‌ 
मेञयादिसंयमरूटम्‌ 
बलसयमरलम्‌ 
्ब््यालखोकसयमफलम्‌ 
सूयेसयमरूलम्‌ 
चन्द्रसयमफलम्‌ 
ध्रवसयमरूखम 
नाभिचक्रसयमफलम्‌ 


पषछठम्‌ 
२२० 
२२१ 


२२३३ 
२३४ 


११ 


२३५ 


११ 
२३७ 
२३८ 
२३९ 
२० 

99 
२४१ 
रधर 
२५५ 
२५९ 
२६२ 
२६३ 
२७८ 
२८० 
२८१ 

श्र 
२८य्‌ 
२८३ 
२८४ 

१ 
२८५ 
२८७ 


99 
<£ 


३०. 
२१९. 
३२. 
२३. 
२४. 
२३५. 
२६. 
२७. 
३८. 
३९. 


४१. 
४२. 
४३. 
८४. 
४५. 
४६. 
४७, 
८८, 
४ ९. 
५०. 
५९. 
४४. 
५२. 
५४. 


॥ © 0 2 ०८ ५ ९) ~ 


ॐ 


विषयः 
कण्ठकूपसयमफलम्‌ 
करूमेनाडीसयमफरम्‌ 
मूधञ्योतिःसंयमकलम्‌ 
प्रातिभस्यमफलम्‌ 
हदेयसयमकूलम्‌ 
पुरुषन्ञान प्ताधनसयमकथनम्‌ 
प्रातिमादीनां स्वाथसयमणटत्वम्‌ 
पूर्वाक्तसिद्धीनां समाधिप्रात्तपक्षत्वम्‌ 
चित्तध्य परदेहावेश्चोपायः 
दानसयमफटम्‌ 
समानरसयमकटम्‌ 
श्रोता काक्चंसबन्धसयम 5ल्म्‌ 
कायाकाक्षसबन्धस्यमफलम्‌ 
प्रकाश्चावरणक्षयभूत्तजयोपायौ 
अणिमादिसिद्धवादयुपायः 
कायसपत्स्वरूपम्‌ 
इन्द्रियजयो पायः 
इन्द्रियजयफलम्‌ 
सवेज्ञादृतादुपायः 
केवल्योपायः 
केवल्यप्रतयुहप्रशमोपायः . 
क्षणतक्करमसयमफलम्‌ 
विवेकजज्ञानाविंषयोक्तिः 
विवेकजज्ञानलक्षणम्‌ 
सत्वपुरुषान्यताख्यातिकलम्‌ 


॥ चतुर्थः कैवल्यपादः ॥ 


सिद्धिकारणवेविध्यम्‌ 
जा्यन्तरपरिणामप्रयोंजकोक्तिः 
धमोदेः प्रकृतिप्रयो जकस्वाभावः 
निमोणवित्तकथनम्‌ 
तस्रयोजकवित्तकथनम्‌ 
नि्भितवित्तस्य वासनाद्युल्यत्वम्‌ 
कमभेद; 


प्रम्‌ 
२८८ 


२९२ 


3 
` 93 
२९३ 
२९४ 
- 3) 
२९५ 
२९६, २९७ 
३०१ 
२०३ 
११ 


३०५ 


२०९ 
२३०७ 
२३०९ 
३९१२ 
३१४ 
२१५ 


२१७ 
३१८ 
३२० 
२२१ 


१०. 
११. 
२१२. 
१३. 
१४. 
१५. 
१६. 
१५४. 
१८. 
१९. 
२०. 
२१. 
२२. 
२३. 
२४. 
२५. 
२६. 
१९७. 
२८. 
२९. 
2३०. 
३१. 
२३२. 
२३२. 
२३४. 


1९1 


विषयः 
वासनानां कर्माजुगुणत्वम्‌ 
व्यबदहितबासनामामप्यव्यवधानो पपत्तिः 
वासनानामनादिप्वम्‌ 
अनादित््रेऽपि वासनानामुच्छदः 
धमोणामष्बभेदपरिणामः 
धर्माणां गुणल्कथनम्‌ 
वस्तुगतेकत्वव्यवहारमिमित्तोक्ति 
अथेज्ञानभदसाधनम्‌ 
अथेस्य ज्ञानसष्टभाविष्वखण्डनम्‌ 
चित्तपरिणामितस्यज्ञनम्‌ 
पुरुषापरिणामित्वोक्तिः 
चित्तस्य स्वयप्रक्राशव्वाभावः 
चित्तस्य स्वाभासत्वे दोषः 
चिन्तान्तरभास्यत्वे च चित्तस्य, दोषः 
अपरिणामिन्या अपि चित्तितो बुद्धिवदनम्‌ 
चित्ते सवोौथेत्वस्यो पाधिकरत्वम्‌ 
चित्तातिरिक्तवेतने हेखन्तरम्‌ 
आत्मज्ञानाधिकारिपरिचयः 
आस्मज्ञानाधिकारिचित्तस्वरूपम्‌ 
विवेकिनो व्युरिथतवचित्तत्वे हेतुः 
विवेकिनो उयुत्थितचित्तत्वनिराकृतिप्रकारः 
प्रसरख्याननिरो घोपायः 
धर्ममेघसमाधिश्कम्‌ 
धमेमेघकाङे चित्तावस्थाकथनम्‌ 
गुणपरिणामक्रमसमाप्षिः 
क्रमरक्षणम्‌ 
केवत्यस्वरूपम्‌ 


॥ समाप्नेयं योगसूत्रविषयासुक्रमणिका ॥ 


पृष्ठम्‌ 
३२४ 
२२९ 
३२८ 
३३१ 
३३३ 
२३५७ 
३३८ 
३४१ 
३४४ 
३४६ 
३४५ 
२३४९ 
३५१९ 
३५२ 
२३५ 
२५५ 
३५८ 
३६० 
३६१ 
२९२ 


१9 
२६३ 
१३ 


२९४ 


३६५ 


११ 


३६८ 


श्रीः 
श्रीपतन्नव्ये नमः 
श्रीवेदव्यासाय नमः 
श्रीमच्छङ्करभगवतसादेम्यो नमः 


॥ पातञ्जरुयोगसूत्रभाष्यविवरणम्‌ ॥ 
॥ श्रीमच्छङ्करभगवतादप्रणीतम्‌ ॥ 


| समाधिपादः प्रथमः ॥ 


(पातञ्चट्योगचत्रम्‌ ) 
अथ योगानुशासनम्‌ ॥ १॥ 


(व्यास्तमाष्यम्‌) 
अयेलययमधिकाराः । योग।ुश्ासनं शाख्चमधिक्रतं वेदितव्यम्‌ ॥ 


( विवरणम्‌ ) 

यसिन्न स्तः कर्मविपाक यत आस्तां 

ङ्कशा यस्म नाटमरुट्ध्या निखिरानाम्‌ । 
नावच्छिन्नः कारशा यः कल्यन्या 

ठेकेशस्तं कैटभरातरं प्रणमामि ॥ १ 
यः सर्ववित्‌ सवेविभूतिशक्तिः 

विहीनदोषोपहितक्रियाफडः । 
विश्वोद्धवान्तस्थितिहेतुरशो 

नमोऽस्तु तस्मे गुखे गुरोरपि ॥ २ 


अयेद्यादिपातज्ञट्येगशान्[सूत्रभाष्य]विवरणमारभ्यते । तत्रानास्यात- 
सम्बन्धप्रयोजने न पुरुषप्रहृत्तिनिदृत्तिम्यां पयौभोतीति, सू्रकारामिप्रेते 
पुदषप्रवृत्तिनिमित्त मूते सम्बन्धप्रयोजने पूर प्रकरटीक्रियेते ॥ 


२ पातञ्जल्योगसूत्रभाष्यविवरणे 


तत्र॒ प्रयोजने तावत्--चिकिःसाराल्ने तच्चतुन्यूहलप्रदर्शनद्ररिण 
व्यास्यातम्‌ । तथथा--चिकिःसाश्ास्लं चतुव्वूहं, रोगः, रोगहेतुः+ आरोग्यं, 
भेषञ्यम्‌ इति । विधिप्रतिषेधनियमद्वरेण [च तत्‌ ] चतुन्यूहविषयन्याल्यान- 
परम्‌ । एवमिहापि ^“परिणामतापत्तस्कारदुःखैगुणदृत्तिविरोधाच् दुःखमेव सर्व 
विवेकिनः1, इद्यारभ्य चतुब्यूहलं राक्षस्य प्रदरईदितम्‌ । तथथा-दुःखप्रचुरः 
संपतरो हेयः । तस्यव्रिधानिमित्तो द्रष्टदस्यसंयोगो हेतुः । विवेक रूयातिरविष्वा 
हानोपायः । विवेकस्यातौो च सलयामविदानिदृत्तिः, तनिदृत्तत्रान्तिको 


दररयसंयोगोपरमो हानम्‌ , तदेव कैवल्यमिति । अगोग्यस्थानीय- 
केवल्यप्रयुक्तघादस्य तदेव कैवल्यं प्रयोजनम्‌ ॥ 


ननु च ` हेयतद्धेतू न प्रस्तोतन्ये, निष्प्रयोजनत्वात्‌ । हानप्रयुक्तं 
हि शाखं, तदुपायभूता वरिवेकस्यातिरेव वक्तव्या । न हि कण्टकविद्ध- 
चरणतर्स्य तदपनयनं मुक्वा दुःलतद्धेत्‌ चोधेते । नैतदेवं--दहेय- 
तत्कारणयिक्षत्राद्धानोपायस्य । यावदिदमनेनोपायेन हातन्यं संसारचक्रम्‌ अस्य 
चाविधानिमित्तो द्रषृददयक्षयोगो हेतुः इति नाल्यायते, तावन्नावि्याप्रतिपक्ष- 
भूता षिवेकल्यातिरास्यातुं शक्यते । हेयतद्धेतुमतो हनोपायार्थिनो 
रोगिणो भेषञ्यार्थित्वदशनात्‌ । न हि रोगं रोगहेतुं चानयेक्ष्य चिकितसाशास्- 
मुपदिस्यते ॥ ॥ 





सम्बन्धोऽपि-- विवरेकस्यतिह्यनमेव फ साध्ये हानस्यापि बिवेक- 
ल्यातिरेव साधनमिति साध्यसाधनयेरितरेतरनियम एव, नान्यस्ंबन्धः । 
तचचथा- -भेषञ्यस्यारेग्यमेव फलम्‌ आरोग्यस्यापि मेष्रञ्यमेत साधनमिति 
इतरेतरनियमः, स च शाघ्लादिति. । तस्मात्‌ ससब्रन्धप्रयोजनं 
यागानुशासनम्‌ । 


ननु च यदि हानं प्रयोजनं तदुपायश्च विवरेकल्यातिषिति, तत्र 
वक्तन्यम्‌ (अथ विवेकस्यात्यनुक्ञासनम्‌? इति । किमर्थम्‌ “अथ योगानुश्चाप्तनम्‌' 
इति सूत्रितम्‌ ए 


तदुपायल्वाध्ोगस्य । उपाय एव वक्तव्यः स्यात्‌ । उपेयोपग्रदश्चैने ह 
उपेयमुपायं प्रति साकाहुमेवे्युपायः साङ्गकरापः पुनरपि वक्तञ्यः स्यात्‌ । 
तसिमिश्वाभिहिते सवेमभिहितमिति । 








1. पा. 2, चुर 15, 


सभाधेपादैः प्रथमः -३ 


कथं तदुपाद्रत्म्‌ £ यत आह सूत्रकारः--ध्योगाङ्गानुष्ठानादञ्ुद्विक्षये 
 ज्ञानदीपिरात्रिवेकल्यतेः' इति । "निर्विच तेशारवेऽध्यात्ग्रसादः” (ऋतमरः 
तत्र प्रज्ञा इति च ] तथा माष्यकतिऽ्याह--्यस्तेकप्रे चेतत्ति स॒ भूतमथ 
प्रचोतयति” इति । भूतार्थावगतिश्च विवक्यातिः । तस्मायुक्तं तदुपाययोगा- 
नुशासनमेवादौ सूत्रितमिति ॥ 

नतु च योगाङ्गानुष्ठानाद्विविकस्पातिः, तत्र वक्तव्ये “अथ योगाङ्गानु- 
शासनम्‌? इति-न-फकेनेपक्रमात्‌ । योगा्गानुष्ठानस्य हि फं योग इति 
तदुपक्रमो युक्तः ॥ 

यथेव हनेनोपक्रम्येत-न-तस्येपेयत्वात्‌-उपेयमेव दहि तत्‌ । योगः 
पुनः स्वाङ्गानसुपेयश्च, उपायश्च विवेकख्यतिरणिम।दिप्रातेशचे.लभ्योर्हिततरः । 
फठतदु पायरूपल्रात्‌ (फड्पयनिमित्तत्वात्‌ ) ॥ 

उत्तरसुत्रार्थताच्च । न हि (अय येगाङ्गानुङ्ञासनम्‌! इध्यक्ते 
ध्योगश्चित्तदृत्तिःनिरोधः' इति युक्तं वक्तुम्‌ । तदा हि भ्यमनिध्यमदिसूत्रमेव 
पठ्तिध्ये स्यात्‌ ॥ 

भथ तदेव पठित्यमिति चेत्‌-न-योगोपे(पफ़याया हानोपायभूताया 
विवेकस्तिः, फएरस्य च हानस्य, संबन्ध|्र]दरौनाधैलात्‌ ध्योगश्चित्तवत्ति- 
निरोधः" इद्यस्य ॥ 

(सोकं पुनरेतत्संबन्धप्रदर्थनाथम्‌ £ यावत निर्बीनसमाधिरक्षणाभिधान- 
मेतत्‌ । सत्यमेत, तथापि हानतदुपायसंवन्धमत्रथे।तयदेव सूत्रं निर्वीजसमाधि- 
छक्षणतामापयते | । 

न हि निरेधलक्षणात्‌ समधेरथान्तरं हानम्‌ । वि सेतावता विशेषः, 
निरोधलक्षणप्तमाध (धेने) पुनः प्रवृत्तिः, हने खाव्यन्तिकी निवृत्तिरिति । 
समाध्यवस्थायां तु हानाविरेष एव॒ । तथा चह--“्तदा द्रष्टुः स्वखूपेऽव- 
श्स्यानम्‌)› [इति] । “सह्यप्रतिष्ठा च चितिशक्तिः कैश्वल्यम्‌'' इति स्वरूप- 
प्रतिष्ठत) हि कैवल्यमाह । ततश्च निर्गौजस्माधिना केवल्यमेव राल्ञथ- 
प्रस्ययद्रदिप्ने सक्षात्ियते ॥ 


1 अ 1 णण 





1. पा. 2. चू. 28. 6. पा. 2, सू. 29. 
2. पा. 1. सृ. 47. 7. पा. 1. सू. 2. 
3. पा, 1. सू. 48. 8. पा. 1. सू, 3, 
4. पा. 1. सू, 1, 9, पा. 4. सू. 34. 
६. पा. 1... 2. 


४ पातञ्जरयोगसूत्रमाभ्यविवरणे 


तस्मादुच्यते कैश्चित्‌ (सत्रीजक्तमाषिः केवस्यसाधनामेति-- तन । 
कि तर्हि? स्यातिय साधंनमविचयानिवृत्तिदरेण । अविधानिमित्तो हि बन्धः;। 
तस्माय्पि योगानुशासनं सूत्रितम्‌ + तयापि स्यात्यथत्राचयोगस्य तदूद्ररेण 
ख्यातिहानसंवन्धमपि दरौयतीति, पुषटून्यते उत्तरसतरसंबन्धार्थं॑च योगानु- 
रासनमिति सूत्रयितव्यमिति ॥ 


यपि फलानां तत्फटसाधनं प्रघ्युत्पननाकाङ्घाणां साधनोपदेदोऽप्यत्ि | 
तथापि न तस्मयोजनम्‌ , सस्य फटेोदेरोन प्रवृत्तस्तदेव प्रयोजनमिति ॥ 


योग्‌।तुशाप्तनमिति । यथा रिष्योऽनुशिष्यते विशिष्टप्रदृत्तिनि- 
वृत्तिनियमद्वरेण, त्तथा विशिष्टसाध्यसाधनतदरङ्गनियममात्र्तद्यादन्तेवास्यनु- 
श।सनवदोगानुरासनमिव्युन्यते । अनुशिष्टिरनुशसनं, येगेऽनुरिष्यतेऽने- 
नासिननिति वा योगानुशासनं शाखम्‌ ॥ 


अथेलययमपिकार्थः । अधिकार आरम्भः प्रस्तावः, अ्थौऽमिघेयोऽस्प ; 
शिष्टस्मृतिप्रामाण्यातः । ननु चनेन्तयीधस्याधशन्दस्य स्मरन्ति शिष्टाः । तथा 
चाह--“धृत्तादनन्तरस्य प्रक्रियार्थो "ष्टः, इति । न-- प॒प्रत्रारम्भा्ल्त्‌ । 
आनन्तरयस्य च गम्यमानलात्‌ । यथा पुत्र इत्युक्ते पिता गम्थते, न च पुत्र 
शब्दस्यार्थः पिता, तयेहप्यारम्भ एवाभिधीयते, आनन्तय तु प्रतीयते ॥ 


[$~ 


अत एव च व्ृत्तादनन्तरस्य प्रक्रियार्थो दृष्टः इत्युच्यते | यदि 
चानन्त्यार्योऽमविष्यत्तदा व्वत्तादनन्तर्येऽयं प्रक्रियायाः इल्यवदिष्यत्‌ । 
अनन्तरस्येति चनन्तरभाविन एवामिधानम्‌ ॥ 

अपि चैवं हि स्पृतिः--“शङिश्विदन्ययः तरिभक्त्ययप्रधानं किञश्चिकिया- 
प्रधानम्‌ । उचैनीचेरिषयादि विमकत्य्थप्रधानम्‌ , हिरुक्‌ प्रथनिल्यादि क्रेया- 
प्रवान्‌” [इति] । न चैतद्ववतिरेकेणान्ययानामर्थो विद्यते । तनाथशग्दस्या- 
नन्तर्थाथैवे सति वरिभक्सय(क्ति)श्रवणमयुक्तम्‌ , सच्चप्रधानत्वात्‌ । आरम्भक्रियार्थत्े 


[ @ > 


तु न विभक्य.थ)श्रवणमयुक्तम्‌ , अप्तचप्रधानत्वादिति ॥ 


तस्मादथरन्दः प्रप्तावा्थ एवेति युक्तमयेव्यधिंकारायं इति । स्वख्पा- 
वचोतना्थं इतिशब्दः । यथा गौखिहेति । प्रपिद्धोऽप्यथजञब्दार्थोऽधिक्रियमाण- 
विषये रिष्यनुद्धिसमाधाना्थ कीव्येते । सिद्धो ह्ययं न्यायः श्रुतौ *ध्याह्यास्यामि 


1 


ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिष्याप्तस्छ' इति ॥ 


1, रात्र, भा. अ, 1. पा. 1. पू. }, बर, उ. 2. 4. 4. 
2. महाभाष्यं 1. 1, 37. 


. समाधिपादः प्रथमः ५ 


[ भाष्यम्‌ | 
योगः समाधिः । स च सवैमोपञशित्तस्य धर्मः । 
क्षिपत, मूढं, विक्षि एकाग्रं, निरुद्धम्‌ इति वित्तभूमयः ॥ 
[ विवरणम्‌ | | 
कः पुनर्योगो यस्यानुशासनं प्रस्तुतमिति-भह - योगः समाधिरिति ॥ 
समाधिग्रहणात्‌ युजिर्योगे" इति निवदय, भ्युज समाधौ" इत्ययं गृहीतः | 
योगः समाधानम्‌ | ननु च भ्योगः समाधिः? इत्येवमन्तेन व्याए्यति सूत्रे स च 
सार्वभौमः" इव्यादिभाष्यमतबन्धं ददयते । नैष दोषः । इह समाधिरिव्युक्ते, 
समाधीयमानप्रक्षत्वात्‌ , समाधीयमानानां च बहूघात्‌ , किमासां समाधीयते ए 
किं वा शरीरम्‌, अहोस्िदिन्दरियाणि, इति बहुविदा विप्रतिपत्तेः, 
स्वविरोषणाक्राह्ताच समाप, कस्यायम्‌ ? रविविसेषणकः १ इत्यनुषक्ते प्रश्ने, 
इदमाह-स च सार्मैमोमश्चित्तस्य धर्मं इति । चित्तस्य धर्मो नासादीनाम्‌ । 
तच्च चित्तं खयमेव समाधीयते [समाघात्र)न्तरनिरपेक्षत्रात्‌ ॥ 


काः पुनभूमय इव्यत आह--क्षिं मूढमियादयो मूमय इति । 
कषिप्तमिति क्ैक्रि मिष्ठ। ' यथा मिनः कुपूलः स्वयमेवेति । श्षिकतमनिष्ट. 
विषयासज्चनेन स्तिमितम्‌ । मू्ढं॒निर्विवेकम्‌ । विक्षिप्तं नानाक्षिक्तम्‌ | 
क्मेकतीर्ये् । विवेकाक्षमं च विक्षिपतत्वदिव । एकाग्रं त॒ल्यप्रययप्रवाहम्‌ । 
निरुद्धमिति प्रलययदुन्य चित्तम्‌ ॥ 

नतु च भूमिषु रमषु विवक्षितेषु, किमथ क्िप्तमिव्यादिना घम्बुष्यते 
नैष दोषः, धर्मिणा घम एवेपदिरयते । धर्माणां धमिंविषयप्वात्‌ । यथा गोले किं 
लिङ्ग भिति पृष्टे, विषाणी ककरुवान्‌ प्रान्तवाख्धिरिति धरिणा ध्म एवोपदिश्यते । 
तस्मात्‌ क्षेपादयश्ित्तस्य भूमयो धमी इयर्थः ॥ 


नतु च भूमीनां चित्तधमेवे समाधेश्च, कथं मूमिमिः समाधिराधारलेन 
विरेष्यत सारमोम इति ? सामान्यमूतघ्वात्‌ समाधेः! भूमीनां च विशेषत्वात्‌ | 
यथा क्षिपते तिष्ठति, मूढं तिष्ठति, विक्षिप्तमेकाम्रं चेति, क्षिप्तादिमूमिइ स्थितिरनु- 
वतते सामान्यम्‌ । स्थितिश्च समाधिः । तस्मात्‌ सामान्यरूपं स्वाघु भूमिषु 
प्राघान्येन वर्तत इति । 'सवैभूमिपथिषी' शव्येश्चयथीयोऽणाप्रत्ययः । अनुशति- 
कादित्वादुभयपदबृद्धिः ॥ 
ये पुनबाद्याध्यासिकान्‌ संयमवरिषयान्‌ भूमय इत्याचक्षते । तषां 
विक्षिपते चेतक्षिः इति सामानाधिकरण्यानुपपनत्तिः । स्ववचनविरोधश्च कथम्‌ ? 


8 पातज्ञर्योगुत्रमाध्यविवरणे 


्षिष्यतेऽस्मिन्निति क्षिप्तम्‌ , सुद्यतेऽस्मिननिति मूं, यद्‌ चैवं न तदा संयम- 
विषयता । तत्र क्ेपाधसंमवात्‌ । एकाम्रावस्यारयां हि सेयम भवति ॥ 


कि चान्यत्‌--क्षिपेश्च प्रौव्याचर्थीभावादधिकरणे निष्ठात्रत्ययामावः। किं 
च- निरुद्धे चेतत्ति सयमस्यापि तत्राभावात्‌ बृत्तिशुन्यत्वात्‌ संयम पिषयाभावः । 
न हि निरोधे विषयविरेषे चित्तं निरुध्यते ¡ तदा हि व्रिषयित्वाननिषर्तते 


परिगिणनानुपपत्तिश्च । न हि क्षिप्तादयः पश्वेव संयमस्य विषयाः । 
तेषामानन््यात्‌ ॥ 


भ 


| ननु चान्यथा योगं केचिदिच्छन्ति । तथा चाहुः--“दन्धिषमनोऽध- 
सन्निकपरीत्‌ सुखदुःखे, तदनारम्भ आत्मस्थे मनसि, [स)]रारीरस्य इुखदुःखामवः 
प्राणमनेविनिग्रह पक्षः पतयेगे , योग] इति" । तदिति प्रकृतपिक्षम्‌ । योऽसौ 
घुखदुःखयोरासेन्धियमनोऽधसनिक्र्षो हेतुः, तस्यानारम्भः तदुत्पत्तिः । स कथं 
भवति £ आत्मस्ये मन्ति, नेन्दियस्ये । सरारीरस्य अविरीर्णश्षरीरस्य । 
तदा कारणाभावात्‌ कार्याभाव इति, सन्निकर्षीमव्रि षुखदुःखयेष्प्यभावः 
तस्यामवस्थायां योऽपो विमोरात्नो मन्ता संयोगः स प्राणमनोविनिग्रहपिक्षः 
संयोगविरेषो योग इति ॥ 

अत्रोच्यते--आःमस्थे मनपीव्ययुक्तम्‌ , सर्वदा आलमस्यघ्ानमनसः । 
इद्दियादिसनिकपरनारम्भपिक्षया आप्मस्ये इति चेत्‌, तदनारम्भ इव्यव 
सिद्धतराद मस्थे मनसीत्यनथकं स्यात्‌ ॥ 


किं चन्यत्‌-मुक्तस्यापि मनस आलस्यलादिन्दरियसनिकषामावाच 
योगः प्राप्रोति । तस्यापि हि सवगतत्वात्‌ मनस्तश्च नित्यत्वात्‌ सवंदात्मस्यत्वमेव ॥ 


क्रि च-आत्मनः प्रदेशभावादात्मस्थ इत्ययुक्तम्‌ । न चघ्युपचरिता- 
सप्रदेशसंयोगः परमार्थस्य योगस्य हेतुः स्यात्‌ । उपचरितस्य मिथ्यात्वात्‌ ॥ 
विं चान्यत्‌-मनोऽधसनिकर्षामाव इव्येव सिद्धेः(द्)शन्धियम्रहणमनर्थकं 
स्यात्‌ । अथयेद्धियेर्विना . मनोऽथत्तनिकप्ीमावात्तदनारम्भ इति प्राप्त्मभवे 
प्रतिषेधो न युक्त इति चेत्‌ ] नैतदेवम्‌, विनेन्दिमेनोऽथसननिकर्षा 


4 (4 


-नास्तीय्यात्‌ सनिकप्रप्रतिषेषं कुवैता विषयत्रात्तिरिन्दियद्यास प्रतिपादिता स्यात्‌ ॥ 


वि चान्यत्‌--पवेप्राणमाजामिन्दियमनोऽथसनिकषत्‌ बुखदुःखप्रति- 
छम्भस्य प्रसिद्धत्वादात्मनः सम्बन्धस्य च निघ्यत्वात्‌ सुखदुःखामवो योग इत्येष 
सिद्धेः, तत्न [सूत्र] शेषोऽनथकः स्यात्‌ ॥ 


समाधिपादः प्रथमः ७ 


भाष्यम्‌ | 

तत्र॒ विक्षिप्त चेतमि विक्षेपोपस्रजैनीमूतः समाधि 
योगपक्षे वैते ॥ 

[ विवरणम्‌ ] 

अथापि स्यादिन्दियमनोऽथसनिकषम्रहणादते हुखदुःखामाव इव्येतावति 
सति मुक्तस्यपि षुखदुःखाभावायोगिचप्रसङ्ग इति तननिवृस्यर्थ सूत्रोषग्रहणमिति | 
तच्च न, सुक्तस्य षुखदुःखप्राद्यमवात्‌ , प्रात्तिपूवप्रतितरेधस्य न्याथ्यत्वात्‌ , यस्य 
इखदुःखभ्र प्तिः, तद्विषयः घुखदुःखाभाव एव योग इति सूत्तरोषभ्र्यास्यानं युज्यते॥ 

किं चान्यत्‌--उपत्तेऽपि सशरीरप्रदणे सुक्ताद्विनिदृत्तिनं शक्यते 
कर्तुम्‌ + निष्प्रयोजनघात्‌ । घुखदुःखामावश्चेधोगः, विधानमपि शरीरं 
कायाकरणादनर्थकरं स्यात्‌ । कार्यानपेक्षायां हि सुक्तामुक्तयोरविशेष एष ॥ 

कि चान्यत्‌- प्राणमनोविनिग्रहपेक्ष इत्यपि न घटते । विधारकस्य 
प्रयततस्यात्मप्तमवेततादत्रिचमानेऽपि मनसः करिंयावचे इन्दियेणासंयुज्य मनः प्राण. 
[मनोनिग्रहौ न कर्तुं पर्याप्यते । इन्दियसयोगे च मनसः, तदनारम्भ 
इत्ययुक्तम्‌ । मनसश्च प्राणनिग्रहे व्यापर(ब)तत्वादनारम्भातुपपत्तिः ॥ 

न चासति इद्धियवायुसन्निकषे प्राणनिग्रहः । न चनिगृहीते प्रण 
योगः, आसमस्यविधारकग्रयतद्वारा मनेगतक्रियासंबन्धहेतुत्वात्‌ प्र णनिग्रहस्य | 
अथापि स्याघोगः सम।धिद्धिति। तच्च न, निष्करियत्वादात्मनो निव्यसमाधानमेव । 
स्थितिश्च समाधिच्युच्यते । तस्माचुक्तममिधीयते--स॒च सार्वैभोम- 
शित्तस्य धमः' इति ॥ 

` - ययेवं समाधिश्ेयोगः, स च सर्वभौमधित्तधमेः, स च सर्वजनानाम- 
यत्तसिद्धः, क्षिप्ताचनुगतत्वात्‌ । तथा च सतिं; यथेव श्ाप्प्रश्चासादीनां 
प्रयत्तादते सिद्धतात्तत्करणमदक्षणम)न्थकम्‌ , एवं योगानुञ्चासनमप्यनर्थकं 
प्राप्तमिलत आह-तत्र | विक्षिप्त (अनविक्षिप्र) चेतमि विक्षेपोपसमेनीसूत 
सम।धिने योगपक्षे वतत इति ॥ क्षिप्ताचनुगतस्यं योगपक्षेऽनभिप्रेतत्रात्‌ । नं 
हि क्ेपा्नुगतः समाधिभूतार्थवयोतनादिक्षमः, क्षेपादिप्रधानत्ात्‌ । 
विक्षेपनिषेधेनैव हि प्रधानमछ्निवर्हणन्यायेन क्षिपतमूढयोरपि निषेध; कृतः । 
म्रधानतां च विक्षेपस्रमाधेरधिकारयोग्यत्वात्‌ । विक्षेपस्य हि चित्तमपक्षपातादिष्ट 
विषयमुपने्तं रक्यते । न हि विषयासञ्ञनादिना क्षिप्तमिष्टत्रिषयवियोगादिना 
वा .मूढमन्यथोपनेतुं पार्यते ॥ 


८ पातञ्जलयो गसूत्रभाष्यव्रिवरणे 


[| भाष्यम्‌ | 
यस्त्वेक चेतसि स भूत(सद्भूत)मथ प्रयोतयति, क्षिणोति च 
न 


केशान्‌, क्मेवन्धनानि शयति, निरोपमामभि)युखी(खं)करोति -स 
स्रज्ञातः(योग)श्याष्यायते ॥ 


स॒ च वितकौतुगतो विचारायुगत अआनन्दानुगतोऽस्मितातुगत 
इत्युपरिष्टात्‌ (नि)परवेदयिष्यामः ॥ १ ॥ 


[ त्रिवरणम्‌ | 
योगपक्ष इतिं ॥ समाधिवे सल्यपि कायोकरणात्‌ पक्ष इत्युच्यते । यथा 
गच्छतः प्रतिपदं वि्यमानापिं स्थितिः स्थितिका्यकरणानन स्थितिस्युच्यते । 
विक्षेपोपसर्जनी भूतत्वं विक्षेपस्येकसमधिन्यक्ल्यमिप्रयिण । सार्वभौम इति तु 
प्राधान्ये, सामान्येन सर्वभूमिषु वत्तः ॥ 


यदुपसजनीमावः समापिपक्षाृत्तो करणम्‌ , - इहप्येकम्र एकाम्रतो- 
पसनेनव्वं स्यात्‌ । ततश्च योगपक्नाटृत्तिरितिं चेदत आह--यस्तेकाग्र इति । 
नैकाग्रतायां भूम्युपसजनलम्‌ । कुतः 2 कशकर्माप्रनल्लरात्‌ । ऊशकर्माप्रनरतवे 
न हि विक्ेपादीनामुदयः ॥ . 


0 


एकाग्रतामूमो समाधिर्यः स मूतमथ यथासानं प्रचोतयतिं अवगमयति 
जयेग्यधज्ञानमयथाभूतत्वगन्धितमेवेति भूतग्रहणम्‌ । क्षिणोति, क्षपयति, पश्च- 
पवैणोऽविधादीन्‌ डेशान्‌ 1 कमबन्धनानि, कर्माण्यत्र बन्धनानि, धममीधर्मविमिश्र- 
कमेजातानिं जन्मादिनिनन्धनानि, धयति, शिथिलीकरोति, निरोषमामुखी- 


करोति, अमिमुखीकरोति । स सम्प्रज्ञात इत्यास्यायते आचर; ॥ . 


स॒ च वितकानुगतो विचारानुगत इलयादिभाष्यम्‌ । सम्भह्नातस्य 
प्रायम्य्हक्षणामिधाने प्राति, अम्यहिंतत्वादसम्भ्ञातस्यैव लक्षणे युक्तपिह 
वक्तुमिति सम्भ््ञातमुपरि्टात्‌ प्रवेदयिष्याम इत्युष्यते ॥ - 


इतश्वासमपरज्ञातस्य लक्षणमिहैव वक्तव्यं, सम्प्ज्ञातनिरेक्षोऽप्यसम्प्ज्ञातः 
पर(परङ्ृष्टोवेराग्यविरामग्रसयाम्यासाम्यां सिष्यतीयेत्मदशनार्थम्‌ । इह सम्प्रज्ञात- 
ठक्षणामिधनि तदुत्तरकाले चासतम्भज्ञातलक्षणामिधाने सम्भ्ज्ञ(तपिक्षयेव असम्भ्र- 
ज्ञातसमाधावधिकार इया्ङ्क। स्यात्‌ 3 तस्मादु परिषत्‌ प्रवेद्पिष्याम इत्याह ॥ १ ॥ 


समाधिपादः प्रथमः ९ 


[ भाष्यम्‌ | 
वैवृत्तिनिरोषे खपंप्रजञातः (समाषिः) । तस्य रक्षणाभिधिस्सयेदं 
सुत्रं प्रववृते-- 


[ सुत्रम्‌ | 
योगधित्तव्त्तिनिरोधः ॥ २॥ 
ू [ भाष्यम्‌ | 
सवशब्दाग्रहणात्‌ तेप्रज्ञातोऽपि योग इयाख्यायते । 
[ विवरणम्‌ | 


सर्ववृत्तिनिरोधे तसेप्रजञात इति । तुरब्दोऽवधारणाधः । तस्य 
एवंविधस्य समधिरसंपज्ञातस्यैव केवलस्य लक्षणाभिषिरसयेदं सूत्र प्रवधूते 
रबृं “योगि त्तदृत्तिनिरोधः' इ[ती]ति वक्तम्यम्‌ ॥ | 

ननु च तस्य लक्षणममिधातुमेतत्‌ सूत्रं प्रत्त, तथा च सति. ध्योगस्य 
चित्तवृचिनिराधः) इति वक्तव्यं, सामानाधिकरण्यं न युक्तम्‌ । न हि रश्ष्यमेव 
क्षणे स्यात्‌ । चित्तवृत्तिनिरोधल्क्षण इति वा वक्तव्यम्‌ । नैपष्र दोषः । रक्षय 
छक्षणाध्यापात्‌ । यथाअ्यं ण्डो देवदत्त इति रक्ष्ये लक्षणमध्यस्यते 
(प्रयत्यते) ॥ | 

ननु च सव्रत्तिनिरोधे व्वततमप्ज्ञातः, तस्य चेदं लक्षणं, ततश्च भ्योगः 
सर्धचित्तवृत्तिनिरेधः इति वक्तव्यम्‌ । न चोक्तम्‌ । अतोऽतिन्यापि लक्षणम्‌ । 
स्रशब्द ग्रहणे तावत्कारणमुच्यते--यदि सर्वग्रहणं त्रियते, तदैकदेशनिरेध- 
निमित्तस्य सेप्रज्ञातस्य योगतवं निवर्तितं स्यात्‌ । तन्माभूदिति स्वशब्दाम्रहणम्‌ ॥ 


अस्तु तहिं संप्रज्ञातासंप्रज्ञतयोः सामान्यलक्षणे, विरोषानुपादानात्‌ 
नैष दोषः । येगे प्रकृते पुनर्योगप्रहणात्‌ । विशेषविवक्षायां हि येगग्रहणे 
नाथवत्‌ स्यात्‌ ॥ 

ननु चानुशासने न्यग्भूतत्वाचोगस्य इह योगग्रहणे असति चित्तचृत्ति- 
निरोध इ्युक्तेऽनुरासनार्थ॑ता। मवेत्‌ सूत्रस्य-नैवं--योगानुरास्तनस्य 
प्रस्तुतत्वात्‌ । येोगानुञ्चासनं हि प्रारग्धं, नायोगानुश्चाप्तनं, तदछक्षणामिधाने 
ह्यतिप्रसङ्गः, पदार्थासङ्गतिश्च । न॒हि चित्तदृत्तिनिरोधो योगाुशासनमिति 
पदाथः सङ्गच्छते ॥ 

एवमपि योगग्रहणात्‌ कुतोऽरसंपरन्नातस्यैव लक्षणं, न पुनः संप्रज्ञातस्य 


रक्षणं स्यात्‌ , येगग्रहणस्याविशिष्टत्वादिति 
2 ॥ 


१० पातञ्ञखयोगसूत्रभाष्यविषरणे 


भाष्यम्‌ ] 
चित्तं हि प्रस्याप्रवृत्तिस्थितिश्चीरत्वात्‌ त्रिगुणम्‌ । प्रस्यासवसूपं हि 
चित्तपत्त्म्‌ 
[ विवरणम्‌ ] 
उच्यते--भग्यमिचारात्‌ । व्यमिचरति न तत्तस्य छक्षणं, निगेधस्वसं- 
्रज्ञतिऽपिं वतैते इति रसंप्ज्ञाते भ्यमिचरति । न॒हि विषाणि गोर्न, 
महिष्य दिभिन्धमिचार।त्‌ ॥ 


नमु चाकप्रज्ञातमपि व्यभिचरति, संप्रज्ञातस्यापि हेयदृ्तिनिरोधलात्‌ । 
सत्यमेवं, किं तु न निरोधादन्येन लक्षयितुगसेरज्ञातः शक्यते | निरोध एव तु 
तस्य लक्षणम्‌ , अन्यस्यामावात्‌ । संप्र्ञातस्य चसाधारणवितकौदिटक्षण- 
ठक्ष्यघ्रात्‌ । यथा स्पररक्षणमिद्युक्ते बायुरेव।पाधारण्याह्टक्ष्यते स्पर्शवच्वेन, 
अथ च विदत एर स्पशव तेजःप्र्रतिष्वपि ॥ 


एवे च सति योगग्रहणमनुवादमात्रम्‌ । अत ए च स॒वरप्रहणं 
न कृतं सूत्रे । निरेधग्रहणेनैवासतज्ञातलक्षणलरे सिद्धे यदि सवेग्रहणं क्रियेत; 
तस्प्रज्ञातस्य येगतां निवारयेत्‌ । तस्मादसंप्रह्वातस्यैवेदं ठक्षणम्‌ । तथा 
चोपसंहरति माष्यकारः-- (न तत्र किचित्‌ संप्रज्ञायते इयसंप्रज्ञातः, स 
योगश्ित्तदृत्तिनिरोध' ईति ॥ 


चित्ततदृत्तितन्निरेधन्याचिषए्याक्तया चित्तं हीयादि भाग्यम्‌ । किमात्मकं 
पुनस्तचित्तं, यस्य ॒वृ्तिनिरोधो योग इव्यत आह- चित्ते हि प्रस्या- 
रबृत्तिस्थितिसीरलात्‌ त्रिगुणमिति । तत्र चित्तं त्रिगुगमिति व्याख्यायते, 
्रयग्रदृत्तिस्थितिीकलादिति दैवः । प्रख्या प्रख्याने प्रकाशनं, स हि 
सुखगुणस्य धर्मः । प्रवतिः प्रव्षनं व्यापारः, स हि रजोधर्ैः । स्थिति; स्थानं 
वरणं प्रतिबन्ध इति, स च तमोधमः । एवसीला हिं सत्वादयो गुणाः, चित्तं 
नच प्रस्यादिशीठं, तस्मात्‌ त्रयाणां गुणानां परिणामश्चित्त भवितुमहति ॥ 


= अ (~ 


` तस्य च प्रष्यादिहैतोरपिद्धिमारोक्याह - प्रख्या स्वप हि चित्तसत्व. 
पिति । दिशब्दः प्रपिद्धावचोतना्थः 1 प्रतिद्धं हि कोके शाल्चे च स्वीव- 
भाक्तकत्वं चित्तस्य । चित्तमेव सवं चित्तत्वं सचप्रधानगुणपरिणामतात्‌ ॥ 


अथवा अन्तप्ात्रियोगाम्यामनकदृत्ति रूथातिमात्रे च चित्त स्पष्ट दशयित 
शक्यत इति ब्रवीति - प्र्यास्वहूपं दहि चित्त्तस्वमिति ॥ 


समाधिपादः प्रथमः १९ 


[ भाष्यम्‌ | 
रजस्तमोभ्यां संसृष्टम्‌ रेशवर्यविषयप्रियं मवति । तत्तमसानुविद्धम्‌ 
अधर्माज्ञनावेराग्यानेशर्योपगं भवति । 


तदेव प्रक्षीणमोहावरणें सर्वतः प्र्ेतमानमनुविद्धं रजोमात्रया 
धमेज्ञानवेराग्येशवयोपगं मवति । तदैव रजोठेशमरपितं स्वरूपप्रतिष्ं 
स्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रं धमेमेषध्यानोपगं भवति । तत्‌ परं प्रसङ्ख्यान- 
मिाचक्षते ध्यायिनः । 

चितिशक्तिरपरिणामिनी अप्रतिसंक्रमा दर्शितविषया शुद्धा 
चानन्ता च| 


[ विवरणम्‌ | | 

इदानीं वृत्तयो व्या्यायन्ते । तासां चनिकलं रजस्तमसोरुद्वामि- 

भव्निमित्त विरुद्धये चेव्याह- रजस्तमोभ्यां संसृष्टे समप्रधानाम्यां यदा 

सृष्टं तदनं देशरयव्रिषयप्रिये भवति ॥ प्रीतिः रागः, रेशवयैविषराग- 
युक्ता ृत्तयो भवन्तीत्य: ॥ 


तत्तमसानुविद्धं ॥ तदेव प्रख्यास्वरूपं चित्तं यदा गुणभूतरजस्केनो- 
द्मूतेन तमसानुषिद्ध, तदानामधम॑दि चतुष्ट्विषय। वृत्तयः छ्चिष्ट! जायन्ते ॥ 


तदेव प्रक्षीणमोदहावरणमिति ॥ न्यगमूततमस्कं तमःश्षयदिव जर्धरा- 
पगमादिव (परि) रविविम्बे सवतः प्रधोतमानं रजोमात्रया रजोर्रेन 
अनुविद्ध यदा तदा धमाद्युपगतं । घमौदिचतुष्टयविषया दृत्तये!$्किष्टा भवन्ति ॥ 


यदा तदेव रजो[ ठेश ]मरपितं स्वरूपप्रतिषठे केवलेन स्वेन प्रस्याः 
रूपेणावस्थितं, तदा सत्वपुरुष।न्यताख्यातिमात्रे मवति । सत्वं चित्तं पुरुप्रो 
भक्ता तयोरन्यता विविक्तता तत्ह्यातिः तद्वगमः, तन्मात्रग्रहणं ङ्ेशाघभावप्र- 
दसनार्थम्‌ । षर्ममेषध्यानोपगं भवति धर्ममेधो नाम समापिः ॥ 

तदेव प्रस्यानत्रलाद्जस्तमसी तिरस्कृत्य केवटेन सयापयात्मना पुरुष- 
स्वरूपमात्रदरनिन अवस्थानं ध्याने प्रसंख्यानमिलयाचक्षते, ध्यायिनो योगिनः॥ 
| एवं वृत्तिखरूपे व्यस्यति ततनिरोधप्रदरीनार्थमाह-चित्त्चक्ति रित्यादि ॥ 
चितिरेव शक्तिः चितिशक्तिः । यथा पच्यादयः राक्तयः शक्तिमदपेक्षाप्रपणीय - 
जन्माने न स्वयंशक्तयः । चितिः पुन; स्वयमेव रक्तैः, ना्थान्तरमपेक्षते । 


१२ पातञ्जरयो गसूत्रभाष्यविवणे 


[ भाष्यम्‌ | 
सस्वगुणास्मिका चेयमतो विपरीता विवेकख्यातिरिति ! अतस्तस्यां 
विरक्तं चित्ते तामपि ख्यातिं निर्णद्धि । तदवस्थं संस्कारों वरति । 
स॒ निर्बीजः समाधिः । न तत्र किचित्‌ सेंप्रज्ञायत ईइलयतंप्रजञातः । 
(द्विविधः) स योगच्धित्तवृत्तिनिरोध इति ॥ २॥ 
[ विवरणम्‌ । 
तेन॒ निव्यावस्थितव्वम्‌ । चितिराब्दस्य चिन्मत्राभिधायिनः शक्तेशब्देन 
सामानाधिकरण्ये अविकृतरूपाया एव चितेर्विंषपिखप्रद दनाधेम्‌ ॥ 
यस्मदिवमतोऽपरिणामिनी । व्यवस्थिते धर्मिणि धममीन्तरतिरोभविन 
धमान्तैरभ्रादुभोवः परिणामः । न परिणिमितुं शीरमस्या इत्यपरिणामिनी । 
अत एव अप्रतिपद्क्रमा, परिणामिन एव चित्तदिविषयादौ प्रति- 
सङ्क्रमदरोनात्‌ ॥ 
| अत एव द्रितविषया दरितोऽन्तःकरणेन विषयोऽस्या इति । तेनैव 
शुद्धा । अत एव अनन्ता देशतः कारतश्च | पूर्पूवैमुत्तरस्योत्तरस्य हतेन 
र्व्यम्‌ । वेधम्य॑दृ्टान्तः चित्तमिद्धिधाणि च । सत्वगुणास्मिका समेव गुणः 
सच्वगुणः तस्येवासा स्वरूपमवभासो यस्याः सेय सच्गुणासिका अव- 
भाप्तस्ख्पेयथः । वृष्यविरिष्टवृ्तिादया सलगुणाकिकेद्युच्यते ॥ 


यदि वा ख्यात्या संबध्यते स्यतिः सच्रगुणालिकेति । अतः 
चितिराक्तरुक्तलक्षणाया विपरीता विकुक्षणा विवेक्रद्यातिः परिणामादिमती ॥ 


यस्मात्‌ पुरूप्रादुषृष्टात्‌ परिणामादिगुणव्रिरहितान्िकृश परिामादि- 
गुणयुक्ता, अतः स्वरूपदोषददनात्‌ तस्यां विरक्तं ` अपरक्तं तामपि रूयातिं 
आसनो निरुणद्धि ॥ 


तदवस्थं निरोधावस्थे, प्स्कोपग, संस्कारमात्रावरोषम्‌ । निरुद्वाघ् 
वृत्तिषु ब्रत्तिजनिताः सर कारा एवावरिष्यन्ते । एतध्यां निरोधमूमो यः समाधिः 
स निर्बीजः । निगेतं बीजत्र छ्ेशादिनीजं सवैपुत्सनमस्मिननिति। तस्मादसंपज्ञात- 
समाधिकक्तणाथैमेव सूत्रमिपयुपसंदरति--स योगशचित्तधृत्तिनिरोध इति ॥२॥ 


क क ५ ४। 


योगशचित्तदृत्तिनिरोष हव्युक्तं, तत्र वेद्धृलेनैव पुरुषतद्भावाधिगमः, 
विषयमूत्त्तिनिरोधे च विषयिणोऽपि बोद्धुः पुरुषस्य निरोधं कशचिदाशङ्कतापि, 
तथा च॒ सति तवैत्रह्यप्रा्ुपायस्यापि विवेकल्यतेरनर्कलं॑ मन्वीत 


समाधिपादः प्रथमः १३ 


। भाष्यम्‌ | 
तदवस्थे चेतसि स्वविषयामावात्‌ बुद्धिबोधास्मा पुरुषः कि 
स्वभाव इति- 
| सूत्रम्‌ | 
तद्‌। द्रद्ुः स्वरूपेऽवस्थानम्‌ ॥ ३ ॥ 
( भाष्यम्‌ | 


क + [> 


स्वरूपम्रतिष्ठा तदानीं चितिशक्तिः, यथ। केवस्ये । व्युस्थानचित्ते तु 
सति तथापि भवन्ती न तथा ॥३॥ 


[ विवरणम्‌ ] 

योगानुरापनस्यापि तद तस्य॒ निष्फलं प्रतिपयेत, तस्पाप्पुरुषस्य वृत्ति- 
निरोधादनिरोधं दर्शीयितुकामः स्यातेश्वापि फर साक्षाददयन्नाह-- तदवस्थ 
चेतसीलयादि ॥ ` 

तदवस्ये--निरोधावस्थे । स्वविषयाभावात्‌--स्वविषयशित्तषृत्ति- 
स्तदभा(वे)वात्‌ । बुद्धिबोधात्मा बुद्ध इत्तिरूपेण परिणतां बुध्यत इति बुद्धा 
पुरुषः । तद्वोधनमेव हि पुरुषस्य स्वं ख्पं, नान्यो बोद्धा, नान्यद्वोधनम्‌ । बद्धश्च 
बोधनादन्यतये सति विक्रियात्मकता स्यात्‌। ततश्च दरितविषयत्वं च न स्यात्‌ । 
तथा च करणान्तरापिक्षित्वे पुरुषस्य प्रसभ्येत । तस्माद्वोधन बोरू चोपचरितं 
तदृदृतिसारूप्येण । तया च वक्ष्यति-- द्रष्टा दश्चिमात्रः" इति ॥ तस्मादाह 
लुद्धिनोधनमेवत्मा खलूपं यस्य स बुद्धिवोधास पुरुषः रिस्वभावः फ 
नश्वरस्वमावः, सद्भाव वा रविस्वमावः;) कर्थं वा सद्धवर इति१॥ तदा द्रष्टुः 
स्वरूपेऽतरस्थानम्‌ ॥ यदा निरुद्धा इत्तयः, स्वरूपप्रतिष्ठा तदानीं चितिशक्तिः। 
स्वर्पप्रतिष्ठेयधः । यथां कैवल्ये ॥ तदा सद्भावं तु न तत्स्वाभासे 
दृश्यतात्‌?2 इत्येवमादिना वक्ष्यति । तत्र सिद्धे सद्भावे तत आकृष्य प्रापतारङ्का- 
निव्ृर्यधमुच्यत--सवर्पर्रतष्ति ॥ 

धिद्धवद्थाख्यातं सूत्रम्‌ । तत्रेदं प्रसक्तमितरत्र न स्वरूपप्रतिष्ठेति । 
अन्यथा हि तदेति व्रिरेषणानथक्यं स्यात्‌ । न चेदन्यत्न स्वरूपप्रतिष्ठा तत्रावस्था- 
न्तरयोगात्‌ परिणमि्वादिदोषः प्रापोतीति तत्परिजिदीषयाह --्युल्यानचित्ते 
तु सति तथ।पि भवन्तीति । [अनेन] अन्यत्रापि खर्पभ्रतिष्तं दर्शयति ॥ 

1. क-2. चू-20. 2. प~. त-19. 


१४ पातञ्जलयोगसूत्रभाष्यविरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
` केथं तिं ! दर्वितविषयतात्‌- 
| सूत्रम्‌ | 
वृत्तिसारूप्यमितरत्र ॥ ४ ॥ 
7; [भष्यम्‌ | | 
व्युत्थाने याधित्तवृत्तयः तदविरिषटवृत्तिः पुरषः। तथा च सूत्रम्‌-- 
(एकमेव दैनं स्यातिरेव दशनम्‌ इति । 
[ विवरणम्‌ |] 
न तथेव्यनेन तदेति विंशोषणस्याथवच्वं स्थापयति ॥ २ ॥ 
इतरस्तु तथपि मवन्तीलयनेन चेस्स्वरूपप्रतिषठत्वमुच्यते, न तयेति च 
स्वर्पप्रतिष्ठत्विपेधशवदेकस्य॒वस्तुनस्तथामावश्चातयामावश्च विरुष्यत इति 
वीक्षापनः पृच्छति-- कथं तहि इति ॥ इतर आह-- वृत्ति पाूप्यमितएत्रेति ॥ 
कस्मात्‌ पुनदृत्तितारूप्यम्‌ ? दरितविषयत्वात्‌ ॥ उभयत्र स्वरूपप्रतिष्ठा. 
विरेषेऽपि इत्तिपारूप्यापतारूप्यकृते त्रिरेष इति, न तथामावातथामावविरोघः ॥ 
ननु च ब्ृत्तिसाषूप्ययोगे सति अवस्थान्तरयोगात्‌ परिणमित्वादिदोषः 
रप्रोेव ] न । दर्चितविषथवेन परिडित्वात्‌ । चिन्तदृस्यव्यरोपितं हि तव्‌; 
न स्वतः; स्फटिकाद्युपधानपरागवत्‌ । उदुस्थ(न इति ॥ निरोधादन्यत्र याधित्तस्य 
छ्िशदयो वृत्तयः ताभिरविरिष्टा सदशी वृत्तिः स्वरूपमस्य, चित्तवृत्तिम्धतिरेकेण 
स्वरूपभ्यतिरेकेण च पुरुषस्य बृत्यभावात्‌ , सदा ज्ञतविषयत्े परिणमानु- 
पपत्तश्च ॥ । 
` तथा च पूरौचावैतूत्रम्‌ एकमेव दशैन-ुद्धपुरुषयोः । किं 
तदित्याद--ख्य।तिरेव दीनम्‌ । बुद्धिषृत्तिरेव दशैनम्‌ । एयायते पुरुषेणेति 
च स्याति; सूयायतेऽनया च बुद्धिपुरूषयोः स्वरूपमिति स्यातिः । 
मैवा्थीकरेऽनया (कारतया) गृह्यत इति करणे, स्वेन च ल्यातिख्पेण गृह्यत 
इति कै च भवति | तथा द्यत इति देनं, इईथतेऽनेनेति च, [ज्ञायत इति 
ज्ञाने, | ज्ञायतेऽनेनेति च सपैमेवमादि द्र्टभ्यम्‌ ॥ 
यत्तु खयातिकर्तृवे चित्तस्य तदेव ज्ञायते जानाति चेति (ज्ञानादितिचेति) 
ज्ञानान्तरकल्पनवैयथपरत्ग इति, तस्य "न त्तत्स्वाभासं दृश्यात्‌" इलतरैव 
परिदिरि वक्ष्यामः ॥ 


1. पञ्चाशिखाचाथसूत्रम्‌ ` व्बह्लाचाय्छलम्‌ ` ` ` 2.षा. 4.19. `: 





समाधिपादः प्रथमः १५ 


[ भाष्यम्‌ | 
(५ [> ( कु (9 क [१ ध [३ 
[चत्तमयस्कान्तमाणकटप पज्िषमत्रपकार ददयतवेन स्वं भवति 


| विवरणम्‌ | 
ननु च यदि चित्तपरिविजम्मितमेवेदं सवै पुरषशचेदुद(स्ते कथमसौ 
भोक्तेति? न--कारकवैचित्यात्‌ । कानिचिद्याप्रियमाणानि कारकाणि, 
कानिचिद्यापारद्ते सनिधिमत्रेण कतृ तं प्रतिपघन्ते ॥ । 


यथा पचतीव्यधिश्रयणादिषु व्याप्रियमाणः पुरुषः कर्तेत्युच्यते । स्थाली 
सम्भवधारणाम्यामव्याप्रियमानेवर पचतीव्युच्यते । तथा स्थाखीमध्यणतमाकाश- 
मवकाद ददाति, न तस्य व्यापारं प्रतीमः ॥ । 


यथा च राजा दरौनमत्रेणेव कतं । सवणि च कारकाणि सेए ग्यापृरिषु 
कर्तृणि । न चादित्यः प्रकाशयन्‌ करणान्तरमपक्षते, व्यप्रियते वा । न दि प्रकार- 
नमविध्यमानमुत्पादयति गमनादिषत्‌ । प्रकादात्तैव हि तस्य सद्भावः, तथापि 
सन्निधिमात्रेण पटादीनां प्रकाशरूपेण अभिग्यक्तेः प्रक।शयतीध्युच्यते, एवमिहापि 
दृशिमत्रेण पुरुषेण दृरयानां चित्तवृत्तीनां चिदात्मना व्याप्यमानलरात्‌ , द्रष्टा 
परुष इतीममर्थ दरीयति- चिनत्तमयस्कान्तमणिकल्पमिति ॥ 


यस्याप्यात्ममनस्संयोगात्‌ ज्ञानमुत्पथते, तस्यापि ज्ञनिन ज्ञेय 
व्यप्नुवन्ात ज्ञातेद्युच्यते, न भ्यत्रियमाण ज्ञानम(स्या)पि गुणतस्रे स्ति 
निज्ियत्वादातन एवाथ दरयति । नपि क्रियानभ्युपगमात्‌ जानातीषयादि 
नोपरपधते । ज्ञानेन हि ज्ञेये व्याप्नुवन्‌ जान।तीद्युध्यते ॥ 


वि चान्यत्‌--आलममनस्संयेगादपर्वज्ञनोपत्तौ सत्यामासनस्तञ्ानं, 
न मनसः; । अतेव जानाति) न मन इति को हेतुमेवेत्‌ ? अथापि स्यात्‌-- 
आत्मनः समवायिकारणत्वादिति । नैतद, असिद्धत्वात्‌ । यथैव ज्ञानमासममन इति 
सोध्ये, एवमान एव समव।यिकारणच्वं न मनस इति साध्यम्‌ , अन।मंस्वरूपत्वे 
सप्युभय्तयोगजलाम्युपगमात्‌ ॥ ~ 


अथापि स्यात्‌ -ज्ञानाहितसंस्कारस्यामनः|स्मत्येककर्तृखेन प्रतिसन्ध।न- 
दरीनादिति--न--तस्यापि साध्यत्वात्‌. । तत्रपि ज्ञानसंस्कारस्परतिप्रति- 
सन्धानादीन्यास्मन एव, न मनस इति साधनीयानि | फठेन -समानाश्रयत्वादि 
ष्छादीनामिति चेत्‌--न-- तत्रापि तुस्यत्वात्‌ । पेयोगजल्े ` सल्याभनः 
फडच्छादीनि; न मनस इति दुःसाधमेव ॥ ४. 


१६ पातञ्जरुग्रोगसूत्रभाष्यविवरणे 


[ भष्यम्‌ | 
पुरुषस्य स्वामिनः । तस्माचित्तव्रत्तिबोपे पुस्परस्यानादिः संबन्धो देतुः॥ ४॥ 
[ विवरणम्‌ ] 1 
कि चास्य ज्ञानस्यापि ज्ञेयखाम्युपगमादनवस्थाप्रसङ्गः । न हि ज्ञानमन्येन 
करणभूतेन ज्ञनेन विज्ञातुं शक्यं, तदप्यन्येन तदष्यन्येनेव्यनिषटप्रसङ्गात्‌ ॥ 


अथानवस्थाप्रतङ्गपरिदाराय दुरमपि गत्व। ्िचिजञ््ञानमाघं वा ज्ञानन्तरेण 
न गृह्यते स्वयम(पनेव गृह्यत इति, तथा ज्ञानवद्र्धस्यापि स्वयं प्रहणप्रसङ्गः ॥ 


अथ दीपवत्‌ स्वयमवभासते चावभासयति च अवभासासकतात्‌ , 
भयेस्यानवमाप्तामकलाददोष इति चेत्‌ - तथापि -प्रकारस्वरूपेषवयष विज्ञाने- 
नाप्रहणप्रसङ्गः ॥ 


अथ ज्ञानस्यालप्तमवेतत्वामास्तनरूपाम्यां स्वयं प्रहणे, बहिःप्रकाशा- 
तकानां तु ज्ञानविपरीतघमलाददोष इति चेव्‌- तच्च न- यदि चातसमवेतल्वं 
प्रकारात्मकलत्वै च ज्ञानस्य खयंप्रहण हेतुः स्यात्‌ स्वै सवैज्ञाः प्राप्नुवन्ति ॥ 


अथ ब्राह्माकारखमपि कारणं चेत्‌--तच्च न ; अन्यस्य च्ञानस्यान्या- 
कारतया करणत्वे यथा, तथा ज्ञानस्यपि प्राह्मस्यन्याकरिणान्यदेव ज्ञानं करणं 
स्यात्‌ , तथा चानवस्था दुष्परिहर ॥ 


किं चान्यत्‌--न हि कञ्चित्‌ स्वयंग्राह्मप्राहकत्वप्रताधनाय दशन्तो 
विधते, प्रदीपस्यापि चक्षुरादिग्राद्यत्वात्‌ । न वचाप्यंशाद्यमस्ति ज्ञानस्य, 
निरवयवत्वात्‌ । सलपि चांशद्रये तयोः प्रकाडातमक्रत्वानन्योन्यग्राह्यप्राहकमावः 
प्रदीपयोखि द्योः ॥ 


किं चान्यत्‌- ज्ञानस्य प्राहयप्राहकलत्ाम्युपगमे सव्याससद्धबोऽपि 
दुस्तम्पाद एव । तस्मादर्थाकारज्ञानस्मृतिप्रतिसन्धानप्रयकतच्छादीनामनात्मधर्मत्व 
्रा्यत्वात्‌ रूपादीनामिव । पराथलवाच्च सद्धाताश्रयतवे रूपदिनिदरनेनैव । 
तथा आश्रयव्ादनिलतवाच्च प्रयतपूतैकत्वाेलेवमादिम्भोऽनासर्मतसिदिः ॥ 


अयस्कान्तमणिकस्पम्‌ ॥ अयस्कन्तमणिरिव । यथा भयस्कान्तमणिरयसः 
स्वासन्यापिं प्रद्युपकरोति सन्निधिमात्रेण, तथा चित्तमपि चित्स्वरूपप्यासनः 
स्वालव्याप्तिं प्रष्युपकरोति दरयतेन ॥ 


समाधिपादः प्रथमः १७ 


. [ भाष्यम्‌ | 
ताः पुननिरोद्धव्याः बहुले सति चित्तस्य - 
[ सूत्रम्‌ | 
वृत्तयः पञ्चतय्यः इ्धिष्टाद्धि्टाः ॥ ५ ॥ 


[ भाष्यम्‌ ] 
केशदेतुकाः कर्माशयप्रचये क्ेत्रीमूताः ड्िष्टाः । स्यातिविषया 
गुणाधिकारविगोधिन्योऽङ्ि्टः । हिषटप्रवाहपतिता अप्यङ्िष्टाः । 
[ विवरणम्‌ |] 
नतेकीव दर्दितविषयत्वादन्तःकरणेनेव्यक्तम्‌- तत्र दरीयितृ्वं चित्तस्य, 
र्त्वं च पुरुषस्य रकिकृतम्‌ १ स्वस्वापिखकृतम्‌ । कथं पुनः स्वस्वामित्वम्‌ ए 
वस्तुस्वभावलखात्‌ । कथमिति वचेदुक्त- चित्तमयस्कान्तमणिकलमिति ॥ 
अय चित्तदृत्तीनां बधे को हेतुः पुरषप्येति? उच्यते - यस्मादेवं 
सन्निषिमाव्रोपकारि चित्तं ददयतवेन, तसमाचित्तवृत्तीनां चोप पुरुषस्य अयं 
हेतुः भवति, योऽसौ अनादिसम्बन्धः ॥ ४ ॥ 


ताः पुनर्निरोद्धब्याः बहुखेऽपि सति चित्तस्य यामिररत्तिभिः 
व्युत्थाने सारूप्यमुक्तं पुरुषस्य । कस्मात्‌ पुनः निरोद्धन्या इ्याह-- यतो वृत्तयः 
डिषाहिषः ॥ 


ननु च बहुखे सति न शक्या निरोदघुमिदयत अ।ह--पञ्चतय्य इति । 
यद्यपि ह्िशङ्कि्टा इत्तयऽनन्ताः) तथपि प्तय्यः पश्चविधाः, पञ्चकरुखा 
एव । ततश्च पश्चप्रकारदृत्तिप्रतिपक्षमूताम्यास्तैराग्यप्रयोगदिव निरोधोपपत्तेः, 
प्रयवयवनिरोधस्ताधनाप्रयोनकलादरततीनां, तद्रहुत्वे न निरोधाराक्यलप्रसङ्ग; । 
ेशदेतुकाः--डेशनिमित्ताः । अविधादिपच्चङ्राभरयुकतं हि चित्त वृक्तिमिरात्मानं 
पुनः पुनरवेदयति । कर्मांशयप्रचये कमणि ठुरङक्रुशखविमिश्राणि 
तान्येव!ऽऽफट्प्रद नाच्छेरत इति करमाशयशब्दवाच्यानि, तेषं प्रचय इतेरेत्युण- 
प्रधानमविन संहननं, तस्मिन्‌ कर्माशयप्रचये निमित्ते, अविचदिक्षेत्रीभूताः 
हष्टाश्रया इयर्थः । सर्तष हि ताघु कमौञ्ये विपाकाभिपुखीमवति ॥ 


स्यातिविषयाः-स्याव्यास्पदाः । गुणानां सखादीनाम्‌ अधिकारः 
संस्कार्हृत्तिः तद्विरोधिन्यः । स्यतितरिषयघदिव ता अह्िष्टाः, 
अपवहितुप्वात्‌ ॥ 

3 


१८ पातञ्चछ्योगसूत्रभाग्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
ङ्धि्च्िदरेष्वप्यह्किष्ठा भवन्ति । अद्किषच्छिद्रेषु ङ्धिष्टा इति | तथाजातीयकाः 
संस्कारा वृत्तिभिरेव क्रियन्ते । संस्करिशच वृत्तय इति । एवं वृत्तिधस्कार- 
चक्रमनिरमावतेते । तदेवं मूतं चित्तमवक्षिताधिकारमासकल्पेन व्यवतिष्ठते 
प्रख्यं वा गच्छतीति ॥ ५॥ 
ताः हिष्ट पचा वृत्तयः-- 


[ सूत्रम्‌ | 
प्रमाणविपर्थयविकस्पनिद्रास्पृतयः ॥ ६ ॥ 
प्रतयक्षाचुमानागमाः प्रमाणानि ॥ ७ ॥ 


| विवर्णम्‌ | 

अथ हिष्टपङ्किमध्य(मानु)जन्मानोऽह्ष्टा वृत्तयः रवि हिष्ट एव 
क्षीरङुम्भग्रक्षिप्ताम्बुजिन्दुवत्‌ ? एवमह्िष्टप्रवाहपतिता अपि ह्ि्ाः किमष्किष्टा 
एव ? कि चातः; यदि हिष्टप्रवाहगता अष्िष्टाः ङिष्टाः स्युः, तदा वृत्तिसस्का- 
रानुिधायिनी स्मृतिः, तदनुरूप एव व्यवहारः । स चपि न सिध्यति 
स्वरूपभ्यमिचरे । तस्मदाह- ्धिष्टच्छिदरेष्वप्यङ्किशः अष्टि एव भवन्ति । 
अ्धिषटरिद्रे अपि इह्टाः हिष्ठा ए । यसमदेवे तस्मात्‌ तथाजातीयशाः 
संस्कारा वत्तिभिरेव क्रियन्ते ॥ 

यद्यपि ज्शादयोऽपि संस्कारमारभन्ते, तथापि वृत्तिद्ौरव तेषामपि 
संस्कार इति वृत्तिभिरेेव्येवकाराथः । तथा संस्कारेरपि वृत्तयः स्वानुरूपं 
कीयन्त इयेवं --वृत्तिसंस्कारचक्रमानेशमनवरतमावतेते । तदर्वभूत वत्त- 
एषं॑देतदेतमदृत्तिसंस्कारधमकम्‌ । भवसित।पिकार- निदृत्तत्रियहितु- 
प्र(त्तकं देतुमात्रावस्यत्वात्‌ । आसकस्पेन-पुरुषकल्पेन स्यातिमत्रेणेव 
कञ्चित्कारमवतिष्ठते- प्रारन्धप्तस्काररषाचुदृस्या । प्रख्यं ` वा गच्छति- 
सष्करवसानादिति ॥ ५ ॥ 


काः पुनस्ताः हिष्ट्वि्टाः पश्चप्रकार। वृत्तय इ्याह- प्रमाणविपथेथ- 
विकल्पनिद्रास्मृतय इति ॥ 


एतावत्य एव वृत्तयः । तत्र--प्रयक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥ 
प्रमाणाह्या व्रत्तिक्िधैव भिघते | तत्र प्रभाणास्याया्चिततवृत्तेः प्रथमो मेदः 


समाधिपादः प्रथमः १९ 


[ भष्यम्‌ | 
इन्द्रियप्रणारिकया चित्तस्य ब्यवस्तूपरागत्तादषया समान्य. 
विरेष।सनोऽथेस्य विद्चषविषररणप्रघा्ना वत्तिः म्रक्ष प्रमाणम्‌ । 
{ विचरणम्‌ ] 
प्रयक्षम्‌ । अतस्तघ्वक्षणमेवाभिधीयते । तत्दूवकत्वात्‌ भेदद्वयस्य ॥ इन्द्रिय- 
प्रनाडिकया ॥ इन्दियमिति श्रोत्रादिपञ्चकं न कर्मन्धिये, तस्य चित्वरच्यदेतुत्वात्‌ | 
क्रियाथ हि तत्‌ । तस्मादिन्धियशब्दस्य सामान्याथसेऽपि चित्तवृत्तेरपन्या- 
चिस्या्िततच्छत्रादिविष्रयतेव । वृ्यधत्वाच श्रोत्रादीनाम्‌ | इन्दियमव प्रनाडिक्‌। 
दारं शब्दाद्याकापवरत्तिरूपेण परिणपमानस्य चित्तस्य । अतस्तत्‌ तेनेन्द्ियद्मारेण 
सामान्यविरोषासकवाह्यवस्त्वराकारतया परिणममानपुपरज्यते | तस्य तदुपरागद्धेतोः 
चित्तस्य या सुदराप्रतिपुद्रावत्‌ वृत्तिः सामान्यविरोषा्मकवस्तूपरागेऽपि 


विशेष वधारणप्रधाना सेव्.प्रयक्चं प्रमाणम्‌ ॥ 


अथ स्वविषरयसतामान्यविरोषावभासन सामर्थ्य शर ्रादीनां चित्तस्य च विकृतं 
विंरोषावधारणप्राधान्यमिति £ 


उच्यते--विरोषग्रतिबन्धत्वात्‌ हनेपादानादीनां विरोषावधारणप्रघान- 

नतेति (तेव्याह) | न सामान्यं नावधार्यते, गुणभूतं तु गृह्यत. एव । यथा नीं 

रूपमिति नीखवधारणप्राघन्ये स्व्यपि रूपमेव नीलमिति गुणभूतमतवरध।रयति । 
कक 


तथा दुःखशन्दः घुखरन्दा मूढः रान्द इत | तथा च वतराब्रव्रधारणप्रघाना 
इत्तिरिति ह्यपप्यते ॥ 


४४ 


कि च--संशयत्रिपयेयनिमित्तत्वच सामान्यापट्ग्धेः । सामान्ये द्युपरन्धे 
बुभुस्तितविरेषस्य संशयो जायते, .समुपडन्धसमान्यान्यस्मृतेवां _ विपर्ययः, 
> 


समधिगतविशेषस्य तु संशयविपर्ययौ न स्वितिमुपदनुवति, इति विजेषावधारण-+ 
प्रधानतेच्यते ॥ ^: 


यत्रपि सामान्यमेवावदिधारयिषितं नैरिति बा अश्न इति वा, 
तत्रप्यन्यतरपस्ियिगेनन्यतरावधारणेति विङ्ेषावधारणप्रधानतैव । सवमेव हिं 
वस्तु वस्त्वन्तरपेक्षया सामान्यं विरोषश्च ॥ , 

यस्य॒ पुनः सामान्यमवस्तध्यारोपितमेवेोषरामबुवत्‌ › नेन्दिय- 
्िषयपरिति, . तस्य प्रतिनियतस्तामान्या्यारोपणानुपपत्तिः । न द्यनुपरन्धपृषै- 


२० पातञ्जख्योगसुत्रभाष्यविवरणे 


मुख्ये संभवद्यध्यारोपणा, स्मृ्यसंभवात्‌ । न कदाचददृष्टमुख्येदकस्य 
सलिलखध्यारोपणमूष्र्र विधते । अथास्मरनप्यध्यारोपयत्‌ रूपस्ठक्नणे शब्दला- 
चप्य्यस्येत्‌ । अथेन्धिान्तरविषयघलादरूपस्वक्षणे रान्दत्वाचप्यासो विरुद्ध 
इति चेत्‌---अवस्तुत्रे सद्यविरोषात्‌ । विरोषाभ्युपगमे च वस्तुत्प्रसङ्गः | 
राब्दस्वलक्षणादिव खूपस्वरक्षणस्य ॥ 





0 (५ 


वि चान्यत्‌ू-देशकालान्यविशिषटप्रयक्षा [न] भ्युपगमे समस्तरोक- 
प्यवहारव्रिछापः स्यात्‌ । न हीदमहममुभिन्नवकारो कलि चास्मिनदरक्षमे- 
तस्मानिपित्तादेवंविशेषणमिति च स्पृद्युपपत्तिः | न च प्रयक्षाष््टेषु 
विरोष्यवद्धिरोषणेइ स्मृतिः समवति । न च कल्पन।पोढेन व्यवहारगोचरातीतेन 
व्यवेहरमाणो दृयते । तस्म्ठोकप्रसिद्धप्रयक्षानुस्तरणमेव न्याय्यम्‌ ॥ 


नतु च योगिनां नि्िकल्पसमाधिजं ददनं, तस्यनिवंखक्षणत्वात्‌, 
तथा पुखरागादि विज्ञानस्य चनिन्दियत्रनाडीन्पू्लात्‌ प्रमाणान्तसत्वमम्युपेत्यं, 
प्रयक्षत्व वा वक्तन्यम्‌ । उच्यते । प्रक्षस्य (न प्रमाणस्य) पुरषप्रल्ययपेक्षत्वेन 
परिहृतलात्‌ । न ॒दह्यप्रस्यया वृत्तिः प्रत्यक्षम्‌ | चैतन्योदयहेतोय सप्र्ययायाः 
रत्यक्षत्म्‌ । तथा चाह-- "फर तदतिशिष्टः वौस्पेयश्चिततवृत्तिबोध' इति ॥ 
एवे च सति घुखरणादिज्ञानस्य शछिष्टाङ्किष्टूपस्य तदविशिष्टपुरषभ्रव्ययफठ- 
वसानतात्‌ प्रत्यक्षता सिद्धैव ॥ 


# अत्रेदमवधेयम्‌--- 

आदशकेोशे २० 'प्रनाडी?” इव्येतदुपरे २५ “°नपेक्षय सम्बन्धः सम्बन्धत।- 
मियात्‌ । यदसो प्रसिद्धधचोच्यते य इति” इत्युपक्रम्य ३४ ^स्मृत्यवसाना हि स, 
यतः प्रमा इत्यन्तम्रन्थं दशभिः पुदैर्विलिख्य, तदुपरि २० (प्पूवस्वात्‌ प्रमाणान्तर- 
त्वममभ्युपेतव्ये, प्रत्यक्षत्व वा वक्तव्यम्‌ इर्युपक्रम्य २५ ("तस्मात्‌ प्रमाणफरान- 
भिज्ञानाम्‌ अभिमानमत्रमेव फवरं पण्डितंमन्यानामिद्युपेक्षणीयमिति? इत्यन्तं 
षड्मिः पुटेविकिख्य, ततः २५ (८अनुमानमयोत्यतेः” इस्यादि २५ “कः सम्बन्धः) 
कयोर्वा, न दि सखम्बन्धिनावः> इल्यन्तं विलिख्य पङ्क्ति चतुष्टयेन, ततः ३४ गेन 
पत्रध्यते, अभूता्थादिविषयत्वात्‌?' इव्यादिवास्यं लिखितं दृश्यते । कोशान्तरञ्च 
न लभ्यते । यथामात्रं सुद्रणे च वाक्यानामनन्वयः--न हि २० (भ्रनाडीः 
इत्यनेन २५ “ध्नेक्षय सम्बन्धः सम्बन्धतामियात्‌ " हत्यन्वेति । न॒ च २५ “कः 
सम्बन्धः कयोर्वा, न हि सम्बान्धिनावः इलयनेन ३४ “गैन प्रवाध्यतेः इति 
चान्वेति । एवे प्रसयक्षप्रमाणानैरूपणमुपक्रम्य तदपरिसपाप्यैव मध्येऽनुमानाग- 
मप्रमाणयोनिरूपणं; ततो विपर्ययनिरूपणं, पुनः प्रयक्षप्रमाणनिरूपण्शेषः; ततः 


समाधिपादः प्रथमः २१ 


इन्दियप्रनाडिकाम्रहणं रोकिकप्रव्यक्षोद्धवानु्बाद एव । अन्यथा. 
हीन्दियनिरपेक्षस्य योगीश्वरयेज्गानस्याप्रत्यक्षता स्यात्‌ । असि हि रादि 
प्रतिबन्धाभवे सवर्थेन वैत्तसचेन स्वविषयेण युगपत्सक्ष्मम्यवाहितादिम्रहणम्‌ । 
तथा चाह--तारकं सर्वविषयं" सर्वथाविषयमक्रमं चेति विवेकजं 
ज्ञानम्‌” इति । तस्मानाव्रधायैते इन्दरियप्रनाडिक्येवेति | 


बह्यवस्तुपरागादिति विपथयनिदृ्यर्थम्‌ । विशोषावधारणप्रधानत्रेन 
सरार्यनिबरत्तिरिति ॥ 


तत्र केषांचित्‌ फं तदेव प्रमाणम्‌ । अपरेषां तु प्रमाणादन्यत्‌(्र) 
प्रमाणन्यक्तयन्तरम्‌ (रे) । यथा घटविज्ञानस्य प्रमाणस्य हानोपादनेपिक्षा- 
बुद्धयः फरमिति । गुणदेप्रतदुभय(बदमव)दून्यत्वविषयत्रदुपादानादिवुद्धीनां 
प्रमाणभूतघटविज्ञाना!दलन्तमेदः । ततश्वान्यविषयस्य प्रमाणस्य अन्य(प्रमेयस्य). 
विषयप्रमाण(गे)ग्यक््यन्तरं (रे)फङ्मिति ॥ 


न हि खदिरच्छेदनस्य खदिरोपादार्मे तत्परियागो वा फट भवितुं 
यक्तम्‌ । त्रि(अपि)योगसवन्धफलठत्रात्‌ स्वागोपादानयोः । न च फलस्य फं 
सम्भवति | द्वैषीमावफलन्यवहितताच ॥ 


किं च-फलस्य चेत फं क्रियानपेक्षाप्रसङ्गः । फलार्थं हि क्रियपेक्ष्यते | 
तच्चत्फटं विनापि त्रियया फलदपि सिध्यति, (अतेद्य) ततो न ह्यनेकायासपिक्षित- 
निष्पत्तिक्रियामनुतिष्ठेत्‌ । साधनान्वेषणानुपपत्तिश्च । क्रियाया अभावात्‌ ॥ 


अनुमाननिरूपणोपक्रमः, ततो विपययनिरूपणदषश्च इति क्रमः आदद्चकोशे 
दश्यते । न चायं क्रमः शोभते | ““अनिन्दरियप्रनाडी पूर्वात्‌ प्रमाणान्तरत्वमभ्युपे- 
तव्यम्‌?” इति; दरापुरव्यवहितवाक्यद्वयस्य मियो योजने, "न दि सम्बन्धिनाव- 
नपेक्ष्य सम्ब्रःधः सम्ब्न्धतामियात्‌, इति, षोडश पुटव्यवहितवाक्यद्वयस्य मिथो योजने, 
^“स्मर्यमाणातद्वस्तुप्रतिष्त्वान्न प्रमाणे, समृस्यवसाना हि सा, यतः प्रमा णेन 
प्रबाध्यते । अभूतायांदिविषयत्वात्‌ इति च षटू पुटग्यवहितवाक्यद्वयस्य मियो 
योजने चन्विति । यथाक्रम प्रमाणत्रेयनिंरूपणं, ततो विपर्ययनिरूपणमिति च 
सूत्रानुसारी माष्यानुसारौ च क्रमोऽनुखतेा मवति, इति प्यारोच्य महता प्रयासेन 
मातृका्रनथवाक्यानां सखन्निवेशविपर्याखः कृतः । तश्र सूक्ष्मेक्षिकया गुणदोषौ 
परिशीलनीयो । “प्रनाडी?? इ्यादेरधः अङ्किता; (२०-२५-३४) इति पुरसद्धुधाः 
मुदधिवितत्कोशानुखारिण्यः ॥ 
1. उ-पा-तू-54, 


२२ पातञ्चल्योगसूत्नभाष्या्ैवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
फ़ठं तदविर्िष्टः पौरषेयधित्तवृत्तिोधः ॥ 


[ विवरणम्‌ | 
नापि क्रियैव फटे, क्रियानुपरमप्रसङ्ग।त्‌ ! फङावसाना हि (पि) क्रिया । 


निप 


क्रयायाश्च फटत्वे फठनाभलावित्वग्रतङ्खः । तस्या दुःखात्‌ ॥ 


तस्मान प्रमाणस्वरहपमेव फम्‌, नापि तव्यतिरिक्तप्रमाणान्तरमिलयाह-- 
फर तदविशिष्ट इलादि । तद विशिष्टः तया प्रपाणाल्यया वृत्या अविरिष्टः 
तुल्यः तदाकास्वन, पौरुषेयः पुरषस्याये बोध इति । पुरुषस्य हि वृत्याकारता 
तसमाननाक्रियाजं द्रव्यस्वरूपमात्र फलम्‌ । फ तर्हि £ द्रव्यस्येवावस्यान्तरविरेषः 
(घोक्रियाजः(ज))त्रियापरयैवक्तान क्राः क्रियोपरमोपपत्तः फलम्‌ .। फक- 
निष्पत्तावव हि करियोपरम उपपद्यते । एवंभूतस्य मुख्यफल्ते प्रधानक्रिया 
न्यवहित(विप्रकृष्टायाः)क्रियाया द्वन्वे द्रव्यस्य त्रा क्रिया फलमिस्यन्योन्यध्रद्युप- 
स्थापकवेन प्रधानफलामियुखीकरणात्‌ फङ्योपचशि न विरस्स्यते ॥ 


ननु च भवतोऽप्युपचरितमेव फलम्‌ वृ्यविशिष्टताया; फएलवेनाम्यु- 
पगमात्‌ , पुरुषस्य च शुद्धात्‌ , तदाकारताया अनृतव्वम्‌ । न हि सफटिक- 
मणेरल्क्तकोपधानाकारता पत्या ॥ 


ब्राढम्‌-- तथपि वेतदेव फठं -मुख्यम्‌ , दृष्टवत्‌ । मुख्यफढान्तरा- 
दर्शनात्‌ । सर्वस्यैव क्रियाकार्कजातस्यैतत्लर्थत्वात्‌ । एतदवतानं हि तत्सम्‌ | 
तथा च प्रदरदितम्‌ ॥ 


ननु च मिष्याभूतस्यैव पुरूयफट्तवै बत्याकारस्य, तथा च तद्मिला- 
पानुपपत्तिः । बाढम्‌--मिध्यामूत ए ब्रसनुगतो भोगः । तथा चाह--« सत्व- 
. पुरष'योरयन्तासकीणेयोः प्रययािरेषो मोगः इति ॥ मष्यमपि-- 
“तयोः घदू्पोपरम्भे सति कुत भागः इति ॥ अत एव च सम्यम्दरना- 
दाद्यान्तकी नन्रात्तर्पपदत ॥ 


येषामामेध्या फट, तेषां वैराग्यकारणाभावात्‌ सम्यादशनन्वेषणानुपपत्ते- 
श्तामावः | न च क्रियप्ररिनिष्पयो मोक्षः, अनिलयलग्र्ङ्गात्‌ ॥ 


--- ~~~ --~~-~-]~-~-~-~-~-~--~-~---~~--~-~~-~-~--~-~_ 
1, पा-३-प्‌-3; - 


2. इदानीन्तनमुद्वितपुस्तके इद भाष्यं नोपरभ्यते ॥ 


समाधिपादः प्रथमः २३ 


[ भाष्यम्‌ | 
प्रतिसंवेदी [बुद्धः] पुरष इत्युपरित्‌ पप्रवेदयिष्यामः । 
[ विवरणम्‌ | 
अथ बुद्धिवेदर्वं पुरुषस्य स्वं चतिद्धमिति चेत्‌ आह- प्रतिसंवेदी 
् [क [क ( 
बुद्धः पुरुष दद्युपरिष्टत्‌ प्रवेदयिष्याम इति ॥ 
ये चपीन्दिया्थसनिकषस्य प्रलक्षत्वमम्युपयन्ति, न तेषामपि सम्यगभ्यु- 
पेतं, सान्निकषस्य क्रियफल्लात्‌ । सन्निकषश्च संयोगः | स च क्रियाजस्तैरिष्यते | 
यतो यदुपजायत तत्तस्य प्रमाणम्‌ । तच्च तस्य फं यदुपजायते ॥ 
फरुमपि सनिकर्षी ज्ञानं प्रति प्रमाणमिति चेत्-- तच्च न-ज्ञापक- 
प्रमाणप्रस्तवि कारकप्रमाणेपन्याप्स्यागुक्तत्वात्‌ । सनिकी हि ज्ञानस्योत्पादको 
न तस्य ज्ञापकः | प्रमेयाधिगमाय हि प्रयक्षादीन्युपन्यस्तानि, न ज्ञानोत्पत्ति- 
कारणम्‌ । तद्यक्रियायाम८यान्य)प्रकृत प्रक्रियत ॥ 
अथापि स्यात्‌--ज्ञानस्यापि प्रमेयलत्तचप्युत्पवमानं श्रमीयत इति, 
तदुत्पत्तिकारणस्य सन्निकर्षस्य ज्ञापकत्वमेवेति- तच्च न--ज्ञानं ज्ञनिनैव ज्ञायेत, 
तेषां तथम्युपगमात्‌ | न च सन्निकर्षो ज्ञानम्‌ । ज्ञनोत्पादकत्वेनाम्युपगमात्‌ ॥ 
अथ ज्ञानस्य ज्ञने सन्निवर्भो निमित्तात्‌ प्रमाणमिति चेदद्शेश्वरेच्छ. 
विषयनिमेषोन्मेषादीनामपि निमित्तत्वात्‌ प्रमाणत्वे कः प्रद्ेषः? न च ज्ञानस्य 
ज्ञेयत्वे आलमनश्च स्वभावचिद्रुपत्वानम्यु पगमे राक्या अनवस्था परिदतुम्‌ ॥ 
अथ आलप्तमवेतमात्रतयैव ज्ञानस्य ज्ञेयता, न ज्ञानान्तरमपेक्ष्यते 
-येनातिप्रस्तज्येतेति चेत्‌--अस्याप्यन्यत्‌ प्र्क्षलक्षणं वाच्यम्‌ अनिन्द्ियसनि- 
कर्षीदिलक्षणत्वादासनि ` ज्ञनसमवायलस्य । सजिकरस्य च ज्ञानोत्पत्तिफट्वात्त- 
दुतत्तिन्यवधाने सति तस्य ज्ञानेन ननन्तयम्‌ ॥ . 
तस्मात्तदानन्तर्येणापि. न सन्निकधफल्से ज्ञानस्य । तया हानादिवुदधौ- 
-नामपि रूपादिज्ञानफल्तवानुपपत्तिरुक्ता ॥ 


ग्यमिचाराच । यंथेकसिमननङ्ग नादिपिण्डविषये ज्ञाने समाने बहूनामु्ने 
कस्यचिदुपादाननुद्धिः, अन्यस्य हेयबुद्धिः, कस्यचचिदुभयाभावः; तत्र 
हानोपादानबुद्धिभ्य॑भिचरति । अन्यतस्रैकमेव ज्ञानं॑तदेवोभये व्यभिचरत्युपे 
| क्षकस्य । यच्च यदयभिचरति न तत्तस्य फलम्‌ ॥ 





1. उपपादयिष्याम इति सुद्वितपुस्तके पाठः । ` 1. उपपादयिष्याम इति मुद्रितपुस्तके पठः । `` ` 7 


२४ पातञ्जरयोगसूुत्रभाष्यविवरणे 


किं च- हानेपादनामावमात्र्वादमाव एवोपेक्षा । न चामावः 
प्रमाणस्य वस्तुनः फठं भवितुमर्हति । रागदेषाम्यां चोपादानपच्िगबुद्धी । 
तदभावात्‌ कारणाभवे कार्यामाव इति प्रमाणविज्ञने सल्यपिं हानोपादान्ुद्धयभाव 


न अ न 


एवेपेक्षेति व्यभिचारान हानादिवुद्धिफल्त्वम्‌ ॥ 


किं च-रागदवेषतदभवनामप्युपादानादिवरुद्धिफरवे प्रमाणलप्रसन्नः । 
पौरुप्रयचित्तवृत्तिबोधफल्ते तु न किश्चिद्धिरुष्यत इति ॥ 


ननु च चित्तवृत्तेः सवेत्वमतिद्धम्‌ । न हि करणमेव कर्म मवति । 
न हि दात्रमेव द्यते । नेष दोषः । क्रियाकारकयेर्भिन्नघपतवात्‌ । करियानिरशृत्ति 
प्रति सम्भूय क।रकामि ग्याप्रियन्ते परस्परं विषयविषयिमविन । क्रिया तु 
सत्तामत्रेव॒ फर्ेतुरिति करणत्वमस्यापुपच्यैते, न कारक्वत्‌ । कुर्बदि 


0 0 


कारयेदिति क्रियाधि कारकं स्यान्न मूते भन्यायोपदिश्येत ॥ 


किं च--अनवस्थाप्रसङ्गश्च । क्रिया चेत्‌ करणे स्यात्‌ , तनिर्वर््यया 
चान्यया क्रियय। भवितन्यम्‌ | न हयन्यां क्रियामन्तरेण तस्याः कारणत्व घटते | यापि 
चान्या तापि कारणं स्यादन्यस्याः क्रियायाः । साप्यन्यस्या इत्यनवस्था । 
ततश्च क्रियासन्तानानुपरमात्‌ फछानमिनिङत्तिः । तत्रान्या चेत्‌ क्रियान्तरेण 
विना फलडेतुभवेत्‌ ; प्रथमस्य तथाते कः प्रद्वेषः? चित्तवृत्तेस्छभिन्यञ्चकत्ात्‌ 
सवेध्तेदयदोषः ॥ 


टृदयते चाभिन्यञ्नकानां स्वरूपसंवेधतेयेव करणत्वं प्रदीपादीनाम्‌ । तथा 
चित्तवृत्तपि । चक्षुरादिष्वभिभ्यञ्ञकतेऽपि अग्रहणाद्यमिच।र इति चेत्‌, 
समान (चेतनसमान) जातीयस्तकरात्‌ कथम्‌ ॥ 


येषां तावद्धोतिकानीन्दियाणि, तेषां चक्षुषतैजप्ततात्‌ बद्यिनारेकेन 
तुल्यजातीयेन व्यतिभेदात्‌ गृद्यमाणदस्यैवाविवेकः । यथा प्रदीपानां बहूनां 
प्रभाव्यतिमेदात्‌ कस्य का प्रभेति न विविच्यते । तथा प्रोत्रदिष्वपि ॥ 


येषामप्यमोतिकानि, तेपष्रामप्यमिग्यञ्चकविन समानजातीयत। इृत्तेरमि- 
व्यञ्ञकत्वाद्प्रहणमिति । तन्न - -प्रा्तचैतन्योपग्रहतयाऽविभाग्यत्वादग्यवषहि- 
तत्वा । सर्वेगतल्रेऽध्यात्मनः सूदषमतेन स्वच्छतर्वेन च चित्तिनान्यवधानाचच 
ग्रहणं चित्तवृततेस्तस्माचिततवृत्िप्रमाणेनैव तद्‌।कारतया पौरुषेयोऽपि बोधः 
सवेधमान एव फलमिति सिद्धम्‌ ॥ 


समाधिपादः प्रथमः २५ 


[ भाष्यम्‌ } 
अनुमेयस्य तुस्यजातीयेष्वसुवृत्तो भिन्नजातीयेभ्यो व्यावृत्तः सम्बन्धो य 
[ विवरणम्‌ । 
येषां पुनः प्रवयक्षेणासंवेवा चित्तवृत्तिस्तेषां फलटग्रहणप्रमाणाभावः ! फले 
च गृहीति ज्ञानापिद्धवस्यार्थापत्तिः । न च फर गृह्यते प्रमाणव्यापारानमभ्यु- 
पगमात्‌ । तदभ्युपगमे चानवस्थप्रसङ्गः | यत्कटवग्रहणाय प्रमाणमम्युपगम्यते 
तस्याप्यन्यत्‌ फं तद्रमाणस्याप्यन्यदिति न कचिदवतिषटेत ॥ 


अथ न प्रमाणन्यापारस्तस्य तदा प्रमाणाभावात्‌ फलस्याप्चं प्रसक्तम्‌ । 
यत्र हि सदुपरम्भकानि प्रमाणानि न व्यापारं गच्छन्ति, तन्नास्तीव्यभ्युपगच्छामः 
(तेषम्‌) ॥ 


अथ अगृह्यमाणमपि तदेव ज्ञानं प्रमाणं फङस्यपीति चेत्‌-न-- 
अभिभ्यज्ञकधमयतिक्रमात्‌ । न द्यमिन्यज्ञकं गृह्यमाणमभिन्यञ्चयदृदृष्टम्‌ । न 
हयल्फा गिरिशिखेऽपरि निजं धर्ममतिक्रामति ॥ 

अथाभिव्यज्यदेव फरं प्रत्यपि प्रमाणमिति चेत्- पिद तर्हीप्सितम- 
स्माकम्‌ | रागादीनां वृत्तिविरेषणव्वेन ग्रहणोपपत्तेः । रक्तोऽहं दिष्टोऽहमिति 
यहेप्र्यर्यविरोषणं, तदपि वृत्तिमावामाविधेनेव प्रहणादृत्तिविराषणानां 
रागादीनां प्रहणपुपपचते । अ८ तेनप)न्यथा सूपादिवन्मानान्तरपेक्षवप्रसङ्गात्‌ । 
ततश्च नवस्थति ॥ 


तस्ल्ममाणफलनमिज्ञानाममिमानमात्रमेवर केवरं पण्डितंमन्याना- 
मि्युपेक्षणीयमिति ॥ 

अनुमानमयोच्यते--अनुमेयस्य तुल्यजातीयेष्वनुवृत्त इति । 
अनुमेयस्य [जिज्ञतितरमविशिष्टस्य । तद्धमेव्रत्तपा तुर्यजातीयेष्वमुवत्त 
सद्धावमत्रेण, [भिन्नजातीयेम्यः] तदिरुद्धधमकेभ्यो व्यावृत्तः तेष्वसन्‌ 
इव्यर्थः | सम्बन्ध इति । कः सम्बन्धः ? कथोवा £ न हि सम्बन्धिनावनयेक्षय 
सम्बन्धः सम्बन्धतापरियात्‌ , यदसौ प्रिद्धवच्चोच्यते ध्यः इति ॥ 


ननु च अनुमानस्य प्रकृतवात्‌, खिङ्गलिङ्गिनोः सम्बन्धः प्रसिद्ध 
एव- न--अगमक्लात्‌ । न केवलः सम्बन्धो गमकः । उच्यते-- 
लिङ्गस्य सम्बन्धो व्यावृत्यनुवृ्योः । कः पुनरसौ? लिङ्गमेव । न हि 
लिङ्गादन्यदनुदत्तं व्यावृत्तं च । तच्च गमकम्‌ । ननु टिङ्गमपि नैव गमकं 
4 


२६ पातञ्जलयेगसूत्नभाष्यनिवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
तद्विषया सामन्यावधारणप्रधाना वृत्तिरनुमानम्‌ । यथा देशान्तरपरति्ति- 
मचन्द्रतारकं चैत्रवत्‌ । 
[ विवरणम्‌ | 
लिङ्गिसम्बन्धानपेक्ष, यदि चानपेक्षितलिङ्गटिङ्गिसम्बन्धं गमकं, यकिश्चिद्रमकं 
स्यात्‌ , तस्मात्‌ लिङ्ग लिङ्गिसम्बन्धो वक्तव्यः || 
न-- उक्तात्‌ ॥ अनुमेयस्य तुल्यजातीयेष्वदुवृत्तः' ह्यादिनैवोक्त- 
त्वात्‌ । न द्यसुमेयेनासंबद्धं खिद्धिना तस्सद्शजातीयेष्वनुवरतेते, मिन्नजातीयेम्यो 
वा निवतेते | तस्मात्‌ य ईति च प्रसिद्धमेव सेवन्धमनवदति ॥ 
तदविषया--एमन्वयन्यतिरेकविशिष्टसंवन्धसंबन्धिविषया वृत्तिः । 
सामान्यावधारणप्रधाना--टङ्गपामान्यविध।रणग्रघाना, अनुमनिम्‌ ॥ 
यथा देशन्तपाि्मतिमचन्द्रतारकं चैत्रवदिति ॥ यथपि रक्षणाभि- 
धानमात्रेण तदभिव्यक्तिः, तयाप्युदाहरणप्रदयुदाहरणप्रदरन।दतितरमिध्युदाहरण- 
: म्रतिपादनम्‌ । तत्र गतिमचन्द्रतारकमिति चन्द्रतारकस्य गतिमच्रमुमेयम्‌ । 
तत्समानजातष्वनुद्त्ता देशान्तरश्राततिगेतिमल्ु चैत्रदिषु, भिज्लजार्तयिम्यश्च- 
गतिभ्यो विन्ध्यादिम्यो व्यादत्ते अभ्यमिचरन्तौ । निलयं गतिमता ` संबन्धात्‌ ॥ 


तस्मादिस्यजातीयकमविनामविन सद्धं संबन्ध्यन्तं गमयति | यथा 
वध्यघातक(कृदि)क्रथिकारणादि ॥ 

भव्रतु तवदविरद्धानां निलरसंबन्धादश।न्तसष्यादीनां गम्यगषकत।, 
वध्यघातकादीनां तु सेबन्धाभवे कथमिन्युच्यते गम्यगमकभावः (भवेन) 


तत्रापि निदल्यसं्रन्धाददोषः । न हयन्यत्रापि प्रा्िलन्नणः संबन्धोऽभि- 
प्रयते । सामान्यते दृष्टा(तु)भावप्रसङ्गात्‌ । न हि चन्द्रतारकादि देशान्तरभरतः 
परा्तिरक्षणप्तबन्धः प्रयक्षेण गृह्यते । अगृह्यमाणश्चेद्रमकः सव सवस्य गमकं 
सय्रात्‌ । न हि किचिक्केनचिदतबरद्म्‌ ,` आकाशादीनां सर्वत्र मावात्‌ ॥ 


तस्माद्वम्यगमकबुद्ध युप्पत्तिहेठरेव संबन्धोऽनुमानविषये । तथा च 
वध्यघातकंयोरपि अन्यतर(रा)भवदरोनेऽन्यतराभावो गम्यत ॒इत्यनुमानमेव । 
यस्याप्युचिते देसे अमावदश॑नादन्यत्र भवो गम्यते ! यथा घतकदरनेन 
वध्याभावोऽनुमौयते ।- चत्रस्य जीवतो - गृहैः जमव(गृह्यभाव)दरोने 
बहिभावश्चेति ॥ 


समाधिपादः प्रथमः २७ 


ननु चामावार्थापत्ती एते, नानुमाने, (न) लक्षणापतङ्गतः, गवादिवत्‌ ॥ 


भ, (० 


न--यथोक्तखक्षणोपपत्तेः-- वध्यधातकयेर्विरोपलक्षणः संवन्धः । यत्र 
यत्र॒ -घातकमभावस्तत्र तत्र वध्यामाव एतरे्विनाभावः | न हि वेच्यस्याभावं 
घातक(का)मावो व्यभिचरति । वध्यस्य वा मात्रो घातका(क)मावम्‌ , 
अग्निभावमिव धूममावः ॥ 


कथं पुनरवगम्यते घातकमावदर्यैनदिव तद्भोचरे वध्यस्यामावनरुद्धिरिति ? 
न पुनः सदुपलम्भकप्रमाणानां घातक्त इव वध्ये व्यापाराभावादिति ॥ 


उच्यते- घ।तकभवे ग्याप्रू(्यब्र)तग्रमाणल्येव वध्यामावनरुध्युव्पत्तिः) 
धूमभवे व्य्रू्)तग्रमाणस्येव ग्निभावबुध्युसत्तिः, तथा धातकविेष- 
न्यप्ू(वृ)तप्रमाणस्य वध्यविरेषाभावबुब्युत्पत्तिः, धूमवरिरोषव्याप्र(रु)त्रमणस्य- 
वाग्निविरेषघुद्विरिति ॥ 


अभावप्रमाणवादिनस्तु सवत्र प्रमाणाभावस्याविशिष्टघाद्विरोधिविरोष- 
दर्नानुविधानं विरेष्यन्तरामावदशनस्यानुपपन्न, लिङ्गविशोषानुविधानमिवं 
दिङ्गिविरेषदशंनस्य | न हि प्दुपलम्भकप्रमाणव्यापारामावस्य कश्चिद्विशेषः, 
येन विरेषबुद्धिसतदविचेषरमनुविधीयते ॥ 

अथ जिज्ञा्षिति विरोषे सदुपरम्भकग्रमाणामावादिति चेत्-तन-- 
अततः स्पतीच्छदिसहभावपिक्षादुपपत्तेः । न ्यप्तत्‌ सहायपेक्षया कार्यं 
निवैर्तयदृष््टं शराविषाणादि । दृ्टमिदेति चेत्‌--न विप्रतिपत्तिस्थानतव 
दृष्टान्ताभावात्‌ । तस्यमिति चेत्‌--न--घट देः सतोेक्षादशनात्‌ ॥ 


५ 


न चापि निन्यौपारस्यावस्तुतादभाव्रस्य प्रमाणमबो युक्तः| न हि 
निरस्तन्यापारकं किचित्‌ का्यीरम्भकं दृदयते रोके । तस्माद्यापारख्पप्रमाण- 
जनिता प्रमेयामवबुद्धिः, प्रमेयविषयत्वात्‌ धटादिबुद्धिवत्‌ । तथा च वस्तुघ्वात्‌ 
्रृत्तिनिवृत्तहेतुलात्‌ । विपक्षः दाशक्षिणादिः । तथा अभव[प्रमा]प्रमाणा(ग) 
भावजनिता न भवति, यथाऽभिहितहेतुद््टान्तदशीनात्‌ । (नेन) ॥ 


५ क 


धातकददोने वध्यामावबुद्धरजिङ्गं तद्धावमावित्वादगन्यादि्ुद्धिनिमित्तधूमादि 
बुद्धिवत्‌ संशयनिवर्तकलाच्च । वध्यामावदुद्धिवा रिद्गजनिता निश्वयरूपत्वादभि- 
बुद्धिवदिति ॥ 


२८ पातञ्ञखयोगसूत्रमाष्यविवरणे 


इह घटो नास्तीति किर नानुमानं लिङ्गटिङ्गिसत्रन्धाग्रहणात्‌ | न हि 
यधाऽनन्यादिबुदधेषूमादिलिद्ग न्वेपरण तथेह नास्ति षट इत्र लिद्गन्वेषणमत्ि । 
प्रगेव लिङ्ग न्वेषणात्‌ बुच्युत्पत्तः ॥ 


| नैष दोषः । इहभ्रत्ययाकार्स्यैव लिङ्गत्वात्‌ । न हि प्रथममेव 
चिद्गवुध्युपजनने सति लिङ्गन्वेषणं मवति । दृहेव्याक्रारोपरन्निता बुद्धिर्छिंङ्गम्‌ 
उभुपरञ्ञकव्यतिस्तिवटाचभावबुद्धेधोतकबुद्धिवदेव । विरोधलक्षण ए चात्रापि 
सम्बन्वः ॥ 


यत्र पुनरविरद्धान्युपरज्ञकानि तत्रास्तितब्ुद्धेः । एतेनेवाथापत्तरमुमानले 
न्य।द्धातमविनाभवेन संबन्धेन । तत्रपि जीवतो दहि देवदत्तस्य गृहामवि 
बहिभौवः, यदा गृहि भावः न तद। बहिमौव इव्यन्यतरेणानुमानम्‌ । साक्षात्‌ 
दृद्यमानवहिभीवाम्यन्तराभावचं दृष्टान्तः | बृद्युपरञ्जकानुपरञ्ञ कतेन ह्यभावप्रहण- 


[कच कव 


स्याभिहिते। हेतुः ॥ 


€. 


अग्न्यादात्रपि दहनादिशक्तिप्रदणमसुमानमेव । कार्थनि्वतकयोरषिना- 
मावतबन्धस्यातमनि दृष्टल्ाद्‌भुज्यादौ । द्यते हि प्रययगालमनि शाक्तोऽहमिदं कार्थ 
कतुमराक्तोऽहमिव्यासवदत्मविशेषणस्य राक्तेप्रहणम्‌ । शाक्तेनिवे्यमेव दहनादि- 
कार्यमपीयनुमानसिदिः ॥ 


ननु चाभावरस्य प्र्क्षतामुपगायन्ति केचित्‌ । यथा किंखदरीकेन 
प्रदीपादिना सति गृह्यमाणे वस्तुनि न तदवयत्रिनि यदुपरम्यते तन्नस्तीयेवं 
सतः प्रकाशकं प्रमाणमपदपि प्रकाडययति । तथा चोदाहरन्ति--अनङ्कितं 
वास आनयेघ्युक्तः प्रविरय भण्डागारम्‌ अङ्कितानङ्कितवासस्सन्निधावद्कितवासो- 
ग्रहणनेव प्रयक्षेणाङ्ाभावति षष्ट बास उपरम्यानयति । तस्मात्‌ प्रयक्ष एवामावेो 
ठक्षणान्तरानुपपत्तरिति ॥ 





तन--बुद्ध्याकररेणायौवधारणादरततप्रसङ्गात्‌ । यदाकारा हि बुद्धिस्तस्य 
प्रयक्षावधियमाणात्मतामभ्युपगम्यते । यथा नीं वस्तु पीतमिलत्रापि विशेषण- 
विशेष्यप्बन्धप्रल्ययो भिध्या प्रभोति । तयेह घटो नास्तीति इहश्रदेशस्य 
घटामवेनाप्तति संबन्धे सबन्धग्रयययः ; न हि घटामावस्येहश्रदशस्य चाप्र] 
प्रा्िखक्षणः समवायामिधानो वा संबन्धस्तैरभ्युपेयते । यथेह देवदत्त इति । 
तस्मादमाव (वे)प्रल्ययव(या) नीकं वक्तिवति विरोषणविश्ेष्यसंबन्धप्र्ययोऽपि 
सेबन्धप्र्ययतानिमिध्या प्रसञ्येत || 


समाधिपादः प्रथमः २९ 


[ भाष्यम्‌ | 
विन्ध्यश्चाप्रा गतिः ॥ । 
[ विवरणम्‌ ] 
यथ। चासव्यपीहदे शघटामावसंबन्धे सबन्धप्रतीतिस्तयैवानीडेऽपि बस्तुन्य- 
पयेव॒ नीरुलक्चवन्ये नील्तसंबन्धग्रल्ययः प्रपोति, तथा संबन्धिष्वपि । 
अथारव्यव संबन्धः, द्िष्ठता विरुच्येत संबन्धस्य | अभावस्याव्रस्तुान्युपगमात्‌ ॥ 


अधधप्येकरातं पष्ठषथी इति यावत्‌ श्रष्ठव्थीः संबन्ध इष्यत, तदा 
दिविध एव संवन्धः समवायाद्यः संयोगास्यश्चेति न युज्यते ॥ 


अथे(तथे)करातस्यपि घष्ठय्यानामुभयान्तःपतितपुष्येत--न-- 
अभवेऽन्यतरस्याप्यक्तम्भवात्‌ ॥ - 


विश्चा(न्त्व)न्यत्‌ | इह नमपि कुषम नास्तीति सबन्धिनो नभसोऽप्य- 
प्रक्षयात्‌ गगनकुखुमामावस्याप्रद्यक्षतवं प्राप्रोति] अथाप्रद्यक्षत्वमेवेति चेदापतितं 
गगनक्रुसुमामाववदप्रदक्षस्वमिह भूप्रदेरो घटामावस्यापि । विशेषो वक्तभ्यः ॥ 


अथ ग्योन्नोऽप्रयक्षत्वादिति--तन--पुष्पस्य पततो नभस्यस्तित- 
दर्नायोमाप्रयक्षलमदहेतुः । यथैव निपतक्कुघुमसद्धबि व्योमाप्रलक्षत्वम- 
हेतुस्तथा सद्धावविरुद्धम्रहणिऽ्यहेतुः स्यात्‌ । अथाकाशग्रयक्षत्वा- 
देयेति चेत्‌, अेबन्धमपि यद्किचि्यवहिताप्रयक्षत्वादि सोऽपि हेतुः स्यात्‌ । 
अथ नमःवुघुमामावः प्रक्ष इति वचेत्-ईन्द्याथसनिकानथक्यं सर्वत्र 
प्रसञ्येत । तथा च सव्यसनिङृषटेपठभ्धेः स्वैषां सवेज्ञतं प्रसक्तम्‌ ॥ 


अथानुमेयं तत्रेति चेत्‌--नमःकुघुमामाववदिह धट।मावस्याविरोषा- 
दानुमानिकस्(कीय)मेव सिद्धम्‌ । एवं च सलभवप्रमाणवादिनेऽपि 
न्यवहितविप्रकष्टद कादवनलावभावस्यानुमेयत्वादिह धट[मवोऽपि तत्सामान्या- 
दनुमानम्राह्य एवेति निश्चेतुं युक्तम्‌ ॥ 


विन्ष्यश्चाप्राप्तरगतिरिति च प्रयोगान्तरम । अगतिरविन्ध्य इति 
प्रतिज्ञानम्‌ । अप्रपतिरिति हैत; । चैत्रवदिति काकलोचनवतुभयत्र संबष्यते | 
गतिमचन्द्रतारकमियनेन साधम्येण, विन्ष्यश्चप्रापेलिनेन वैधरम्ण 


संबन्धः । एवं च सव्यन्वयग्यतिरेका(क)दशनकृतो न दोषः ॥ 


1, अप्राप्निरिति बाचस्पत्यभिमतः पाठः | 


३० पातञ्जछख्योगसूत्रभाष्यिवरणे 


[ भाष्यम्‌ ] 
आन द्ोऽतुमितो - वाञथेः परत्र स्वषोधसंकरान्तये शब्देनो- 
पदिद्यते, श॒न्द्रात्तदथैग्रिषया वृत्तिः श्रोतुरागमः। 
यस्याश्रद्धेय्थो वक्ता न द्ष्ातुमितार्थः स आगमः प्रवते । 
मूखक्तरि तु द्श्टानुमितर्थे निर्विषवः स्यात्‌ ॥ & - ७॥ 
[ विचरणम्‌ ] 
अथैतस्मिन्‌ भ्रयेगि व्यतिरेकविपर्थैयदरौनेन दोषाभाव इधयुपन्यस्तम्‌ । 


| ® ककि 


लक्षणस्य च लक््यविररेषेणे्यव्यददोषः ॥ 


आप्तः परानजिधृक्षप्रयुक्तो दोषरहितो दृष्टातुमितथः | तेन दष्टो वा 
अनुमितो वारैः प्रत्र श्रोत्रिरेषे स्ववोधपङ्करान्तये स्वभिगमशक्तमणाय 
शब्देन शाब्द इति वाक्य ततो विशिष्टा्प्रतिपत्तेः । तस्मात्तदुपदिषटद्वाक्यात्‌ । 
[तदर्थविषया] बाकयाभरविष्रथा या चित्तवृत्तिः सा अनुमानक्देव प्तामान्या- 
वधारणप्रधाना ॥ 

इव्यमाप्यादिधप्रहणपूरविका श्रोतुरागमः, न वक्तुः । दृ्टाुमितारथौ 
हि वक्ता, तस्य ठेङ्गिकमन्दरियक वा तज्ज्ञानम्‌ । घ्रेतुरेव तु श्रवणपू्वकं निशितं 
विज्ञानं शलिङ्गिकेन्द्ियकव्यतिरिक्तम्‌ । स आगमः [न] प्रलन्नमिन्दिया[क्षिय]- 
विषयात्‌ यथामिहितटिद्गटिद्धिसत्रन्धनिसेन्नलाच नानुमानम्‌ । न हि स्वगपूर्- 
दवनादिशब्दा(ब्दोऽ)्थान्वितं॑ज्ञानमासादितटिङ्गशेह्ञि पनन्धपुरस्सरमुपजायते । 
फठे तु स्त्र पौरुषेय दृ्तितेध एव ॥ 


(४ 


यस्य आगमस्य व॒क्ता आगमाद्यवृच्युदत्तिनि मित्ते राब्दोचारणात्‌ आग- 
मस्य प्रयेमोषन्यात्तेन प्रतिपादितं फङं तु पूर्वदेव । यद प्येक एव प्रयोगस्त(था)- 
दापि साध्यप्ताधनामावमात्रस्य विवक्षितत्वान विपरीतत्यतिरेकदशेनादिष्युष्यते ॥ 

अश्रद्धेयार्थवक्न्रभिहितलेनागम एव॒ क्िङेष्यते । कथमपतावप्रद्वेया्ौ 
वक्तेयत आह--न दृशेऽनुमितो वाः तेन वक्त्रा | रिष्टलेकप्रपिद्धान्यषा- 
प्रतिपादनात्‌ बुद्धाहृतादिः । न हि रगादिदोषानुपहतान्तःकरणः प्रतिद्धमन्यथा 
निरर्णयति । स आगमः पुत्रते आभासीमवति ॥ 

यथपि प्र्यक्षानुमानविषयामाप्तदशनं सखरब्देन न कृतं, तथाव्याग- 
माभासोपप्रदरनेनैव पूरवैत्रपि यथामिहितठक्षणव्रिपरीतव्वेन प्रलक्षानुमाना- 
मासादि द्र्टव्यमथोदुक्तम्‌ ॥ 


समाधिपादः प्रथमः ३१ 


मूरवक्तरि त॒ आववरक्तरीश्वरे तन्निमित्तो य अगमः स विष्टवनिमित्ता- 
भावानिर्विष्वः स्यात्‌ | यथाथ(य)षक्रतृवत्‌ ॥ 

उपमानं (मान) शब्दपू्ैकम्‌ | तदागमान्तःपातिलान प्रमाणान्तसम्‌ । 
यथा नखि गवय इति वनेचराभिहितदेव वाक्षयादवधृतसादृषयस्य पुनधने 
गघयदरशेनेऽपि पूश्रुतवराक्यापस्थापितसाद्दयस्मरणमत्रमेव नाधिकम्‌ । साद्य तु 
वाक्यदेव पूर्वप्रतिपन्नम्‌ ॥ 


नापि संज्ञसं्ेसबन्धश्रतिपत्तित एव मान, तस्या अपि तद्वाक्यादेवा- 
वगतघरात्‌ । न हि गौर्यितावतानवगतगवयनामकस्य वनगतगवयदर्चि नोऽपि 
गवोऽयमिति सेज्ञासंज्ञेसवन्ध।ववोधो मवति ॥ 

तस्माद्रौसि गवय इति गव्रयशम्दोऽपि तद्वक्येपेक्षितन्यः । तथा च 


सति पूध्रतादेव वाक्यात्‌ सर्वं प्रतीतम्‌ । अथापि स्यादयं (दस्योगवय इति न 
पूथरुद्धित्रिषयमिति-- तदपि त्रभवतामपरि पर्विदनपरिहारमव[प स्यतामपि 


® (५ कि 


(डितकवले[कौ ठे यकटत्तिकोणिऽवस्थानमिव ट्ष्यते ॥ 


तथा हि- देशकारसन्निकर्धरविध्रकादिमदेनानेकोपमानमेदः प्रसञ्येत । 
तथा्िति चेत्--तस्पूवैधियैवा तलमन्तर्निहितसमस्तविशेषमेव हि वा नेयौ 


(५ 


पूरवमुपपादितम्‌ । न हि गौच्युक्ते देशकालादि विरेषाभवि न गोरब्दादथप्रतिपत्तिः॥ 

किं चान्यत्‌--न हि संजञरसक्ञिेवन्धप्रतिपत्तिरपमानं, येन ह्युपमीयते 
तदुपमान, सच्दयज्नानं हि तव्‌ । न हि नामिनामसतत्रन्धप्रतिपच्या 
किचिदुपमीयते उत्तरकाट्ात्‌ । अवधघृतताद्दयस्य हि पश्चाद (स्य)यं गवय 
इवे सोऽपि निपतति ॥ 

एवं तहि स्यादर्ब्दपूत्कं प्रमाणान्तरं, यथा गवयदश्चनादेतत्तदसो गौरिति 
प्रामीणस्य वबुद्धिः- तदपि न- प्रमेयाभाव्रात्‌ | सति हि प्रमेये सदुपलम्भक- 
त्वामिमतस्य प्रमाणस्य व्यापारः, न हि गोगवययेब्यंदृत्तमनुृत्तं च वस्तुतः 
सारय नभिकमस्ति ॥ 

ननु च पादृर्यब्ुदधिरस्येतर, नाततो निरारम्बना भवितुमर्हति । सव्यमेतें 
तत्रैव विचारणा--किमपते वनयधादिप्र्ययवत्‌ १ अथ घटादिुद्धिवदिति। 
कि चातः ? यदि वनप्रययवद्धवेत्तदा यथेव त्रिश्िष्टसतनिवेशानुगत। महीरुह 
एवासभ्यतिरेकेणाव्रिधमानवनप्रलयहेतवस्तथैव गोगवयावयवा एव द्रयदर्शनस्परल- 
पक्षया स्वासन्वतिरेकेणासतः सादरयस्य प्रतीतौ कारणमिति प्र ्तमवस्तुतम्‌ ॥ 


३२ पातञ्जख्योगसूत्रमाष्यविवरणे 


अथ पुनषटादिग्र्ययवद्वस्तुरवं प्रमाणत्वं च, तद्‌ स्यादिति ॥ 

तत्र कौददौ वस्विति विचार्थते- 

किं गेगवययेोरनुदृत्तमेकं सादृश्यं गे्वगवयत्वाम्यामन्यत्‌ १ ते एव 
वान्योन्यविरिष्टे, यदि वा ताभ्यां भिन्ने गोगवयाघारे दे सादये पस्परानपेक्षि, 
सपेक्षि वा ९ 


वि व्यक्तिरेव साऽन्यतरजातिषिशिष्टा वा, कि जातिः) सा चान्यतरभ्यक्ति- 
विरिष्टा, व्यक्तिद्यविशिष्टा वा; संबन्धो वेतेषां यथाविकल्पयेगमिव्येकेकन्योन्य- 
विरिष्टविशेषणल्यादिना भूर्यासोऽन्येऽपि विकल्पा उद्भावयितन्याः | तन्न यदेकं 
सादृर्यमुभयगतं, तदा नोपमेयत्वमेकत्वात्‌ , यथा गौरि गौरिति ॥ 

अथ तेनान्यतश्वय्तिरुपमीयेत- >ेतदपि--स्वामगतत्वात्‌ गौखि 
गोतेन । अथ तद्रत्या व्यक्त्या व्यक्तयन्तरमुपमीयेत- नैतदपि-- न हि गोत्व 
खण्डपुण्डोपमेयत्रकारणम्‌ । अथ धममान्तरयपेक्षया साद्य तद्बुद्धेः कारणमिति, 
नष्टं तर्हि सादृश्य, स एवास्तु धमेः तदूनुद्धेः किं ते साटरयहतकेन कलिपतेन ॥ 

कि च--स च्यवेक्ष्यमाणो धमः क्मिकः सादृर्यवदुभयत्र, 
अथ मिनन इव्येवमादिविकल्पाः स्युसि्यितम्भवः पूर्ववदेव । अथ भिन्नं 
साद्दयपुच्येत--तच न-मेददेव, न हि भवति गौखिश्च इति । 
यथेवैकेकल्यादघटमानता तथा बहुभिपएपेक्ष्यमाणेः । एतेन जातिव्यक्तिसम्बन्धादयः 
पूवेविकल्पिताः प्रदयुक्ताः ॥ 

अथय बुद्धयुसच्यन्यथानुपपत्या सादृदेयकल्पना+ ससव वनविवर - 
पूतरदक्षिणेत्तरादिवुद्धियोगान्यधानुमवात्‌ [न्यधानुपरपच्य] वस्तुत किं न कल्प्यते । 
स्यादेषा तव बुदधिक्षादय एव तत्र तदुद्धिजन्महैतव इति । यदेवे मिथ्याप्रव्ययो 
गवयेन सदृशी गौरिति वनबुद्धिवत्‌ । अथ ये व्यावृत्ताः क इदहोपमाधः 
गौखििाश्च इति । अपोमयेऽपि तेऽवयवा व्यावृत्तानुवृत्तामानस्तदुद्धिहेतवः,) 
तथापि बनप्रव्ययवदेव प्राप्तम्‌ ॥ 

तस्मात्‌ परीक्ष्यमाणं नातिविमर्दनक्षममिति त एवावयवा उभयत्रोपठम्य- 
माना मू्यां्तः साद्खयबुद्धैः कारणं बनवुदधेखि पादपाः [ईति] नोपमानं नाम 
प्रमाणान्तरमिति सिद्धम्‌ ॥ 

नापि प्रमेयद्धिवात्‌ प्रमाणद्धिवकल्पनम्‌ । कुतः ? प्रमाणवादर्थप्रतीतेः । 
न हय्थवञ्ात्‌ प्रमाणकलपना । यदि चायव्रश्ात्‌ प्रगाणकल्पना स्यात्‌ ; अधुना 


समाधिपादः प्रश्रमः ३३ 


व [ सूत्रम | 
विपययो मिथ्याज्ञानमतद्रुपप्रतिष्ठम्‌ ॥ ८ ॥ 


[ विचरणम्‌ ¦ 
तन्न राक्यं जनानामसर्वज्गव्वात्‌ । चेव्यवन्दनात्‌ स्वगो भवतीत्यत चैत्यवन्दनस्य 
स्व्हेतुखब्ुदधेः प्रस्यक्षानुमानाविषयत्वान्मिथ्यालं स्यात्‌ । तदथ वा प्रमाणान्तर- 
कल्पनम्‌ ॥ 


अथ स बुद्धिरतुमानफठमिति चेत्‌--प्रमाणादन्यत्र फठप्रसङ्गः, - एवं 
डा(कण)रणत्रयादिवाक्यार्थविष्रयबुद्धिरपीति ॥ 


नपि चात प्रमाणलक्षणनिरूपणताद्यै प्रसिद्धप्रमाणादिवृत्तिनिरोधाम्यु- 
पायामिप्रददनपरत्वात्‌ । अत एव न सूत्रकारः सूत्रयाश्चकार । 
माध्यकरिण तु किङ्चिध्रिद्धनुवादमात्रमवटम्बितमिति तदनुस्रणेन किमपि 
जल्पितमिति ॥ & - ७ ॥ 

भ्रमाणाल्यां वृत्ति अया्याय विपर्ययामिधानां वृत्तिमिदानीमुपभ्याचि- 
्यासभान आह--विपययां मिथ्याज्ञानमिति ॥ 

नन्‌ निरेधस्य प्रकृतखात्तस्य च हानताद्धानस्य च हियपक्षवाद्धे- 
यस्य चाविधामूलस्वादविधा च विपर्यय इति स एव ॒प्राघन्येन . निरोद्धव्यः. । 
त्प्रमवत्वाद्वेयस्य । कारणनिरोधे हि कार्यमथादेव निरुद्धं स्यात्‌ | तस्माद्विपर्वयः 
प्राधान्यात्‌ प्रमाणात्‌ पूर्वं व्या्यातम्य. ॥ 


स्यमेवमस्तयेव प्राथम्ये विंपययस्य निरोधनीयतया, तथापि गुणदोष- 
ज्ञानपिक्षवाजिरेध प्रति पुरुषप्रवृत्तेः । प्रमाणमेव हि गुणदोषज्ञानम्‌ । न हयप्रमाणेन 
विपर्यस्य दु व्व गम्यते, निरोधतत्फरपताधनानि वा ज्ञायन्ते । तस्मात्‌ प्रम।णवृत्तेरव 
्रायम्यं युक्तम्‌ । ज्ञयते च गुणदोष प्रमणेनेति तदनन्तरं विपर्ययाभिधानम्‌ । 
ृत्यन्तरपिक्षया तु विपरययस्य प्राथम्यम्‌ । तन्मूललतवाचच वृत्यन्तराणां तन्निरोधपूरभमे- 
मेवान्यनिरोधोपपत्तेः ॥ 
` विपर्ययो मिथ्याज्ञानमिति पर्यीयकथनम्‌ । अतद्रपप्रतिष्ठमिति 
लक्षणोक्तिः । तस्य रूपं तद्रूपे न तदूपमतदपं, यदामाते विज्ञानं तस्य 
विज्ञानस्य च सा प्रतिष्ठा आलम्बनम्‌, । अगृह्वीतव्रिरोषस्य सामान्यमात्र- 
युद्धिरुपटन्धपूवीन्यतवस्तुस्मृद्युपसंहिता निश्वयाकरिणोपरसंहिता निश्वयाकरिणो- 
पजायमाना विपर्ययः ॥ 

5 


३४ पातज्ञदयोगसूत्रभाष्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
स कस्मान्न प्रमाणम्‌ । यतः प्रमाणेन बाध्यते । भूताथविषयलात्‌ 
प्रमाणस्य । तत्र प्रमाणेन बाधनमप्रमाणस्य दृष्टम्‌ । तचथा--द्विचन्द्रदशैनं 
सद्विषयेगेकचन्द्रदशेनेन बाध्यत इति । 


| विवरणम्‌ | 
संशयो दह्यभयोरिदं सामान्यमि्येवं गृहीतसामान्यस्य विशेषमेव 
घुभुत्समानस्य जायत इति स्पृतावेवान्तभवति । यथा स्थाणुः वि वा पुरूष इति 
गृहीतपूवस्येव बिरोषस्य स्मरतः संरये। जायते, न तथा विपर्ययः | अन्यतरस्मरण- 
म्रेणेवावसितत्वात्‌ । त्था-- स्थाणौ पुरस्तादवस्थिते परिणाहारदणादि- 
सामान्यप्रत्रोपलम्भेन समुपजातपुरुषस्मरणस्य पुरुष एवायमिति निश्चिता 
सुद्धिरुत्पथते ॥ 


सा यद्यपीन्दरियमार्गणोपभ्यमानवस्तुामान्यप्रधाना, तथापि समर्य 
णातद्रस्तुप्रतिष्ठत्वान प्रभाणम्‌ । स्मृत्यवसाना हि सा यतः प्रमाणेन प्रबाध्यते 
जअ(आ) मूताथ(थदि)विप्रयत्रात्‌ । (इव्यतः प्रतिषठत्वादियेतत्‌) अभूतो हि 
स्मयेमाणोऽथस्तदा । ययेवं स्मृतिरेव प्राप्नेति-न- विशिष्टत्वात्‌ । उपरम्यमानं 
वस्तु निमिक्तीकृत्यान्यत्र स्मृतिजीयते यधानुमूतवस्तुविषया । न विपर्ययस्तथा | 
सननिहितसामान्यमत्रे देशक।खादिविशेषानुगते वस्तुनि स्मरणपर्यवसतानस्वे 
स्यप्ययमिति विशेषरूपेण विपययव्र्ययो ज।यते । तस्मादेवं न प्रमाणधर्मो नापि 
स्मूतिधम्‌ इति बस्यन्तरतरम्‌ ॥ 


तत्राप्रमाणस्य प्रमणेन वाधसंदरचनार्धमुदाहरणे दरयति- तथथा 
दविचन्द्रदशेनमिति ॥ यथा काचकामलादयुपहतदरीनस्याभूताथैवरिषयल्वाद्धि 
दिचन्द्रददीनस्य सद्िषयेण भूताथवििषयेण एकचन्द्रदशेनेन हि तीयनचन्द्रामावो- 
पपन्ति्वानस्मृव्यतुगृहीतिन बाधनम्‌ ॥ 


ननु च द्विचन््रमिति विपरी पञ्चपठीतिवत्‌ द्विगु समा्ततवात्‌ 'द्ियुरेक- 
वचनम्‌! इति प्रतिरग्ध तद्भावात्‌ 'अकारान्तोत्तयदो द्विगुः ्ियामिष्टः' इति 
दविगोरकारान्ताव्‌ (इति) दि चन्द्रशब्दादीक।रः प्राप्तोति-नैष दोप्रः-पात्रादिप्रति. 
बेधात्‌ । तत्र चादिशब्दस्य प्रकारवचनघलात्‌ | प्रकारस्य च शिष्टप्रयोगानुसासतिात्‌ + 


= 


1, पाणि. सू. 2.4. 1. 





समाधिपादः प्रथमः ३५ 


भाष्यम्‌ | 
सेयं पश्वपवां मवलविधा, अविद्यासितारागद्रेषाभिनिवेशाः 
कशा इति। एत एव स्वसंज्ञाभिः तमो मोहो महामोदस्तामिक्ञोऽन्धतामिल्च 
इति । एते चित्तमटप्रसङ्खेनाभिधास्यन्ते ॥ ८ ॥ 


। सूत्रम्‌ ] 
शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥ ९ ॥ 


[ भाष्यम |] 
च पेद 
सन प्रमाणापारेही, 
[ विवरणम्‌ |] 
दिचन्द्रोऽपि पात्रादिषु द््टम्यः । द्रौ चन्द्रौ यस्मिन्‌ दीन इति बहुरि; | 
एकचन्द्ररान्दस्य अद्रगुत्वादव चाचाभमविः | पाच पश्चपवो अविधा; ता 
विपययव्रत्तर्‌त्रियया पज्च परताग अस्या इत ॥ 


कानि पुनस्तनीवयाह-अविद्यास्मितेल्यादि । एत एव अविचादयः 
ह्राः स्वधङ्ञभिः खाभिः शाल्न्तरप्रपिद्धामित्तमआदिपंज्ञामिः; भिशिष्टाः 
चित्तमलप्रसङ्गनाभिषापिष्यन्ते दवितीयपदे ॥ ८ ॥ 


ददानीं विकल्पं दशयति-- शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकलः ॥ 
सब्दस्य ज्ञानं राब्दङ्गानम्‌ , वाच्यवाचकनियमेन सष्साधुरान्द्ञान, तदनुपतितुं 
शी खमस्येति रखब्दज्ञाना।नुपाती | वस्तुशन्य इति ॥ यथावाच्याथद्यून्यः, यस्य 
राब्दस्य ज्ञानमनुपतति तस्य शाब्दस्य यथाभूतामिधयेन सयून्य इति यावत्‌ | 
यथाभूतायर््यतिरेकेण हि विकल्पनं विकल्पः ॥ 


त्य हि रान्दज्ञनानुपातित्वादागमान्तःपातितवे प्राप्तम्‌ , अत आह-- 
प॒ न प्रमाणोपारोहीति ॥ न प्रमाणान्तःपाती वस्तुदन्यत्वात्‌ । 
न द्यागमस्य शब्दु्ञानानुपातितेऽपि वस्तुद्यन्यत। । यतः राब्दार्थत्रिषय। 
बरत्तिर।गमः, विकल्पस्तु वस्तुदयूल्यत्वाने प्रमाणम ॥ 

किंञ्च -वक्तृधरोत्रोश्च तुल्यो विकस्य । द्रयेरपि शब्द दुर रिताद्वि कल््यष 
(५ [क्न किप्‌ 


हि बुद्धिजौयते । न तथा आगमे | प्रोतुरेव ह्यागमः । वक्त! तु दष्टानुमितार्थः ॥ 


( 


किश्च-निर्वितकपसमापन्नस्य विकल्पो वतते नागमः । तप्मान्न 


ष्य 


प्रमाणेपारेद्दी ॥ 


३६ पांतञ्जलयोगसूत्रभाष्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ ] 
न॒विपर्य॑योपादी च । वस्तुशुन्यखेऽपि शब्दज्ञानमाहास्यनि- 
बन्धनो भ्यवह्‌रो दृश्यते । त्यथा--““ चेतन्यं पुरुष्य स्वहूपम्‌" इति । 
यदा चिति पुरुषः तदा किमत्र केन व्यपदिश्यते ? भवति च व्यपदेशे 
वृत्तिः, य॒था --“ वचेत्रस्य गौः” इति । 


| विवरणम्‌ ] 
ययेवं वस्तुशून्यलाद्धिपययान्तःपातिल प्राप्तम्‌ , अत आह-न विपर्ययो- 
पारोद्ीति ॥ कुतः ! शब्दङ्ञानानुपातित्वात्‌ । न हि पर्तुदून्यतरेऽपि विपर्ययः 
राब्दज्ञानमपेक्षते । यतः ^“ विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रपप्रतिष्ठम्‌ श्युक्म्‌ । 
प्रमाणपचिच्छिधप्रलयये प्रलतिगुणमूतत्वाच विकल्पस्य । न हि यथा सर्वषां विपर्ययो 


विरोधाद्वाष्यते, तथा विकल्पः । प्रमाणप्र्ययगुणमावदेव ॥ 


तस्माद्रस्तुशून्यलग्रहणिन रब्दज्ञानानुपातिलम्रहणेन च परस्परसंबन्धेन 
प्रमाणविपर्ययाम्यां प्रमणत्रिपर्यैयगन्धमात्रानुलिप्िमपि भिन्नं विकल्पास्य वरस्यन्तः 
दरितम । तद्र द्रन्धानुदेपनदेव तदानन्तर्येण विकल्पस्य।रम्भः । नपि स्मृतिम्‌ । 
सृते: केवलानुभूतास्पदलवात्‌ ॥ 


अथ न लीद्री चित्तवृत्तिः भरसिद्धा | न हि स्वभावे िचिदूवृत्ति- 
निमित्तमिति चेदाह-पस्तुशून्यखेऽपि शब्दज्ञानमाहातम्य(मात्र]निबन्धनो 
व्यवदारो दृशयते इति । मन्नप्रहणे शब्द्ञान्पतिरिक्तका(णाभवद्यापनार्थम्‌ । 
क दृस्यत इति चेदाह- त्था चेतन्यं पुरुषस्य स्वरूपमिति । चितिरक्ति- 
रपरिणामिनीव्युक्तघाचेतन्यमेव पुरुषः, तदेव च स्वरूपमिति न्यतिरेकाभागद्वप- 
तिरेकोपनिबन्धने व्यपदेशो न स्यात्‌--पपुरप्रस्य चैतन्यम! इति । तथा चेममे- 
वाधपुपाश्चिलय शब्दविदा वार्तिककरेणोक्तम्‌-- “सिद्धं तु भ्यपदेशिवद्वावात्‌)' 
इति । तथेवेहपि यथा सति -व्यतिरेके चेत्रस्य गौरिति तद्वदेव चैतन्यं 
पुरुषस्येति । न हि यथा गोसन्यशचत्रो व्यपदेशहेतुः, तथा चितेरथीन्तर 
पुरूषेऽस्ति, ` येन व्यपदिश्येत । नापि चितिः पुरुषादयौन्तरं व्धपदिरयेत । 
तथाऽपि ` -व्यतिरेकसेबन्धविषये मवति “चैतन्यं पुर्षरस्य स्वरूपम्‌! 
इति भ्यपदेर वृत्तिः ॥ 





1. पा. 1, स्‌, 8. 


समाधिपादः प्रथमः. ३७. 


[ माष्यम्‌ | 
तथा, प्रतिषिद्धवस्तुषर्मो[मी]निष्कियः पुरुषः, तिष्ठति बाणः 
स्थास्यति स्थित इति, गतिनिवृत्तौ षासथेमत्रं गम्यते । तथा, 
अनुतयत्तिषमो पुरुष इति, उत्पत्तिषर्भस्या मावमात्रमवगम्यते, न पुरूषान्वयी 


ष्मः। तस्मात्‌ विकसिितः स भर्मः, तेन चास्ति ग्यवहार इति ॥ ९ ॥ 


[ विवरणम्‌ 1 
प्रतिषिद्धवस्तुधर्मेति । वस्तुनो धर्मो वस्तुधर्मः । प्रतिषिद्धो वस्तु- 
धमोऽस्येति प्रतिषिद्धवस्तुधमी । ““'धरममीदनिच्‌ केवहात्‌,' इति वचनात्‌ 
समसान्तश्िन्ययसमाधिः । वस्तुशब्देन सखदिगुणा उच्यन्ते, तेषां घमः 
प्रतिषिद्धा अस्येति ॥ 


न हि प्रतिषिद्धाः सच्वादिधमाः प्रतिषिद्धत्वदिवास्य पुरुषस्य संनन्धिने। 
मेवन्ति । येन ते पुरुषेण अस्येति व्यपदिर्यरन्‌ । तदमभावमात्रमेव तु तत्रः । 
तथापि यथा चित्रा गव्रोऽस्येति व्यपदेरो बुद्धिः तथा प्रतिषिद्धा वस्तुधमौ 
अस्येति व्यपदेशे बुद्धिः ॥ 


निता करिया अस्मदिलत्रपि निगेतिरपायः । अपायश्च सम्बन्धधूरवः । 
यथा चैत्रानिगेता क्रिया| न चेवं पुरषे क्रियाया अपतम्भवानिगेतिः पुरुषात 
सम्भवति । तथाऽपि निष्क्रियः पुरुष! इति भ्यपदेदो भवति वृक्तिः ॥ 


तथाऽनुखत्तिधमी पुरूष इति ॥ न विते उतप्तिधरमोऽस्येति पूर्ववदेव । 
अत्र स्वयमेवार्थमाचष्टे भाष्यकारः--उतत्तिधमेस्यामाव(ज्ञाम)मात्रमव(मत्र). 
गम्यते । यथा निगुणो निरञ्जनो निष्कल इव्येवमादीन्यप्युदाहरणानि । 
आलसविषयानेकोदाहरणप्रदशचैनमातमतचनिधंरणाथलात्‌ ॥ 


तिष्ठति बाण इति रेकप्रसिद्धादाहरणप्रतिपादनमप्रसिद्धधाशङ्का- 

निवृ्यधम्‌ । तिष्ठतीति गतिनिवत्तिर्मेद्यमावः । न॒ चमातस्य कालत्रथयोगो 

भवति । नापि बाणस्य क्रियानिरपक्षस्य दव्यस्य । नापि चाभवेन गतिनिवृ्या 
[> | ‰» 


बाणस्य वस्तुनः संवन्धः । तिष्ठति बाणः (स्थास्यति स्थितः] इयेवं 
तरीण्युदाहरणानि ॥ 





{. व्याकरणसूत्र अ. 5,पा. 4. सू. 124. 


३८. पातञ्जलयोगसूत्रभाष्यविवरणे 


[ सूत्रम्‌ ) 
अभावप्रययारम्बना वृत्तिर्निद्रा १० ॥ 


[ भाष्यम्‌ ] 
सा च सम्रवोधे प्रयवमश्चौत्‌ प्रल्ययविशेषः । कथम्‌? “सुखमह- 
मस्वाप्सम्‌ , प्रसन्नं मे मनः प्रज्ञां मे विशारदीकरोति" “दुःखमहमं- 
स्वाप्सम्‌, स्यानं मे मनो मअ्रमयनवरि्थितम्‌'' ““गाढमूढेऽदहमस्वाप्तम्‌ , 
गुरगुरूणि मे गत्राणि, न्तं मे चित्तम्‌ अरततं मुषितमिव तिष्ठति" इति । 
स॒ खल्वयं प्रबुद्धस्य प्रयवमर्शा न स्यादसतिं प्रययातुभवे । तदाश्िताः 
स्मृतयश्च तद्विषया न स्युः । तस्मात्‌ प्रययविशेषो निद्रा।साच 
समाधावितरप्रययवन्निरोद्धव्या इति ॥ १० ॥ 
[ विवरणम्‌ ] 
गतिनिवृत्तौ धास्थं इति ॥ ननु गतिनिषृत्तिरेव धाल्रथः, तत्र कथं 
ग॑तिनिबृत्तात्रियाघारः १ अत एवेदाहरणान्तरमेतत्‌। अपति व्यतिरेके अधारा- 
धेयमावस्यामावात्‌ । अस्ति च गतिनिधरृत्तौ धात्वथं इति व्यपदेशे शब्दसाम्यै- 
सपुस्यापिता बुद्धिराधाराधेय[माव)]पुबन्धव्रङम्बिनी । तस्मादित्यजातीय विकल्प. 
विषयमनेकमुदाहरणं द्रष्टन्यम्‌ ॥ ९ ॥ 


निद्रया वृत्तिमिदानीमाचषटे--अभावप्रययारम्बन) वृत्तिर्निद्रा । जाग्र 
विषयत्वात्‌ प्रागुक्तस्य दृत्तित्रयस्य तदुपमर्देन च निद्रासमुद्धव इति, तदनन्तरं 
निद्राया वृत्निन्य्यायते ॥ 

अमाव इति जाप्रद्विषयाभावः, न त्त्यन्ताभाव ए | तत्र प्रल्ययानुप- 
पत्तेः | अभवि प्रययः अमविप्र्ययः । स ए अआरुम्ब्ने यस्याः सा 
वत्तिरमावप्रययारुम्बना । सा निद्रा घुषृपतावस्था ॥ 

ननु च स्व्नवरस्थाऽपि निद्रैव--नेष दोषः-““स्वभ्रनिद्राज्ञनाठम्बनं 
व्‌[1* इति सूत्रकरिण भेदेनेपदिष्टतादिह शुधृप्तावस्थेव निद्राऽभिप्रेत। ॥ 

फिंच--अभावप्र्ययाङम्बनघाच्च पुपृत्तमेव । न हि स्वपस्यामाव- 
प्रसयालम्बनता, स्पृतिखात्‌ । स्मृतेश्वानुमूतविषयलात्‌ । तथा माष्यकारः- 
८धयदस्वत्ने मावितस्मरतन्या!' इति स्मृतिं दशयति ॥ 


1, ५. 1. प. 38. 
2. ण. 1. ९. 11 


समाथिपाद्‌ःःत्रथमः ३९ 


सूत्रम्‌ 1 
अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मरतिः ॥ ११ ॥ 
[ विवरणम्‌ ] 
किञ्च-- स्वरस्य चित्तद्त्तिता स्वरसत्रेयेति नारशङ्कवोपपदयते । तथा च 
चित्तटृत्तितामराङ्क्यह-- पा तु[च सपप्रबोषे प्रयवमशदिलयादि । तस्मात्‌ 
प्रययविशेषो निद्रा । न दह्यक्तति प्रयव्िेषे परम युक्तः । अस्ति चायं 
प्रबुद्धस्य प्रघ्यवमरः शुखमहमस्वाप्सम्‌' इत्यादिः । प्रलयवमरो नाम 
किमप्यन्वभूवमिति प्रत्ययारोचना | नानुभव्रामवि सा भवेत्‌ । नापि _ तद्विषया; 
स्मृतयो युक्ताः । निद्राया अप्रत्ययते- प्रज्ञां विशारदीकरेति मनः, मनः 
करैत, स्यानं स्तिमितम्‌ अकर्मण्यम्‌ , गुर्गुरूणीति प्रकरे "गुणवचनस्य" 
इति द्विवचनं गुरुप्रकाराणि, अपं सुषितमिव मछेनाप्टतमिव, 
एतानि प्र्ययानुभवक्रा्यणि न स्थुः । काश्चन स्मृतयः कानिचित्‌ कार्याणि 
केचन प्रखवमरौः । तदेतल््रयमपि माप्यकरिपन्यस्तं प्रत्ययविरेषत्व एवोपपधते ॥ 


किश्च- गर्भगृहादिषु चद्ृ्टबाह्यनिमित्तानामपतति विशेषे चिरमहं 
सुप्तवान्‌ क्षिप्रमिति च परामर्योऽन्यथा न युज्यते ॥ 

ननु च नात्र स्मृतयः, स्मृतीनाम्‌ अन्वभवभियेवंविशि्टत्वात्‌ । न हि 
घुषुप्ादुत्थितो विशेषे स्मरति--अत्रोच्यते--बारुप्येह जन्मन्यनुभूतस्तन्य- 
संबन्धस्य जन्मानन्तसेव तस्यामिखाभो दृस्यते । न च [स] स्वामातरिकः. । 
अबालनोंस्मृतिपू्रप्रदत्तिदशैनात्‌ । तथेहापि । तस्मात्‌ प्रत्ययपृश्रकः सुपप्तविभय 
म्रत्यवमरेः, प्र्यवमरोत्रात्‌ जम्रदुपरब्धविषयप्रत्यवमरेवत्‌ । तथा सु ृतषोत्यितस्य 
गात्रगौरवादि काय दुःख्यनुभवपूर्व, गात्रा िषयगौरवादिकायैतात्‌ 
परसिद्धदुःखानुमवकायैगात्रगौरववदिति प्रत्ययविशेषो निद्रेति सिद्धम्‌ ॥ १० ॥ 

सपृतिमिदानीं व्याचष्टे--अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः । स्मृतेः 
प्रमाणादिसव॑त्तिकायैत्वादन्ते निवेराः । अनुभूतश्चासो विषयश्च अनुभूतविषयः | 
योऽसावनुभूतः स एव विषयः, न पुनर्यो व्रिषयः स एवानुमूत इति । तथा च 
समृतेररब्दादिवात्‌ स्मृतिविषयायाः स्पृतेरस्मृतिं प्रपेतीति । हृष्यते 
च स्प्रतिषरिषयाऽपि स्मृतिः स्व्तवेयलात्‌। अनुभतविषयस्यासेप्रमेषोऽनपहरणम- 
तिरोभावः । परोक्ष्येऽपि साददयादिर्निमित्तपिक्षयाऽतुमतस्य विष्रयस्य 
टृडयमानवदवभापः स्मृतिः ॥ 





1. पाणि. स्‌, 8. 1. 12. 


४० पातञ्चल्योगसूत्रभाध्याविचरणे 


{ भाष्यम्‌ ] 
रिं प्रलयस्य चित्तं स्मरति, आदोसित्‌ विष्यस्येति । 
ग्रह्मोपरक्तः प्रययो ग्राहयग्रहणोमयाकारनिमौ्तः तजातीयकं संस्कार 
मारमतं । स सस्करः खन्यक्चकाञ्चनस्तदाकारमेव प्र्यप्रहणांमयासिमिकां 
स्मृतिं जनयति ॥ 
[ विवरणम्‌ ] 
तत्र॒ प्रल्मयस्मरणयेोविषयाकारावमास्ताविशेषात्‌ , किङ्कृतस्तयोरभैद 
इति तद्विवेकं प्रदरीपितुकाम आह-किं प्रयस्य चित्ते स्मरतीवयादि ॥ 
यथप्यनुभूतानतुमूयमान विषयत्वेन विवेकः, तथापि सादृर्यनिमित्ता 
भ्रान्ति तयोः कार्यकारणत्वप्रदशैनाय निवर्तयति । एतदेव च वैनाश्चिकान। 
बहिरथानुपपततबंद्धिकारणम्‌ । कं प्रययस्य स्मरतीति कमैण्युभयत्र षष्ठी । चिन्त 
स्मरतीति पुरषरकतृत्वं निवारयति स्पृतिप्रल्मययेरेककतृत्वप्रदर्दीनार्थम्‌ । न हि 
पुरुषस्य प्र्ययकरृ्वं स्पृतिकर्तृते बा । दृर्यत्वात्‌ प्रस्ययानाम्‌ । दृरयानां च 
स्वातमातिरिक्तदरयत्वे षटादिवदिति बक्ष्यामः ॥ 


किश्चातः यदि विषयस्य स्मरति, प्रघ्ययस्यापिं वरिषयविषयल्रादनर्थान्तरं 
स्मृतिः प्रलयात्‌ । अथ प्रत्ययस्य स्मरति, तदा विदमयुक्तम्‌ अनुभूतविषया- 
सम्भरमोष इति । तद। श्यनुभवासम्प्रमोष इति स्यात्तत्रह- ग्राघ्योपरक्तः 
्ा्लो त्रिषिय आढम्बनम्‌ › तेनोपरक्तः लक्षाचुपरक्तस्फटिकवत्‌ । ग्रह्यग्रहणो- 
भय।कारनिभीप्तः प्राह्यस्य च षटदिः पृथुब्ुद्‌ ्ाचाकारेण स्वेन चावभासरेणो- 
पजायमानत्वादुभयनि मासः ॥ 

स च प्रत्यय उथ विनिवतैमानः स्वाश्रये प्र्यपिनि संस्कारम. 
दधाति। से च संस्कारः कारणानुविधयित्वादु भया(पात)कार एष । स्वनव्यक्षकान्नन 
इति । संस्काराधापिनः प्रष्ययस्य हेतुभूतं यत्‌ कम दत्तफठं तततुस्यजातीयं 
यत्कमान्तरं फलग्रदानायाभिमुखीमवति तत्‌ स्वव्यञ्षकम । तथ। च वक्ष्यति- 
(ततस्तद्विपाकानुयुणानामेवामिन्यक्तिर्वास्तनानाम्‌? इति । तत्करमप्रदयुपनीतं वां 
सादृरयप्रणिधानादि । स्वेन गयञ्चकेनाभिम्यञ्यत इतिं स्वन्यन्चकाक्ननः । 
्र्यग्रहणादिमिकांः स्मरति जनयत्ति । अन्यथा तद्रबज्ञकस्य कमणो 
विपाकानुपपत्तिः ॥ 


1. पा, 4. स्‌. 8. 
2. ग्राह्प्रहणोमयात्िकाम्‌. इति मुद्रितमाध्यग्नन्थपाठः 


समाधिपादः प्रथमः ~ 


भाष्यम्‌ |] 

तत्र ग्रहणाकारपूवं बुद्धिः । आद्याकारपूवो स्मृतिः । सा च द्यी 
भावितस्मर्तव्या. च अमावितस्मतेव्या च। स्वपे भावितस्मतेव्या । 
जाग्रत्समये समावितस्मर्तव्येति । सर्वाः स्मृतयः प्रमाणविपयैयविकल्प- 
निद्रास्पतीनामलु मवात्‌ प्रभवनित । सर्वाश्रेता वृत्तयः सुखदुःखमोदासिकांः। 
सुखदुःखमोदाश्च शेषु व्याख्येयाः-पुंखानुशयी रागः, दुःखानुशयी 
देषः, मोहः पुनरविद्या इति । एताः स्वी वृत्तयो निरोद्धग्याः । अपां 
निरोप सम्परज्ञातो वा समाधिभ॑वति अपम्भज्ञातो वा इति ॥ ११॥ ` 


[ विवरणम्‌ | 
तत्र प्रहणाका।रपुक्व बुद्धिः, ग्रहणम्‌ [स्वी]करणे [स्वी] करणमेव पूर्व 
प्रथमसुत्पद्यमानस्य प्र्ययस्य । न हि विधयत्रिशेषमपेक्षते पूवैमिष्टानिष्टम्रहणात्‌ , 
निर्मप्रषटप्रदीपविनिगेतप्रभाजाखत्रत्‌ ॥ 


अ्रह्याक्रापपुष्र स्प्रृतिः अनुभूतपेक्षत्वात्‌ । यदि च प्रहणपूर्विका 
स्मृतिः प्रस्ययवदभविष्यत्‌ , अनुभूतं नापिक्षिष्यत । अपेक्षते तु । तस्ादृभ्रह्यो 
वियः पूर्वोऽस्या न ग्रहणम्‌ । तथापि तूमयासिििकेव | स्ृतिसस्कारयेरेकरूपत्वात्‌ । 
नध्यन्यत्तर्रस्यास्यानेन सम्भवति । तथा चानु मूतविषयाप्प्रमोषर इव्युपपद्यते । 
स्रातेप्रयययोर्‌ पर[पसमान)विषयत्वात्‌ , म्रहणतवस्य च सवत्र सम्भवात । तसात्‌ 
पक्षद्रयेऽप्यभिहितदोषो न दृश्यत इति ॥ 


१ 


पाच हयी । कथम्‌: भावितस्मतेव्या भावितं परिनिष्पन्ने 
अप्कृद्धावितल्रात्‌ । यया द्रन्यान्तरेणासकृद्धावितं तैखादि । असङृद्धावितत्वादेव 
प्रणिधानादिप्रयननान्तरं नपिक्षते । भावितं स्मतेग्यं प्रणिघानादियन्नान्तरा[नि पेक्षया 
यस्याः सा स्वपने मावितस्मतेन्या । जागृ प्रमये त्वपेक्षते प्रणिध।नादियन्नान्तरमिति 
तद्विपरीता ॥ 


सश प्रमाणादिवृत्तिपश्चतयानुमवादुदधवन्ति । सवांगरैताः सुखाचा- 
(स्पचाधा)लिकाः। तदात्कथ संसारः। सुखदुःखमोहाश् डशेषु व्याख्याताः 
सुत्रकरेण । “सनं दुःखं विवेकिनः" इति हि वक्ष्यति । तद्धानं चेह विवक्षितम्‌ । 





1, षा. 2, बु. 15. 
0 


४२ पातञ्ञटयो गसूघ्रभाध्यविबरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
अथ आसां निरोधे क उपाय इति-- 
[ सूत्रम्‌ । 
अभ्यासवेराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥ १२ ॥ 
| भाष्यम्‌ ] 
चित्तनदी नाम उमयतोवादहिनी वहति कल्याणाय वहति पापाय 
च । या तु केवल्यप्राग्मारा विवेकरविषयनित्रा सा कल्याणवहा । 
ससारपराग्भारा अविवेकविषयनिश्ना पापवहा । तत्र वैराग्येण विषयन्लोतः 
विटीक्रियते, विवेकदरीनाम्यासेन विवेकल्लोत उद्वाव्यत इत्युमया- 
धीनशित्तवृत्तितिरोपः ॥ १२॥ 


सूत्रम्‌ | 
तत्र स्थितौ यलोऽभ्यासः ॥ १३॥ 
[ विवरणम्‌ | 
तस्मात्‌ सुखदुःखमोदात्मकतवात्‌ निरोदधम्या वृत्तयः । विश्च--आसां निरोषे 
सम्भर्ञातो वा समापिमैवलयपम्मज्ञातो वा॥ ११॥ 


अथ आसां निरोधे कं उपाय इति ॥ 


उपायं प्रवेदयति--अभ्यासुवैरग्याम्यां तज्निरोष इति ॥ अभ्याप्तवैरण्ये 
वक्ष्यमाणलक्षणे । ताभ्यां यथोक्तरक्षणानां [बृत्तीना] निरोधः विरोधात्‌ । निरोध 
उपरमः । अम्यासुत्रराग्ययेर्विषयविवेकप्रदर्रानार्थमेतद्भाप्यम - चित्तनदीलयादि । 
चित्तेन नयेव संक्तारिणः सततत विषये परिणीयन्ते । सागप्रामभारा ससारावसानां 
समुद्रावसनेव । खिीक्रियते प्रतिब्यत इति । उद्वाव्यते प्रवते । उद्धाटः 
क्रियत इत्युद्राय्यते । अन्यथा परितात्‌ घटाद्यो मितः इति (इत) “भिता! 
हस्वः)" इति स्यात्‌ । एवं उमयाधीनः; उमयतन्त्र हृद्यः ॥ ६२ ॥ 

तत्र म्धासस्वरूपं प्रतिपादपिप्यनाह-- तत्र स्थितौ यन्नोऽभ्यापः । तत्र 


तक्षिन्निरोधे । सा च निमित्तसप्तमी । निरोघनिमित्ता चित्तस्य या स्थितिः 
यत्नस्य फलभूता तस्या निमित्ता[त्तमूतो]यो यन्नः सोऽभ्याप्तः । तथा चाह- 





1. पाणिनिसूत्रं भ. 6. पा, 4, घु. 92. 


समाधिपादः प्रथमः ४३ 


[ भाष्यम्‌ ] 
चित्तस्याव्रत्तिकस्य प्रशान्तवादिता स्थितिः । तदथः प्रयल्ञः- 
वीर्यम्‌--उत्सादः । तस्सम्पिपादयिषया ततसाधनानुष्ठानमम्पासः।॥ १३॥ 


[ सत्रम्‌ ] 
[स तु] दीधका।रनैरन्तथसत्कारासेबितो दृढभूमिः ॥ १४ ॥ 


{[ भाष्यम्‌ 1 
दीरधकारासेवितः, निरन्तरापेवितः, सतकारासेवितः-- तपसा 
ब्रहमचर्येण विद्यया श्रद्धया च सम्पादितः सक्तारवान्‌ ; दटमूमिमवति-- 
वयुत्थानसंस्करिण द्रागित्यवानभिभूतविषय इत्ययः ॥ १४ ॥ 


[ सूत्रम्‌ । 
दष्टाजुश्रविकविषयविवृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्‌ ॥ १५॥ 


[ विवरणम्‌ । 
अवृत्तिकस्य प्रान्त पङ्क}कर द्ग) क्षस्येवाम्भसः प्रशान्तवाहिता प्रसन्नहूपतय 
परिणामो निरुद्धवृत्तिकस्य चित्तस्य । यज्ञो वीयेमम्युत्साह इति पयौयाः.। 
स्थितिपंपिपादयिषया यमनियमादियोगसाधनानुष्ठानमभ्यास्न इति ॥ १३ ॥ 


तु कथं स्थिरीमवतीलत आह---दीधक्रारनरन्तयसेवितः दीषकाल 
त्ववजितो वा (नैरन्तयवरजितो बा न] दृदभूमिभंकत्यम्यासः । तस्मादुभयोरपि 
(विरोप्योविंहेषणल्वमेव । सैस्कारसेवित इति तम्याप् एव विरेष्यते । दृढभूमि 
रिखस्य व्याल्यानं ब्युत्थानपस्कारेणेति । ब्युखानजेन सेस्करिण द्रागिति 
सहसा नाभिभूयते ॥ १४ ॥ 


वैराग्यप्रतिपादनाथमाह--दष्टानुश्रविकविषय वितृष्णस्य वशीकार- 
सेज्ञवेराग्यम्‌ | विषयशन्दः प्रलकमभिसंनष्यते वितृष्णस्य इति च, इष्टविषय- 
वितृष्णस्य आनुश्रत्रिकविषयवितृष्णस्य चेति ।॥ 


1. इदं अब्ृत्ति$स्य इति भाष्यपदस्यः व्यार्यानम्‌ । अतः अश्ृत्तिकृस्य 
इति प्रतीकादनन्तरं सन्निवेक्नमुचितं प्रतिभाति । 
2, इदं प्रशान्तपङ्कत्यादितः प्राकखन्निविष्टञेःऽमुचितं प्रतिमाति । 


४४ पातञ्जखयोगपूत्रमष्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
„ (= [1 र, 0 क भ क © क च, 
` क्ञियाऽन्ने पानमश्वयमिति दृ्टविषये वितृष्णस्य, स्वगेवेदेद्य- 
प्रकृतिर्यलप्रापठवानुश्रविकाविषये वितृष्णस्य दिम्यारिव्यविषयसम्भ- 
योगेऽपि चित्तस्य विषयदोषदरिनः - भरषंल्यानवरात्‌ अनामोगासिका 
देवोपरादेयञचलया वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्‌ ॥ १५ ॥ 
[ सूत्रम्‌ ] 
तत्परं पुरषर्यातेशुणवेतृष्ण्यम्‌ ॥ १६ ॥ 


[ विवरणम्‌ । 
दृशा विषयश्च तस्मिन्‌ ॥ कः पुनरे ! क्ियोऽन्नं पानमेशव्य 
मिति व्यक्त्यपेक्षया । रान्दादीनामानन्त्येऽपि रागप्रवलत्वमेतेष्वतितरामिति 
याद्ष्हणे प्राधल्यात्‌ । अत्र हि प्रबल्तयो रागः । स प्रथत्ततरेण 
निबेद्धन्यः । एवम्‌ आनुश्रविकविषयः । आनुश्रविको नाम आगमिक इह । 
स च स्वर्गादिप्रप्यानुभवनीयः प्रकृतिख्यगतमोग्यो वैदेद्यप्रापौ उपमोग्यश्च ॥ 


ननु च वैतृण्पमेव वैराग्यम्‌, तथा ^दागस्तृष्णा ग्धः इति हि 
वक्ष्यति: । न--अवस्थाविरीषस्य विवक्षितत्वात्‌ । तथा च यतमानंज्ञा, 
व्यतिक्रान्तसंज्ञा, एकेन्धियस्ना, वक्षकारसंङ्ेति चतसृणामासां सामान्यरसंज्ञा 
वैराग्यमिति । एवं सति दृष्टाुश्रविकविषयवितृष्णस्येष्येतदुक्तं मवति-- अधिगत- 
पूथोवस्थात्रयस्य चतुर्थी या अवस्थया सा विह वैराग्यमिति विवक्षितम्‌ । 
तस्मादिह वैतृष्ण्यादन्यवैराम्यमामिप्रतम्‌ । तथा च दरौयति--विषयदोषदर्शिनः 
दोषदरौनस्य विषयनिदृ्तिहेतुतात्‌। तदृगुणदर्शनं हि रागक्रारणम्‌ । प्रसंख्यान- 
यलात्‌- तदेषदशेनाम्यासनरात्‌ । अन।मोगासिका विषयाभ्यतिकराभिका । 
दिव्यादिव्ययो सम्भ्रयगेऽपि हेयोपादे यद्यनया रञ्जनावमुक्तस्येव स्फटिकस्य 
विषयरागविमुक्तस्य चित्तस्यावस्यानम्‌ | वदीकारसज्ञा-- वीक राक्यन्तेऽस्या- 
मवस्यायं सवै गोणाः पदार्थाः वक्षीकपव्यत्रेन संक्ञायन्ते, वशीकृतानि च 
तस्यामवस्थायामिन्दियानि सेक्ञायन्ते, वकष करणं वा संज्ञायतेऽस्यामिति ॥ १५ ॥ 

तच्च द्विविधम्‌-- परं चापरं च विषयनिमित्तमेदेन । अपरं व्यास्यातम्‌ । 


[क कभक ~ । 


अघुना परमुन्यते- तसरं पुरषख्यातेशणवेतृष्ण्यम्‌ । तदिति वैराग्ये परमृर्यते । 





1. पा. 2. षु. 7. 
-2. भाष्यकारः ॥ 


समाधिपादः प्रथमः ५ 


[ भाष्यम्‌ | 
दृष्टानुश्रविकविषयदोषदरी विरक्तः पुरुषदशेनाम्यासात्‌ तच्ुद्धि- 
प्रविवेकाप्यापितबुद्धिः गुणेभ्यो ग्यक्ताव्यक्तधमैकेभ्यो विरक्त इति । 
दृहये वैराग्यम्‌ । तत्र॒ यदुत्तरं तज्ज्ञानप्रसादमात्रम्‌ । यस्योदये संति 
योगी प्रसयुदितख्यातिरेवं मन्यते - प्राप प्रापणीयं, क्षीणाः क्षेतव्याः हशाः, 
छिन्नः श्िष्टपत्र भवसङ्करमो यस्याविच्छेदाञ्जनिसा प्रियते मृत्वा च जायत 
इति । ज्ञानस्यैव परश कष्टा वैराग्यम्‌ । एतस्यैव हि नान्तरीयकं 
केवस्यम्‌ इति ॥ १६ ॥ 
[ विवरणम्‌ ] 
परमिति पू्वोक्तवैराग्यादुत्तरकामावीति । यदि वा-तस्य विषयनिमित्ताम्या- 


५ [च 


मुकछृष्टनिमित्तविषयत्वात्‌ , कैवल्यस्य वा प्रल्मासनतरत्वात्‌ परवुक्ष्टम्‌ ॥ 


किं निमित्तमस्येल।ह-पुरुषख्यातिर्निमित्तात्‌ । किविषयमिद्याह-- 
गुणवेतृष्ण्यमिति । गुने सच्वादि8 वैतृष्ण्यम्‌ । दृषटामुश्रविकविषयदोषदर्यीति। 
पैैर,ग्यनिमित्तविषयपरामदयैनमस्य विषयनिमित्तमेदग्रिवेकायम्‌ । पुरुषददैना- 
म्यात्‌ निगित्तात्‌ । तच्छुद्धिप्रविवेकाप्यायितद्ुाद्धेः । तदिति पुरुषदरनं 
परामूयते । तस्य इ्ुद्धिः तच्छुद्धिः निणिक्तकेशदिमल्त्वम्‌ । अथवा तस्य 
पुरुषस्य शुद्धत्तच्छुद्धिः । तच्छुदधेस्तद।उम्बनद रीन प्रविविच्यते । तसप्रविषे 
केनाप्यायिता बुद्धिरस्य योगिनः ॥ 


गुणेभ्य इति विषयप्रतिपादनम्‌ । पूरस्तु टदशानुश्रव्रिकविषयेम्ये) (ऽपि) 
विरक्तः । एष तत्कारयेभ्यो गुणेभ्य एव । व्यक्ताव्यक्तपगकेभ्यः- महदारिसंश्िता 
व्यक्तधमका; । प्रधानाव्यिता अन्यक्तधभेकाः | तेभ्यो विरक्त इति । त॒त्‌ द्यं 
वेराग्यं पूर्वामेद च। तत्न यदुत्तरं पुरुषद शननिमित्त गुणविषयं त्ञ्ज्ञनप्र माद 


क 


मात्रम्‌ } पुरषदरौनस्येव परः प्रविवेक इति यावत्‌ ॥ 

पुरुषद शी हि हेयोपदेयदयन्यचित्ते। भवति | तदाह रपं ख्यानेऽप्य- 
कुपीदस्य सर्वथा विवेकख्य तिषर्मर्मषेः समाधिः" इति ॥ 

यस्योद्ये यस्य वैराग्यस्योदये । प्रसयुदितस्वोतिः प्रद्ुयनदसनः 
एवं मन्यते प्रात प्रापणीयम्‌ इवयदि । एतस्य हि चान्तशीयकं केवल्यं तत 

1, पा, 4. सु, 29 





६ पातञ्जलयोगसुत्रभाष्यविवरणे 


[ भष्यम्‌ ] 
अथोपायद्रयेन निरुदधचित्तवृत्तः कथमुच्यते सम्भ्रज्ञातः समाधिरिति । 
[ विबरणम्‌ | 
परं साधननपरक्षसरात्‌ । वैराग्यस्य ज्ञानग्रसादमत्रते ज्ञानवैराग्ययोरनन्यवात्‌ 
तद्विपरीतयोश्च रागाज्ञानयोरनयान्तर्वमेव सिद्धम्‌ । एवं सति रगोऽप्यविचाय। 
एवावस्थान्तरमिति पश्चपव अतरिवेव्युपपनने भवति ॥ 


ननु चैवं बुदधेर्टगुणवे बध्येत । षड्गुणलं हि ध्यानावस्यमेदाम्यु- 
पगमात्‌ । ज्ञानतरेऽपि वैराग्यस्य प्रसन्नतरप्वाम्युपगमः; । रगोऽप्यज्ञ(नस्या- 
वस्थान्तरविरोषः ॥ 

ननु चैवं सति ज्ञनाज्ञानयोरेकावस्थमेद।दष्टगुणस्वं पुनरपि न प्राप्रोति । 

नैष दौषः. फङव्खप्रलनीकलनियमात्‌ । ज्ञनावस्थाचतुष्टयस्य फलवत्वेन भेद्‌- 
नियमः । तथा अज्ञानावध्याचतुष्टयव्रलनीकविनाधमीदिचतुष्टयनियम ईइलयष्टगुण- 
त्वसिद्धिः । धर्मादिप्रतिदन्धिन एव दहि गुणवेन नियम्यन्ते, नाज्ञानभेदाः 
स्वं एव ॥ १६॥ | 

उक्तं पुरस्तात्‌ सरज्ञातः समाधिवितकौचनुगत इत्युपरिष्टात्‌ 
प्रवेद विष्यामः' इति । सोऽवसरपरात इदानीं लक्ष्यते । उपायद्वयेन्‌ निरद्धव्तेः 
वैराग्यं परापरतेन व्याष्यातम्‌ । अम्पासश्यापि द्विलं सामध्यौदवप्तीयते । 
कथम्‌ £ विरिष्टमसम्भह्ञातस्तमपेरम्यापतं सूत्रेणैव वकष्यति--'विरामप्रयया- 
म्यासरपुंवः, इति । तेन ॒साठम्बनव्िरियः पवौभ्यास इति निश्चीयते । वक्ष्यति 
च -- (तसतिषेधा्म्‌ः एकतस्वाभ्याक्तः' इति ॥ 

माध्यकारोऽप्यवादीत्‌-- ववैराग्येण+ विषयक्नोतः विीक्रियते । विरेक 
ददनाम्यततिन कल्याणक्नोत उद्ध।व्यते' इति । नावोचत वृत्तिस्वखूयतिरस्कारमेव 
सम्भज्ञातस्तमाधेः । इृत्तिनिरोधप्रभवल्वमनिष्टविषयप्रबृयुपरमोत्तरकालभाविखा- 
पक्षया, वृत्तिषरिषयविरोषानुगत एव हि सः ॥ 


। ¢>. गय) 


तथा च द्वितीयसूत्रे सम्प्रज्ञातस्य निरोधो न लक्षणमिति ब्याल््यातम्‌ । 
अतः पू्ोक्तम्यसतैराग्योप्ायद्वयेन निरुद्धवृतेश्चित्तस्य कथमुच्यते -- कथं 


प्रथमसूज्व्याख्यानावस्रे- 
धा. 1, तृ.. 18. 
पा. 1. घ, 32. 
पा. 1, सू, 12. 


५ 


4 ~ 


समाधिपादः प्रथमः ७ 


[ सूत्रम्‌ | 
वितकंविचारानन्दास्मितारूपानुगमात्‌ सम्प्रज्ञातः ॥ १७॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
वितर्कः-चित्तस्य आारुम्बने स्थूरु आमोगः । सुक्ष्मो विचारः , 
अनन्दो हवादः । एकालिमका संवित्‌ असिता । 


| विवरणम्‌ |] 
ठक्षणमुष्यत इति यावत्‌| वितकंविचारानन्दास्मितारूपानुगमात्‌ सम्प्रज्ञातः । 
अनुगमशन्दः प्रयेकं संबन्धनीयः । वितकानुगणमादिचारानुगमादानन्दानु- 
गमादसितारूपानुगमादिति । रूपरब्दो मात्रा्थौ वितकादिपू्धमंत्रयवर्जितत- 
स्यापनर्थः ॥ | । | 


वितकफशित्तस्यारम्बने स्थूठ आमोगः । स्थूठ्(पि)मिश्रीमावः 
व्रथममाङम्बनाकररेण परिणममानस्य चित्तस्य य आटम्बनभ्यतिकरः स 
वितक्षः ॥ सु्षमो विचारः आभोगः सूक्ष्म इति संबन्धः । अनन्दा हद 
विचारः सुक्षमतर अआभोगस्तृतीयः । सानन्दता विरोषः । 'एकह्पासिका 
सविदस्मिता स्वस्यां प्रकृतावस्मितायां समपन्स्य असिता प्रल्ययमात्रता 
एकरूपालमकलम । तथ। चोदाहरिष्यति-- स्तमणुमालानमन्ववैत्यासीयेतावत्स- 
जानीत हते ॥ 


ननु चास्मितां हरोषु पठिष्यति "छदर्शनश्कतयेरेकारमतेवोस्मिताः 
इति । तत्कथमिव स्मिताख्येण हरेरोेन समाधिरनुगम्पत इति । सल्येवं -- 
प्रकृष्टस्वकारणाकारावमा्तकलतादन्यविषयविनिवृत्तासकतवाचास्मितायाः -समाधि- 
रूपतेऽप्यदोषः ॥ 


यदि षा अ्तितारूपस्याठम्बनस्याविधालेऽपि न योगिप्रल्यस्या- 
विद्यात्वम्‌ । न हि खदु परचित्तविविदिषार्यां परस्य विधात्वम्‌ । न हि खदु 
परचित्तप्र्ययं गृहन्‌ परकीयाविधाप्रद्ययरूपाटम्बनदोषेण स्वयमविध।वान्‌ 
भवति ॥ 


1. मुद्रितग्रन्थे तु माष्यपाठः (एकात्मिकाः इति। 


2. पा, 1. सू, 36. अत्र तमणुमात्रमात्मानमनुषिद्यास्मीदतावस्सप्रजामैति" 
इति मुद्रितमाष्यपाठः। 
3. पा, 2. सू, 6. 


४८ पातञ्जल्योगसुत्रभाष्यविषरणे 


( भाष्यम्‌ | 
„< तत्रः: प्रयमः चतुष्टयानुगतः समाधिः सवितर्कः ! द्वितीयो 
वितकैवि कलः सविचारः । तृतीयो विचारविकरः सानन्दः । चतुः 
तद्विकलोऽसितामात्र इति । सवै एते साठम्बनाः समाधयः ॥ १७॥ 


अथापम्भरज्ञातः समाधिः किमुपायः ? किस्वमावो वा! इति-- 
 [ सूत्रम्‌ ] 
विरामप्रययाभ्यासपूवैः सस्कारलेषोऽन्यः ॥ १८ ॥ 
[ विवरणम्‌ ] 


यः पुनः बशः स विपर्ययविरिष्ट एव । यथा--अहं गण्ठामि 
कृरोऽहमितिः। योगिचित्तस्य तन्न्यगभूत रजस्तमसी इति न तया ॥ 


तत्र पवः पूतैः स्वकीयोत्तरोत्तरधमानुगतः | परः परस्तु पूवेपूतरषम- 
विकर; । यस्मन्चेतद्धमचतुष्टयानुगत एवायं सम्प्रज्ञातः समापिस्तस्मदितष्ठक्षण 
इति लक्षणार्थं सूत्रम्‌ । ठोकेऽपि यो यदसाधारणधमीनुयातः स तद्टक्षणः, 
यथा साल्ञदिरक्षभो गोरिति ॥ 


अस्मितापात्रप्रहणान्निराठम्बनतमिषां समाधीनां मा कश्िद।शङ्किटेव्याह- 
सर्वं एते साठम्बना इति । यः पुनमन्यते निर्विकल्पत्वमस्तितेति-- तदसत्‌ । 
असिताशब्दस्याहङ्कोर प्रसिद्धल्रात्‌. । तथा चाह--अस्मिमावोऽप्तिता ॥ १७.॥ 


अथ अस््रज्ञातः 'योगधित्तव्रत्िनिरोध'  ह्युपपादितखक्षणः 
किमुपायः किंतसताधनः केनोपयेनेपिल् इल्यः । रकिंस्वभावः रकिंस्वरूप; 
क्रिमवस्थ हति स्वभावविशिष्टसाधनसंबन्धप्रदसीनार्थमाह- विरामप्र्ययाम्याष. 
पैः संस्कारसेषोऽन्यः ॥ ` 


` " “ विरमप्र्ययाभ्यापपू्ै शयेतावता साधनसम्बन्धमाचषटे । सेस्कारशेष 
इति तु स्वमवभ्या्यानम्‌ । अन्य इति अनन्तरोक्तरक्षणात्‌ सम्भ्ज्ञातादन्योऽयं 


निर्बीजः अप्षम्प्रज्ञातः ॥ ` : 


` अन्य इतयुमाभ्यां सेव्यते --विरामप्रत्ययाम्यातपूर्वशच संस्काररोषश्च.। 
कोऽपाबुभयविशिष्ट इद्याद-अन्य इति ॥ 


समाधिपादः प्रथमः ४९ 


[ भाष्यम || 
सवेत्रत्तिप्रयस्तमये संस्कारशेषो निगोषश्चित्तस्य समाधि. 
रसम्परज्ञातः । तस्य परं वेराग्ययुपाधः । प्ाठम्बनो द्यभ्यापस्तस्पाधनाय 
न कट्पत इति विरामभ्रययो निर्वस्तुक अ।ठम्बनीक्रियते । स चाेदयुन्यः। 
तदभ्यासपूरवकं हि चित्तं निरारुम्बनममावप्राप्तमिव मवतीव्येष निर्बीजः 
समापिरसप्रज्ञातः ॥ १८ ॥ 


[ विवरणम्‌ | 
षिरमणं विरामः । विरामश्चासै प्रलयश्च विरामप्रलयः । विरामरू्पल्रात्‌ स 
एव प्रघ्ययो विराम इत्युच्यते । सैत्रिषयेम्यो विनिवत॑मानस्य विनिवर्तनकाठे 
प्रागग्र्ययापत्तेः प्रल्ययकूपत्वम्‌ । एतथथा- प्रावकस्य जरतः प्रक्षीयमाणेन्धनस्य 
रानेरदानैरपशाम्यतः प्रागङ्गारतापत्तेौस्कता ॥ 


तस्माद्विरामखूपः प्रलयो विरामप्रययः तस्य अभ्यासः पूवो मुखं 
यस्थ सः विरामप्रययम्यापपृर्रैः । संस्कार एव शेषो यस्य स सस्कारशेषः | 
प्र्ययेपरमे तु प्र्ययत्तस्कार एवरषिरिष्यते | व्िषयप्रह्ययेम्य उपरतं चित्त 
संस्काररेषेमेवेव्यथः । तस्य परं वैराग्यमुपायः तस्य समाधेः परसुत्तरम्‌ ॥ 


ननु च परं वैराग्यं चति वक्तभ्यम्‌, अभ्यासतरैराग्याम्यां वृत्तिनियेधस्या. 
भित्रेतत्वात्‌ | नेष दोषः | विरामप्रल्ययाम्यासस्य सूत्रोपात्तत्वादनाराङ्कधस्तदभ्य।सः। 
वैराग्यं पुनरनुपात्तत्यादाशङ्कथेत । तस्मात्तदेव प्राप्यता न चा [चः] पठितः ॥ 


ययेवं कस्मान सूत्र एव वैराग्यग्रहणं कृतम्‌ १ पूर्त पठितघात्‌ । तत्र 
किमर्थं पठ्तिमिति चेत्‌ वैर'ग्यप्रपङ्गात्‌ । पूमवैराग्यविशेष एतरोत्तरं वैराग्पमिति 
प्रसङ्गादुत्तरम्‌ [दृक्तम्‌ ] । पूतस्य च वेराग्यस्य सम्प्ज्ञातव्रिषये(ऽपि)विनियोग।दव- 
शिष्टत्य परस्य साधनघ्रादन्यकविषयलाच्च निर्वीजेनेव सम्बन्ध इति न सूत्र 
वैराग्यग्रहणं कृतम्‌ । सामर्थ्यत्रापषं तु भाष्यकारो दरयति ॥ 


अम्याप्तवेराग्याम्यां तनिरोष इति हि प्रतिपदितम्‌ । साटम्बनो 
हयभ्यासो विरुदत्वानिराटम्बनस्य समये: साधनलाय न कल्पत इति 
निर्वस्तुकोऽपि विरमप्र्ययो निरालम्बनत्माध्यनुरूपत्वादाठम्बनीक्रियते । 
तस्मात्तदभ्यासवेराग्योपायपूर्वंकं चित्तं निराठम्बनममावप्राप्तापिव मवति । 


स॒ एष निर्बीजः सस्काररषस्ठमवरः समापिरसम्प्र्ञ।त इति ॥ १८ ॥ 
त्र 


५० पातञ्जलयोगसूत्रभाष्य्िवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
स॒ खल्वयं द्विविधः-उपायप्र्ययो भवप्रययश्व । ततरोपाय- 
पर्ययो योगिनां भवति । 


[ सूत्रम्‌ | 
भवप्रययो विदेह प्रकृतिटयानाम्‌ ॥ १९ ॥ 
भष्यम्‌ | 
विदेहानां देवानां भवप्र्ययः। ते हि स्वसेस्कारमत्रोप(यो)भोगेन 

चित्तेन -केवस्यपदमिवानुभवन; स्पंस्कारविपाकं तथाजातीयकमति- 
वाहयन्ति । तथा प्रकृतिर्याः. साधिका चेतति प्रङ़ृति्खने केवल्य- 
पदमिवानुमवन्ति, यावन्न पुनरावतेतेऽधिकारवशाचित्तम्‌ इति ॥ १९. 

[ विरणम्‌ ] 
ञ स॒ खल्वयं दिविधः। सः निर्वाजः समाधिः उपायप्र्ययो मवप्रययशच । 
उपयेन प्रतीयते प्राघ्यत इध्युपायप्रययो योमिनां भवति । यपि विदेह। अपिं 
योगिन एव । तथापि यमादियोगपताधनानुष्ठायिनोऽभिप्रेताः । तेषां श्रदवावीर्या- 
युपायलम्थः समापिः ॥ 


विदेहप्रकृतिख्यानां तु जन्मनैव रम्यः । तेहि तनुतरप्रतिबन्धावशेष।ः । 
स ` तु. प्रतिबन्धावरोषस्तेषां सञृदासादितपुनजेन्मनां समाधिव्याघाताय न 
परीप्रोति । स तु जन्मप्रतिखम्भमत्रनिभित्तम्‌ | (त्वात्‌ )्ञानेराग्यायनुष्ठान किला - 
द्िदेहध्रकृतिरुयत्वस्य तदनुष्ठानस्तुय्थं सूत्रम्‌ । इदस हि तदनुष्ठानमाहात्यम्‌ । 
यदुत सामर्थ्यादिवैकल्यादभप्तितफलानवाप्तावपिं ` महनीयतरं विदेहप्रकृतिखयत्व 
प्राप्यते ॥ 


विदेहा नामः देवाः पुग्रष्टकरादरेपव्न्धाः । ते स्वसंस्कारमात्रोपभोगेन 
वैराग्याम्पासाहितः सेस्काररेषस्तन्मात्रोपभोगेन चित्तेन कैवस्यमिहानुमवन्त 
इति । सखगुणविनिभोकात्तथाज।तीयकं  स्वसस्कारपरिपाकं क्षपयन्ति ॥ 


~ प्रकृतिलय: साधिके अपथवर्तित।[धि]क)रे । यावद्धि न कृत। 
गुणपुरुषान्तस्ट्यातिः, ताव्रदपरिसमाप्त।धिकारमेव चित्तं `तस्िन्‌ प्रकृति- 
यापने कैवल्यमिवानुमभवन्तीति । पूर्ववत्‌ । यावन्न पुनरावतेतेऽधिकार- 
वरात्‌ व्रियाकर्तन्यताव्रात्‌ :तावदनुभवन्ति केवल्यमिव ॥ १९ ॥ . 


सभाधिषादः प्रथमः ५५१. 


सूत्रम्‌ ; 
श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूवेक इतरेषाम्‌ ॥ २० ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
उपायप्र्ययो यमिनां भवति । श्रद्धा चेतसः सम्प्रपादः । साहि 
जननीव कल्याणी योपिनं पाति । तस्य हि भ्रहषन्य विवेकार्थिनो वीये- 
मुपजायते । समुपजातवीयेस्य स्प्तिरपतिष्ठते । स्ृत्युपस्यनि च चित्तमन- 
कुठं समाधीयते । समाहितचित्तस्य प्रज्ञाविवेक उपावतत, येन यथाथ वस्तु 
जान।ति। तदभ्यासत्तद्िषयाचच वैराग्यात्‌ अपम्भज्ञातः समाधिभवति॥२०॥ 
ते खलु नमर योगिनो मवन्ति मृदुमध्याधिमत्रापायाः। तथथा--. 
मृदुपायो मध्योपरयोऽपिमात्रोपाय इति । तत्र मृद्पायलिविधः-- 
मृदुसंवेगो. मध्यसंवेगस्तीवरतैपेग इति । तथा मध्योपायस्तथाऽषि- 
मात्रोपाय इति । तत्रापिमात्रोपायानाम्‌-- ` 
[| विवरणम्‌ ] 
येषामुपायप्रल्ययो योगिनां, तेषां श्रद्धावीयस्मृतिसभाषिप्रज्ञापू्कः 
समाधिः, श्रद्धा नामापवरगप्रततो तत्ताधनश्रवणे च कतकफलपपर्कं इव 
सलिलत्य चेतसः [सम्प्रादः] सेप्रपत्तिः। सा हि जननीव कल्याणी योगिनं 
पाति रकषवयञचभेभ्यः। तस्य हि विवेका्िनः सम्यग्दरीनाधने। वीर्यम्‌ उत्साह 
उपजायते योगप्ताधनावुष्ठानं प्रति । सञ्जातवरी्यस्यागमज्ञानादिषिषया दृढतया 
स्मृतिरपतिष्ठते । विवेक।यिन इति सवत्रानुप्रञ्यते ॥ | = 
टृदस्मृत्युपस्थाने च चित्तमनाकुठं समाधीयते । समाहितचित्तस्य 
्र्ञाया बुद्धेः विविक्तता सर्वाचप्रकारानताम्यम्‌ । त(था)त्‌ विशिनष्टि- 
येन यथामूतम्‌ आल्मादि वस्तु जानाति इति ॥ 
दभ्यसात्‌-- एतदुक्तं भवति--अ(त्मदशंनविरामप्रस्ययाम्यास्तादिति ।. 
तदिषयाञ वेरारया(्यादिषया)त्‌ परस्मद्विराग्यादिति .। अपभ्प्रज्ञातः 
समाधिः इति ॥ २०॥ 
तेऽपि श्रद्धादिमनाधना नव “नुपोयोगिनो भवन्ति । तहरीयति.- तद्यथा: 
मृद्पायो मध्योपायोऽषिमात्रोपाय इति । तेषाेकैकल्षिधा भिघते-- तत्र 
मृदुपाय इति। साधनानुष्ठानं प्रति मन्दोपक्रमे मध्योषक्रमः ती(नकषतरेगो)त्ोपक्रम,. 
इति । एवमितरत्रापीति । नात्र तिरोभूतम्‌(त्‌) ॥ | । 


५२ पातञ्जख्योगसूत्रभाष्यविवरणे 


[ सूत्रम्‌ । 
तीत्रसंवेगानामासन्नः ॥ २१ ॥ 
भष्यम्‌ ] 
समाधिलाभः समाधिफ़टं च मवति इति ॥ २१॥ 
सूत्रम | 
ग्रदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेषः ॥ २२ ॥ 
[ भग्यिम्‌ ] 
मृदुतीमो मध्यतीत्रोऽधिमात्रतीत इति । ततोऽपि विशेषः 
तदिशेषादपि, मृदुतीव्रहवेगस्यासन्नः;, ततो मध्यतीत्रसंवेगस्यासन्नतरः, 
तस्मादधिमात्रतीव्रपषवेगस्याधिमात्रोपावयस्याप्यापन्नतमः समाधिलामः 
समाधिफरठं चेति ॥ २२॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
किमेतस्मादवासन्नतरः समाधिभेवति, अथास्य कमे भवलन्योऽपि 
कथिदुपायो न वा इति- 
[ सूत्रम्‌ | 
ईश्वरप्रणिधान ¦ २३॥ 
[ विवरणम्‌ ] 
तत्राभिमत्रोपायानां तीत्रस॑वेमानामासन्नः समाधिरामः समाधि 
फलं च ॥ २१॥ 
तेषामपि मृदुमध्यतीत्रोपक्रमतया विरशिष्यमाणलवत्तते(ऽपिविशेषः 
साधनानुष्ठानसंस्कारस्य | तद्िशेषादपयुत्तमस्य समापिखामः प्रस्यासीदतितयम्‌ ॥ 
एतदस्य सूत्रस्य प्रयोजनम्‌ योगप्ताधनाुष्ठानं प्रति योगिनः कथमुपव्रहितो- 
त्साहा भवेयुरिति । यथा लेके हुततरं सीमान्तं परिप्रति]धावतमितत्फरं 
भवतीति तद्त्‌ । अथवा- मन्दमन्देतदेपक्रमाणामपि योगिनामभिमतफडावप्ति- 
प्रकाशनादनसनचेतसतः प्रवर्तरन्निति । इतरथा तीनरतरायास्तजनितमीतयेोऽवीदे- 
युरिति ॥ २२॥ | 
किमेतस्मादेवाप्नतरो भवति ! अथ (तस्व) अस्य कमे भवः 


न्योऽपि कश्चिषुपायो न वेति । उपायान्तरमस्तीत्याह-- ईेथरप्रगिषानद्वा । 
ृरशष्दारथपुत्तरत्र म्याद्यास्यति । प्रणिधान॑मिह व्याचे-भक्तिविशेषा- 





समाधिपादः प्रथमः ५३ 


[ भाष्यम्‌ | 
[घ [क ९ ४१५ मि 
प्रणिधानात्‌ भक्तिविरोषादावर्जित ईरः तमनुगह्णायभिध्यान- 
मत्रेण । तदभिष्यानमात्रादपि योगिन आपन्नतरः समाधिलाभः 
स॒माधिफटठं च भवति इति ॥ २३॥ 


अथ प्रधानपुरुषव्यतिरिक्तः केऽयभीश्वरो नामेति । 


[ सूत्रम्‌ | 
देशकमविपाकारायैरपरागृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥ २४॥ 


[ भाष्यम्‌ | 
अविद्यादयः शाः । ईशलाङ्कश्राति कमणि । तत्करं 

विपाकः । तदनुगुणा वासना अशयाः। ते च मनसि वतमानाः 
पुरुषे व्यपदिश्यन्ते । सहि तक्फठस्य भोक्तेति । यथा जयः 
पराजयो वा योद्धृषु ततेमानः स्वामिनि व्यपदिश्यते । यो ह्यनेन 
भोगेनाप्रामृष्टः स पुरुषविशेष ईरः । 

[ विवर्णम्‌ ] 
द्‌ावर्जित इति । अनुग्रहं प्र्मिमुखीभावमपादितः तं मक््यतिशययोमिनं योगिनम्‌, 
अमिध्यानमात्रेण परमेश्वरत्वदिव् निरायासतया सप्यसंकल्पत्वात्‌ अनुगरृह्णति । 
तदनुग्रहादपि प्रल्याप्रज्नतरः समाधिलाभः फे च इति ॥ २३ ॥ 


अथ प्रधानपुरषव्यतिरिक्तः कोऽयमीश्वर इति सांस्यशान्ञे प्रसिद्ध 
मावादीश्वरसद्भवि चेपपत्तिमवदईयमनवगतेश्चरवरिशेषो वा पृच्छति । तत्र तावत्‌ 
प्रतिजर्नति-ङ्धेरकमेविप।काशयेरपरामृष्टः पुरूपविरोष ररः ॥ 


छ्ेश। इति। अविधयादयः हशयन्तीति ढेशाः। तपूर्वानुितानि कुशला- 
कुरालानि कमणि । कुशखानि चङ्ुशलनि [च ऊुशकुरखनि] 
चेत्येकशेषः । कुरशट कुराानीति कुशककुश्विभिश्राणीति यावत्‌ । त्फटं 
विपाकः जात्याघरुमोगलक्षणः । त एव ङ्केशादय अ। निव(गच्छेरत इति शकः 
विपाका आद्याः । यदि वा इ्रादीनां रारापः कशकमविपाकाराय।ः ॥ 


ते मनसि वतमाना मनोदृत्तिप्रमवलात्‌ पुरुप व्यपदिश्यन्ते । 


च चे, (न 
कस्मात्‌ £ सु हि तत्फर्स्य भोक्तेति । यथ। राजनि जयपराजयौ योधेषु 
वक्षमानत्रपदिश्येते तत्फरं राज्तबन्धि इति ॥ 


५४ पातज्ञलयोगसुत्रभाष्या्िवरणे 


१ [ भाष्यम्‌ | 

केवल्यं प्राप्तिं ? सन्ति च बहवः केवठिनः । 

ते हि त्रीणि बन्धनानि च्छि्ला कैवल्यं प्राप्ताः । ईश्वरस्य च 
तत्सम्बन्धो न भूतो त भवी। यथा मुक्तस्य प्रौ बन्धकोटिः 
प्रज्ञायते नेवमीश्वरस्य । यथा वा प्रकृतिलीनस्योत्तरा बन्धकोटिः 
सम्भाव्यते नेवमीश्वरस्य । स तु सदैव मुक्तः सदेकेधर्‌ इति । 

योऽप्तौ प्रक्ृष्टसच्वोपादानात्‌ ईश्वरस्य शाश्वतिक उर्कषः, स 
के सनिमित्तः! आद्दोखित्‌ निनिमित्तः? इति- तस्य शास्रं निमित्तम्‌ । 
नि , { विवरणम्‌ ] 

या यनेन मोगेनापराभृष्ट हति उच्यते । न क(ठविवक्षा, 
उपटन्नणाथल्ल- न्‌ परामृश्यते न्‌[पि परामृ्ष्यते न[[प प्रराबृष्ट इ।त | शकम 
` विपाकाडय्यसबन्धी(न्धयेगी)त्ययः ॥ 


[१ 


सूर यविदद दुर्वनाह-केवव्ये प्राप्तस्त्हीति । छेराधपरामरौस्य 
कादाचि्कतयाऽपि सैमवात । सन्ति बहवः केषलिनः किं तदी[तिऽपी]घरा 
इति ? । परामर्शस्यापि संभवान्न त ९कान्तेन क्शादिभिरपरामृष्टाः । परामरापरामरशौ 
हि स्तः तेषाम्‌ । शशरप्वपरामृ्ट एव । न द्यनवधृतः शब्दार्थो लक्षणव्वेनो 
पायः अपरामृष्ट इति । तसमाध एकान्तेनापरामृष्टः स एवापरामृष्ट ह्युच्यते ॥ 


“` तेहि त्रीणि बन्धनानि प्राङृतवैकृतदा्िणानि सभ्यग्दरशनेन हित्वा 
कैवल्यं प्रा्ठाः । ईश्वरस्य तु तत्तबन्धः छेशादिसेवन्धो न भूतो यथा मुक्तस्य 
वा बन्ध रोरिधुक्तसोपपतेत ज्ञायते। । बन्धपूर्विकरा हि सुक्तिः। नापि भावी। 
यथा प्रकृतिलीनस्य । तस्य ह्यनारन्धसंसारस्य उत्तरा बन्ध कोटिः सम्भाव्यते । 
 प्रवृत्तसंसारस्य चाप्रकृतिखीनचित्तस्य सा(समा)धिकारत्वात्‌ पूर्रोत्तरबन्धकोदी 
समवतः । तदिदं सर्वमत्रपरागृष्ट इति काठाविवक्षप्रदरौनार्थम्‌ । स तु पदैव 
मुक्तः सदे वेश्वरः ॥ 

तत्र पुरुषविशेष ईश्र इत्युक्तत्वात्‌ , ईश्वरस्य पुरुषस्थानैखर्यपमलात्‌ , 
चित्तस्य चैश्व्यधर्मलात्‌, निरातिरायेश्््य च प्रकृष्टचित्तसबन्धपेक्षत्वात्‌ 
व्रा्तमेवेत्तराधपरुवदति-- योऽपो कृष्टपच्वापादानादीश्वरस्य -शाश्वतिंक 


[¢ 


उत्क इति । नित्यनिरतिशयसव्ञनैशयेराक्तिसम्पत्तिरेकषः ॥ 


समापिषादंः प्रथमः ५५५. 


[ भाष्यम्‌ ] 
शास्त्रं पुनः किज्निमित्तम्‌ ? प्रकृ्टपर्वनिमित्तम्‌ । 


[ विवरणम्‌ | 
तत्र प्रतिज्ञाविशयद्धवयं प्रन्नपूर्षमुपक्रमते-- प फ सनिमित्त आहोस्वि 
त्रिनिमित्त इति । निमित्तशब्दः कारणपयौयः । स किं सकारण अहेस्वि- 
निष्कारण इति । किंश्चातः १ यदि तावत्‌ सकरारणस्तदा सदैवेश्वर इत्ययुक्तम्‌ , 
अनिदयघ्वात्‌ | अथ निष्कारणः, तथा चोत्कर्षस्य कायत्वादसत्वप्रसङ्घः । 
न हि निष्कारणं काथ द्दयते लोके ॥ 


चत्रोच्यते-- न निष्कारणः शाक्ञतिमित्ततात्‌ । शाक्ञ ज्ञानम्‌ । रालस्य 
हेतुत्वात्‌ । यतः सर्वविषयं ज्ञाने नित्यं दरन्यस्वमावत्ताध्यसाधनभ्यवदहित- 
विप्रकृष्ट स्षदम्‌ ॥ 

ययेवं ज्ञानस्यान्यतोऽधिगमपूवैष्वास्रागनुर्कषः प्रतत इत्यत आह- 
दाख पुनः किन्निमित्तमिति । यदि स्वाभाविकं ज्ञानं, मततोन्मत्क्ञानवदनुत्कर्ष- 
हेतुत्वम्‌ । अथ पुनः सनिमित्तकं, निमित्तात्‌ प्रागनु्कध इति मन्यते ॥ 


न तावनिर्निमित्तम । यतः प्रकृष्टस्वनिभित्ते ्रकृ्टसतत्वाश्रयमिति 
यावत्‌ । अत एव स्वभवज्ञानदोषमावः ॥ 


किञ्च- स्वाभाविकज्ञानसेऽपि न मत्तादिज्ञानवदपकषहेतुत्वम्‌ । नित्य 
मक्त्केशादिसच्ाश्रयत्रात॒ । तत्र यथेव . ज्ञनपेस्कारस्मृतिप्रवन्धानानन्येन्य्‌- 


| 

निपित्तनैमित्तिकमव्रेन बीजाङ्कुरषदनादिसंबन्धः, तथेव २ जप्रकैयोरीश्चर- 
चेतति नित्यप्रबृ्तप्रबन्धख्पेण प्रवतमानयोरनाचन्तः संबन्धः । तत्रेत्कर्षो ज्ञानस्य 
करायमेव । ज्ञानमपि तस्य कारणमेव ॥ _ 


अन्येषां! व्य्यानम्‌- निमित्तशब्दः प्रमाणवाच । तस्य श्चास निभित्ते 
प्रमाणम्‌ , तेन हि तदुत्कषेः प्रमीयते । दाः पुनः विप्रमाणकम्‌ ! .ईंरनिर्म- 
सखप्रमाणम्‌ । विडुद्धत्खप्रणीततवाद्धि शा्ञस्य प्रामाण्यम्‌ › यथ। मन्वादीनाम 
तथा च श्रुतिः श्यकिचिन्मनुरम्यवदत्तद्वेषजम्‌" इति । यथा. च छेके 
गुरणाऽभिहितीमति ॥ ` क ५ 
व्याख्यातारः । : ` - ए ` 


५8 पातञ्ञटयोागसूत्रभाऽयविवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
एतयोः शान्नोकरषयोरीश्वरसच्वे वतैमानयोरनादिः सम्बन्धः । 
एतस्मादेतद्धवति- सदैवेशवरः सदैव मुक्त इति । तच्च ॒तध्यैशव्ष 
साम्यातिशयनिनिगरक्तम्‌ । न तावदेश्वयन्तरेण तदतिशय्यते । यदेत्रातिशायि 
स्यात्तदेव तस्स्यत्‌ । तस्मात्र कष्ठाप्रा्िरेर्थस्य स ईश्वर इति । 
न च तत्समानमेश्वयंमस्ति । कस्मात्‌ १ दयेोस्तुल्ययेरेकस्मिन्‌ युगपत्‌ 


[ विवरणम्‌ ] 
एतयोः शाक्ञत्कपैयोः प्रमाणप्रमेयतया निराचन्तः सम्बन्धः ॥ 
ननु च नेवेश्वरसच[आ]र्तमानेन शान्ञेण तदुर्कर्षैः प्रभीयते । नैष दोषः । 
तस्प्रभवत्वात्तत्र वेत॑मानम्‌ । वरत(मान)त एव तल्रमवमपि शाज्ञं तस्मिन्‌ 
सर्वज्ञसवदेव । ठोकेऽपिं यते यत््रभवति वर्ते तत्तस्िन्‌ , यथा तन्वादिष पटादि । 
तल्मभवत्वमनुमानागमाम्यामवगम्यते । शाक्लप्रमाणकः उत्करैः, ईघरप्रमाणकं 


न कभक 


शाल्नमिति भिनाश्रयत्वाच्छाक्लोव्कर्षयोर्नेतरेतराश्रयत्वम्‌ ॥ 


ननु च उाह्ञादीश्वरपरामाण्ये, तघ््रामाण्याचच साच्प्रामाण्यमिति स्यदन्यो- 
न्याश्रयत्वम्‌--उष्यते-{श्वरप्रामाण्यस्यानुमानेन सिद्धव्वाददोषः ॥ 


एतस्मादेतद्धवति । कस्मात्‌ ! ईरपरकृष्टसच्ाश्रययेर्निरतिशयक्ञानो- 
त्करषयो; कायैकारणद्ये प्रवन्धनिलतया नि्यवदेतद्भवति--स तु सदेव मुक्तः 
सदैवेश्वर इति । (इयतराह) तच्च तस्यैश्वयं॒साम्यातिशय वियुक्तमिति 
वक्ष्यमाणव्रमाणफलम्‌ । एतत्सूत्रपिण्डार्थो वा ॥ 

अतिरायविमुक्ततां व्याचे-- न तावदैशर्यान्तरेण तद तिशय्यते । कुतः? 
यदेवैशवर्यान्तरं तद तिशयानं मन्यते तदेव तत्‌ रें मथाऽमिदितम्‌ । कतरैवे- 
शर्यन्तरातिशायि भवधयश्वै स एवेश्वर इति यावत्‌ । न च तत्समानमेशर्व- 
मि । समानधमप्रकषोसेमवात्‌ ॥ 

न द्येकस्मिन्‌ रथ्ये दयोः समवो रज्ञो; । एकस्य वा दवै र्ये । तथा 
प्रतिपादयति- तदृदरयेस्तुल्पलवं प्रसक्तम्‌ । न धेकः्यान्यतसत्र प्राकराम्यमनाधित्वा 
अन्यतरसिमन्‌ प्रवृत्तिरुपपद्यते । दयेश्च युगपदेकाथयोरेकस्य प्राक.म्पेण श्रचत्तितव 
नास्ति | प्रकामिते वस्तुनि समानप्रकर्षस्याथस्य विरुद्धत्वात्‌ । येन च समानव्रकषेता 
तस्य तेनैव स बध्यते | (तेच) तच्च न वाचा बाधर्नमितरध्य खूपातिराया 
आद्ृस्यतिरायाश्च विरृध्यन्ते । सामान्यानि लतिशयेः सह्‌ वतन्त इति वक्ष्यामः ॥ 


समाधेपाद्‌ः प्रथमः ५५७ 


[ भाष्यम्‌ ] 
कामितेऽयै गवमिदमस्त॒ पुराणमिदमस्त॒ शइयक्स्य सिद्धो इतरस्य 
प्राकाम्यविषाताद्नलं प्रसक्तम्‌ । द्वयोश्च तुल्ययोयुगपत्‌ कमिताये- 
्राधषिनासि । अर्थस्य विरुद्धत्वात्‌ । तस्मात्‌ यस्व साम्यातिशवे- 
विनिधक्तमैश्वयं स एवेश्वरः । स च पुरुषविशेष इति ॥ २४ ॥ 
[ सूत्रम्‌ | 
त॒त्र निरतिशयं सवंज्ञबीजम्‌ ॥ २५ ॥ 
[ भाष्यम्‌ ] 
कि --यदिदमतीतानागतप्रलयतसन्प्रयेककषुचयतीन्दरियग्रहदणमल 
घहिति सर्वज्ञवीजमेतदविवधैमाने यत्र निरतिशयं स सवैज्ञः । भसि 
काष्ठप्राप्षिः सवज्ञरीजस्य, सातिशयस्वात्‌, परिमाणवत्‌ इति । 
यत्र काष्ठाप्रा्िज्ञीनस्य स सर्वज्ञः । घ च पुरुषविशेष इति ॥ 


[ विवरणम्‌ ] 
तसाधस्य साम्यातिङयविप्रोषितमैश्ययं स रर इति प्रधानपुरुष- 
व्यतिरिक्तः पुरुषविरोष श्वरः सिद्धः ॥ २४ ॥ 


यथप्रतिज्ञातस्येश्चरस्य सिद्धो प्रमाणमुपन्यस्यते- तत्र निरतिशयं स्वै 
ज्ञबीजम्‌ । तत्र तस्मिन्‌ यथप्रतिज्ञातलक्षण ईश्वरे निरतिशयं भव्रितुमर्दति । 
करं तदिति ? यदिदम्‌ अर्न्यमि चारि प्रलक्नातुमानज्ञानम्‌ अतीतविष्रयम्‌ अनागत- 
विषयं (वतेमनकालगप्रस्युसन्न[बिषय]मतोतदि पमुच्चयविषयम्‌ अतीद््िय- 
विषयं च । अतीद्धिययोरतीतानागतयोः सभव।दतीन्दिय[ग्रहणा]मिद्युच्यते ॥ 


तच्चातीन्दियग्रहणं त्रिविधम्‌--सुक्ष्मविष्रयं व्यवहितविष्रयं विप्रकृष्ट 
विषयश्च । अल्पं बहति । यथप्रतिद्धमेतद्विव्मानं सातिरायतेन सर्वैज्ञवीजं यथा 
धूमविज्ञानमभ्निविज्ञानस्य । कथम्‌ १ यत्र प्रकपकाष्ठ प्रतिपधते । ज्ञानस्य ज्ञत्रा- 
श्रयघ्रात्‌ यत्रेति ज्ञातोच्यते--यसिन्‌ ज्ञातरीति । स॒ सृप्रज्तः सिद्धः॥ 


तथा शक्तिरपि सातिशयेन विवधमाना यत्र काष्ठां भ्रपोति, प 
सवेशक्तिः । तेन जगननिमीणस्थापनोपपंहारादिकतृखसतिद्धिः । तथेश्वयस्थापि 
वर्धमानस्य यत्र काष्ठाप्राप्तिः, स परमेश्वरः । ततश्च अशाक्त्यादिविपर््यदोषा. 
भवसिद्धिः ॥ 

8 


५८ पातञ्ञखय।गसूत्रभाष्यविवरणे 


अथापि स्यातू--अज्ञानस्यापि `विवर्धमानस्य स्वमवसिद्धस्य काष्ठा- 
प्राप्तस्य तस्मिननीश्वरे सिद्धिरिति-न--ज्ञानषिरोषात्‌ । न हि ज्ञानज्ञनयो- 
विरुद्रयेरेकसमिनभिसंयेगोऽस्ति | न हि ज्ञनि प्रकषेवति तत्राज्ञानं संभवति ॥ 


यत्र हि अयोतिर्विवधते तत्र तमे।ऽपकृष्यत एव । विपयैयोऽपीति चेत्‌- 
तच्च न- सति ज्योतिषि तमकोऽनुपलम्भात्‌ । व्रियमानं हि तमो अ्योतिषा 
तिरस्ियते, न कदाचिद्धिधमानं अ्योतिस्तमसाऽभिभूयते ॥ 

यदपि जल्धरोपरोषात्‌ प्ादृषि खेरददीनम्‌ , तदपि दृष्टिन्यवधानमत्रम्‌ | 
न पुनः प्रकारा एव तिरोधीयते तमेावत्‌ । तस्मान, यत्र क्ञानविव्ृद्धिस्तत्राज्ञानस्य 
मावः सवितरीवर तमसः । निदयाघ्यन्ततिरोहितस्जस्तमेगुणप्तच्वोपादानात्‌ ॥ 

किश्च-- नात्ञानस्यावरस्तुविषरयताद्विबृद्धिः संमव्रति । ज्ञानस्य ज्ञेयवस्तु- 
विषयत्वादभिच्द्धचुपपत्तिः । अज्ञानस्य हि वस्तुविषये ज्ञानतप्राप्िः ॥ 

यश्चापि स्यावरादिषवज्ञानप्रकषे इति, नाततौ प्रक; । अ्यन्तज्ञानामावा- 
पक्षया हि स उच्यते | अह्नस्य प्रक्ष हि सलयज्ञानसहल्तस्य न ज्ञानेनैकेन 
बधः स्यात्‌ । तथादि]हि प्रल्ञानं ज्ञनेनेष्पनेनानेकेन नाधनं स्यात्‌ । तस्माना- 
ज्ञानस्य प्रकर्षः स्वरूपेण ॥ 

यस्य हि सातिशयं तस्य काष्ठप्रापि्सयते । यथा फठादिपस्िणाना- 
माकाशपर्न्तता । तथा स॒तैज्ञनीजमपि परां काष्ठा प्रप्तुमह॑ति ॥ - 

समस्तं व्यस्तं च स्थं वस्तुजातमेकस्य प्रयक्ष, ज्ञेयत्वात्‌ , घटादिवत्‌ ॥ 

ज्ञान विषयत्वेन पुरु्राधत्वात्‌ , घटादिवदेव ॥ 

उत्पत्तिमती च परथिवी, सावयक्तर(त्‌ , षटादिवत्‌ ॥ 

प्रणिक्मैततसाधनफलविभागविदेक(गधैक)निष्पादितं जगत्‌ , तदुपभेग्य- 
स्थान।दिरचनाविशेषकव्खात्‌ , प्रा्तादादिवत्‌ ॥ 

अनेकप्राण्युपभोगविज्ञानवदेकनितिता प्रथिवी, अनेकप्राणवदुप- 
भोग्यत्वात्‌ › बीहियवादिवत्‌ ॥ - 


अनेकप्रयोजना्थिना एकेन निर्मिता परथिवी, गृहादिवदेव ॥ 


सर्व्रण्याश्रयो गिरिनिदीपमुदायः तन्निवाक्षिपस्िगयेग्यविज्ञानवदेक- 
कुराखेत्पादितः, प्रकृतदेतुनिदरोनाम्यामेव ॥ 


समाधेपादः प्रथमः ५९ 


अनेकप्राणमकूप्रकादादिसामथ्यज्ञानवता शएकेन निवेतितः सवितः, 
प्रकारा्मक्रलात्‌ , प्रदीपादिवत्‌ ॥ 


नियतकालमादिव्योदयास्तमयादिसश्चरणम्‌ पएतत्थ्रयोजनज्नानवदेकप्रयुक्त, 
परतिनियतकाठत्वात्‌ , कृष्यादिवत्‌ ॥ 


ुद्धिमदेकेरपरयुक्ता सूर्थप्रदचन्द्रनकषत्रादि ्रहृत्तिः, प्रबृतेदःखास्मकवे 
सति नियतसमयघवात्‌ , ध्रिष्यमृद्यादिशदृत्तिवत्‌ ॥ 


चन्द्रमसो वृद्धिक्षयौ तिध्यादिकालक्ञानवतकेन प्रयुक्तौ, कालपरष्छिद 
कत्वात्‌ , धटिका[हिरा,दिवत्‌ ॥ 


कारपलिनठेदज्ञानवतैकेन निर्वर्तितशवन््रमाः, दृद्धिक्षययुक्तताव्‌ , 
` धटिकादिषदेव ॥ 


बुद्धिमदेकस्वामिकं अगत्‌ , अन्योन्यविरुद्धसंहतनेकप्राणिन।यकाषिष्ठित- 
बहुमण्डलत्वात्‌ , इत्थजातीयककराञ्यवत्‌ ॥ 


सप्रमेतत्साधनसाप्यन्य(पारावरस्येप्रद्यक्नं कस्यचिदेकस्य, अवान्तरत्रिरोधानु- 
प्रहवत्तयेकग्रयोजनतरात्‌ , सांभ्रामवस्तुवत्‌ ॥ 


सेहतत्वात्‌ , कुखाडादिवस्तुवत्‌ । सेव प्रतिज्ञा ॥ 


युमपच्च सव प्रलक्षमेक(त)प्य, अनेकते (त्व) सलयन्योन्य्बन्धात्‌ , 
परसिद्धसम्बन्धानेकाथैवत्‌ ॥ 
अश्नित्रादिसाधनसधनीये कस्यचिस्मलक्षे, साप्यक्ताधनरूपलात्‌ , 


[ चि $) 


मुजितृक्तिवत्‌ ॥ ध 
सवो; शक्तयः कस्यचित्‌ प्रद्यक्षाः, वस्तुलात्‌ , घटादिवत्‌ ॥ 


अ[वान्तरप्रतिन्धामावे सर्वं वस्तुजातं नैरन्तर्येण कस्थचिव प्रयक्ष, 
डान्दादिम्वेन सम्बन्धात्‌ , द्राषीयत्तीमिव शष्डुरीं मक्षयनः शब्दादयः ॥ 


स्वतन्त्रतया केनचिदेकेन सव प्रसक्षत उपरम्यते, ज्ेयतवेनाभिमतत्वात्‌ , 
नाख्यवस्तुवत्‌ ॥ न ~ -.;:5 


1 


अप्रतिबन्धेन कस्यचित्‌ श्र्यक्षोपरुम्यं सर्वम्‌, :अनेक(स्ते)ते 
सलयन्योन्यसंवन्धात्‌ , नाव्यत्तबन्धिनर्तकादिवत्‌ ॥ ` --- > ~. 


६० पातन्ञटयोगसूत्रभाष्यविवणे 


सेसाररहितः सहः, अज्ञानामाबात्‌ , मुक्तासवत्‌ । छेदादिरहित ररः, 
अप्रतिबन्धज्ञानल्वात्‌ , सिद्धयोगिवत्‌ ॥ 


एतेन देशादिग्रतिबन्धाज्ञानरदहितघेन चक्षुरादीद्धियप्रामनि पेक्षपर्ब- 
विप्रयज्ञानवं सिद्धम्‌ । स्वाधप्रहणत्मथस्य परमेश्वरचित्तस्य सवव्यापिनो 
युगपत्््षविषययेोगित्रातु । ९वं सति समस्तवस्तुग्रहणामवि कारणामा(बानु)- 


बोपपतिः ॥ 


नापि मूर्तिमल्रतिवन्धोऽप्याकाशवदेव सर्वविषययोगिनोऽपि चित्तस्य | 
विषयानवस्थानादाविभावतियेभावस्पृतिसकल्पानवस्थितत्वोपपत्तिः । विषया- 
कारतया बृत्तिखाभादर्कप्रमावत्‌ ॥ 


न हि ज्ेशाघयावरणवच्छनं चित्तसत्म्‌ , तस्याधर्मादियोगात्‌ । सर्वगतस्य 
स्वार्थस्यापि सवस्याधर्मादिप्रतिबन्धकनिरुद्धस्वकीयप्रवृत्तिमार्गत्।दिन्दियादि- 
दरारपिक्ित्वमुपपयते । यथा अपवरकाधावरणाद्रतः प्रदीपस्तदावरणगत- 
च्छिद्रदरिण बहिः प्रकादायति | प एव तु प्रदीपः प्रमिन्नापतरकत्ररणः सन्नन- 
पक्ष्य तत्तच्छिद्रमा्गं समन्ततः प्रकाशयति ॥ 


तथेवेश्वरस्षख डशावावरणयेोगाभावाद सति विषयत्रिरेषनिरोधिकारणे 
युगपदरेषाथंग्रहणम्‌ । ततश्च स्वातिलङ्खनानतिरङ्कनादिदोषामावः ॥ 

सर्व॑स्य विषयत्वात्‌ सकमेकेश्वरं जगत्‌ , परिपाल्कपेक्षस्थानायनेकवस्तु- 
विरोषत्वात्‌ , प्रसिद्धवंभूतेकराञ्यवत्‌ ॥ 
तथा, नियतस्थितिद्वतनकेपकरणवच्ात्‌ , अन्योन्याभिमवनीय- 
प्रमूततरदुगैयुक्तनिकदेरालात्‌ , अभङ्गुरन्यवस्थशरीरभेदवस्वाच्च, प्रतीतेव॑- 
विधेकराञ्यवत्‌ ॥ 


अनेककर्तूमोक्तृक्रियासाधनफठप्बन्धविरेषज्ञ।नवदुपदिष्टानि वणश्रमा- 
पनुष्ठानानि, फलार्थिभिः प्रलवायभीरमिस्तश्वायुषठायमानत्वात्‌ , भेषञ्यरसायनाथ- 
नुष्ठानवत्‌ ॥ 


तथा तदुपदेशाः) परथेतरात्‌ , उपदेशात्‌, विद्रन्छुद्धेयत्वात्‌ 
 उपदेशाइते भदुभ्यानवगम्यात्वाच, भेषञ्यायुपदेरावत्‌ ॥ 


शरीरेन्द्रियाणि सवेतस्रयोजनविदेकनिमित्तकारणामिनिप्र्तितानि, नियत- 
क्रियास्थितिद्ेतुसाघनवस्वात्‌ , प्रसादगृदद।रुयन्त्रादिवत्‌ ॥ 


समाधिपादः प्रथः & १ 


नियतप्रयोजनरचनावचाच, तद्देव | 

तथेन्दियाणि, करणात्‌ , वासीब््षादानादिवत्‌ ॥ 

तथा स्र, कयनियतेपादानल्वात्‌ , मेक्त्र्थत्वात्‌ › भोगसाधनत्वाश्, 
घटादिवत्‌ । उत्पत्तिमेऽप्येते हेतवः ॥ 

एव ध्यमपसिणत्वात्‌ , अनेकविनारहेतुसब्रन्धयोग्यत्वात्‌ , 
भोगाधिष्ठानलात्‌ , क्रियाफलपसाधनतदरूपादिमसराच) आअधीयमान।पचीयमानपूरय- 
माणापनीयमानदद्यमानमिधमानानेकदेरात्वात्‌ , विनश्वरी पृथिवी ॥ 

शरीरादिवन्श्चराणि पृथिभ्यदि भूतानि, अन्योन्यनााकराक्तिमखात्‌ , 
रान्चपुरुषदिषत्‌ ॥ 

तथेव विरोधात्‌, पुरुषविपरीतत्वाच्च, उत्पत्तिविनाराधर्मकमाकारं, 
साक्षादुपकरणत्वात्‌ , घटादिवत्‌ बह्यन्दियग्रह्यगुणाश्रयत्वाच्च ॥ 

तस्मान्निरतिरायराक्तिज्ञनिश्वषैः परेश्ररः सिद्धः ॥ 

द ¢ + ज १. [@ 

अत्रोच्यत-ईश्वरशब्दाथः सवेज्ञो न भवति, प्रमेयत्ववस्तुत्वशब्दाभिषे- 
यत्वासत्रपाघनपेश्षोपछभ्धृष्वादिम्यः, अस्मद।दिवत्‌ ॥ 

ईश्वरशब्दोऽपि निरतिशयज्ञनयुक्तमिधायी न भवति, शब्दत्वात्‌ , 
घटादिरब्दवत्‌ ॥ 

सर्वजञपर्वेश्वरसू-यं जगत्‌ , अनेकप्राणिन्यपाश्रयलात्‌ , अन्योन्यविरुद्धाने- 
कनायकराञ्यवत्‌ ॥ 

भूतभविष्यत्काल्योरपि इदा्न।मिव सर्वज्स्यानुपटन्धारः सर्वप्राणिनः, 
प्रागित्वात्‌ › अस्मदादिवत्‌ ॥ 

वाचन्तरपारिकधस्पितः सर्वज्ञः सर्वश्रश्च नस्ति, अनुपलम्यमानत्वात्‌ , 
दाराविषाणवत्‌ ॥ 

तथा अपतवज्ञोऽनीश्वरश्च, अरशैरत्वात्‌ , सुक्तासवत्‌ । सशरीरशेद्धमी- 
धपेक्षरारीरते, तथा च संसारित्मस्मदादिवदेव । अशरीरसमेवेति चेलगत्कर्त- 
तवानुप्राहकवाधनुपपत्तिः, मुक्तत्निदशेनेन ॥ 

विरिष्टपरिभोगयोग्यजगद्रचनाविरोषोपपनत्तिः स्वभावादेव, कण्टकतीक्ष्ण ख 
कुमुदकमलक्तङ्कोचविको चादिवत्‌ । निशाकरदिवाकरत)रकादिगमनागमनाधपि 
स्वाभाविक, रोहायस्कान्तमणिवत्‌ ॥ 


६२ पातञ्ञलयोगसुत्रभाष्यविवरणे 


अत्रामिधीयते--सखामाविकी तावन्न भवति प्रयिव्यादिरचना । टृ्न्तो 
नेव तव्साधनस्य विधते | कण्टकादीनां च तिक्षण्यं न स्वाभाक्रिकमम्युपेयते ॥ 


अगन्यादीनामिवौष्णयादि स्वभावो वस्तुधर्मत्बाद्धेनोः ` परयिन्यादिरचनेति 
चेत्‌-- प्रासादादिस्चनाय। वस्तुधर्मवात्‌ स्यादनैकन्तिकत्वम्‌ ॥ 


अथ स्वामाविकल्वादिति चेत्‌- असिद्धम्‌, जगद्रचनाय। धमाीधमे- 
फलोपभेगायप्रयुक्तववाम्युपगमात्‌ । कतृधमाधमाप्तिमुपरिषटात्‌ स।धयिष्यते ॥ 


तस्मात्‌ प्रथिष्यादिप्चन। स्वाभाविकी न भवति, प्रण्युपभागाथलवात्‌ , 
प्रसादादिरचनावत्‌ । चन्द्रादिप्रबरत्तिनं स्वामाषिकी, प्रवृत्तितात्‌ , अस्मदादि- 
प्रवृत्तिवत्‌ ॥ 


अस्मदादिभ्रवृत्तिरपि स्वामाविकीति चेत्‌-न-- अग्नयुष्णल्वान्नेयव्‌- 
्रसङ्ग।त्‌ । न ह्यन्नयुष्णलं स्वाभाविकं सन्नियते निमित्तमात्मलभाय कांति 


धर्मिसत्तान्यतिरेकेण । क्रियाफर्रचनादीनां तु पिरिष्टनिमिचाका्घणमत्म- 
प्रतिरम्भयिति न स्वामाविकत्वम्‌ ॥ 


। नियतनिभित्ताका्वणमपि प्रास्तादादिरिचनानां स्वभाव इति चेत्‌-- 
अस्तु तथात्रिधस्वमावतम्‌ । तथाऽपि प्रथिन्यादिस्चनाया नियतनिमित्ताकाह्ण- 
स्वमावघ्वं प्रा्ाददिवदेव । ततश्च नान्न विप्रतिषत्तर्म दोषाय, कारकान्तरपि- 
कषत्वादिति प्रतिज्ञा प्रतिरूपकरिणी च ॥ 


भवद्धिरुक्तनि [भनुमानानि) लोकानुमागमविरोधात्‌ {अप्रमाणानि] | 
अनुमान विरोधं तावत्‌ सातिशयत्वादिम्यो ब्रमः ॥ 


आगमविरोधं च ५यः सवज्ञः' संवित्‌" “एकोः वक्ष” शेवमादिभ्यः 
समाचक्षपह ॥ 


{ 


समस्तलोकव्रिरोधंः चापि .।. सतै ` एवानाशनेपाठं संव्यवहरमाणाः सततं 
शिवनारायणादिनान्न प्रणिहितचेतसः प्रतिषेधत्सलपि संभिन्नवुद्धिष अकर्णीकितः 
तद्प्तिषरेधविषयपह्वा; परेश्वरं प्रणतमूधंनः कुषुमाञ्चटिप्रमतिमिः्चयन्ति 
फलं चापि तत एव प्राथयन्ते ॥ 


1. - मुण्डकोपनिषत्‌ 1, 1. 9. 
2. कठोपनिषत्‌ 5. 12. र 


समाधिपादः श्रथम॑ः. ६३ 


अथ चेदूनूयात्‌-- सव्ञाभावभ्रतिपादिभिरसमदयुमनिरितपरतिज्ञान। विरोध 
इति--अतरोच्यते-- 
, नैतान्यनुमानानि कथम्‌ १ प्रथमं तावत्‌ श्रनिङ्ञैव दुष्टा | यदि तावदीश्वर- 
राच्दाथः स्ज्ञे न भवतीति युष्मदभिप्रेत ईश्वर उच्येत, तथा. च 
सिद्धप्ाध्यता स्यात्‌ ॥ 


अयास्मदमित्रेतः, तथापि युष्माकमतिद्धत्रिशेष्यता भवेत्‌ ॥ 
अयेश्वरत्वस्यापवेज्ञतवमुच्यते, तथपि सिद्धं साध्यते ॥ 


तथेवाम्युपगमत्रिरोधोऽपि । कथम्‌ ? र्र्यसःरज्ञवीजत्वयोर्विवधमानलात्‌ 
काषठाप्रातिः पल्मिणवदेवाम्युपगमनीया । तथा काष्ठप्रततैश्चयैसवेज्ञतववाचिनावपी- 
श्ररसर्वज्ञशब्दवेषितव्यौ | काष्ठाप्रति श्च निरवधिकत्रम्‌ । यथा परिमिाणादीनमातसा- 
काराधनन्तपरिमाणन्तत्वम्‌ । तथा चानुमानाभ्युपगमस्ववचनविराधाः स्युः. ॥ 


किश्चान्यत्‌- काष््रपिश्चरत्वस्य च ङब्दार्भस्य परिद्यगे शब्दार्वादः 
प्राप्नोति ¡ न हि शन्दः पस्िक्तमिषेयेकदेडा उचरितः 


अथ परिमाणदेरपि निखधिकनिष्त्वे नेष्यते--सिद्धान्तविरोधः .-। 
आसाकाशादीनां हि सपरगतत्वामवि, मध्यमपरिमाणलानिव्यलादिदेषप्रसङ्गश्च | 
अथाप्यात्मनः सवत्र ॒कार्यदरोनात्‌ स्गतत्वम्‌, तत्रापि शकुन्याबाणनां 
मनुष्यगो चराकाशादिगतष्वे सामान्यतोद्टदेवानुमानात्‌ स्यात्‌ । तथा चेहापि 
सामान्यतोदृष्टानुमानघं केन वायते ॥ 


अथानुमानविरोघान्नावधार्य॑त इति चेत्‌--आध्मादीनामपि प्रमेयत्ववस्तु- 
त्वादिम्ः प्रयिग्पादिवदियनुमानविरेषेोद्धावना शक्यते [करम्‌ | वक्तुम्‌ । न-च 
तावताऽतरानुमानकिरोधितम्‌ , अनुमानमवप्रङ्गात्‌ ॥ 


तथा अनुमानाभाव इष्यत इतिं चेत्‌--प्रलयक्षेऽप्यनाश्वासतः स्यात्‌ । 
अथ निश्वीयमानबुदध युत्त; प्रद्यक्षप्रमाणलम्‌ , अदुमानस्यापि तर्हिं निशित- 
बुद्धिसमुद्धवादस्तु प्रामण्यम्‌ -। -अथ दृष्टतम्बन्धधूमादिविषयमेवानुमानमिति 
चेत्‌-तत्राप्यनुमानामाव एव-अनभ्चिः धूमवान्‌ प्रेदशः, प्रष्यक्नानुपठम्यमानाधि- 
सम्बन्धे सति प्रदेरव्वात्‌ ,. अप्निद्यन्योपलम्यमनप्रदेरावदिति ॥ 


अथ प्रमाप्रान्तरसेवादाददृष्टसम्बन्धतरिषयेऽयुमानस्यानुमानलतमुष्यते, 
्रव्यक्षमपि प्रमाणन्तरसंबादात्‌ प्रमाणे भवेत्‌ , प्रमाणत्वात्‌ , अनुमानवदेव । 


६४ पातञ्जलयोगसून्नभाष्यविवरणे 


अप्रमणे स्यात्‌ , प्रमाणान्तरसवादाभावात्‌ , सामान्यतोदृ्टादिषदिति ¦ तस्मान्न 
सामान्यतोदृष्टस्य प्रमाणत्वं निश्वितवुद्धिताद्वाधेतं शक्यम्‌ ॥ 


किं च-सामान्यतोदृ्टस्य मानत्वमनभ्युपगच्छतः स्वशरीरमरण्तम्बन्ध- 
ठक्षणस्यानुपलन्धपूरवत्वात्‌ सर्पादिभ्यो मयातुपपत्तिः । व्याधिप्र ५काराय 
चिकिरपादिभ्रयोगो न घटेत । मरणङङ्ाक्रारणामावात्‌ | तया जन्मनोप्युपलम्मा- 
मावादा्मराशरस्याजतवै चिन्त्यत । हानोपादाननियेोगाभावश्च स्यात्‌ ॥ 


तस्मात्‌ सामान्यतोषरष्टपस्ििणत्वादिसातिरायत्वसामान्यादीग्वरज्ञाननिर्वधि- 


कलि्धः ॥ 


कविं चान्यत्‌-- दैधरसरवज्ञःवस्य प्रतिषिद्धयमानत्वात्‌ साम्युपगमः, 
अ(नुप)पदार्थस्य प्रतिषेधासम्भवात्‌ । न हि केवलो नेति (न) प्रयुज्यते । ईरः 
सर्वज्ञो न मवतीव्युच्यते । तत्ने कचित्‌ सर्वज्ञत्वमम्युपगतं भवति ॥ 


तथथा--राशस्य विषाणं नास्ति, वन्ध्यायाः पुतो नास्ति, 
कुषुममाकारास्य नास्तीति कचिद्िवमानानामेव विषाणषुतकुषुमादीनां शशादि- 
संबन्पेन प्रतिषेषः, तद्वदिहापि स्यात्‌ ॥ 


किं च--ईरः सधैक्ञो न भवतीति, ईरशब्दाथसवैकञत्वसम्बन्ध- 
प्रतिषेधादिना ईश्वरादन्यस्य सवैज्ञताम्युपगमः । सम्बन्धिनावनम्युपगम्य 
सम्बन्धप्रतिषेषो हि न राक्यः कतुम्‌ ॥ 


स॒ एष युक्तः सम्बन्धः प्रतिषिध्यते, अयुक्तशाम्धुपगम्यते | तद्रि 
श्रममात्नम्‌ । ईश्वरसरङ्ञयोः प्रतिद्धपदा्योरप्रतिषेधात्‌ । न ्यनन्तपरिमाणमाकां 
न भवतीद्याकाशस्य॒प्रसिद्धमनन्तपरिमाणल्वं प्रतिषिष्यप्रपिद्धानन्तपरिमाणःतवेषु 
घटादिषु तत्‌ व्यवस्थापयितुं युक्तम्‌ ॥ 


अथ सन्बन्धिनवेवेश्वरसर्व्चत्वे श्रतिषिष्येते, स्ववचनविरोधिनी 
परतिज्ञा स्यात्‌ । रश्वरपर्व्॑ञतवयोरीघरसवज्ञराब्दाथतवाम्युपगमात्‌ । न हि 
मवलयग्निरपनिराब्दाथौ न भवतीति ॥ 


अथाप्रमिद्धपदार्थव्रीश्वरपर्वज्ञराब्दो, तथाऽपि -तदर्थप्रतिषेधानुपपततिः । 
| कय ^ । 


अप्रतिद्धस्या्धस्य प्राप्यमावात्‌ । न हि रकिचिदयप्रपिद्धमेतश्छिखरे मेषकुटुम्बिन 
प्रतिषेदधुमईति । किं च शब्दोपादानानर्थक्ये च । अप्रतिद्धपदाचत्वात्‌ ॥ 


समाधिपादः प्रथमः ६५ 


अथ प्रसिद्धा्योरीश्वरस्ज्ञराब्दयोर्निरवधिकेशवरपर्वज्ञतवाम्यामप्रधिद्धाभ्यां 
गगनस्येव कुषम; सबन्धः कैथित्‌ कल्पितः, स प्रतिषिष्येत--तथाऽप्यम्युपेतार्थ- 
प्रतिषेधात्‌ स्ववचनविरोधिन्येव प्रतिज्ञा स्यात्‌ । सातिरयनिरतिरयनेकेश्वरसम- 
जञन्यक्तिमस्सामान्ययोरीश्वरस्ज्ञशब्द।थवेनाभ्युपगमात्‌ ॥ 

प्रसिद्धं हि टेक ईशरसरहशब्दयोरुत्कपीपकर्षयुक्तानेकग्यक्तिविषय- 
बुद्ध-युत्पादकत्वम्‌ । न हि म।माधिपतिरीश्वर इति द्ित्रिग्रमविषयापिपतय 
उत्तरोत्तेश्ररा न भवन्ति । यो वा कुटुम्बाधिपतिरीश्ररे न मवति स्तश्वासावथे- 
वानीश्वराब्दः ॥ 

तथा बवैयकरणः सर्वज्ञ इव्युक्ते नाधिकक्िज्ञानयुक्तो न भवति| 
निखधिकौ सावधिकौ वेश्वरसर्वज्ञावीश्वरसर्वज्ञशन्दयोरयौवम्युपगम्ययाताम्‌ । अत- 
स्तघ्रतिषेधादम्युपगमविरोधिनी प्रतिज्ञा स्यात्‌, असाकाश्चादीनां महस्तस्य 
महच्छ्दायैखप्रतिपरेधवत्‌ ॥ 


अथेश्वरसवेज्ञो निखधिकौ न स्तः, अनुपलभ्यमानलात्‌ , अनीवरदवितीय- 
शिरेवदिद्युच्येत, तथाऽपि शब्दा्थीम्युपगमादम्युपगमिरो धिनी प्रतिज्ञा ॥ 


सातिशयतादिभिरेर्यपवज्ञघबीज।दिलिङ्धर्निखधिके्चरसतरज्ञतयोऽ१- 
लम्यमानत्वान्निखधिकपसििणलत्रदिवयपिद्धिरनुपर्न्धेः ॥ 


| ® कक 


अथ अविरोष्यैवेश्वरशब्दाथः सधरज्ञो न मवरतीद्युच्येत वस्तुत्वादिदहैतु- 
भिरस्मदादिदिति, तदा पत्रप्रमाणविरोधिनी प्रतिज्ञा स्यात्‌ | प्रतिदधेरशब्दाथस्य- 
प्राकृतसरवज्ञतस्य सर्वप्रमाणत्िद्धलात्‌ । यथा इश्वरशन्दाथः [सर्वज्ञो न भवति] 
प्रमेयल्वादिमिर्ैतुमिषेटादिदिषयक्ते यत्‌ ब्रुथात्तदेत्ाहं वक्ष्यामि ॥ 


इह सुपरह्नदयुन्यं जगत्‌ । कारो वा दिश आकारां वरा प्राणिमहेरो वा 
प्राणिनो बा सव सप्ज्ञसून्याः | प्रमाणानि वा सर्वाणि सर्वज्ञाविधयाणि | प्रमातारो 
वा सर्वज्ञस्याप्रतिपत्तारः, इवयेवंजातीयघ्ठु प्रतिन्ञाष्चु निरखधिकेश्वरे सज्ञे वा 
ग्रतिषिव्यमने, प्रतिद्धे्रसवन्ञशब्दायाभ्युपगमविरोधाः प्रतिज्ञादोप्रा वचनीयाः ॥ 

नलु च वन्ध्याुतो नास्तीति, तच्छरन्यं जगत्‌ काटो वेति, प्रतिज्ञायमाने 
यथेक्तप्रतिज्ञादोषप्रापिभवेत्- नैष दोषः- बन्ध्याघुतप्तत्तालक्षणस्य प्रति. 
बेद्न्यस्य वाक्यार्थ्येश्वरसरवत्तशब्दाथैवदप्रसिद्धवात्‌ केवटशब्दभ्रा पितसनिधान- 
बुद्धिमात्रप्रतिपनने पदथ[पदा्॑प्रतिेध)]भ्याप्राचेऽस्तीति बन्ध्याघुतास्तित्वस्य 
(वा नास्तित्वस्य) नाभ्युपगमोऽस्ति । ततो नाभ्युपगतप्रतिषेधदोषः ॥ 

9 


६६ पातञ्ञल्योगसूत्रभाघ्यविवरणे 


ननु चेश्वरः सर्वज्ञे न भवतीव्यत्रापि बुद्धिमात्रं प्राप्माणे प्रतिषिव्यते, न 
कचिदपि प्रप्नुद्रस्तु (न) प्रतिषेदधं शक्यते प्रतिहस्तिनेव हस्ती । यदि च नञ 
वस्तु निराकरिष्यत, नजुमनेणेश्चरवादिपन्षलमपि[पक्षोऽपिनिराकस्प्यिते, (अतः) 
तस्मादिहपि बुद्धिमान्नप्रतिषेध इति नाभ्युपगतग्रतिषेधः प्रतिज्ञादोषः ॥ 


सत्यमेवम्‌ । कि त्वस्ति विशेषः । प्रमाणसिद्धवस्तुविषया बुद्धिस्न्तरे 
कालविदो वा प्रतिषिध्यते वस्तुसामान्यात्‌ प्राप्नुवत यथा घट नास्तीति । 
कवचिद्धिनप्यर्थन बुद्धिरेव शब्दग्रस्युपनीतसन्निध।ना कल्ितवस्तन्तरा प्रतिषिध्यते | 
यथा बन्ध्याघ्ुतो नास्तीति ॥ 


यत्र तु प्रमा णान्तर्यप्द्वसदस्तुप्रतिषेधस्तत्रापि[स्ति]अभ्युपगतार्थप्रतिषेध- 
दोषः | यथा ईंशवरदाब्दार्थः स्ज्ञो न भवतीति । ईशर पभज्ञशब्दयोरभिव्धंमनेश्वर- 
सधज्ञन्यक्व्यनुगतसामान्यवचनवेन लिङ्गेन निरवपिकेश्चरसर्वज्ञसत्ताववोतिलवं 
तिद्धमेव । महद्रहुसर्वानन्तपसिमाणादिरब्दवत्‌ ॥ 


ययैवेते महदादिशब्दाः प्रपिद्सातिरायमहदाधनुगतसामान्या्थाभिघापिनः 
सन्ता निरवधिकमहद्रहुसवौनन्तपसिमाणव्यक्तीनामस्तिष्ावयोतनटिङ्गा भवन्ति | 
महद।देसामान्यानां सातिशयप्यक्ध्यनुगतानां निरवपिकमहदादिव्यक्तेग्यापन 
(रव्याक्षीण)रक्तित्वात्‌ | न हि सन्तं व्याप्यमर्थं तद्बपिकः सनर्थो न व्यप्मोतीति | 
निपवधिकत्ति परो व्याप्यो नास्तीति व्याप्य सामान्यस्य क्षयः व्याप्य्रिषयत्वेनैव 
परसिद्धतात्तत्र । तस्मात्‌ प्रमाणत्िद्धस्वादीशख्रसतरन्नरव्दाययेरभावं साधयतोऽभ्यु- 
पगताथप्रतिषरध प्ति दुष्टा प्रतिज्ञा ॥ 


न चेश्रसर्व्शन्दयोरतदश॑लमन्यायतवे वा कतु [वक्तुं] शक्यते । तथा 
दात्तिज्ञानैश्चयीणां प्रतिपुरुषं समुच्चितानां सातिशयानां निरधिकं तच 


(५ 


अतः[नानुन्त्तः| प्रतिबद्ध मुत्सहेतेवयनुमानविरोधिचं प्रतिज्ञायाः ॥ 


कि चान्यत्‌- परिपर]कल्पितस्येश्वरस्य प्रतिषेधं कुन्तः प्रयक्षपरचित्ता- 
नष्टाः प्राप्तुबन्ति । परवक्यादिति चेन - सातिरायत्वादिसव्गप्तापकलिङ्ख- 
प्रतिपादकवदविरिष्टव्यात्‌ परवाक्षयस्य । ताद्दावाक्याथप्रतिषेधे चाम्युपगत- 
प्रतिषेधः, पूवेवदेवानुमानविरोधश्च ॥ 

वि च--प्रमेषत।दिहैत्‌ना५पि असतिद्धत् | कुतः ? अस्माभिनिरतिराय- 
ज्ञ नै श्वयविरिष्टसस्याभ्युपगतत्वात्‌ । अथ स्वयमपि ताद्रामम्युपगच्छेत्तद 
सर्वज्ञपिद्धिः, अम्युपगतवात्‌ ॥ 


समाधिपादः परथमः ६७ 


किं चान्यत्‌--अम्युपगततादकूप्रतिषेधे, यथा घ्रटो घटो न भ्रति, 
वस्तुत्वात्‌ , पटवदिति, एवमिहापि स्यात्‌ ॥ 


किं च-निरवधिकस्यानम्युपगमे, प्रमेयल्वादीनाम्‌ [अ] पक्षघमेत्वमाश्रवा- 
सिद्धत्वं च । तदम्युपगमे हि किं साध्ये भ्वेत्‌? यो हि तृ्तवन्तं ब्रूयात्‌ 
माज्त्रास्छीरिति, किं तेन कृतं स्यात्‌ ॥ 


अथापि स्यात्‌--निरवधिकमीखरममित्न्धाय तस्य सर्वज्ञसं निषेधामाति । 
नेदतपि युक्तम्‌- सम्ज्ञघस्यपि निखधिकलात्‌ ॥ 


अपि च सातिशयैशर्यसरषज्त्वधोरुत्कधीनुत्करपतिषयवेन व्यभिचाराने- 
आरसन्तशब्दमुए्पामिषेयत्वम्‌ । यथा महदादयः रब्दा व्यमिचरितमहदििषु 
धटादिष्वमुख्याः, नाकारादिषु, तथैवात्रापि निरतिक्चयंमेश्वयं सवैज्ञतवं चन्यमि- 
चारीति स एव सुस्यः शब्दाथः । न च पुख्यनिराकरणं स।धिमानमृच्छति ॥ 


कि च-- यथा भवता अनुमानागमप्रिद्धे्रस्य प्रमेयत्वादिधमीविकल्पतया 
सवैज्गतरे निराक्रियते, तथेव प्रमेयत्वा दिमिरचेतनत्वमपि धटादिवदेव प्राप्तुयात्‌ । 
अविरोधात्‌ । यथा प्रमेयत्वं [अ]्षसेन व्याप्तमेव्मचेतनरल्रादिमिरपि ॥ 


भ (9 | ® कनक. 


चेत्‌-इहापि अनुमानागमविरोधं किं कटक्षेणापि 





५ 


नापि च प्रमेयत्वादिधभप्तामान्येन सपक्षे पिप्रक्ते वा किश्वित्‌ कचिदध्या- 
रोपयितुं राक््यम्‌ । वस्तुविषये सवत्र प्रमेयलादौनामत्तिखात्‌ । न मतिमोहनाथः 
परमेयत्वादयुषन्य।सः ॥ 


अथ आसलादिति चेत्‌, सुक्तामवदज्ञवप्रसङ्गः स्याद्रषदीश्चराणाम्‌ । 
{ # 2 क, 


परयक्षादि विरोध इति चेत्‌--अत्रप्यनुमानादिविरेधः पूर्ववदेव ॥ 


भूतमव्िष्याकराल्योरपि रईश्रस्यानुपटन्धार इतीदानीन्तनेश्वराणानुपे- 
लन्धरमिरनेकान्तिकं प्रागिलादिव्यादि । कवि च भतीतानागतक।छ्योरपि 
सातिशयतादिटिद्गैरुपलग्धवन्त उपरुप्स्यमानाश्च प्राणिनः प्रमाणङ्ुरालाः, 
प्रमाणकुराङत्वात्‌ , अस्मदादिवत्‌ ॥ 


अथ अरारीरलादसवक्ञः, सक्ता काशादिषत्‌ इति चेत-न-सरररारतात्‌ | 
= (५ ¢ [न [4 [ (4 (क 
व्यक्ताग्यक्तं हे सवमङरीरं सरारीरत्ादनियेश्वरतवं धर्मयपेश्षप्ठ दिष्युक्तसवादिति 


६८ पात्यो गसुत्रभाष्यविवरणे 


चेत्‌-न-अरारीरत्वात्‌ । सरारीरारारीरतषिरोध इति चेत-न~मुक्तमुच्यमने- 
कत्मनोऽरारीरत्वसरारीरप्वदनात्त्‌ ] तत्र भिनक्रारत्वादविरोध इति वचेत्‌-न- 
अत्रापि भिनकाल्म्युपगमात्‌ ॥ 


कै च-युगपदीश्वरत्रादेव इयसम्भवः | सकरणता अकरणताऽपिं 
ईशवरत्वादेव युक्ता । तथ। च श्रुतयः--"“ अशरीरं शरैरेषु"" इति । तथा 
““यः सर्व भूतेषु तिष्ठन्‌?” इति । तथा भ्यः सर्वज्ञः स्वित्‌ इल्यादयः ॥ 


श्रुतीनां विप्रतिषेधाय॑लादीश्वरप्र्यायकतम्‌ इति चेत्‌-न-अनन्य- 
दोषत्वात्‌ । न हि क्मैरोषवे श्वुतिलिङ्गादीनामन्यतमदपिं प्रमाणमस्ति ॥ 


स्वाध्यायविधिपरिप्रहादरौपूणमाप्तादिशेष इति चेत्‌-न-अ्योतिष्टोमादिष- 
द्िष्यन्तरस्य भावात्‌ । यथेव ञयोतिष्टोमादोनां (यमग्र पृथकप्रकरणादि- 
कारणादन्योन्यरेषरेषिमावो नारित । तथेव मन्तव्यो विदिष्याितव्यः'“ 
दस्य दिविषयतानाभ्नहोत्रादिरोषतवं युक्तम्‌ | 


फल।भाव इति चेत्‌-न- “सर्वाः लोकानाभोति सर्वाश्च कामान्य- 
स्तमात्मानमदुविदय विजानातिः" इव्यादिफलपुदिदय विधानात्‌ ॥ 


~ (५. 


अथेवमप्युपासनाविधिशेषरत्वात्‌ स्तुतिरेति चेत्‌-नादयन्तमप्तता 
सतुतिरस्ति । न हि “वायु क्षेपिष्ठा देवता इति बयेोरक्षपिषठचम्‌ । 
कचिदसताऽपि स्तुव्यादिसम्भव इति चेत्‌-न-अनुमानसिद्धस्येहेपादानात्‌ ॥ 

अथ स्वैका्यकरणयोगादीश्वरस्य सवप्राणिघुखदुःखदिसेबन्ध इतिं 
चेत्‌-न-निमित्तभदात्‌ । धमादिनिमित्तः सप्ाशिणां शरीरादिसम्बन्धः । 
धमादिनिमि(त्तानाँत्तो दुःखादियोगः । नेश्वरस्य धमादयः । निरतिश्येशर्यादि- 
हेतुवाच्छशरादिकायेकरणसंबन्धस्य । यथ। ग्रहतदाविष्टयोः ॥ 


अथ चश्षुरदिकरणलादस्मदादिवत्‌ सानुपरलन्धिरिति चेत्‌-न- 
सवैविषयप्रहणप्तमथीनां प्रतिवन्धक।रणामव्रात्‌ । सवगतनां हि करणानां 
[आ]धर्मादिसंवरणेन स्वविषयसङ्कोचः क्रियते । यस्य पुनररणं प्रतिबन्धक[म]- 
घमोदि न विदयते, तस्य तदभावाद ञेषस्वविषयग्रहणानि करणानीति न दुष्यति ॥ 





1. कठोपनिषत्‌ , 2, 21. 4. च. <. 2. 4 5. 
2. बृ. उ, 3. 7. 13. 5. छा, उ, 8. 7, 1. 
3. मु, उ, 1. 1. 9. 


समाधिपादः प्रथमः ६९ 


अथ वा सर्प्राणिकरणैः [ईरः] एथगामनः करणामविऽग्यविशग्रह इव 
सवेमनुमवति । न च प्राणिशयन्यो विषयः कश्चिद्िधते, "यः" पृथिव्यां तिष्ठन्‌' 
ध्योऽप्पु तिष्ठन्‌ इयेवमादिश्ुतेरन्त्यामिनाम्न ईश्वरस्य सर्वष्ववस्थिततवश्रवणात्‌ ॥ 


शपि वा प्रकृष्टमेव सकं नित्यानतिशायितरततिज्ञानेश्वरसरधमेकम्‌ , 
सगतल्वादाकारवत्‌ सर्वयोगि, स्ीयैत्वात्‌ स्ैविषयप्रकाशकम्‌ , धमोधमीदिवि- 
प्रयोगादप्रतिबन्धशक्तेकं च इति अकायानिद्धियत्वपक्षेऽ्षीश्चरसवैज्ञत्रपिद्धिः ॥ 


चक्षुरायवेक्षमेव चित्तस्य खूपादिग्रतिलम्भसामध्यमिति वचेत्‌-न-- 
रेश्यैधमीचमावाम्यां परिहतत्वात्‌ ॥ 


अपि च चक्षप्रह्यध्यापि चक्षुषा अग्रहणं छोके दृयते । चक्षुर 
सत्‌ सव॑ तमः सन्निमीठितलेचनेरपि स्वस्थान्तःकरणैरुपरम्यते । तदेष 


चान्धतमसं विप्फास्तिनयनैर्यन्यगतचित्तैनैव गृह्यते | यथा गृह्यमाण 
एवाकशि प्रकाराः ॥ 


अथापि प्रकाजञामावमात्रमेव तम न वसिति ब्रूयात्‌-तच्च न-अभावस्य 


[कभ 


वस्तुतिरेधानसामध्यामावात्‌ ॥ 


अथ प्रहणनिमित्तस्य प्रकाड्यस्याभावदिव घटाचग्रहणं, न वस्तुतिरो. 
धायकं तम इति ब्रुवीत-न-चक्षुषः प्रकाशकत्वात्‌ प्रकारसाह।यकपे- 
्षानुपपत्तिः । असति भिनजातीये वस्तुनि वस्तूनां तिरोधातृणि तत्र या च 
यावती च मत्रा प्रकाराकवाचक्षुषा प्रक्यित | न हि प्रदीपः प्रदीपान्तर- 
दैतीयकधिश्ः प्रकाशयति ॥ 


कि चान्यत्‌-- चक्षुषः प्रकाशान्तरस्हायत्वपिक्षतायां च निङायामपि 
ताराधिपतिप्रकाशद्वितीयेन चक्षुषा दिवस्त इव ख्पादिगप्रहणप्रसङ्गस्तिरो- 


+ ( 


धानस्यासति निमित्ते ॥ 


कि चान्यत्‌--अभावश्ेत्तमः, चन्द्रमाघ्ु निशायां भा(मव)न्तीषु तमस्ता 
मन्देन न प्रवर्तितव्यम्‌ । सवौतनैव हि तेन विनशनीयम्‌ । मातां भावात्‌ । 
मासां तु व्तुवान्मन्दखपाटव।दिविशेषो घटते, न(मावस्य)अभावस्य 
निर्विशेषत्वात्‌ ॥ | 


७० पातञ्जर्योगसूत्रभाष्यविवरणे 


किं च-सहायामावाचचक्षुष उपट्न्धिसामध्यौमावादग्रहणगिलेतदपि 
व्यभिचरति । यथा सलखपि विद्युहुनाप्रकारे तीव्रतरे विदुहठताविर मे 
च कि तदृदृष्टिनीपलभते। न हि विधुतः सहायके दष्टचकिनत्वेना्रहणं 
विरोधाभावादुक्तम्‌ ॥ 


किंश्च - चिकिःसाशाच्े छया मधुररशीतच्च्युच्यते । न ह्यवस्तुनो 
मधुरशीत्त्वम्‌ । तथा चाक्षिपति पथ्यलम्‌ । नभवस्य पथ्यपिध्यलं ब्रूयुः ॥ 


प्रदीपच्छयोपटब्धेश्च । अभावश्ेत्तमः, प्रदीपप्रभामण्डठे प्रदीपच्छाया 
कथं भवेत्‌ । वस्तुखेऽपि बिरोधादयुक्तमिति चेत्‌--न--विषसरपैयोरिव 
संभवात्‌ । यथा प्राणविधोगकरमपि विषं पन्गप्राणवियोगाय न पयौप्रोति, 
तथा प्रदीपतच्छाययोरपि ॥ 


तस्मादरस्तु तमः, प्रकषोपकर्षवस्वात्‌, प्रमावत्‌ । विरोधिद्रन्पापने- 


, 
यत्वाचच, घटवत्‌ । उपलब्धृग्यवधानकरत्वाचच, भित्तिवदिति ॥ 


इतशवेन्दियनिरपेक्षप्यन्तःकरणमिन्दियविषयग्रहणाय समर्थम्‌ । पिहित- 
कणविवर्र्य घोषोपलंमात्‌ । न च पिहितकण॑संपुट्य प्रोत्रान्तरमनुमातं शक्यम्‌ । 
वधिरस्य।पि पिहितश्रोत्रपुटस्य तदम्रहणात्‌ ॥ 


किश्च--प्रतिज्ञाज्ञानेनपि ख्पादिग्रहणमिन्दरियनिरपेक्षं ददयते ॥ 


किंञ्चान्यत्‌--स्तेश्वानुपपत्तिः स्यात्‌ इन्दियनिरपेक्षस्य चित्तस्य 
सातिरयप्रहणत्तामर्ध्यऽपि । स्पष्टाश्च स्पृतयः स्वपा ख्पादिविषयाः ॥ 


यदि चक्षुराचन्तःकरणाम्यां समन्वित।म्यां रूपग्रहणं पूवेमपि 
(५.९ श {४ [क भ १, 6 | ५, 
निवर्तिष्यते, स्वप्रादावपि सपुचित।म्यमिव प्रदीप्य । न चैवमस्ति । एुखादि- 
प्रहणे स्वातन्त्र चित्तस्य सर्वप्रपिद्धम्‌ ॥ 


तसम।दारोकस्थानीयानीद्धियाणि चित्तस्य विषयग्रहणे स्वतन्त्रस्यैव 


सतः । तदुक्तम्‌ ""इन्द्रियप्रनाडिकया' इति । तथा श्रुतिरपि-- "मनसाः ह्येव 
परयति मनसा भृणोतति' इति ॥ 


1 १.1 2 आव -2 =. 1 8; 


समाधिपादः प्रथमः ७१ 





अथोच्येत--इन्द्रियाणामालोकपिक्षावत्‌ अन्तःकरणमपीन्दियसाहायकपि- 
क्षमेव प्राहकमिति --तन्न--ग्यमिचारात्‌ । रत्रिश्वरा्णां विमिनन्यारोक- 
देतीयकेन दिवस इव रूपग्रहणम्‌ । स्यपि प्रकारो न पस्य प्रहण- 
मुर्कादिभिर्दिने ॥ 





किष्च--साधनपेक्षस्य विक्ञानसाधनादतेऽपि तुलादौ दरौनमातरेणैव 
घुब्णाीदिपरिमाणज्ञानं दृस्यते ॥ 





अथ चेदूनूधादानथक्रय॑चक्षुरादीनामिति-- स वक्तव्यः--तुलादिव- 
देवान्यत्रार्थवखमिन्दियाणामिति | यथेव तुलादिविषयवैमल्यप्रकर्षात्‌ पुरुषस्य विनापि 
तुखादि साधनेन दररनमात्रदिव कनकादिवस्तुपरिच्छिदकोशरं, तयैवान्तःकरणस्या- 
नपेक्षितचक्षुरादिसाहायकस्यापि वेमल्यप्रकरषीदुपादिग्रहणसामर्ध्यं॑न विहन्यते ॥ 

नापि ह्यनेकनिवतनीयं क्रियाजातमेक्रेन नाभिनि्वैते । दृदेयन्ते च 
बहभिरुत्तोल्यमान शिलादिकमद्ितीया हस्तिपुरुषादयः केचिदुत्ताल्यन्तः ॥ 

तथेवेन्दियसहायेनान्येषामन्तःकरणेन गृद्यमाणा पादयः परमेश्वरचित्त- 
सखेनानाक्रख्ति(वकर्णित)चक्षुरादिपस्सिन्देन केवलेनेव गृह्यन्ते । काष्ठागत- 
त्वादवेमल्यराक्लेश्वप्रकरस्य ॥ 


संसारिणां ततो निकृष्टलादषिचदिमलेनैश्धराक्तिज्ञानादीनामिन्धियसह- 
करिपिक्षिलमन्तःकरणस्य । शिखदिसपुत्तोठन इष हीनत्रकनाम्‌ ॥ 


ये(षा) पुनः संक्षारिण एव सन्त ईश्वरीमवन्ति बुद्ध्षभादयः, तेषां निएति- 
रायराकतिज्ञानेश्वयानुपपत्तिः । कार्पखच्छिवलात्‌ । अभ्युपगच्छन्ति च 
तदरेनश्धिनः काल्पच्छिदनीयक्र तेषम्‌ | । 


नास्मदीशरस्य काट्पर्च्छिवता । तत्करङिस्तदाधकाठैश्च बुद्ध।दिभि- 
रपल्जञितेश्वयादिसातिदायलादिलिन्धैरुभय एवा्ौ । न।पुमिन्‌ काट उन्न 
उत्पद्यत उत्पपस्यमान इति त्रिधा कैश्चिदनुमीयते । निरतिरायत्वविरेधो हि 
तथा{दा]स्यात्‌ ॥ 


तस्मात्‌ बुद्धादीनां सिद्धधमेक्षत्वात्‌ , पत्बुद्धानां काल धिक्यप्रतिरुत्तरकाङ- 
बुद्धस्यापि न निरतिायदाक्लश्चयन्नानसे विरुद्धम्‌ । अथ तुल्यरात्तिज्ञनिश्च्याणा- 
मेव तेषां समनराज्यराजानामिवरासमानकाकुतमिति ब्रुयात्‌ , तथापि बुद्धन्तर- 
कार्य व्याप््यमिलरदिधातानिरतिशेश्वश्रीवभावः ॥ 


७२ पातञ्जलयोगसूत्रभाष्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ ] 
सामान्यमात्रोपसेहरिे च कृतेपक्षयमनुमानं न विशेषप्रतिपत्तौ 
समथेमिति । तप्य संज्ञादिविशेषप्रतिपत्तिरागमतः पर्ैन्वेष्या । 
तस्यासानुग्रहाभविऽपि मूतानुग्रदः भ्रयोजनम्‌ › ज्ञानधर्मोपदेशेन कसप्रख्य- 
महाप्रययेषु संसारिणः पुरूपानुद्धर््यिामीति । तथां वचोक्तम्‌-- 
आदिविदयान्‌ निमीणचित्तमधिष्ठाय कारुण्यात्‌ मगवान्‌ परमर्षिरापुरये 
जिज्ञासमानाय तन्त्रं प्रोवाचेति ॥ २५॥ 


( विवरणम्‌ ] 
भमिरुषति हि कश्चित्‌ बुद्धान्तरं वरीकर्तुम्‌ , तद्विषयं च ब्यापतुम्‌ । 
अनियतत्वादिच्छायाः । बुद्धन्तरावशीकरणे च सवशि ही(नी)येत ॥ 
अथ चेदुव्येत, बुद्धान्तरस्याननुग्राह्यतवाद्रागाचयभावाच्च तद्विषयभ्याप्तावन- 
भिरप्र इति--अत्रोच्यते-- यथैव प्रापतब्ुद्धलस्य कंचित्काठमवस्यानममिलाष- 
पूवैकम्‌ , तथ। बुदधान्तरकाकावस्थानाभिङुबेणावङ्यं भवरित्तम्यम्‌ ॥ 


अनुग्राह्यप्राण्यन्तरभावाच क।लन्तरावस्यानाभिख्ेण युक्तं भवितुम्‌ । 
न च भविष्यता बुद्धेन सव प्राणण्रतेऽनुग्रहीष्यन्ते ॥ 


[क 


बुद्धत्रस्य च॒ दुःखाचासकतरेऽपि प्राण्यनुग्रहायलादृबुद्धस्यितेः 
काछन्तरावस्यनेच्छया भवितव्यमेव । सिद्धेश्च प्रागविचयादिपरामरशौत्‌, 
नुद्धस्वख्पस्य च दुःखदयूनयाचाप्मकतस्य, तेरभ्युपेततरात्‌ › बुद्धषमाचन्यत्तीथ- 
करणात्‌ [करत्‌ ]निरतिशयराक्तिन्ञनि शथनुपपत्तिः ॥; 

कालानवच्छेदात्तु मैते दोषा अस्रदीशवरे क्रमन्ते । शक्तिज्ञनिशव्थाणां 
तु निखधिकत्वानुमानात्‌ सातिरायत्वानवस्थिततवादिदोषरः नालसाकाशादीना- 


भिवातिशङ्कनीयः ॥ 


तया च दरीयति--सामान्यमात्रोपरंहरि कतेपक्षयमनुमानम्‌ 
इति । निरतिशयशाक्तिजञनि खयेयुक्तपुरपरविरोषप्तस्वस।मान्यमात्रोपसंहर 
कतोपक्ष्यं कृत उपक्षयो यस्यानुमानस्य॒तच्छृतेपक्षयं सातिरशयत्वादिति । 


तदुक्तमनुमने-- यत्र प्रातस्तत्र गतिमात्रमिति । तस्मन्नेश्वरसक्ञागुणादि- 
विदो सतामपि प्रतिपादने समर्थम्‌ । सामान्यमत्रोपपंहारपरलात्‌ ॥ 


समाधिपादः प्रथमः ७३ 


तदेतदुक्तं मवति । यदेवं सतामपि गुणानां सामान्यप्रतिपादन- 
कृतक्षयलान्न प्रतिपादकमनुमानम्‌ , किमङ्ग पुनरव्यन्ताप्षम्भान्यमानसनिधीन।- 
मनुमेयधमैविरुद्धानामशक्तयज्ञानघर्माधर्मानिश्वयदानां [न]त्प्रल्यायकमिति ॥ 


भत एव च त्रिरुद्धभरतिंसाधनानुपपत्तिः । स्धज्ञास्तितानुमानवत्‌ प्रथमं 
तदभावप्रतिपादकानुमानाप्रवृचतेः . | न ह्यतुमानस्य परोक्ध्युदीक्षाघमैत्वमस्ति | 
न हि धूमदरौनेन।गन्यनुमाने वक्नरन्तरोक्तिरुदीश्षयते ॥ 


न च स्वयमेव सवै्ञासितये नास्तिल॑वा बुद्धि (प्रति)पूर्वमाशङ्कधते । 
घट दिवत्‌ सेज्ञसद्धावध्य स्वयमनम्युपगमात्‌ । न द्यनिधौरितिशश्चस्वरूपः 
दारो विषरणमस्ति नास्तीति कश्चिदाशङ्कते । 


परवास्यात्‌ प्रतिपवाङशङ्कत इति चेत्‌- परेणापि कथमप्रसिद्धेश्वर- 
सद्भवन।राङ्कितमिति वक्तव्यम्‌ । अथ परस्य भ्रान्तिरिति चेत्‌-न सामान्या. 
तुपटम्भे भान्तिकारणमस्ति । न हि शुक्तिकायां पिकभ्रमः "कस्यचिदुपजायते । 
तस्मादाह- संज्ञादिविरेषप्रतिपत्तिशगमतः पर्य॑न्वेभ्या इति । वेदेतिहात- 
पुराणयोगधरमशाल्रा्यागमतः पर्यन्वेष्या ॥ 

तस्यामानुग्रहामावेऽपि तस्थालार्थमवाप्त्यामावात्‌ सूतानां चाविया- 
पङ्कनिमम्रानां संसारपागरेत्तरणे।पायपुतरोपदेर्यन्तरस्याभावत्‌ तदनुग्रहः 
प्रयोजनम्‌ । ज्ञानधर्मोपदेरेन येऽनन्यरारणास्तसिन्‌ सव्रोसमना निवेदितासान- 
स्तान्‌ कलपप्रलयमहाप्रलयेषु ईशवरानुगृहीतागमन्ञान विरेषेष्वाचयष प्रलीनेषु 
पुनःपुनजातकारृण्यामृतः सन्‌ उद्धर्ि्यामीति प्रवतेत इति बाक्यरोषः ॥ 


~ ~ 


तथा चोक्तमादिविद्रानिति- अदौ वदान्‌ आदिविद्रान्‌ रजस्तमो- 
म्यामनमिभूतक्ञान इयथः । ज्ञानधर्मीदि वा तत आदीयते इत्यादिः, आदिश्वापौ 
विद्वांश्च ` आदि विद्वान्‌ निमीणचित्तं संकल्पमात्रनिभितं योगिनित्तम्‌ अवेरग्रह- 
वदुपदेशनार्थम्‌ अधिष्ठाय भगवान्‌ परमपि: परमदर्खन इव्यथः । परमलं 
चागमतः । दरौनार्थस्य वा गद्यर्थस्य वा घातोः ऋषेश्रहणम्‌ । परमर्षिरीश्चर 


एव्र कपिरनारायणादितंक्ञः आसुर्ये प्रोवाचेति ॥ 


तस्मात्‌ प्रधानपुर्षभ्यतिरिकिः सर्वप्राणिभावकमफलपरिस्फुरणक्ञानात्त- 
दनुग्रहकारणम्‌ ईश्वरः सिद्धः । स प्रकृ्टसचधनोपादान ईखरः कथं कत ? कथं 
च नुगृह्णाति £ इष्येवमादि न चोदयितव्यम्‌ । आगमतः पर्न्वेभ्या इव्युक्ततात्‌ । 
अनुमानस्य च तद्विषयस्यानुपपत्तिः विशेष्तबन्धाम्रहणादिति ॥ २५ ॥ 
10 


७ पातञ्जखयो गसूत्रभाष्यविवरणे 


| भाष्यम्‌ ] 
स एषः-- 
[ सूत्रम्‌ | 
क [९ व 
(स) पूवषामपि गुरूः कालेनानवच्छेदात्‌ ॥ २६ ॥ 
[ भाष्यम्‌ ] 


पूर हि गुरवः कलिनावच्छिघन्ते । यत्रावच्छेदार्थः' काटो 
नोपावतते स एष पूर्ैवापपि गुरुः । यथ्‌।ऽस्य सर्गेस्यादो प्रकर्षगया 
सिः, तथाऽतिक्रान्तसगादिष्वपि प्रयेतव्यः ॥ २६ ॥ 
[ विवरणम्‌ |] 

सः यथोक्तद्पः परमेश्वरः पूर्वैषामपि गुरूणाम्‌ अभ्युदयनिःशरेयस- 
सव॑साधनसाष्यषबन्धेपदेरिनां गुरः तेषामपि ज्ञानोपदेस्य कर्तेत्यथः । तदु- 
द्ववत्व।त्‌ सव॑ज्ञानानाम्‌ | यथ। उलनल्वणजरपिस्मुद्धवा विष्फुटिङ्गटवणकणाः ॥ 

तस्य चादिविद्रत्तमवोचाम काठेनानवच्छेदादिति । अतीतानागतप्रत्यु- 
पादीयमानलक्रि््टन काटेनान्ये गुखोऽवच्छिदयन्ते । स॒ वीश्वरः सर्वदा 
मक्तेशवरसरेन तैरप्यस्माभिरिवातुमेयः ॥ 

कस्मात्‌ पुनस्तस्य वस्तुले गुरुखसामान्ये च सति नावच्छेदकः काठ इति 
चेदाह-- यत्रावच्छेदाथेः कारो नोपावतैत इति । यस्मिन्नीश्वर विषये 
अवच्छेदा्ः भ्रस्थादिवत्‌ " परिन्छिदकरः नोपावतैते न परिष्छेदकतननेश्वर 
विषयीकरोति सपरपररिणापरिवस्छवच्छेदकरो ऽपि सन्‌ ॥ 

ननु चेश्वरकृष्टसखस्य प्रधानकार्य॑तात्‌ , प्रधानकार्यस्य च काल- 
वच्छेधत्वात्‌ , क्मात्तःसत्ं नावच्छिचते पुरुषस्वरूपं हि सर्वेषामेव कालनवच्छेव- 
(मिति नाशाङ्कनीय)मपरिणामिलात्‌ पुरुषस्य ॥ 

अथ मन्येथाः--तन्त्रान्तरप्रसिद्धेश्वरवत्‌ सच्वनियेक्न ईश्रर इति- 
तदयुक्तम्‌- श्रकृष्टस्वापादानाम्युपगमात्‌ ॥ 


अथापि मर्न्व।थाः--ईश्रसच्नात्‌ प्रवृत्तमेष कायमवच्छिनत्ति का 
नेश्वरसचमिति- तदप्ययुक्तम्‌ ग्यक्तस्य परिच्छेवत्वात्‌ | व्यक्तं चेश्वरसखम्‌ ॥ 





1. अयं विवरणानुत्तारी माष्यपाटः । इदान)न्तनमुद्रितम्रन्थघ्थः वाचस्पति. 
सम्मतश्च पाटस्नु यत्रावच्छेदार्थेन इति । 


समाधिपादः प्रथमः ७५५ 


अथाप्यमिसन्दधीयाः-- प्रधानवस्थमेवेश्वरसमिति- तदनुपपनम्‌ -- 
्ञानामुपपत्तेः ॥ 

अथापि प्रतिपथेथाः-- सत्कायम्युपगमाद्रौजफल्बष्ठरीक्ुष्ठुमादिवज््ञाना- 
दीनां प्रधानावस्था यत्सच्वमेवेति- तच न साघु-ग्यवहारयोग्यत्वात्‌ | 
सर्वषां च तथा सल्यनवच्छयतेवं ज्ञानादि सत्तामात्रसम्बन्धात्रिरोषात्‌ प्राप्नुयात्‌ ॥ 

अथापि व्रुवीय।;ः- न्यक्तवे सल्यपि कायाणां कस्यचित्‌ परिच्छेत्य 
काछान कस्यचिनेति-- तच्च न--न्याप्रिरोधात्‌ ॥ 





अथापि प्र्यवतिष्ठेथाः, इश्चरत्वप्य कारपरिच्छिवत्वमागमपिद्धमिति- 
तच्च न -- अवघोतकलादागमस्य ॥ 

अधाप्याचक्षीथाः-- विद्यमानस्यैव क।रपल्च्छियत्वस्याज्ञातस्यावधोतक 
अगम इति -तच्वपि न --निरोधादिसमनुषठाननिमित्ततात्‌ कार(न)वच्छे्यो 
वेमह्यादनवच्छेयश्चेति विरुद्धं स्यात्‌ ॥ 


नवे 


अत्रोच्यते-रश्चरसचयेमल्यप्रकषं पक्षत्वात्‌ कालनवच्छेयतस्यादोषरः ॥ 


यथा अन्येषां गुहूणां योगधमादिसमनुष्ठाननिमित्ततात्‌ काटानवच्छेवो 
वैमल्यप्रकषेः, तथा न मगवतः । कथम्‌ १ सव॑दाऽत्यन्ततिरो भूतरजस्तमस्वा- 
दनपेक्षितधमादिनिमित्तं सकटाथौवद्योतकरं काङानवच्छेथ सच्छस्वरूपव द्रगवत्सचचे 
ज्ञानम्‌ ॥ 

तथा ततकार्यमप्युत्कषः काटेन नावच्छिदयते । यथा चद्निरष्णप्रकाशभन 
कालानवच्छेवै, तथा मगवत्सच्वस्य वैमल्यज्ञानग्रकप॑स्तत्सचे कारनवच्छेवता- 
मुपयन्तीव्येतदपेश्नयामिहितं यतावच्छेदा्थैः कालो नोपावर्तत इति । न 
त्वकार्यपिक्षया ह्युच्यते | 

गुरुत हि नावधिमत्‌ । तदवाह-- यथाऽस्य सगेस्यादो ज्ञानवैमल्य. 
प्रकर्षमलया सिद्धः सग॑दिजन्मनामनुमेयतया सिद्धः आगमतश्वाज्ञायि, तथाऽति- 
क्रान्तसर्गादिष्वपि तच्कालजन्मनां ततः प्राक्तनानामपि तिद्धः । तथा भविष्य- 
त्काठेऽप्यनुमानागमाम्यामवगम्यते ॥ 


अस्य च सूत्रस्येदं प्रयोजनम्‌---यथा दृष्टा गुखो ज्ञानघमोदुपदेशिला- 
दनन्य शरणैरनवरतमुपास्यन्ते, तथा मगवानयमपि सर्वगुङूणामपि गुरुतरत्ततोऽपि 
विरोषरेण नारायणादिनामा(दीनाम)नन्यचेतेमिः स्वहदयेनानिरो ध।रयितन्य इति ॥ 


७६ पातज्ञखयोगसुन्नभाष्यविवरणे 


सूत्रम्‌ | 
तस्यं वाचकः; प्रणवः ॥ ९७ ॥ 


| भाष्यम्‌ |] 
व्‌।च्य॒इशरः प्रणवस्य 


[ विवरणम्‌ ] 
यथा दृष्टगुख उपासनेनाभिमुखीकृत।स्तदुपासनपराननगृहन्ति, तथाऽयं 
परमगुरुरप्यभिव्यानमत्रेणानुग्रहं करोति । तथा च शतिः -- 


८ यस्य देवे पररा भक्तेर्यथा देवे तथा गुरौ । 
तप्येते कथिता ह्यथौः प्रकाशन्ते महासमनः ॥" इति । 
सस्मृतिरपि- - 
८ मकम॑क्रन्मत्परमो मद्धक्तः सङ्कवर्जितः । 
निवेरः सर्वमूतेषु यः स मामेति पाण्डवं ॥'” इति ॥ २६ ॥ 


इश्र्रणिधानादिध्युक्त, स कथं प्रणिधातमव्यः ? कि च तस्रणिधान- 
साधनम्‌ ? येन प्रणिधाता प्रनिधत्त इति तद्रणिधानस्ताधनप्रतिपादनाथमाह-- 
तस्य॒ वाचकः प्रणवं इति । तस्य ईश्वरस्य यथेक्तरक्षणस्य वाचकः 
अभिधायकः प्रणवः साल्लादिमत इव गोराब्दः ॥ 


वकि ४ ०९ च क, [+ [® ५ [९ 
प्रकषण नूयते स्तूयते अनेनेति प्रणवः । यदि वा, प्रणोति स्तौतीश्वरमिति 
प्रणव ओङ्कारः । प्रणिधीयते चानन मगवान्‌ प्रणिधातृभिरिति प्रणमन्ति वा 


अनेनेति, प्रणिघत्ते वा तेन भगवन्तं चेतसीति, धजो वकारोपजनं कृत्वा. । 
शब्देन हि परोक्षाणामर्थोनां मनसि प्रणिधान मेररिदढ इति यथ। ॥ 


तस्य चोङ्करस्य वाच्यः ईश्वरः । अन्वर्थं खल्वपि निवेचनम्‌. । 
अव्रते; रक्षणाधरथान्मनिष्टिछोपश्वेति । प्रणिघातृन्‌ सेसतारादवतीति, गमयति वा 
संसारिणं निर्वाणमिति, निरतिशयं वा प्रीणयति, समाघ्या्नुप्रहेणाकगमयति वा 


परमा्मिदयेवमाचर्थानुगतम्‌ सवधा तु नेदिष्ठ प्रियं नाम भगवतः ॥ 








1. सुव्रारोपानषत्‌ | 
2. श्रीमद्भगवद्रीता 11. अध्यायः 55, शोकः । 


समाधिपादः प्रथमः ७७ 


[ भाष्यम्‌ ] 
किमस्य सृङ्ेतछृते वाच्यवाचकत्वम्‌ १ अथ प्रदीपपरकाशवद- 
स्थितम्‌ ? इति । 


स्थितोऽस्य वाच्यस्य वाचकेन सह सम्बन्धः । सङ्कतस्त्वीश्वरस्य 
स्थितमेवा्थममिनयति । यथा--अवस्थितः पितापुत्रयोः सम्बन्धः 
सङ्कतेनावदोदयते “अयमस्य पिता" अयमस्य पुत्रः" इति । 

| विवरणम्‌ | 

तेन हि मनप्ि सतते प्रणिधीयमानः प्रसीदति । तथा चनेकराः 
्रुतयः--.ओं खं ब्रह्म' “ओमिति ब्रह्म इत्यादयः । स्मृतयश्च “ओं तस्सत्‌' 
इति । “ओं ¶विश्वं विष्णुः" इव्यादयः । ओंशन्दध्य कृदन्ते यन्मान्तमि- 
व्यव्ययत्वाद्धिभक्तिनिवृ्तिः । 


किमस्य सद्कतक्ततं वाच्यवाचकसवं ? अथ प्रदीपप्रकाश्चवदवस्थित- 
मिति । कि चातः? | यदि तेन भगप्रता अन्यैव संन्यवहाराथमस्य नामिद- 
मस्िविति संकेतितम्‌ , ततऽस्य प्रागोरान्दाबाच्यल्वादसब्देन वा प्रणिधातारः 
प्राण्यधिषत, अन्येन वा नामान्तरेणाघीतवन्तस्तथेदानीमप्यस्तु, किमोङ्कारविशेष- 
वचनेन । अथापि प्रदीपप्रकारवदवस्यितं, तथाऽपि प्रथमश्रवणिऽपीश्चर 
उपलभ्येत यथा प्रकारेन सविता ॥ 


किं च--सङ्कृतोऽप्यनथकः स्थितप्तम्बन्धलात्‌ | अथापू्वं॑सङ्केयेत, 
परवोक्तदोषभ्रसङ्ग इति मन्यते ॥ 

अत्रोष्यते--स्थितोऽस्य वाच्यस्य वाचकेन सम्बन्धो यदि निलयः 
राब्दो यदि वा अनिलः, सङ्खतस्तु तमेव स्थितं सम्बन्धमवञ्वछ्यति ॥ 
प्रघयाय्यप्र्यायकस्तम्बन्धः शब्द्ाथये;ः स्थितोऽपि सनिन्ियिण गृह्यते 
यथेन्दरियाथयोः । अप्रयक्षे हि वाच्यवाचकरशक्ती | 


ननु चोक्त-- स्थितश्वेत्‌ प्रथमश्रवः) ऽपि तं प्रतीयुरिति । उच्यते---न हि 
| 


ततश्च येनोच्यते शब्दादर्थोऽनुमेय इति-- तदसत्‌ । सम्बन्धाम्रहणाव्‌ । 
परप्रयोगव्यड्ग्यत्वाच सम्बन्धस्य । न ह्यनुमानं परश्रयोगमपेक्षते ॥ 





1. 3, भ. गी. 12. 23, 


४, 1, 
1. 8. 1. 4. विष्णुसहसलनामस्तोत्रम्‌ 


1. त्र, उ, 
2 ते, उ. 


५ सूः [दा 
७८ पातज्ञटयागसूत्रभाष्याविवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
सगान्तरेष्वमि वय्यवाचकशक्लयपेक्षस्तथेव सङ्केतः क्रियते । सम्प्रति- 
पत्तिनियतया नियः शब्दाथंसम्बन्ध इलयागमिनः प्रतिजानते ॥ २७ ॥ 


[ विवरणम्‌ | 
अथ त्रूयादनुमितात्‌ संबन्धादर्थानुमानमिति । स वक्तम्यः कथमनुमितः 
शाब्दा थंसम्बन्धः ? इति ॥ 


स चेत्‌ व्रूयात्‌-क॑द्नादर्थं हि प्रतील पश्वादवुमिनोति तस्संबन्धम्‌ । 
यथा चक्षुरा खूपपुपलम्य चक्षुस्पंवन्धमिति ! स प्रतिवक्त्यः--सिद्ध तर्हि 
वरिनाऽनुमानेन सब्दादेव प्रतिपत्तिरिति }; 


यो हि प्रष्टपकेनेव कृताथ; ङं तस्य किङोरिपाकेन | अपाप्तकृत्‌ 
परयोगदरनाद्‌ गृह्यते सम्बन्धः, यथाऽभ्निधूमयोरिति चेत्-- नतुत्रूमःनदहि 
सहस्नेष्वपि ग्रयोगे९ प्रक्षेण शान्दाथये; सन्धो गृह्यते यथाऽप्निधुषयोरादात्रपि 
संवन्धो गृह्यते । वाक्येऽप्ययमेव ॥ 


तस्मादवस्थितमेव वाच्यस्येश्वरस्य वाचकेन प्रणवेन सम्बन्धमवद्योतयति 
सङ्केतो यथा स्थितं पितापुत्रसतवन्धम्‌ । सङ्केतोपायपिक्षवात्‌ प्रथमश्रुतान्नाधः 
प्रतीयते । यथा चक्षुष आलोकामवि ॥ 


ननु च शब्दानित्यत्वपक्ने कथपनिल्ये सनन्धिनिं निलयः संबन्ध इति । 
न द्यनिखयो रञ्जुषटयोः संवन्धो निष्यः स्वात्‌ । उच्यते--यथा प्रमाणप्रमेययो- 
रिन्दियविष्रययोश्च क्रियाकारकाणां सं्रन्धः स्थित एवानियेष्वपि संबन्धिषु, 
तद्रदत्रापि स्थित एत्राम्यमिचपिण सबन्धः सर्गादिष्वपि व।च्यवाचकडक्य- 
प ०५ 
पक्षः सङ्खतः ॥ 

यथेव ॒ रूपचक्षुषरप्रद्यप्राहकरशक्तथपेक्षयैव सगदो सर्गस्तयेहापि 

#४ = (~ अ 

वाच्यवाचकरकत्यपेक्षयेव सङ्केतः करियते ॥ 

सम्ध्रतिपत्तिनिद्यतय। ब्रृद्धपरम्परयेव गम्यगमकमभावेन रशब्दाधयो; 
संप्रतिपत्तिर्निल्या नान्यथेति भगमिनो वेदवादिनः प्रतिजानते । सम्ध्रतिपत्तिश्च 
रब्दाथसवन्धस्य हेतुस्तदेषाम्‌ ॥ 

तदेतदुक्तं भव्रति--यदागमिपक्षः स्यादथान्यपक्षः, सर्वथा स्थित एव 
सबन्धः पितापुत्रयोखि सङ्कतेन।भिभ्यञ्यत इति ॥ 


समाधिपादः प्रथमः । ७९, 


[ भाष्यम्‌ ] 
विज्ञातवाच्यवा चकखस्य योगिनः-- 


॥ [ सूत्रम्‌ ] 
तज्ञपस्तद्थभावनम्‌ ॥ २८ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
प्रणवस्य जपः, प्रणवाभिधेयस्य चेश्वरस्य भावनम्‌ । तदस्य 
योगिनः प्रणवे जपतः प्रणवार्थं च भावयतः चित्तमकामरे सम्पचते । 
तथा चोक्तम्‌-- 

«५ स्वाध्यायाच्योगमासीत योगात्‌ स्वाव्याय्मामनेत्‌ । 
साध्याययोगस्तम्पच्या परमाम प्रकाशत ॥'” इति ॥ २८ ॥ 
किञ्चास्य मवति- 

( विवरणम्‌ ] 
वाच्यवाचकयोरस्थितसबन्धते तु प्रणवस्येणामिमुखीभव्रतीश्चर इति 
नावकल्पते । न हि पाच्यपाचकसंबन्धे न च स्थिते पाचकाग्न्युपादाने पाकार्थ 
कल्पते । स्थिते तु बाच्यवाचकक्षव्न्धे भगवद्‌।राधनताधनस्य प्रणवस्योपादान- 
मवकल्पत इति तव्परतिपादनार्थं सथ भाष्यम्‌ ॥ २७ ॥ 


एवमवगतव।च्यवाचकरसंवन्धस्य योगिनः परमेश्वरप्रसादनं कथे क्रियत 
इति तदथमाह-- तञ्जपस्तदथमावनम्‌ तस्येश्वरवाचकस्य प्रणवस्या्भचतुरमातरस्य 
त्रिमात्रस्य वा जपः मनसोपां्च वा आवर्तनं जपः, तदर्थस्य चेश्वरस्य 
प्रणवेन वाचकेन समपितस्य बुद्धे समारोपितस्य भावनमभिष्यानं तद्ैभावनम्‌ । 
कतैग्यमिति वाक्यशेषः ॥ 

तदेवमुमये कुवैतो योगिनः चित्तमेकाग्रं सम्पद्यते । एकाम्रसम्पत्िं च 
तदाराधनफलं दरोयति- तथा चोक्तम्‌--स्वाध्यायादयोगमा (तिष्ठत्‌ )सीत 
स्वाध्यायात्‌ प्रणवजपादीश्वर प्रह्यवनतचित्तः सन्‌ योगमाप्ीत । तद्मीश्वर 
ध्ययेत्‌ । (रस्ययत्‌ )तदथध्यानाचप्रचठितमना; स्वाध्यायं प्रणवमामनेत्‌ 
मनसाऽभिजपेत्‌ । मानक्षोऽभिजपः प्रास्यते ध्यानस्यासननतरतात्‌ । मा 
विषयप्रवणचित्ता भूदिति । एत्वे स्वाध्याययोग्तम्पच्या तद्विरोधिना 
प्रययान्तरेणानमिषातः स्वाध्याययोगस्रम्पत्तिः । तया च प्रणवजपपरमेश्वर- 
ध्यानसम्पस्या पर्‌ आता पसेष्ठी प्रकाशते योगिन इति ॥ २८ ॥ 


८० पातञ्ञल्योगसुत्रभाष्यत्रिवरणे 


सूत्रम्‌ ] 
ततः प्रत्यक्ूचेतनाधिगमोऽप्यन्तरायामावश्च ॥ २९ ॥ 


[ मध्यम्‌ ] 
ये तावदन्तराया व्याधपिप्रभूृतयः, ते तावदीश्वसणिधानान्न 
भवन्ति । स्वरुपदरनमप्यस्य भरति । यथेवेधरः पुरुषः शुद्धः प्रपञ्चः 
करेवछेऽतुपत्मः, तथा अयमपि बुद्रैः प्रतिसवदी यः पुरुषस्तमधि- 
गच्छति ॥ २९ ॥ 


# | 
[कै [क्ष 


अथ केऽन्तरायाः ? ये चित्तस्य क्क्षिपाः | के पुनस्ते? 
कियन्तो वा? इति- 


| तरिवरणम्‌ ] 
किश्चास्य भवति ? पूवैपूत्रे चित्तमेकाग्रं सम्प्यत इ्युक्तमेकं फलम्‌ , 
तदेपक्षया किञ्चेति चकारः । किंञ्चान्यदप्याप्ति फलम्‌ £ आदहोस्िचचित्तेकाग्रत्व- 
मेवेति; तत्राह- ततः प्र्यकूचेतनापिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च । ततः 
तस्मार्दश्नर्रणिधानत्‌ प्रयक्‌चेतनाषिगमः प्रयक्‌ स्वबुद्धि चैतयत इति 
प्रयक्‌ चेतन आत्मा, तस्य अधिगमो यथावत्छरूपतवेदनम्‌ ॥ 


ननु चाधिगत एव प्रयातं पुरुषोऽहं खी दुःखी चाहमिति । एवं 
प्रसिद्धं, ततः क्रि विशेषेणोच्यते इति । सप्येपवम्‌-- रिं वविरिषटोऽसौ 
प्रययश्चित्तस्य व्या । किंञ्च-- सुखी दुःखी चाहमिति षुखिदुःखिक्तामानाधि- 


। क 


करण्यदिदहाहप्रलयस्य चित्तद्त्तिविषयत्वादविद् प्र्यय एव प्रसिद्धिः ॥ 


कथं तद्यष्याधिगम इव्याद--यथेवेशवरः पुरषः शुद्ध; डेशादिमल- 
वर्बितस्तत एव प्रसन्नः स्वच्छस्तत ए केवलो निल्ञिगुणस्तत एव निर्प- 
स्स्तापत्रयवर्जितः प्रकृष्टसचप्रति्तमेदो च तथाऽयमपिं मदीयः पुरुष; शुद्धः 


प्रसन्नः केवलो निरुप बुद्धेः परतिसेवेदीयवगच्छति ॥ 


यथा तयेति च दृान्तदाटन्तिकनिर्दशादीश्वरकषेत्र्ञयोर्भद उक्तो 
भवति । बद्धमुक्तोपपत्तेश्च । प्रधानस्य पारार्थ्योपपत्तेः । क्षत्रज्ञानां चात एव 
परस्परभेदः ॥ 


सभाधिपादः भ्रथम॑ः ८१ 


[ सुत्रम्‌ ] 
व्याधिस्यानसंशयप्रमादारुस्याविरतिभ्रास्तिदशनान्ध- 
भूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः ॥ ३० ॥ 
[ भाष्यम्‌ ] 
नवान्तरायाश्चित्तस्य विक्षिपाः । संहते चित्तवृत्तिभिभैवन्ति । 
एतेषामभवे न मवन्ति पूर्वोक्ताधित्तवृत्तयः । ग्यापिः धातुरसकरण- 
वेषम्यम्‌ । स्यानम्‌ अकर्मण्यता चित्तस्य । संशयः उभयकोटिर्क्‌ 
विज्ञानम्‌ 'स्यारिदमेवे नेवं स्यात्‌" इति । प्रमादः सम।षिसाधनानाममाव- 
नम्‌ । आलस्यं कायस्य चित्तस्य च गुससवादभरवृत्तिः । अविरति; 
चित्तस्य विषयपम्प्रयोगास्मा गर्षः। 


[ विवरणम्‌ ] 
किश्चास्य भवति १ ये तावदन्तराया व्याधिप्रभूतयो वक्ष्यमाणास्तेऽपि 
चास्येश्वरप्रणिषानान्न भवन्ति ॥ २९ ॥ 


तत्र कै तेऽन्तरायाः ? कियन्तो वेवाह--व्याधिस्यनेयादि । 
संषयया तवन्नवान्तरायाः । स्वद्पेण च व्यत्यादयः । व्याधिषातुरसकरण- 
वैषम्यम्‌ । धातवो बातपित्त्ेष्माणस्तेषां विषममावो वैषम्यं, त 
वातपित्श्ेम्मभूविष्दरव्योपयोगादिम्यो जायते । स्वयोन्यागमे हि धातूना 
बरद्धिमाचक्षते ॥ 


रस॒ उपयुक्ताारस्य परिणामविशेषः; । स च सप्तधा, रसकर्यतवादरप 
इत्युष्थते रसलोहितमेदोमांसास्थिमनश्युङ्का्यः । तस्य वेषभ्यं बरद्धिक्षयौ । करण- 
वेषम्यमन्धनधिरतादि ॥ 


स्यानमकर्मण्यता चित्तस्य स्तिमितम्‌ । संशयः स्यणुवी पुरुषो वेति 
विरुदधोभयकोटिसपक्‌ प्रययः ॥ 


प्रमादः समाधिसाधनानामभावनमदील्नम्‌ । भारस्यं कायस्य 
चित्तस्य च गुरुतवादप्रवतेनम्‌ । भविरतिशित्तस्य विषयसम्प्रयोगस्वभावो 
विषयस्प्रयागनिमित्तो वा गद्धंः अभिका तृष्णा ॥ 

11 


८२ पातञ्चख्योगसुत्रभा्यविबरणे 


[ माष्यम्‌ | 
` अन्तिदशेनम्‌ विपयेयज्ञानम्‌ । अरन्धभूमिकतवं समाधिभूेरलामः। 
अनवस्थिततं यष्ठन्धायां मूमो चित्तस्याप्रतिष्ठा । समापिप्रतिरम्मे दहि 


सति तदवस्थितं स्यात्‌ इति । एते चित्तविक्षेपा नव॒ योगमलाः, 


ष [नकप विप ध 


योगग्रतिपक्षाः, योगन्तराया इलभिधीयन्ते ॥ ३० ॥ 


| सूत्रम्‌ 
व विक्षेपसहभुवः ॥ ३१॥ 
| भाष्यम्‌ ] 
दुःखम्‌ आध्यालिकमापिभौतिकमापिदेविकं च । येनाभिहताः 
प्राणिनः तदपेवाताय प्रयतन्ते तदुदुःखम्‌ । दो्मैनस्यम्‌ इच्छाविषातेतसः 


[ विवर्णम्‌ । 
+भ (~ © * ५ न [+ 
प्रानितिदशंनं विपर्ययज्ञानं योगसाघनेषु तन्मर्म षा विपरीतद्ृत्तिः । 
अरुग्धमूमिकत्वं समाधिभूमेरखामः । भूमयो वितकौदयश्चित्तस्य धमेविरेषा 
उक्ता वक्ष्यमाण।श्च । अनवस्थितायामपि समापिभूमौ ततः कथमपि प्रचलितस्य 


चित्तस्य पुनस्तत्रावस्थितत्वेव स्यत्तदलामस्वनवस्थितस्वमुच्यते ॥ 

तदेते तवान्तरायाः । अन्तरं वरव विच्छेदं कुन्त आयान्तीलन्तरायाः 
्षेपाः, प्रतिपक्षा: योगप्रतिरपस्तणीः । एते च सह चित्तवृत्तिमिमैवन्ति । 
त्तं॑विक्षिपन्ति विषयेधिति चित्तविक्षेपः । क्षिप्रं ते क्षिपन्ति] सहेते 


तिभिः पञ्चतयीमिरन्योन्यप्रयेज्यत्रयोजकमावेन भवन्ति । अथेषामभवि 
व्याधिप्रमृतीनाममवि सहायवलामावान्न भवन्ति पूरवोक्ताःप्रमाणादय- 


4 क न 


ध्रित्तव्रत्तयः । तद्धावम।वित्वात्तुल्यग्रल्ननीक। वृत्तिविक्षेपा इव्युक्तं भवति ॥ २० ॥ 


॥५| 


दुःखं येनामिहताः प्राणिनस्तदपघाताय प्रयतन्ते चेष्टन्ते । तच्च 
त्रिविधम्‌ । आध्यात्मिकम्‌ + अधि भास्नीलध्यात्म्‌ , तत्र भवमाव्यालिकम्‌ | 


(५ (+ 


तच शारीरं मानक्तं च । सरीरं धातुरैषम्यादिनिमित्तम्‌ | मानसमिष्टविधातादि- 
हेतुकम्‌ । आधिभौतिकम्‌ अपि भूतेष्विदयधि भूतम्‌ , तत्र भवमाधिभौतिकम्‌ । 
तच्च पञ्यमृगादुपनिपतितम्‌ । आधिदैविकमिंति अधि देवेभिल्यधिदेवम्‌ 
तत्न भवमापिदेविकम्‌ । भध्यास्ादिभ्यष्ठक्‌' इत्युपसंख्यानात्‌ ठक्‌ 1 अनुाति- 


कादिलादुभयपदघरद्धिः । तच्चापि वातवषीदिनिभित्तम्‌ । तदेकमेव सन्निमित्तमेदेन ` 
रजोरूपं भिघते | 


समाधिपादः प्रथमः ८३ 


| भाष्यम्‌ || 
क्षोभः । यदङ्गान्येजयति कम्पयति तदज्गमेजयतवम्‌ । प्राणों यदद्य 
वायुमाचामति स श्वासः । यक्कौष्ठवं वायुं निस्सारयति सर प्रशवासः। 
एते विक्षेपसहभुवः । विक्षि्तचित्तस्येते भवन्ति । समादितचित्त्येते न 
भवन्ति । अयते विक्षेपाः समाधिप्रतिपक्षाः ताभ्यामेवाभ्य।सवेराग्याभ्यां 
निरेद्धव्याः ॥ ३१॥ 


तत्राभ्यासस्य विषयमुपसंहरन्‌ इदमाह- 


[ सूत्रम्‌ ] 
ततप्रतिषेधाथमेकतच्वाम्यासः ॥ ३२ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
विकषेपप्रतिषेधारथमेकतसारम्बनं चित्तमभ्यपेत्‌ । 
[ विवरणम्‌ |] 
दोमेनस्यमिच्छाविधाता्रेतसः क्षोभः अकुरछामावः सश्वरुनम्‌ । 
यदङ्गान्येजयति कम्पयति तदज्गमेजयसवम्‌ । (न्‌ तच्च प्राणायामा्धाम्यास- 
परमवश्वासतावपि तथा समुद्भवः) यद्राह्यं वायुमाचामति बाह्वायाराकरण- 
ब्ाहुट्कं [स्यम्‌ ] निष्रमणमन्दता च शासुः । तदिपरीतन्यपारः प्रधासः-- 
यत्कौ्ठवं वायुं निस्सार्यति । एते विक्षेपसहभुवः विक्षेपैः सहते विक्षि 
वित्तस्यैव भवन्तीति विक्षेप्हसुवः । समाहितचित्तस्यैते न मवन्तीति 
यावत्‌ । यावदावच्चेतः समाधीयते तावत्तावन्न भवन्तीति । ताम्यामेवाम्यास- 
वैयग्याम्पापरपरामपितम्याः ¡ नान्यं प्रतिपक्षमयेक्षन्ते ॥ 


अम्यासवेराप्ये मुक्ला न हि प्रसेश्चरप्रगिध।यिन्यः[म्यः प्रभावे मवतीति 
गम्यते । "अन्त्रायामावश्चः शइ्युक्या प्राक्तनादपीश्चरणिधानादन्तराया 
निर्ष्यन्ते ॥ ३१ ॥ 


अम्यप्षवेराग्याम्यां तन्निरोध ह्युक्तम्‌ । तत्र वैराण्यविषयः 
प्रतिपादितः । इदानीमम्यापतस्य विषयमुपतंदरनाह--तसरतिषेषारथैमेकतत्वा- 
भ्यास इति । तेषां विक्षेपाणां प्रतिषिधाय तसखतिषेषार्थम्‌ । रकं त. 
मेकतसम्‌ । तच्चैकं तत वस्तुलान्नाम्यसितुं॑राक्यम्‌ । न द्यात्भादिवस्तुनां 





1, यो. षू. षा. 1, दु. 29 


५५ > म 
८ पततिज्ञखयागसूत्रभाष्याववरण 


[ माष्यम्‌ ] 
यस्य तु प्र्यथनियतं प्र्ययमात्रं क्षणिकं च चित्तं तस्य सरवैमेव 
वचित्तमेकाम्रम्‌ । नास्येव विक्षिप्तम्‌ । 


यदि पुनरिदं सवतः  प्र्याहय एकस्मिन्नर्थे समाधीयते, तदा 
मवस्येकाग्रमिलतो न प्र्थेनियतम्‌ । 


[ चिवरणम्‌ | 
रीर्ने वक्तुं राक्यते । स्वमाह्यभाग्यावस्यितानि हि तानि न चित्तमत्रानि । 
वस्तूनां ॒तु॒ चित्ततन्त्रतां प्रतिषेधयिष्यति- (न॒ वैकचित्ततस्त्रं वस्तुः 
इत्यादिना । तस्मदितदाशङ्कमानो माप्यकार आह--एकतत्वारम्बनं 
चित्तममभ्यसेदिति । सूत्रेऽप्येकतच्ाम्यास इति समासादयम्थै उपात्त ए ॥ 


ननु नैकं चित्तमवस्थितमस्ति, यस्यैकतत्वावरम्बनः प्रयय अपद्यत । 
्रयय। एव चित्तम्‌, ते च प्रलथै नियताः क्षणप्रणाश्चिनश्च । प्रयातमसंवेधं च 
प्र्यानामनवस्थितत्वम्‌ । नपि प्रल्यम्यत्तिरेकेणावस्थितं प्रययि चित्तं नापो- 
पटम्यते । योऽप्यहमेवाहमिति प्रययः सोऽपि समानप्तन्ततिपतितच्ा- 
{सादृश्यनिबन्धनः । यथा स एव प्रदीपः त एव केरा इति ॥ 


तदप्याह-- प्रह [प्रति प्रघ्ययं प्रलय भिनः, प्रप्ययेम्योऽव्यन्तपरस्पर- 
भिननेम्योऽनन्यत्वात्‌ । एकैक्रसययस्वरूपसद्रतंमानादहेप्रद्ययविधयः प्रलययी 
भूतभविष्यत्काराहंप्र्ययविषयात्‌ प्रलपिनो भिनः, भिन्नप्रलयविषयत्वात्‌ + 
घटात्‌ (घ) पट इव । यदि वा--मिन्नकार्त्वात्‌ , विनष्टमविष्यद्वटाम्यां 
वतमानो घटः [इव] । अर्हप्रयया वा स्वै भिनाङम्ब्रनाः, प्रलयत्वात्‌ + 
घटपट(दिविषयप्र्ययवदिति ॥ 


अत्राभिधीयते-स्वशरा्ञषिरोधोऽपि स्यदेव त्रुवत इत्याह- क्षणिकं च 
यश्य चित्ते ठस्य स्वेमेव चित्तम्‌ एकाग्रम्‌ विक्षेपामावदेव नास्सेव 
विक्षिप्रमिति स्वैचित्तेकाम्रवाद्िक्षेपप्रास्यमावादिक्षेपप्रतिषेधाय शान्लोपदे- 
दोऽनथकः स्यात्‌ । अस्ति च चित्तपरिकमयं कैतयाुपदेशः । स च 
विरुष्येत इत्थ॑धर्मं चित्तमम्बुपगच्छतः ॥ 

ननु च तवापि वृत्तिषृत्तिमतोरमेदादतुपपनो विक्षेप इति तस्परति- 


^~ 


पेधोपदेशान्थक्यम्‌- नैष दोषः-- वर्तिवृत्तिमाम्युपगमात्‌ ॥ 


समाधपादः प्रथमः ८५ 


[ भाष्यम्‌ | 
योऽपि सद्यप्र्ययप्रवाहेण चित्तमेकाग्रं मन्यते, तस्य एकाग्रता 
य॒दि प्रवाहचित्तस्य धर्मः, तदा एकं नासि प्रवाहचित्तम्‌ ; क्षणिकत्वात्‌ । 


[ विवरणम्‌ | 
यदि बृत्तय एव परस्परभिनाः स्वतन्त्रा इत्तिमतोऽ्न्तमिन्ना जायेरन्‌ 
प्रदर्थनियताश्च, तत एष दोषः स्यात्‌ । न चैवमभ्युपेयते ॥ 


कथं तर्हिं £ दृत्तिमदरपेणेकमनेकार्थं च तदृढ्तीनां विषथमेदादवस्यितं 
च सदसतोर्विपर्ययानभ्युपगमादिलेवमाप्पक्षे समन्ञसतां दर्चयति- 
यदि पुनरिदं चित्तं दृत्तिमेदननिकधा (म्मिङावयवद्धि) प्रतं साङ्ए्ययोगवादिन 
इव तवापि स्वेतः सवभ्यः विषयेभ्यः प्रह्याह््य प्र्यानीयेकस्मिनासराचर्थे 
समाधीयत स्यप्येत तदा भवयेकाग्र पुरुषग्रयासभाग्यलाहमिवयर्थः ॥ 


ततो युक्तस्तत्पर्किर्मणे शाज्ोप्देरः । (अते न प्र्क्षम्‌ ) अतोऽस्मात्‌ 
कारणात्‌ तत्परकिमविषयशाखेपदेशात्‌ सांस्ययोगव।दिवत्‌ क्षणिकवबादिनोऽपि 
एकमनेका्थमवस्थितं च चित्तं न प्रयथैनियतं (व) पश्वादम्युपगमनीयम्‌ । 
अन्यथा शास्रविरोधः स्यात्‌ । योऽपि सद्शप्रत्ययप्रवारं चित्तमकात्रे मन्यते 
सदाः समानः प्रलयप्रवाहो यस्येकस्यां सन्ततौ तच्चित्तमेकाग्रम्‌ । तद्विपरीतम्‌ 
असमानप्रलययप्रवाहं॑विक्षिप्तम्‌ । तथा चैकाप्रता विक्षेपप्रतिषेषेनोपपदते, 


तदर्थोपदेरश्वेति कुतः शाच्लपिरोध इति ॥ 


इतर आह--न प्रवाहचित्तस्येकस्य धर्मिणोऽनभ्युपगमात्‌ । न हि 
प्रवाहचित्तं नमेकमर्ततवतंमानमविष्य्प्रलयानां धर्मिणमभ्युपगच्छति । 
यदि ह्यभ्युपगच्छेत्‌ परिक्तः स्वपक्षः ] कस्मात्‌ ! प्रवहचित्तस्याक्षणिकतवात्तदेवैकं 
नास्ति, यस्थैकाप्रता घमः | प्र्ययनेव हन्येन्यसहतान्‌ पिपीठिकापङ्किकल्पानसाव- 
म्युपगच्छति ॥ 


अयेवं मन्यते, यथय्येकं नास्ति तथपि सरवषमिव प्रययानां सद्श- 
प्रवाह्मणपिकाप्रता धमः प्रदीपार्चिषामिव प्रकाश इति- तत्राद--नायुगप- 
त्कारोदत्तित्रिनारानां समाहारः सम्भवति । दष्टन्तस्य च साध्यविकसर्ूत्वात्‌ । 
न हि बहीनामर्चिषामेकः प्रकाराः । प्रलविषमस्य भेदात्‌ । नचापि प्रकाशस्य 


विषां चैको धर्मो नामास्ति ॥ 


८६ पातज्ञलयोगसूत्रभाष्यविवरणे 


[ भष्यम्‌ | 

$. © 
अथ प्रवाहांशस्येव प्रलयस्य धर्मः, स सवैः सद्श्रययप्रवाही 
वा॒विसदराप्रययप्रवादी वा ्रर्थनियतत्वादेकग्र एवेति विक्षिप्तचित्ता- 


नुपपत्तिः । तस्मदिकमनेकाथेमवस्थितं चित्तमिति ॥ 


यदि च चित्तेनकेनानन्विताः स्वभावमिन्नाः प्रयया जायेरन्‌, 

अथ कथमन्यप्रयय््टस्यान्यः स्मता . मवेत्‌, अन्यप्रययोपचितस्य च 
कमाशयस्यान्यः प्रय उपमेक्ता भषेत्‌ ॥ 
| विवरणम्‌ | 


अथापि मन्यते प्रवाहांशस्येव प्रयस्य कस्यचिदेकाप्रता धर्मः; 
यथेकस्यां पिपीलिकासन्ततव्रेकापि पिपीरिका लोहितेति- तच्च न--पूरवदोषा- 
नुषक्तेः । सवैः प्रययः प्रवाहाः सद्वादी विपद्शवादी वा पूरवैवत्‌ 
प्रयथनियतत्वादेकाग्र एषेति विक्षिप्तचित्तानवष्पिः । तस्मादकमनेकाथ- 
मवभ्थितं च चित्तमम्युपगन्तव्यम्‌ । यदि राल्चेण चित्तपरिकिरमोपदेकष्यते ॥ 


करं च-- यदि चिततेनकेनानन्विताः करणेन स्वभावमिन्नाः प्रयया 
जायेरंस्तदा बूहि कथमन्यप्रययदषटस्यान्यः प्रययः स्मर्ता मवेदेवदत्तदृ्टस्थव 
यज्ञदत्तः । अन्यप्रस्ययोपचितस्य वा कमीरयस्यान्यः प्र्यय उपभोक्ता ॥ 


न हि भविष्यपपुत्रः पित्रा रचितकर्मारायफङं स्वर्गदि प्रत्युपसुक्षीतं । 
अथ त्रयात्‌ विरिष्टमविष्यदपुनविज्ञानार्थं॑विनरयघ्रङृत्तिविज्ञानमारयवि्ञान- 
संस्कार कञश्चनाधत्ते इति- नैतदेवम्‌--आल्यप्रवृत्तिविज्ञानयोरयन्तमेद।द- 
वप्तुत्वाच्च ॥ 


यथाल्यविज्ञानान्न तत्महत्तिविज्ञानं, तदा तदेव तदिति नाममात्रमेदः+ 
तथा च संस्काराघानयुक्तवात्‌ स्मृत्यनुपक्टटपति; । अथाप्यन्यत्‌-एवमप्यन्यत्प्रबृत्ि- 
विज्ञान मायविज्ञनि संस्कार नादधीत, भिनत्वात्‌। यथा सन्तलयन्तराख्यविज्ञाने ॥ 


विच--य्पि संस्कारमाधत्ताम्‌ , तथापि प्रदृत्तिविज्ञानापादितसंस्कार- 
माटयविज्ञानं देरकालन्तराक्षमम्‌ । तस्यापि क्षणिकत्वाम्युपगमादविनश्यत्च 
{` (~ 


तावलेव नेत्तरविज्ञनोपकाराय पयापरोति । देशकाकान्तर्यवहितं चेदुपकुर्बीत, 
तदा भिननतन्तानान्तरजन्मनाप्युपकतेग्यम्‌ || | 


समाधिपादः प्रथमः ८७ 


अथ कालान्तरावस्यायि, तदा क्षणिकत्हानिः । क्षणान्तरं चेदवतिष्ठेत, 
दौैकाठाबस्थायिषे क्य स्यादक्षमा ॥ 


अथापि ्रदृत्तिविज्ञानसं(कारविरि्टस्यान्तरारुभाविन आममतदरास्य 
भविष्यत आख्ययिक्ञानस्य संस्कारमाधाय पू्वमाख्यविज्ञानं विनद्खुथतीति-- 


तच्च न- संस्कारान्तरामावात्‌ । अस्ति चेदनवस्थाप्रसङ्गः । अय 
नास्लयाधारः,) तत्र कि प्रद्त्तिविन्ञानस्याख्यविज्ञानकल्पनया संस्क।राधानाय । 
यथा आच्यविज्ञानमुषित्तिष्यमाणस्य तत्काकमसतः आल्यनिज्ञानस्य संस्कार- 
माधत्ते, तथा प्रवृत्तिविज्ञानपपि उपि्षिष्यमाणस्य ततकालमप्ततः प्रदृत्तिवि. 
ज्ञानस्येव संस्कारमाधत्तामनयपेश्ष्याख्यविज्ञानम्‌ ॥ 


न च विनर्यत्‌ अन्यस्य भाविनस्तत्क।छमविधमानस्य संस्कारमाधत्ते 
इयस्य दृष्टान्तो दृरयते । नापि माविन्येव संस्कारं कुर्वत । पूर्वेण मविष्य- 
त्तस्रियते, भविष्यति चेति विरुद्धम्‌ । तत्कालं चेदसद्गविष्यत्संक्रियते, 
कि तुल्यातुल्यसन्ततिकल्पनेन १ असंबन्धाविशेषात्‌ सर्वै सवण संस्क्रियत ॥ 


नापि मविष्यद्धिनरयतोयुगपदुसत्तिविनाशवक्षणिकलप्रसङ्गात्‌ । भय 
तुलन्तयोखि नघ्युनती युगपदपततरिनाशोत्तरसमुपत्ती स्याताम्‌ (न) वस्तुनारिति 
चेत्‌-न-अम्युफगमविरोधात्‌ । नहि वैनारिकेनोत्पत्तिविनाशक्रिया- 
व्यतिरेकेण कारकमन्यदिष्यते । अभ्युपगमे च सिद्धान्तविरोधः ॥ 


किच--अन्यत्वे च .करियाकारकयोयावत्कियोत्पत्ति कारकेणावस्थातन्य, 
ततश्च क्षणिकवहानिः। अ[न |वस्थाने च क्रियायै ततः[तस्य] उपादानमनर्थकम्‌ ॥ 


किं चान्यत्‌-- क्रियाथा एव कारकत्वे कारकस्यापि क्रिया 
करियाकारकरान्दौ पयौयौ स्याताम्‌ । ततश्चाद्छुरो जायते, देवदत्तो जायत 


¢ ¢ (~ 


इ्यङ्कुरदेवदत्तयोः पथायत्वं स्यात्‌ । तयोजंनितक्रियामात्रत्वात्‌ ॥ 


अथ अन्यजनिक्रिया देवदत्तविशिष्टा अन्या चाङ्कुरविरिषेति चेत्‌-- 
अभ्युपेतं तहिं विरोषणे कारकं, न हि स्वख्पेण रकिचिद्िरिष्ट स्यात्‌ ॥ 


अथोच्येत, स्वद्येणवेत्प्तित्रिय। उदत्तिक्रियान्तरादिशिष्टा यथा 
स्वलक्षणानि रूपादीनि इति--तच न- मवाभावयेरिकरवभप्गात्‌ । इद्ाङ्कुरो 
जायते नस्यलङ्छुर्‌ इति च य॒ एव॒ जायते सु एव॒ नर्यति तत्राङ्कुरजनन्‌, 


८८ प।तञ्जलयोगसूत्रभाष्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
'कथशच्धित्‌ समा्धीयमानमप्येतत्‌ गोमयपायसीयन्यायमाक्षिपति । 
किंच-- स्वारानुमवाप्ह्ववः वचित्तस्यान्यतवे प्रभोति । कथम्‌ ? 
'्यदहमद्राक्षं॑त्स्पृशाभि' भ्यन्चास्परक्षं तस्पश्यामिः इयहमिति प्रयः 


[ विवरणम्‌ | 
मङ्कुरविनारनमिति जननं विनाश ॒इ्युक्तं भवति । अद्रे हि क्रियेव 
कारकमिति वेच्येत (चितः) ॥ 


अथापि स्यात्‌--अन्ये(न्यस्येवाङ्कुरजननक्रियाया अङ्कुरविन।रा- 
त्रियेति- तयाऽप्यङ्कुरजननस्य निद्यतप्रसङ्गः । विनाशस्यन्यत्वदिव ॥ 


अथापि नाश्चजननवद्रस्तु राबरमिति, तथाऽप्यभावस्य इाबल्त्व 
प्रस्तभ्येत । कथम्‌ ? क्रियाभ्यतिरिक्तस्य कारकस्यामवेऽपि नादा एव जननवि- 
नाङ्ावान्‌ जननमेव जननविनाशवदिति । न ह्यभावस्य शनख्तादिविदेषो 
निर्विरोत्मवाद्भावाभावयोश्वाविरोधात्‌ प्रयक्षानुमानानुपपत्तिः ॥ 


यदप्युच्यते- तुखन्तयेन॑मेनामाविति- तत्र युक्ता तुखन्तयोरेक- 
कालयोर्विवमानत्वादन्यतरस्य वस्छन्तरगोखनिमित्ता आनतिरन्यतरस्य चोन्नति, | 
इह पुनर्मवद्भविष्यत्कालयोर्वजञानयोनीशोत्पत्ती तुानामहेतुवत्ततीयस्य 
निमित्तान्तरस्यामावदेककारं नोपपद्येते । विनश्यदेव विज्ञानमालसस्री 
जनयतीति न राक्यं वक्तुम्‌ । न हि देवदत्तो प्रियमाण एवाससमानं पुत्र 
जनयति विनारोनाक्षणलात्‌ ॥ 


अथ मूतिण्डो यथा घटपुतादयन्‌ विनदथति, तदिति चेत्- तच्च न-- 
मृदवयवानामेव घटाकरण परिणतघात्‌ । एकैव हि मृिण्डवटादि- 
बहुधयोगिनी ॥ 


यच्चपि भीजेषु द्रन्थान्तरवाप्तितेषु वास्तकद्रब्यानुविधायितव बास्यद्रव्यस्येति- 
तदप्यक्रारणम्‌ वास्यवासकयेरस्थितत्वात्‌ । अवस्यितान्येव हि बीजेष्वङ्कु- 
रादीनि वास्यन्ते बीजवसनेन । तदन्यखात्‌ वाप्तकद्न्यस्याप्यवयवाननुप्रविष्टः 
सूक्ष्मा विधन्त एव । तस्माद्विथमानान्येवद्कुरादीनि बीजवाप्तनया वास्यन्त 


{. विवरणरीत्या इदं पदं भाष्ये नास्तीति भाति | 


समाधिपादः प्रथमः ८९ 


[ माष्यम्‌ | 
स॒वेस्य प्रयस्य मेदे सति प्रययिन्यभेदेनोपस्थितः । एकप्र्पि- 
विषयोऽयमभेदासमा अहमिति प्रययः कथमलन्तभिननेषु चित्तु 
वतमानः सामान्यमेकरं प्रयपिनमाश्रयेत । स्वाुभवम्राद्यश्वाय- 
मभेदासा अहमिपि प्रलयः । 


[ विवरणम्‌ ] 
इति युक्तम्‌ । असतां हाविषाणादीनामुपस्यभावात्‌ । असतां चेदुखत्तिः 
स्याद्रास्यवाप्तकयेर्विनष्टवादवियमानलाविरोषे वासक्द्रन्याननु विधापि नोत्पयेत । 
अन्यद्र। हस्तादि ॥ 


यदि वा, अलन्तास्तदेव शङाविषाणाद्ुपयेत । अतो विरिष्टं हि त्रयाण- 
मस्ये वासिते बजि | तस्मादवश्ितं कारकं भूतभविष्य्कालनेकड्कत्तियोगि 
चाभ्युपगन्त्यम्‌ । अन्यथा प्र्ययमात्रे क्षाणिकं चित्तमिति समथयमानस्य 
समाधीयमानमपि (समध्यैमानमपि) गोमयपायसीयन्यायमाक्षिपति ॥ 


ययैव बहुमिरपि गोविकारत्वादिदैतुभिः समीहमाने कृतटेपिनापि 
गोमयं पायसीकर्तुं न शक्यम्‌, तथा क्षणिकेन चित्तेन सारणादि सम्थयितुम्‌ ॥ 

किंश्च- स्वासानुभवापहवः चित्तस्यान्यत्वे प्रययमात्रते नान्यदृष्ट- 
मनुस्मरतीति स्वात्मनानुभूतमपहूवरीत ॥ 


वि ल्मदक्षील्युक्तो दृष्टवानपि नाहमद्रक्षमिति ब्ुषीत । अन्येन हि 
तत्पक्षे तत्‌ दृष्ट दर्॑यते | तदपहुत्र चानुभूतस्य प्रतिपत्तिः कथम्‌ ? 'यदहमद्राक्षं 
तत्‌ अहमेव स्पृशामि "यदहमस्पराक्षं तत्‌ अहमेव स्मरामि' इति । सेषा 
प्र्यस्मरणयोरेककर्तवे सति घटनामुपटौकते प्रतिपत्तिः । अन्यथा मत्स्यो 
यदद्राक्षीत्तःसघ्योऽहं तं स्प्श्षामीति स्मरामीति च स्यात्‌ । सर्वस्य 
पुरुषस्याहूमिति प्रयः स्ृतिप्र्ययेोरेकसिन्‌ कतैरि वर्तमानः प्र्ययमेदे 


पदयामि स्परञचामि स्मरामयदिप्रलयमेदे सति तेषां च प्र्ययानमेकस्मिन्‌ 
कर्तरि प्र्ययिन्यभिन्ने चोपस्थितः प्रयक्षश्च ॥ 

नन्वेकप्रययविष्रय एवन्यः स्मृतेरेकवेऽपि कर्तुरहं प्रयेमि स्मराम्यहमिति 
नच न मवितभ्ये, प्रयेता स्मर्तेति शब्दभेद द्वद एव । तत्राह-न-प्रयक्षत्वात्‌ । 


तदेव द्यति-- स्वानुभवग्राह्यश्चायमभेदास्मा अहमिति प्रयः ॥ 
। ४1 


९० पातज्जलयोगसूत्रभाष्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
न च प्रक्षस्य माहात्म्यं प्रमाणान्तरेणाभिभूयते । प्रमाणान्तरं च 
प्रयक्षचटेनेव व्यवहारं लभत । 


[ विवरणम्‌ | 
अथ प्रलेता स्मर्तेति रब्दभेदात्‌ प्रल्मयमेदाच्चाहम्प्र्ययस्य मिन्नविषरयत्- 
मनुमाविष्यत इति चेदत आह--न दहि प्रक्षस्य माहाद्यं प्रामाण्य 
चक्षुषो रप इवानुमानादमिभूयते बाध्यते ॥ 


वि च~ -प्रयक्षं प्रमाणमयमहप्रल्यो न तत्‌ स्मृतिप्र्ययानमिकस्मिन्‌ 
कर्तरि सामन्येन वतमानः । सचेत्‌ प्रलक्षप्रमाणभूतोऽलुमानेनामिभूयेत) 
तदानीमतुमानस्यापि प्रमाणव हीयेत । तन्मूललादनुमानस्य । तदेतदाह-- 
प्रमाणान्तरं च प्र्क्षबटेनेव प्रामघ्यन्यवहारं मत इति । तेन 
्र्यक्षविरेभेन अनुमानविदरेधन च प्रतिवादि(पादितीप्रमाणप्रतिज्ञदिभो 
व्यास्यातः ॥ 


अतीतानागतप्रव्ययसस्काराघारादनन्यः इदानीन्तनप्रस्ययसंस्काराधारः, 
एकसन्तामक्तबन्िवे सति बेघाघ्मकलात्‌ , आमस्वरूपायथा ॥ 


भूतमविष्यलमत्ययतस्काराश्रयः वतेमानप्रत्ययसस्काराश्रयादनन्यः, एक- 
सन्तन पजन्य सति बोधा्मकत्ात्‌ , आतमन इव स्वरूपात्‌ ॥ 


वतेमानाहेप्रययी मूतभविष्यल्मघ्ययिभ्यापभिनः, एकंसन्तानयोगे 
सति प्रत्पयित्रात्‌ , यथा स्वरूपात्‌ ॥ 


भूतमविष्यसत्ययिभ्यामनन्ये वतमानः प्र्ययः) एकसन्तानप्तजन्धे 
सति बोधाप्कत्वात्‌ , आतमरागस्वूपादिम्य इव ॥ 


भूतमविभ्यस्मव्ययेभ्यो नान्यो वतमानः प्रत्ययी, एकसन्तानसंन्धिवि 
सति बोधाप्कलात्‌ , आत्मनो यथा सर्पात्‌ ॥ 


भिन्नप्तन्ततिषु परस्परस्परतिप्रतिसन्धनाधनुपठम्भदिकपन्तानेषु च 
समर्थादिदरनदिव सिद्धमेकक्ततम्‌ । तथा स््रमणेभ्यो गरीयसा प्रघयक्षेण 
प्रमाणेन | तत्र न रिंचिदनुमानेन साध्यम्‌ | न हि कश्चित्‌ करतरलान्छनदिद्क्षया 
दरपैणमादत्ते | तथाऽपि वैनारिकोपररचितानुमानापक्लदमप्तहमानाः केचित्‌ प्रव्यनु- 


समाधपादः प्रथमः ९१ 


[ माष्यम्‌ | 
तस्मदेकमने ाथमवस्थितं च चित्तम्‌ ! यस्य चित्तस्यावस्थितस्येद 
शस्त्रेण परिकर्म निर्दिश्यते ॥ ३२॥ 
तत्कथम्‌-- 
नी शत ॥ सतम्‌ ] वि । 
करुणासुदितापेक्षाणां सुंखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां 
भावनातधित्तप्रसादनम्‌ ॥ ३३ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
तत्र पपप्राणिष्च युखसम्मोगापननेषु मैत्रीं भावयेत्‌ । दुःखितेषु 
करुणाम्‌ । पुण्यात्मकेषु मुदिताम्‌ । अपुण्यश्ीटेषुपेक्षाम्‌ । एवमस्य 
भावयतः शङ्को धर्म उपजायते । ततश्च चित्तं प्रसीदति । प्रसन्नमेका्रं 
स्थितिपदं लभते ॥ ३३ ॥ 
[ विवरणम्‌ ] 
मानानि पेराखनि दर्शयन्ति । तथा चाह--तस्मादेकमनकाथमवस्थितं च 
चित्तम्‌ । यस्येदं शाश्चेण परिकमं निर्दिश्यत इति--शाज्नोपदेरसम्बन्धिवव 
चित्तस्यावस्ितवे हेतुपुपदिरशति । न हि विीर्माणस्य घटस्य प्रक्षारन- 
परिवर्तनादितस्कारः कियते ॥ ३२ ॥ 
कथं चित्तपरिकम निर्दिद्यते ए तथेकतच्वाम्यास्त इति चोक्तम्‌ , किं च 
तदेके तचम्‌ £ यद्धिषयोऽम्यास इति । तत आह-- 
मेत्रीकरुणामुदितेपेक्षाणां सुखःदुखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनात- 
श्चित्तप्रसादनमिति । मेत्री मित्रबिषया भावना) ताशी सुविते घुखमदुमोद- 
यनतीमसूयादिवर्जिताम्‌ । तथा दुःखितेषु कर्णां कृपाम्‌. अनु नानतीं दुःखम्‌ । 
पण्यासमकगु मुदितां पुण्यशीर्तामनुजानतीम्‌ । अपुण्यश्शीठेष्ु चेपिक्षाम्‌ 
अपुण्यरारन्यापरिषूदाक्षीनतां च भाक्ेदिलयनुषञ्यते ॥ 


सकत्रैवमस्य भावयतः, शङ्क इति विञ्जुद्धः प्रण्युपघातादिवर्जनाच्छुकञो 
धर्मः ¦ ततः स धमे इव जातश्चित्त प्रसादयति । तेन प्रसन्नं चित्त- 
मेकाग्ं स्थितिपदं ठमते । एकाग्रतया समाधीयत इत्यर्थः तदुक्तम्‌--“प्रसन्न- 
चेतसो ह्या बुद्धिः पर्यवतिष्ठते' इति ॥ 





1, म, गी, 2. 63. 


९२ पातञ्जलख्योगसुत्रभा्यविवरणे 


| सूत्रम्‌ | 
प्रच्छदनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ॥ ३४ ॥ 


[ भाष्यम्‌ | 
कोष्टयस्य वायोः नासिक्रापुराभ्यां प्रयज्ञविरेषात्‌ वमने प्रच्छदेनम। 
विधारणे प्राणायामः । ताभ्यां वा मनसः स्थितिं सम्पादयेत्‌ ॥ ३४ ॥ 


| सुत्रम्‌ | 
विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिषस्धिनी ॥ ३५॥ 


[ विवरणम्‌ ] 

-तत्रेपरक्षाया अक्रियारूपववाद्धमीहेदते सति किमरथमिहोपादानम्‌ ए 
उच्यते--उपेक्षानुपादाने चापुण्यशेष्वपि चित्तं व्यापारं यायात्‌ । ततश्व 
तद्वयापारेपघानकादटुष्यानौतयादिभावनाया न योग्यं भवति । अपुण्यद्चील- 
निमि्तनैरमित्तकाकारव्यापारादर्मो वा मा संजनिष्टेति चित्तस्थितिरेवेोपेक्षेति 


तस्या उपादानम्‌ । चित्तस्थितिश्वेह सर्महिता ॥ 


तस्मादित्थ समाहितचित्तस्य मेत्रीकरुणाद्येकतच्चारम्बनं चित्तं रीलयतः 


प्रागभिहिता अन्तराया न जनिष्यन्ते ॥ २३ ॥ 

प्रच्छर्दन विधारणाभ्यां वा प्राणस्य । वाशब्दो केत्यादिभावनोपायान्तर- 
त्रिकल्पाथः । मेत्यादिभावनायुपायानामन्यतमेन येन केनचित्‌ चित्तस्थितिः 
सम्पादनीयेति प्रकरणा; । अनेकोपायग्रदरान कस्यचित्‌ कचित्‌ घुकरतमि- 
प्रियेण । प्रच्छदैनविधारणाभ्यां व्यस्ताभ्यां समस्ताभ्यां वा । प्रच्छर्दनम्‌ 
कौष्ठ्य वायोरतमितोरुदमनं नाभिकाम्याम्‌, न मुखेन । विधारणं 
प्राणायाम. आतमितेरिव । यथपि ्रच्छदैनेनापि प्राणः आयम्यते, तथापि 
बहि्वत्तिनं निरुष्यत इति विधारणं प्राणायाम इति विच्ेष्यते॥ ३४ ॥ 

विषयवती वा प्रवृत्तिरुखन्ना स्थितिनिभन्थिनी । चित्तस्येति 
वाक्यदोषः । विषया गन्धादयो यस्या योगप्रवृत्ते्न्धादिसंवेदनलक्षणाया 
आलम्बनीभूताः) स विषयवर्तील्युचयुते ॥ 


प्रबतिर्नाम योगिनो योगमम्यस्यतः अमिमुखीमावं प्रतिप 
मानस्य योगस्य यः प्रथमोऽभिमुखीमावः प्रल्ययकरणो योगाुष्ठानं प्रदयुत्साह- 


समाधिपादः प्रथमः ९३ 


[ भाष्यम्‌ | 
नािकम्रे षारयतोऽप्य या दिव्यगन्धसंवित्‌ स। गन्धभ्रवृत्तिः। 
जिहप्रे रससंवित्‌ । तानि रूपपंवित्‌ । जिहामध्ये सपश्ैसंबित्‌ । 
जिह्वामूञे शब्द संवित्‌, ईइयेता। वृत्तय उदयन्न।धित्तं स्थितो निवध्नन्ति, 
संशयं विधमन्ति, समाधिप्रज्ञायां च द्वारी भवन्ति इति । 
एतेन चन्द्रदियग्रहमणिप्रदीपरदम्यादिपु प्रतृत्तिरुत्न्ना षिषयवदलेष 
वेदितव्या । 


यचि हि तत्तच्छास्रानुमानाचारयोपदशैरवगतमथंतचं सद्मूतमेव 
भवति । एतेषां यथामूता्प्रतिपादनसामर्थ्योत्‌ । तथाऽपि यावदेक- 
देशोऽपि कश्चिन्न स्वकरणसंवेबो भवति, तावत्‌ सवं परोक्षमिवाप्वगी- 
दिषु सृष्सोष्वर्थेषु न दां बुदधिमुत्ादयति । तस्ाच्छन्ञानुमानाचार्योप- 
देशोपोद्वलनाथैमेवावदयं कश्िदथेविशेषः प्रसक्षीकतेन्यः । 
[ विवरणम्‌ 1 
जनने निभेथ्यमानस्यप्नेति धूमसमुद्धवः, सा प्रवृत्तिः | सा च ताद्री 


[क 


रवृत्तिससन्ना प्रययरकरणात्‌ ब्रहर्षयन्ती योगिनधित्तं स्थितौ निबधाति ॥ 

नासिकम्रे चित्तं धारयतो गरन्धसंवित्‌ प्रह।दनकरघुरभिगन्धरवेदनं 
निरन्तरतया सम्भतसंयोगमिवाचक्षाणा जायते । सा गन्पप्रव्त्तिः । तथा 
जिहवादि§ । धारयत इति सम्बध्यते । ता एताः प्रवृत्तयः स्थितौ चित्त 
निबध्नन्ति । संरायं विधमन्ति समाधिप्रज्ञायाश्च दवारीभवन्ति ॥ 


एतेन रश्मिचन्द्रादियग्रहप्रदीपादिषु चित्तं धारयतो हृदयपुण्डरीके- 
वा॒.धारयतो वैषम्याद्रसिचन्दायकारा प्रघृत्तिरुयन्ना विषयवतीयेव 
वेदितव्या ॥ 


यथपि शाख्चानुमानाचरयम्योऽवगतमथैतत्वं तथाभूतमेव 
अव्यमिचारिखरूपमेव । तेषामन्यथाभूताप्रतिपादकतात्‌ । तथाऽपि यावदेक- 
देशोऽपि स्वकरणसंवे्ो न भवति प्रलक्षो न भवति शाल्ञाधुपदिष्टस्यार्थ- 
सयैकदेशोऽपि, तावत्‌ सर्व परेक्षमिवापवगीदिषु पृक्समष्रथेषु न ष्टां बुद्धि- 
मुत्पादयति । तस्माच्छान्चानुमानाचार्योपोदडनाथेमवद्यं कधिद्िरोषः 
परयक्षीक्ेग्यः ॥ 


~ व [न 
९४ पातञ्जटयागसुतजरमा्य्रधिवरणे 


[. भाष्यम्‌ | 
तत्र तदुपदिष्टथैकदेरप्रयक्षत्वे सति स्वं ॒सृष्ष्मविषयमपि आ 
अपवगौत्‌ श्रद्धीयते । एतदथमेवेदं चित्तपरिकम निर्दिश्यते । अनियतासु 
वृत्तिषु तद्विषयायां व्ीकारसज्ञायापुपजातायां समर्थं॑स्यात्‌ तस्य 
तस्याथस्य प्र्क्षीकरणायेति । ` 


तथा च सति श्रद्धीयस्मृतिसमाधयोऽस्याप्रतिषन्धेन भविध्य- 
न्तीति ॥ ३५॥ 


[ सूत्रम्‌ | 
विशोका वा उयोतिष्मती ॥ ३६ ॥ 
[ विवरणम्‌ | 
तत्र॒ शान्ञादुपदिष्टयकदेशप्रयक्षतरे सति सव॑ सूष्ष्मविषयमपि 
आ अपवर्गाच्रद्धीयते। एतदरथमेवेदं चित्तपचिमै यदेतत्‌ 'मेत्रीकरुणा' 
इत्यदिना प्रमाणुपरममहखान्तोऽस्य वकश्लीकारः' इयेष्मन्तन प्रकरणेन 


त #। 


यमनियमास्नविश्चिष्टस्य चित्तपरिकर्मोपदिद्यते ॥ 


तदेतदुक्तं मवति--एतत्प्रकरणोपदिष्टनामुपायानामन्यतमानुष्ठानात्‌ 
प्र्क्षीकृतैकदेशतय। विधूत (पिध्मात) संशय. त॒ अआ अपवर्गात्‌ द्टावस्थितश्रद्धा- 
नादि प्ररान्तनहिगत्ति उपस्थितवशीकारसंज्ञविराग्यं तस्य तस्य तर्वयपदो- 
पदिषटपरिमन्यददरथस्य प्रलक्षीकरणाय समर्थं स्यात्‌ ज्ञानविभूलयादि- 
प्राप्य्थमिति । ततश्चैवमर्थं चित्तपरि्मपदिद्यत इति प्रकरणाथैः । तथा च 
भाष्यकारः प्रद्रितवान्‌--“एतद थेमेवेदं चित्तपरिकर्म' इयेवमादिन। ॥ ३५॥ 

विशोका वा ब्योतिष्मती प्रवृत्तिरुसन्ना मनसः स्थितिनिष- 
न्धिनीति प्रकृतममिस्तवध्प्ते । ्योति्ैस्यां विते प्रवृत्तौ पा ज्योतिष्मती । 
सा च शोकं व्यपगमयतीति विशोका नाम ॥ 


सा च कथमुपजायत इव्याह--हृद यपुण्डीके धारयतो बुद्धिसवि- 
द्वति स्वरूपप्षवेदनम्‌ । बुद्धिं हि किंर्पमिलयह--बुद्धिसत्च हि 
प्रभास्वरं प्रभास्तनरील्माकारचकसपं व्यापि । यत्र यस्िन्‌ बुद्धिसच्े ॥ 


समाधिपादः प्रथभः ९५ 


[ भाष्यम्‌ | 


क _ (+ ~ _ (५ क) | भ 


रव्तिससन्ना मनसः स्थितिनिवन्धिनीलनुवतैते । हृदयपुण्डरीके 
धारयतो या बुद्धिक्षवित्‌, बुद्धिस दि प्रमास्वरमाकाश्चकृखम्‌ , तत 
स्थितिवेशारयात्‌ प्रवृत्तिः सुयैन्दुग्रहमणिप्रमारूपाक्ररिण विकते । तधा 
अस्मितायां समापन्ने चित्तं निस्तरङ्गमहोदाधिकस्पं शान्तमनन्तमस्ि- 
तामात्र भवति। 

यत्रेदमुक्तम्‌-““"तमणुमात्रमासानमनुविधासमीयेवं तावस्सेजानीति'' 
इति । एषा हयी विशोका विषयती; अस्मितामात्रा च प्रवृत्तिर्ज्थो- 
तिष्मवीद्युच्यते । यया योगिनश्चित्तं स्थितिपदं ठभत इति ॥ ३६ ॥ 

[ सूत्रम्‌ | 
वीतरागविषयं व। चित्तम्‌ ॥ ३७ ॥ 


[ विवरणम्‌ ] 
स्थितिवैषम्यादिति । बुद्धिसच्वामतासाम्यानापत्तरिति । हदयपुण्डरीक 
एव धारयतः प्रवृत्तिज्योतिष्मती सूर्यन्दुमणिप्रभारूपाकारेण विकल्पते । 
तथा चास्मितायाम्‌ अहङ्कर समापन्नं स्यात्‌ बुद्धिस स्वल्पेण सम्यपत्त- 


निप्तरङ्कमहोदपिकत्पं शान्तमनन्तमस्मितामात्रं मवति ॥ 


यत्रेदमुक्तं यत्रासिित।समापत्तो । तं एतं प्रकृतमस्मित(सानमहङ्क!रम्‌ 
अणु सृक्ष्मम्‌ आत्मानमनुविच प्राप्य अक्मीयवैतावस्सं जानीत इति । याद्ररामा- 
ठम्बनस्वरूपं तावन्मात्रं सज्ञानीते । अहङ्करस्वरूपेणेव तदावुरूप्यादवच्छिधते, 
स्फटिकमणिखिपधानल्येण । एवं दयी विका श्रवृत्तिविंषयवती चासिता- 
मात्रा च । तत्र गन्धसंविदादिरास्मितामात्रान्ता सवा विरोकैव | उ्येतिष्मती 
पुनगन्धसंविदादिप्रवृत्तिपञ्चतयादन्यत्न । विषयवन्ती लह्ितामा्नात्‌ प्रगित्रेलेवं 
विषयक्रिमागः । यया विशोकया ग्योतिषल्या योगिनधित्तं स्थितिपदं 
` रमते ॥ ३६ ॥ 

वीतरागविषयं वा चित्तं वीतो रागो यस्मात्‌ प्रययात्‌ स वीतरागः 
रागदयुल्य इव्यर्थः । स एष विषय आहम्बने यस्य चित्तस्य तद्वीतरागाविषयम्‌ । 


वीतरागश्च प्रलयः प्रतिद्धो छक । रागिणोऽपि हि पुरुषस्य रागकारणेऽपि विषये, 
यः द्वीषु मात्रादिषु । स एव प्र्ययः [तमेव प्रयये] वीतरागः [गं] आटठम्बनतवे- 


1. प्ञ्चषिखाचार्येण । 


९६ पातञ्ञछयोगसूत्रभाष्यनिवरणे 


भाष्यम्‌ | 
वौतरागचित्तालम्बनोपरक्तं वा योगिनश्चित्तं स्थितिपदं ठभत 
इति ॥ ३७ ॥ 
[ सत्रम्‌ | 
स्वप्ननि द्राज्ञानाम्बनं वा ॥ ३८ ॥ 
[ माष्यम्‌ | 
स्वभ्रज्ञानारभ्बनं वा निद्राज्ञान।रम्बनं वा तदाकारं योगिनहिवत्तं 


क 


स्थातेपद्‌ ठभत इति ॥ ३८ ॥ 

| सूत्रम्‌ ] 

यथाऽभिमतध्यानाहय ॥ ३९ ॥ 
[ भाष्यम्‌ ] 
यदेवामिमतं तदेव ध्यायेत्‌ । तत्र॒ ठन्धस्थितिकमन्यत्रापि 

स्थितिपदं छमत इति ॥ ३९ ॥ 

[ विवरणम्‌ | 
नाम्यस्येत्‌ ; न तु तस्य यो विषयः आख्भ्वनम्‌ | विषयाणां खल्लरात्‌ । 
तत्‌ बीतरागप्रययारम्बनोपरक्तं चित्तं तद्वदेव वीतराग प्रसन्नतरं 
स्थितिपदं लभते । रागदिखटीकृतं हि कृतखटीनमिव तुरङ्गमाननं 
प्रचरति ॥ २७ ॥ 


स्वनिद्राज्ञानार्नं वा । स्वभज्ञानाठम्बनं वा निद्राज्ञानारम्बनं 
वा चित्तं तदाकारमेव भवति । पएवंस्वमवं हि चित्तं यदालम्बते तदाकारं 
भवति । स्वप्रे च उान्दादिविषयदुन्यं ज्ञानम्‌ । ज्ञानस्यापि स्वमाबोऽवभासकता । 
तत्रापि ज्ञानस्वूपमेवारम्बते । न तु सय॑माणविषयस्वरूपम्‌ । सर्यमागेनापि 
विषयेण खलटीकारो ददयते । निद्राज्ञानं तु विरोषग्रहणात्मकममावप्रव्ययारग्बनं 
दान्तमनन्तमनुभूयमानाचठनधमंकम्‌ | ततश्च तदाहम्बनं सचित्त स्थितिपदं 
ठमत इति युक्तम्‌ ॥ २८ ॥ | 


यथामिमतध्यानाद्रा । यदेवाभिमतमिति चित्तस्थव्योक्षया । 
चित्तस्थिते; प्रकृतत्वात्‌ । न तु पुखाधयेक्षया । प्रतिषिद्धवाच-- “नन सेव 
विषयान्‌ प्राप्य धारयेत कथंचन इति । तत्र रन्धस्थितिकरं करण्यं सत्‌ 
अन्यत्र शा्ञयेषु अपि स्थितिपदं रभते ॥ ३९ ॥ 


समाधिपादः प्रथमः ९७ 


[ सूत्रम्‌ | 
परमाणुपरममह्वान्तोऽस्य वशीकारः ॥ ४० ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
सुमे निविश्षमानध्य परमाण्वन्तं स्थितिपदं कमत सति । स्थरे 
निविशमानस्य परममहचान्तं स्थितिपदं चितस्य । एवे तामुभयीं 


रिमनुषावतो योऽस्याप्रतीघातः स परो वशीकारः । तदशीकारात्‌ परिभू 
पोगिनधित्तं न पुनरभ्यासकृतं परिकमोपक्षत इति ॥ ४० ॥ 


[न्क 


अथ रष्धस्थितिकस्य चेतः किंस्वरूपा किंविषया वा समापत्तिः 
इति--तदुच्यते-- 
[ सूत्रम्‌ | 


८ 


्षीणब्रतेरभिजातस्येव मणेग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तस्स्थ- 
तद्ज्ञनता समापत्तिः ॥ ४१ ॥ 


[ विवरणम्‌ ]] 

परमाणुपरममहखान्तोऽस्य वशीकारः । अन्तशब्दः प्रघयकं 
संबध्यते । सुषम निविशमानस्य परिमणे निविशमानस्य योगिना संक्षिप्य 
माणस्य । अभ्यासक्रारे खल्पमल्पतरं च क्रमेणालेचयत्परमाण्वन्तं संक्षिप्यते | 
स च परमाणुशचित्तस्य सक्ेपकोटिः । तेन तदन्ते स्थितिपदम्‌ ॥ 

इस्यपुभयकोटिमनुषावतशित्तस्य रेकतेषं॒॑विस्तारं चानुमवते यः 
तद्विरोधिना प्र्यान्तरेण भप्रतिघातः स परो वक्षीकारः । पूर्वेऽपि परे ए । 
तथाऽप्यस्यायं विशेषः । तद्रशी कारात्‌ परिणेम्‌ अनत्रखण्डितं ग्धस्ितिकं न 
पुनरम्यासकृतं परिकिमंपेक्षत इति । पं त कियदपि परिकमंन्तरमपेकषन्ते ॥ 

तत्र संक्षिप्ता विशाखा विकरणी चेति त्रयी धारणा । तत्रोभयकोटि- ` 
स्परिनी विकरणी । परममहत्वान्तस्पृणिशचाछा । परमाण्वन्तस्रक्‌ संक्षिप्ता | 
सा च त्रस्यपीह सूत्रोपात्ता ॥ ४०॥ 


अथ रन्धस्थितिकरस्य चेतसः अथ उक्तानामन्यतमेनोपयेन 
ठन््रस्यितिकस्य रिस्छष्पा विषया वा समाप्तिरिति तननिदिदशयिषयेद 
सूत्रं॑प्रषवृते- क्रीणवृत्तरभिजातस्येव मणेग्रहीतृग्रदणग्राह्येषु तसस्य 


तद्‌न्लनता समापत्तिः ॥ 
13 


९८ पातञ्जलयोगसूत्रभाष्याकिवरण 


भाष्यम्‌ | 

्षोणव्ृत्तरिति प्रसस्तमितप्रययस्येयथैः । अभिजातस्येव 
मणेरिति दृष्टन्तोगादानम्‌ । यथा स्फटिक उपाश्रयभेदात्‌ तततदरूपोपरक्त 
उपाश्रयरूपाकारेण निभाते, तथा प्राह्याहम्बनोपरक्तं चित्तं ग्राह्मपतमापन्न 
ग्राह्स्वरूपाकरेण निमीपते । 

मूतसृष्ष्मोपरक्तं सूतसृक्ष्मसमापन्नं मूतसृक्ष्मसरूपाभासं भवति । 
तथा स्थूलारम्बनोपरक्तं स्थूररूपसमापन्नं स्थूटरूपामासं मवति; तथा 
विश्वमेदोपरक्तं विश्वमेदसमापन्ने विशरूपामापं मवति ॥ 

[| विवरणम्‌ ] 

नलु च समापततेविषयं वक्ष्यति तृतयपदे “परार्थात्‌ स्वा्थसेयमात्‌ 
पुरुषज्ञानम्‌ इव्यादिना । समापत्तिस्वरूपं च संयमस्वरूपं॒तत्काय॑निवै्तनेनैव 
सेत्स्यति । ततश्चानर्थकमिदं सूत्रम-नैष दोषः-पूर्क्तोपायवरीकारणार्थवस्व- 
प्रदरोनायैत्वात्‌ । एवं ह्येष ॒चित्तवर्।कारोऽथवान्‌ , येन म्रहीत्रादर्थसमापनं 
चित्तं तदाभास भवतीति ॥ 

किश्च-"वितर्कायनुणमात्‌ संप्रज्ञातः इ्युक्तम्‌ वितकीदिस्वरूपं चे दरयि- 
त्यम्‌ । अनुक्तायां समापत्तौ वितकौदि स्वरूपे न शक्यं दशयित समापत्तिघमी 
(दि)वितकौदय इति । क्षीणवृक्तरिति प्रयस्तमितबाहयभ्रमणादिप्र्ययस्येलधः ॥ 

नमु सवै एव प्रत्ययाः प्रत्यस्तभिताः । सवरप्रस्यस्तमये हि अवतिताधिकारं 
न स्थूलसुक्ष्मादिकमारम्बते ॥ 

अभिजातस्येव मणेरिति द्शन्तोपादानम्‌ । यथा स्फटिक उपाश्रय- 
मेदाततत्तदरूपोपरक्त उपाश्रयाकारेण निभौसते । तथा प्रह्चाठम्बनोपरक्तं 
चित्तं ग्राद्यसमापन्नं परा्यघ्वरूपाकारेण निभौसते ॥ 

तथा भूतसूक्ष्मोपरक्तं तन्मात्रोपरक्तं भूतसूक्ष्मसमापन्नं मूतसुक्षषस्- 
स्पावभाप्तम्‌ अवभाप्तते ॥ 

(तथा स्थूखारम्बन।परक्तं स्थूलरूपपतमापन्नं स्थूलदूपामासं भवति । 
तथा विश्वमेदोपर्तं विश्वमेदसमापन्नं विश्वरूपाभासं भवति ॥ 

तथा प्रहणेष्वपीन्द्रियेष्वपि द्रव्यम्‌ । प्रहणारम्बनोपरकतं 
ग्रहणश्षमापन्नं प्ररणस्वरूपाकारेण निभासते ॥] 





1, यो. सू. षा, 3. घु. 35. 


समाधिपादः, प्रथमः ९९ 


| भाष्यम्‌ ] 
तथा ग्रहगेष्वपि इन्दियेष्वपि द्रष्टव्यम्‌ । प्रहणाटम्बनोपरक्त 
ग्रदणपमापन्नं प्रहणस्वहूपाकरिण निभीसते । तथा म्रदीतृुरषारम्बनो- 
परक्त ग्रदीतृपुरूषतमापन्नं ्रदीतुपुरुषस्वरूपाकरारेण निभौसते ॥ 


तथा मुक्तपूरष।रम्बनोपरक्तं पमुक्तपुरषपमापन्न मुक्तपुरष- 
स्वह्पाक्रारेण निपतत इति । 


| विवरणम्‌ | 
तथा ग्रहीतृपुरषपमापन्नं बुद्धिवरोधकस्वसूयमिव्ययैः । गृदीतृष्व- 
ट्पाक्ररेण निभीसते ॥ 


तथा गुक्तपुरषालम्बनोपर््तमिति । स ए बुदधेबेद्धा यदा विषय- 
वृत्तीनां न बोद्धा भवति तदा सच्वपुरूषान्यताए्यातिपात्रवस्या ॥ 

यदा उदप्ीनो सुक्तपुरुष शव्युच्यते तदा हि सर्वङ्केशादिमुक्तं चित्तं, 
सेव हि पुरुषस्य पुक्तता, या छे शादिविमुक्तिश्चित्तस्य । अत एव सूत्र 


#+ 


्रहीतृप्रहणमेव कृतम्‌ । ग्रहीता पुस्षवरिरोष ९व पुक्तपुरुष इहामिप्रेत इति ॥ 


त[दाथा हि पुरुषग्रहणमेव कुयात्‌ । परस्यां वरे॥कारसंह्ञायां जातायां 
न पुनः संसाप्योगो मवति । तथा चेक्तम्‌--“स॒लेवं चित्तसस्व पम्बन्धे 
देशादिसम्बन्धामावात्‌ स तु सदैव मुक्तः सदेवेशवर्‌ः' इति ॥ 


तस्मात्‌ सुक्तपुरुषालम्बनोपरक्त सुक्तपुरुषकषमापृन्नं युक्तस्वरूपाकरिण 
निमीपत इति । यो दि मन्यते निदृत्तसससम्बन्भेनैव युक्तेन पुरुषेण 
समापन्नं तदाकारमेव नि्मांसत इति-- तदयुक्तम्‌-- चित्तस्य स्वामप्रखय- 
प्रसङ्गात्‌ ॥ 


निरतिशयसूक्षपश्च पुरूपरप्तततमसूष्मे प्रधानं तत्कार्यकाधकायं (निमित्त) 
स्तं, तच्चित्तं प्रधानं पुरुषं वा समापचमनं न स्थितेन स्वेन ख्पेण 
समापततुमुप्सहते । न हि धटे मृदवस्थामपरियक्तस्वरूपः समापवते ॥ 

नतु च कार्येणापि योगिसच्छेन महदहङ्करौ सत्रयावुष्येते । महति 
तावद्िप्रतिपत्तिः, संपरेयते न वेति । यदा हि सवेता प्रहीतृमुक्तस्वरूपवत्‌ 
सबन्धविरेष उपपथते महदहङ्क।रये।रपि । व्यक्तौ हि तौ ततः संबन्धविशेषो 


१०० पातञ्जलयोगसूत्रभाष्याक्रेवरणे 


युज्यते | सबन्धविरोषाच्च थथा सपुरुषो ्र्ीतृस्वरूपश्च मुक्तश्च चित्तवृत्तिविरोष- 
सेबन्धात्‌ गृह्यते तद्त्‌ । न तु स्वात्मनैव महदहङ्कारयोरयि ग्रहणं 
महत्वरात्‌ ॥ 


तयोरपि [तिबपि] यदि सत्रप्मना गृह्येयाताम्‌ , चित्तसत्वमात्रातानौ 
जवेयाताम्‌ , तथा च सति तद्विषयप्रहणमेव न स्यात्‌ | प्रधानपुरुषयोस्तु 
तत्संबन्धस्य चव्यन्तमन्यक्तस्वरूपत्व। न खरूपग्रहणम्‌ ॥ 


ननु चेश्वरस्यार्व्ञता, [यतः] प्रधानपुरुषतत्तबन्धा न भ्रवयक्षा इति । 
उच्यते-- प्रधानपुरुषसंबन्धेम्योऽन्यत्सर्वं प्रद्क्षमिदयत्र तावत्‌ अ्रिप्रतिपत्तिः, 
निरवधिकप्रद्यक्षज्ञानाम्युपगमात्‌ । (यत्र त्वनुमानागोचरः) [यत्त अस्माकमगो चरः 
तत्‌] स वेश्वरे ज्ञातुमहति । ज्ञेयं चेदि तत्सर्वमसौ यथावा तावा 
जानातीति निश्चयः । अज्ञातृकस्य ज्ञेयलानुपपत्तेः ॥ 


किञ्च-यदि प्रकृतिपुरूषे स्वरूपेण ज्ञेयत्वमा(ना)प्ेयातां तदा 
बुद्धिवद्वोग्यताप्रसङ्गः । ततश्च परार्थोऽपि स्यात्‌ परश्वान्यः कल्प्य; स्यात्‌ ॥ 
नयु पुरषाणामन्योन्यमोग्यतेति न परो भोक्ता कंल्यः-नैतदेवम्‌-- 


{५ $ 


समत्वात्‌ पुरुषाणां विषयविषयितवानुपपत्तेः । न हि प्रदीपावन्येन्यप्ुपुरुतः । 


- किश्च--भोग्यत्वे पुखादिरूपत।प्रसङ्गश्च पुरुषस्य | तथा च सति 
प्रधानस्य निर्दैतुकलतप्रसङ्ग शेखेवमादयो भूयांसो दोषाः ॥ 


ननु च ° 'पशथात्‌ स्वाय्तयमात्‌ पुरुषन्ञानम्‌ ' इति पुरुषभ्रयक्षत। 
वक्ष्यति-- सव्यं॑युक्तपुक्तम. । अत एवोच्यते पुरूषो न सरूपेण विषयी- 
मवतीति । येनेवं तत्रोक्तम्‌ “न च पुरषप्रययेन बुद्धिसत्वारमना पुरषो 
हर्यते । पुस्ष एव ते प्रत्ययं स्वारम्बनं पयतीति । तथा दयक्तम्‌- 
विज्ञातारमरे" केन विजानीयात्‌ ' इतीति ॥ 


ननु पुरष्रछम्ननोपरक्तं चित्तं पुर्ष्रस्य विषियः । तथा च सति 
प्र्यक्ष एव॒ पुरुषः । यथा धटाङम्ननोपरक्ते प्रत्यये पुरूषेणोपटम्यमने घट, 
प्रयक्ष उव्यते- नैष दोषः--घटवःपुरुषध्य चित्तेनाग्याप्यत्वात्‌ । धटदिस्तु 
बाह्यशित्तेन व्याप्यते, न पुरूषः, आनन्ात्‌ ॥ 


1. पा.सू. षा. 3. चर. 35. 
2. ब्रू, उ, 2, 4, 14, 


समाधिपादः प्रथमः १०१ 


[ भाष्यम्‌ | 
तदेवमभिजातमणिकल्पस्य चेतसो ग्रदीतग्रहणग्राहयेषु पुरषेन्दरिय- 
रतेषु या तरस्थतदज्ञनता तेषु स्थितस्य तदाकारापत्तिः सा समापत्तिरि- 
त्युच्यते ॥ ४१ ॥ 


[ विवरणम्‌ ] 
परिच्छिनं हि चित्तं विषयीकुर्वन्न पुरुषे विषयिणमनन्तं 
भ्याप्तुमुत्सहते । यदि पुर्व म्यति प्रधानमपि व्याप्नुयात्‌ ॥ 


तस्मा्था दपणे मुखं छयाख्पेण गृह्यते, तथा पुरुषच्छाया- 
करेण परिगतः प्रलयो गृह्यते पुरुषेण । तथा च व्य(सः 'यथाऽऽदशैतल्रख्ये 
पयलयास्मानमास्रनि' ॥ इति । 


न तु मुक्तान्यपुर्प्राकरेण परिणतौ द्वारमास्ि । यदि तदाकारेण 
परिणमेत, मुक्तस्यापि तस्स्वमे्रेति दृदयं स्यात्‌ । न कि चित्तस्य परिणाम- 
दन्यघ् नामास्ति । स्वाक)रेण हि परेणतं पुरषे न तु चित्तं न प्यति । 
स्वपुरुषे स्वसात्सति संबन्धे परिणतिद्र।रमस्ति ॥ 


कथंतह स्पुरुषादन्यस्य स्वत्वासबन्धिनो प्रहणम्‌-- उच्यते --यथा 
परदर्पणद्वरेण परमुखदशैर्न, तथा दर्पणस्थानीपपरसतताकारपरिणतं स्वसघवं 
पुरुषः पश्यन्‌ परमपि पुरुषं जानाति ॥ 


तस्यायमालमा ममायमिघयन्यत्वन्नुपानादेव प्रतिपचते स्वकीयादन्य- 
दीयसत्वगत्तविरेषटिद्वेन । सत्वानां च तिगुणत्वादकश्यं विशेषाः सन्ति| 
पुरुषाणां तु निर्विरेषतवात्स्वूपेण मेदो दुरवबोध एव ॥ 


तस्मादेवमभिजातमणिकल्पस्य चेतसो ग्रहीतृप्रहणभ्ा्येषु 
पुसषेन्द्रियभूतेषु तत्स्थतदक्लनता । तेषु प्रहीत्रादिषु तिष्ठतीति तस्यं 
तत्स्यतातरिशि्टा य। ग्रहीताचञ्चनता, तदेवाद- तेषु स्थितस्य तदाकारापतिः 
समापत्तिरिदयुच्यते ॥ 


सम्यगपत्तिः समापत्तिः सा च तादृशी प्रल्स्तमितबदिरदत्तेरेष 
भवति । यधपि व्युत्यितचित्तस्यापि समाप्तिरस्ति । तथाऽपि सा न 
समीचीनतरा; रजस्तमेस्यां चित्तसघ्स्याल्यन्तामिभूतत्रादिति ॥ ‰१.॥. 


१०२ पातञ्ञखय।गसूत्रभाष्यविषवरणे 


[. सूत्रम्‌ | 
तत्र राब्दाथेज्ञानविकल्पैः सङ्काणी सवितका समापत्ति; ॥ ४२॥ 


[ भाष्यम्‌ ] 
त्था गोरिति शब्दो गौरियिर्थो गोरिति ज्ञानं इदयविभागेन 
विभक्तानामपि अ्रहणं ष्टम्‌ । विभञ्यमानाश्वान्ये शब्दधमा अन्ये अथेषमीः 
अन्ये विज्ञानपमौ इयतषां विभक्तः पन्थाः । तत्र समापन्नस्य योगिनां 
य) गवार्थे समाधिभ्रहायां समारूढः स चेच्छब्द्थंज्ञानविकल्पानुबिद्ध 
उप्रवतेते सा संकणौ समापत्तिः सवितका इद्युच्यते ॥ ४२॥ 
[ विवरणम्‌ ]. 
तैषा समापत्तिश्चतुष्टयी । तत्र प्रथमां समापत्ति व्याच्े--शब्दा्थ- 
ज्ञानविकतपैः सङ्कीणा सवितकां समापत्तिः । राब्दश्र्थश्च ज्ञानं च 
राब्दार्ज्ञानानि तेषां विकल्पाः शब्दार्थज्ञाननिकल्पाः । ष्यातन्यालम्बन- 


¢ ~+ (^ १ [® 


विषरयेर्विकल्पैः संकीर्णा विमिश्रा इतरेतरप्रल्ययायुविद्धा सा सकीर्णसमापत्तिः ॥ 
ननु च रन्दार्धप्रलया इतरेतर्यादृत्तसखष्पाः, योगी चैकं वस्तु 
प्येयवेनालम्बते राब्दमर्थ प्रयये वा, तत्र कः इब्दार्थज्ञानविकल्पसङ्करः ॥ 
एवमेतत्‌ । तथाऽपि अयमेव संन्यवहारो रेके, यदुताविभागेन 
प्रहणम्‌ । त्था गौरिति शब्दो गौरिलर्थो गौरिति ज्ञानमिलविभगेन रोके 
ग्रहणे ष्टम्‌ । एवं हि रोकं; त्रयमपि गौरिव म्यपदिराति । तथाऽन्यतर- 
प्रहणेऽवरिष्टयेरपि स्मृतिः ॥ 
ननु च तथाभूतमेतदरस्तु-नैव-रशन्दार्थपङ्कतग्रहणोत्तरकालमाविलात्‌ । 
ननु सङ्कतादपि प्राक्‌ सामान्यशब्दं य कञ्चिदध्यवस्यलेव--न -- विविक्तानामपि 
प्रहणदर्नाव्‌ । विविच्यमानाश्वान्ये शब्दधमी गकारादिवर्णोदात्त- 
स्वरििद्ुतमच्यविरम्बितप्रत्रम्रहणादयः । ते नारथज्ञानयोः 1 तथन्येऽथैषभीः 
साज्लालङ्गूखककुदसुरविप्राणदरनस्पशनादयः । तथा (च)अम्ये प्रययधमीः 
पुर्षभ्राद्यात्मकतावमासातमकतवतस्काराध।यिल्वादयः, न ते शब्दार्थयोः । 
न (तेन]परमार्थतोऽन्योन्यधमसङ्करगन्धोऽष्यस्ति । तेन विविक्तः पन्थास्तेषाम्‌ ॥ 
तत्र यत्र कचन समपृन्नध्य यो छयवार्थः समापिप्रज्ञामुपाहूढः 
स ॒चेच्छन्द्राथेज्ञानविकल्पामुविद्धः र्दा्थपङ्कतकृतो य इतरेतरस्मृयनु- 
व्याधस्तदविरिष्टशवेदथं उपावततैते सा सङ्कीणां समापत्तिः सवितकरत्युच्यते ॥ 


समाधिपादः प्रथमः १०३ 


[ भष्यम्‌ ] 

यदा पुनः शब्दरसकेतस्मृतिपरिलुद्धो श्रुतानुमानज्ञानविकसपशन्यायां 
समाधिप्रज्ञायां स्वरूपमत्रेण(वस्थितोऽथैः तत्स्वरूपाकारमात्रतेथवव 
च्छिदयते। सा च निर्वितका समापत्तिः। तत्प प्र्क्षम्‌ । तच श्रतानुमानयो- 
बीजम्‌ । ततः श्ुतायमाने प्रभवतः। न च श्रुतानुमानज्ञानसदहभूतं तदशैनम्‌ । 
तस्मादधकीर्ण प्रमाणान्तरेण योगिनो निर्वितफसमापिजं दर्शनमिति । 

निर्वितर्कया: समापततेरस्याः सूत्रेण ठक्षं बोयते-- 

[ विवरणम्‌ ] 

अनेकजन्मान्तरराब्दा्थसङ्कतज्ञनसंस्कारषिशिष्टत्वायो गिनोऽपि प्रथमतरा 
समापत्तिर्छकम्रययाविशिष्टा । ख तु विषो यत्‌ रग्धस्थितिपदत्वाघोगिचित्तस्य 
समानप्रययप्रवाहतेति ॥ ४२॥ 

इदानीं निर्वितकौ समापत्तिरुच्यते । यदा पुनः श्षब्दसङ्कतस्मृति- 
परिडुदधौ । शब्दसङ्कतोऽस्यायै वाचकः अयमस्य वाच्य इति समयप्रतिपत्तिः । 
तजनितसमृतिः शब्दसङ्कतस्मृतिः । तस्या; पर्डिद्धिमिथ्यालाद्विनिवृत्तिः | 
सा रजस्तमसोन्यगमावात्‌ ॥ 

श्रुतज्ञान आगमिकम , अनुमानज्ञानं ल्गेकं, ते च सामान्यविषय 
एवानुमानागमन्ञाने, तर्योर्विकस्पो हि विरोषाध्यारोपः तेनाध्यासेन शून्यायां 
योगिनः समाधिप्रज्ञायां व्याृत्तसन्गिकसाङ्कतिकङ्ञानाप्यासायां सवरूपमात्रेण 
मात्रग्रहणं दिग्देदाकालानुमावादिम्योऽपि ग्याचरृत्त इदयवमर्थ, स्वैरेव र्मीमहीयमानः 
तस्स्वरूपमात्रतयेव तस्यास्य स्वरूपमात्रतयेव योगिनः भर्गा अवच्छिदयते । 
न तस्माद्थीदरहिर्देशकारादि किचिदालेचयतीलयथः ॥ 


स्वमपि ग्रहणातमकं रूपं तद्मज्ञा नालोचयति, नि्मख्तरत्वात्‌ । 
गरह्यमत्रिव सा विभाव्यते । सा च ताद्री निवितकी समापत्तिः । 
निशत वितर्काऽस्याः निर्वितकैः वितर्कोाऽष्यारोपः । सोऽस्यां नास्ति ॥ 


तत्‌ एतत्‌ प्रं उक शुद्धं प्र्यक्षं अपरं परयकष सव्ाधारणं पुरस्तादृत्ति- 
मध्ये पठितमिदं योगिन एवेति । तच्छुतानुमानयोषीजम्‌ । यथपि पूरवोक्तमपि 
्॒तालुमानयो्नीजमेव+ तथाऽपि तत्का श्रुतानुमने व्पभिचरतोऽपि, 
न पुनर्नर्वितर्कसतमानिजप्र्क्षप्रमवे व्यमिचरत इलत आह-- ततः श्रुतानुमाने 
प्रभवत इति ॥ १ 


१०४ पातज्ञखयोगसूत्रभाष्य विवरणे 


[ सूत्रम्‌ ] 
स्रतिपर्शथिडो स्वरूपशन्येवार्थमात्रनिभासा निवितक ।॥४३॥ 
[ भाष्यम्‌ | 

या शष्दसङ्धेतशुतालुमानज्ञनविकलस्मरतिपरिशुद्धौ ग्र्यस्वरूपो- 
परक्ता प्रज्ञा स्वमिव प्रजञास्वरूपं ग्रहणात्मकं स्यक्खा पदा्थैमात्रस्वसूपा 
ग्रा्यस्वरूपापत्नेव मवति । सा तदा निर्वितकां समापत्तिः । तथाच 
व्याख्यातम्‌ । 

[ विवरणम्‌ ] 

न च (ननु) श्रुतानुमानक्ञानसहमूतं तदशेनम्‌ , श्रुतालुमानज्ञाना- 
भ्यामसमानविषयमियेतत्‌ । विशोधविषयं हि तदशन, सामान्यविषये श्रुतानुमान- 
्ञने । तसमादसङ्कीणं प्रमाणान्तरेण योगिनो निर्वितक॑जं दर्शनमिति (तनि. 
वितकीयाः तदिति तस्मादिति) पस्मापत्तरस्याः सूत्रेण रक्षणं चोत्यते-- 
समृतिपरि्ुद्ध स्वरूपश्ल्यवाथमत्रनिमसातिरवितका ॥ 

दब्दसङ्कतश्रुतानुमानज्ञान विकस्पस्प्रतिपर्शुद्धौ शन्दशङ्केतविकल्पः 
्रुतक्ञानविकल्पः अनुमानज्ञानविकत्पश्च, स एव स्मृतिः । स्मरणेन 
हयन्यस्यान्यधर्मोऽध्यसेष्यते | नहि वस्तु स्वरूपेण वस्वन्तरेऽध्यरेपयितु 
राक्ष्यम्‌ | 

नयु च कथं श्रुतानुमिते प्र्क्नेऽध्यरिष्येते । ननु च प्रसिद्धोऽध्यरेपः, 


+ , (~ (~ 


तया चेदं मया श्रुतमिदं मयाऽतुमितमिदमिति च प्यति ॥ 


ननु तदेव तत्‌ इश्यमानमपि यदनुमितं श्रुतं च--न - सामान्य- 
विरेषभेदात्‌ । समान्य श्रुतमनुमितं च । विरषस्तु प्रक्षस्य व्िप्रयः | तरिमश्च 
तत्सामान्याध्यासः प्रसिद्ध एव ॥ 


ग्रह्मोपस्का योगिनः प्रज्ञा स्वं प्रज्ञारूपं अ्रहणातमकं यक्ता 
पदाथमात्रस्वमावा ग्रह्मस्वरूपापन्ञेव भवति । इवशब्देन म्रहणासमकतां 
न जहतीति । न हि स्फटिक उपाध्याश्रयतायां स्वां स्च्छूपतां हस्ति । 
किश्चव- प्रहणन्यतिर्क्तिं चे ग्राह्यं वस्वन्तरमस्तीति चोक्तं भवति ॥ 


सा निर्वितकं समापत्तिः । तथा च व्याख्यातम्‌ । तस्या श्यफबुदध ध॒प- 
कमो ऽथा | उपक्रम्यते एकया घुद्धध। यः स एकबद्ध चुपक्रमः एकबुद्धि- 
परिच्छिध इति । अथसा बेध्यापनेयेतत्‌ ॥ . 


समाधिपादः प्रथमः १०५ 


[ भाष्यम्‌ ] 
तस्या एकबुदध्पक्रमो द्य्थासा अणुप्रचयविशेषासमा गवबादिषै- 
ददिव लोकः । स च स्थानविशेषो मूतसुक्ष्माणां साधारणो धर्मः 
( विबरणम्‌ | 
गबादिर्टादिव विषयः न तु बोध एव गवाघ्ाकारो विषयः 
एुप्रचयत्रिशेषास्मा अणूनां तन्मात्रावयवानां प्रचयाविरेष आसा यस्य स 
गवादिधटादिवी आलम्बनं बुद्धैः स॒ च विषयः संस्थानविशेषः तथा 
संस्थितानि हि तानि मूतसुक्ष्माणि ॥ ष 


एतदुक्तं भवति--मूतसृक्ष्माणां साधारणो धर्मं इति आत्मभूतो न 
व्यतिर्कि; । यथा सपस्य अमोगकुण्डलनादि ॥ 

येषां पुनरल्यन्तव्यतिसिक्तमन्यदेव कारणात्‌ कार्थ, तेषां कारणतन्त्रल 
कार्यस्य न प्रपोति । अंद्यतन्त्रो हि तन्तुः तन्तुतन्त्रश्च पटः | न चाद्न्ता- 
न्यलेऽन्यतन्त्रतवं दृष्टमन्यस्य । यथा ॒वृ्तिपण्डतन््ेता न पटस्य, तन्तूनां वा ॥ 


किञ्च--तद्विनाशानुविनाशित्वं च न शक्ये, न हि कपालबरिनारामनु- 
विनश्यति पटः ॥ 


अयेन्येत, सम्बन्धः कारणमिति | पटस्य हि तन्तवस्तन्तूनाश्चाराव इति 
सम्बन्धस्तत्न हेतुः कारणं तत्तन्त्रत्रतदनुविनाशयोरिति ॥ 


अत्रोच्यत- चेत्र्ित्रादिसम्बन्धेऽपि प्रसङ्गः स्यात्‌ । चैेत्रस्यापि क्षत्रादि- 
तन्त्रता तदनुषिनाशिष्वं च सम्बन्धविरेष।त्‌ प्रसज्येत ॥ 


अथापि स्यत्‌- समवायलक्षणः सम्बन्धः कारणमिति-न- तस्यापि 
संबन्धल्वािरेषादहेतु, यथान्यसंबन्धः संबन्धिनोरन्यतरतन्त्रलायहेतुः एवं 
समवायलक्षणस्यापि संबन्धस्वादन्यतरतन्त्रलादावहेतुत्म्‌ ॥ 


अपि च- न द्रन्धव्यतिरेकेण कर्म॑सामान्यविशेषसमवायाः सन्ति। 
द्रभ्यतन्त्रत्रादुपपत्तरेव । तत्रापि सम्बन्धस्याप्यहेतुत्वमेत ॥ 


किश्चान्यत्‌- सेत्न्धस्य च सबन्धिनेरिवान्यतरतन्त्रतवादिदेदुत्वे समवा- 
यस्यापि समवायान्तरं तस्यप्यन्य इत्यनवस्था प्रसञ्येत । यथा गुणादीनां 
समवायछन्षणात्‌ संबन्धात्‌ द्रव्यतन्त्रतं, तथा समत्रायस्यापि द्रन्यन्यतिस्कित्वे 


दरन्यतन्तरत्रा्थं समवायान्त{ कल्प्येत, तस्याप्यन्यत्तस्य प्यन्यदित्यनवस्था स्यात्‌ ॥ 
{1 


१०६ पातञ्ञलयोगसूत्रभाष्यविवरणे 


्रागुतपत्तरमावातु कायस्य कारणेन संबन्धानुपपत्तिः, अविरिष्टं चासं 
दादाविषाणस्य घटस्य च] तत्र षटेनैव कारणस्य संबन्धो न दाराप्रिषणादिभिरिति 
हेतुव॑दितब्यः ॥ 

पराक्‌ असनोतपचेत शशावि्ाणवत्‌ । यस्तु तन्तुम्योऽन्यः स तन्तुभ्यो 
नाथते, तन्तुम्योऽन्यघ्वात्‌ । यथा तन्तुभ्यो घटः ॥ 


इतर आह--प्राक्‌ सन्नपि नोदधेत, सलरात्‌ , विधमानघटवदिति । 
यो यस्मादनन्य; सोऽपि तस्मान्ेप्पते, षिधमानतात्‌ , स्वरूपवदिति ॥ 


अपर आह-ग्रदि सन्नोद्यत इति सत उसस्यमाव उच्येत, तिद्ध. 
साध्यता स्यात्‌ | अथाभिव्यक्स्यभावः, तदा दृष्न्तामावः ॥ 


यदप्युच्यते यो यस्मादनन्य इति, तत्रपि सिद्धसाध्यता दृन्ताभावश्च । 
स्वरूपादेव ह्यमिन्यञ्यते, नासव्यमिन्यङ्गस्वरूपेऽमिन्यक्तेरमभिव्यञ्चकसदहतेणापि 
शक्यते कर्तुम्‌ ॥ 


किश्वान्यत्‌- सथभ्यवहाररोपश्च । कथं 2 यद्‌। देवदत्तस्य गैरशो वा 
प्रातर्वियमानकर्णलाङ्गूलः एुनरट्वी गतः केनचिल्दूनकर्णो द्नरङ्गूला वा 
स्यात्‌ , तद पूतरौवयवविभागाद्विन टः, अन्यस्तु नवः प्रद्नकणैलाङ्गूरोऽस्वामिकः 
सञ्चात इति येन केनचिदुप।दीयेत, तथा चावयवविमागः सवत्र प्म्मवतीति 
स्वस्वामिस्तम्बन्धादिनियमामावादशेषन्यवहाररोपः स्यात्‌ ॥ 

भथ ब्रुयात्‌-- पूर्वोपाजिंतावयेैरेवावयवी नवः प्रद्नकणैराङ्गू आरच् 
इति--नैवम्‌--न हि मातापित्रादिन्पतिरेकेणेदानीन्तनद्धनकणलाङ्मूलवय- 
व्यन्तरप्रत्यारम्भिणो देयन्ते ॥ 

किच--यस्य च क्षत्रे दूनकणेखङ्गरूलो जातस्तस्येवात्तो स्यात्‌ , न 
पृवीवयत्रिकस्य, तेतछषत्रज।वतृणपटाशादिवत्‌ ॥ 

यथा चान्यक्षे्रगतानि बीजानि सटिलोधेनान्यक्षे्रमुपनीतानि चेत्तत्तद्व!ज- 
निष्पन्नसस्यं क्ेत्रवानेव गृह्णाति, न तु पूर्वबीजवान्‌ (तः) । न चास्यात 
प्रतिबक्नाति विद्रानपि मदौयीजपारेनिष्पन्नं सस्यमहमुपादीयेति ॥ 


तथा द्नकर्णखङ्गूकमपि कषत्रवानेव गृहत | न तत्र प्रतिबन्ध(रूप) 
नीयम्मदीयावयवेरारन्धोऽयमवयवीति ॥ 


समाधिपादः प्रथमः १०७ 


[ भाष्यम्‌ ] 
आत्मभूतः फलेन व्यक्तेनानुमितः स्वव्यक्षकान्ननः प्रादुर्मवति । 
धर्मान्तरस्य कपारदि सदये च तिरोभवति । स एष धर्मोऽवयवीस्युच्यते । 
योऽसवेकश्च महां शाणीर्यांश्च सदीवांश् क्रियाधमेकशानियश्च तेनावयविना 
व्यवहाराः क्रियन्ते । 


[ विवरणम्‌ | 
येषामप्येकसिन्गृह्यीते तस्मिन्नश्वे दूनकणर।ङगूके जति सवक्षत्रे च 
दष्टे स एवाश्रदाता अन्योय (वितिसन्योये) महत्तमादश्चान्मया दत्तो महत्तम इति 
हरेत । हरतामिति वचेसर्वञ्यवहारलोपग्रसङ्ग; शाक्रकोपश्च । तस्माद[नन्योऽ]- 
वयवेम्यः करणेभ्य एकोऽवयवी कार्यमिति सिद्धम्‌ ॥ 


यदप्युच्परत--शब्दप्रल्ययधघमौदिभदादम्य इति, तदप्ययुक्तम्‌ । दृश्यते हि 
राब्दादिमेदेऽप्यनन्यघ्म्‌ । यथा हस्तः करः पाणिरिति शब्दभेद एकस्य, 
पितृचं पुत्रत्वं च, प्रल्मयभद एकस्येव बद्धः पुनथुक्तः स्थितो गतश्चेति काट- 
भेद।त्‌ । दाहकत्वं पाचकत्परिल्यादयो घमेभेदा इति । दिग्देशादिभदास्वसिद्धा 
एव । तस्मदाह--आन्ममूता इति ॥ 


स च स्वफटन व्यक्तेनानुमितः । फठेन उदकाहरणधारणक्तम्भव- 
नादिना । यस्य हि फर काय व्यक्तमुपठम्यते सेऽप्तीति निश्चयः । अनुमित 
इति विप्रतिपन्नपिक्षया, साधारणशब्देन शक्तिख्येण वोव्यते। स तु प्रल्क्ष एव 
अन्यक्तेन दण्डतुत्रकुटालािकारकन्यापरामिष्यक्तेन फरेन कर्यैेण धटास्येन 
प्रागपि मृदाववस्थायामत्तितेन अनुमितः स एव दण्डारिकारकैः स्वव्यक्षकेरभि- 
व्यज्यमनः प्रादुभेवति धमौन्तरोदये च तिरेभवति स एष भूतस्‌क्षमाणां 
पर्मोऽवयवीद्युच्यते ॥ 


एतदुक्तं मवति-- अणगूनामप्र्यक्षत्वा्नाविभावतियेभावो युक्तौ । (तत) 
स्तश्च तै । तस्माय आविभ॑वति, धरममान्तरोदये विरेधात्तिरोभवति च, आविर्भाव 
च ये! व्यञ्ञकाववेश्नते सोऽवयवीद्युच्यते । यशचवेधर्मैः सोऽणुभ्योऽन्य इति ॥ 


किश्च--अमी अप्यन्ये हेतवोऽवयत्रिसद्रवि--योऽपाविकश्च महां 
शधाणीयांश्च करियाधर्मकशथानिदश्च | प्रयेकमेते हेतवः ॥ 


१०८ पातञ्जल्योगसुत्रभाष्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
यस्य पुनरवस्तुकः सं प्रचयविशेषः, पृष्ष्मश्च कारणमनुपलम्वं 
अविकट्पस्य तस्य अवयव्यभवात्‌ अतद्रपभ्रतिष्ठ मिथ्याज्ञानमिति 
प्रायण सत्रमेव प्राप्त मिथ्याज्ञानमिति । 
{ विवरणम्‌ ] 
अपि च-एको घट इति घटश्चन्दवाच्यस्यैकतेन सामानाधिकरण्यात्‌ । 
अस्ति चेदं सामानाधिकरण्य योऽसावैक इति । न हि बहूनमणूनामेकस्वेन 
सामानाधिकरण्यमुपकल्पते ॥ 


तथा महत्वेन । न चाणूनां अमहतां महेन सामानाधिकरण्यं 

युज्यते । तथाऽणीयस्त्रेन | न द्यणूनामण्वन्तरवेक्षया अणीयस्वं घटते । सत एव हि 

तेऽणीयाप्तः । नापि चाणूनामणुवं गृह्यतेऽणुम्यः । अणुत्वे वस्वन्तरस्याणीय- 
स्मुपपस्स्यते ॥ 


किश्च- त्रियाधमकश्च | क्रिया धर्मो यस्य स क्रियाधमकः । फलवदथा- 
पारनिदत्तिकरघादिद्युक्ते मवति । न द्यणूनां फल्वद्वधापारनिङत्तिकरसं 
युक्तम्‌ । अश्चक्यप्रयोऽयलादस्मदादिमिः । किञ्च--अनिव्यघात्‌ । न 
ह्णूनामनिलयतवं गृह्यते ॥ 


किच-- दृदयत्वात्‌ । न ह्यणवो द्यन्ते । तथा स्पृश्यताच्च हानाञ्चो- 
पादानाच्च धारणाचचेदेवप।दयः । तेनावयविना व्यवहाराः क्रियन्ते 
नाणुभिरिति ॥ 

यस्य॒ पुनः ह्य प्रमाणदुप्रतिद्धसत्ताकोऽपि अवस्तुकः] 
अवयवी, स प्रचयविशचेषः सूक्ष्मं च कारणमनुपलम्यं अण्तरादि 
तस्यवयन्यभवादतद्रपग्रतष् मथ्याज्ञननामति प्रायण सवमव विषयज्ञानं 
प्राप्त मध्यङ्ञनम्‌ ॥ 


ततः सर्पमेव ज्ञानं शब्दायाकरेण घुाधाकरिण तदृङ्ञानाकरेण 
चोपजायते । शब्दादयश्च ज्ञानाकारकरावयवित्रामिपमता नाम्युपगम्यन्त | 
घुखादयोऽपि विषरयत्वादवयविपक्षा एव. तथा तज्ज्ञानमेव ज्ञानाकारकरत्वात्स्व- 
रूपमपि मिथ्येति प्रतं सपैभेव मिथ्याज्ञानम्‌ ॥ 


ततश्च प्रयक्षानुमानयोरव्याभासतत्मेव तेनाभ्युपेतं तयोरपि शब्दादि. 
विषयत्वात्‌ ॥ 


समाधिपादः प्रथमः १०९ 


[ भाष्यम्‌ ] 
तदा च सम्यग््ञानमपि $ स्यात्‌? विषयाभावात्‌ । यदु 
पलमभ्यते तत्तत्‌ अवयंवितेनाम्नातम्‌ । 
तस्मादस्यवयवी यो महत्वादिव्यवद।रापन्नः समापूत्तेनिंरवितकोया 
विषर्यामवति ॥ ४३॥ 
[ विवरणम्‌ | 
यदपि स्व्गज्ञानमनिदयदुःख्यन्याना्मकस्वादिविषयै तस्यापि विषया- 
भावत्तिदपि मिथ्याज्ञानं प्राप्तमिति, स्वतन्त्रस्य तीथकरस्य चप्रामाण्ये) तत्र 
तीर्थकरसहधमामावरश्वाभ्युपगतो मवति । शब्दादिवद्ममाणव्रिप्रयता विशेषात्‌ ॥ 


तदेतव्पतिपादयति- सम्यगज्ञानमपि किं स्याद्धिषियामत्रात्‌ । 
यद्यदुपलम्यते तत्तदवयविखेनाघ्रातमिति, ज्ञानस्य स्वाकारसम्पकत्ा- 
विरोघात्‌ । तच्च स्वाकरसमर्षकं किञ्चन नाभ्युपेयत इति सवंस्यासीयतस्य 
ज्ञानस्य तेन मिध्याव्यमापादितम्‌ ॥ 


तथा च सम्यन््ञनर्मपि वि स्यात्‌, यदपेक्षया मिध्याज्ञानमभि- 
सन्धीयते ॥ 


यदा चावयक्िनं स्प्रमाणसतम्यकूपकज्ञानसिद्धमपहुते तदा न 
पतम्यश्ञानस्य विषयः सम्पादयितं परथते ॥ 

यदा च न पारयति, तदा कथममितन्दधीत सत्र मिथ्येति । सम्य. 
ग्ञानमपेक्षय मिथ्याज्ञानं मिध्यामवमाप्तीदति अपिक्तिकवत्तम्यद्मिथ्याज्ञानयोः | 


यश्चापि मन्यते-- निर्विषयं च्खानं सम्यगिति, तस्यापि स्वरूपब्रहणात्‌ 
तदस्तिलानुपपत्तिः । गृह्यते चेद्दिषयत्वादवयविमिध्यात्वे, तन्मिथ्यालाच्च 
तज्ज्ञानमिथ्यातव, तथा तज्ज्ञानमपि सवेमिध्यासमुक्त पूथैमेव ॥ 

अपि च-- निर्िषरयन्ञानसम्यक्ते सतेज्ञानस्य विषयानम्युपगमानिर्विंषयत्- 


मिति, रम्यक्छमेव प्राप्नुयात्‌ । तथापि तु सवैज्ञानस्म्यकवान्मि्यज्ञानं कि 
स्यादिति वक्तव्यम्‌ ॥ 

अथापि त्रुयात्‌--यत्सविषयमिवामाति तन्िथ्याह्नं, यदलन्तनिविषयं 
तत्सम्यगिति | तथाऽपि तस्यास्ते प्रमाणाभाव इघ्युक्त एव दोषः । तस्मादवयवी 
सम्य्ञानस्य विषयोऽवस्याम्युपगन्तम्यः इत्याह-तस्मादस्यवयषी यो 
महत्वाद्थवदहारापन्नः समापततर्मिवितकांया विषयीभवतीति ॥ ४३ ॥ . 


११० पातञ्जल्योगसूत्रभाष्याेवरणे 


सूत्रम्‌ ] 
एतयेव सविचारा निध्रिचारा च सुष्ष्मविषया व्याख्याता ॥ ४४॥ 
[ भाष्यम्‌ | 


र तत्र॒ भूतसक्षपकेष्वमिन्यक्तधर्मकेषु देशकालनिमित्तातुभवाव- 
च्छिननिषु या समपर्चिः सा सविचरिद्युच्यते । तत्राप्यक्बुद्धिनिग्राद्यमे- 
वोदितधमविशिष्टं मूतपृष्ष्ममाछम्बनीमूतं समाधिप्रज्ञायामुपतिष्ठते । 
या पुनः सर्वथा पर्वतः शन्तोदिताग्यपदेर्यवमानवच्छिन्नषु 


[ विवरणम्‌ | 

एतयेव सविच।श॒निविचाय च सूक्ष्मविषया व्याल्याता । तत्र 
मूतसुष्मष्वमिग्यक्तधमकेषु तम्त्रष्वेव देरकाटनिमित्तातुभवरावच्छिननेषु 
देरावच्छिने कालावच्छिनेषु निमित्ताघच्छिन्तेष्वनुभवबच्छिननषिति प्रयेक- 
मवच्छिनशब्दः । सर्वं हि वस्तु देरादिभिरवग्छिचमानं विषयिणा ज्ञात्रा 
संबध्यमाने व्यवहाराय कल्पते । तेष्ववेमूतेष्वेवमूतैव देश(दिविकल्पामिसंहितैव 
या समापत्तिः सा सव्िचरिद्युच्यते । ततश्च सविचारायाः सवितक॑ - 
विशेषं प्िद्धम्‌ ॥ 


[ ककर 4 = 


कथम्‌ १ इहप्यध्यासाविशेषात्‌ । अयन्तु षिरेषः रब्दस्ङ्कता४. 
ज्ञानदेशादिसत्रीष्याप्ताः सवितक।य।म्‌ ॥ 


{+ (7 न 


इह॒ पुनस्तन्मातसूकष्मघर्मषु शन्दसद्कतस्याप्रसिद्धघाद्विशिष्टनामसङ्केत- 
ज्ञानानध्यासः देशाधध्यातश्च सूक्ष्मविषयत्वश्चेति सवितकौविरेष्रत्वसिद्धिः ॥ 


[0 


तत्राप्येकन्चुदधिनिग्रीह्यमेवोदि तधमविशिष्टं उक्तदेशादिषर्मविरि्टमु- 
दूभूतधमेविशिष्टं वा भूतपुक्षमारम्बनीभूतं न तु निर्विषयं ज्ञानमेव समाधि- 
प्रजञायायुपतिष्ठते ॥ 


यदा पुनः सवथा सवप्रकरेण सवैतः सवत्र शान्ताश्वोदिताश्वान्य- 
पदेश्याश्च ये धर्मास्ते शान्तोदितान्यपदेश्यपमौः तेः अनवच्छन्नेषु । शान्त 
इति यो व्यापारं कृत्रोपरतो धमः । उदित इति यो भ्यापारमाहूढः । 
अन्यपदेश्य इति न इन्तो नाप्युदितः नाप्युद्धावयद्द्रयमाननिमित्तः । तथया-- 
पुव्त्यादषटानेकाश्वता करिपजन शक्तयस्ता अन्यपदेदया धर्मः । तेरनवच्छिननेषु 


समाधिपादः प्रथमः १११ 


भाष्यम्‌ | 
सवेधमीनुपातिषु सवेध्मासमकेषु समापत्तिः सा निर्विचारेद्युच्यते । 
एवंस्वरूप टि तद्मूतसुक्ष्ममेतेनेव स्वरूपेणारम्बनीमूतमेव समाधि. 
र्ञास्वहूपमुपरक्ञयति। ` 
रज्ञा च स्वरूपशन्येवाथमात्रा यदा भवति, तदा निविचरिदु- 


च्यते । तत्र॒ महदस्तुविप्रया सवितक्र निर्वितकां च । सूक्ष्मवस्तुविषया 
सविचारा निर्विचारा च । एवष्ुमयोरेतयेव निर्विंतफैया विकस्पदानिव्य- 
ए्यतिति ॥ ४४ ॥ 
[ सनम्‌ ] 
सुक्ष्मविषयत्वच्चालिङ्गपथवसानम्‌ ॥ ४५॥ 
[ विवरणम्‌ | 

भूतसूक्षमेषु सवेषमीनुपातिषु सवौन्धमौनतुपतनिति तानि सूक्ष्माणि सवेविसेषारम्भ- 
कत्वात्‌ । सवौ तकेषु सर्वम्ये विषरयेम्योऽनन्यतवा्तन्मात्रणाम्‌ । तन्त या समापत्तिः 
सा निरविचारेति । निवितकया यछ्ठश्षणे तत्सकमिह निविचारायं द्रष्टव्यम्‌ ॥ 

तदरशयति--एव॑स्वरूपं हि तदुमूतसुक्ष्ममनेनेव स्वरूपेण देरकाठ- 
निमित्तानुमवादिविरोषविरदितेन सवैत्मकेन सर्वधनीनुपातिना आहुम्बनीमूतमेव 
समापिप्रज्ञामुपरञ्जयति ॥ 


रज्ञा च स्वर्ूपश्यल्येवाथमात्रा यदा भवति तद। निविचारा । 
तस्मनिर्वितकौविशेषा नितिचारा । तत्स्वयमेव दरोयति-महद्रस्तु विषया । महतः 
वस्तु महदरस्विति समसः राहुशिर्‌ इति यथ। । तद्िषयो यत्याः सा मदृदस्तु- 
विषया पवितकं निर्वितक च सूक्ष्मवस्तुविषया पत्रिचापय निर्विचारा चेति॥ 

एतयैव सवितर्कानिर्वितकौल्यया द्या समापस्या सविचार निर्विचारा च 
समापत्तदैयी व्पास्याता । उमयोरिति सतरितर्कनिर््ितर्कयेभध्ये एतयैव 
निर्वितर्कया वितकंदानि्व्याख्याता निर्विचारा व्या्यतिति। सविचारा चार्थात्स- 
वितकया उ।ए्ता छक्षणस्येोमयत्र समानत्वात्‌ । उक्तश्च विरेषः ॥ ४४॥ 

सतिचारा निर्विचारा च समापत्तिः सूक्षषविषयेध्युक्तम्‌ । तस्प्रसङ्गेनेदं 
चिन्यते--कि(मसमाने)मवसानं सूक्षमविषयतमिति । सुक्षमविषयत्श्वारिङ्ग- 
पर्यवसानम्‌ । पार्थिवस्याणोगैन्धमात्रस्सरूपमात्तेति प्रथिवरी्मीक्षया सूक्ष्मा 
विषयः ॥ 


११२ पातज्ञखयोगसूत्रमाष्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
पाथिवस्याणोगैन्धतन्मात्रं सृकष्मो विषयः । आप्यस्य रसतन्मात्रम्‌ । 
तैजपस्य रूपतन्मात्रम्‌ । वायवीयस्य स्परेतन्त्रिम्‌ । आकारस्य 
शब्दतन्मात्रमिति । तेषामहङ्कारः । अस्यापि लिङ्गमात्रं सृष्षमो विषयः । 
टिङ्गमात्रस्याप्यरिङक सृष्ो विषयः । न चाशिङ्गातपरं सुष्षममस्ति । 
नन्वि परुषः सृष्ष्म इति--सप्यम्‌-- यथा टिङ्गासरमटिङ्गस्य 
सौक्ष्ये, नेव पुरुषस्य । किन्तु, टिङ्गस्यान्वयिकारणं पुरषो न 
मवति, देतस्त॒ भवतीति । अतः प्रभाने सैक्यं निरतिशयं 
व्याख्यातम्‌ ॥ ४५॥ | 
[ विवरणम्‌ | 
गन्धमात्र्वरूपमन्रस्यापि लिङ्कमात्र महत्तत सृक्ष्मो प्रिषयः । 
ततो लिङ्गमात्रान्महते निर्वत्तानि सहाहङ्करेण तन्मात्राणि च्यं 
गच्छन्तीति लिङ्गं, ख्याद्वा प्रधनछि्ग।सअघ्यागच्छन्तीति लिङ्गं, तद्विषरतमरिङ्ग 
प्रधाने न ठयं गच्छति, नाप्यन्यत; कुतधित्‌ व्यद गच्छति । लिङ्कमात्रस्या- 
लिन्गं सुक्ष्मो विषयः ॥ 


न चाटिङ्धासटं सृष्ष्ममस्ति । सक्मे नाम स्थूलकायंविक्षया कारण, 
तचालिङ्गावसनम्‌ । न चालेङ्गात्‌ प्रधाना(छिरब)दन्य्सुक्षं कारणमि ॥ 


ननु पुरुष इति । नयु तत्र पुरुषस्यानाराङ्कव, कायंकारणसूक्षमतया 
्रक्रमात्‌- नैष दोषः--पुरुष्यापि वैश्िष्कारणत्वस्याभ्युपगमात्‌ । तदा- 
शङ्कैव द्येतदुच्यते ननु पुरुष इति । सव्यमलिङ्गालमक[त]मटिन्गस्य 
सौक्ष्म्यम्‌ ¡ कुतः १ यतः कारणमलिङ्गं लिङ्गस्य । यद्यस्यान्वयिकारणं तत्तद- 
पेक्षया सृक्ष्ममिति प्रकृतम्‌ । नयु पुरुषोऽप्यलिङ्गासक एव । बाढ, न तु लिङ्गा- 
पेक्षया पुरुषः सुष्पः । कुतः £ यतस्तु लिङ्गस्यान्वयिकारणे पुरषो न भवति 
सलयप्यलिङ्गामकत्वे | कयस्य पेतन्येननन्वितलरात्‌ ॥ 


किश्च--पुरुषस्यपि मोग्यवप्रङ्गः । तथा च पारा््यं घुखदुःख- 
मोहारकत्वं॑च, निर्हेतुकः च प्रधानस्य (पुरुषस्य) । तच्च प्वैप्रमाण्माण) 
विप्रक्ुपितमिव्यत आह--देतुस्तु भवतीति । प्रधानप्रदृत्तौ भोक्तृत्वेन निमित्तं 
मवतीलयर्थः । अतः प्रधानस्य स्म्य निरतिशयं व्याख्यातम्‌ ॥ ४५॥ 


समाधिपादः प्रथमः ११३ 


[ सूत्रम्‌ । 
ता एव सबीजः समाधिः ॥ ४६ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
ताश्वतखः समापत्तयः बहर्वस्तुबीजा इति समाधिरपि सवीजः । 
तत्र स्थूलेऽये सवितं निर्वितकः, वृक्ष्मेऽ्थे सविचार निर्विचार, इति 
चतुरपोपसंख्यातः समाधिरिति ॥ ४६ ॥ 


[ सूत्रम्‌ | 
निर्विचारवेशारवेऽध्यात्मप्रसादः ॥ ४७ ॥ 


[ भाष्यम्‌ ] 
अश्ुद्धयावरणमलपेतस्य प्रकाशास्मनो बुद्धिसतवस्य रजस्तमोभ्या- 
मनभिभूतः स्वच्छः स्थितिप्रवाहो वेशारघम्‌ । यदा निर्विचारस्य समैः 
वैशारवमिदं जायते, तदा योगिनो भवलध्यासप्रसादो मूताथैविषयः 
कमावुरोषी' स्फुटः प्रज्ञाऽऽखोकः । 


[ बिबरणम्‌ 1 
ता एव सबीजः समाधिः । चतस्तः समापत्तयो षहिषैस्तुविषया इति 
बदिर्वस्तुविषयतवं हेतु; सबीजले । समाधिरपि सवीजः सम्््ञातो "वितक- 
विचाएनन्दासितारूपानुगमास्सम्प्रज्ातः' शइत्युपव्यास्यातः । स्थूलेऽर्थे 
सवितर्का निर्वितकेः; सृष्षमेऽ्थं सविचारो निर्विचार इति चोपन्याख्यातः 
वितकादिलक्षणसूत्रेण ॥ ४६ ॥ 


निर्विचासश्ारयेऽध्यासप्रसादः । अश्युद्धधावरणमलखपेतस्य 
अड्ुद्धिरेवावरणं तदेव मरं ह्ेशादिकं तस्मादपेतस्य प्रकाञचासनो बुद्धिस्तखस्य 
रजस्तमोम्यामनभिमूतः स्वच्छः स्थितिप्रवादये वैशारद्यम्‌ । यद्‌ निर्विचारस्य 
समाषेवशारयमिदं जायते, तदा योगिनो मबयध्यालप्रसादः आत्मादि- 
ज्ञानविवेकः । जस्थेव व्यास्यानं भूतायेविषयः करमातुरोषी परिपाटिकया 
यावक्छेशक्षयमनुरुद्धयत इति क्रमानुरोधी स्फुट बिषिक्ततरं शुद्धतरात्मकः 
्र्नालोकः श्रह्ैवाठोकः तया हि चथावस्तु जानाति ॥ 


1, क्रमाननुरोधी, इति वाचस्पत्यभिमतः पाठः ॥ 
15 - 


११४ पातञ्जलयोगसूत्रभाष्याविवरणे 


तथा चोकतम्‌-- 
८८ प्रज्ञा्रासादमारह्य अशोच्यः शोचतो जनान्‌ । 
भूमिष्ठानिव शैरस्थः सवाँन्राज्ञोऽनुपर्यति ॥'" इति ४७ ॥ 
[ सूत्रम्‌ | 
ऋतभरा तत्र प्रज्ञा ॥ ४८॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
तस्मिन्‌ समाहितचित्तस्य या श्रज्ञा जायते, तस्या ऋनेभरा इति 
सज्ञां मवति । अन्व च सा, सलमेव विमति, न च तत्र विपर्यासन्ञान- 
गन्धोऽप्यस्तीति । 
तथा चोक्तम्‌-- - 
५ आगमेनानुमानेन ध्यानाभ्यासरसेन च । 
त्रिधा प्रकत्पयन्‌ प्रज्ञां रमते योगयुत्तमम्‌ ॥ इति ।॥ ४८ ॥ 
सा पुनः- 
॥ [ विवरणम्‌ |] 
तथा चोक्तम्‌- - 
्ज्ा्रासादमारहय न शोच्यश्शोचतो जनान्‌ । 
मूमिष्ठानिव शेरुप्यः सवौन्पराज्ञोऽतुपरयति ॥' इति ॥ ४७ ॥ 
ऋतंभरा तत्र प्रजा । तस्मिन्‌ प्रज्ञाोकेऽध्यासप्रस्रदे समाहितस्य या 
रज्ञा जायते विवेकजन्मा, तस्या विवेकजन्मनः ऋतम्भरेति सन्ना मवति । 
अन्वर्थैव सा सलमेव बिभति न तत्र विपययीसज्ञानगन्धोऽप्यस्ि । 
प्रक्षीणसकङ्विपय।सकरल्मषस्य हि जायते । जायमाना च विषयकल्ङ्कः 
मपनुदति ॥ 
तथा -चोक्तम्‌- 
‹ आगमेनाुमानेन ध्यानाभ्यासरसेन च । 
त्रिधा प्रकलसयन्प्रजां लभते योगमुत्तमम्‌ ॥' इति । 
योगाङ्खप्रजञां त्रिधा विभजते । तत्रैको भागः शाल्ञचायोपिरिष्टर्थानुसायी । 
द्वितीयस्तसयैव युक्त्याऽनुपानेन विचायौगमाथविरोधिनिराकरणपूर्वकं तसम्यगुप- 
धरादनपरः । तृत।यस्तुं सदागमानुमानप्षम्यगुपपनयाटम्बनस्य प्रययस्यानुश्षीन 
रसोपयेगी । तदित्थं त्रिधा प्रकल्पयन्योगी योगं कमते ॥ ४८ ॥ 


समाधिपादः प्रथमः ११५ 


| सूत्रम्‌ | 
्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषाथेत्वात्‌ ॥ ४९ ॥ 


[ भाष्यम्‌ | 
श्रुतं आगमविज्ञानम्‌ । तत्‌ सामान्यविषयम्‌ । न द्यागमेन शक्यो 
विशेषोऽभिधातुम्‌ । कस्मात्‌? न दि विशेषेण कृतसङ्कतः शम्द इति । 
तथा अनुमानं सामान्यविषयमेव । "यत्न प्रा्षिः तत्र गतिः, यत्राप्राततिः 
तत्र त मवति गतिः इत्युक्तम्‌ । अनुमानेन च सामान्येनोपसंह्‌।रः । 
तस्मात्‌ श्वुतानुमानविष्यो न विषः कश्चिदस्तीति । 


नचास्य सृष्ष्मग्यवहितविप्रकृषटस्य ` वस्तुनो ठोकप्रयक्षेण 
ग्रहणमस्ति । न चास्य विद्चेषस्य अप्रमाणक्रस्य अभवोऽस्तीति समाषि- 
्रज्ञानिग्रह्य एव स विशेषो भवति मूतसूक्ष्मगतो वा पुरुषगतो वा। 


[ षिवरणम्‌ ] 
सा पुनः ऋतम्भरा प्रज्ञा सामान्यपुरुषप्रसयविषयादन्यविषयेव्याह-- 
्रुतातुमानग्रजञाभ्यामन्यविषय। । विरेषः विरेषाणामानन्त्यान सङ्केतयितु 
दाक्यते । सामान्येन हि कृतसङ्केतः दाब्दः । ततश्वागृहीतविशेषसङ्केतो न 
विरेषमभिधातुं ज्ञापयितुं वा राक्रोति ॥ 


तथातुमानं सामान्यविषयमेव । तदप्यक्तेव (सामान्यावधारणमप्रधान। 
वृत्तिः" इति । तथेोदाहरणेन च प्रतिपादितम्‌ ^ यत्र प्रा्तिस्तत्र गतिः । 
यत्राप्रा्स्तत्र न मवति गतिः" इति । अनुमानेन सामान्योपतहारः । सा 
मान्यमात्रमनुमनेनेपसंहियते । तस्माच्दुताुमानविज्ञानविषयो न विरेषः 
कश्िदस्ति ॥ 


येवं न छोकप्र्क्षणापरेण मूतसूक्षमगतः पुरुषगतो वा विशेषः 
रजञयित । नान्यच्च प्रमाणत्रयन्यतिरिक्तं प्रमाणमस्ति, येन तद्विशेषं सन्ञानीमहे 
इति तेदाद--न चास्य सृक्ष्मव्यवदितविप्रक्ृषटस्य वस्तुनो लोकप्रयक्षेण 
ग्रहणम्‌ । न चास्य विरेषस्याप्रमाणकस्याभावोऽस्तीति । प्रमाणावगम्य- 
मान्यो हि भावोऽस्ति रजवीधीमधिरोहति । तस्मात्‌ समापिप्रज्ञानिग्रीद्य 
एव विशेषो भवति भूतसूक्ष्मगतः पुरुषगतो वा ॥ 


११६ पातञ्जलयोागसूत्रभाष्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
तस्मात्‌ श्रुतानुमानप्रज्ञाम्यामन्यविषया सा प्रज्ञा विशेषायैखात्‌ 
इति ॥ ४९॥ 
समाधिप्रज्ञाप्रतिरम्मे योगिनः प्रज्ञक्रतः सेस्कारे नवो नवो जायते- 
( सुत्रम्‌ ] 
तजः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ॥ ५० ॥ 
[ भाष्यम्‌ । 
समापिप्रजञप्रमवः संस्कारो ब्युत्यानसंस्काराशयं बाधते । 
वयुस्थानसंस्काराभिमवात्‌ तस्मभवाः प्रयया न मवन्ति । प्र्ययनिरोषे 
समाभरिरपतिष्ठते । ततः पमापिजा प्रज्ञा, ततः प्रज्ञाकृताः संस्काराः इति, 
नवो नृव; ससकाराशयो जायते । ततश्च प्रज्ञा; ततश्च संस्कारा इति । 
| विवरणम्‌ |] 
ननु च ते सृक्षगता विरोषाः प्रलक्षेणाव्रगम्यन्ते इति किमीश्वराज्ञापितम्‌ ए 
दस्तुत्वादवगम्यन्त इति चेत्‌--आगमानुमानाभ्यां सन्तील्यवगम्यन्त एव । न च 
नियामकः किंचिदस्ति प्रयक्षेणेव निग्राह्या इति । न हि विशेषा हस्ततल्गता 
अपि सवै गृह्यन्त-न-अन्यवस्तुगतविशेषाणां प्रयक्षप्राह्यत्वस्यानुमेयत्वात्‌ ॥ 
कथम्‌ £ एवं मन्यते--भूततूक्ष्मादिगता विरोषाः प्रलक्षम्राह्याः कस्य 


| १ 0 


चित्‌, क{यवस्तुवर्‌ाष्रल्ात्‌ 9 ग्ह्यमणस्तरपाणगतवदषव्रादत | तस्मार्डतानु- 
मानप्रज्ञभ्यामन्यविषया सा प्रज्ञा; विरोषा्थेखादिति । विदेषाथा हि सा॥४९॥ 
समापिग्रज्ञाप्रतिरम्भे योगिनः प्रजाक्रेतः संस्कारो नवो जायते । 


प्रज्ञ हि सस्कारारम्मिणीति सिद्धम्‌ । प्रज्ञाभिनवघ्वात्तत्संस्कारः प्रलयग्रतसे जायते 
इति विरोषः । प्रज्ञानवत्वं तु तस्या (सामान्य) अन्यत्रिषयलरात्‌ । तजस्स॑स्कारोऽ- 
न्यसेस्कारप्रतिबन्धी ऋतम्भरमन्न प्रमवसंस्कारो ब्युत्थानसंस्कारश्चयं अन्यं 
बाधते विशिष्टयथार्थविषयप्रभवत्वासतिबधघति । अमोक्षच्छेत इति 
संस्काराशयः ॥ 

व्युस्यानसस्काराभिमवात्‌ ब्युप्ानसंस्कारा्यस्य समधिभज्ञासस्करे- 
णामिमवात्‌ तस्रभवाः व्यु्थानसंस्कारप्रभवाः प्रयया न भवन्ति । 
प्रययनिरोपे ग्युव्यानभ्रसयनिरेधे समाधिः सम्प्ज्ञात इव उपतिष्ठते । 
ततः समधिजा प्रज्ञा; ततः प्रज्ञाकृताः संस्कारा इति, एवं नवः संस्काराशयो 
वर्धते । ततश्च प्रा ततश संस्कारा इति ॥ 


समाधिपादः प्रथमैः ११७ 


भाष्यम्‌ ] 
कथमसो सस्काराशयधित्तं साधिकारं न करिष्यतीति? नं 
ते ` प्रज्ञाकृताः सध्काराः जशक्षयहैतुसखात्‌ चित्तमधिक।रविशिष्ट 
कुर्वन्ति । चित्तं हि ते -स्वकार्यादवसादयन्ति । स्यातिपयेवसानं 
हि चित्तचेष्टितमिति ॥ ५० ॥ 


किश्चास्य भवति- 


सूत्रम्‌ | 
तस्यापि निरोधे सवेनिरोधानिर्बीजः समाधिरिति ॥ ५१॥ 


इति श्रीमहूर्षिपतञ्जञलिविरचिते योगसूघ्र 
प्रथमः समाधिपादः ॥ 


[ विवरणम्‌ ] 

अत्राह-- समाधिप्रज्ञामवः संस्कारारयश्चित्तप्याधिकारप्रदृत्तिदेतुः, प्र- 
यप्रमवत्वात्‌, व्यु्थानग्रभवसंस्कारारायवदिति, तथा चित्तसस्कारत्वाचेति । 
तदेतदरीयति--कथमसौ संस्काराशयः चित्त साधिकारं संस्करेपितं 
न करिष्यतीति ? ॥ 

नैष दोषः-तद्विरोधित्रात्‌ । कथं £ ते सैस्काराः इ्शक्षयदेतुला- 
चित्तमधिकारविशिष्टे न कुवन्ति । ब्युत्थानप्रल्यगप्रभवानां हि स्स्कारणा- 
मविधादिङ्कराहेतुताचित्ततस्काराभिपुखमावकारणता । तद्विरोधिग्रह्ययप्रमबलातत 
न समाधिजप्रल्ययजन्मनां संस्काराणामधिकाराभिमुखूयनिमित्तता ॥ 


किचच--चित्तश्वं ते स्वकार्यात्‌ सेस्काराभिमुखदृत्तिम्योऽवसादयन्ति 
विरमयन्ति । ख्यातिपयववैसानं हि चित्तविचेषटितम्‌ । पुरुषल्य।तिश्च जाता 


म ९ अ 


संस्कारश्च भवतां विरुद्धम्‌ ॥ 


य हि विगततृष्णप्षपुदायो, नासो पानीयं पिपासति ] एतावदेव 


चित्तेन पुरुषस्य करणीयम्‌ । न हि कशचित्‌ कृतं करणीयं 
चिकीर्षति ॥ ५० ॥ 


११८ पातञ्चल्योगसुत्रभाष्याकेवरणे 


( भाष्यम्‌ | 
सन केवरं समापिप्रज्ञाविरोधी, प्रजक्रतानामपि संस्काराणां 
प्रतिबन्धी भवति । कस्मात्‌ : निरोधनः संस्कारः समाभिजान्‌ ैस्कारान्‌ 
बाधत इति । 


निरोषस्थितिकाठक्रमानुमवेन निरोधदित्तक्ृतसस्कागस्ितवमनु- 
9 
मेयम्‌ । 


[+ 


[ विवरणम्‌ }] 


किश्च- तस्यापि निरोपे सर्वनिरोधा्निर्बीजिस्समाधिरिति । इति- 
दाब्दः पर्िमाप्यथः | तस्यपि समापिप्रज्ञाप्रमवस्य सैस्कारस्यामिनधस्य 


निरे भपिशब्दास्संरकारकारणस्य समाधिप्रज्ञाया अपि निरेषे, सवनिरोधा 
भवति । उक्तमेत्रोप।यदयं परेरग्यथिरामव्र्ययाम्याप्ता्यं तनिरोघस्य ॥ 


कि पुनस्तव्तव? यन्निरोषस्यते । ग्युत्यानसमाधिग्रज्ञातत्संस्कराः । 
तस्मात्‌ सवेनिराधान्निर्बाजः समाधेः ॥ 


स॒ न॒ केवरं ऋतम्भरप्रज्ञाजनितसेस्कारः समाधिप्रज्ञानिरोषी, 
यथैव तां समाधिप्रज्ञामृतम्भरां निरुणद्धि, तथेवासना सहात्मसतजातीयानां 
स्वकारणप्रज्ञ।कृतानां सस्काराणामपि प्रतिबन्धी निरेषाद्धवति ॥ 


कसमात्‌? निरोधजः स्कारः यस्मासमाधिग्रज्नयास्तनन्मनश्च 
संस्कारस्य निषे, निरोधकः समाधिप्ज्ञाजनितत्तस्कारादन्ये जायते, स चापि 
यतः समाधिप्रज्ञा तजनितसंस्कारांश्वाति(्स्कृप्य न जन्म प्रतिपद्यते, तस्मात्स 
निरोषजः सस्कारः समाधिजान्वस्कारान्वापत इति ॥ 


कथ॑पुनरसे निरेधजः सस्करोऽस्तीति गम्यते? विधमनेऽपि स 
बाधको भवतीति £ आह-- निरोधस्थितिक्रालकरमादुभवेनेति । निरोधस्य 
स्थितिस्तस्याः काठः स च कारः क्रमेणानुभूयते, यतः प्रस्यभ्यास्तममिवधते, 
तस्मात्तेन निरोधदिथितिकालक्रमानुमवेन निरोधचित्तृतं निरोधावस्यचित्त- 
कृतं संस्क।रास्तित्वमनुमेयम्‌ ॥ 


समाधिपादः प्रधमः ११९ 


[ भाष्यम्‌ | 
सयुरयाननिरोपसमापिप्रमवैः सह कैवस्यमागीयैः संस्करिः चित्त 
स्वस्यां प्रकृताववस्थितायां प्रविटीयते । तस्मत्ति संस्काराश्चित्तस्या- 
धिकारविरोधिनो न स्थितिहैेतवो मवरन्तीति । यस्मादवक्िताषिकारं सह 
केवरयमागीयेः सश्करेधित्तं निवते । तस्मिन्निवृत्ते पुरुषः स्वकूपमात्र- 
प्रतिषटोऽतः शुद्धः केवले मुक्त इत्युच्यत इति ॥ ५१ ॥ 


इतिं श्रीपातञ्ञलयोगसूत्रभाष्ये श्रीमद्वेदन्यासकरृते 
प्रथमः समाधिपादः ॥ 


[ विवरणम्‌ | 
व्युटथाननिरोपसमािप्रभवैः व्युत्यानक्तमाधिप्रमवेः निरेधक्तमाधि- 
प्रमवैश्च स॒ह केवल्यभागीयैः संस्करिशचित्तं अविताधिकारत्रात्‌ स्वस्यां 
प्रकृतो स्वकारणेऽसितायामहङ्करे प्रविठीयते प्रष्यस्तमेति । तस्मात्ते 
ए्यातिनिरेधजन्मानः संस्कार यस्मात्‌ चित्तप्याधिकारविरोषिनः न 
व्थितिदेतवो भवन्तीति ॥ 


यस्मादषपिताधिकार सह केवल्यभागीयैः संख्रिधित्तं य॑पुरुषं 
प्रति चरितप्रयोजनं तस्मात्‌ निवतैते । तस्िन्विनिवतते पुरषः स्वरूपमात्र- 
प्रतिष्ठः केवलो मुक्त इत्युच्यते, चित्तबृततिनिदृत्तिरव प॒क्तिः इति ॥ ५१॥ 


इति श्रीगो विन्दभगवस्पूञ्यपादक्लिष्यस्य परमहं प्तपरिन्राजका चायस्य 
श्रीशङ्करभगवतः कृतौ 
शरी पातञ्जल्योग(शाख)सूत्रभाष्यतिवरणे 
॥ प्रथमः समाधिपादः ॥ 


श्रीः 
॥ पातञ्जख्योगसूत्रभाष्यविवरणप्र ॥ 
॥ साधनपादौ द्वितीयः ॥ 


[ व्यासभाष्यम्‌ ] 

उषिटः समाहितचित्तस्य योगः । कथं व्युधितचित्तोऽपि योग 
युक्तः स्यादियेतदारभ्यते-- 

[ पातञ्जख्यो गसूत्रम्‌ ] 
तपस्स्वाध्यायेश्वरमप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥ १ ॥ 
[| विवरणम्‌ ] 

अथेदानीं द्वितीयः साधनपाद आरभ्यते । कैवल्यस्य साधनं 
सम्यण्दरशनम्‌ । योगसाघधनानिं च योगद्ररिण सम्यग्दशैनस्ताधनान्येव | तानि च 
प्राधन्येनस्िन्पदि प्रतिपायन्त इति साधनपाद्‌ इध्युच्यते ॥ 


तथा, योगप्ताधनानुष्ठान्रदृत्तस्यानुश्गंकविभूतेः प्राधान्येन प्रतिपादना . 
दि भूतिपाद इव्युष्यते तृतीयः ॥ 


तथा, सकल्येगिश्वयेविमूतिमभ्यो विरक्तस्य सवीपतंहारद्रेण कैवल्यस्य 
प्राधान्येन प्रदर्शनात्‌ कैबल्यपाद ह्युच्यते चतुधः ॥ 


तथा, समाधिः प्राघान्येनादाबुपास्यात इतिं प्रथमः समाधिपाद्‌ 
[०१ 
इत्युच्यते ॥ 


तदेतदाह--उदिष्टः समाहितचित्तस्य योग इति-- करमण्यचित्तस्ये- 
व्यधः । मेत्रीकरुणादिभावन।धुपा(ह्पा)यलन्धस्थितिपदस्य योगिनः परवैराग्यविरा- 
मग्रसययस्लाधनो निर्बीजः समाधिरुदिशः । कथ स्युत्थितचित्तोऽपि योगयुक्तः 
स्यादिति । विक्षि्तचित्तोऽपि कथं नाम समाधियोग्यो भवेदिव्यत श्दमारम्यते । 


तपञआदिप्ताधनमनुक्रम्यत-तपस्स्वाध्यायेशरसप्रमिषानानि क्रियायोमः। 


' कवने 


ननु च तपस्स््ाप्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमेषु वदिष्यमाणा 


किमधमिहोच्यन्ते ॥ 
16 


१२२ पातज्ञखयोगसूत्रभाष्यतिवरण 


ननु चैतदेव प्रथोजन-- यदुक्तं व्युत्थितचित्तोऽपि योगयुक्तः स्यादिति ॥ 
नैतदस्ति- य॒त्र नियमाः पन्यन्ते तत्रैवेदं प्रयोजनं क्िध्यति ॥ 


अथ छ्ेशतनूकरणाथमिति चेन--तस्यापि तत्रैवामिधानात्‌ । यथा 
^“ योगङ्गानुष्ठानादङ्ुद्धिक्षये” इति । अद्ुद्धिश्च छैशादिः । समाधि- 
मावनार्थ॑च्च योगाङ्गावुष्ठानमान्नापिष्यत ए । यथा «^ श्समाधिभिद्धिरीश्चर 


प्रणिधानात्‌" इति । तस्मादिह तपअदिसमाम्न(नमनथकम्‌ ॥ 


न- योगाह्गानुष्ठानस्य सम्यग्दरनोपायस्य सम्यग्दशनपूैल- 
प्रतिपादना्थत्वात्‌ । सर्वाणि च योगाङ्गानि सम्यग्दर्सनोपायवात्सम्यण्दर्शन- 
प्रक्ालानि | तेषां च नियमेकदेशा इह पठितः सर्वोपायप्राक्राल्तवे निददनाय | 


(4 


यथप्युपायतदिव प्रक्ताकत्वमथौस्सिद्धम्‌ , तथाऽपि स्पष्टत्वमेवं सति स्यादिति ॥ 


ननु चैवमपि प्राक्‌ सम्यग्दसेनादनन्तरं पठितव्यम्‌--उच्यते--न-- 
सम्यग्ददीनस्यव साक्षा्केशादिग्रतिपक्चघ्वात्‌ । अविधा हि समस्तानर्थमूलम्‌ । सा 
च सक्ाव्मयनीकभूतसम्यग्दशैनेन निवर्त्यते । तपअदिस्तदनन्तरं 
पठि सद्यविधात्तम्यग्दशनयेग्यवधाने मवेत्‌ । ततोऽमिशकेन--किं अव्रिधाया- 
स्तपआदिः साक्षाघ्तिपक्षः£ कि वा सम्फादरोनमेवेति ॥ 

किश्च.- विषयश्च प्रथम दरनीयः सम्पण्ददनराक्ञस्य । स च 
करेशकमविपाकारायामिमूतः पुरुषः । यथा रोगातैः चिविःसाशान्ञस्य त्रिबयः । 
तपओदेस्तदनन्तरं समाम्नाने विषयविषयिणो व्यवधीयेयतां ततश्चायं 
विषयोऽयश्च विषरयीति न वितिष्येत ॥ 


~ \ 
(| 
[व 


पादादौ च पठे सम्धण्दशेनोपायघं - च प्रतिपदित भवति, 
प्रथमपादसम्बन्धश्च व्थास्यातः स्यात्‌ समाहितचित्तस्य योग उद्िषटः, 
व्युत्ितचिचोऽपि तपञदित्ताधनः कथं योगयुक्तः स्यादिति ॥ 


किश्च--समाधिभव्नङ्केरतनूक्तरणायलश्च तपजदीनां दशंयितव्यम्‌ ॥ 





1. यो.सू.णा. 2. सू. 28. 
2. यो.षू.षा. 2. सू. 45, 


साधनपादो हितीयः १२३ 


[ भाष्यम्‌ 1 
नातपस्िनो योगः सिद्धयति । अनादिकमंङ्करावासनाचित्रा 
परत्युपस्थितविषयजाखा चाश्ुह्धिः 


( विषरणम्‌ ] 
ननु परस्तदेवैतद्वक्षयति--“ समाधिसिद्धरीश्रपणिषानात्‌ ' " 
‹कायेन्द्रियधिद्धिरशुद्िक्षयात्तपसः"' इवम्‌ । प्रवेकस्ताषनानां सिद्धिं च 


वक्ष्यति ॥ 


नैतदस्ति सिद्धानामिह तत्र साधनस्तुत्यथमनुवादात्‌ । छत्र हि 
तादर्वसुच्यते । तथा चाह---““समाधिमावनाथैः डशतनृक्ररणार्थ॑श्च '” इति। 
तत्र ह्यनूघन्ते साधनस्तुतये ॥ 


सम्प्रति सूत्रक्षराणि भ्यास्यायन्ते-- तपश्च स्वाध्यायश्चेश्वरप्रणिधानच्च 
तपस्स्वाष्यायश्चरप्रणिधानानि । तान्यत्र क्रियारूपे। योगः क्रियायोगः । तप- 
आदिक्रिया च योगार्थवायोग इ्युष्यते । चित्तधरमौ हि समाधिर्योगः । तदथ- 
श्वाय क्रियायोगः । तस्मादनेन क्रियायोगेन योगीति ॥ 

तप इति कृच्छचनन्दायणादि, रीतोष्णादिद्न्सषवम्‌ । स्वाध्यायः- 
प्रणवस्य मोक्षशाल्लाणां चोपनिषस्रभ्तीनां पवित्राणां जपः । { श्रमिधान- 
क्रियाणां परमगुरावीशवरे स॒म्पंणम्‌ । तासां वा फठसंन्यास : पसेश्वर संन्यसनम्‌ ॥ 


कथं पुनश्चित्तसमात्रानं प्रति विप्रकृष्टस्य कायञ्केशदिदूपस्य तपसो 
योगघ्म्‌ ? खाघ्ययिश्वरप्रणिधानयेस्तु युक्तमन्तरङ्गघाचोगतनिति, तदर्थमाह -- 
नातपस्िनो योगः सिध्यतीति ॥ 


रारीरादिपोषणाभिरतचित्तस्य कायेन्दरियमनःखेदपरिहारपरायणस्याव्यन्त- 
शरीरा्(त्मवदरिनः पुकुमारतरमन्यस्य न योगः सिध्यतीति तपस्त उपादानम्‌ ॥ 


किश्च-अनादिवाक्षनाचित्रा- विषयग्रहणवासनामिरनदिकाल्मिर- 
परचितविचित्रमावा । तथा प्रत्युपस्थितविषृयजाला---वतमानकाडा विषया 
एव जां, तेन च वतेमानक्िषियास्येन जलेन आनायेन ज्ञपानिवे चित्तं 
अशुद्धिः पयति. या सा प्र्युपस्वितविषयज।खा सती यस्मात्‌ 


५ 


1, यो.ष्‌.पा. 2, पू. 45. 
2. यो. सूर्पा. 2. स्‌, 43, 
3, यो.सृ.पा. 2, सृ. 2. 


१२४ पातञ्जटयोगसूत्रभाष्यविरणे 


( भाष्यम्‌ ] 
नान्तरेण तपः सम्भेदमाप्यत इति तपस उपादानम्‌ । तच्च चित्तप्रसाद- 
नमब।धमानमनेनापेव्यमिति मन्यते । 
स्वाध्यायः प्रणवादिपवित्राणां जपः, माक्षशास्त्राच्ययनं वा | 
देषरप्रणिघानं सवेक्रियाणां परमगुरावर्षणं, तफरसंन्यासो वा ॥ १ ॥ 
सहि क्रियायेगः 





ति | सूत्रम्‌ ] । 
समाधिभावनार्थः ्ेरातनूकरणार्थश्च ॥ २॥ 


[ भाष्यम्‌ ] 
स॒द्यसेव्यमानः समाधिं भावयति, शाश्च प्रतनक्रोति। 

प्रतनृक्ृतान्‌ शान्‌ प्रसंख्यानाभिना दग्धवीजकस्पानप्रसवधर्मिणः 
करिष्यतीति । 

[ विवरणम्‌ ] 
नान्तरेण तपः तपस्त विना सम्पदं विनाशम्‌ अपधते, अम्मिनशुद्ेशित्तस्य 
कुतः समाधिः इति तत्म्भदनाय च तपप्र उपादानम्‌ । तच्च तपः 
चित्तप्रप्ादनं समाध्यन्तरङ्गं अवाघमानमनेनापन्यमिति योगा मन्यन्ते । 
चित्तभ्रसादायत्वात्तपसस्तमेव चेद्रापेत तादध्यमेव हीयेत ॥ १ ॥. 


सहि क्रियायोगः किमथे इति तस्य पारध्यप्रतिपादनाथेमाह-- 
समाधिभावनाथेः हेशतनुकरणार्थश्च ॥ 


कथं पुनरुमयाथव्विप्याह-- स हि आपेव्यमानः समाधिं मावयति । 
इतरथोगाङ्गसदितः समाधि भावयति, शाश्च तनूकरोति । वक्ष्यति च-- 
““योगाङ्गानुष्ठानादशयुदिक्षये ज्ञनदीपिराविवेकख्यातिः'” इति । तदेतदाह- 
तनृङ्ृतन्ड्ेशानसंख्यानेन = हेरतनू करणात्‌ सञ्चातपम्यग्दशनरीलनेन 
दग्धबीजक्रल्पान्‌ बीजानीव दग्प्रपवरशक्तीन्‌ , भत एव अप्रसवधर्भिणः 
अवि्मानः प्रस्तो येषां ते अ्रस्वाः, अप्रपतवाश्च ते घर्मिणश्वेलप्र्वधमिणः; 
(सर्व्बीजादिषु वा द्टन्यम्‌) तानप्रस्वधर्मिणः करिष्यति प्रसवशक्तिरहितान्‌ 
करिष्यति ॥ 


1, यौ.वचु.षपा. 2 सू. 28. 


साधनपादो द्ितीयः १२५ 


तेषां तनूकरणाद्युनः इरीरपराभृष्टा सतपुरुषान्यतामात्रख्यातिः 
सुक्षमा प्रज्ञा समाप्ताधिकारा प्रतिप्रसवाय कसििष्यत इति ॥२॥ 


अथकेते शाः? कियन्तो वा? इति- 


[ सूत्रम्‌ ] 
अविद्यास्मितारागद्ेषाभिनिवेशाः ्केराः ॥ ३॥ 


( विवरणम्‌ | 
तेषां तनूरणादुजन्मा पुनः रोरपराग्रष् सतवपुरषान्य- 
तामात्रख्यातिः समाप्ताधिकारा प्रज्ञा प्रतिप्रसवाय [कसिष्यते) 
ससाराभिमुखतयि पुनन कल्पिष्यते ॥ 


यथपि श्ाल्ाचार्योपदेश्ेन योगाङ्गानुष्ठानाद्तेऽपि सत्वपुरूषान्यतामात्र- 
स्थातिरुपजायते, तथाऽ्पि न जशाधमंदानतीवातिरस्कृ्य सा जयेतेति 
पुनः पुनः ङ्ेशादिभिः परामृश्यत इलयेतदरेयति पुनः डशेरपरा मृष्ट. 
त्यनेन ॥ २॥ 


के ते इशाः स्वरूपेण, कियन्तो वां सं्यया इति संख्यस्वरूप- 
प्रतिपादनाय सूत्रं॑प्रणीयते-- अविद्यासिमितारागद्वेषामिनिवेशाः डराः 
एषमिकेकस्य लक्षणं सूत्ैर म्यल्यायिष्यत इति [न] व्याष्येयत्वे यत्नः 
क्रियते, व्याल्येयं सेताव्रदेव ॥ 


यया प्रमाणविप्ययविकल्पादयः परस्परभिन्नाः, न तथा छेदानां 
विपर्ययाद्धेदः | किन्तर्हि ? त्रिपर्ययस्येवैते भेदा इतिं । कस्मात्‌ ? विपर्ययभावभावि- 
तवादिलेतदाह-- पश्च विपयेया इखर्थः ॥ 


ननु च यथा वृत्तिमेदव्याख्यने प्रमाणवृत्तेः “' ्रलक्षाचुमानागमाः 
प्रमाणानि" इति त्रिधा मेदस्तत्रैव व्याख्यातः, तथा कस्मात्ततरैवास्य 
विपथयस्यापि मेदः प्श्चधा नेपन्याल्यातः £ चित्तवृत्तिरेव च विप्यैय इव्युक्तम्‌ | 
तथा चोदाहतं, ५ सद्धिषयेणेकचन्द्रदरीनेन द्विवन्द्रद्ैनं बाध्यते इति ॥ 





1. यो.सु.षपा. 1. स.) 


१२६ पाततञ्जखयोगसूत्रभाष्यविषरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
डेरा इति पश्च विपर्यया इयर्थः । ते सन्द्माना गुणाधिकारं 
दरढयान्ति; परिणाममवस्थापयन्ति, कार्यकप्णस्ोत उन्नमयन्ति, 
परस्परानुग्रहतन्तरीमूत्वा कमैविपाकश्वामिनिरैरन्तीति ॥ २॥ 


[ विरणम्‌ ] 
नेष दोषः--ङेशानामव्रत्तित्वात्‌ । न हि हशः प्र्ययमात्राः, प्र्ययमात्रा 
हि वृत्तयः । शास्तु चित्त्य मठे, यथा चक्षुषस्तिमिरम्‌ । छैशमङबियोगे 
चित्तस्य विप्ययग्रव्ययाभावात्‌ ॥ 


यदि हि प्रस्य एव विपर्ययः, तदा यथा ेरानिरोपेऽपि योगिनः 
स्मृतिप्रमाणप्रघ्यया भवन्ति, तथा विपर्थयोऽपि मवेत्‌ । न तु विपर्ययः 
क्षीणङ्केशानाम्‌ | तस्माद्श्षुष इव अयथाथैग्रहणनिमित्तं प्रस्ययस्य मद॑ विपर्यय 
इध्युच्यते ॥ 


तस्पुनः प्रल्ययन्यतिरेकेण प्रतिपत्तृमस्यातुं चाराक्यमिति प्रलययेनै- 
वाल्यायते ' विप्थेयो वृत्तिः इति । तथ। च इृत्तयः द्धिषटह्िष्ट श्वेति डेरेन 
विरोप्रिताः । न च वृत्तिभिरेव इत्तीनां विशेषणं युक्तम्‌ । तथा ! कशदेतुका ' 
इति च ग्याघ्यातम्‌ । न च वृत्तय एव बृत्तिहेतुक। इति युक्तम्‌ ॥ 


तस्माचावृत्तितवादुबृत्तिमेदत्वन न तत्र छशा व्या्याताः | तथा 
चे क्तम्‌--““ चित्तमलग्रसङ्गनभिधायिष्यन्ते 2 इति छ्ेशानां न वृत्तित्वं, 
मललमेवेत्यभिप्रायेण । अभैदोपचरेण तु प्रत्ययेन सामानाधिकरण्यं, यथ। 
धूमो महैरश्न गमौदश्ान्तद्रत्तास्तथा ज्ञानमेतेनेति, (९) तथेवात्नापि ॥ 


प्रययविपरीतत्वमाह- ते स्पन्दमाना इव्यदिना । स्पन्दमाना 
परमयद रेणोद्धासमानाः, न हि खतस्तेषाश्चलनमस्ति, वन्ञादिरागवत्‌ | गुणाधिकारं 
द्रदयन्ति युणानामधिकारं प्रवृत्तिं (स)कर्मष्यतवं स्थिरीकुर्वान्ति । न हि तेद 
परस्पन्दमनेषु कलेन्यत।दयुन्ये चित्तं भवति ॥ 


प्रीणाममवस्थापयान्ति पुनः पुनः पर्णिमयन्तीति यवत्‌ । 
कार्थकरणक्षोत उन्नमयन्ति शरीरस्य करणादीनां चक्षुरादीनां प्रबृततिक्लोत 
उच्छरा(बोययन्ति । कथमिव्याह--परस्परातुग्रहतन्त्रीमूतवा भविवादय इतरेतर - 


=, (> (५ ०९ 


निमित्तनैमित्तिकभावेनेति ॥ 


साधनपादो दवितीयः १२७ 


[ सूत्रम | 
अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततयविच्छिन्नादाराणाम्‌॥ ४॥ 


( भाष्यम्‌ | 
अतत अविधा क्षत्रं प्रसवमूमिः उतषां अस्मितादीनां चतुरविंव- 
विकल्पानां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नादाराणाम्‌ । 


तत्र का प्रसुतः ?। चेतसि शक्तिमात्रप्रतिष्ठानां बजमावोपगमः। 
तस्य प्रबोध आलम्बने संमुखीभावः। 
[ विवरणम॑ | 
किश्च--कमेविपाकांश्चामि निवैतैयन्ति । कम त्रिविधं, तद्विपाकांश्च 


किर [^> $ 


जादयायुभागानेति ॥ २॥ 


अविद्या क्षलपुत्तरषां प्रसुएतयुविच्छिन्नोदाराणाम्‌ । कथमस्मितादयो 
विपर्यया इति, तस्रदस्य॑ते सूत्रेणैव । अविद्यां क्षत्र प्रसवभूमिः भत्लामक्षत्र 
यथा पृथिवी तृणलतागुल्मवीर्धां स्वासनोऽनतिरिक्तानां, एवमिधातो 
विपयैयादन्यतिरिक्रनां अस्षितादीनां चत॒णामिकेकः प्रसुप्तनुविश्छिन्नो- 
दारतया चतुर्विकल्पानां प्र्तवभूमिरवि्या ॥ 


(>~ € 
[वपवयश्रल्यया | तापा 


$, (५ ् 


ध्रियात्मानं प्रतिलभन्ते । तस्मादत्रिधै. 
वास्मितादिचतुष्टयरूपेण विपरिणमते ॥ 


तत्र का प्रपुक्िरिति । अस्ितादीनांप्रहुतिनौम धपे उच्यते, नविवायाः। 
कारणत्वात्‌ । स्वास्ितादिविकष्पेष्वनुगमात्सर्वैदा प्रबुदधेव सा, न प्रघुत्ता । 
्रस्वपने व्यवहारामाव्रात्‌ । अस्मितादीनामन्यतमस्य प्रसुपताबन्यतमस्यावस्थानम- 
व्यमेव । अन्यथा ्शान्तरस्योद्भव एव न स्यात्‌ । तस्मादसिमितादीनमिष 
चतुणा प्रषु प्तादि चतुर्विकल्पत्वम्‌ ॥ 


चेति शक्तिमात्रप्रतिष्ठानमिलस्य व्या्यानं करोति- बीजमवे- 
पगम इति । यथा बीजं सदेवानङ्कुरीभवदपि भूमिगतं तिष्ठति, तथा 
चेतस्यक्िताद्यः शक्तिख्यणानमिन्यक्त्वलूपाङ्कुरा भ्यवतिष्ठन्ते ॥ 


तस्य॒ प्रमोप इति- तस्य शस्यल्ितदेः प्रबोध उद्भवः 
भारम्बने विषये सम्मुखीमावः स्वव्यञ्ञकाञ्चनस्य ॥ 


१२८ पातञ्जरयो गसूत्रभाष्यविवरणे 


[ भाध्यप्‌ | 
प्रपंख्यानवतोऽदःधङ्केश्रीजस्य संषुलीमूतेऽप्यारुम्बने नासौ 
पुनरस्ति, दग्धवीजस्य कुतः प्ररोहः इति । ्षीणङ्कशः कुशल 


चरदह्‌ इत्युच्यत । तत्रव सा दरधबीजमावा पमी इशावस्था नान्यत्रेति । 
सतां शानां तदा ब्रीजसामथ्य दग्धमिति विषयस्य संमुखीमवेऽपि 
सति न मवयां प्रबोध इत्युक्ता प्रसुप्तिः दग्धरबीजानामप्रराहश्च । 


तनुखमुच्यते--प्रतिपक्षभावनोपहताः ेशास्तनवो भवन्ति । 

तथा विच्छिय विच्छिद्य तेन तेनात्मना पुनः पुनः समुदाचरन्तीति 
[ विवरणम्‌ |] 

तत्रैतत्‌ स्यात्‌, सदैव रस्य बीजभाबोपगमः प्रबोधश्च नियमेन 
स्यदिति । तत आह-प्रसंख्यानवतः सम्यग्दर्सनाम्यासवतः अदग्धङ्धेरा- 
बीजस्य योगिनः संपुलीभूतेऽप्यारम्बने नासो बीजमावोपगमः । दुग्धस्य 
दग्धत्वदिव कुतः पुनः प्रषोधः उद्भवः । विमानस्य हि बीजस्य क्षितिजलादि- 
सयागनित्तव्रप्तातङ्कुतमत न्‌ द्ग्धतराजराक्तः) तथा रास्यापि ॥ 


यदेवम्‌ , एषा पञ्चमी कस्मादवस्या नोक्ता दग्धप्रसुप्ततनुविन्छिन्नो- 
दराणामिति-न--अपाधारणत्रात्‌ । न हि सर्वदेहिनां सावारणी पञ्चमी 
देशावस्था । योगिन एव हि सा, तते नाक्नायते ॥ 


कथ व] अप्ताधारणीति ? तत आह- तत्रैव पा सम्य्ददीनाभ्यासवप्येव 
दग्धा नान्यत्र । क्ाणङ्क॑शः इुशरश्वरमदेह इति सम्यग्दन उच्यते योगी । 
तत्रैव सषा दग्धबीजभावा पश्मी इरावश्या। सतां शानां तदानीं 
दग्धं बीजसामथ्यैम्‌ | यथा विद्यमानानां यवादिवीजानां भर्जितानां बीजसामर््यं 
दग्धम्‌ । विषयस्य सम्पुखीमावेऽपि न मवयेषां प्रबोधः, सम्य्दरिनः 
सस्काररेषावस्यत्वादिषोखि रक्ष्यविपुक्तस्य ॥ 


उक्ता प्रसुप्तिः । किञ्च दग्धगरीजानां च क्ेशानामप्रबोधो योगिन उक्त 
इति । तनुवं इदानीं उच्यते--प्रतिपक्षमावनोपहताः प्रतिपक्षस्य शरीराचवथ- 
दरीनदिः भावनयोपहताः अबीकृता मन्दध्रभावाः ज्शास्तनव उच्यन्ते ॥ 


तथ] विच्छिच पिच्छि्ाथीन्तरोपजनकाठन्तराडेष स्व(सानमप्रदशथन्तः 
तेन॒ तेनात्मना येन स्येण पूत्रमुपटन्धास्तेनेवासना समुदाचिरम्ि 


® (4 क 


पुनरुद्धवन्तीति विच्छिन्नाः ॥ 


साधनपादो द्वितीयः १२९ 


| भाष्यम्‌ | 
विच्छिन्नाः । कथम्‌ ? रागकारे करोधस्यादरैनात्‌ । न दहि रागकरि कोषः 
समुदाचरति । रागश्च कचित्‌ द्श्यमनो न विषयान्तरे नास्ति । नैकस्यां 
क्जियां चैत्रो रक्त इदयन्यासु क्लीषुं विरक्तः । रितु तत्र रागो ठन्धवृत्तिः, 
अन्यत्र तु भविष्यदुव्रत्तिरिति। स हि तदा भ्रघुहतडुविच्छिन्नो सवति। 
[ विवरणम्‌ ] 
यदि वा विच्छिद्य विच्छिघ विच्छेदकारे ते व्यक्तेनासना स्वरूपेण 
पर्वोत्तरकाठ्वत्‌ न समुदाचरन्ति ॥ 


ततरोदेहरणम्‌- कथं १ रागकाठे कोधस्याददीनात्‌ । न हि रागक 
करोः समुदा चरति । कुतः रूपातिशयानां दृच्यतिशायानां च विरोधात्‌ । स हि 
रागदयात्तिरोभूते।ऽन्येनाव्यक्तेनाल्मना वतत इति विच्छिनः ॥ 


तथा रागश्च कविदुद्शयमानो न विषयान्ते नाकि । कुतः ? 
विषयग्रिरोधादत्न | पूर्वत्र. रागेण विरोधादसमुदाचरणे क्रोधस्य । अत्र तु 
बिषयाणामन्योन्यव्रिरोधात्‌ । न हि विषय एकसमिन्नुपजनयति रागं 
विषयान्तरमपि तस्येव रागस्योत्पादकम्‌ ॥ 


तच्था--नेकप्यां ्चियां चै्ो रक्त श्यन्यासु विरक्तः । किन्तु तत्र 
रागो छन्धतृत्तिः यस्यां रक्तः । अन्य॒त्र भविष्यदुच्त्तिः अन्याघु ब्रीषुस॒ हि 
मविष्यद्र गव्यक्तिविरेषः तद्‌ प्रसु्तस्ततुर्वेति ॥ 

ननु च (रागश्च कचित्‌ दह्यमान ! इल्यादि भाध्यं किमर्थ ननु 
रागस्वभावाल्यान, इत्थं विषयमेदाछ्ठम्धभविष्यद्‌वृत्तिस्वभवे। राग इति-सव्यम्‌- 
तथाऽपि प्रकरन्तानुपयोगः । प्रकरन्तं हि विच्छेदम्याल्यानं । न चेतद्िच्छेद- 
व्याल्यानम्‌ । नपि वक्ष्यमाणेोदारन्याख्यानेन सम्बन्धः | तस्य निराकारत्वात्‌ ॥ 


एवं तर्हिं पूर्ैरेष एवायम्‌ । कथम्‌ १ एवं मन्यते, प्रघुप्ततनूदारव- 
व्यतिरेकेण त्िच्छित्तिनीम घम एव नास्ति | कथम्‌ ? यावन्न ठन्धन्त्तिस्तानस्मघुप्त 
इत्युक्तम्‌ । प्रतिपक्चमावनोपरहतो मन्दप्रवृ्तिस्तनुच्युष्यते ॥ 





1, प्रसुहस्तनुबौ इति विवरणानुसारी पाठः | 
17 


१३० पातञ्ञल्यो गसूतचरभा्याेवरणे 


यश्चापि छन्धद्ृत्तिः स उदर्‌ इत्याख्यायते । विच्छिने नाम सत मवति, 
यः कचिदुपटन्धः पुनरुपङम्थते । यथा सरस्वतीन्नोतः । न हि रागेदये 
क्रोधः क्वचिदपि द्द्यते | तस्मान्न विच्छित्तिनाम धर्मोऽस्ति । अददनात्‌ ॥ 


अत्रोच्यत--यदरशनाद्विच्छेदो नास्ति, तद। रागस्य क्चिद्द्द्यमान- 
स्यान्यत्रादर्चनाद मावोऽस्तु । नन्वस्वेवाभावः, अन्यत्रादरोन।त्‌ । न हि । कसमात्‌ ? 
कचित्‌ दृद्यमानघदेव | न हि विषयान्तराभिमुखो न मवत्तीति धर्भिण्यपि 
चेतसि नास्ति) नहि चक्षुः कदाचिद्गजाभिमुखं न भवतीति धटामिमुखप्रवृत्त 
सास्ति । धटाभिमुखदर्य॑नादेव । तदेतदाह --कचित्‌ दद्यमानो न 
विषयान्तरे नास्तीयादि ॥ 


तथा क्रोधोऽपि रगणेद्‌ भूतेनाभिमभूतत्वादिच्छिनदर्सनो भविष्यति, 
सरस्वर्तसरेतोबदेव । स हि रगो विषयान्ते प्रसुतः तनुवा । तदाभिमुस्येनाद्र्य- 
मानविरोषत्वात्‌ ॥ 


कः पुनः प्रसुष्ठिविच्छेदयोविंशेषः १ यावतोभयत्र(दशनमविरिष्टम्‌ । 
उच्यते-- प्रदृत्तदरानप्रबन्धस्यान्तराषियेधिनाऽनुत्रद्वाददर्शंनं विच्छित्ति 
रदग्धस्य ॥ 


प्रघुपिः पुनर्निमिचेषर सत्छप्यदग्धनीजस्येवा ल्यपि विरोधिनाऽमिभवे 
न्यभूततया -वजख्पेणावस्थानम्‌ ॥ 


५. $ 


ननु चेवं सति “स(न) हि तद्‌ ्रसुप्तस्तनुर्ै''ति विरुद्धं, प्रवृत्तेरदशन- 
प्रबन्धो हि विषयान्तरेण दृरयते--न-- विषयान्तराभिमुख्यस्य विवक्षितत्वात्‌ । 
विषयान्तराभिमु्यं नाम यो रागस्य धमः स हि तदा प्रहुतः तचुवौ । न रागः 
सथैदा आमनैव श्रहु्तस्तनुवौ । कचित्‌ दृर्यमानतदिव । कोषः प्रुस्तदुर्वा 
आसनैव राणक्राठे सवैविषये§ न दस्यते ॥ 


| #० 


अयवां विद्िनदाहरणान्तरप्रतिपादनाथेव सरागश्च कृचि"दिव्यादि 
भाग्यम्‌ । कथं £ द्विप्रकये विच्छेदः प्रदरयविष्य(ति) ते । एकस्तावस्मबृत्त- 
ददानप्रवन्धस्य विरोविनाऽभिमवास्सर्त्राद्रनम्‌ । यथा दरिीत"रागकाठे 
करोधस्यादशना'दिति ॥ 

तथाडयमन्यो विषयविशेषे दस्यमानस्येव वि्रथान्तरे प्रापिनिमित्तस्या- 


दरोनम्‌ | यथा चत्रप्य एक्स ज्या रक्तस्य अन्याद्ु सताष्व।प यगस्यादरन 


साधनपद्‌ द्वितीयः १३१ 


[ माष्यम्‌ | 
विषये यो ठन्धवृत्तिः स उदारः । सवै एवैते डेरविषयत्व 
नातिक्रामनिि । 
कस्तं धिच्छिन्नः प्रसुक्ः तनुरुदारो बा शः ? इति-उच्यते- 
सलयभेवैतत्‌, ज्जिन्तु विरिशनामेवेतेषां विच्छिन्नारिखम्‌ । यथेव 


[४ क क. [द 


प्रतिपक्षभावनानो निवृत्तः, तथव स्वव्यञ्जकान्ञनेनाभिग्यक्त इति । 


[ विवरणम्‌ ] 
तत्र॒ ठन्धश्ृत्तिरिति कचिद्धिषये ददयमानस्यैव यत्र॒ भविष्यद्‌ वृत्तिविषये 
यददरोने, स च।पि विच्छेद इति ॥ 


कस्मापपुनरन्यत्र न इरयत इद्याह-- स॒ हि तदा प्रसुपस्तनुवी । 
न हि प्रहुषिस्तानतव्रे वा विवक्ष्यते । यथा तथा वा भवतु । तत्रादर्शनं 
विच्छेदत्वेन विवक्षितम्‌ ॥ 

तरिषये यो ठम्धन्रत्तिः स उदारः | [नल च प्रपुततचुविच्छिन्नानां 
कार्यासमर्थानां न राता । न हि प्रहु््तनुर्विच्छिने। वा प्रघुपिविन्छित्तितनियमा- 
वस्यायां कायै कतुं क्षमते । न ह्यजतद्शत्ररुपधातायाखम्‌ | विच्छिन्ने वा प्रदरो 
स्रोतसि खतं शक्यम्‌ | तस्मादविदाक्षत्रमुत्तरेषामिदयेतबदेषास्तु । किन्तेरकार्क्षमैः 
्रुपततवुविच्छिनरपदिषटैः । एतदारोक्याह-- सर्वै चैते शविषयखन्नाति- 
क्रामन्तीति । न हि रच्रुः प्रुपतो जनिष्यमाणो वा नापकरिष्यति | 


| 9 


कस्तर्हि विच्छिन्नः प्रपुपरस्तनुरुदारो वा ङ्श: । न युक्तमेवं भेदेन 
वचनम्‌ । एकमेबोद।हरणमस्तु । न चे।दारावस्थाया अन्यत्र काय करिष्यति ॥ 


सलमेवमेत॑त्‌ । तथाऽपि परिहार उच्यते, किं तु विविष्टनमिवैतेषा 
अपरिलयिक्तङेशव्वधमकाणामेव विच्छिन्नादिखम्‌ । विच्छिनाधवस्थःयामपि 
नापागमदपकर्वरवदक्तिरि्यदोषः ॥ 


तत्काले कायाक्षमत्वमिति चेत्‌--न-- प्रतिपक्षविधानार्थत्वाद चनस्य । 
न हि शत्रोरदटर्यमानस्य प्रषुत्तस्य जनिष्मायंस्य वा न प्रतिविधातव्यम्‌ | 


श्रयते चेन्द्रः प्रतिपक्षभयेन स्तघा दितेगमममिनदिति । तत्र कारणं 
स्वयमेव प्रकटयति-- यथेव प्रतिपक्षमावनतो निव्रृत्तस्तथेव स्वव्यञ्- 


काञ्चनेन विषयादिना अभिन्यक्त इति ॥ 


१३२ पातश्चखयोगसूत्रभाष्यविवरण 


[ भाष्यम्‌ | 
सवे एवामी शाः अविचामेदाः । कस्मात्‌ ? सर्वेष्वविद्येवाभि- 
प्रवते । यदवि्यया वस्त्वाका्ते तदेवायुशेसते शाः विपर्यापप्रह्ययकले 
उपरभ्यन्ते क्षीयमाणाज्ाविधामनु क्षीयन्त इति ॥ ४ ॥ 


तत्राविद्यास्वरूपमुच्यते-- 


[ सूत्रम्‌ ] 
अनियाशचिदुःखानात्मसु नियशुचिसुखात्मख्याति- 
रवि्या ॥ ५॥ 
[ विवरणम्‌ ] 


यस्मात्ते पुनरभिन्यक्ताः पुनश्च तिरोहिताः पुनरप्यभिन्यन्निष्यन्ते च, 
तस्माद््मघुप्त।यवस्या अपि प्रतिपक्षविधानाय वक्तव्या एव, छशत्वानति- 


क्रन्तत्वात्‌ ॥ 


हानीघुपंदरति - सर्वै, एवामी शा अविध्मिदाः । कस्मत्‌ ? 
यस्मात्‌ सर्वेषु अस्मितादिष अविद्येवाभिष्ठुवते प्रतरति, उद्‌ भूत द्यते ॥ 


किञ्च - यदविद्यया वस्ताकार्यैते प्रकल्प्यते तदनुशेरते तद्विषया 
उपजायन्ते ङ्श; रागादयः । यथा सूग्रदिपिण्डे हेयेऽपि भोग्योऽयमिद्य- 
त्रिया परिकिलप्यातमाभिमानं का रज्यते । धर्मज्ञाने विपरीतं 


परिक्ल्य देष्टि॥ 


कथं पुनस्तदेवानुशेरते ईइनि-- यस्मात्‌ विपयासिप्रययकाठ एवेपल- 
भ्यन्ते । इतश्चविदमिदाः, यस्मारक्षीयमाणामविधापनु क्षीयन्त इति । 
अविधप्रणाशानुप्रणाश्चिनो हि ङेशा अस्ितादयः | न दछप्तव्यापविधार्या 
कशिदपि हराः सम्भवति ॥ ४ ॥ 

त्राविचया्वहूपषच्यते । ति पुनर्दवरचाखरूपाख्याने प्रयोजनं ६ 
तत्स्वयमेव माष्यक्ृद्‌।स्यास्यते “अविद्या मूरमस्य शघरन्तानस्य' इत्यदिना । 
अङ्घाते च छश सन्तानभूढखद्पे तन्मूलोन्मूखनं न शक्यं कर्तुमिति तत्खस्य- 
माद्यायते ॥ 


साधनपादो दवितीयः १३३ 


| भाष्यम्‌ | 
अनिले कर्ये नियख्यातिः । तथथा--छुवा पृथिवी, धुवा 
सचन्द्रतारका चोः, अमृता दिवौकसः, इति । 
तथा अज्चुचो परमवीमस्से कये-- 
“'स्थानादीजादुपष्टम्मा्निष्यन्दान्निधनादपि । 
कायमयिषशैचाखण्डिता ह्च विदुः ॥"' 
इलज्चुचौ शुचिष्यातिरश्यते । 
[ विवरणम्‌ ] 
अनिलयाशुचिदुःखानात्मसु नियश्चुचिसुखातमख्य।तिरविद्या । कथम्‌ ? 
अनिये कर्ये निलख्यातिः निल्यमिति विपर्ययुद्धिः यथ भ्रुवा पृथिवी, 
धरुवा सचन्द्रतारका चोः, अमृता दिवौकस इति ॥ 
ननु चैतस्मान्मन्तरासृथिन्यादीनां धुवत्वं प्रतीयते । तत्र कथमेषां कार्त्- 
मुभ्यते £ अपिक्षिकखाददोषः । मनुभ्यावपेक्षया पृथिम्यादयो धवाः । कार्यत 
मनिव्लवं च सपरपरमणसिद्धं श्रुतिषु वचनात्‌ श्यौरासीन्न पृथिवी नान्तरिक्ष. 
मिव्यादिषु सिद्धम्‌ । 
तथा अशुचौ परमबीभत्से परमोद्रेगकेरेऽखन्तधृणास्पदे कारामपस- 
ग्रनीवाशचौ काये । कथम(पि)स्य बीभस्सकलमिव्याह-- स्थानादशुचिः-- 
गभीरायस्थानतादड्धचिः । बीजादश्ुचिः-- श्ृशोणितबीजो हि कायः | 


उपष्टम्मात्‌--बातपित्तश्छेमेपष्टम्भात्‌ । तेषां चञ्चि प्रसिद्धम्‌ | 
निष्यन्द त्‌--प्रसेदमृत्रपुरीषादिमराजल्निष्यन्दात्‌ । निधनादपि- 


मरणात्‌ । मृतसंबन्धिरनां दशषहावाशोचस्मरणम्‌ ॥ 

नतु च स्वमातरतो यचद्ुचिः कायस्तस्य शौचविधानमन्भककं 
प्रप्नोतीयत आह--कायमापेयशोचलादिति । साल्ञत॒ आधातभ्यमेव 
दौ चमस्मिन स्वते[ऽस्तीति यावत्‌ ॥ 

यद्रा, करणानि बुद्धिक्तलादीनि सव्वाभमकतया ड्युचीन्यपियान्यस्मिनिति, 
तच्छुचित्वादस्यापि रोचम्‌ । बुद्धिपतायपरेयविभ्रयोगे चालयन्ताश्युचित्वदरन।त्‌ ॥ 

तस्मासण्डिता द्यरुचि विदुः । पण्डितग्रहणे विपर्थस्तपियां 
ग॒चिलग्रहणल्यापनार्थम्‌ । अश्गुचौ शुचिख्यातिरहश्यते विपरीतचेतसाम्‌ ॥ 


1 वेयाचिकी गाथा, 


१३४ पातञ्चलयोगसुत्रमाघ्यविरणे 


[ माष्यम्‌ ] 
नवेव शशाङ्करेखा कमनीयेयं कन्या मध्वमूतावयवनिर्भितेव, 
चन्द्र भिस्वा निःचृतेव ज्ञायते, नीरोखल्पृत्रायताक्षी हावगभाम्यां 
रोचनाभ्यां जीवठेकमाश्वासयन्तीवेति, कस्य केनामिस्तम्बन्धः । भवति 
चैवमद्युचो शुचिविपयासप्रयय इति । 
एतेन अपुण्ये पुण्यप्र्ययः, तथेवानरथे च्थेप्रलययो व्याख्यातः । 
तथा दुः सुखस्यातिं वक्ष्यति-““परिणामतापंस्कारदुःखेगुण- 


वृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव पं विवेकिनः” इति । तत्र सुखख्यातिरवि्या । 

तथा अनासन्यासस्यातिः-- बा्योपकरणेषु चेतनाचेतनेषु, मोगा- 

धिष्ठाने वा शरीरे, पुरषोपकरणे वा मनि, अनातमति मासख्यातिः, इति । 
.[ विवरणम्‌ ] 

नवेव शशाङ्ठेखा कमनीयेयं कन्या अमृतावयवनिर्मितेव चन्र 

भितेवे निस्छता ज्ञायते नीरोत्मल्पत्राक्षी मावगमीभ्यां लोचनाभ्यां 

जीवरकं समाश्वासयन्तीति कष्य केनामिषबन्धो भवतीति । क सरीरादि- 


[® 


यायाघ्ये, क भवतयेवमशुचौ (कचिद्ि) चिविपयौस इति ॥ 


एतेनापुण्ये पुण्यप्रययः, यथा संप्तारमोचकानां, तथेवानरथ 
चाथेप्रययो ग्याख्यातः, यथा तस्कराणाम्‌ ॥ 


तथा दुःखे सुखस्यात्िं ` वक्ष्यति परिणाम तापरसंस्कारटुःसैगंण- 
वत्तिविरोध।च दुःखमेव पर्वं विवेकिनः इति । तत्र सर्वसिन्‌ सैपारे दुःखे 
सुखस्यातिरकिधा ॥ 

तथा अनासन्यास्मल्यातिबौद्योपकरणेषु चेतनाचेतनेषु गवादि- 
घटादिषु मोगाधिष्ठनि वा शशैरे पुरूषोपकरणे वा मनस्यनासन्यास्म- 
स्यातिरेति ॥ 

अत्रोच्यते-- करस्य पुनर्मनस्यनासन्य।तल्यातिरिति ? नतु मनस एव 
एयातिः, किं चोचते-- यावता अविद्या वरिपर्ययश्चित्तबत्तिरिति युक्तम्‌ । चित्तमेव 
प्रा्तचेतन्योपग्रहणूपलवादा्मानं चेतनममिमन्यते "अहं द्रष्ट श्रोत्‌ वा अमिदे 
ममे'ति चविरेषण ॥ 


~ = नमो = र "पवर कद | 


1, योःसू.पाः 2. चू, 1 । 


साधनपादो द्वितीयः १३५ 


[ भाष्यम्‌ | 
तथेतदबोक्तम्‌'-- “व्यक्तमव्यक्तं वा सत्वमासमतवेनाभिप्रतीय 
तस्य सम्प्दमनु नन्दलासमसम्पदं मन्वानः, तस्य व्यापदमनु शोचलयास- 
व्यापद्‌ मन्वानः, सर सर्वऽप्रतिबुद्धः' इति । 
एषा चतुष्पदा मवयविघा मूलमस्य ्शसन्तानस्य कमीशयस्य 
च सविपाकस्येति | । 
तस्याश्च अमित्रागोष्पदवत्‌ वस्तुसत विज्ञेयम्‌ । 
[ विवरणम्‌ 
तथेतदत्र एतस्मिन उक्तं व्यक्तमव्यक्तं वा प्रधानादिकं शरीरेन्धि- 
यादि विषरयविरोषपथन्तं किचित्‌ व्यक्तं आमुमाविक्रं, रकिचिदानुमानिकमाग- 
मिक अव्यक्तं वां सत्वमासमस्वेनाभिप्रतीतः प्रतिपननः तस्य सम्पदमनु 
नन्दति तस्य व्यक्तात्यक्तातमकस्यात्मसरेनावगतस्य सम्पदं पप्रद्धि षिभूतिमनु 
नन्दति अनु हृष्यति, आ्मप्तम्पदं मन्वानः "सम्पनाऽहमनया सम्पदा, 
ममेषा स्म्पदि'ति मन्यमानः । तस्य व्यापद्‌ तस्य क्षयं अनु शोचति ममेषा 
म्यापदहमेव्र भ्यापन्न' इति । स॒ सव एवाभिमानी अप्रतिबुद्धः अज्ञ इति ॥ 


एषा चतुष्पदी मवलयविद्या । नचु चापुण्ये पुण्यल्यातिः पुण्य अपुण्य- 
स्याति: इत्याभ्यां सह षटुपदीत्वम्‌--न--चतुर््रैव पदिषु यधासंमवमन्तमौवात्‌ | 
अविद्या मूढं प्रमवव्रीजम्‌ अस्य ्शसन्तानस्य अभिनिवेरान्तञ्शानामनवरत- 
प्रवतनस्य । किं च--कममाश्चयस्य च त्रिविधस्य जाद्यायुमोगलक्षणविपाकत्र- 
यसहितस्य सकरस्य ससारस्येत्यभः ॥ 


तस्याश्च अव्ायाः अमित्रागोष्पदव्रस्तुप्ततसवं वस्वन्तर्व 
विज्ञेयम्‌ । किमथमिदमुच्यते | यावता विपरीतरूथातिरिति वस्तुस्ततत्वपुक्तमेव ॥ 

अयममिग्रायः- अविच इति नजूप्तमासोऽयं तद्पुरुषः, स चोत्तरपद थ- 
प्रधानो वा स्यात्‌, यथा राजपुरूष इति । यद्वा, पूर्वपदाथप्रधानः, 
अधपिप्परीति ॥ 


तत्र यदि पूत्रपदार्थप्रधानस्तदानीं विदाया; प्रमाणस्याभाव (वादि) इति; 
यत्रैष विचाप्रपङ्घो वृ्तिप।मान्यात्तरव (स्मृ्योवृत्यन्तरादौ प्रतीतिरिति, अनिधस्ति- 





1. पश्चरिखाचार्येण, 


१३६ पातज्ञलयोगसू्रभाष्यविवरणे 


ह 1 
यथा नामित्रो मित्रामवः; न मित्रमात्र; किंतु तद्विरुद्धः सपत्नः । 
यथा वा अगोष्पदं न गोषदाभावः, न गोष्पदमात्रं; रितु देश एव 
[ विवरणम्‌ | 
विरोषतत्वोऽयः प्रज्ञायेत | या तु विपरीतस्यातिः पूर्वोक्ता अविचेति सा 
पारिभाषिकी स्यात्‌ | 


ततः के। दोषः स्यात्‌ अविधााब्दश्रवणे सन्देहः स्यात्‌ । 
किं प्रसिद्ध एव शब्दाथः परिमितः शाखपंग्यवहारा्थ, यथा लोके येष्वर्थेषु 
्रविद्धानि पदानि तानि सति सम्भवे तद्थान्येव सूत्रषिल्यवमन्तव्यं इति। 
अयश्ब्दायै एव, यथ। ईको गुणवृद्धी" इति । ततश्वानिशिते पदरथ 
नविदाशब्देन ग्यवहारः क्रियेत ॥ 


अथोत्तरपदाथैप्राधान्यं  समानाधिकरणघानीलोत्पख्वत्‌, तत्रापि 
नीरोत्पलशब्दाथयेोरवियेध द्वि शेष्यविरेषणभवेन सवन्धो युक्तः ॥ 


इह नञा निवृत्तिरुच्यते । विदशृब्देनाीपि विचा । तत्र यदयुत्तरपदस्यारथ 
प्रधानं प्रति गुणभूतो नस्‌ तस्थेवोत्तरपदायैस्याभावे कुयौत्‌ , तदा तदृगुणत्वमेव 
हीयेत । नापीतरस्य प्राधान्यम्‌ ॥ 

यो हि कश्चिन्निवतयितुं अनुप्रस्थितो निव्यमेव व्यापादयत्‌, 
न॒ तस्य नित्य प्रति गुणतम्‌ । नापि निवत्यस्य प्रधानता, तद्त्‌ । 


तस्मात्‌. प्रधानवशवत्तिना गुणेन भवितव्यमिति विंधायामन्यस्यामाव एतेति 
केवलो नज्ञ निद्यानुवादीति विधामात्रं प्रतीयेत ॥ 


तदेतदेवं शष्वोच्यते । तस्याश्चामित्रापोष्पदवद्रस्तुसतत्वं विज्ञेयम्‌ 
इति। यथा अमित्रो न मित्रामावः यथा पूर्पदायप्राधान्ये अर्धपिपपछति | न 
मित्रमात्रम्‌ । यथेक्तं उत्तरपदाथध्राधान्ये प्रधानवशवरतिना गुणेन भवितन्यं, न 
प्रधानविनरोनेति । तथ। चोक्तम--““'अत्राह्मणमनयेद्यक्ते बाह्मणमात्रध्या- 
नयनं प्राप्नोती"ति नजुतरातिके | उत्तरपदार्थप्राधान्यपक्षे नञो निवयावुवादल्ात्‌ । 
एवममित्र इति । एवमविधादि ॥ 


यथा वा भगेष्पदं न गेष्पदामावो न गोष्पदमात्रं, किन्तु देश एव 
तास्वां गोषदामवगोष्पदमात्राम्याम्‌ अन्यदरस्त्वन्तरम्‌ । [कथमेवम्‌ ?] 


"4, सशभाषष्‌, 22 





साधनपादो द्वितीयः १३७: 
[ भष्यम्‌ ] 
ताम्पामन्यदरस्छन्तरम्‌ । एवमविचा न प्रमाणे, न प्रमाणामावः, रितु 
विद्याविपरीत ज्ञानान्तरमविचा इति ॥ ५॥ 


॥ कत्‌ ॥ व ॥ 
हग्दशन शक्यारेकात्मतेवास्मिता ॥ ६ ॥ 
[ भष्यम्‌ ] 


(> 


पुरषो दकूशक्तिः, बुद्धिदैशनशक्तिः, इलेतयारेकस्वरूपापत्तिरि 
वास्मिता ङश उच्यते । 

[ विवरणम्‌ ] । 
यावता गोष्पदमात्रं तदभावश्च श्रूयते । उच्यते--अत एव प्रयोगतामर्या- 
दल्यन्तागेप्पदाधप्रतीतिः॥ 

कथम्‌ १ नञस्तावत्‌ भावचिरुद्धाऽथः, येन च पह अयुञ्यते तदभावमाह ॥ 


ततश्वागेष्पदमिति गेष्पदप्रसक्तोऽ्थः, गोष्यदमत्रे, गोप्पदविरद्धश्वेति 
त्रयाऽयाः प्रतिमान्ति | तत्र यदि गोष्पदमात्रे भवेत्तदा नञः प्रयोगोऽनर्थक 
एव । अन्यामावानुवाद चेदगोष्पदे नञ्‌ स्यदिवमप्यनथैक .एव ॥ 

अथ गोष्पदप्रसङ्गयुक्तेऽरथ, तथाऽपि नञमुख्येऽथ प्रवृत्तस्स्यात्‌ , गे 
रयन्तासेत्रितलस्यानुक्ततात्‌ । यतः सेविते भविष्यद्यपि त्रिष्वपि काठेषु 
राब्दप्रयोगे युक्तः स्यात्‌ । पु्यश्वाथौ नाम स भवति, यत्र गोभिः सेविते न 
भूते. न वर्तते नाऽपि भविष्यति । तस्मात्‌ , सतिं सम्म नजर्थः सत एव युक्त 
इति न सेवितप्रसङ्गो नाऽपि सेवितमान्र इष्यते । गोसेवितविरुद् एव 
देशोऽगेष्यदक्षन्देमामिधीयते ॥ - | 

कथं पुनर्नीोत्पल्वद्धिरोष्यविरेषणमाव एकस्य, भावाभावयोर्विरोधाव्‌ । 
तदभावभ्रतिपादनमात्रेण संन्यवहारातुपपत्तः यसिन्वस्तुनि तदभाव उच्यते 
तदेव वस्वन्तरं प्रतीयते । तदुक्तम-“"गोष्पदं सेवितापेवितप्रमणिषु" इति ॥ 

अत्र सेवितप्रहणे पुनः क्रियमाण च वह्ीहिः ये विज्नायते, अविधमान- 
सेवितोऽसेवरित इति । (तस्मात्‌) एवमविधा न प्रमाणं न च प्रमाणामावः। 
किन्तु विपरीतं ज्ञानान्तरमिति ॥ ५॥ 

दगदशेनशक्टयारेकास्मतेवास्मिता । अघुना असिताल्यं विप्य- 
माच्े--दक्‌ दरोनं उपरन्धिः पुरुषः स एव शक्तिः । द्ययतेऽनेनेति दशने 


सेव शक्तिः अन्तःकरणाप्यवस्ायरवरूपा । तयोः दग्दशैनशवत्योः उपरन्षय- 
18 


१३८. पातञ्नरुयोगसूत्रभाष्यविवणे 


[ भष्यम्‌ | 

मोक्तृमोग्यशक्त्योरयन्तविमक्तयोरलन्तापङ्कीणयोरविमागप्राप्ताविव 
सलं भोगः कलपते । स्वख्पप्रतिटम्मे तु तयोः कैवल्यमेव भवति, 
कृतो भोग इति । 

तथा चोक्तम्‌'-- “बुद्धितः परं पुरुषमाकारशीरविधादिमिर्विभक्त 
मपरयन्‌ कुर्यात्त्रासबुद्धिं मोहेन इति ॥ ६ ॥ 

ह श । विवरणम्‌ | 

ष्यव्तायस्वरूपयोः एकसतेव एरकश्चासावासाच तस्य॒ भाव एकाघ्मता । 
इवशब्देनत्यन्तविविक्ततामाचष्टे । एकस्वरूपापत्तिरिवास्मित। छश उच्यते ॥ 

यस्मिनहं प्रत्यये चित्तपुरुषयोर्विवेको नोपरम्यते सोऽयमहप्रययो- 
ऽस्ितास्यः केश उच्यते ॥ 

पूर्वत्र तु पुरुषेपकरणेऽन्तःकरणेऽनात्मन्यात्मस्यतिरिति विपरीतदर्शन- 
मेवव्रिधेद्युक्तम्‌ ` । इह ` त॒ पुनरद्धिपुरुषयोरविशेषदश नमकस्वर्ूपापत्तिखि 
दर्थनमस्ितेति विरेषः ॥ 

तदेतदुक्तं भवति -- भोक्तृ मोग्यशक्योरयन्तविविक्तयोः अयन्ता- 
सद्कर्णयोः अव्िभागप्रापषाविव पलां भोगः कल्पते । मेगदेतुरसिता- 
भिधानकेश इल्यर्थः । सति द्यहंग्रयये पु्धितोऽहं दुःखितोऽहमिति घुखदुः- 
खदिसम्बन्धो मवति । तस्मदेतदेवमिति ॥ 

स्वरुूपप्रतिहम्भे तु तयोः विवेके नाहं ममेति खरूपोपटन्धौ स्यं 
युद्धिपुरुषथोः केवल्यमैव अविमिश्रतैव भवति । कुतो भोग॒इति । कारणे 
ह्यविशेषहिप्रव्ययात्मनि सति काय भोगः, तसिन्नसति कारणे न भोग इति ॥ 

न हि मनसि चेतनावत्वमनध्यारोप्य पवितं दुःखिषं वा शक्यं प्र्येतुम्‌ । 
अहंग्रत्ययविषयो हि घुखदुःखप्रययाधि करणम्‌ । "अहं घुर्खी दुःखी चाहम्‌ इति 
सामानाधिकरण्यात्‌ । तस्मादस्मिताल्योऽहङ्करे मोगहतुः ॥ 

तथा चोक्त बुद्धितः प्रं पुरुषं बुद्धितः सकाशात्‌ विभक्तं 
विरुक्षणमन्यम्‌ । कै्गुणे्विमाग इव्याह--आकारशीरविधाभिः आकिण 
बृत्तिसारूम्येण, शठेन बुद्धिप्रतिसंवेदितथा । विद्यया चेतन्यस्वरूपतया । 
अथवा जआक्ररिण ञुद्धानन्तस्वरूपव्वेन, शठेन अपरिणामिलादग्रतिसंक्रमलेन, 

> च ® 


विद्यया चितिशक्तिस्वरूपतया । तदेतैधरेवुद्धितो विभागः ॥ 


(य 


1. परश्चरिखाचयेण्‌, 


साधनपादो हितीयः १३९ 


[ सूत्रम्‌ ] 
सुखाजुजन्मा रागः ॥ ७ ॥ 
{ भष्यम्‌ ] 
पुखाभिज्ञस्य युखारुस्पृतिषूवः सुखे तस्ाधने वा यो गैः) 
तृष्णा, लोभः, स॒ राग इति ॥ ७॥ ॑ 


( विवरणम्‌ ] 
न्‌ वे च ध 
तथा बुद्धेरपि आकारेण सखदुःखमोह।ःमकत्वेन, शीठेन प्रल्या- 
्रइृत्तित्यिलयासना, व्िचया सत्रधीष्यवक्तायात्कलेन पुरुषात्‌ विभागः । 
इत्थमन्योन्यमाकारश्ालव्रिधाभिर्विभक्तं पुरुषं अपद्रयन्‌ कुयौत्त्र तस्यां बुद्ध 
आत्मवुद्धि आचग्रयये मोहेन रोक इति । व्रिवारीलाकरिरल्यन्तविभक्तयोर्धुद्धि- 
पुरुषयोरविभाग इव तदरीर्नमिदयनेनरेनोदाहरणम्‌ ॥ 


यत॒ व्रेभक्तमपश्यन कुर्यातत्रासबुद्धिम्‌ इति । सा पूवेक्तिवाविधा । 
यद्वा अस्मिताया अत्रिाभेदतात्‌ स्रपुदाहरणमिति । अपर्यन्‌ कुयीदिति 
पुरुषस्रूपादरीनमव्रिचायाः, भस्मितायाश्च हेतुः कारणं चित्तस्य द्रर्योप- 
रक्तता । पुरुषध्य त्वदयं दरष्टप्वदेव ॥ ६ ॥ 


सुखानुजन्मा इुखानुशयी रागः । अनु जन्म) अनु उत्पत्तियैस्य सः | 
सुखानुशयी तथा दुःखानुशयीति अन्येषां पाठः । सुखानुशयी रागः 
दुःखानुशयी देष इति ते व्याचक्षते, सुखमनुभवितुं शीरमस्य स 
एुलानुशाथी, तथा दुःखानुशायीति । उभयधाऽप्यनुजन्मतेव | तदेष ताच्छील्यम्‌ । 


तया च वक्ष्यति--श्वमीस्सुषं सुखाद्रागः' इति ॥ 


कथं सुखानुशयित्वमिति तदाह - सुखाभिज्ञस्य इते आभि- 
ज्ञानमाभज्ञा यस्य॒ स घुखाभिन्नः पुखं य उपटन्धर्वास्तस्य, सुखाभिज्ञस्य 
पुखानुसपरतिषू्ः सुखं पवोचमूतमनुस्मरन्‌ सुखे हदे तत्साधने वा 
अगरुचन्दन।द्‌ अनुरज्यते । तत्र योऽसौ गर्षैः स॒ उच्यते तृष्णा लोमे राग 
इति ॥ ७ ॥ 


1. इदानीन्तनमुद्रितप्रन्पपारस्तु '“दुलानुशयी रागः+° इति | 


१४० पातञ्जलयोगसूत्रभाष्यविवरणे 


[ सूत्रम्‌ ] 
'दुःखाचुजन्मा द्वेषः ॥ < ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
 दुगखाभिन्गष्य दुःखातुस्मृतिपूर्वो दुःखे तत्साधने वरा श्यो मन्यु 
उदासा, क्रोधः, स देषः ॥ ८ ॥ 
| सूत्रम्‌ | 
स्वरसवाही विदुषोऽपि तथा रूढोऽभिनिवेशः ॥ ९ ॥ 
। [ भाष्यम्‌ | 
सर्वस्य प्राणिन इयमासारशीर्नित्या मवति “मरणे माऽन्वभूवं, 
भूयासम्‌” इति । 
{ विवरणम्‌ ]| 
दुःखानुजन्मा दुःखातुरायी देषः । दुःखमुक्तम्‌ “ येनामिहता 
प्राणिनप्तदपपाताय प्रयतन्ते इति । दुःखाभिज्ञस्यति पूववद्याहूयानम्‌ । 
दुःखामुस्प्रतिपूर्री हुःखे तत्षाधने वा पतस्करादौ यो, मन्युरुञिहासा 
उद्धातमिच्छा क्रोप्रः स॒ द्वेषः । रगेण तुर्यं व्याख्यानं सर्वम्‌ ॥ ८ ॥ 


स्रस्वादही विदुषोऽपि तथा रूढोऽभिनिवेशः स्वरसेन स्वमवेन 
चित्तस्यविदामत्रिण वोह प्रवर्तितं शरीरमस्य । वहतेरकर्मकस्यापि दरौनात्‌ 
यथा नदी वहतीति । अथग्रा स्वरसं स्वमवं वोहुं शीरमस्य स्वरपवाही 
विदुषोऽपि सम्बग्दरोनस्यापि । अपिरब्दादविदुष एव युक्तो मरणत्रास 
आसेच्छेदमानिन इ्यभिप्रायः । सम्यग्दरोनस्यातानुच्छेद मानिनो ऽयुक्त इति । 
तथा विमृढतरबुद्धिष्वासेन्छेददरिीष्वयमंभिप्रायो मस्णत्रसो रूढोऽभिनिविष्टः 
स्थिरो यथा तथेव व्िदुषोऽप्यासानुच्छेदद रि्वादयुक्तोऽपि रूढः ॥ 


कस्मात्‌ पुनरयं मरणत्रास्तः स्वरसेनैव रूढ इति १ यतः सर्वस्य 
प्राणिनः इयमातमाक्षीरनिलया भवति, यदे मरणं मान्वभूवम्‌ उच्छेदं मा 
प्रापम्‌ । इयमासीवौ, भूयासं गुणैः ्मालमिः सम्पत्सीयेति न तैर्वियोगो 
भूयादिति । म्‌े मोगसम्पदामालनश्वाचुच्छेदः प्राथनीयः ॥ 


1, इदानीन्तनमुद्रितग्रन्धपारस्तु "दुःखानुशयी देषः" इति । 
2. इदानीन्तनमुद्धितभाष्यप।रस्वु भ्यः प्रतिघो, मन्युः, जिषांसा, क्रोधः, स 
द्वेषः” इति । 
.-. --3. . इदा्नीन्तनमृद्रितमाष्यग्रन्थपारस्तु “मा न भूव, भूयासम्‌ इति । 
4 यो. स.पो.1.स. 31 


साधनपादो द्वितीयः १४९१ 


[ भाष्यम्‌ | 
न॒ चाननुभूतमरणधमेकस्येषा भवत्यात्माशीः । एतया च 
पूजन्मानुमवः प्रतीयते । स चायममिनिवेशः शः स्वरसवाही कृमेरपि 
जातमात्रस्य प्रयक्षाुमानागमेरसम्मावितो मरणत्रास उच्छदटश्यारमकः 
पूर्वजम्भातुमूतं मरणदुःखमनुमापयति । 


यथा चायमव्यन्तमृदेषु दश्यते केशाः, तथा विदुषोऽपि विज्ञातपव). 
प्रान्तस्य रूढः । कस्मात्‌ १ समाना हि तयोः कुरशलाङ्शल्योभेरण- 
दुःखातुभवादियं वासनेति ॥ ९ ॥ 


( विवरणम्‌ | 

किमेतयाऽऽरिषा अवगम्यत इत्याह--न चाननुमूतमरणधर्मकस्य 
मवस्येषा आमाशीरिति । एतया च आत्मारिषा पूषैजन्मानुमवः प्रतीयते । 
तदेतदुक्तं भवति-न ह्यननुभूते सुखे मवति प्राथना, नाप्यननुभूते दुःखे 
तत्पचिहारवान्छा भवतीति । येनापि प्रलक्षानुमानाम्यामननुभूतं मरणदुःखं 
तस्थयाप्यनयात्माश्चिषा पूरवो मरणादुभवः प्रतीयते, सोऽपि नान्तरेण जन्मेति 
जन्मानुमवः । तया पूवः पूर्वो जन्ममरणानुभवेोऽनादिरिति मतः । स चायमभि- 

निवेशः हशः कृमेरपि जातमात्रस्येति ॥ 


मरणानुमवकारणमाचषटे- प्रयक्षानुमानागमेरसम्भावितो मरणत्राष् 
उच्छदद््टयात्मक आसममोगेच्छेदप्रतिपत्तेतुः. पू्वजन्मानुभूतै मरणदुःख- 
मनुमापयति । यथा चायमलन्तमूदेषु ददयते कृमिप्रृतिषु हेरस्तथा 
विदुषोऽपि विक्ञातपूरापरानितकस्यापि पूर्वान्तिकं बन्धः अपरान्तिकं 
मुक्तिः । ज्ञातजन्ममरणान्तिकस्य वा ह्ढः । कस्मात्‌ पुनमूदस्येव विदुषो रूढ 
इति, तत आह-समाना हि इर कङुशर्योर्विदरदविदुषोमंरणावुमवादियं 
वापतना मरणमयवासना ॥ ९ ॥ 


' केशमूछः' कर्माशयः" "सति मूले तद्विपाकः इति वक्ष्यते । तस्मत्ति 
केशा हातव्याः । हानाथ्च ते प्रदर्दित।ः] तदवदहानौ चेप।यं वक्ष्यति--श्यान- 


1, यो.षू.षपा. 2 चू. 12 
2 यो.सू.पा. 2. सू. 13. 


१४२ पातञ्ञरयो गसूत्रभाष्यविवरणे 


[ सूत्रम्‌ ] 
ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ॥ १०॥ 
| भाष्यम्‌ ] 
ते पञ्च शाः दग्धवीजकेल्पा योगिनश्वरितापिकारे चेतसि प्ररीने 
सह तनवास्त गच्छन्ति ॥ १९॥ 
स्थितानान्तु बीजमावोपगतानाम्‌-- 
ति | सूत्रम्‌ | 
प्यानह्‌ यास्तद्‌ बत्तयः ॥ ११ 
[ भाष्यम्‌ | 
दानां या वृत्तयः स्थूखास्ताः क्रियायोगेन तनृक्रताः सल 
प्रसेख्यानेन ध्यानेन हातव्याः याव्सुक्षमीङृता यावद ग्धधीजकल्पाः इति । 


[ विवरणम्‌ |]. 
हेया! ;+ इति ते किबिषयो ध ये षि 1जकर्य 
देया स्तद्रत्तयः ईति । तत्र न ज्ञायते ।कवषयो च्यानत्रयागः, कि द्गधनीजकम- 
¢ (+, 


रेराविषयः १ कि सवविषयः १ इति । तद्विषयविभजनायमिद्‌ं सूत्रमारम्यते-- 
ते प्रतिप्रसवहेयाः सृष्ष्मा इति ॥ 


तेप ङ्श: दग्पबीजकस्पाः योगिनश् प्ताधिकरि चेतापि प्ररीने सद 
तेनास्तं गच्छन्ति । रएतदुक्तं मवति--सम्यग्ददनाम्याप्तानख्दग्धनीजततामर्ध्यानां 
केशानां कृत दोषपुरुषध्रयोजनस्य चेतसः भ्रतिग्रप्तवेनैव प्रल्येनैव श्रख्योत्पततर्म 
ध्यानस्ाघनपेक्षा । न हि दग्धं दाहमपेक्षते, पिष्ट वा पेषणमिति। चेतस्तु 
साधितपुरुषाधत्वात्‌ स्ितिप्रयेोजनाभावाच्च स्वयमेव निवतते ॥ १० ॥. 


कीदृशानां पुनध्यानादिसाधनपिक्षे्यत उच्यते-- स्थितानां तु 
धीजमावोपगतानामिंति ॥ 


ध्यानहेयास्तदुव्ृत्तयः । कशानां या वृत्तयः स्थूलस्ताः क्रियायोगेन 
तपस्स्वाच्ययेश्वप्रणिधानास्यन स्थूलप्रतिपक्षेण तनृकृताः पूतम्‌ । तत इदानीं 
तनूकरणाद्वीजशक्यवस्यः; प्रसख्यनिन सम्बग्दरानरीठनतो नेपुणविरोषेण 
ध्यानेन महता बरीयता प्रतिपक्षेण हतव्याः, ततोऽपि यवित्पुक्ष्मीकृताः । 
किमुक्तम्‌ भवति | यावहुग्षबीजकलपाः यावनिर्बीजीक्ृता इति ॥ 


1, यो.सू. पा, 2. सू. 11. 


[^ ^ ॥ 


साधनपादो द्वितीयः १४३ 


[ भाष्यम्‌ | 
यथ्‌! वषाणां स्थूरो मलः पूर्र निधूयते, पश्चास्सुष्मो यन्ननोपायेन 
चापनीयते, तथा स्वस्पप्रतिपक्षाः स्थूला वृत्तयः शानां, सुष्षमास्तु 
मह प्रतिपक्षा इति ॥ ११॥ 


् 0 ॥ चलम्‌ | ०५, [१ 
क्रामः कमा शया टद्टाटृ्टजन्मवद नीयः ॥ १२ ॥ 
[ भाष्यम्‌ |] 
तत्र पृण्यपुण्यकममाश्चयः कामलोभमोदकोधभवः । 


| विवरणम्‌ | 
तत्‌ विभ्विति? यथा व॒ल्चाणां स्थूलो मरः पूर्वं निधूयते, 
पश्वात्सुक्ष्मो मलः सेहन।दिनिमित्तो यज्ञेन चोपापेन क्षारादिविशिष्टोपयेन 
अप्तीयते, तथा सल्पप्रतिपक्षाः तपप्स्वाध्ययेश्वरप्रणिधानयमनियमादि- 
योगङ्गाय्ठानादिपरतिपन्नाः स्थूड। वृत्तयः शानाम्‌ । सृष्षमास्तु महप्रतिपक्षा 
इति । तपरस्स्वव्यायाधनुष्ठानप्रतिकन्धदीप्िप्रकषं विषएएवसभ्यग्द रनमहाप्रतिपक्षाः 
सूक्ष्मा बीजराक्त्यपेक्षा इति ॥ ११ ॥ 


किमर्थं पुनः _्वरादानाय प्रयतत इत्याह--यतः करमूछः कमोशयो 
दृष्टाृष्टजन्मवेदनीयः । छशा अविचादयो मूं जन्मकारणं यस्य कमे।रायस्य 
स ्शमूलः कर्माशय इति । अकमेफलश्रदानादन्तःकरणे शोत इति कर्माशयः 
गुकृष्णासमकः । दृष्टं चाद्ृष्टं च दृष्टदृ्टे जन्मनी तयेर्वैदनीयमनुभवर्नयै एं 
यस्य स दृष्टाटष्टजन्मवेदनीयः कर्माशयः । यो द्शदृ्टकमानुभवितन्यफठः 
कमौशयः स शमूढ इति सूत्राथः ॥ 


यस्य पुण्यापुण्वरूपस्य कर्माशयस्य यसिन्‌ जन्मनि निष्पत्तिस्तस्य 
तस्मिन्नेव जन्मनि वेदनीयं फं स दृष्टजनमवेदनीयः | यस्य तु जन्मान्तर 
वेदनीयं फल सोऽदृ्टजन्मवेदनीयः कमाय इति ॥ 


माग्पप्रिदा्नी व्याल्यायते- तत्र पुण्यपुण्यकमीरयो ठोभक्रोधमोह- 
प्रभव इति, हशमूलल्व तस्याचष्ट । पुण्यकरमीरायो लोमप्रमक्रे यथा-- स्वी वी 
अत्र वा ज्युभे फठमनुमविष्यामीति स्वर्मकापपुत्रकामयगादिः | करोधप्रमो यथा- 
विश्वामित्रस्याम्बरायाश्च । मोहृश्रमवो यथा- दपा: कुम्भकर्णस्य च ॥ 


१४४ पातञ्जल्योगतुत्रभाध्य विवरणे 


[ भष्यम्‌ | 
क क [9 [1 # ऋ, क, 
स॒ टदृष्टजन्मवेरनीयश्वाद््टजन्मवेदनीयश्च । तत्र तेात्रवगंन 
मि (=¢ 0 (प 


मन्ततपस्समापिभिर्निवैतितः, ईशरदेवतामहर्षिमहातुभावानामाराधनाद्रा 
यः परिनिष्पन्नः स सद्यः परिपच्यते पण्यकमौश्चय इति । 


[ विवरणम्‌ ] 
अपुण्यकर्मशियोऽपि छोभप्रभनो यथा-- चर्मणि द्वीपिनं हन्ति कुञ्ञरं हन्ति 
दन्तयोः । कणस्य चाज्ञानरोमादनृतवचने ¦ क्रोधप्रभवो यथा- ब्रह्महत्या | 
भारते(भवि)ऽप्यश्चत्थास्नश्च | मोहप्रभवो यथा-संप्तारमोचक।दीनां नहषस्य च ॥ 


अस्मिताविययोलोभकरोधमेोदैः प्रयेकं सम्बन्धः । कथम्‌ १ अहमधि- 
क्षिप्ोऽस्मीति क्रुध्यति । दं ुलमनुमविष्यामीति ठुम्यति । अहं मुह्यामीति 
मुद्यति ॥ 


 अविद्याऽपि सपरत विपरीतदरशंनलक्षणा सम्बध्यते । नद्यसव्याम- 
विधायामस्ितादीनां सम्भत्रोऽस्ि | रागस्तु लोम एव | देषस्तु क्रोधः | 
अभिनिवेश! विमोह एवान्तमवति ॥ 

यत्त मोहः पुनरव्ियेति, तदविवेकसामान्यादुक्तम्‌ । लोभक्रोधमोहास्ु 


परस्परनिरेक्षा धमीधरमेत्पत्तिद्र।रम्‌ । तथा च वक्ष्यति--छोमक्रोधमोह- 
पूर्विका इति ॥ 


स॒ टृष्टजन्मवेदनीयश्च स रोभक्रोधमोदप्रमवः कमौशयो दृष्टजन्म- 
वेदनीयश्च भृ्टजन्पवेदनीयश्च ॥ 


कथं पुनः कर्मणां स्वरूपनिमित्तुल्यले कस्यचिद्‌दष्टजन्पत्रेदनयि्व 
कस्यचिदद्ष्टजन्मवेदनीयधश्चेयाह--यथा तीत्रष॑योगेन तीतोधमेन मन्त्र 
तपस्समाधिभिययाप्रसिद््येस्तीवेवेगानठिेरनिवैतितः, ईशवरदेवतामहरषि- 
महानुभावानामाराधनाद्वा । ह्र उक्तः, देवता अदिल्यादयः, महये 
भरण्वादयः, महनुभावा धमंज्ञाननिरतमतयः, एत एव॒ वा (तदेषां व) । 
तीव्रतरध्षनपारतिष्पन्नः सयः पसिच्यते स तस्मिनेव जन्मनि । यथा 
नन्दीश्रकुमारस्य ॥ 


साधनपादो द्वितीयः १४५ 


[ भाष्यम | 
तथा तनरङ्केयेन मीतस्याधितक्रपणेषु, विश्वासोपगतेषु वा, महानु- 
मात्रेषु वा तपस्विषु [यः] कृतः पुनः पुनएपक्राए, स चापि पापक्रमशयः 
सद्य एव परिपच्यते । 


क] 


यथा नन्दीश्वरः कुमारो मनुष्यपरिणामं हिखा देवस्वेन परिणतः । 
तथा नहुषोऽपि देवानामिन्द्रः स्वकं परिणामे हिला तिक्तेन 
परिणतः इति । 

तत्र नारकाणां नास्ति उष्टजन्मवेदनीयः कर्माशयः । 


[ विषरणम्‌ ] 
तथा तीत्ङ्कशेन लोमादिप्रकरषेण भीतव्याधितकृपणेषु विसम्मोपगतेषु 
महानुभावेषु गा तपस्िषु ज्ञनधमनिरतमतिष्च तपस्विषु पुनः पुनः आमीष्ण्येन 
कतोऽपकारः, स चापि पापकमौसयः स एव परसिच्यते फति । यथा 
नहुषस्य ॥ 


छोकेऽपि क्षत्रवीजसस्कारविरेवेण वबृक्षादिफलपनिकर्षः प्रसिद्धः 
बक्षायु्वेदप्रसिद्धया । तथा क्रिया फठसनिकषषविप्रकर्षदर्शनं गमिपव्यादिषु 
तीत्रमन्दानुष्ठानविशेषतः ॥ 


तत्र पुण्यक्मशयस्येदाहरणमाह--यथा नन्दीश्वरः कुमारो मसुष्य- 
परिणामं स्वक हित्वा महेश्वराराधनपरिनेष्पन्नेन रतात्रतरङ्केशानुष्ठानेन जन्मना 
देवत।सेन परिणतः ॥ 


तथा नहुषोऽपुण्यकमौशयस्ये दाहरणम्‌ । सदेवानामिन्द्रः । स स्वकं 
परिणामं हित्वा तीत्रतरमोदानुष्ठानजेन कमाशयेन तिवक्त्वेन परिणत इति॥ 


क्रोधादीनां तु यथास्य दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयत्वेनेदाहरणानि 
म्याछ्यातानि पू्मेव | एतेन च मन्दमन्दतरलेमादिङ्ेशानुष्ठानजन्मानो पुण्यपाप- 
कम॑रायावदृष्टजन्मवेदनीयो व्याष्टयातो टोकवदेव । तत्रापि तावदुच्यते ॥ 


तत्र नारकाणां नास्ति-येनर्कग्राष्लर्थमेव कम ुष्टितं ब्रह्महययागुरुदार- 
गमनादिलक्षणं, तेषां नारकाणां नारकत्वस्याञ्चमाविल्माश्रिदय तेषां नारकाणां 
तास्ति दृष्टजन्मवेदनीयफलटः कमौश्चयः [ येन फं] आरभ्यते ॥ 

19 


१४६ पातञ्ञखयो गसूत्रभाष्यविवरणे . 


- | भाष्यम्‌ | 
क्षीणङ्केशानामपि नास्स्यद््टजन्मवेद नीयः कमाशय इति ॥ १२ ॥ 
[ सूत्रम्‌ | 
सति मूले तदहिपाको जालयायुमोगाः ॥ १३ ॥ 
[ भाष्यम्‌ ] । 
सत्सु शेषु कमीशयो ` विपाक्राएम्मी मवति नोच्छिन्ङ्केशमूलः । 
यथा तुषावनद्धाः शाङितिण्डुलाः अदग्धनरीजमावाः प्ररेहसम्थौ मवनित, 
[ विवरणम्‌ | 
कथं पुननारकाणां कमीरम्भस्तिथगादीनां देवतानां च 2 मनुष्धाणां हि 
कमीधिकारः | एषा च कर्मभूमिनं नरकादिरि्युव्यते-न- नहुषादानां 
कमदरोनात्‌ । श्रूयते च रातक्रतोरपि ब्रत्रादिवधेन ब्रह्महघ्यप्रा्िरयोगा- 
धनुष्ठानश्रनणे च ॥ 


{५ {५ 


यन्मनुध्याणां कम।धिकारः इयं च कर्मभूमिरिति, त्कषिप्रफरपिद्वध्पेक्षम्‌ । 
तदुक्तम-- “क्षिप्र हि मानुषे रङ्गे सिद्धिभ॑वति कमजा" इति 


(क, णि 


व्यासेन कौटोपा्यान(श्रव)स्रणाचच तिरश्चामपि कर्मोपपरत्तिः ॥ 


{५ 


किञ्च -देदेन्दियादिमतः करियोपपत्तेः | क्रियाणां च कायवाङ्मनः 
प्रमवानां फलारम्भकः, छृशपूथक्रसात्‌ ॥ 

क्षीणङ्खशचानामपि सम्यग्दरिनामपि नास्त्यद्जन्पवेदमैयः क्मशयः 
छ्शामावदेव | न हि वातरागे जति दृद्यते । शानां कमोरम्म इव कफर 
रम्भेऽपि हेतुखात्‌ । क्षीणङ्केरस्यापि ज्ञानप्रप्तिः प्रागारन्धो इष्टजन्मवेदनीयः 
सम्भवति कमाशयः प्रदृत्तफट्लान्पुक्त शरदिति ॥ १२ ॥ 

किश्च-- पति मूठ तद्िप।को जघायुर्भोगाः । मूर हि कमणां हशः । 
अस्मिन्‌ संति मूले छैरोष सस्छिदय्थः । तस्य लोमक्रोधप्रमवस्य पुण्यापुण्यकरमी- 
दायस्य विपाकः फट्निष्पत्तिः तद्विपाकः । कि पुनस्ततफरमिल्याह- 
जात्यायुमांगाः ॥ 

माध्य न्तर रेषु कमीश्चयो विपाक्रारम्भी भवति नोच्छिन्नङकगमूर 
इति, मूढस्य भ्याए्पानम्‌ । तत्र सषु क्रो कमयो विपाकारम्भीस्य 
टृष्टन्तमाह-- यथा तुषाव्रनद्धाः शा सितण्डुला अदग्धर्व।जभावाः ॥ 





1. भगवद्रीता 4, 1९2. 


साधनपादां द्वितीयः १४७ 


[ माष्यम्‌ | 
नापतीततुषा दग्धबीजमावा वा, तथा छशावनद्धः कमौशयो विपाक्प्ररेदी 


मव्रति, नापनीतङ्कये न प्रषंल्यानदग्धड्केशवीजभावो वेति । सच 
विपाकष्चिविषो जातिरायुर्मोग इति । 

तत्रेदं विचायते 

[ दिवरणम्‌ | 

तुषावनद्धा अपि कदाचिदग्धवीजमावा न प्ररोहसमर्था. मवन्ति। 
अदग्धबीजभावा अपि भ्यपनीततुषा न प्रोहायाकं भवन्ति । उभयथा च 
दा्टीन्तिकम्रतिपादना्थं दष्ठान्तविकल्पः ॥ 

कथम्‌? तथा शवनद्ः कर्माशयो विपाक्प्ररोद्ी भवति 


क्शोपवन्धः तुषाव्नद्धश्ालितण्डलवत्‌ | नापनीतङ्कसो [न प्र्ष्यान] दगध- 
क्केरवीजभावो वेति । अपनीततुषडालितण्डुलवद पनीतङ्केशो न विपाकग्ररोही ॥ 


योगाङ्गावुषठान्किराक्षयपू्वंसम्यग्दरनानां योगिनाम[न]पनीतङ्केशोऽप्य न] 
पनीततुष्रदग्धनीजशक्तिन्चाचिवयोगाज्गानुष्ठानग्रणाद्किवटसम्यग्दरोनानल्दरधव्री- 
जसामर््यो न विपाकप्ररोही भवति ॥ 

तथा च अयासः सांरप्रानां योगिनां च पृथङ्मोक्षं दरयति ॥ 


८८ बीजान्यग्न्युपदग्धानि न रोहन्ति यथा पुनः । 
च, + 0 क, (4. 
ज्ञानदग्धैस्तथा हरैनौता सम्पद्यते पुनः ॥'" इति ॥ 
तथ। '“्योगेश्व्यमतिक्रान्तो योगी मुच्येत" इत्यादि । वक्ष्यति 
चात्रापि प्रा्ाप्रततिश्चययोगयोः केवल्यम्‌ ॥ 
कतिप्रकारोऽसौ विपाक इव्याह-पत च विप।कञ्चिविधः जाति. 
रायुभांग इति ॥ 
तत्रेदं विचार्यते । किं पुनर्विचारफलम्‌ ? उच्यते--एवौकेन प्रामिना 
विरुद्फलानि भूयिष्ठान्येकलतिन्नेव जन्मनि कमणि क्रियन्ते । तथथा 
°“ शरीरजैः कर्मदेषेयीति स्थावरतां तरः । 


वाचिकैः पक्षिमृगतां मानतैरन्यजातिताम्‌ ॥' 


१४८ पातञ्जल्योगसूत्रमाध्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
किमेकङ्कर्मेकस्य जन्मनः कारणम्‌ १ अथेकं कमानिकं जन्मा 
ऽऽकषिपतीति। 


[4 


दितीया विचारणा- क्रिमनेकं कमाने जन्म निर्ैतयति!? 
अथानेकं कर्मैकं जन्म निवैतेयतीति । 
[ विवरणम्‌ ] 
स्वगीर्थीनि च तावदनुतिष्ठति । नरकप्रपीणि च कमणि । तत्रैकस्य 
्रहमहत्यादिकमणोऽनेकजन्मकारकववं श्रूयते ।श्सूकरंखरोध्णापिलयादिपमृतेः ॥ 
तत्र॒ विरुद्धदेशकाटनिमित्तविपाकानां कर्मणामेकजन्मारम्मे विरुद- 
विपाकतादरथ्यं हीयेत । ततश्च तादध्यचोदनाः कमणां बध्येरन्‌ ॥ 


अथ पयण जन्मारम्मिलं, कर्मणामक्तस्येयत्वात्‌ केनचिदेव 
फलमारब्धं नान्येरिति, तत्र नियमानुपपत्तिः, केनारन्धः केन वा नेति । तथा 
च कतणां कमेफलं प्रलय(व्य)विक्ञम्मादुत्साहवरिभङ्गः स्यात्‌ अम्युदयनि- 
श्रयमप्रवत्तिषु ॥ 


[# [® 


अथान्यतमेनारम्भे विन।र एवान्येषामिति, तथाऽपि स एव दोषः, 
कि विनष्टं किमारम्भकप्रि्यनियमात्‌ ॥ 


अथाविनाद्॒ एव, तथप्यवशिष्टस्यारम्भकारमावो मोक्षाभव्रशवेति । 
तसमास्मद्ृत्तिनिवृत्तिरा।क्त।यवप्रतिपादन।धमिदं विचार्यते ॥ 


किमेकं कम एकस्य जन्मनः कारणं स्वमौदिभ्रापिनिमित्तेषु वहुषु 
कमु सत्सु । अथेकं कमीनेकं जन्माक्षिपतीति प्रयमा विच(रणा । विरुदधपक्ष- 
दरयारम्बिनी हि विचारणा एकैव स्यात्‌ ॥ 


4 _ ^~ क क क ७ ८.9 2 ^~ € €. _ 
द्रताया कचारणा--केमनके केमानकं जन्म ।मवेतयाते 


विरुद्धफर्मनिरुदफठं वा । अथ।नेकं कर्भुकं जन्म निर्मतैयि विस्द्फल्म- 
वधिरुद्धफडं वा ॥ 





1. ^ खसूकरखरोष्ू।णां गोऽजाविमृगपक्षिणाम्‌ । 
चण्डारपुर्कसानां च- नह्महा योनिमृच्छति ॥' 


साधनपादो द्वितीयः १४९ 


( भष्यम्‌ ] 
न तावदेकं कर्मैकस्य जन्मनः कारणम्‌ ¡ कस्मात्‌ ? अनादिकार- 


प्रचितस्यास्तख्येयस्यावशिष्टस्य कर्मणः साप्रतिकस्य च फठक्रमानिय- 
मादनाशापो रोक्ष्य प्रपक्तः, स चानिष्ठ इति । नचेकं कमौनेकस्य 
जन्मनः कारणम्‌ । कस्मात्‌ ? अनेकेषु करमशेक्रकमेव करमनिकस्य जन्मनः 


क(रणामेलवशिष्टस्य विपाकक।ङामावः प्रपक्तः, स चाप्यनिष्ट इति। 


[ विबरणम्‌ | 


किञ्चातः? न॒ तावदेकं कर्मकस्य जन्मनः कारणम्‌ । कस्मात्‌ 
बहुषु कमे सत्सेकमेव कम जनके नारमत इति ॥ 

यचेकस्येव जन्मारम्मिल, तदा अनादिकाटम्रचितस्य सप्तरानादि- 
त्रादेकैकेन पुर्षरेणासं्येयमेकेकस्मिन्‌ जन्मनि कमै प्रचीयते विरुद्धफल- 
मविरुद्धफटं च ॥ | 


# 


तत्र॒ अवशिष्टस्य जन्मारम्भिकरमैव्यतिरिक्तस्य असह्येयस्य अनेक- 
जन्ान्तशभरचितस्य कर्मणः क्कलपस्य साग्रतस्य च वर्तमानजन्म- 
प्रचितस्यानार्धकायैस्य फलक्रमानियमात्‌ कि पूत्ैजन्णोपचितकमराशेगतस्य 
कस्यचिदेव मव्रि्यजन्मारम्मिखे, आहोखिदिदानीन्तनजन्पकमंराशिगतस्य 
कस्यचिदेतिं फलके न नियम्येतेति अनाश्वापो लोकस्य ॥ 

रकि पूत्ेजन्मकमेणा दुषेनादुष्टेन वा कलमारन्धम्यम्‌ १ अथेदानीन्तन- 
कणा दुष्टेनाृष्टेन वा १ ` इव्यवित्तम्भात्‌ न कश्चिदद्निहत्रादि कुर्वीत । नपि 
मोक्षाय सरमीहेतेदयनाश्वासः प्रषक्तः, स चानिष्टः ॥ 


इदानीं प्रथमविचारणायां द्वितीयं पक्षं निराकरोति-न चेक 
कमीनेकस्य जन्मनः कारणम्‌ । कस्मात्‌ १ एकैकसिमस्तावजन्मनि 
अनेकं करमवुष्ठीयते, तत्रेकेकमेव चेकर्मानिकस्य अन्मविपाकस्य 


= ~ 


जन्मपरिणामस्य निमित्तं भवेत्‌, ततोऽवरिष्टस्य  आरन्ध करायादन्यस्य - 


विपाककालामावः प्रसक्तः, स॒ चाप्यनिष्टः । फख्क्रमानियमश्चेति 
पूषदोषोऽपि । नैव मूतमनिष्टमम्युपगन्तम्यम्‌ । यत्तु॒ब्रह्महत्यादिकमणामेकेक- 


स्यानेकजन्मारम्मित्व, तस्य शाच्गोचरत्वात्‌ ब्रहमहंदयादि विषयेलमेवाम्युपणेम्ते ॥ 


४ 


१५० पात्तञ्ञखयोगसूत्रभाष्यविवरणे 


{ भष्यम्‌ ] 
न चानेकं कमनेकस्य जन्मनः कारणम्‌ । कस्मात्‌ ? तदनेकं जन्म युगपन्न 
सम्भवतीति क्रमणेव वाच्यम्‌ । तथा च पूप्रैदोषानुषङ्कः । 
तस्माजजन्मग्रायणान्ते कृतः पुण्यापुण्यकरमौर"यप्रचयो विचित्रः 
प्रधानोपस्जैनमावेनावदस्थितः प्रायणाभिग्यक्त एक प्रघह्केन मरणं प्रसाध्य 
समित एकमेव मन्म करोति । तच्च जन तेनैव कर्मणा लब्धायुष्कं 
भवति । तसमिन्नायुषि तेनेव कर्मणा मोगः सम्पद्यत इति । 


[| विवरणम्‌ ] 
द्वितीयविचारणायामिदनीं प्रथमः पक्षो निराक्रियते- न चनिकं 
कमौनेकस्य जन्मनः कारणम्‌ । कस्मदिवं नाम्युपगम्यते १ तदुच्यते, तदेवानेकं 
जस्म युगपन्न सम्भवति एकस्यानीश्च्स्य । ततश्च कमेण वाच्यमानें 
किमेकमनेकं जन्मारभत इति । तथा च पृवैदोषातुषङ्कः सवत्र प्रथमदो- 
षालुषङ्घः फलक्रमानियमादब। शरास इति ॥ 


तस्मात्‌ एवं पक्षत्रयानुपपत्तावरिदानीं पिद्धान्तमुपसहरति--जन्म- 
प्रायणान्ते जन्ममरणयोरतरे म्ये कृतः पुण्यपापकरम शयः भविरुदजन्मदेश- 
निमित्त इति वाक्यशेषः । विरुद्धजन्मदेशनिपित्तः पुनः अदृ्टजन्मवेदनीयः 
अप्रतिनियतविपाकः | त्य त्रिधा विनियोगं वक्ष्यति | तस्म।दविषृद्धफलस्येव 
पुण्यापुण्यकमीशयस्यायै नियम उन्यते ॥ 


प्रचयविचिन्रः तस्याटल्यनिककमेनचितत्वस्चपेन विचित्रः । 
प्रधामोपसर्मनमविनावस्थितः किक्ित्कष कस्यचिष्कर्पणः प्रधानमपि कस्य 
चेदन्यस्योपपतजेनपुपस्जनमपि प्रधान मिद्येवमनेककर्मरानटिन्नाऽवस्थितः ॥ 

प्रायणाभिव्यक्तः यथा बीजक्षेत्रतस्कारक्येगोऽङ्कुरमावाभिन्यक्ति- 
करणं, तथा प्रायणपप्यविरृद्धानां कमणामभिन्यक्तिनिमित्तम्‌ । एकप्रधदकन 
एकलेछमवेन समुचितः एकीभूतः एकमेव जन्म करोति ॥ 

तञ्च जन्म तेनैव प्रायणामिव्यक्तासन। कर्मणा ठन्धायुषकं भवति । 
तसिमन्नायुषि तेनैव कर्मेणा भोगः सम्पद्यते, येन जन्मायुषी कृते | यथा येन 
बीजेनाद्कुरो निशत्तस्तेनेव फरुपुष्पादयोऽपि ॥ 


1. कर्मादायः प्रचयविचित्रः? इति विवरणाभिमतपाठः ॥ 


साधनपादो हितीयः १५१ 
[ भाष्यम्‌ | 
अतौ कमाश्चयो जन्मायुमौगहेतुखालिविपाकोऽमिधीयत इति । 
अत एकभविकः कमाशय उक्त इति । 
दृष्टजन्ममेदनीवस्तेकविपाकारम्मी भोगहेतुत्वात्‌ , दिविपाकारम्भी 
वा आयुमेगहेतुत्वात्‌ , "नन्दीश्वप्वत्‌ › नहुषवद्रति । इशकमेविपाकानु- 
[ विवरणम्‌ । 
तेन च कर्मणा मोगायुर्निग्रत्तिमवयवेदयव्रधायैते । न पुनरन्य्यायु्मा- 
गादिनिमित्तस्य॒पुत्रपञ्चुकामादियागदेः पुत्रायुरादिप्ररहैतुं निराक्रियते । 
इतरथा हि सर्श्रुतिस्पृतिविप्रकोपः स्यात्‌ । ठस्मत्तेनैव कर्मणेति जन्ममतर- 
मारभ्य कृतकार्थताद्धिनिवृस्यारङ्क निगरेधमानं क्रियते ॥ 
असौ कर्माशयो जन्मायुर्मोगदेतुत्वात्‌ त्रयो विपाका जन्मादयो 
यस्य स त्रिविपाकोऽभिषीयत । अयमेकमविकः कमाशय उक्तः एक(ए). 
जन्मप्रयेोजन एकभविकः ॥ 


टृएजन्मवेदनीयस्त्वेकविपा रम्भी यथा^-पुत्रग्रमादिकामयागः । 
दिविपकारम्भी वा मोगायुरहतुखात्‌ । यथा भबुरादिकामयागः | 
ननिविपाकर्‌म्भी वा नन्दीश्वरनहुषवत्‌ ॥ 

ननु च नन्दीश्वरनहूुषयोष्ट जन्मवेद नीयत त्रिविपाकास्म्मिघं च विरुद्धम्‌ । 
टृष्टं॑हि जन्म नन्दीश्वरस्य मनुभ्यत्वम्‌ । यस्पुननेन्दीश्वरस्य देवं, नहुषस्य 
चाजगरं तत्‌ द्वयमप्यदृष्टे, न हि मनुष्यत्व एव देवत्वे सेवं नन्दीश्वरस्य, 
नापि देवल एव नहूषस्याजग्तवे संवे्यमिति, कथं त्रिविपाकारम्मितव 
टृष्टजनावेदनीयघं चेति ॥ 

नेष दोषः । दृरयमानजातिविशिष्टमेव रदारीरं तयोजाद्यन्तरत्वेन 
परिणतम्‌ । न च . यथाजन्येष्रां दृष्टजातिविरिष्टरारीरेपमर्देन जात्यन्तरोपादान- 
निषेकादिनिमित्तपिक्षया जाल्यन्तरग्राप्तिः, तथा नन्दीश्चरनहुषरयोः । तस्मात्‌ 
्रिविपाकारम्मिखं दृष्टजन्मवेदनीयघयं चेद्युदाहतम्‌ ॥ 


तत्र तितिधः क्मरारिरष्टजन्मव्रदनीय शाट्रष्टजन्म्वेदनीयश्च । दष्टजन्मवेद- 
नीयत्छनियतविपाकः कदाचिद्धोगहेतुरियेकव्िपाय,; । कदाचिद्धोगायुैतुत्ात्‌ 
द्विविपाकः । कदाचित्‌ जाव्यायुरमोगहेतुात्‌ त्रिविप्रको नन्दीश्वरनहृषयेरि ॥ 





1. भव्रिविपाकारम्भी वा जन्मायुर्मोगहतुस्वात्‌, दयधिकः पाटः विवरणानुसारी | ` 


- 


१५२ पातञ्ञलयोगसूत्रभाष्यािवरणे 


भाष्यम्‌ | 
मवनिवतिंताभिस्तु वासनाभिरनादिकाटमूर्डितमिदं चित्तं विचित्रीकृतमिव 
सर्वतो मस्स्यजालं प्रन्थिभिरिवाऽऽततमियेता अनेकभवपूर्विका वासनाः । 
यस्त्वयं कमीशय्र एष एवैकमविक उक्त इति । ये संस्काराः स्मृति 
हेतवस्ता वासनाः, ताश्चनादिकाटीना इति । 


यस्त्वस्ावकभार्वकेः केमशियः स] पकश्चनियतविपकरभ। 


| विवरणम्‌ | 
अदृष्टजन्मत्रेदनीयस्तु द्विविधो नियतविपाकश्चानियतविपाकश्च | 
नियतविपाकस्तु परद्रितः तस्माजन्मप्रायणान्तरे करत्‌ इत्यादिना । 
यस्वनियतविपाकः स त्रिविधो वक्ष्यते ॥ 


इदानीं तु कमैविपाकजनितो वासनारारिरपर आस्यायते--ङ्कशकमे- 
विपाकानुमवनिवतिंताभिः छेरानुमवश्च कमीनुमव्रश्च विपाकानुमवश्च 
केरक्मविपाकातुमवाः, तैर्निवर्तितामिः वापनाभिः संस्करिः अनारिकार- 
संमूरितमिदं चित्तं चिग्रीकृतमिव पण्ङुञ्यादिवत्‌ सवैतो मत्स्यजाठं 
ग्रन्थिभिखिततं व्यत्‌ ॥ 

अथेकैकस्मिन्‌ जन्मनि अनेकभवपूर्विका वासनाः कमणि विपकि च 
तदङ्धीभविन व्याप्रियन्ते । न हि वासनायाः कमेविपाकानङ्गमवे सति 
जातमात्रस्य पृषदशदारकस्य वरृषनुवानं प्रति स्फुसिपरिकोपस्यावस्कन्दनं 
जाघटीति । न च सक्ृदनुभववासतनामात्नतय। तेन राक्यं भवितुम्‌ ॥ 


यस्वयं कमारायः यस्तवये जन्म्रायणान्तरे कृतेऽविरुद्धजन्मदेश- 
निमित्तः ` प्रधानोपसजनीभवेन त्िविपाकारम्भी एष एवकभविक्र उक्तः | 
न दृष्टजन्मवेद नीयः, नाष्यनियतविपक्तिरदृ्टजन्मवेदनीयः, न।परि च वास्तनाः ॥ 


तासां तावस्सरूपमाह--ये संस्काराः स्मरतिहेतवस्ता वापनास्ताधाना- 
दिकाटीन।ः, संसारस्य डेशकभैविपकानुभवरूपस्यानादितात्‌ ॥ 


यस्व क्षविकमगिकः कर्माशयः पूीक्तस्तस्य।पवाद उच्यते एकदेशस्य । 
कर्थं? स नियताविपाकश्चानियतविपाकश्च । कोऽसौ नियतविपाकः१ य 
प्रायणाभिग्यक्तः काथमारभते । स एव चैकभविकः ॥ 


साधनपादो हितीयः १५३ 


यस्तु विरृद्धजन्मदेदाकाटनिमित्तः सोऽदृष्टजन्मवेदनीयव्वप्तामान्ये 
सत्यध्यनियतविपाकः । कस्मात्‌ १ नियतविपाकेन विरेधात्‌ । न चायमेक- 
भविकः, विरोधादेव | यखस्यैकमपिकसमुक्त, यश्छप्विफभविकः कमाशय 
ड्‌), तददृष्टजन्मवेद नीयत्पामान्येन ॥ 


ननु च यदेवे जन्मप्रायणान्तरे कृतः पुण्यपापक्रमौशयः प्रचय- 
विचित्रः प्रधानोपस्जेनमवेनावस्थितः प्रायणाभिन्यक्त एङप्रषटन 
सम्मूर्चित एकजन्म करोतीयेवमादिनियमो विरुध्येत । कुतः १ प्रायणस्य 
सवेपूतैकमौभिग्यज्नकलात्‌ , आश्याघासेपमर्देन चाशयान्तरोत्प्तः, मानुष्य- 
काशयाधरि पूवं दैवतैर्यग्योनाशयानां समवस्थानं, तदाधायेपमर्दनकलि च 
प्रायणे साधारणे सवकमौभिष्यक्तिकः।रणे दैवतैरयग्योनादायानां कस्यचिदेवा. 
भिव्यक्तिर्नतरेषामिति नासि हेतुः । न हि स्वगेचरापने भ्यङ्गधमेकदे दापरि- 
स्यागेनमिन्यनक्ति प्रदीपः ॥ 

अत्रोच्यते--नैतयुक्ते, कमोनयक्यप्रसद्नात्‌ । बहुप्रकाराणि हि 
कमणि परस्परविरुद्धानि करियन्ते । यो हिः स्वर्गार्थं कर्म कृतवान्‌ स एव 
पशुम्रामायभरं कमीनुष्ठाय पुनब्रह्महल्यां वा स्थावरादिप्रप्तय्थं वा वल्वत्कर्मानु- 
तिष्ठेत्‌ । तत नरकस्थावरादिप्राप्तस्य न हि पञ्चुत्रामादिकामसभवः । ततश्च 
तत्कर्भणामानथक्यं प्रस्तञ्येत ॥ 


[4 


अथ तत्रापि प्रामादिलामघुखं भवर्तीति चेत्‌-न हि प्रामकाम 
इत्युक्ते प्रामघुखत्वमभिप्रेतम्‌ । न हि प्रामघुखं प्रतो प्राम प्राप्तत्रान्‌ ॥ 

किश्च-- स्व॑श्ाच्चविप्रकोपश्च स्यात्‌ । अद्ृष्टानां च स्वर्गनरकादीनां 
एुखदुःखमात्नप्रसङ्गः । (ततः' शेषेण इति रोषरसद्ावज्ञापनश्रुतिस्पृतयो 
बाध्येरन्‌ । तस्मान्न सव कर्मं प्रायणेऽभिव्यञ्यते । भव्यन्तव्रिरद्ध।नां कर्मण. 
मानधक्यप्रपतिः । कर्मशा्ञानथक्ये च मोक्षराेऽ्यनाश्रापप्रसङ्गः ॥ 


जअमिन्यञ्ञकानामपि कस्यच्चिदभिनव्यञ्जकल कस्यचिननेति टरयते 
ग्यभिचारः । यथा चक्षुषो रूपाभिन्यञ्कवेऽपि चैत्रोद्धकचश्षुषोरहोरात्रयो- 


रतरेतरब्यभिच।रः । आलोकस्य च समाने सवरैचक्षुस्सहक।रिवि, नोद्कचक्षु 
स्सह कारितम्‌ । एकरस्मिश्च स्यादिपिषण्ड सुखदुःखमेोहानां सर्वेषाममिन्यक्तिनिमि- 
तेऽपि कस्यसचिदेवामिन्यक्तिः ॥ 
1. गमौतमधर्सृत्नम्‌ 11, 31. 
20 





१५४ पातञ्चटयोगसुत्रभाष्यविरणे 


तन्न कर्माचपेक्षया विरोधाददोष इति वचेत्‌्--इष्टापि व्रिरोधादनभि- 
व्यक्तिः सवंकर्मणाम्‌ | न चापि बाजाधरे क्षेत्रे उपमधमाने जकादिनिमित्तसंयोगे 
सत्यपि तद्गतानां बीजानां विरुद्धजातीयानामङ्कुरादिकायौरम्मित्वम्‌ । एवं 
मानुष्यकाटानाशयाधरेऽप्युपमर्घमनि, न विरद्धजातीयदेवतैयैग्योनाङ्यानां 
सर्वेणां युगपदूत्तिलामः ॥ । 


नच प्रायणतेवं कर्मणाममिन्यञ्ञकम्‌ । दृ्टजन्मवेदनीयानां मोगार्थानां 
दशनात्‌ । येषां प्रायणमेवाभिव्यञ्चर्क तेषां सर्वेषां भवत्वभिग्यक्तिरिति चेत्‌- 
न-- विरोध द्धिवतेयेग्योनम।नष्यकारायनाम्‌ ॥ 


परायणानां च भूतमविष्यत"रविरोषैरवि(षावि)रोषोपपत्तम॑सर्वकर्मा- 
मिव्यन्नकःवम्‌ । प्रायणविरोषश्रवणन्च प्रायणमेदः यधा--धय यं प्वाि 
स्मरन्भावं स्यजस्यन्ते ककेभरम्‌' इति स्मरणविरोषमेदात्‌ प्रायणमेदः । 
तस्मान्न सवैकमीमिव्यज्ञकस प्रायणस्य । अन्यधा विरेषणानधक्यप्रसङ्गात्‌ ॥ 


नच स्परणादिविरेषणेन प्रकृतस्यान्यथात्वं नारो वा स्यात्‌ | 
त्नाशान्ययात्वकरणे हि स्मरणस्य प्रहृतकरमसहकारिति न स्यात्‌ । घ्वतन्त् 
हि स्मरणै स्यात्‌ । तथ। चातुष्टितकमनैर्थक्यं मवेत्‌ ॥ 


किच--करुलयवध्याघु मृतानां मोक्षप्रसङ्गः । कम।नारम्भात्‌ । 
ताप्तां फटलवच्करमखापीति ` चेत्‌--न--करणान्यूहात्‌ । करणेषु 
हि व्यूहेतेषु कमर्णां वृत्तिलाभः फल्यं च । न तदा तदृन्यूह उप्रपद्ते ॥ 


स्वनत्रदिति चेन्न । तत्रापि कमनम्युपगमात्‌ | श्रुतिश्च स यत्तत्र 
दिंविदयद्यलयनन्वायतस्तेनः भवतिः इति कर्मणा स्वप्तदरनजेन।सम्बन्धं 
दशयति । न कशित्छत्तैरपराधवानस्ि । तब्रह्महल्यादिकरणदर्यनात्‌ | अध 
स्कननप्रायश्चित्तादिदरोनाेति चेन्न, रेतस्स्कन्दननिमित्तत्वाश्रायश्चित्तस्य ॥ 


तस्मा्चथपि स्व्ायवस्थायामिव कञ्टयवस्थाघ फलमम्युपगम्यते, 
तथाऽपि करणत्यापारामावात्‌ स्वावस्थरावदेव फलमात्रे तत्‌ , न कमैकतत्वमिति 
मोक्षप्रसङ्ख एव गमेप्रसृतान।मापतित इति ॥ 





1. भगवद्रीता. 8. 6. 
2. ब्र. उ. 4.3. 15 


[® 


साधनपादो दित्तीयः १५५ 


( भाष्यम्‌ | 
तत्रादृ्टजन्मवेदनीयस्य नियतविपाक्येवायं नियमो, न तद््टजन्भवेदनी- 
यस्यानियतविपक्रस्य । क्सत्‌१ यो द्यदृ्टजन्मवेदनीयोऽनियत- 
विपाकप्तस्य त्रयी गतिः-- कृतस्याविपक्रस्य नाशः, प्रधानकर्मण्यावाप- 
गमने वा, नियतविपकप्रधानकर्मणाऽमिभूतस्य वा चिरमवस्थानमिति। 
तत्र कृतस्याविपक्स्य नाशो यथा-शुङ्ककर्मोदयादिरैव नाः कृष्णस्य । 


{[ विवरणम्‌ ] 


(५ क 


तस्मान सक्कमौभिग्यञ्चकल्वं प्रायणानां, तेषां च विशेषोपपत्तेलियत 
इदमुच्यते-तत्राद्टजन्मवेदनीयस्य नियतविपाकस्येवाये नियमो योऽसौ 
'जन्मप्रायणान्तरे करत इव्येवमादिभाष्यण त्रिषिपाक्रारम्मिल्रनियम उक्तः, नं 
तु अदृष्टजन्मवेदनीयस्य अनियतविपाक्रस्य । कस्मात्‌? यस्त्वद््टजन्म- 


वेदनीयः अनियतविपक्रस्तस्य त्रयी गतिः॥ 


कथम्‌ १ कुतस्याविपक्रप्य विनाशः नाराकाटमप्रप्तस्येव नाशः। 
यथा प्रायद्चित्तादिना प्रतिषिद्धस्य कृतस्य नाराः ॥ 


प्रपामकर्मण्या प्राएगमनं प्रधानकर्मणि नियतवेदनीये आग्राप्रापतिः 
प्रधानकमफलातिरस्कोरण स्वयमपि मन्दमन्दं फं मध्यमनुप्रव्रिहय प्रयच्छति । 
यथा- सकलेषु तण्डुटेष्रः॒विपरच्यमनिषु अपस्कला अपि तण्डुल्कण। उप्ता 
अल्पीयां समर्थं साधयन्तयेव । नियतविपाकप्रधानकमभिमूतस्य वाऽप्यवस्थानं 
नियतविपाकं यद््घ्रानकमे प्रारन्धफरं तेनमिभूनस्य न्यक्कृनस्य 
विरुद्वदेराकारनिमित्तविपाकत्वादवस्थानम्‌ । यथा--त्रिजिर्गषमाणयेरन्यतेरेण 
म्रवृत्तराज्येनामिमूतस्येतरस्यावस्यानं देशकाठनिमित्तपिक्षया ॥ ` 


तत्र कृतस्याविपृक्रस्य नाशो यथा शुङ्धकर्मोदयारिहैव तपर्खाध्याय- 
योगादिलक्षणस्य श्ुद्धस्यादयात्‌ प्रायश्चित्तादिलक्षणस्य च, कृष्णस्य अञ्ुदि- 
रूपस्य हिंसादि लक्षणस्य प्रगेव वृत्तिखामात्‌ नाशः । इहैवेति करिवक्षितम्‌ । 
जन्मान्तरेऽपि प्रा्वृत्तिलामान्नारोपपत्तेः । यथा कौनख्यादिनिमित्तपापतिदचेषाणां 


(+ {~ (व 


=, ५ 
कौनद््ादि चिहैरवगम्य प्रायश्चित्तेन नराः क्रियते ॥ 


१५६ पातञ्नखयोगसुत्रभाष्य॑विवरणे 


[ माप्यम्‌ 
प मू-- “५ भे भ, # | © (> १ ्\ = क जक 
यत्रदमुक्त हह ह १ केममा बदतत्य पपिकर्यका राशः 

[क £ 


पुण्यक्ृतोऽपहन्ति । तदि च्छस्व कमीणि सुक्रतानि करमिहैव ते क्रमं 
कवयो वेदयन्ते" । | 


प्रधानकमेण्याव।पगमनम्‌ । यत्रेदमुक्तम्‌--““ स्यात्स्वल्पः 
सुकरः सपरिहारः सप्र्यवम्षः कुशस्य नापक्रषौयाठम्‌ । कस्मात्‌ 
कुररं हि मे बहुन्यदस्ति यत्रायमावरापं गतः स्वर्गेऽप्यपकषेमल्पं 


[ (र 


कर्ष्यितिः" इति 1 


{ विवरणम | 

तदेतत्तन््रानतसपरपिद्धेनोदाहरणेन व्याच््े--यत्रेदभुक्तदे दे ह वै 
कर्मेणी शङ्कङृष्णे जन्मनि जन्मनि साधकस्य पुरुषध्यापिक्ृतस्य । एक रािः 
स्वाध्यायादिपुण्येन कृतः पुण्यक्रतः अपहन्तीतरमपुण्येन कृतं रश्िम्‌ । अथ 
वा पुण्यकृतः पुरुषस्य जहकर्मराशिः कृष्णकर्ैरारिमपृहन्ति । तदिच्छस 
तस्मात्‌ खच्छकर्मि स्वगरीयानि कमणि श्ह्णानि सुकृतानि कतुम्‌ । इतः ? 
यतः इहैव अत्रैव तत्र शै खं शन्ति कवयो वेदयन्ते कर्मविपाकविमागज्ञाः 
ज्ञापयन्ति ॥ 


प्रधानकमैण्यावापगमनमुदाहरणेन प्रद्यैते--स्वलयसङ्करः अल्पीयान्‌ 
दोषावकरः । कुतः १ प्पटटिरः परिहारपदहितः। परिहारमपेक्षते, न तु परिहृतः | 
परिहारशक्द्युणयायिज्ञनसमानाश्चय इव्यथः । सुप्रल्यवमगैः सप्रदयेक्षणः । 
कथमक्ताय॑॑मय। क्रियते कंद। नु निस्तरिष्याम्पेतत्‌ न पुनः करिष्यामीद्यापदि 


{५ (५ 


भव्रत्तस्याकयि कुवतः प्रणि्यसादनि।मत्तम्‌ | 


कुशलस्य कमेफल्दोषपर्हिरादिषिभागविश्ारदस्य विदुषः । 
नायमप्कर्षीय नायं स्वल्पः संकरः पुण्यफखस््त्त ददुतरादपकरषं, अपकृष्य 
च स्वक नियेक्तुं परयप्तः । अथ वा, कुशस्य कर्मण ए नायमपक्रषीय 
पयिः । कस्मात्‌? कुशरं हि मे | साधक एवं मन्यते | शुभं यस्मान्मम 
बहूुन्यदास्त यत्रय वसषन्‌ बहन शुम अय सङ्कर अव[पगतः स्वगऽ- 
प्यपकृषमल्प कलियितीति ॥ 


साघनपादे। द्वितीयः १५७ 


[ माष्यम्‌ ] 
नियतविपाकप्रधानकर्मणाऽमिभूतस्य वा चिरवस्थानम्‌ । 

कथमिति ? अद््टजन्मवेदनीयस्येव नियतविपाकध्य कर्मणः ` समानं 

मरणमभिब्यक्तिकारणयुक्तम्‌ › न तु ` मदटजन्पकेद नीयस्यानियतविपाकस्य । 


यच्छ जन्पत्रेदमीयं कमौनियतविपाक्रं तन्नश्येदावपं व। 
गच्छेदमिभूतं वा चिरमप्युपासीत, यावत्समानं कर्मामिव्यज्चकं निमित्त 
मस्य न विपाक्राभिभुखे करोतीति । तद्विपाकस्येव देशक्राखनिमित्तानव- 
धारणादिये कर्मेगतिित्रा दुर्विज्ञाना चति। ग्न चोत्सगस्यापवादान्नि- 
वत्तिरिप्येकमविकः कमौशयोऽनुज्ञायत इति-॥ १३॥ 


[ विवरणम्‌ | 
नियतविपक्रप्रधानकमभिभूतस्य वाऽप्यव्थानम्‌ । कथमिति दुष्टमि- 
प्रायः प्रश्नः । कथं? प्रवृत्तराञ्येनापरस्याप्रवृत्तराज्यस्पामिमवो युक्तो निमित्त 
भेदेन राञ्यप्रत्रतेः | इह तु निमित्तमभिव्यञ्चकं मरणं सैषां कर्मणां तुल्यं 


तरसिमस्तु निमित्ते सति स्वैषां कर्मणां वृत्तिाभो युक्त इति प्रधानकमीौमभवो 
न युक्त इतरस्येति मन्यते । तत श्वाव।पगमनमेवास्िति ॥ 


अनत्रोच्यते- तत्रादृष्टजन्मवेदनीयस्येव अविरुद्रदेशक्ाल्विपाकरादिः 
निमित्तस्य नियतविपाकस्य पुण्यापुण्य्पस्यानकस्य कमणः समानं मरण. 
मभिग्यक्तिकारणमुक्तम्‌ । न तु दष्टजन्मवेदनीयस्य पुत्रम्रामादिविषयस्य, 


[+> 


अनियतविपाकस्य वा अदृष्टजन्मवेदनीयस्य यथाकृतव्याल्यानस्य ॥ 
यखदृष्टजन्मवेदनीयमनियतविपाकं तन्नयेदावापं वा गच्छेदमिभूतं 
वा चिरमप्युपाप्तीत उदाप्तीत, यावस्समानमविरुद्रं वुल्यजातीयमभिन्य्लकं 
निमित्ते कमै । समानजातीयं हि कमं व्रिपच्यमानमेतदभिमरुखं करोति ॥ 
तद्विपाक्रस्येव तस्यानियतत्िपाकस्य कर्मणो तिपाकस्थेव । देशकाठ- 
निमित्तानवधारणाकसिन्वा देर कस्मिन्वा निमित्ते कस्िन्कलि वा तत्क 





1. न्न तु हृष्टजन्मवदर्न वल्यानिव्रतविपाकस्य वा अदृष्टजन्मवेदमीयस्यः 
इति विवरणाभिमतपाठः ॥ 

2. न तस्योरवगैस्यः इति (कर्माशयो दुर्ञान इति” इति च विवरणाभिमतो 
भाष्यपाठ दति ज्ञायते ॥ 


१५८ पातञ्जखयोगसुत्रभाष्यधरिवरणे 


. _ | सूत्रम्‌ | 
ते हादपरितापरुलाः पुण्या पुण्यहतुत्वात्‌ ॥ १४ ॥ 
[ माष्यम्‌ | 


ते जन्मायुर्भोगाः पुण्यहेतुकाः सुखफलः, भपुण्यहेतुका दुःखफरा 
इति । यथा चेदं दुःखं प्रतिकरूरात्मकमेवे विषयपुखकारेऽपि दुःख- 
मस्तयेव प्रतिकूलात्मकफं योगिनः ॥ १४ ॥ 
[ विवरणम्‌ ] 
विपाकामिमुखं भविष्यतील्नवधारणात्‌ । इयं गतिश्चित्ना दुक्ञौना च भवति | 


^ (- 


चित्रा नाशावापामिभवादिवैचरित्यात्‌ | दुक्ञौना देरकालनिमित्तानवधारणात्‌ ॥ 


ननु च।दृष्टजन्पवेदनीयस्य प्रायगेऽमिष्यक्तस्य एकमत्र जन्म करो कीव्येक- 
जन्मारम्मितवपुक्तम्‌ , तदिदानीं नाश्चावापामिमवावध्यानादिवचनाद्रष्येतेति 
चेत्‌--न--उपपादितत्तरघात्‌ अष्ष्टजन्मवेदनीयस्य नियतविपाक्ष्येषायं 
नियम इति । न तस्योर्समैस्य अस्मादनियमापएव।दान्नित्रत्तिरिति । कथंन] 
निदृत्तिः 2 एकभविकः कमाशयां दुज्ञान इलव न निदृत्तिः । अनियत- 


विपाकस्याप्येकजन्मारम्भिलं न प्र्तिषिद्धमिल्यथः । 
अथया, उत्सगस्यापवादानिश्रुत्तिरिति मला नैकभविकः कमीशयो 
दु इत्यनेन नस्‌ संवध्यते । यस्मादुत्सगस्येकदेरस्यापवदो 
निवर्तक्तो न सवस्य, तस्मानियतविपाक एकभविकः कममङायः सुज्ञान एव ॥ 
अपरः कल्पः-इह कभगति्ञातव्येति प्रकृतं, तस्यायमपवाद्‌ एकभविकः 


क्मारायो दुज्ञन इति । तत्रेतिशब्दो हस ¦ यस्माद्धेतोरेस्सगिं कस्य कमेगतिज्ञानस्य 
प्रकृतस्य एतस्मादपवादान निदृत्तिरिति, तस्माद्यथा ज्ञेया कर्मगतिष्तथ। 
्ञातव्यैव । दुज्ञान। इति दुःखेन जयत्वमुच्यते छैरीन ॥ १२ ॥ 

कम॑ौराय उपव्या्यातो दृष्टजन्पेद नीयश्च अदृष्टजन्मवेदनीयश्च । तस्यापि 
त्रिविधा विपाका जालयायुभीगाः हादपरितापफलाः पुण्यापुण्यरैतुत्वात्‌ । 
हृदः सुखै, परिप दुःखं, हृदश्च पर्तिपश्च ह्वादपरितिपी, तौ एड येषां ते 
ह्ादपरितापफला; । तथा पण्ये च अपुण्यश् पुण्पपुण्ये, तेणएव्र हेतू येषां ते 
पुण्यापुण्यहेतवः; तेषं मावः पुण्यापुण्यहैतुतं, तस्मप्पुण्यापुण्यहेतुत्वात्‌ । 
ते जालायुर्भोगाः पुण्हेतुकाः सुखफलः । अपुण्यदेतुक्रा दुःखफलाः । 
यथेदं दुखं प्रतिकरूटात्मफमेवं विषयसुखकलेऽपि दुःखमस्तयेव 
प्रतिकूठात्मकं योगिनः ॥ १४॥ 


साधनपादो द्वितीयः १५९ 


[ माष्यम्‌ | 
कथं ? तदुपप।यते-- 
- सत्रम्‌ ] 
परिणामतापसंस्कारदुःखेगुणवृ्तिविरोधान्न दुःखमेव 


स्थं विवेकिनः ॥ १५ ॥ 
[ भष्यम्‌ | 
स्वस्यायं रागातुविद्धशेतनाचेतनपाधनाधीनः घुखानुमव इति 
तत्रास रागजः कमौशयः ! 


[ विवरणम्‌ ] 
कथे वरिषपष्ुलकाले योगिनः दुःखमपि १। तथा पूवैत्र चोक्ते! दुःखे 
सुखख्यातिं वक्ष्यतीति । तदुपपादयते प्रतिपायते ¡ तत्र चेतन्न प्रतिपादितम्‌ | 
दुःखस्य कर्मकायैलात्‌ , कमौनन्तरं प्रतिपादन युक्तमिति, बहुवक्तवयत्राच्च । 
परिणामतापसंस्कारदुःखैुणवृत्तिषिरोधाच् दुःखमेव सनं विवेकिनः ॥ 


परिणतिः परिणामः, तत्तिप्तापः, संस्कृतिः संस्कारः, तापश्च 
संस्कारश्च तापपस्कारौ, परिणामश्च तापसतस्कारौ च परिणामतापसष्काराः, 
त एव दुःखा दुःखनिमित्तानि, रतैः परिणामतापसंस्कारदुःचै्हेठभिः 
स्वमेव दुःखम्‌ । किन्तत्सर्व १ शा दुःखकारणघ्वदिव हेतोः । कर्माणि 


हादपरितापफल्त्वात्‌ । जालयायु्मेगाश्च छरादीनामाश्रयनिमित्तविषयाश्च 
दुः खहेतुत्वादियेतस्तैमेतर दुःखम्‌ ॥ 


कि सवैस्येव ? नेद्याह -- विवेक्रिन इति । केशादीनां विभागव्रिवेको 
यस्य विधते मस विवेकी ¡ तस्य दाकर्मविपाकाभिन्नस्य परिणामत।पसंस्कार्‌- 
(> (नि, च 


गुणव््तिविरोघात्मक(घाच्च)सवेदु .खलरोपपादक(प्रतिपादक)हेत्वमिदरिन इल्यः | 
नेतरस्यानिव्दरिनः ॥ 


तस्य तु तप्तिमात्रे दुःखम्‌ | तदपि “अहं तप्यः इत्यासत्वेन प्रतिपद्यमानः 
तत्रापि संशयानोऽसौ ममेदं दुःखमिलेतःवन्मात्रमपि विविङ्क्ते । यदि श्चेतावद्‌- 
ध्यन्तरं॑विविश्चवीत, ततो दुःलसताधनमप्येतद्‌दुःख(साधन)मिति मन्वीत । 


1, या. सूग्षपा, 2. चू. 5, 


१६० पातञ्जञल्योगसूत्रभाष्यविवरणे 


[ माष्यम्‌ | 
५ (= [क (न अ (० [4 
तथा च दे दुःखप्ताधनानि पद्धति चेति दैषमोहकृतोऽप्यस्ति 
कर्माशयः । तथा, नानुपहय मूतान्युपमाोगः सम्भवतीति 


हिषाजृरोऽप्यस्ि शारीरः कमीरय इति । विषयसुखं च।विचेधयुक्तम्‌ । 
[ विव्ररणम्‌ ] 

तथा च स्वमिदं दुःखमिति तितिक्षेदिति सोऽपि विवेकी स्यात्‌ । तस्मा्घपि 
तापके दुःखम्न प्यन्ति, तथाऽपि न तद्साधनादि सम॑दुःखमिति 
मन्यन्ते निर्विवेकिनः । यस्य पुनः परिणामदुःखदेत॒दशेन तस्य विवेकिनः 
सवमेव दुःखम्‌ ॥ 

तत्र॒ तावत्परिणामदुःखतां व्ाच््- -सर्वैस्याये रागानुविद्धः । 
सरवस्येलयनेन स्व॑प्राणिप्रसिद्धलवादग्यभिचासिपरलक्षावगम्यलवं दरयति । चेतना- 
चेतनाधीनः पुत्रपद्यदिरण्यादिपाधनायत्तः सुखानुभव इति । सुखानुभवक्रारे 
रागो मनेव्यापारः तद्विशिष्टो हि घुखमनुमवति । स सर्वो व्यापारः ङृशोपसं- 
हितलाद्रमीधर्महेतुः । तदूतैश्च कर्माशयः प्रारन्धफलक उपमुञपते, 
भोगकाठे च।पर उपचीयते । ततश्च क्रुशमूलः कर्मीशयः सति मूञे तदविपाक 
इद्युपपन्न भवति ॥ | 

तथा, इखवेायां इखप्र्नीकमभूतानि दुःखसाधनानि उपलभमानो 
देष्टि, तथा सुखोपभोगपलपाखनन्यप्रनरमानसो मुह्यति चेति देषमोहप््व्यापार- 
जनितोऽप्यस्ति कमाशय । अथवा दवैषमोहविव ग्यापाररूपाविति तक्कृत एव ॥ 


तथा, यश्चाप्तौ इलेपमोगः स नानुपहय नातुपहिस्य भूतान्युपभोगः 
सम्भवतीति । उपमोग एवोपघातहेतुत्वादु पहन्तृप्ेन विवक्षित इति, 
समानकर्तुकलम । अन्योऽपि मदीयमेवोपमोक्ष्यत इति मन्यते, तत्तापि 
सर्वेपभोगसामष्युक्त धनमिति तस्मिन्तुपादीयमनि धवे परपीडा स्यात्‌ । 
किमुत पीडयिलैव यदुपादौयते । ततश्च रहि्ताकृतोऽप्यस्ति कर्माशयः 
शारीरः । तदुपादानग्यापारस्य हारीरनिषदयस्रात्‌ ॥ 

एवमेकस्मिन्तुपभोगकाले बहुधा कमीड्यो छेमक्रोधमोहनिमित्त 
उपचीयते । तथा च रागदरेषमोहविरिष्टख।दनेकभुखकमरायविरिष्टः 
षुखानुभवः . परिणममानः सननुबन्ध दुःखीमवर्तीति परिणामदुःखतेप्युच्ते । 
विवेकिनस्तेवं पर्यतः घुखानुमवकालेऽपि दुःखमस्त्यव । तचथा-- विषदिगधतां 
ज्ञघ्रा दध्योदनं भुञ्ञानस्य ॥ 


साधनपादो द्वैतीयः ` ९६१ 


[ भाष्ग्रम्‌ | 
या भोगेषि्द्रियाणां तृपरिरुपश्चान्तिस्तस्पुलम्‌ । या लोव्यादनुष- 
शानितस्तद्‌ दुःखम्‌ । न चेन्द्रियाणां मोगाभ्यासेन वैतृष्ण्यं कतु शक्यम्‌ । 
कस्मात्‌? यतो भोगाभ्याप्तमनु व्रिवधैन्ते रागाः कोलानि 
चेन्दरियाणामिति । 
[ विवरणम्‌ || 
इतश्च स्व दुःखमेव, अविधात्वाद्धिषयष्चुखस्य | अविवेकप्रल्ययातमको हि 
विषयघुखानुभवः । तदेतदाह -- विषयश्युखं चाविचेदयुक्तमिति । कोक्तम्‌ £ 
इहैव पयायशब्देन ““"अस्यन्तवि वि [मा]क्तयोरयन्तासङ्कीणयोरविवेकभरा्ताविव 
सां मोगः कर्पते । स्वह्पप्रतिरुम्भे तु तयोः कैवत्यमेव भवति कुतो 
मोग इतिः" ह्यनेन माप्येण ॥ 


यद्वा, सूत्रकरिणोक्तमुपरिष्टत्‌ “श्रल्ययाविशेषो भोगः”) इति । अवा 
च परिणममाना सत्रेमनथं करोति । ततश्च दुःखव्रीजघ्वादूनु खमेव विषरयदहुलम्‌ । 
यथा व्याधिनिमित्तत्व।त्‌ खादूतरमपि भक्ष्यमणम्‌ ॥ 


विषयघुखं चाव्रियेस्यैवायत्य प्रकाशनाय तन्त्र्िद्धमुदाहरणं 

दरायतते--या भागाषिन्द्रियाणां सञ्छन्त इति मागा; शन्दादयः तेपु 

निमित्तेषु या तृप्तिः तत इन्द्रयाणां उपशान्तिः उपरमः. किमनथायासहेतुकया 
थेति निरङ्कुखतयावस्थान तत्‌ सुखम्‌ ॥ 


या तु ठल्यादीप्तया वृष्णातः सकारादुनुपञ्ञान्तिः ` अनुपरतः 
तद्‌ दुःखम्‌ । तदुक्तम्‌- 9 
५ नास्ति तृष्णाप्मं दुःख नास्त्यतृष्णापमं सुखम्‌" इति ॥ 


ननु चेपमोगेनैव वेतृष्ण्प भवति उप्रभान्त | उपमागश्च दुख 
मविष्यति । तत आह--न चेन्द्रयाणां भामभ्या पनं शक्यं वतृष्ण्यं कतुम्‌ । 
कस्मात्‌ £ अत आह- यतो भागाभ्यासमनु विवधन्ते इन्द्रिय।णां रागाः 1 
तथा चेक्तभ- 
५ न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । ~ 
ह विषा कृष्णवर्सैव भूय एवाभिवयेते ॥'' इति । 


"गीरिगयणणणिीणि म 
ण = म 


1, योगसू.पा, 2. सू, 6 
2. यो. सु. षपा. 3. सू. 35. 
21 


। ॥ 


: १६२ पातञ्जखयो गसूत्रभाष्य्िवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
तस्मादनुपायः सुखस्य भागाम्याप इति । स खल्वयं प्श्चिक- 


विषमीत इवाऽऽशीविषेण दष्टः, यः सुखां विषयाठेवासितो महति 
दुःखपङ्के निम्र इति । एषा परिणामदुःखत। नाम रतिकूखा सुखावस्था 


[क्‌ चे, क [4 [क्व 
यामपि योगिनमेव इ्धिश्नाति । 


अथ का तापृदुःखता? सर्वस्य द्रेषानुवरिद्धशवेतनाचेतनपाधनाषीन- 
स्तापाुमव इति तत्रासति द्वेषजः कमीशयः । 


[ विवरणम्‌ | 
कौश्चलानि नैपुणानि च मोगाम्यसेबिन्दरियाणामलु विवर्षैन्ते । 
यथपि मनःकौशख्पूवैकमिन्दियाणां कोरा, तथाऽपि दृर्यत ए भिक्ना[श्वा]. 
दीनामिन्धियस्यापि कौशलम्‌ । तस्म!दतुपायः सुखष्य भोगाम्यास इति 
भोगाम्यामाज्निवत्तिरेव षुखम ॥ 


स॒ खल्वयं वृध्िकभीत इवाशीविषेण दष्टो यः सुखार्थी विषय।- 
नन्ववितः अन्ववबद्धः अनुप्रशरत्तोऽनुभ्यवसितो वा) यथा मन्दविषादूबृशि- 
कादुपजातभीतिः पटुतरेणासीविषेण प्रस्तो महत्तर दुःखममिप्रपधते, 


तथाऽयमग्रदुःखामसिायाः परिणाममहाुखाया निवृत्तो दुःखबुद्धवा 
भीतः सन्नप महति दुःखपङ्के मग्न इयेषा परिणामदुःखता खस्य 
परतिकूडा सुखावस्थायामपि योगिनः । स हि योगी प्रबरच्तवेपथुनेव हदयेन 
प्रतिनियततेदनीयस्य कर्मणे बरयस्वादनुभृद्क घुखम्‌ । तस्मात्‌ सर्व 
दुःखं विवेकिनः ॥ त 

अथ , तापदुःखता अ्या्पायते--घुखोपमोगस्तु परिणममानः 
सन्लुकरये -विज्ञाते विषदिग्ध्वादुदप्योदनोपमोगघ्द्‌दुःखीमवति, . खरूपतः 
पुनररयारूपोऽनुकूखेद नागन्धेऽपि । इद ॒पुनः सरूपरत्‌. एव दुःखत 
तापस्य प्रतिकूल सकलात्‌ ॥ 

कथम्‌? सवस्य द्वेषानुविद्धः द्रेषाठुगतः चेतनाचेतनपाधनाषीनः 
शानरुकण्टकादिक्ताधनेयत्तः त।पानुभवः पूववदेवाधर्मफल्मनु मवति अपू 
खोपचीयमानः तत्रास्ति देषजः कममौशयः ॥ 


साधनपादो हितीयः १६३ 


[ भाष्यम्‌ ] 

सुखसाधनानि च प्रार्थयमानः कायेन वाच। मनसा च परिष्वन्दते, 
ततः परमनुगक्घाद्यपहन्ति चेति परानुग्रहपीडाभ्यां धर्माधरमाह्ुचिनेति। 
स कमौश्यो लोभान्मोहाच्च भवतीत्येषा तापदुःखतोच्यते । 

का पुनः सष्कारदुःखता? घुखानुमवास्पुलषस्कारश्यो 
दुःखामुभवादि दुःखसेस्ाराशय इति । एवं कर्मभ्यो विपकेऽनुमूयमनि 
सुखे दुःखे वा पुनः कममीरेयप्रचय इति । 

एवमिदमनादि दुःखस्रोतो विप्रसृतं योगिनमेव प्रतिकृूात्मक- 
त्वादुद्रूजयति । 

[ विवरणम्‌ | 

तेन॒ च दुःखेन परितप्यमानः सुखसाधनानि चन्दनादीनि 
प्राथेयमानः कायेन वाचा मनसा च प्रिसन्दते चेते । तच्च परिषन्दनं 
परानुग्रहाय परपीडनाय वा भवति । ततः परानुग्रहपीडभ्यां धमा 
धरमाबुपचिनोति । स च परानुग्रहणडह्ृतो धर्मीधरमाद्यः कमीश्यो 
ठोमान्मोहाच्च प्रमपरतीय्येषा तावत्‌ तापदुःखता दाधीषसी विप्रता | खं 
पर्यतो विवरक्रिनः सर्वमेवाश्रयतरिषयनि मित्ते ईःखमिति ॥ 

अघुना हादपरितापानुभवजनितसस्कारदुःखपुच्यते- का पुनः 
संस्कारदुःखता! सुखानुमवात्‌ दुखपस्काएश्चयः, दुःखानुमवादपि 
दुःखसस्काराशयः। इखदुःखये रागव षानुविद्धत्वातततस्वारारायावपि रागद्रानु- 
विदधौ । एवं कर्मणो विपाके जालायुर्भोगाख्येऽनुमूग्रमाने सुखदुःखे भवतः ॥ 

ततोऽपि एुखदूःखानुमवरस्काराशयः यथ। नैरन्तर्येण सुखदूःखानुभव- 
स्तथेव तदनुभवसस्वारावपि राग्रेषानुब्िद्धौ निरन्तरतया भवतः | तौ च 
सैस्काराशयै क्रियाया उपभोगस्य चाङ्गीमवतः। एवं संस्कारारायस्य दुःखहेतुखम्‌ । 
संस्कारदेतुकं सैस्कारदुःखे, तथ। च तत्संस्कारदु खता । न द्यस्मरन्नुपमोगा्य 
करिययि वा साधनमुपादत्ते । स्परृतेश्च सस्कारनिमित्ततपुपपादितम्‌ ॥ 

यदपि तस्करस्य स्वरूप्रतो दुःखता नस्ति, तथापरि संस्कारस्य 
दुःखहेतुतां जानतो विवेकिनः सत्तामात्रेण दुःखलं, भक्षितमात्रषिषत्रत्‌ । 
इ्यमेतैः परिणामतापसेस्कारहेठमिः समेव दुःखमियनादिदुःक्लेतो 
योगिनमेव प्रतिकूल(स्कतादुदरजयति ॥ 


१६४ पातञ्ञलयागसुत्रभाष्यविवरण 


[ भाष्यम्‌ | 
कस्मात्‌ ? अक्षिपात्रकरपो हि विदानिति । यथो्णौतन्तुरक्षिपत्र 
न्यस्तः स्पर्शेन दुःखयति, न चान्येषु मात्रावयवेषु, एवमेतानि दुःखान्य- 
क्षिपात्रकस्पं योगिनमेव ्धिक्षनिति, नेतरं प्रतिपत्तारम्‌ । इतरं तु ' सकर्मा 
पहृतं दुःखमुपात्तमुपात्तं यजन्तं यक्तं यक्तयुपाददानमनादिवासनाविचित्रया 
चित्तवृ्या पमन्ततोऽनुविद्धमिवाविचया दातव्यः एवाहङ्कारममकारानुपातिनं 
जातं जातं बाह्चाध्यासिकोभयनिमित्ताल्िपर्वाणस्तापा अनु्ुवन्ते । 


[ विबरणम्‌ | 
नतु चेत्तरस्यापिं प्रतिकूलात्मकमेव, कस्मान तपुद्रेजयति । नाव्यन्त- 
कशादिकाद्ु्याकरिवेक्विंणीकृतचेतस्वादितरमुद्रेजयति । न प्रतिकूकघ्मकता 
प्रमाग्यते। यो हि दयितामुषटिघातं मुद्ररामिघातदेशीयमपि मस्तकेन प्रतीच्छति । 
पत्रस्य वा मूत्रपुरीषमुरप्ा धारयति । -असावानन्दमहोदन्वत्तरङ्गायमाणः [ै] 
रवा्न्यपि न वातितयाम्‌ [स्वासानमपि न वेत्ति तराम्‌] । न हि तस्य 
तस्रतिकूलात्मकम्‌ । रागमेव हि तदितरस्य प्रतिपत्तूघादभिव्धयति तराम्‌ ॥ 


ननु च योगिनोऽपि ततसमानं निमित्तं, करस्मात्तमुद्रेनयतीति 1 
उद्वेजयलेव तम्‌ । कस्मात्‌ १ अक्षिपात्रकल्पो हि सः । प्रसनलाद्विर्त- 
त्वादिल्वथः । तस्मान समानं निपतते तस्य, यतोऽपौ विद्वानिति । न हि विदुषः 


ङकेरादिकादुष्याविवेकाक्रेणीकृतचेतस्खम्‌ । न च तावविर्णीङतचेतस्वति 
रस्क।रद्ते विद्रत्ता । तस्मादक्षिपात्रकंल्पवादिदरंसमेवेद्धेजयति, नेत्‌ ॥ 


तत्र॒ दृष्टान्ताभ्यां विददविदुषोरन्तरमाचषटे-- यथोणौतन्तुरतिगरदु- 
स्पशोऽव्यक्षिपत्रे न्यस्तः स्परौन दुःखयति सखच्छतरलादक्षिपानस्थ, तथा 
योगिनं विविक्ततरप्रज्ञानमकटुषहदयपुद्रेजयति दुःखम्‌ । स. एवेर्णीतन्तुरन्येषु 
गन्निषु क्षिपतः खरतरसंस्ेनपि न दुःदयनि, तथा नेतरं प्रतिपत्तारं 
दुःखं पीडयति, छेशादिकिणीकृतचेतस्वात्‌ कटिनतेेतरगात्रावयवकल्पो हि सः ॥ 

तदिदमाह--एषमेतानि दुःखानि अक्षिपात्रकस्पं योगिनमेव 
ह्िश्चन्ति नेतरं भ्रतिपत्तारम्‌ । इतरस्य त॒ प्रतिपनतुरितरगात्रावयवस्वभावतां 
दरीयन्नाह-इतरं चिति । तापा अनुप्रुव्स्त इयेवमन्तेन वा्यपमत्तिः ॥ 


1, ५ स्वका।रणोजत १.मत।म.पादित” इति, 
2. ५ हातव्यादद्करः इति च विवरणाभिमतः पाठः । 


साधनपादो द्वितीयः १६५ 


[{ भाष्यम्‌ | | 
तमे(देवमनादिना दुःखक्लोतपा व्युद्यमानमासमानं भूतग्रामं च दष्ट 
यागी सरवदुःलक्षयक्ारणं सम्यग्दशैनं शरणे प्रपते इति । 
[ विवरणम्‌ ] 
स्वकारणोपहतं दुःप्रापिनिमिततैशवेतनाचेतनादिभिरुपहृतमुपनीतं बुद्धि 
दत्तिद्रोरण पुरुषस्य कर्मतामाप्रादितं, दुःखपुपात्ते लयजन्तं शरीरत्यागेन, 
अन्यत्र च टक्तं पुनरन्यं शरीरादिलश्रणमेव दुःखपपुदायपरुपाददानमना- 
दिवाप्तनाचित्रया अविवया चित्ततया सप्रतोऽनुविद्धमिव ॥ 


इतरं प्रतिपत्तारं किविरिष्टम्‌ १ द्‌तव्याहङ्कारममकारानुपातिनम्‌ । 
काय॑करणेष्ु तद्ध्मषु च क्रिधागुणफदटेषर विपर्ययेण प्रतिपत्तिरह ङकारः । पमकारस्तु 
तेद्‌ बाद्येष च चेत्तनवितने¶ ममेति प्रत्ययः | तौ च विपयत्वात्‌ समस्तङ्छेराकर्म- 
विपाकवीजल्वाच्च हातन्यौ । न हि तावन्तरेण रागादयः कर्मैविपाका वा 
सपुदाचरन्ति । तस्माद्वातव्यौ तै त।वनुपतितुं शीलमस्येति हातव्याहङ्कार- 
ममक(रानुपःती, तम्‌ ॥ 


जातं जातं अन्यगात्राव्रयवकल्प॑वा्याध्यासिकोभयनिमित्ताः बाय 
देवता भूतानि च, अआध्यामिकं कार्यं कारणे च, बाद्यध्यामिकानि चोभयानि 
च निपित्तं येषां ते वाद्याप्यालिक्रो भयनिमित्ताः ॥ 


(तरिप्वीणः ` वह्यादििमित्तमव तरिप्लम्‌ । मूतमविष्यद्तमानत्वै वा 
रिप्तम्‌ } वक्ष्यति च “प हेयं दुः'खमनागतम्‌'” इति । यद्रा, छंशकम- 
त्िपाकासकलवम्‌ यद्रा, परिणामतापसंस्कारदुःखध्म्‌ । अतत्ते त्रिपत्रोणस्तापा 
असुप्ुषन्ते अनुषञ्यन्ति ॥ 

त)देवं अव्िवकं प्रतिपत्तारम्‌ अनादिदुःखस्लोतसोद्यमानमात्मानं च 
दुःखललोति मग्रं तथा भूतग्रामं च्छ्रा योगी सर्वैदुःखक्षयकरं सम्यग्दशैनं 
शरणं प्रप्त इति ॥ 


ननु च योगिखादेव सम्यग्दर्शनं प्रतिपनः । उव्यते--योगाङ्गानुष्ठाना- 
देव योगिवे, ऋतेऽपि सम्यग्दरीनात्‌ । तस्मात्‌ सम्पग्ददीनसाधनव्य योगस्य 





भ 


1. या. चु. षा. 2. 8. 16, 


१६६: पातञ्जल्योगसूत्रभाष्यविवरणे 


[ भष्यम्‌ ] 
गुणव्रत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सवं विवेकिनः । प्रख्याप्रवृत्ति्थिति 
रूपा बु दगुणाः प्सरावुग्रहतन्त्रीभूत्वा ` शान्त घोरं मूढे बा प्रयय 
त्रिगुणमेवाऽऽरमन्ते । चठे च गुगवृत्तमिति क्षिप्रपरिणामि चित्तमुक्तम्‌ । 
ठ्पातिशया वृत्यतिशयाश्च परस्परेण त्रिरुध्यन्ते, सामान्यानि ततिशयेः 
स॒ह प्रव्रतैन्ते । 
[ विवरणम्‌ ] 
दरोयति । यें योगफलं च सवमेव दुःखे पदयन्‌ सम्यग्दरौनेकशरण। भरतिपधेत । 
तथा च वक्ष्यति--“'तदरराग्यादपि द।षमीजक्षये कैवल्यम्‌" इति ॥ 


क ऋ, क 


इतश्च सवे दुःखं विवेकिनः । कुतश्च ? गुणव्त्तिविरोपाच्चपि। नयु च 
किमथ सूत्रे परथन्िभक्तिक्रिया १ यावता परिणामतापंस्कारयुणङ्ृत्तिविरेषैरिलिष 
कतभ्यम्‌ । नैष दोषः । षुखदु ;खानुभवतद्रासनाः सवर॑ननप्रपिद्धा इति परिणाम. 
ताप परस्कारदुःखैिति निर्दिष्टाः । तत्करारणविभागज्ञान वरि शारदस्येत विवेकश्रकषैवतो 
गुणडृत्तिविसेधा विज्ञेया इति प्रथक्तरणम्‌ । सतरदुःखहेतुत्वतामान्यासेकसूत्र- 
विन्यासः ॥ 

गुणाः; सृच्रादयः) तेषां वृत्तय गुणड्त्तयः, तातां विरोधाद्‌ गुण्रत्ति- 
विरोधात्‌ | ते च गुणा अन्तःकरणाधाकारसनिविष्टाः । तेषं गुणप्रधानभावेन 


भिनवरिणापरलाच्च विरुद्ब्रत्तित्मं भवति । अन्यतमवृत्तिरुद्रषन्तयाऽन्यतम- 
बरस्याऽभिमूयते ॥ 


एवे त्रयाणामपि प्रतिक्षण(पक्न)मन्येन्यद्रत्तितिरस्क)र इततरद्चयुद्धावितं 
च | न षुखटुःखमोहाचकानां गुणानामन्यतमब्रत्तिकामोऽन्यतमाननुसहितः । तत 
एतस्पिद्धं मवरति-- यदा दुःखात्मकं रज उद्भवति, तदा दुःखल्देव तदृते 
दुःखमिति षक्तन्पम्‌ । सत्रतमारीपि रजेऽनुगतिरसतयेषेति तये।रपि दुःखत्रभेव | 
पस्वतमःप्रवृत्तिनिवरच्थे(पि रजोग्याप।रानुजघ्वाद्‌दुःखतवमेत्र सस्येति ॥ 

एतदुपभ्याचश्ट-प्रख्याप्रवृर्तिष्थितिशीलामिवरत्तिमिगुणाः परस्परानु 
ग्रहतन्त्राः परस्परविरुद्धा अपि परस्परोपक्रर्योपकारकमविन तेखरत्यभ्नितरत्‌ 
सान्तं साचिकं घोरं राजसं मूढं तामसं प्र्ययं विगुणमेवारभन्ते । ई(त)- 
तरयोरङ्गभवेनानुगतत्वाघदा साश्चिकः रान्तः प्रल्यय उदूभूतः सोऽनन्तरमेबो- 
दूबु भूषता तमेऽनुप्हितेन परेण रजकेन प्र्ययेन हन्यते ॥ 





1, यो. सूषा. 5. सू, 50, 


साधनपादो हितीयः १६७ 


[ भाष्यम्‌ | 
एवमेते गुणा इतरेतराश्रयेणोपा्जितमुखदुःखमेोहप्रययाः सर्वे 
सरूपा भवन्तीति, गुणग्रघानमवक्रतस्सषां विशेष इति । 
तस्मादूदुःखमेव सवं विवेकिन इति । 
{ चिवरणप्‌ | 
यदा च राजसो घोरः प्रस्य ईइतरगुणानुगत उद्‌ भूतो भवति 
सोऽनन्तरमेबोद्बुभूषता तामसेन प्रल्ययेन मूढेन स्ानुगतेन सालिकेन व। 
तमोऽनुगनेन हन्यते । तथा ताममोऽपीतरप्रलययराम्यां पययेण । तथा साच्चिकेन 
इतराविद्यन्योन्योदयाभिभवप्रदृत्तया गुणाः ॥ 


कस्मात्‌ १ यतः चठं गुणवृत्तं गुणस्वभव्रलं चित्ताकरिण ` गुणाः 
सन्निविष्टा इति क्षिप्रपरिणामे चित्तयुक्तम्‌ । क £ तन्त्रे ॥ 


कस्मात्‌ पुनयुणा विद्यन्त इत्र । अनेकातिश्चयानमिकन्रासम्भवात्‌ | 
यथा अपवरके तमःप्रक।हायोरतिरायवतोः, एत्मन्तःकरणाकारसन्नितरेशेनां 
सुखदुःखमेहरूपाणां प्रकाराग्रहृत्तिनियमबृत्तीनां गुणानां ख्पेण वा सुखादिना 
वृत्या वा ज्ञान।दिलक्षणय। युगपद तिरे न सम्भवति ॥ 


सामान्यानां वत्रिरोधादन्यक्तल्पराणामतिशयेभ्वक्तैः सह वृत्तिधुक्ता । तेन 
्पातिशया वृ्यतिशयाश्च विरुध्यन्ते । सामान्यानि खतिशयेः सह वर्षन्त" 
इत्युच्यते | यदा घुखरूपातिशयस्तद्‌ा न दुःखरूपातिशये माहरूपातिरायो वा | 
तथा इतरातिरये नेतरातिशंयः । तथा, ज्ञानवृस्यतिङये. न ठोभप्र्ययत््यति- 
शयः । तथा, अन्यतमवृच्यतिराये नान्यतमब्च्यतिरायः ॥ 


एवमेते गुणा इतरेतरोपाश्रयेणोपाजितसुखदुःखमेदप्रलययाः । सखेन 
रजस्तमउपाश्रयेणोपार्जितः षुखप्रययः । रजपापि सच्तमउपाश्रयेणोपार्जतो 
दुःखप्रलयः | तमप्तापि सचरज उपाश्रयेणोपाजितो मोहश्रलयः । ततः सव 
सर्वैकायौ भवन्ति ॥ 

यवमयं प्रल्ययः साचिकः+ तामसोऽय, राजक्श्वायमिति विरेषः क 
इव्याद--गुणप्रथान भावक्रृतस्सेषां विशेष इति । प्रधानेपसर्जनतया सज्ञा 
लामाङमैौ । यथा पश्चमौतिकसरेऽपि पार्थित्रं तैजकतमाप्यमिति ॥ 

यत एवं गुणडत्तििरोधः, तस्मात्‌ समेव दुःखं विवेकिन इति । 
गुणदृ्तिविरोधा देव्यततपखेरग्याथम्‌ । कथं १ परिणामतापसंस्कारदु तैरिति द्शनु- 


१६८ पतञ्जलयोगसूत्चभाष्यविवरणे 


[ भष्यम्‌ | 
तदस्य महतो दुःखसमुदायस्य प्रभवबीजमव्रेया । तस्याश्च 
सम्यरदशेनमभावहेतुः । । 
यथा चिक्षितपराशक्लं चतुब्बूहम्‌-रोगो रोगदतुरारोग्य 
मैषञ्यमिति, एवमिदमपि शाके चतुब्यूहमेव । त्यथा- संसारः संषार- 
देतुर्मोक्षो मोक्षोपाय इति । 
तत्र दुःखबहुढः संसारे हेयः। प्रानदरुखयोः सेयोगो हेयदतुः 
सयोगस्यायन्तिकी निवृत्तिहीनम्‌ । हानोपायः सम्यरदरैनम्‌ । 
[ विन्रणम्‌ ] 
्र्रिकव्िषयावतृष्णस्येव सनैस्य दुःखप्रतिपादना् पृथन्िभक्तिकं कृतम्‌ । 
न हि तत्र दुःखत्वमपर्यतो वेैराग्यमुपकसपत इति ॥ 


(4 9 


एतत्तु गुणब््तिविरोधाच्ेति गुणानां परस्परत्रिरोपिदृत्तिघेन दुःखलप्रति- 
पादनात्तेम्यो व्यक्ताग्यक्तधमकेम्यः प्रं वैराग्यमुपकस्प्यत इलेवमथम्‌ । तथा 
चात्रापि प्रधानोपक्जनमवेन स्तवै सवैखूपा भवन्तीति ब्यक्ताव्यक्तधभघं 
प्रतिपादितम्‌ । एवं च कृता सूत्रेऽपि गुणब्त्तिविरोधाचेति प्रथक्‌ पठितम्‌ ॥ 


परिणामतापसंस्कारदुःखधभत्वात्‌ तस्येतष्य महतो गुणगौणलक्षणस्य 
दुःखसमुदायस्य प्रमवबीजमविघा। तस्याश सम्यग्द्रोनममावहेतुः प्रतिपक्ष- 
त्वात्‌ | मूतायीश्रवराद्विवाया अमूतायश्रयलाचविद्याया वियैवामावहेतुः । यथ। 
सदिषयेःकचन्दरददीनेन।पद्विषयस्याने कचन्द्र दर्सनस्य ब।धनम्‌ ॥ 

सह दुःखनिदनिन छेराकमविपाकलक्षणन स4 दुःखमिदयुपपादितम्‌ । 


.] 


अनेन दुःखेन यो दुःखी विवेकी स एत्य सम्यग्द्नशान्ञस्य वियः 


ॐ 
न 


अधिकृनो, नेते दुःलष्येव प्रतिपततृखादिरयेतदृष्ान्ेन प्रतिपिपादापिभननाह-- 
यथा वचिरिरसचाखं चतुष्बूहम्‌--रेगो रोग्दैतुरारोग्यं भेषञ्यमिति । 
रोगराण्हेटुमास्तनि धरिवर्तपिषुरभेष्ज्यस्प शा्ञस्यिग्यस्य प्रयोजनस्य विषयः ॥ 


एवमिदमपि शाश्च चतुव्धूमेव । यथा-- ससारः संसारहेतुरमोक्षो 
मोक्षदेतुः । तत्र दुःखब्रहुलः संसारे हेयः । प्रधानपुरूषसंयोगो हेयहेतुः । 
संयोगस्यायन्तिकषी नितव्रतति्हीनम्‌ । हानोपायः सम्यग्दरैनमिलेते 
चत्वारो भ्यूह।; ॥ 


साधनपादो द्वितीयः १६९ 


[ भाष्यम्‌ ] 
तुः स्रूपमुपादेयं वा देयं वा न भवितुमर्हतीति, हाने सस्य 
वादप्रसङ्गः, 


ह 


[ विवरणम्‌ ] 

यथा चिकिसाशाच्चं रगे रेगहतौ चासेग्ये च तलथरयोजनके भेम्ये 
च चतुष्टये स्वर्पप्रतिपादनाय ब्यूहितं, तत एव्र च रोगादयेऽस्य चारो 
म्यूहा इति चतुभ्यूहं, तथा अस्य रास्लस्य । दुःखन्रहछः सेरः [हेयः], 
भविधाहेतुकश्च प्रधानपुरषसंयोगो हेतुः, - सनिमित्तस्य संपतारस्य हानं 
सम्यण्दशनङा्ञेस्य प्रयोजने, तथा सम्यण्दर्शनं चेति चध्वार एते व्यूहा 
शस्यापि इति चतुन्यूह राल्रम्‌ । एषु वाऽथैषु चतुधा भ्यूहोऽस्येति 
चतुव्यूहम्‌ ॥ 

तत्र हातुः स्वरूपमिति। नतु द्रष्ट दृशिमात्रः" इति हातृखश्रणसूत्न 
एतददित्यम्‌ ] नेष दोषः ॥ शास्त्रारम्मप्रयोजनप्रतिपिपादयिषुजा इशादिकः 
समस्तो दुःखवसानः संसारो निवैितः । संसारी च यः सेस्तारदुःखेन 
निर्विण्णो विवेकी सोऽस्य शास्रस्य विषय उपपादितः । तस्य विवेकिनः 
दास्त्रमतःपरमारम्यते । एतच प्रथमसूत्रे प्रदरितम्‌ । आरभ्यमाणस्य राज्ञ्य 
सम्यग्दरनमेव प्रयोजनम्‌ । तच्च संसारदुःखनिवर्णनानन्तरमवसरप्राप्तं प्रति- 
पादयितन्यमिलयतदुष्यते-- तत्र हातुः स्वरूपमिति ॥ 

हाता पुषः, तस्य स्वरूपमुपदेयं वा हेयं वान भवति । कुत 
एतदेवम्‌ ? हेगरोपादेयभ्यतिरेकेण वस्वदशरेनात्‌ । यथा छेके घुखं तत्कारणं 
चोपदेष, दुःखं तत्कारणं च हेयम्‌ ) एतरमयमपि पुरुषो वस्तुखादन्यतरधमी 
भवितुम्हतीलभिप्रायः | किमतो यचेवम्‌£ अत एतद्भवति, हाने सस्येच्छेद- 
व[९ प्रसङ्ग इति ॥ 

यद्यसौ हेयल्धममौ, तत एष हातम्य; । हाने लस्य करि स्यात्‌? 

आकेच्छेदवादग्रसङ्गः स्यात्‌ । अतः को दोषः स्यात्‌ ? दोषं कैवल्यपदि 
प्रतिप।द विध्यामः ॥ 

किञ्चान्यत्‌-अस्य हात्रन्तरस्य (किश्वान्यतरस्य) अमावाद्धानानुपपत्तित्म्‌ । 
स्वयमेवासन आत्मा हतेति चेत्-न-- स्वात्मनि क्रियातिरोधाद्वे 
दाभावाच्च | हेयादासन आसा हाता चेदन्यस्तदाऽनवस्थासङ्कः | योयो हाता 
तध्यापि हेयत्वात्‌ । न च युगपदृद्रयोह॑तरोः समोऽस्ति । मिन्नकाकमात्रिनोप्तु 
हेयहातृलखानुपपत्तिः ॥ 

22 


१७० पातञ्जल्यागतसूत्रभाध्यविवरणे 


५, न १ | न 
उपादान चव हतुतद) उभव्रप्रय्यान शाध्तवाद्‌ 


इयतरसम्यग्द्रीनम्‌ ॥ १५॥ 
 [ विवरणम्‌ ] | 
हातुश्च हियत्वाम्युपगमे तेस्यानवत्थिनख)द्वेयस्तम्बन्धानुपपत्तिः । 
हातुरनवस्थितते च स्वयमेव हियत्वग्रतिपत्तहातुद्ौनाणोद्यमानयकयप्रसङ्गः । 
हानफरानुपपात्तश्च । न हि बद्धस्य स्वह्पनादा एव फलम्‌ । मोक्षो हि तस्य 
फलम्‌ । नापि ब्रियमाणोऽपि ज्ञातक्षणान्तरमरणः स्वरूपत्रिनारपिच्छति | 
विनारास्यायप्र्तत्वदिवमनवस्थितश्चद्धाता न सखरूपहानमिनच्छेत्‌ , अर्थप्रतिर्हनस्य ॥ 


यथा च हतुनिंयवं तथा दरषटपुत्रे' केवल्यपदि च व्याह्यास्यामहे । 
तस्मान्न हियत्वधमा पुरुषः । सपतारस्तु महदादिव्यक्तिः दुःखब्रहुतरे हेयः । 
तततुल्यधमकेः पुरुषे न मवतीलर्थः ! तततुल्यधैकवे तस्यो च्छेद वाद प्रसङ्ग इति ॥ 


अस्तु तद्युपादेयः, यथा ुख।थं षुखकारणं द्भ्यम्‌ । नैतदेवम्‌ । कस्मात्‌ ९ 
उपादाने चस्य हेतुव।दभ्रसङ्गात्‌ । यस्य द्रव्याययुपादानफलेन सम्बन्धः स 
चेदुपादीयेत, तननिहैतुकमस्थपादाने स्यात्‌ । अन्यस्योपादातुरमागात्‌ । न 
हि पटः पटेनेवोप।दीयते । अन्यस्य ह्यन्यदुपदेयम्‌ । उपादात्रन्तरतम्भवे हि 
तदनवस्थाप्रसत्तः, सोऽ्यन्येनेपादीयते सोऽपि चान्येनेति॥ ` 


कि च--पाराध्यप्रसङ्गश्च | अन्यस्य. हि हैतोरन्यदुपादीयते, सत्वा दि. 
क्षणस्य प्रघानस्योपादाने पुरूषो हेवुरम्युपेयत, यथा पेटाय मृषिण्डपादने 
कुरुखो हेतुः । स चेपपुरुषः प्रधनोपादयनदेतुः प्रधानवदुपादीयेत, तस्यापि 
सच्वदिधर्मतवं स्यात्‌, उपदेयत्वान्रविण्डवत्‌ । ततोऽस्य प्रधानस्य निरहैतुक 
कायाथैपुपादानं प्रप्नोति ॥ 


अथेश्च(रथमुपदेयः, पुरुषाणां वा प्ररस्पराथैमिति चेत्‌, मोग्यत्वा- 
चेतनत्वपरिणामिखादिदोषसामप्री पसञ्येत, तस्मान्पि प्रधानध्मकरः पुरुष 
इ्युषादनि च हेतुवादग्रसङ्ग इत्युच्यते ॥ | 

तदुक्तम--दैतुस्वपुरुषो भवतीति । तस्य चेपादनि अहेतुः प्रधान- 


वृततिरनिरहैतुक्रौ स्यात्‌ । न च स्वय स्वाथ शक्यं विज्ञातुम्‌ | प्रकाशादिषु 
स्वायत्वादरोनात्‌ ॥ 





॥। ५ यो, सू ५ पा 2, मू 9 1, 


कि कष्य, हि 
साधनपादा दतायः १७१ 


[ भष्यम्‌ | 
तदेतच्छाक्लं चतुव्यूहमिलयभिषीयते-- 
कि [ सूत्रम्‌ ] 
हेयं दुःखमनागतम्‌ ॥ १६ ॥ 
[ भाष्यम्‌ }) 
दुःखमतीतपुपभोयेनातिवाहितं न हेयपक्षे वतेते । वतमाने च 
स्वक्षणे मोगारूढमिति न तक्षणान्तरे देयतामापघते । तस्माचदेवानागतं 
दुःखं तदेवाक्िपात्रकस योगिने ्िश्नाति, नेतरं प्रतिपत्तारम्‌ । तदेव 
हेयतामापचते ॥ १६ । 
[ विवरणम्‌ |] 
उमयप्र्ाल्याने दहेयत्गषदेयवप्र्याल्यने । शाश्वतवादप्रसङ्ः 
आत्मनित्यत्वादग्रसङ्गः । यथपि प्रधानस्योपदेयस्यापि शाश्वतल्वै, तथाऽपि 
विकारासना तदशाश्चतमेव | अनेकाःमकल्वमश्ुचित्वमविधास्वं परार्थ्वभिलेव- 
मादयो दोप्राः प्रधनि । पुरुषाणामपि तथव्वे सत्यनिर्मोक्षप्रसद्कः । 
बन्धमोक्षयेस्तद्धेखेश्च विद्याविचयोः स्वरूपाग्यतिरेकाद्न्धपुक्तयोश्च निर्धशेषल- 
प्रसङ्गात्‌ । तस्माद्ेयोपदेयलप्रवयास्यानेन शाश्वतवाद्‌ इदेतदेव 
सम्यग्दरौनम्‌ ॥ १५॥ 
यथा चिकिरस्यन्यतिरिक्तिरोगादिचतुष्टयमन्तरेण चिकिस्सादास्त्रमारोग्य- 
प्रयोजने चतु्यूहं न संभवति, तथेदमपि हतृस्वरूपन्यतिरिक्तदहेयादि- 
चतुष्टमन्तरेण सम्यग्दर्नशाखरं हा नफठं चतुव्यूहं न पम्भवतीरि, हेयदि- 
चतुषटयप्रतिपादनेन तदेतच्छास्चं चतुव्यूहमभिधीयते ॥ 
कथम्‌ ? हयं दुःखमनागतम्‌ । दुःखमतीतम्‌ अतिक्रान्तं, वतेमानाजन्म- 
नोऽतिक्रान्तजन्मलक्षणं दुःखं, तदुपभोगेनातिवाहितम्‌ अतिनीतं न हेयपक्षे 
वतते ! स्वयमेव हीनघात्‌ ॥ 
वर्तमानं च यजन्मलक्षणं दुःखम्‌ स्वक्षणोपभोागारूढम्‌ स्वे वर्तमाने 
भोगविशिष्ट क्षणमष्वानमुपमुञ्यमानासमकतवेनारूढं तत्‌ दुस्तं तन क्षणान्तरे 
हेयतामापद्यते । सखरयमेव भोगेन हीनं न हानाय क्षणान्तरमपेक्षते ॥ 
तस्माद्यदे वानागत प्रायणानन्तरभाविजन्पदुःखलक्षणे दुःखं तदेवाक्षि- 
पात्रकल्पं योगिनं हिकश्वातीति तदेव हेयं सम्यग्दर्शनेन हानीय्ुच्यते । 
भविष्यन्न्मामावायेव यतितव्यम्‌ । न वतंमानदुःखनिरेधाय ॥ 


१७२ पातञ्जख्योगतुत्रभाष्यविव्रणे 


{ माष्यम्‌ ] 
तस्मादेव हेयमिल्युज्यते तस्यैव कारणं प्रतिनिदिश्यत-- 
सूत्रम्‌ । 
भ क _ > ण, च 
द्रष्दश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥ १७ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 


(4 ०७, 


द्र बुद्धः प्रतिपवेदी पुरूषः। स्द्याः बुद्धिसतोपारूढाः से धमौः। 
| विवरणम्‌ | । 
वर्तमानजन्मयियतिषायां हि सम्यग्द्ङनमश्क्यविनियोगत्वादनर्थकं 
स्थात्‌ । मुक्तबाणवत्‌ प्रबृत्तफटलवाद्रतमानदुःखस्य । भविष्यति पुनरभ्रवत्तताद्रौज- 
निरोध उपकल्पत इति सम्यग्दर्शनार्थवम्‌ । स्वविषये हि सम्यग्दरेनस्य 
स हति ॥ १६ ॥ 


तदेतच्छान्ं॑चतुव्यूहममिधीथत इच्युक्तम्‌ । रकश्वतु¶ व्यूहः 
प्रतिपादितः हेयं दुःखमनागतमिति । इदानीं द्वितीयो व्यूहः तस्य दुःखस्य 
कं!रणे, हेतः प्रतिनिर्दिश्यते ॥ 


+ % भो, 


ननु निर्दिष्टमेव दुःखकारणमिति, तथेवेपसहतमन्ते--तस्यैतस्य महतो 
दुःखप्तमुदायस्य प्रभवधीजमविद्येति । सत्यमेवम्‌ । किन्तु दुःखस्वरूपमात्र 
तत्कारणस्वरूपमत्रे च पूत्ै निर्दिष्टम्‌ । न च तच्छ्वरूपमत्रे, इति तत्कारणं 
निर्दिर्पते । द्रषटद्श्ययोः सेयोगो हेयहेतुः ॥ 

दर्टा च द्यं च द्रष्ये । तयेग्रष्ुदर्थयोरिति । द्रषदर्यसयोग इति तु 
वक्तव्ये पथत्िमक्तिग्रहणे तयेभिन्नजात।यत्वह्यापनाथम्‌ । मेक्तृमोम्ययोः 
स्वस्वामिनोः प्रधानपुरूषयोरिति वा सूत्रितं शक्यत एव॒ । तध।पि द्रषटद्द्य- 
प्रहणमनन द्रष्स्येनैव संयोगो नान्ययेद्येवमथम्‌ ॥ 

द्रष्टा बुद्धः प्रतिसंवेदी पुरषो वक्ष्यपाणलक्षणः | प्रतिसंवेदितुं शौरमस्य 
स॒ प्रतिवेदं । कस्य बुद्धेरिति । दृश्या बुद्धिः अन्तःकरणं प्र्मयख्येण ॥ 

ननु च शब्दादयोऽपि विषया द्ृर्या एेव्यत आह- स॒च्वोपाहूढ।; 
स्वे धमः शब्दादयो शुद्धिसच्मुपारूढा वुद्धिप्रल्ययाकारा एव दृश्या न स्वतः | 
स्वतश्च दृरयतस्रे ज्ञाताज्ञ।तविषयलं पुहरस्य स्यात्‌ । सद। ज्ञातविषयत् च 
पुरुषस्य न्ययन स्थाप्यते । तस्मादबुद्धचुपाखूढा ए स्वै धर्मी दयाः. ॥ 


साधनपादो हितीयः १७६ 


[ भाष्यम्र । 
तदेतद्‌ च्दयमयस्कान्तमणिकरस्पं स्निधिमात्रोपकरारि स्श्यतेन स्वं 
भवति पुरुषस्य दृशिरूपस्य स्विनः, अनु भवकमैविषयतामापन्नं यतः । 
अन्यस्वर्मेण प्रतिरन्वासमक स्वतन्त्रमपि प्राथैत्वासरतन्तम्‌ । 
तयोरग्दशेनशक्त्योः अनादिरथेङृतः संयोगो दहेयदेतुः, दुःखस्य 
[ विवरणम्‌ |] 
तदेतद्द्दयमयस्कान्तमणिक्रल्पम्‌ अयसोऽपि क्रियाधनेवोपकतीऽय- 
स्कान्तमणि्य॑या, तथा पुरष्य पुरुपरा्थेन द्विविघेन मोगपवरीलक्षणेनेपिकवृला- 
दयस्कान्तमणिरि स्वं दरिषूपस्य चितिष्ठरूपमात्र्य घ्वामिनः ॥ 


कथं स्वमिल्यत आह --कमविषयखमापन्नं कैव विषयः कर्मविषयः, 
करमतरापत्तिरेव । विषयो द्चिरूपस्य दृरयतामापन्न इयेतत्‌ । कथम्भूतं सत्कर्म- 
वरिषयतामपि्त इति तद्िरेषणा्थमाह - अन्यस्वरूपेण प्रतिरुन्धासमिति॥ 


अन्यस्वखूपेण स्वपरपुरुषरूपेण शब्दादिषूपेण च प्रतिरन्धात्कं प्रति- 
ग्धविरेषद्पे प्रतिटन्धपुरुषशब्दादिविशेषस्वभावे पुषूषस्वखूपेण छम्धासकं 
सदुद्रेयसरेन क्मेतामापनमपवगंर्थन स्पे मवति । शब्दा।कारेण रूरघा्मकं 
सद दश्यलेन कमतामापन्नं मोगाथन स्वै भवति ॥ 


ननु कथं स्वतन्त्रस्य स्वत्वम्‌ | न हि किश्चित्‌ स्वतन्त्रं स्वयं भ्याप्रिय- 
माणमन्यदपन्षते.। यदपि स्वभ्यापारानुनिष्पादिपुरुषाधस्य, तदपि स्वभावदिव । 
न॒पुरूषरनियोगकारि । तस्मात्‌ स्वतन्त्रस्य सतः स्वल न युक्तमिव्यत आह--- 
सवतन्वरमपि पुरुषाथद्ययकवेतेन प्रायेलात्त्‌ प्रतन्त्रम्‌ । ततश्च स्मेव ॥ 
` तयोृग्दशेनशक्व्योरिति । दषट्दययेसिधयुपक्रम्य इदञ्चनराक्त्योर्तयुप - 
सहारः, बुद्धिपुरुपंग्रोस्य बुद्धयुघ्पस्यनन्तरमात्रित्वादादिमच्वमाशङ्कुथ तदना- 
दिमचग्रदरीना५॑क्रियते । दग्दरनशक्ल्योर्नारिः सेयोगः । धर्मिणां 
निललात्‌ निव्यतम्बन्धोपपततस्तच्छकतयोरपि दषटृद्दयतलक्षणोऽनादिः सेयेगोऽथै- 
कृतः पुरुषाथप्रयो नवश इत्यथः ॥ 
तथ। च प्तद्यनादिषरेऽपि प्रयोजननिवृत्तौ सयोगनिवरतिरुपपचते । 
धमिणा तु स्वरूपक्तयोगः सत्तामत्रेण न प्रयोजनक्कन इति निल एत्र । धर्म- 
मात्राभिस्वनिलाभिरनियः संषोगः । स तु वबुद्धिपुरुपयेगो देयहेतुः 
दुःखस्य कारणम्‌ ह्यधः ॥ 2 


१७४ पातञ्ञङ्योगयूत्रभाष्यविवरणे 


[ माष्यम्‌ ] 
का।रणपरिल्थैः । तथां चोक्तम्‌ “^तत्पंयो गहेतुविषजनात्‌ स्यादय. 
मान्ति दुःखप्रतीकारः । कस्मात्‌ ? दुःखदेतोः परिहार्यस्य प्रतीकार 
द्दीनात्‌ । तचथा- प्रादतरस्य भेदयता, कण्टकस्य भेतततवं, परिहारः 
कण्टकस्य पदाऽनयिष्ठाने पादत्राणव्यवदहितेन वाऽपिष्ठानम्‌ , श्एतद्यं यो 
वेद रोके स तच प्रतीक(रमारममाणो भेदनं दुःखं नाऽऽप्रोति । कस्मात्‌ ? 
त्रिखोपरुभ्धिसामर्ध्यात्‌' इति । अत्रापि तापकस्य रजसः सत्वमेव तप्यम्‌ । 


~~ 


[ विष्ठरणम्‌ ] 
तथा चोक्तं तन्त्र तस्यो गहेतुविवर्जनात्‌ तयेोद्द्धिपुरुषयोः 
पयोगस्तस्य हेतुरतविधा तद्विवजैनात्‌ । कथे विवजंनम्‌ ? प्रि्य। सम्प्दश्चनेन 
तद््रतिपक्षेण निवतनात्‌ । तस्मात्तत्तयोगहेतुविवजेनात्‌ आलन्ति को ऽतथन्ताय 
प्रमवति दुःखप्रतीकारः । कोऽसौ? यत्सम्यगदर्िम्‌ ॥ 


कथमेतदिति, प्रसिद्धं॑द््टन्तमाह--तथा--पादतरप्य मेता 
ुकुमारतरत्वात्‌ । कण्टकस्य मत्तं कर्कीरास्वभावत्वात्‌ । तत्सथेगो विशिष्ट 
दुःखदे त॒रिव्यथतिद्धम्‌ । तत्र कण्टकन्ययादुःखस्य परिहारः कण्टे पदा 
पादेन अनधिष्ठानम्‌ अनाक्रमणम्‌ | अथाधिष्ठानक्रारणं चेदस्ति पादत्राणव्यव- 
हितेन वा पदाधिष्ठानम्‌ । एतद्द्रयं यो वेद मेघमेत्द्रये परिदारदयं 
वायो वेद लोके सरतत्रान्यतरं परिहारमारमते । स तत्र प्रतीक्राए्मारमपाणो 
मेद्जं वण्टकरमेदजनितं दुःखं नप्रोति ॥ 


तयेहपि पुरुषः सचढेण कण्टकस्थानीयं प्रधानम्‌, तयोव्िंशिष्टः 
संयेगोऽविद्यानिमित्तो दुःखकारणम्‌, दुःखपरिहिरेऽध्ययम्‌--गुणगीणेम्यः 
प्रधानमात्नविशेषभ्यो ददयेभ्यो निरपेक्षता, सम्यग्दर्शनेन प्रयोजनामावं ब्ुभ्दूवा 
पुरुष्याविक्रियत्रात्‌ कण्टकािष्ठानवच्छरीरारम्भिणो वा कर्मणो नियतवेदनी- 
यत्वादवर्ये फल्दायिखं बुदष्वा अप्राथितोपनतानां राब्दादीनां सम्दग्दर्न- 
यत्राहितिन सघ्वेन भोगः । एत्र परिहारे सन्नानानः कण्टकरभददुःखपरिहरमिव 
संसारदूःखे नप्रात ॥ 





1. प्ञ्चश्खेन। 
2. एतततूग्र इति पाठान्तरम्‌ । 


साधनपादो द्वितीयः १७५ 


[ भाष्यम्‌ | 
कप्मात्‌ १ तपिक्रियायाः कर्मस्थतरात्‌ । सत्वे कर्मणि तपिक्रिया 
नापरिणामिनि निष्कि क्षेत्रज्ञे | दर्ितत्रिषयल्रात्‌ । सखे तु तप्यमाने 
तद।कारामुरोधी पुरषोऽप्यसुतप्यत इति ॥ १५ ॥ 
ददयस्वह्पमुच्यते- 


[ विवरणम्‌ ] 
क्मदितदेवमिति ? त्रित्वोपरम्बिसाम्यत्‌ । भ्रधानपुरुषसंयोग- 
्रितवोपग्धिसामध्यौत्‌ । एवे हि विज्ञानस्य साम्यं दर्यते, पादतख्कण्टक- 
तस्तयेगिष्वन्ञानस्य च त्रित्ानुपरब्पेदुःखहेतुसवं दृदयत एव ॥ 


एतमर्थं प्रचि्यापयिषन्नाह । अत्रापि तापकस्य रजतः । यथपि प्रधानं 
कण्टकस्थानीयं॑तपके, तथापि रजसो दुःखामकतवाद्रजेद्रीरेणेव प्रधानस्य 
तापकत्वमियुब्यते-- तापकस्य रजस इति । तस्य रजपः कमभूतं स्वमव 
तप्यम्‌ ! कस्मात्‌ १ चिदिकरियावत्तपिक्रियायाः कर्मस्थतात्‌ । कर्मणि हि 
तपिक्रिया वतते, न रजक्स्तापकस्य विषरयिणि पुरषे । ततश्च फटस्य 
पुरुषविषयत्वात्‌ ॥ 


न॒हि परञ्युछेत्तरि स्वालनि वा. वतेते चछ्िदिवा फं, विषय एव 
छेये काष्ठादौ । एवं पुरुषस्येव ततिः कर्मणि स्वे वतमाना फं, रजश्च 
का्ठादाविवि परञ्च: सल एव पुरुषस्य दृश्ये वतैते ॥ 


इतश्च पुरुषे तपिक्रिया न वतेते । अपरिणिामित्वात दष्टः । तपिशपि 
हवि कर्मत्िक्रिया । यथा छेदनस्य फठं ठेधस्य कर्मणो दैधीमवो विक्रिया, 
तद्रत्‌ । नाप्रिणापिति निष्क्रिये क्षेत्रज्ञे । अपरिणामिले च सद ज्ञाततरिषय- 
त्वेन साधयिभ्यति ॥ 


रेवं ` पुरुषरशचेन्न तप्यते पुरुषाय प्रधाने प्रवर्तत हयेतदनुपपन्नम्‌ । 
वृत्तिारुप्येणोक्तो ्तरत्वात्‌ । तदेवेदमुच्यते-द रितविषयत्वात्‌ । अपरिणामिनोऽ- 
विक्रियतवादर्शितविषयखम्‌ । तसमादृहशिकर्मणि सत्वे तप्ये तदाकारानुरोषी 
तदाकारानुबतीं । तदाकारानुरोधित्वं तदुदृशिसन्निधौ वैद्धस्य प्रव्ययस्य 
दृरिषूपावमासता । यथा लक्षारससन्निधौ स्फटिकस्य खक्षाकारात्रमाक्तता, 
तथा पुरषोऽपि तप्यत इ्युपचर्यते ॥ १७ ॥ 


१५६ पातज्ञख्योगसूज्नभाष्यनिवरणे 


[ सूत्रम्‌ | 
प्रकाशक्रियास्थितिशीरं भूतेन्द्रियात्मकं मोगापवगौर्थ 
दइयम्‌ ॥ १८ ॥ 


( भाष्यम्‌ ] 
प्रकाशरीर सतम्‌ , क्रियाक्षीर रजः, स्थितिशीडे तम इति। 


 [ विरणम्‌ ] 
दश्यस्वरूपमुव्यते । ननु च द्रष्हस्ययोसिुकतं पूरसत्रे । तत्र 
करयग्राप्तसननिधानं दृषटस्वरूपतेव पूर्व वक्तत्यम्‌ । नैष दोषः । दृदृयस्वरूपावगम- 
पूवेकत्वादूदरृखरूपावयेधस्य । दृदयस्य हि स्वासन्यतिरिकिदरषटूतवा्यतिरिक्त- 
द्रष्पद्वाविद्धिः । अत एव ॒प्राध।न्यात्‌ पृवैसूत्रे द्रष्टः पूरषेनिपातः कृतः । 
तद्क्षणे स्वथक्रमो विवक्ष्यते ॥ 


प्रकाशक्रियास्थितिरीरं भृतेन्द्रियात्मकं मोगापवर्गाथं द्ड्यम्‌ । 
प्रकाशश्च क्रिया च स्थितिश्च प्रकाराक्रियास्थितयः | ्रकारा्याभ्यहित्तात्‌ 
पृश्रनिपातः । बहुषु चानिषमात्‌ स््थितिक्रियारब्दयोरनिथम इति क्रियाशब्दस्य 
पूवनिपातः । ता ए रीर यस्य तथ्रकाराक्रियास्यितिशीलम्‌ । प्रकारानं प्रकाराः, 
स॒ रशीरं यस्थ तत्‌ प्रकारशीठे सच्वम्‌ । नयु च यदा प्रकाशनं क्रिया, क्थ 
तच्छीरं सच स्यात्‌ ए रजो हि तच्छीक, स्थितिशीलं वा तमः कथमिति ॥ 


ननु च स्वरूपमेव तस्प्रकाशनं स्थितिश्च । न | स्वरूपमत्रे शीठशाब्दा- 
योगात्‌ । न हि पृदङ्कशीलो मदङ्गिकः । मृदज्गवादनशीरो हि स उच्यते। 
न हि भ्यापारशन्य कषचिदपि शील्दन्दः भ्रयुञ्यते ] 


ननु ` च स्थितिप्रकाशावपि सचखतमसो; स्वरूपम्‌ । तदेतेनैव गम्यते 
सस्ये शीटराब्दः प्रसंक्ष्यत इति । उच्यते-न सरूपे सवत्र शीटशब्दप्रयोगः ) 
इहापि रजप्ति दुःखस्वूपे नरियारीटमिति क्रियया सम्प्रयुज्य रीठरान्द- 
व्यपदेशः । स्थितिप्रकाशपि व्यापारह्पावमिप्रतो ॥ 


अथ मतं क्रियापि रजसः खरूपमेत्ेति-न-प्रधानव्रस्यायां साम्यभ्युप- 
गमात्‌ गुणानाम्‌ । यदि क्रिया रजसः स्वरूपममत्रिषयत्‌ प्रघानस्यापि क्रिषावक 
गुणसतम्यावस्थायाममत्रिष्यत्‌्‌ । काय्रप्यार्या ई क्रियवस्मभ्युपाम्यते, न 
प्रधानवेखयाम्‌ । तस्मान्न स्वदूपाभिप्रयेण शीख्शब्दग्रयोगः ॥ 


॥ 


साधनपदों द्वितीयः १७७ 


{ भाष्यम्‌ ] 
एते गुणाः परसरोपरक्तमविमागाः परिणामिनः सेयोगवियोमषमीणः 
इतरेतरेपात्रयेणोपाजितमूर्वयः "परषरङ्गङ्गिखेऽप्यसम्मिन्नशक्तिप्रवि मागाः 
| विवरणम्‌ ]] 
तत्राक्रियारील्योरपि सखतमसोर्निलयं क्रिया्चीडेन रजा सयोगाद्रजः- 


क्रिथयेत्र॒क्रियाव स्थितिप्रकाशयोरपीति तक्कियोपचरिण प्रक्राशश्चीरं 
सखं॑स्थितिश्ीकं तम इति व्यपदिदेयते । स्थितिप्रकाशयोरास्मखामस्य 


रजः क्रियापृतैवाचलतेरेतरामिग्यक्तेस्ताच्छील्यं सखतमसेरुष्येत ॥ 


तत्र प्रकाशश्ीर यत्तपससम्‌ । क्रियाशील प्रवृत्तिरीर रजः । स्थितिक्ीठं 
वरणरीटं नियमं तम इलेते गुणाः परस्परेपर््त्रविमागाः -परस्परेणोप- 
रक्तः प्रतिमे मेदे येषां गुणानां ते परस्परोपरक्तप्रमिमागाः ॥ 


| यथा प्रकाशशीटमिति सस््मुच्यते ऽत्रैव । रजःक्रियेपरञ्ननात्‌ सर्वा- 
वभापप्तमर्थस्यापि सत्रस्य नियतप्रकाशघे तमउपरक्ततेन । तथ। रजसोऽपि 
्रदृच्यभिन्यक्तिः स्ोपरागेण । नियतप्रदृत्तिवं तु तमउपरगेण । तथा 
तमसोऽपि स्थिघ्यमिभ्यक्तिः सत्वोपरागेण । स्थिति्ीरत्वं रजउपरगेण । 
स्थितिस्तु खत एव । रजसोऽपि प्रवृत्तिः स्वतः | सच्रस्यपि प्रकाशः स्वत 
एव । ह्यमेवान्येष्वपि कर्य सतादीनामितरेतरोपरमेो द्रष्टव्यः ॥ 
संयोगविथोगधमीणः। संयोगश्च वियोगश्च संयोगवियोनौ, तौ ध्न येषां 
ते संयोगव्ियोगधमाणः । करिमिथित्‌ कायं आरम्यमाने गुणप्रधानमविनान्येोन्यं 


ज 


सयुञ्यन्त । तथवरारञ्धकायविरोधिधर्मान्तरोदये परस्परं षियुञ्यन्ते ॥ 


इतरेतरोपाश्रथणोपारजितमूतयः - महदादिस्तम्बपर्वन्ता मूय इतरेत- 
रोपाश्रयेणोपार्जिता धर्मधर्मिलक्षणा यैस्ते इतेरेतरोपाश्रपेणोपार्जितमूर्वयः ॥ 


प्रस्सरतो भिन्ना भपि-- परमारथतोऽन्योन्यतोऽन्येऽपि । भपम्मिन्त- 
शक्तिप्रविमागाः--अखन्तं व्याव्ृत्तकार्यारम्भामिमुष्यसामर्थ्यप्रमेदाः ॥ 


1. प्रसरतो भिन्ना अपीग्ति विवरणाभिमतो माध्यपाठः| 
23 


१७८ पातञ्ञखयोगसूत्रभाष्य विवरणे 
[ भाष्यम्‌ 1 


तुत्यजातीयातुर्यजातीयराक्तिभेदानुपातिनः प्रषानवेखायामुपदरितपन्नि- 
धाना गुणखऽपि च व्यापारमात्रेण भ्रधानान्तणीतामुमिरास्िताः -परुषाथ- 
केव्यतया प्रयुक्तपसामध्याः सन्निषिमत्रोपकारिणोऽयस्कान्तमणिकलाः 
प्र्यमन्तरेणेकतमस्य वृत्तिमनु वतमानाः प्रधानश्चज्दवान्या भवन्ति । 


[ विवरणम्‌ ] 


एतदुक्तं मवति--एक्मिन्‌ कार्थं आरन्धन्येऽखन्तन्यतिषक्तपरस्पर- 
दाक्तयः काय॑रम्भकाले प्पृथक्ेनानुपरक्ष्यमाणराक्तिभ्रविभागा इति ॥ 


तुस्यजातीयातुस्यजातीयशक्तिमेदानुपातिनः । साखिकान। सं 
तुल्थजातिः, राजप्तानां रजस्तुल्यजातिः) तामस्तानां तमे इति च । परस्परापेक्षया 
तु मिन्नजातीयत्रम्‌ । तुल्यजातीयातुल्यजातीयानां शाक्तिप्रभेदमनुपतितुं शीरं 
येपां ते तुल्यजातीयातुस्य गतीयशाक्तिभरभेदनुपातिनः । न हि साछिके वा 
राजसे तामे वा प्रारन्धन्यस्य त्रयाणां राक्तिप्रभेदानुपातमन्तरेण कयीरम्भः 
सम्भवति ॥ 


ययेवं सवैराक्तिप्रमेदानुपातिसरदेकेकस्य कायारम्भे तुल्यं प्राधान्य 
मित्यत आह- प्रधानवेखायायुपदर्शितसन्निषानाः सथ । एकैकस्मिन्‌ प्राधान्येन 
स्वकायारम्भिणि तत्का इतरयोरपि सनिधानमुपसजंनभवेनोपदितमिति 
प्रधानवेलायामुपदितसन्निधानाः । न हि सरवैषां युगपत्‌ ` प्राधान्यम्‌ । 
समप्रधानले हि प्रधानमेव भवेयुः, न कार्यरम्भित्वम्‌ ॥ 


अयेो्यते-कथ पुनकस्मिन्‌ प्राधान्येन कायौरम्भिणीतर।स्तित्रमवगम्पत 
इति । तदुम्यते- गुते चोपपर्जनभवे च व्यपारमत्रिण प्रधान उपच्कष्य- 
माणेन व्यापासमत्रेण । प्रघानान्तर्मीतिन न दहि प्रधानस्यान्तर्नातो व्यापारः 
इतरयोरुपसजेनमविनातजिधाने सेभविभ्यतीति प्रधानव्य।परिणानुमितास्िलाः॥ 


1. प्रधानान्तर्नीतिनानुमित।स्तित्वाःः इति विवरणाभिमतो भाष्यपारः। 
2, अत्र आदशकोशे "पृथक्त्वेनानुपः इयतदुपरि भ्व तत्छाल्प्यमादर्ितं" 
दत्यादिः अत्र (192) पुटे सुद्रितो भ्रन्थः उपलभ्यते । तस्यानन्बयात्‌ आदर्चकोक्षे 


(६5) पुटानन्तरं छिखितः "लक्ष्यमाण” इयादिभ्न्यो योजितः ॥ 


साधनपादो हितीयः १७९ 


[ माध्वमर ] 
एतद्‌ रर्यमित्युच्यते । 
तदेतद्मूतेन्द्रियात्पकं भूतमावेन पृथिव्यादिना सूष्ष्मस्थूठेन 
परिणमते । तथेन्दरियमवेन श्रोत्रादिना सुक्षमध्यूलेन परिणमत इति । 


तत्त॒ नाप्रयोजनम्‌, अपि तु प्रयोजनमुररीक्ृय प्रवतैत इति, 
भोगापवर्गार्थं हि तद्च्श्यं पुस्षप्येति । तप्ष्टानिष्टयुणस्वरूपावभषारणम- 
विभागापन्नं भोगः | 
[ विवरणम्‌ ] 
पुरपा्थेतिकरतव्यताप्रथुक्तप्रामथ्यीः पुरुषार्थो भोगापवरगौ तस्येतिकर्त- 
ग्यत। यथा यथा अथनिष्पत्तिस्तथा तथा प्रयुक्तं कायारम्भं प्रति साम्यं येषांते 
पुर्षार्थतिकतेव्यताप्रयुक्तसामथ्याः ॥ 


सन्निधिमात्रोपकारिणः विकारप्रल्ययदूपसन्निधिमत्रेण पृरुषस्येप- 
ुर्वन्तीति सन्निधिमात्रोपकारिणः । अयस्कान्तमणिकल्पाः ॥ 


प्रययं वृति ज्ञानमन्तरेण एकतमस्य बसि स्थितिलक्षणां समतामनुवष- 
मानाः । प्रधानरब्दवाच्या भवन्ति । नैव त्रिगुणीन्यतिरेकेणान्य्रधानं 
नामास्ति | त ए गुणाः साम्यावस्था प्रधानैकरान्दाभिधानीयकं प्रतिपवन्ते | 
वेषम्यं मजन्तो विकाररन्दाभिधेया वृत्तिमन्तो भवन्ति ॥ 


एतद्‌ द्य मित्युच्यते । तदेतदृटरयं भूतेन्द्रिपासकरं मूतात्मकमिद्धिया- 
स्मकं च । कथं तद्‌मकतमिलह--भूतमावेन पृथिव्यादिना सृक्षमस्थूलेन 
सुक्मेण तन्मात्रेण स्थूदेन व्िरोषस्पेण । दिविधो हि भूतभावस्तन्मात्ररूपो 
वरिरोषरूपश्च । विपरिणमते स्थूटसूक्षमभावमापवते । इन्द्रियभावेनेन्दियरूपेण 
भ्रोततदिना सृक्षमस्थूठेन विपरिणमते । सकेणाहङ्कारखूपेण स्थूठेन 
्रात्रादिख्पेण ॥ 


ततु दर्ये नाप्रयोजनम्‌ । सर्वत्रैव प्रदत्तः प्रयोजनदर्शनातू । 
णपि तु प्रयाजनपूक्रय अङ्गाल प्रवतेते । कि. पुनंददयपरृत्तप्रयोजन- 
लाह मागापवरगाथं हि दृश्ये पुरुषस्य अम्नरादिप्रतिपत्तिवत्‌ ॥ 


१८० | पातञ्चल्योगसूत्रमाष्यविवरणे 
{ माष्यम्‌ ] 


भोक्तुः स्वरूपावधारणमपवमं इति । दयोरतिणिकतं भन्यश्यैने 
तास्ति । तथा चोक्तम्‌ “अयं तु संह त्रिषु गुणेषु कवष्वकतीरे 
च॒ पुरुषे तुत्यातुस्यजातीये चतुर्थे तच्कियासाक्षिण्युपनीयमानान्‌ 
सवेभावानुपपन्नाननुपश्यन्न दशेनमन्यच्छङते इति । 


तवेतौ भोगापवर्गौ बुद्धिकृतौ बुद्धवेव वतैमानौ कथं पुषे 
व्यपदिश्येते इति । 
[ विवरणम्‌ | 


कौ पुनस्तौ भोगापरवमीविव्याह- तत्ेष्टानिष्टगुणस्वहपावधारणम- 
विमागपन्नम्‌ इष्टानां अगरुचन्दनस्परशनदिलक्षणानां अनिष्टानां 
प्रतिकूलत्कानां कृपाणकण्टकादिस्परनखूपाणां गुणानां स्वह्पावधारणे 
स्वरूपावगमः स्वूपाध्यवस्तानम्‌ । तस्य विरोषणे अविभागापन्नं पुरुषप्रव्यये 
(नाय पुष इदं सखम्‌? इव्यविभागतां गतम्‌ । प्राप्तचेतन्योपग्रहरूपलरादोद्स्य 
प्र्ययस्य । स इत्थंभूतः पुष्षस्य भोग इव्यास्यापते ॥ 


तस्माद्धेोगस्वरूपद्भैद्वाव्‌ प्र्ययाद्धिविच्य तरपताक्षिणो दृशिरूपस्य स्व- 
रूपावधारणं मोकतृस्वरूपादवधयैमाणादुत्तरकाठमप्यपदृत्तस्य वरिरोषाभमावादपवमं 
इव्युष्यते । सवेद! स्वूपप्रतिष्ठो हि (तदा) स॒ इति । वृत्तिसारूप्यमितसत्र 
विदेष इति ॥ 


दयो मोगापवमयोरतिसिक्तिमन्यत्ततीये दशनं नासि । यावदविधा 
ता्रदिष्टानिष्टे स्त इति भोग ए | पुरषस्य सहेयानुपदियस्वरूपल्रात्‌ तदवधारणे 
कुतो भोग इति मोगरूपस्याविचाटक्षणस्य प्र्ययस्य प्रतिपक्षः प्रलयः पुर्षाव- 
धारणम्‌ ] यस्मदितदत शएतदरशंनद्यभ्यतिरेकेण तृतीयं दशोनान्तरं न कल्पयितुं 
राक्यत ॥ 


तथा चोक्तम्‌--अयं तु खस्वेवं सम्य्दशी त्रिषु गुणषृक्तलक्षणेषु 
कषु स्न्यापारनिवत्तिरेष्वक्रतैरि च गुणघमेविक्षणे पुर्वे चतुथे 
तच्छियासाक्षिणि गुणक्रियासुपद्र्टरि सन्धिक्रियासाक्षिभूतोपद््टवदुपानीय- 
मानान्‌ अन्तःकरणरक्षणैुणिः प्राप्यपाणान्‌ दरितविषयत्रात्‌ सवम।वान्‌ 





(+ 


1, पश्चक्िखन. 


साधनपादो द्वितीयः १८१ 


[ भाष्यम्‌ | 
यथा विजयः पराजयो वा योद्धृषु वर्तमानः स्वामिनि 
व्यपदिश्यते, स हि तत्फरस्य भोक्तेति, एवं बन्धमोक्षो 
बुद्धाेव वतमान पुरुषे व्यपदिश्येते, स दि तत्फरस्य भोक्तेति । 
युदधरेव पुरुषाथौपरिसमतिषन्धस्तदथावसायो मोक्ष इति । एतेन 
'ग्रहणधारणोदहापोहतच्वज्ञनामिनिवेशा बुद्धो वतमानाः पुखेऽध्यारोपित्- 
सद्धावाः, सर हि तत्फरस्य भोक्तेति ॥ १८.॥ 


[ विवरणम्‌ ] 
उपपन्नान्‌ गै णानेव बोद्धप्रव्ययाकरेण परिनिष्पन्नान्‌ पश्यन्‌ उपर्ममानो 
नाहं न ममेवेवं न दशषनमितेऽन्यत्‌ सम्भवति सम्यग्दर्शनमिति न शङ्कते । 
नास्येवान्यत्‌ सम्यग्ददानमिति मन्यते ॥ 
तावतो मोगापवगे बुद्धिकृतो बुद्धिनिषतिते बुद्धावेव वतमानो । 
भन्यक्रतस्याप्यन्यत्र वृत्तिदा यथा रजककृतो वक्नराग इति कथे पुखेभ- 


दिश्यते? इति तौ बुद्धवि्र वर्तमानौ पुरुषेऽपदिश्येते इति कुत एतत्‌ ? स 
हि तत्तरफटस्य मोक्तंति सम्यङ्मिध्याप्र्यययोरुपछग्धेति ॥ 


दृष्टान्तेन व्याख्यातमर्थं निगमयति-- यथा प्रिजयः पराजयो वेति । 
ुदधरेवार्थापरिसमापिरषन्ध इति । यावत्‌ समा कर्तव्यौ मोगाऽपवगीविति 
बुदधिर्मन्यते तावद्भन्धः । तद्थौवसायो मोक्षः । तस्या ए बुदधेरथवस्तायः 
कर्व्यसतमापिः । यदा आत्मविलश्षणं बन्धमोक्षापस्म्बन्धिनं पुरुषमीक्षते नास्य 
कर्तैन्यमस्तीति, स कतेन्यावसायो बुदधरमाक्ष इति ॥ 


एतेन प्रहणधारणविज्ञानोहापोदकरियाव्चनयथान्यायात्रषारणाभि-. 
निवेशाः पुरुपेऽध्यारोपितसद्भावा इति ज्ञेयाः । प्रस्यलाविंरेषात्‌ बुद्धिधमीः 
बुद्धावेव वतमानाः बुद्धितः; पुरषेऽध्यारेपितपद्धावाः पुरुषो गृह्णाति 
पुरुषो धारयतीव्येवमेव पुरषे अध्यरेप्यन्ते ॥ 


1. ग्रहणघारणविशनोहपोहक्रियावचनयथान्यायावुधारणामितिवेक्ाः" इति ` 
विबरणामिमतो भाष्यपाठः | ;` 


-१८२्‌ पातञ्जटयोगसूत्रमाष्यतिरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
दह्यानां गुणानां स्वरूपभदावधारणायथमिदमारम्यते-- 


[ सूत्रम्‌ ] 
विेषाविशेषरिङ्गमात्रालिङ्गा गुणपवौणः ॥ १९ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
तत्र॒ अआकाशवायवरन्युदकमूमयो भूतानि शब्दस्पररूपरसगन्ध- 
तन्मात्राणामविङेषाणां विशेषाः । तथा प्रोत्रखक्चक्षुजिह्राणानि बुद्धी- 
न्द्रियाणि, वाक्पाणिपादपायूस्थाः कमन्द्रियाणि, एकदे मनः स्वार्थम्‌, 
श्यतान्यसिमितारक्षणस्यातिरेषस्य विशेषाः । 


[ धिषरणम्‌ ] 


ग्रहणं शब्दादीनां श्रोत्रादिमिरपादानम्‌ । गृहीतानामविस्परणं धारणम्‌ । 
धघासिस्य सामान्यविदेषावधारणं विज्ञानम्‌ । विज्ञातस्येव पुनस्तद्रतविशेषाव- 
बुमुःसयोहनमुहः । उदितस्य व्रिरुद्धानां धर्माणां ब्युदस्तनमपोहः । विपये परबृत्तिः 
क्रिया । वाक्यत्रिषयो इृत्तिविरेषाशितस्य वचनम्‌ । यो यो न्यायो यथान्यायं 
यस्य च वस्तुनो यथैत्रोपपत्तिस्तयेवा्घारणं यथान्यायाव्रधारणम्‌ । तत्र पुनः पुनः 
--सम्यक्प्रलययात्रिंचलनाय यश्चिततस्याभियेगः सोऽभिनिवेशः । त एते म्रहणादयः 
पुरुषेऽभ्यरोपितसद्रागः । स॒ हि तर्प्य भोक्तेति प्रहणादिफरष्येप- 
र्भ्धेति ॥ १८ ॥ 


दद्यानां गुणानां यथाम्याल्यातात्मनां स्वरूपमेदावधारणार्थं तखा. 
वत्थामेदावध।रणायमिदं सूत्रमारम्यते--विेषातिरेषटिङ्गमात्रारिङ्गा गुण- 
पवौणः । विशेषाश्चाविरेष।श्च लिङ्गमात्रे चालिद्गश्च, न लिङ्गति, उुतश्चिना- 
गच्छति प्रधानाख्योऽथ इति पचाचच्‌_ स॑धतुम्य इति यैौगिकस्तन- 
भिषेयलिद्घं भजते | यो हि चिह्मपथायो लिङ्गशब्दः स. नपुंकलिङ्गः । स च 
करणप्ताधन इति । अथ व। खह्गं न विधते, टिन्गमवगमनं पर््किदः प्रयक्षेण 
प्रधानाद्धयस्यार्थ॑स्यासावणिङ्ग इति बरहर्बहिः ॥ 

ते च विषादयः पुरुषामिप्रायं पाख्यन्ति मोगापवर्गप्रदानेन, पूरयन्ति 
वा विकारान्‌ स्वानिति पिपरतेः (अन्येभ्यो दृद्यन्ते' इति कतरि वनिप्रल्ययः। 
त॒था च सति यननन्तिमकरैरि तन्नपुं्तकम्‌ । यत्तु नान्तर कतरि तत्सेलिनग 


साधनपादो ददितीयः १८३ 


भवति । यथा मेदश्च मेरुदृश्नीति । ततश्च व्िशेषादयः पर्वणः । केषां ते 
सम्बन्धिन इति £ गुणानां पर्वाणो गुणपत्रीणः । केपाचिदयमेव पाठे त्रिरषा- 
विशेषरिद्गमात्रारि्नानि गुणपकवौणीति ॥ 


तत्राकाशवास्व्चिजलमूमयो भूतानि । शब्दतन्मात्रारन्धमाकाडशम्‌ । 
सपर्शतन्मन्रेण शब्दस्पर्शलक्षणेनारग्धो वायु; | ख्यतन्मात्रेण श॒ब्दस्पशीरूप- 
ठक्षणेनारन्धोऽचिः । रसतन्मत्रेण शब्दस्प्चरूपरसचतुष्टयलक्षणेन।ऽऽप 
आरन्धाः । गन्धतन्मत्रिण शब्दस्पशंरूपरपगन्धपश्चतयरक्षणेन भूमिरारन्ध! ॥ 


ननु च निव्यमाकाश्चम्‌ , प्रायुतत्तर्विनारकाङं च विरोषामावात्‌ | 
यो य उत्पत्तिमास्तस्य तस्य पृधिव्यदेः प्रागुत्पत्तर्विनासे त्रके च विरोषो दृष्टः । 
तथ। आक्रादो यदुप्पत्तिमत्‌ स्यात्‌ प्रागुत्पततर्विनाशोत्तरकारं च भवेद्धिरोषः । 
न च सोऽस्ति । तस्माद।कारमनुत्पत्तिकम्‌ ॥ 


भधावकारादानामावरो विरेष्र इति चेन, मूर्तिमतोऽन्यस्यामावान्ुल्य 
निलत्रेऽपि । अनिव्यटक्षण।भावाच निलयमाकाराम्‌ , सर्वेगतत्वादाप्मादिवत्‌ ॥ 


न--आागमविरोधात्‌ । ' तस्मादा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः 
इ्यागमविरोषः । स्परतिविरोधश्च | अवकाशं कुर्वति तदुपचार इति चेन, 
वास्वदिष्वप्युपचागप्रसङ्गात्‌ । अक्रशाद्रायुः सम्भूत इल्येकवाक्यत्वात्‌ ॥ 


प्रागुखत्तेविंरोषाभाव।दानिल्यो न भृवतीति च चरुत्रता विरेषाभावान्निष्य- 
तमिव्युक्तं भवति । विरोषभावाच्ानिलयलमिदुक्तं मवति । तथा च सल्यापादी- 
नामपि बन्धमोक्षोपटन्ध्यनुपरन्ध्यादितरिरोषामावात्‌ सतो वैरोषिकस्य 
अनिष्यत्वप्रसङ्घः । तथा, परमाण्वादीनां चानिधघ्यतं प्रसञ्येत | 


अथाप्युत्पत्तिमत एव प्रागूरष्वं च विशेषमावामावौ विवक्षिताविति चेव्‌- 
न-आकारास्योत्पस्यम्युपगमप्रसङ्गात्‌ । अथाकारोत्पत्तिवादिना विशेषो वक्तु न 
दाक्यत हति चेत्‌--न--पुरुषायेप्ताधनाप्ताधनतविरिषाच्‌ । सर्वगतत्वादिति 
चिद्धो हेतुः ॥ 





१८४ पातद्लल्योागसूत्रमाष्यविवरणे 


अंसर्वगतानि काठदविगाकारामनांस्यनिद्यानि च स्वाथोभवे परात्वात्‌ > 
धटादिवत्‌ । उत्पत्तिमन्ति च, प्रधानपुरुषाम्यामन्यत्वात्‌ › घटादिवत्‌ | एवमाकश 
[उत्पत्तिमदनिवयं च| बाह्यन्धियविषयगुणत्वात्‌ , घट।दिवत्‌ । भूनलाच्च, प्रथिवी 
वत्‌ । जनिलद्रव्यक्तयोगोताचगुणत्वात्‌ , प्रयिन्यादिवत्‌ । चिरिरसानिवल- 
प्रकोपकरत्वात्‌ , वायुवत्‌ । नभसश्च प्रकोपश्चिकिस्सानिवतनीयशिकित्सक- 
प्रसिद्धिमुपाूढः । एतेनानिदयसाधभ्य व्यारयतम्‌ ॥ 


एतानि च भूतानि शब्दस्पशंरूपरसगन्धतन्मत्राणामविरेषाणां 
विशेषाः । शान्तघोरमूढाथनेक विरोषवच्ताद्विरोषाः । रान्तायमावाच्चाविशेषाः 
तन्मात्राणि ॥ 

तधा श्रोत्रसवर्चक्षु्जिहप्राणानि, शब्दादितिषयवुद्धथथत्वाद्बुद्धी- 
न्द्रियाणि स्वव्रिषय्ुद्िभियानुपितानि । वाक्पाणिपादपायुषस्थानिं 
क्मन्दरियाणि वचनादिक्रियानिर्वर्तकानि तदनुमितन्यिव । न वागादीनि 
कर्मन्दियाणि तिद्धा्नति चेन, श्रुतिभ्रसिद्धत्वात्‌ ¡ इन्दियाणि प्रकृ सर्वेषां" 
वेदानां वागेकायनम्‌? इलयादिश्तेः ॥ 


= $ (~ भ, 


स्मृतिषु च सृप्रत्रैव विधिप्रतिवेधविषयग्रदर्तिनिदृत्तिमसस्राच श्रोत्रदिवदि- 
न्द्ियत्वम्‌ । "न वाक्चपलो न पाणिपादचपडः' इत्यादेरविधिभ्ररिषेधविषयप्र 
षृ त्तिनिनश्र्तिगत्तपिदिः ॥ 


तथा, वागादीर्नाद्धियाणि, कोराख्वल्वात्‌ , चक्षुरादिवत्‌ । सर्वगात्रे 
पेन्दियशक्तिः करणद्स्याः सम्दर्शनादिष्यत एव । वागगुदप्रगरतीनां सर्पादीनां 


मूक्रषण्डनां च पुखमेवोपस्थेन्धियम्‌ । एकाद मनः सवौयमतीतानागतवर्त- 
मानविषयाग बुद्धाद्धियकर्न्दियविषयाधं च ॥ | 


एतान्थकादशेन्दियाण्यक्िताटक्षणस्य अस्मिमावोऽस्मिता अस्मीति 
्रल्मयः, स च रक्षणे यत्य सोऽस्मितालक्षणोऽिताप्रद्ययेन हि खक्ष्यते 
लिङ्गपते पष्ठमविरोषाछ्यं त्वमह ङ्क।रः । तस्याव्िशेषष्य विदोषा एतानि ॥ 


गुणानामविशेषाकारपंस्थितानां सत्वादानामेष पोडशको विरेषपरिणामः 
सप्वबहृटमाकारो, रजोबहुलो वायुः; सच्रजेबहृटोऽग्निः, [जलं च] । 
सत्तमोबहखा पृथिवी, प्राह्यघ्ात्‌ । तामस्षतवेऽप्येषां गुणप्रधानङ्ृते त्िरेषः । 





1, बृ, उप, 2.4. 11, ` 


1 


साघनपादो हितीयः १८५ 


[ भाष्यम्‌ | 
गुणानामिष पेाडशको विशेषपरिणामः ॥ 
षडविशेषाः । तद्था-- शब्दतन्मात्रे स्पद्ैतन्मात्रं रूपतन्मात्रं 
रसतन्मात्रे गन्धतन्मात्रं चेति एकद्वितरिवतुःपवलक्षणाः सन्दादयः प्श्वावि- 


क ऋ अ, क 


शेषाः । ष्टशवाविक्ेषोऽसमितामात्र इति ॥ 
एते सत्तामवरस्यासनो महतः षडविरेषपरिणामाः, यत्तयरम- 


विरेषेभ्यो -रिङ्गमात्रे> महत्तरं, तस्मतनेते सत्तामात्रे महयासन्यवस्थाय 


[4 [न्प 


विवुद्धिकाष्ठामनुमउन्ि ॥ 


प्रतिसंसज्यमानाश्च तसमिन्नेव ॒सत्तामाते महयासमन्यवस्थाय 
यतत ज्निस्सत्ताएत्तं निस्सद सन्निरसदव्यक्तम्‌िज्ग-परधानंः ठ स्मरति यानिि। 


{ विवरणम्‌ ] 


करणानि प्रकारात्वात्‌ स्वबहकानि, मनःषष्ठानि तु बुद्धीन्द्रियाणि प्रकर 
प्राधान्यात्‌ सच्बहुलानि । कम्द्धियाणि क्रियप्राधन्याद्रजोबहूलनि ॥ 


पडवि शेषाः । तचथा शब्द मातरं स्पदमात्रमिति दिलक्षणस्यापि प्रधनिन 
व्यपदेशः । तथा हपमात्रमिति त्रिरक्षणस्यापि प्रधनिन व्यपदेशः । तथेो- 
तरयोरपि मात्रशब्दः खान्तधोरादिविरोषञ्यावतेनार्थः । एक्वितरि चतुःपश- 
लक्षणमेदाः रब्दतछकलक्षणः शब्दतन्मात्रमेदः । रब्दस्पर्शलक्षणः 
रपातन्मात्रमेदः, इलेवमेकेकाधिक्यनेत्तरत्रापि द्रव्यम्‌ । षष्ठश्चाविशेष्‌)ऽ- 


सिमितामात्तः। शम्दादितन्मात्नपिक्षया षष्ठ इन्दियाणमेकादरानामविशेषः ॥ 


एते सत्वमातस्यास्तित्वमात्रस्य लिङ्गमात्रस्य मूर्तिमात्रस्य, 
प्रधानस्यामूतेस्य प्रथमा मूर्तिं यथा बीजस्याङ्कुरीमावः । भातमनो 
वस्तुरूपस्य महतः सर्वविरेषातरिसेरभ्यो महच्यात्‌ षृडविदोषपरिणामाः षडविरोष। 
९३ परिणामाः सचादीनां महदुपावस्यितानाममी भुविरेषपर्णामाः ॥ 


यत्तत्र सूक्षममविरेषभ्यो लिङ्गमात्रं महतखम्‌ , तस्िन्नेते सत्तामात्र 
महस्ान्महयवस्थाय कारणस्वरूपे महव्यवस्याय व्िव्द्धिकाष्ठां एथिभ्यादि- 
विरोषान्ततामनुभवनिति ॥ 

ध, 


१८६ पातञ्ञङयोगसूत्रमाध्यविवरणे 


[ भष्यम्‌ | 
एष तेषां टिङ्गमात्रः परिणामो निस्सत्तापत्तं चारिङ्गपर्णिम इति ॥ 
अरिङ्वस्थायां न॒ पुर्षर्थो हेतुः, नारिङ्घावस्थायामादौ 
पुरुषार्थता कारणे भवतीति । न तस्याः पुरषा्थेता कारणं भवतीति । 
नासो पुरषाथंकृतेति निलया आस्यायते ॥ 
त्रयाणां तवस्थागिरेषाणामरादौ पुरषा्थैता कारणे भवति । स 
चार्थो देतुरनिमित्तं कारणे भवतीलयनिया आख्यायते ॥ 
गुणास्तु सर्व॑धमौतुपातिनो न प्रलस्तमयन्ते नोपजायन्ते । 
व्यक्तिमिरेवातीतानागतन्ययागमवतीमियुणान्वयिनीमि रूप जननापायधर्मका 
इव प्रयवभापन्ते । यथा देवदत्तो दद्िाति । कस्मात्‌ १? यतोऽस्य 
प्रियन्ते गाव इति । गवाम॑व मरणात्त्य दद््रिणं न सवरूपहदानादिति 
समः समाः ॥ 
( विवरणम्‌ ] 


प्रतिस्चसृज्यमानाश्च प्रतिलोयमानाश्वाप्रिरेषाः तरिमन्नेव सत्तामत्रे 
रिद्गमात्रे महयास्न्यवस्थायार्व्येक्तं प्रति यानित । किंविशिष्टम्‌? निस्सत्तासतत 
विशेषाविशेषधमरहितम्‌ । निस्छदसिति अन्यक्तादीषद्रिकृतमिति सत्‌ , 
अविरेष्रेभ्यः सूह्षमतरमिति चासत्‌ , सचापसतच सदसदिति महत्त्वमुच्यते । 
तद्धभ॑रदितमब्यक्तं निस्सदसदिति ॥ 


एष तेषां गुणानां सचादीनां ठिङ्कमात्रः परिणामः यस्िन्नत्रस्थाय 
िच्द्धि काष्ठां प्रतिल्ये च प्रतियान्त्यविरोषाः । निस्पत्तासत्तं चन्धक्तं च यत्‌ 
स तेधमित्र गुणानामरिङ्गपरिणामः । परश्च न सुहमोऽवस्थान्तरपरिणामोऽस्ति 
गुणानाम्‌ 1 “सुष््मविष्यलं चारिङ्गपयेव तानम्‌" इति हि व्याख्यातम्‌ ॥ 


जचिन्गत्वदेवालिङ्गावस्थायां न पुरूषाय देतुः। अलिङ्गावस्यानिमित्तं न 
पुरुप्राथ हेतुः । नालिङ्गवस्या पुरुषराैप्रयुक्ते्यथः । तदेतत्‌ व्याचषे-- 
नालिङ्गवस्थायामादो पुरूषाथता कारणम्‌ । कस्मात्‌ पुनस्तदवस्या 
पुर्प्राथ॑प्रयुक्ता न मव्रतीति तत आह-यस्मान्नप्यां पुरुषायथेता 
कारणे विद्यते । स्वयमपि नासौ पुर्षा्थैता महदादिवदकष्ेववादीश्वराणामपि ॥ 





1. योर. बू.एा, 1. सृ, 45. 


साघनपादो द्वितीयः १८५७ 
[ भाष्यम्‌ ] 
लिङ्मात्रमरिङ्गस्य प्रयासन्न, तत्र तत्पसृष्ट विविच्यते करमानतित्रत्तेः। 


[ निवरणम्‌ | 


यश्चैतदेवं तस्मा्निया व्याख्यायते । यो हि पुरुषारथप्रयुक्तः सोऽनिल्यो . 
ट्टो यथा पृपिव्यादिः। न चैषा प्रधानावस्था पुरुषार्थप्रयुक्तेति निव 
व्यास्यायते ॥ 


त्रयाणां खवस्यावरिरेषाणां विरेषाविरेषलिङ्गमात्राणामादौ पुरषाथेता 
महदाचवस्या पुरुषाप्रयुक्ता । स चार्थः स च पुस्पयौ हेतुर्निमित्तं कारण. 
मियनिदा व्याख्यायन्ते महदावास्तिसे ऽवस्थाः ॥ 


गुणास्तु सर्वषरमानुपातिनः सर्वत्रिकारालुपातिनः । यथा सवैः प्रादय 
सर्पणङ्गुण्डल्त्वादिविशेषानुप्राती, तथा विशेषादितचानुपातिने गुणाः पिण्ड- 
प्रययानुपातिनश्च ` न प्ररीयन्ते नोपजायन्ते । ग्रथा सर्पः इुण्ड८।दिषे 
प्रयमनि न प्रीयते तदुपजने च नोपजायते तथत्र गुणा अपि । यथा च 
घटपिठएदिषु प्र्छयमानेष जायमानेषु च मृन्न प्रीयते नापि जायते ॥ 


गुणा व्यक्तिभिरेव पौमैरवतीतानागतव्ययागमवतीभिन्निलक्षणा- 
भिगणान्वयिनीभिरयुणोपादानकारणामिङ्षजनापायधरमक्रा इवो पत्तिप्रखयवन्त 
इव प्रययवभासन्ते न खद्येण विनद्यन्ति जायन्ते वा ॥ 


एतस्यता्थस्य दृष्टन्तमाह-- यथा देवदत्तो ददति । कस्मात्‌ 
येाघ्य अ्िपरन्ते गाव इति । गवामेव मरणात्तध्य दद्छ्िणे न स्वूपहाना- 
दिति समः समापिः वुल्यश्चचौ दृ्टन्तेन दाष्टन्तिकस्य देवदत्तददि।णवदेव 
गुणानुगत।भिन्धक्तेभिर्महदादिभिगुणविमदनवैचिन्यकृतामिर्विवर्धमानमिर्पुणान।- 
माढ्वता त््रल्ये च तेषां दद्णं, न स्वह्पेणापचय उप्रचयो ठेति तुल्यः 
समाधिरिति ॥ 


® 


तर्य प्रधानकर्यले सति व्रिरोषा अव्रिशेषा वा करमादनन्तरं 
नोपजायन्त इत तदाह-टिङ्गस्यालिङ्ग ॒प्रयासज्नं यथा मूढ वृक्षस्य प्रल्यापन्न 
रजि ससृष्टं मूटमेव प्रथमतरं विविच्यते) न बक्षस्ये।त्रावस्था | एवं तत्र 


१८८ पातञ्ञखयोगसूत्रमाष्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
तथा षडत्रिशेषा रिङ्गमात्रे संषृष्टा विविच्यन्ते परिणापक्रम- 
नियमात्‌ । तथा तेष्वविशेषेषु भूतेन्द्रियाणि संखष्ठानि विविच्यन्ते | 
तथा चोक्तं पुरस्तात्‌ । न विषेभ्यः प्रं तखान्तरमस्तीति विशेषाणां 
नास्ति त्ान्तसरिणामः । तेषां तु पर्मक्षणात्रस्थापरिणामा व्याख्या. 
पिष्यन्ते ॥ १९ ॥ 


[ भाष्यम्‌ | 
व्याख्यातं दृदयम्‌ । अथ द्रः स्वरूपावधारणा्थंमिदमारम्यते- 
सूत्रम्‌ ] 
दश दरिमादः शुद्धोऽपि प्रययानुपदयः ॥ २० ॥ 
[ विवरणम्‌ ]] 
प्रधाने तत्‌ टिश्गं संसृष्टं लीनं प्रथते विविच्परते अविर्मेवति नोत्तरे वरिरोषा 


विपरहृष्टत्रदेव । तदेवाह --क्रमानतिपृत्ेः क्रमानतिक्रमात्‌ । न हि रोके 
कस्यचिदुतथम।नस्य क्रमतिलङ्कनमस्ति ॥ 


तथा षडविशेष।; पूवोक्त लिङ्गमात्रे प्रलयासनवात्‌ सस॒ष्टवाद्ि- 
वच्यन्ते । कस्मदिलाह-प्रिणामक्रमनियमात्‌ । तथा तेष्वविरेषषु 
भूतेन्द्रियाणि । तन्मत्रे भूतानि संघृ्टानि व्ितिच्यन्ते । असिितामत्र 
इन्दियाणि मनस्सहितानि ॥ 


तथा चोक्तं पुरस्तात्‌ । न किहेषेम्यः भ्रागुकतेम्य आकाशादिम्यः 
प्र्‌ तचान्तरमस्ि । न विशेषाणामन्यस्तचान्तरपरिणाम इयर्थः | एतदेवाह- 
विशेषाणां नासि तखान्तरमिति । तच हि नाम साधारणं स्प्रणपाणि- 
मामहाप्रलयस्यायि । नेवंठक्षणं पथिग्यादिम्य उत्यथमानमन्यदस्ि । धभलक्षणा- 


वस्यापरिणामस्तु भवन्त्यवेति । तेषां तु विशेषाणां पर्मैटक्षणावस्थापरिणामा 
व्याख्यापिष्यन्ते तृतीयपदे ॥ १९ ॥ 


व्याख्यतिं दृदयम्‌ भवधृतं दृरयम्‌ । यदर्य च दरयते तस्येदानीं द्रष्टुः 
स्वरूपावधारणाथमिदभारम्यते- द्र हरिमत्रः शुद्धोऽपि प्रययातुपदयः 
द्रष्टा द्यस्य यथान्यास्यातूपस्योपडन्धा पुरुषः । तस्येदं रक्षणं दथिमात्रः 


साधनपादो द्वितीयः १८९ 


[ माष्यम्‌ ] 
दशिमात्र इति चक्छक्तिरेव वव्िशेषणापराग्र्टेयथेः । स पुरषो 
द्धः प्रतिसवेदी । स बुद्धेन सरूपो नान्तं विरूप इति ॥ 
[ विवरणम ] 
शुद्धोऽपि प्रययानुपदयशचेति । पुरस्तादाल्यातम्‌--^्तदा  द्ष्ः स्वरूपेऽव- 
स्थानम्‌" ध्वृत्तिपाूप्य मितर्र' इति च, तदेव द्वयमिह प्रतिपाधते ॥ 


यचे्त ° प्रतिसवेदी बुद्धः पुरुष इद्युपपादयिष्याम इति, तच्त्रोप- 
पाते । दरिदरोनुपरुन्धिस्तावन्मात्रो द्चिमाल्तः । यत एवं तस्मच्छुद्धः । 
दोऽपि सन्नप बद्धस्य प्रययस्यानुप्श्यः) दृशिमात्रल्रदिव । तस्मात्तमनुषद्यन्‌ 
तत््वह्पो मत्रि । दृशि सन्निधौ वृत्तेध्िस्वरूपावमा्तता दषटत्तिसारूष्यम्‌ ॥ 


टृसिमत्नप्येवाविक्रियासकस्य सतोऽस्य बैद्धप्र्ययानुदशयैनं यस्मात्त. 
स्माच्च स्वरूपप्रतिष्ठता च पिद्धा । प्रययानुप्रश्य इति । एतत्तु तदस्तितानु- 
मानम्‌ । कथम्‌ १ घटादीनां दृद्यानां स्वरूपन्यतिरिक्तेनान्येन ददयत्वदरोनात्‌ , 
तस््रकाराकानां च आरोकादौनां ग्यतिरिक्तद्रयत्वात्‌ , सवीौौवभासकानामपि 
प्रत्ययानां स्वरूपग्यतिरिक्तदरयत्वं दृदयत्वादवगम्यते घट।दितदालोकादिवदिति ॥ 


यस्माच्च नेद्धमेत्र प्रस्ययमनुप्रश्यति, ते च पश्येव, न कदाचित्‌ 
स्ववि प्र्ययं न पश्यति, तस्पदृट्शिमात्रः । मात्रग्रहणं ध्मन्तरनिवतैनाधम्‌ | 
एतेन द्रष्टुटशिसियिततिनपिं तमिच्छादि समाना श्रयत्वं च निवि, दृशेरेव ्रष्टुखात्‌ । 
तदेतदुव्यते--दशिमात्र इति । दकछाक्तिरेव दण्दशैने तदेव शकिरईकूछक्तिः । 
नाप्यन्य ३ छक्तिमानस्ति । सेव शाक्ति्दगिति | तत्र मघ्रशचब्दाच ग्पाचे- 


(कुप 


कक भ, ¢ न क ‰ १ दिच्छ [+ ५ के ्््ः 
विरेषेणापरामृष्टयथेः । तरिरेषेण केनचिदिच्छादिना गुणे्युणधरपश्चापरामृष्टः ॥ 


स पुरषो अुद्धः प्रतिस्रदिदं शीरुमस्यति प्रतिसतरेदी । बीदप्रययो- 
पर्न्धिस्भाव ह्यः । पुरुषो. बुद्धेः प्रतिपत्रेदौ दृशिमात्रः शुद्धश्चेति कथं 
गम्थत इव्याह --स बुद्धन सरूपो नायन्तं विद ईति । न समानजक्षणो 
नप्यल्न्तत्रिधभलयेतत्‌ । अप्तख्पतया दिमात्रलं ञ्ुदधलवं चाह । नाव्यन्त क्रूप 
इति वृत्ति पारूप्यतामाह ॥ 


1. ्विशष्रेणापराभ्रष्टा इति बिवरणा{भिमतो भाष्यपाठडः | 
2. यो.सू.पा. 1, बु. 3-4, 
3. यो.सू.षपा. 1, सू.7, 


१९० पातञ्जरयोगसुत्रभाष्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
न तावत्‌ सूपः । कस्मात्‌? ज्ञाताक्नातविषयलात्‌ पशिणापिनी हि 
बुद्धिः । तस्याश्च विषयो गवादिषश्ररिव . ज्ञातथाज्ञातश्चति 
परिणामित्वं दरयति ॥ 
[ विवरणम्‌ ] 
कथं पुनः न सषूपतेति ? उच्यते---न तावत्‌ सष्ूपः । करमात्‌ ? 
को देतु; ?। बुद्धस्ताव्रत्‌ स्वरूपं वेधम्धदरोनाधमाह--ज्ञाताज्ञातविषयतात्‌ 
परिणामिनी उद्धिरिति । कः पुनरसौ बुद्धिषयो यो ज्ञतश्वाज्ञातश्ेव्याह-- 
तस्यास्तु त्रिषया गवादिर्षयदिश्व ज्ञात्वाज्ञातश्च । येन बाक्चाकरेण 
परिणता बुद्धिः स ज्ञातः । येनाकरेण न पश्टणता सेोज्गातः ॥ 


{+ 


यदि न परिणमेतापरिणममाना चेद्धिषयं विख्यापयेत्‌ सदैव विषयिषवं 
बुद्धः स्यात्‌ । तस्मात्‌ ज्ञाताक्ञातविषयता परिणामि स्यापयति । परिणामिनी 
बुद्धिः, ज्ञाताज्ञातविषयत््ात्‌ । दपचक्षुरादि(विषय)वत्‌ ॥ 


तदविरक्षणः पुरूषः सदा ज्ञातव्रिषयः | सवेदा हिं ज्ञात एत्र पुरुषस्य 
स्वो विषयः । तस्मात्‌ सदाज्ञातविषयत्वं पुरुपस्यापरिणामितं परिदीपयति । 
सद। ज्ञातत्रिषयत्रमिद्धं पुरुषस्येव्याराङ्कषाह-- कस्मात्‌? को हेतुः ९ न हीति 
हिशब्दः प्रसिद्धावयोतनायः । बुद्धिश्च नाम बुद्धिरिति बोद्धप्रययः, पुरष्य 
विषयः स्यादगृहीता गृदीता चेति । सव॑दा च गृहीत एत्र वद्धः प्र्ययः| 
तदन्यभिचरिणेव पुरुषस्य व्यतिरिक्तसिद्धिः । तस्मात्‌ पुरुषस्य सदा 
्ञातनिषयत्वम्‌ । ततश्वापरिगापिं सिद्धम्‌ । अपरिणामी पुङषर इति प्रतिज्ञा 
सदा ज्ञातविषयघादिति हेतुः । वैधम्यदछान्ते। बुद्धधादिः ॥ 

ननु च बुद्धपा न्यवसितमथं पुरृषश्चेतयति, बुद्धेश्च सर्वो बिषयो 
्ञातशा्ञतश्च पुसुपरस्यापि समानः । ज्ञाताज्ञातत्रिियत्वे बुद्धवा भ्यवरषितार्थो- 
पलम्भितात्‌ । तस्मात्‌ पुरप्रस्यापि परिणामित्वं ज्ञाता्ञातत्रिषयताद्‌ बुद्धिवदेव ॥ 

नैष दोषः | बुद्धेरेव पुरपरमिषयलात्‌ | बुद्धिर डि बाह्याधाकारा पुरुषस्य 
विषयो नाथः केवर; शखल्येण । तस्मान्न ज्ञताज्ञातविषयः पुरुषः । बुद्धिस्तु 
सदेव श्तैवेति न परिणापिलं पुरष्रस्य ॥ 

ननु च बुद्धवा व्यवक्षितमथं पुरुषश्ेतयतीति कश्चिदाह । तत्‌ कथम्‌ 
उभ्यते-न-तैरप्यपरिमामिघस्याम्युपगमाव्‌ पुरुषस्य ; बुद्धा म्यवत्ितमयमिलेत- 


साधनपादो दवितीयः १९१ 


भाष्यम्‌ ] 
सदा ज्ञातविषयत्वं तु पुरषस्यापरिणापमित्वं परिदीपयति । 
कस्मात्‌ । नहि बुद्धि नाम पुरुषविषयश्च स्यादग्ृहीता गृरीता 
चेदि सिद्धं पुर्षरष्य सदाज्ञातविषयत्वं, ततश्वापरिापिसखमिति । 


किव्-प्राथा बुद्धिः सेह्यका्लित्‌, स्वार्थः पुरष इति। 


[ विवरणम्‌ | 
दुक्तं भवति- बुद्धधाकार चेतयति बुद्धिन्यवसायाकारापनम्थं॒चेततयततीति | 
अन्यथा हि तेषां परिणामित्वपरार्थत्वतदसयकः।रिनादयो बुद्धिधमाः पप्र ए 
प्रसजेयुः ॥ 


अथापरिगामित्रे ददनायुपपत्तिरिति चेत-न--दरयनस्थैव पुरुष- 
स्वरूपत्वात्‌ । यो हि पुरषपरिणामित्वममिमन्यते, प इदं भर्टन्यः--र्कि 
परिणामेन क्रियत इति ॥ 


¢, 


स चेदभिदधीत-दकशंनमिति। स प्रद्यमिधानीयः-- पुसृषस्य दर्शनमेव 
रूपं, अतः परिणामानथक्यमिति ॥ 


स चेत्‌ प्रतित्रूधात्‌--न पुरुषस्योपरन्धि्भोगः, कस्त £ विक्रियैव भोग 
इति । स पुनर्व॑क्तन्यः-- तथ।पि विक्रियावच्ादनिव्यच्रमुपनतं शरीरादिवदेष ॥ 

अथापि प्रतिभप्रेत-- स्वात्मनि विक्रिया नानिदयत्वक।रणं स्यात्‌ , 
कि ववस्थान्तरमाविविक्रिया हि कारणमनिद्यतस्येति । स पुनः प्रतिमि- 
तन्यः--विक्रियावस्याया एवावस्यान्तरत्वात्‌ । पूतैमविकृतस्य वस्तुनः पुनर्वि. 
क्रिय अवस्थान्तरम्‌ ॥ 


कि च--विषयाम्युपगमे च वित्रियेव, तावता नियमः परायते न करम्‌ | 
न चापि स्वात्मनि त्रिक्रियमाणानां वजदू्ादीनामनिलत्ते नास्ति | नच 
विक्रियाजनितस्येव दरनस्य दररयविष्रयत्वं न निलयस्य दरनस्येति नियमहेतुरस्ति । 
रिक्रियैवोपर्न्धि्नं विक्रियाजनितेति चेत्-न--शरीरादीनां विनिःयावतामुप- 
छन्धिप्रसङ्गात्‌ ॥ 

तस्मादटृशिमान्न एतव्रापरिणामी च, सदा क्ातविधयत्रात्‌ पुरुष इति 


तिद्धम्‌ । तस्य च निव्येोपरखन्िस्वरूपव्वेऽपि दृदयनैौद्धप्रययमावामावकृतोऽयं 
ग्यपदेशः पश्यति दशेपिभ्यति ददति च । सकित्रदिभ्रकाशनभ्यपदेशवत्‌ | 


१९९ पातञ्ञलयो गसूत्नभाध्याविवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
तथा सवधौध्यवसायक्रत्वात्‌ विगुणा बुद्धिः, त्रिगुणस्वादचेतनेति । 


गुणानां तुपद्रष्ा पुरुष इयतो न सरूपः ॥ 


अस्तु तहिं वहम इति । नायन्तं विरूपः । कस्मात्‌ १ । 
शुद्धाऽप्यस प्रययाटुपर्यो यतः । प्रयये बौ दइमनुपरयति, तमनुपर्यन्न- 
तदासाऽपि तदासक्र इ प्रयवमासते ॥ तथा चोक्तम्‌'-"“अपरिणा- 
मिनी हि मोक्तृशक्तिधतिसद्छ्रमा च परिणापिन्यर्थे प्रतिसङ्कान्तेव 
तद्त्तिमु पतति । तस्याश्च प्राप्चैतन्येपग्रहूपाया बुद्धिषृत्तेरयुकार- 
मात्रतया बुद्धिवृच्यवि शिष्टा हि ज्ञानवृत्तिरियाख्यायते ॥ २० ॥ 


[ विवरणम्‌ ] 
यथा प्रकाशयति सविता प्रकाराविष्यति प्रार्चाकरादिति च प्रकाश्यमावामाव. 
कृतो ग्यपदेशः । शुद्धत्वादयो हेतवे वैधरम्य॑ण चुद्धधादयो दृष्टान्ताः ॥ 


इतश्वापतखूपः । स्वाधौध्यवपायिताद्यरशचान्तादिसमस्ताथावपतायितात्‌ 
तिगुणा बुद्धिः प्रोत्रद्धप्रित्‌ । गुणानां तूपद्रषस्युपदरषटवं देत: । अत्रिगुणः 
पुरषं इति प्रतिज्ञा । वैधर्म्य बुद्धथादिरेवर दष्टन्ताऽत्निगुणलराच्चाप्तल्पः ॥ 


अप्तु तर्हिं विष एर | ततश्वप्यन्तवरिषूयत्वाद्धोगादुपपत्तिरिति । 
त्रोष्यते-नायन्तं विरूपः । कस्मात्‌ { कोत्र हेतुः? न हि द्धस्य 
बुद्धिस्वरूपविरूपस्याशुद्नैदधप्रययादव्यन्तविरूष्यसिद्धये हेतुरिदयमिप्रायः ॥ 

न--जुद्धिपरलययसक्षिस्य सिद्धत्वात्‌ । यतः शुद्धोऽप्यसौ बौद्धं 
प्रययमनुपहयति तच बोदग्रत्ययानुदरौनं साधितम्‌। अनुपश्यतीति व्रिषयाकार्‌- 
परिणमि सति बद्ध प्रलय पर्यतीलययः । तमनुपश्यन्नपि न तदासरा न विगुणः | 
तद।त्मक़ इव शान्तघोरमूढव्यवपायद्प इव प्रयवभाप्ते। तस्मानाघ्यन्तविरूपः 
प्रदृत्ति्ारूप्यात्‌ । तत्र यदुक्तं बुद्धः प्रतिषवेदी पुर इल्युपपादयिष्यामः 
इति, तदुपपादितम्‌ । तथाः च तत्ताह्प्यमादरितम्‌ । तयोक्तं तन््रे-- 





1. पञ्चशिखेन. 

2. अत्र आदर्कोशे (तथाः इययेतदुपरि स्वानिषयन्रत्तिद्धावैःः इत्यादिः 
मरन्थः उपलभ्यते । तस्यानन्वयात्‌ आदशकोशे (68) पुरेभ्यः प्राक्‌ लिखितः ।च 
तस्सारूप्यमादर्धितः इत्यादिः अन्थः योजितः ॥ | 


साधनपादो द्वितीयः १९३ 


[ सूत्रम्‌ ] 
तद्थं एव दरयस्यात्मा ॥ २१॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
दृशिरूपस्य पुरुषस्य करमत्रिषयतामापत्रं ध्थमिति तदर्थं ॑एव 
ददयस्यात्मा भवति । स्वरूपं मवतीलर्थः । [ततश] स्वरूपं तु ररपण 
. [| विवरणम्‌ | 
“अपरिणामिनी मोक्तृशक्ति--दक्छक्तर्ययान्यल्यातरूपा. अप्रतिंसङ्कमा 
च प्रिपाभिन्यर्थे वेद्ध प्रत्यपे प्रतिसङ्करान्तेतर श्रलयविषयत्वात्‌ तदु दृत्तिमनु- 
पतन्तीव अस्या बुद्धेत्तिमनुपतन्तीव द्रटूलादुपममाना । बैद्धः प्रल्ययो जायमान 
एव टृकूकक्तेः कमेतामापथते । तमनुपतन्त्युपममाना मोक्तृरक्तिः तस्याश्च 
प्रा्ठचेतन्योप्ग्रहह्पायाः प्रतत चैतन्योपग्रहर्पं पुरषोपग्रहर्सं यया बुद्धिषृस्या 
आप्तादिते पावकोपग्रहरूपत्ठेहपिण्डव्रद्दरिकमवदेव अनुकारमालतया 
बुदधिवृत्तिसाख्प्यमात्रतया बुद्धिवृत्यविशिष्टा ज्ञवृत्तिरिति ज्ञ एवोपरुन्धिरेव 
दृत्तिरिास्यायते ॥ २० ॥ 
तदं एव टदृदयस्यापमा तच्छब्देन दष्टा द्रिमातः खद्धो यथापि. 
गताता प्रयाक्नायते । तदर्थः तक्ष तदयस्तस्रयोजनः देिकीला्थं इव्यथः । 
भोगख्पेणापवरगख्पेण च । कोऽसाविद्याद-- दृश्यस्यात्मा प्रधानस्यात्मा श्वस्य 
स्वरूपटाम इति ॥ 
ननु चतुग्यूहत्व भ्याचिष्यासितं किंमथमेतदप्रकृतमुष्यते । नैष दोषः | 
आय्यन्तिकदुःखनिदृ्तिश्रयोजनस्य प्रकृतत्वात्‌ । कथं दृर्यत।दध्यामावधारणे 
नात्यन्तिकी दुःखविरतिरुक्ता भवेदिति । उच्यते--यदि ` द्दयस्वरूपग्रतिठम- 
स्तदथ एव, तदा अरोषतदर्थिरतौ पुनः कृतार्थवत्‌ का्याभावादात्यन्तिक 
टर्यविरतिः स्यात्‌ | तस्य पुनः प्रदत्त ्रये।जनामावाव्‌ । न हि कृतमेव पुनः 
करणीयकमुपाद्ुते । गथ तु स््ार्येऽपि द्ृदवस्यासलमोऽमविष्यदतः स्वास्य 
भावात्‌ पुनः पुनः प्रावर्तिष्यत । ततश्च नालन्तिकी निद्रत्तिः ¡ तस्मात्तादर््य- 
मेवावधार्यते ॥ । क 


हरय त्सठाभस्य स्वयिमव्रश्व दङयस्य भ.्यघ्वात्‌ अदनाद्वत्‌ ।तद्धः+ 
अचेतनतरात्‌ सेहल्यकास्विाच । तदाह-दयिर्पस्य पुरुषस्य कर्मविषयतामधिन्न 
रदयमिति । रतिशब्दो हेत्व । तदथं एव ॒द्दयस्यास्मा मवति स्वूपं 


मवत्रील्थैः । परषां एव प्रधानस्यात्लाभो दृशिकर्पतायत्तरेढनादिवव्‌ ॥ 
28 


१९४ पासञ्चर्योगसूत्रभाष्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ ] 
प्रतिरग्धासकं भोगापवरगार्थतायां कृतायां पुरषेण न दृदयत इति ॥ २१॥ 
स्वरूपहानादस्य नाशः प्राप्तः । न तु विनश्यति । कस्मात्‌ ? 


[ सूत्रम्‌ ॥ 
कतां प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्‌ ॥ २२.॥ 


[ भाष्यम्‌ | 
कृताथमेकं पुरुषं प्रति दृश्यं नष्टमपि; नाञ्चं प्राठमपि, अनष्ट, 
तदन्यपुरुषसाधारणतात्‌ । कुश पुरषं प्रति नशे प्रप्तमप्यकुराखान्‌ 
पुरुषान्‌ प्रति न कृताथ॑मिति,) तेषां द्शेः कमे, विषयतामापन्नं कमत 
एव प्रद्पेणास्मरूपमिति । 


[ विवरणम्‌ ] 
सूत्रप्रयोजनमाचष्ट दृदानीम्‌- ततश्च तादर्थ्यस्य नियतलात्‌ कारणात्‌ 
पुरषर्मेण प्रतिटम्धातमक्तं प्रा्चैतन्योपग्रहल्यं सद्धोयापवगथतायां 
कृतायां पुरषेण न द्दयते । मोगापवरगन्यतिरेकेण कर्तन्याभावात्‌ ॥ २१ ॥ 


सूत्रपम्बन्धं करेति--यं पुर्षे प्रति चरितार्थं दृदयं, तं प्रति दृरिकरमतां 
नापत्स्यत इति स्वरूपहानम्‌ , अतश्च स्वकूपदानादस्य विनाशः प्राप्तः | नं तु 
विनयति सर्वीमना । कस्मात्‌ ? के हेतुः ? प्रधानानां प्रतिधुरुषे बहुलात्‌ 
छतां प्रति मष्टमेवेति मन्यते ॥ 

कृताय प्रति नष्टमप्यनष्टे तदन्यस्ताषारणत्वात्‌ । कृताथ यं पुरषं 
प्रति भोगापवगनिर्वतनेन कृतप्रयोजनं तमेकं पुरषं प्रति पुनः कायकरणस्येणा- 
प्रनतेनाद्धावाभावयोरविरोषान्नष्टमपि । अस्य व्यष्यानं नाशप्राप्तमपति। 
अनष्ट तदन्य पुरषसाधारणत्वात्‌ । यान्‌ प्रलङ्ृतार्थं तान्‌ प्रलनष्टम्‌ ॥ 


कयमनष्टमि्याह-- कुशलपुरुषान्‌ प्रति ना्प्रापं मोगापवगप्रदनिन 
दुरा्पुरुभान्‌ प्रति कृतप्रयेजन । अक्ुशचटपुरषान्‌ प्रति अङ्कतार्थं भोगापवर्भयोः 
कर्तन्यये(रकृततात्तेषामकरुरयखानां दयः त एव दृरिस्तस्याः कर्मतां ददयतामापन्न 
ठमत एव पुरषसूपेण पुरुषनिभौततया आसमरूपमिति । अतश्च साधारणता 
देकमेव प्रधानं परपिभ्यादित्रद्‌ । कावथकरणानां च भिन्नचात्‌ पुरषाणां नानां 
सिद्धम्‌ । इखदुःष्नानालाचच पुरुषमेदतिद्धिः ॥ ` 


साघनपादो हितीयः १९५ 


भाष्यम्‌ | 
अतश्च दग्दशेनशकलानिंयत्वादनादिः संयोगो व्याख्यात - इति 
तथा चोक्तम्‌" “धर्मिणामनादित्तयोगाद्धमेमात्राणामप्यनदिः संयोगः” 
इति ॥ २२ ॥ 


संयोगस्वरूपाभिषित्सयेदं सूत्रं प्रववृते-- 
[ सूत्रम्‌ ] । 

स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपरन्धिहेतुः सयोगः ॥ २६३ ॥ 
 [ भाष्यम्‌ ] 

पुरुषः स्वामी दयेन स्वेन ददीनार्थं संयुक्तः । तस्मात्‌ ` संयोगात्‌ 

च्श्यस्यपिलान्धया स मगः । यातु द्रष्टुः स्वरूपापलग्धः साऽपतगः। 
{ विवरणम्‌ 1] 

अतश्च र्दशैनशक्त्योर्नियत्वादनादिः संयोगो व्याख्यातः । तथा 

चोक्तं तन्त्र- धर्मिणामनादिसंयो गात्‌ गुणानां पुरषाणां चानादिसेयोगाद्धर्म- 

मात्राणां महदादिकाथकरणान्तानामपि पुस्षैरनादिः संयोगो पर्मिमितर्माणाम- 


क ~ ० 


भिनलात्‌ ॥ २२ ॥ 

दरेयमवधृतम । दरष्टा चातरधृतः । दरषटश्ययोः संयोगो हैयहेतुरिति चोक्तम्‌ । 
स च संयोगोऽवधारयितभ्यः कटरा इति । ततश्च सैयोगस्वूपावधारणार्थमिदं सूत्ं 
पवदृते--स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलन्षिहेतुः संयोगः । सवस्वामिः 
शक्टयोः बुद्धिपुरषयोः स्वरूपोपरन्पेेतुः कारणम्‌ । यस्मिन्‌ सति तयोः स्वरूप 
मुपरम्यते वदनदर्पणयोरि, स तयोः स्वरूपोपलश्वहेतुः । यागः शषदध्य- 
स्वरूपकायानुमेय इत्यथः ॥ 

प्रमाणे चान्न स्वसंयोगपूर्विका बुद्धिपुरुषयो; स्वरूपोपरम्धिः, विषय- 
विषयिश्वरूपोपलग्धित्वात्‌ , ईक्षणदपणस्वरूपोप्न्धिवत्‌ । या काचित्‌ 
ुखदुःखोपरन्धिर्वितादगो चरापन्ना सा सुखदुःखहैतत्ंयोगपूरविका, सुखदुः 
खेोपरभ्धित्वात्‌ , चन्दनकण्टकष्ठुखदुःखोपकन्धवत्‌ ॥ ० 

तदाह- पुरषः स्वामी दृश्येन स्वेन स्वय बुद्धया दरीनाथं मोगापवर्म- 
दशनाय संयुक्तः । दरीनप्रयुक्त एव सेयोग इयर्थः ॥ . 1 

तस्मात्‌ संयोगादरौनप्रथुक्ता दृश्यस्योपटन्धिः अविशिष्टा या स मोगः। 
या तु द्रष्टुः स्वरूपोपटम्पिविविक्ता सोऽपव्ैः। यस्मादरदनकायदरयप्रयुकतः 

1, आगमिमिः। ॥ 


१५६ पातञ्चटयांगसूत्रभाष्यविवेरणे 


[ भाष्यम्‌ ] 
दश्चनकरायविक्तानः सयोग इति दशैने वियोगस्य कारणमुक्तम्‌ । दशन 
मदनस्य प्रतिदन्द्रीयदशैनं संयोगनिगित्तएुक्तम्‌ । नात्र दशैनं मेक्ष- 
कारणम्‌, अदशैनामावादेव न्धाभावः सर मोक्ष. इति । दशंनस्य भावे 
घन्धकारणस्यादशैनस्य नाश इत्यतो ददीनं ज्ञाने कैवस्यकारणपुक्तम्‌ । 


किं चेदमदशैनं नाम ! 


[ विवरणम्‌ | 
सेयोगस्तस्मादर्शनका्यौवप्ानः संयोगः तेन पुरुपसंयोगवदशेनं वियोगस्य 
कारणमिस्युक्तम्‌ । गुणपुरषन्तरदशेनं प्रधानपुरूपवियोगस्य क।रणमिदयुक्तं) 
कार्यस्य दरनेन पर्यवसितघात्‌ ॥ 


संसारिसंसारहेतुयाधाप्यदरीन दुःखदुःविसंयोगहेत॒निवतैके, दुःखि- 
दुःखहेतुयायापम्यविषयत्वात्‌ , रेगिरोगहेतुयायासमयद्‌ शेनवत्‌ ॥ 


अविद्या द्रषटृददययोः संयोगकारणे, दुःखनिमित्तसयेगहेतुत्वात्‌ , 
रोगहेतुसंयोगनिमि्तमिध्याज्ञानवत्‌ । द्रधुद्रयसंयोगो भिथ्याज्ञानपूर्वकः, 
दुःखहेतुत्वात्‌ , रोगिरेगहेतुसंयोगवत्‌ । यस्माददृःखिदुःखदेतुयाथाल्यविषयं 
दशषेने, तस्मात्तदन्ययाविषयस्यादशैनस्य प्रतिदन्दमित्यदर्शनं संयोगनिमित्त- 
मिद्युक्तं तस्य हेतुरविथेति । दुःखनिमित्तताचर संयोगस्य ॥ 

यस्माददसनमेव निवर्तयति दर्शनं नान्यत्कायं करेति, तस्मान्नत्र 
दशनं मोक्षकारणम्‌, अदनाभावादेवा्याददशेनकायंस्य दुःखहेतेवेन्धस्या- 
मावः, स मोक्षः । न पुनबन्धाभावन्यतिरेकेण भावपितम्यो मोक्षः । ततश्च 
मोक्षस्य निल्यत्वसिद्धिः ॥ 

दशनस्य मवे दृदद्यविषयस्य दशनस्य भवे तद्विषयस्याद्ैनस्य 
नाशः । दर्शनादर्शनयोरेकत्र विरोधात्‌ तिमिररपरिकिरणज।ल्योलि । अतो दैनं 
केवस्यकारणमुक्तम्‌--"विवेकल्य।तिरविष्वा' हानोपायः इति ॥ 


किबेदमदग्नं नाम ? नच चोक्तमधियैव । सा चामित्रापोष्मदवदिति 
विाविपर्थयेणः व्याख्याता | स्यमेवे, किन्तु शाक्ञगता विकत्पा दसैपिष्यन्ते 


, 1. वो.सू. पा. 2. सु. 26. 
2. यो. सू.पा, 2. सर. 5, 


साधनपादो दितीयः १,९७ 


[ भाष्यम्‌ | 
किं गुणानामिकारः १ 


[> 


आदेष्वित्‌ दशिषूपस्य स्वामिनो दरितविषयस्य प्रधानचित्तश्या- 
नुखादः, स्वस्मि दृश्ये विद्यमान यो दशैनाभावः 
किमथवत्ता गुणानाम्‌ १ 
विवरणम्‌ | 


स्वामिमतपक्षनिश्चिचीषथा । परपक्किलितवस्तुखण्डिमानमापादयता £ निजाभि- 
मतनिरूपितव्तु ददिमानमतितरामानीयते ॥ 


चेदमिति सर्वैरेव विकलरध्यमाणेरमितेवन्धनीयम्‌ । किं गुणानामि- 
कार इति; सामान्येन परिपृष्टस्य विशेषपर्यनुयोगः | अपिक्रपिशषिकारः, गुणानां 
प्रवृत्तिः ॥ 


ननु गुणानाम्पिकारस्य कथमदरौनाराङ्का १ उच्यते--अर्थदरेण 
मवव्येवादर्खनमधि कारः । यावद्धि गुणानां प्रदृत्तिस्ताबद्रन्धः । बन्धकारणमकयेति 
स्थितिस्थेयैमानीयते । रान्दद्वरेणापि--दर्शन।दन्यददरौने यदा, भवल्येव 
तदानीमाशङ्का । गुणाधिकसि हि ददनादन्य एवेति ॥ 


आहोसिद्‌ दरिष्वरूपस्य स्वामिनो दरितविषयध्य चित्तस्यादुत्रादः। 
इह॒ तु पूपपदार्थव्रधानत्मदरीनस्य गृहीता शङ्क्यते । चित्तस्यानुतादः 
प्रागुचत्तश्यनस्यामावः । किमुक्तं मवत्यनुत्पाद शयत आह-स्वामिन्‌ 


मे ०५ न अ 


दृदये पित्ते विद्यमाने यो दरौनामावः गुणपुरुषान्तरदशचनानुत्पत्तिरद नमिति ॥ 


करिमथंवत्ता गुणानां मोगापतरग॑म्यां या गुणानामवत्ता तददरीलमिति । 
अत्र लर्दरेणेवा शङ्का | प्रयोजनवते हि प्रयोजनमवदईयङृवयमिति ॥ 

कः पुनरेष पक्षिषु दोषः १ उच्यते--य्धिकारा गुणानामददयौनं 
विधानर्भक्यं प्राप्तम्‌ । न द्यसिन्‌ पक्षे विया प्रलनीकमूता स्याददर्शन्य । 
यस्माद्धियाधिकारयोरविरोधः, अतश्वानिरमेक्षिः असक्तः । पुनः पुनः 


प्रयोजनवत्तया प्रवृत्तिसभवात्‌ ॥ 


गुणवत्ता अदरनमिति पक्षेऽ्यष एव दोषः। तथा चिन्तस्यानुत्पादपक्षेऽ- 
प्येष एव । अनुत्पादो हि ददनामावः, तस्य चावस्तुलाद्धि्या 
निद्रत्तिरनुपपन्नेति । अभवि हि सति प्र्नीकविधानमनधकमेव ॥ 


१९८ पातञ्ञख्योगसून्नभाष्यविवरणे 


| [ भाष्यम्‌ ] 

अथाविद्या स्वचित्तेन सद्‌ निरुद्धा [सवचित्तस्योसतिमीजम्‌ ॥ 

किं स्थितिषस्कारक्षये गतिसस्काराभिव्यीक्तः ? यत्रेदमुक्तम्‌- प्राने 
धिस्येव वतमाने विकाराकरणादग्रधानं स्यात्‌ ।. तथा गदेव वतमानं 
विकारनिलयत्वादप्रधने स्यात्‌ । 'उमयथा चाख पत्तिः प्रधानव्यवदारं 
ठमते, नान्यथा । क।रणान्तरेष्वपि फलिपतेष्वेष समानश्चैः ॥ 

[ विषरणम्‌ ] 
` अथाविधया स्वचित्तेन सद्‌ निरुद्धेति । अत्र द्यविधाया अदरीनस्य च 

केनचिददेन भेद मन्यमानो विकल्पयति । कथम्‌ ? अनिरुद्धा ह्यविधा ददयमा- 
नत्वादर्शनमेव । या तु निरुद्धा चितेन सदह प्रठीना स्वकारणे | स्ववित्तस्यातत्ति- 
बीजमुपपत्तिकारणं सा न दृदयत हइध्यदरनमित्यभिमानः । ततश्वानिरेधावस्थाया 
दर्यनल्प्रसङ्ग इति दु एवाय पक्षः स्यात्‌ ¦} अथ तु निरोधानिरोधावस्ययोरष्य- 
दशमैमेव, तथा सप्यभिमतसिद्धिसििदोष एव । क स्थितिसस्कारक्षये गति- 
सस्कारामिन्यक्तिः । किंमतददर्शनमिति न संबध्यते । कथं ति संबन्धः! 
उच्यते- तत्र विया स्वचित्तसहनिरुद्धा चित्तस्योत्पत्तिबीज प्रयुक्तं, तत इदमधौत्‌ 
पिद्धम्‌-चित्तं स्वकारणे निष्यते पुनश्चोत्थत इति । ततशेदमपि 
तिद्धमर्थाचित्तस्य कारणमपि स्थित्या गत्या च वर्तेत इति । ततश्चेतद्धिस्प्टी- 
करणार्थं पृच्छति ॥ 

स्थित्यर्थो गुणानां साम्यावस्याहितुः संस्कारः स्थितिसंस्कारः । तस्य 
क्षये स्थितिसंस्कारक्षये गतिमहदाच कारेण प्रहृत्तिस्तदथः सैस्कारो गतिसस्कारः 
तस्याभिव्यक्तिरेति ॥ 

यदि स्थित्या ग्या च वतेते, ततः को दोषः स्यासदुदाहरणन दर्ीयति- 
यत्रेदमुक्तं प्रधानं स्थियेव वर्तमानं विकाराकरणात्‌ महदाचाकरिणापरिणामा- 
दभ्रधानं स्यात्‌ । यतः प्रधत्ते विकारानिति प्रधानम्‌ । तेन विकाराणां 
अप्रधातृत्वादप्रधानं स्यात्‌ | 

तथा गयेव वतमानं नित्यं विकारख्पेणेव वर्षमानं त्रिकार- 
नियलान्न विकारान्‌ प्रधत्त इति कारणलदनेरप्रघानं स्यात्‌ । उमयथा 
त्तिः गव्या स्थिव्या च वर्नं वृत्तस्य प्रधानस्य तदुभयथाव्रत्ति व्यवहारं 
प्रधानखभ्यवहारं कारणलन्यबह।रं ठमते । नान्यथा प्रधानत्वे प्रधानस्य | 
कारणान्तेेष्वपि पुरुषश्रपरमाण्व।दि§ प्रकलितेषु समानश्वचैः तुल्यतरिषयः 


1. “उभययाड़त्ति व्यवहार ईति विवरणादुसारी पाठः । 


+ साधनपादो द्वितीयः १९९ 
[ भाष्यम्‌ | 
ददीनशक्तिरेवादवीनमियके । “प्रपनस्थास्मस्थापनाथो प्रवृत्तिः" 
इति श्रुतेः । सर्वबोध्यबोधसमथः प्राक्‌ प्रवृत्तेः पुरो न पश्यति, 
सर्वकायेकरणसम्थं दृदयं तदा न द३यत इति । 


उमयस्याप्यदरैने परम इयके । तत्रेदं दस्यव स्वासमूतमपि 
परुषप्रययपिक्षं दशनं दद्यधमेतेन मवति । तथा पुरुषस्यानासमूतमपि 
हृदयप्रययापक्ं पुरुपधर्भतेनेवादशंनमव मासते ॥ 


द्दनं ज्ञनमेवादशेनमिति केचिद मिदषति | 


[| विवरणम्‌ | 


न्यायः । प्रकृत एवाधुना निरूप्यते । दशैनशचक्तिरेवादशैनमिलेकरे । दशनस्य 
श्॒क्तिनमिग्यक्तायस्था बीज इवानमिन्यक्ताङ्कुरावस्था तदेतददरशीनमियेके 
मन्यन्ते । कतः 2 प्रपानस्यात्मप्रख्यापनायो प्रह्यापने ददीनमाद्यायमानस्पत। 
तस्ये तददरनमिति श्रुतेः ॥ 


अलिन्‌ पक्षे तदेवानमिग्यक्ताणकं राक्तिरूपमदरने तदेव चाभिग्यक्तं 
ददनमिति स्वाप्मनि विरोधानुपपत्तेदरोनाददरौनस्य निवरृच्यनवक्टटपतिः ॥ 


तथा दशेनान्तरं--स्वेबोधसमर्थैः बेोधात्मकलात्‌ प्राक्‌ प्रवृतेः 
प्रधानप्रवृत्तः प्रान पहयति दरनासकोऽपि सन्‌ पुरुष ईति । 
सर्वकार्वकरणक्रियासम्‌र्थं॒दृदयं प्रधानं न तदा प्रक्परृत्तेः परमार्थमपि 
सत्‌ दृदयत इत्युभयश्य प्रधानपुरुषयोरदशैनं धम इक मन्यन्ते ॥ 


अत्रप्युमयोरपि प्रागवस्येवादरनपुत्तरकाखावस्या च दरीनमिति पूर्वदेषः 
स्थित एव । द्दयस्यासमभूतमन्यतिरिक्तमपि पुसष्र्ययपिक्षं पुरुषाकरेण 
पुरुषस्य न इयते । पुरुषाकारविशिष्टतया वा पुरुषस्य दर्यत इति पुरुषप्रव्यया- 
पेक्षमदरशाने पुरुषस्य ध्वन मवति । तदेतप्स्पटयति--पुरुष्यानासममूत- 
मपि द्दयप्रययपिक्षं॑द्दवप्रव्ययोऽज्ञानं तदपेक्ष, कथं पुरुषाकरिणादर्यानात्‌ 
सकेरेण वा दर्नादन्तःकरणप्रव्यययिक्षं पुरुषानात्मभूतममि पुर्षधर्मतेनै. 
वाद्शेनमामाप्ते । तथा च पति दृर्यधंम एवायमिव्यदोषः ॥ 


२०० पातञ्चलयोगसूत्रभाऽयविचरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
इते शाक्चगत। विकल्पाः । तत्र विकश्यबहुतमेतत्‌ ॥ २३ ॥ 
सर्वपुरुषाणां गुणपतयोगाविरेषः । अताधारणविषयस्तु प्रयकचेत- 
नस्य स्वघुद्धिसंयोगः- । 
[ सूत्रम्‌ } 
तस्य हेतुरविद्या ॥ २४ ॥ 


| [ भाष्यम्‌ | 
विप्ययज्ञानवासनेय्ः । 
[ विवरणम्‌ ] 
सर्वविकल्पपक्षषयापनाथं उपन्यासः । दशने ज्ञानं, तदेव इान- 
मद्च॑नमिति केविन्मन्यन्ते । समासस्योत्तरपदार्थप्राधान्यमूर्‌ कृत्यायं व्रिकलयः। 
एतस्य दोषोऽबरिधासूत्र एष व्याख्यातः । 


एते श्चास््रगता विकल्पाः ददईनान्तरगता विकल्पाः । तत्र विकल्य- 
धहुरवमात्रमेतत्‌ न बहुतवमन्नेणायंतिदधिरिवयमिप्रायः | यस्य तु बुद्धिपुरुषसंयोग- 
हेतुत तस्यादरीन[नव्व]युक्तं दरनव्रिरोधात्‌ । तथा च व्याल्यातमिति नत्र 
पुनः प्रयत्यते ॥ २३ ॥ 


सर्वपुरषाणां गुणसंयोगाविक्षेषः । गुणैः सेयोगः सवैषामविरिष्टः 
साधारणः, तयाव्यस्ताघारणविषयस्तु प्रत्यत शिष्टस्तु ॒प्रयक्‌चेतनस्य 
बोद्धप्रप्ययानुदीकशनः स्वबुद्धिसयागः। स चाप्ताधारणः स्वबुद्धिकषयोगो येन भवति 
तदेवादरानम्‌ । तस्य हेतुरविध। । तस्य खश्वामिशाकिस्रूपोपरन्धिदेतोः 
संयोगस्य हेतुः कारणं अविद्या विपयैयज्ञाचवासनेययंः ॥ 

ननु च विपयेयों पिथ्याज्ञानमतदूपप्रतिष्ठम्‌' शुक्तम्‌ । तथाः 
अनित्याद्ुचिदुःखानासमसु निस्यद्युचिषुखासख्यातिरतिवा' शइ्युक्तम्‌ । 
अन्न कथे व्िपरययज्ञानवासनेच्युष्यते । नैष दोषः-अविधाकार्यत्वादराप्तनायाः 





1. इदानीन्तनुद्रितमरन्थपाटस्तु-- (तत्र विकस्पब्हुस्वमेतत्‌ सवंपुरुषाणां 
गुणानां ऽयोगे साघारणविषयम्‌ ॥ २३ ॥ 

यसु परतयक्चेतनस्य स्वबुदधिखंयोगः-- (ख) (तस्य हेतुरबिद्या? इति ॥ 

2. यो.सू.षपा, 1, सू. 8. 

3, यो.षु.पा. 2. सू. 5. 


साधनपादो द्वितीयः २०१ 


भाष्यम्‌ | 
विपयैयज्ञानवासनावासिता च न कायनिषठां . पुरूष्यातिं बद्धः 
प्राप्नोति । साधिकारा पुनरव्पते । सा तु पुरुषख्यातिपयेवसानां 
कार्यनिष्ठां प्रभेति । चक्िधिकारा निवृत्तादसैना बन्धकारणामावान्न 
पुनरावतैते ॥ 


अत्र कञ्चित्‌ पण्डकोपाख्यानेनेद्धाट्यति - मुग्धया भयिया अभिः 
धीयते- “पण्डक ! आधेपुत्र। अपलवती मे भगिनी, किमर्थं नाम नाहम्‌ 
इति ¦ स॒ तामाह--प्मृतप्तेऽहमपलयपुखादयिष्यामि' इति । तथेदं 
विद्यमान ज्ञाने चित्तनिवृ्ति न करोति, विनष्टं करिष्यतीति का प्रयज्ञा ॥ 

। [ विवरणम्‌ | 

सैवाविदेव्युष्यते । प्रटीनेष्वपि कारणेषु साम्यावस्यायामपि सस्यामविधावासना 
पुनः पुनः प्रदृत्तौ प्रधानस्य हेतुर्म्रति । न पुनव्रिपय॑यः प्रक्‌ बुद्धुत्पत्तेरमावा- 
परदृत्तिकारणमिति, तद्रासनैव प्रधान पुरुषर्तेयोगस्य कारणमित्याल्यायते ॥ 

तदेषाह-- विपथ यज्ञानवासनावासिता न कायैनिषठां कायैसमतिम । 
कार्यनिष्ठामाह-पुरुषस्यतिमिति । तां बुद्धिने प्रभोति । पुरुष्यातिप्वसाना 
हि बुद्धेः करणीधवत्ता | साधिकारा करणीयवती पुनः पुनरावतैते विपययज्ञान- 
वासनावश।त्‌ ॥ 


सा तु बुद्धिः पुरुषख्यातिपथवसाना कायैनिष्ठं प्राभरोति । 
पुनरपि तदेव स्पष्टयति -- चरिताधिकारा निवृत्ताद्थनबन्धना कमीत्रिपाकयो- 
रदरीनमूल्ताददुरनमेव बन्धनम्‌ । अदशननिदृत्तौ च बन्धनिदृत्तेवन्धकारणा- 
भवाद्रन्धकारणस्यादशौनस्यामावान्न पुनरावतैते ॥ 


अन्न कथितपण्डकोपाख्यनिनोद्यति । पण्डकः प्रण्डः । त किल 
एुरधया मार्यंया अभिधीयते । कथम्‌ £ आर्यपुत्र, मे भगिन्यपलयवती, 
किमथ नाहं अपलवलस्मीति। तामाद-मृतस्तेऽहमपत्यपुसाद्यिष्यामीति । 
तथेदं विधमानं ज्ञाने चित्तनिवरत्तिन करोति, नष्टे करिष्यतीति का 
प्रत्याशा ॥ 


अयमुद्यितुरमिप्रायः-अत्रिधा चेदूनुद्धपुरुषसयेग्य कारणे, तस्याश्च 


बिथा निबृतिेतुः, ततश विधमानायां विधायां तद्धिरेधिन्यत्रिवा निवर्ते | 
26 


1 


२०२ पातञ्जखयोगसूज्रभाष्यविवरणे 


[ भष्यम्‌ | 
तत्राचार्यदेसीयो वक्ति-ननु शुद्धिनिवृत्तिरव मोक्षः । अदशेन- 
कारणाभावात्‌ बुद्धिनिवृत्तिः । तचादशैनं बन्धकारणं दशीनाज्निवतैते । 


तत्र॒ चितनिवत्तिरेव मोक्षः । किम्थेमखान एवास्य 
मतिविभ्रमः ॥ २४॥ 


{ विवरणम्‌ ] 


न तु विधोत्पस्यनन्तरमपि चित्तनिवृत्तिः । तत्र यथेव सत्यां व्रिधायां न 
चित्तनिब्रतिः, तथा नष्टायामपि विचायां न निनवर्सस्यति तरामिदानीं षण्डदिव 
मृतादपत्योपत्तिः । अत ए कारणादव्रिघ्याऽपि न सयोगक्रारणम्‌ ॥ 


अत्राचायंदेशीयः परिहारं वक्ति। आच।यदेशीयप्रहणे पूर्वपक्षस्यासारल- 
प्रस्यापनार्थम । उद्धट्नेनेव प्रयुतं वद।मि इति ॥ 


ननु बुद्धिनिवृत्तिरव मेक्षः। कथम्‌ बदशेनक्ारणामवाद्‌बुद्धि- 
निब्त्तिः । तचादरैनं बन्धकारणं दरैनान्निवतैते, ततिबत्तिव मोक्षः । 
किमथमस्थाने विभ्रमः । प्रधानपुर्रतयोगस्य दुःखहेतोरविथा कारणमिति 
विस्तरेण प्रतिपादितम्‌ । ततश्च दरोनाददरीननिदृच्युपपेत्तः पपक्षमतारं मन्यते ॥ 


ननु चोक्तं विधानन्तरमेव बुद्धिर्न निवतैत इति । उच्यते । विधया 
तावदतरिधा निवर्तत एव्र । नात्र व्रिभ्नमः कार्यः । तस्यां तु निवृत्तायां बुद्धिनि- 
वृत्तिश्च मवव्येव । पुनवुद्धि्तयोगस्याविधम्यतिरेकेण कारणान्तराभावात्‌ । ततश्च 
युद्धिनिदृत्तिरेव मोक्षः ॥ 


यत्त॒ विधानन्तस्मेव बुद्धिन निवत्त इति, तदकारणम्‌ । कस्मात्‌ १ 
निमित्तनैमित्तिकयोरनेकग्रकारदरनात्‌ । यथा तक्षादिनिमित्ताः प्राप्तादादयस्तक्ष(- 
दिषूपरते्वपि न निमित्तविरत्या विरमन्ति । भप्रप्य च हूमस्य भङ्गानन्तर्‌मेव 
विरेषादर्चनात्‌ । तथा चित्तस्यापि विपुक्तप्तायक्वदारन्धप्तस्कारापरिक्षयात्‌ , 
तस्सस्कायवेक्षथा कचित्कारं ददोनेनेवावस्थानं इति । तथा च श्रतिः-- म्नतुस्य 
तावदेव चिरम्‌" इति ॥ २४ ॥ 





1. छान्दोग्य, उ, 6. 14.-2. 


साधनपादो द्िवीयः २०३ 
[ भाष्यम्‌ | 


हेयं दुःख हेयक।रणव्च सेयोगार्थं सनिमित्तदुक्तम्‌ । अतः षरं 
हानं वक्तव्यम्‌- 


। सूत्रम्‌ | 

तदभावात्‌ संयोगाभावो हानं तत्‌ दशः कैवस्यम्‌ ॥२५॥ 
[ भाष्यम्‌ | 

तस्यादशेनस्यामावात्‌ बुद्धिपुरषसंयोगामावः । आलन्तिको 


बन्धनोपरम इलः । एतत्‌ हानम्‌ । तत्‌ देः केवल्यम्‌ । पुरुषस्यामि- 
श्रीभावः, पुनरसयोगो गुणेर्यियैः । दुःखकरारणनिवृत्तौ दुःखोपरमो 
हानम्‌ । तदा स्वरूपप्रतिष्ठः पुरुषं इ्युक्तम्‌ ॥ २५॥ 
[ विवरणम्‌ | . 

चत्वारे भ्यूहा; प्रकृताः । तत्र हेयं दुःखं देयं दुःखमनागतम्‌! 
श्युक्तम्‌ । रोगस्थानीय एको व्यूहो व्याख्यात इत्यथः । हेयकारणं च सनिमितत 
सयोगाख्यमुक्तम्‌ । द्वितीयो. व्यूहो रोगदेतुस्यानीयो देयदेतुस्वव्रिवानिषि- 
ततसाहितः प्रधानपुरुपरपयोग उपवर्भेतः । उक्तपर्किीक्न च सोपपत्तिकोक्ते- 
स्तीद्रषयाकाङक्षानिवृ्यर्थम्‌ ॥ 

अतः प्रं हानम्‌ अगरोग्यत्यानीयं मक्षरास्विप्रयोजने वक्तव्यम्‌ | 
वक्ष्यम'णसंकीतेनं च श्रोतृबुद्धि6्माधानर्थम्‌ । तदभावात्‌ सयोगामावो 
हानं तत्‌ द्ये; कैवल्यम्‌ ॥ | 

तदिति पूरवपरकृताय। अविधायाःप्रत्य्रमरीः । तस्यादृ्चनस्य अविधाय। 
अमावात्‌ बुद्धिपुरषपंयोगस्य दुःखहेतेः अमावः आलन्तिको बन्धनोपरम 
इयः । एतत्‌ दानम्‌ अरेग्यस्थानीयम्‌ । तत्‌ द्धेः कैवल्ये तदेव हानं 
आत्यन्तिको बन्धनोपरमः दृशेः पुरुषस्य केवस्यम्‌ । अस्य व्याख्यानं पुर्ष- 
स्यामिश्रीमावः पुनरप्योगो गुणेरित्यथः ॥ 

पदार्थं व्याल्याय वाक्ययमिदानीं दरीयति- दुःखकारणनिवृत्तो 
दुःखोपरमो हानम्‌ । तदा स्वरूपप्रतिष्ठः पृष इ्युक्तम्‌--1“.स्वसरूपप्रतिष्ठा 
वा चितिशक्तिः” इति ॥ 





1. यो.स्‌. ण. 4. सू. 34. 


२०४ प।तञ्नलय्रोगसुत्रभाष्यविवरण 


[ भाष्यम्‌ | 
अथ हदनस्य कः प्राप्ट्युपाय इति- 
[ सूत्रम्‌ ] 
विवेकख्यातिरविष्वा हानोपायः ॥ २६ ॥ 
{ भाष्यम्‌ ] 
सतवपुरुषान्यताप्रययो विवेकस्यातिः । सा तु अनिवृत्तमिथ्या- 
ज्ञाना पवते । यदा मिथ्याज्ञानं दरग्धवीजमावं चन्ध्यप्रपवं सम्पद्यते, तदा 
विधूतङ्केधरजसः सत्वस्य परे वेशारये परस्यां वरीक्रारपंज्ञायां वतैमानस्य 
विवेकप्रययगरवाह्ये निमेरो भवति । 
[ विवर्णम्‌ ] 
ननु च अनियतत्रिपाकस्य कर्मणः सद्भावे कथ हानं स्यात्‌ ए पुनरनियत- 
विपाककर्मेणा श॒रीरस्यारम्भ इति । न-अमिहितप्रतिविधानल।त्‌ । प्तम्यग्दर्शनेन 
हृरावीज्य ददातु कर्मणामनारम्भकलमुक्तं दग्धबीजभावपर्न।ततुषशलितण्डुङ. 
निदशनेन । तस्मात्‌ न विदुषः कारणामवराच्छदीरारम्मः ॥ २५ ॥ 
उक्तस्तृतीयो स्यूहः--आरोग्यस्थानीयो हाने नाम } अधुना चतुथ व्यूह 
भेषञ्यस्थानीयमुपाचिद्यासन्नाह - हानस्य कः प्राप्लयुपायः१ इति ॥ ` 
ननु च कथं हानस्य प्रप्टुपाय इति ? यावता नेव हानपतवस्तुखात्‌ 
प्राप्यम्‌ । बन्धनोपरम एव हि हानम्‌ । नैष दोषः । यत्नसाष्यलादवियानिवृत्तेः 
यथा निगछमेदः । सम्यकूष्यातौ स्यामविचानिवृत्तिरिति हानमत्रस्स्रपि 
प्राप्यमित्युपचयैते ॥ 
विवेकस्यातिरविप्ठवा हानोपायः । का पुनविवेकल्यातिरियाह- 
सत्व पुरुषान्यताप्रतययः सखपुरुषयोः साधम्थवेधम्थयायास्यावब्ोध इव्यथः । सा 
तु विवेकख्यातिः अनिवृत्तमिष्याज्ञाना विग्मुवत्ते न स्थिदभवति,) न काक्षमेति ॥ 
तथा चोक्तम्‌--“्यथा हेमाविपक्तं न विराजते । 
तथाऽपक्रकषायस्य विज्ञानं न प्रकाशते ॥" 
तया “कामग्राहगृहीतस्य ज्ञानमप्यस्य न पुवः" । इति ॥ | 
यदा तु मिथ्याज्ञाने दग्धबीजमावे दम्धनीजत्वादेव वन्ध्यप्रप्वं 
कायौरम्भाक्षमं समयते, तदा विधूतङ्कश्रजसः छशा एष रजः विधूते यस्य 
तद्विधूतङ्केरारजः तस्य सस्य रागदिमलसकलङ्कितस्य परस्यां वद्ीकरारपन्ञायां 
वमानध्य ज्ञानप्रसादमात्रे वर्तमानस्य । तदेवानुत्रदति--विषेकप्रत्ययप्रवादं 
विवेकक्ञननिरन्तरम्ः निर्मलो भवति ॥ 


५५ 


साधनपादो "द्वितीयः २०५ 


[ माष्यम्‌ | 
सा विवेकख्यातिरविषुव्रा हानोपायः । ततो मिथ्याज्ञानस्य 
दग्धुत्रीजमावोपगमः पुनशवप्रसव इयेष मोक्षघ्य मगौ हनस्योपाय 
इति ॥ २६ ॥ 
सूत्रम्‌ | 
तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥ २७ ॥ 
[ भाष्यम्‌ |] 
तध्येति प्रद्युदितख्यातेः प्रया्रायः। सप्तधति, अश्ुद्धधावरणमला- 
पगमात्‌ चित्तस्य प्रययान्तरानुत्पादे सति सपप्रकारेव भ्रज्ञा विवेकिन 
भवति ॥ 
तथथा- परिज्ञातं दहेयं नास्य पुनः परिजञेयमस्ति । क्षीणा 
हेयहेतवो न पुनरेतेषां क्षेतन्यमस्ति । 
| विवरणम्‌ | 
सा विवेकख्यातिः इत्थ भूता सती अवित्रा भवति । यदैवमविष्वा 
विवेकख्यातिः ततो मिथ्याज्ञानप्य दग्धबीजपरविपगमो विरुदधघरात्‌ । 
पनश्याप्रपवः मिथ्याज्ञानस्य द्ग््र्बजमावोपगमादव । तया चोक्तम्‌-- 
^“ धरीजान्यग्नयुपदग्धानि न रोहन्ति यथा पुनः । 
ज्ञानदग्धेस्तथ। इगेनस्मि सम्पद्यते पुनः ॥'” इति । 
सा च तारी विवेकल्यातिमेक्षिस्य मार्गो हानस्वोपाय 
ह्यधः ॥ २६ ॥ 
उत्पनसम्यग्दरानस्य सम्यग्दशंनोत्पत्तौ स्वानुमवप्रत्ययटिङ्गप्रकटीकरणा्थ 
माह-- तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा । तस्येति ` ्रस्युदितल्यातेः प्रस्युसन- 
सम्यग्दरोनध्य प्रत्याम्नायः प्रस्यवमरौः । सक्तधेति अद्युद्धबावरणमलपगमात्‌ । 
अश्युद्धिरेवावरणे छेशाः कमणि च, तदेव मर तस्यपगमात्‌ चित्तस्य 
प्रत्ययान्तरानुत्यादे ममाहमिति च परिरृदधप्रव्ययान्तराणापनुतत्तो । सप्तधेत्यस्य 
विवरणं सुपतप्रकारेव प्रज्ञा बुद्धिः विवेकिनो भवति ॥ 
तान्‌ सप्त प्रकारान्‌ क्रमणाचष्टे- यथा परिज्ञातं देयं सव॑ दुःखं हेयं 
्ञातवुपपत्तिभिः । नाश्य पर्ितव्यो दुःखप्रकरारः ॥ 
क्षीणा दहेयदेतव इति बहूवचनप्रयोगत्‌ छशाः कर्माणि च 
अभिधीयन्ते । न पुनेरषां केराकमणामस्पमपि सम्यग्दरोनपावकादग्धवीजा- 


२०४ पातञ्जरयोगसूत्रभाष्यविषरणे 


{ भाष्यम्‌ ] 
साक्षाकछरृते निरोधसमाधिना हानम्‌ । भावितो विवेकल्यातिरूपो 
हानापाय इति। एषा चतुष्टयी कार्यविमुक्तिः प्रज्ञायाः ॥ 


चित्तविमुक्तिस्तु तरयी चरिताधिकरारा बुद्धिगुण्रा गिरिरिखरक्टय्युत। 
श्व ग्रावाणो निए्वस्यानाः स्वकारणे प्रख्यामिमुखाः सह तेनास्तं गच्छन्ति । 
न चेषां प्रतिप्रडीनानां पुनरस्सयुत्मादः प्रयोजनाभावात्‌ इति । एतस्यामव- 
स्थायां गुणसम्बन्धातीतः स्वरूपमात्रज्योतिः पुरषः केवरी शुद्ध इति ॥ 

{ विषरणम्‌ |] 

भावात्‌ क्षेदुस्रक्षि)तम्यमस्ति । एतेनापि प्रान्तमभूमित्वमेवोक्तम्‌ । इत्यं च 
परत्युपस्थितम चनप्रत्ययस्य क्षीणङ्केशत्रात्‌ न ॒क्षेतन्यमस्ति । कृतकरण- 
योऽहमिति च सम्यग्ददनपरिपाकटिङ्गप्रस्यय उपावर्तते । यथा रोगातुरश्य 
रेगहेदुक्षये रोरोगोऽदं न पुनरषज्यमस्तीति प्रत्ययः । एवेमव [ष] द्वितीयः 
प्रज्ञप्रक्रर्‌ उक्तः ॥ 

साक्षात निरोध्तमापत्तिदीनम्‌। हानप्रप्यासन्नघात्‌ ह नतुस्यरूपलाच्च 
निरोधसमाधिरेव हानमित्याह्यायते । तच्च साक्षाक्तम्‌ अमुभत्रविष्रयतामानीतम्‌ । 
तदिद कैवल्य पथैवत्तितम्‌ वैवल्यं कतैन्यमिति च श्रज्ञायते। एषोऽपि 
प्र्तभूमिग्रज्ञाप्रकारः तृतीष आस्यतः ॥ 

भावितः सम्यगम्यस्ततरः विवेकल्यातिरूपो हानोपायः । सम्यग्दर्शनं 
यथाषटुपस्थितमिति निश्चिता चेध्ज्ञा विवेकिनो जायते स एष चतुर्थः प्रज्ञा- 
प्रकारः । इत्येषा चतुष्टयी कायेविुक्तिः कायौत्‌ कतम्यात्‌ विुक्तिपस्याः 
प्रज्ञायाः सा कर्यविमुक्तेः चतहूपा प्रज्ञा पुरुषथकतग्यतेत्यधैः | 

अथ बा-कायस्य विमुक्तेः निङृत्तिः कायविमुक्तिः । सच चतुष्टयी 
कायैविपुक्तिरिति समाप्ते वाक्यम्‌ । प्रज्ञा इति परेण सेतरष्यते । कथम्‌ ग्रहा) 
यक्तम्‌, विवेकद्यातियुक्तं॒चित्त प्र चित्ते तस्य ।पपुक्तिः प्रख्यः प्रज्ञाचित्त- 
विभुक्तिः। सा त्रयी | तथा च वक्ष्पति-पुरषायश्चन्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः 
" कैवयम्‌' इति ॥ 

तत्र का्विमुक्तिश्वतुष्टयी । पुरूषाथयन्यतवं पूमुक्तम्‌ । इदानी बुद्धिगुणा- 
निदृतिः । पुरुषाथकतन्यानां पुरषायसुल्यानां प्रतिप्रसवः प्रज्ञाचित्तविभुक्तिश्जयी 


1. यो, सु, पा. 4. सु, 34. 


साधनपादो हितीयः २०७ 


| भाष्यम्‌ ] 
एतां सप्विधां प्रान्तभूमिप्रज्ञामनुपहयन्‌ प्रषः कुशल दयाख्या- 
यते । प्रतिप्रपतवेऽपि चित्तस्य मुक्तः कुशल दयेव भवति, गुणातीततात्‌ 
इति ॥ २७ ॥ 


सिद्धा भवति विवेकल्यातिहीनोपाय इति । न च सिद्धिरन्तरेष 
पाषनं इत्यत इदमारभ्यते-- 
[ सूत्रम्‌ ] 
योगाङ्खाजुष्ठानादश्दिक्षये ज्ञानदी्तिरा विवेकख्यतिः ॥ २८ ¦ 


[| विवरणम्‌ ] 
व्याट्यायते । यथा-- चरिताधिकाराः निवृत्तकर्तव्यःः बुद्धिगुणाः सच्वादयो 
ुद्रशकारावस्थिताः प्रठयाभिमुखाः ¡ किमि १ गिरिशिखरकूटच्युता इव 
गरावाणो निरवस्थानाः कतैन्याभावात््‌ स्वकारणे अंके प्रलयामरमुखाः 
सुह तेन बुद्धिसंस्यानेन कार्येण, अथवा, स्वकारगनाहङ्करिण कुशलं पुरुषं 
प्रति स्वकारणमप्यतयक्तभावं प्रतिपधत इति सह तैनास्तं गच्छन्ति इप्युभ्यते | 
एषा प्रथमा प्रह्ञाचित्तविमुक्तिः ॥ 


न चैषां प्रतिप्रलीनानां पुरूपं प्रति पनरस्च्युवादः प्रयोजना- 
भावात्‌ । विमुक्तं हि चतूर्विधं कार्यम । एषा द्वितीया प्रज्ञाचित्तविभुक्तिः ॥ 

एतस्यामवस्थायां चरितायगुणप्रखधावस्यायां गुणसतम्बन्धातीतः 
गुणक्तबन्धो द्रषदस्यटक्षणः तमतीतः । स्वरूपमात्रज्योतिः दरिस्वरूपमात्रमेऽ 
ग्येतिः । पुरषः केवह शुद्ध इति तृतीया प्रज्ञाचित्तविमुक्तेरिति ॥ 

एतां सष्विधां ्रान्तसूरभिं भ्रान्ताः भ्रगतावसानाः भूमयः अवस्थाः 
यस्यास्तां प्रान्तभूमिं प्रज्ञामनुपदयन्‌ सम्यग्दरोनलिङ्गपरिपिकभूतामैीक्षमाणः 
पुरुषः कुश इयाख्यायते । कुराल इति सङ्केतः । प्रतिप्रसवेऽपि प्रव्येऽपि 
चित्त्य युक्तः कुशर दयेव मूतपूतरगव्या कुरार इव्येव भवति। कुतः 
कौर तस्येद्याह -गुणातीतलात्‌ इति । युणानतीतो हि कुरालः ॥ २७ ॥ 

सिद्धा विवेकख्यातिः समधिगता विवेकल्यातिः सप्तविधग्रान्तमूमि- 
्ज्ञाफङावसाना हानस्योपाय इति । न च सिद्धिः अन्तरेण साधनम्‌ , इलत 
इदं विवेकस्यातिपिद्धिस्ाधनथमारम्यते- योग ङ्ग।चुष्ठानादश्चुदिक्षये ज्ञान- 
दीपिरानिवेकस्यत्तिः ॥ 


२०८ पातश्चरयोगसूत्रभाष्यत्रि वरणे 


[ भष्यम्‌ |] 
योगाङ्गान्यष्टावमिषायिष्यमाणाति । तेषामनुष्ठानात्‌ पएष- 
पर्वणो विपयैयस्या्ुद्धिष्पस्य क्षयो नाशः । तरक्षये सम्यग्जानस्या- 
भिव्यक्तः। रथा यथा च साधनान्यनुष्टायन्ते तथा तथा तनुत्वमश्टद्धि- 
राप्ते । यथा यथा च क्षीयते तथा तथा क्षधक्रमानुरोधिनी ज्ञानस्यापि 
दीिविंवधते । सा खल्वेषा विवृद्धिः प्रकपैमनुमवति भा विवेकख्यातेः, 


आ गुणपुरुपस्वहूपव्िज्ञानादियथः । 


[ विवरणम्‌ ] 
योगाङ्घानुष्ठानादेव विवेकल्यातिरिति न।वदिधारयिवितम्‌ , गुरूपासन- 
धप्ररतिकेम्योऽपिं विवेकख्यातेः सिद्धिरिष्यत एव॒ । कि तर्हि? साधनमत्र 
मन्तरेण न मवद्येवे्यवधारयिष्यते । न पुनर्योगाङ्गानुष्ठानमेव साधनं, 


योगाङ्गानुष्ठानात्त॒ मवलव विवेकल्यातिसिद्धिरिति । तथा चाचा्रक्तम्‌-- 
ध्योगस्तच्वन्ञाना्थैः' इति ॥ 


योगाङ्गान्यभिधायिष्यमाणानि तेषापनुष्ठाने योगा्गानुष्ठानम्‌ तस्मात्‌ 
अद्ध: इ्राट्यायाः क्षयः, तत्क्षये दीप्तिः प्रकषः । किंयदवप्तनेवयाह- 
आ विषेकल्यतिः मवतीदयुपस्कारः ॥ 

स्वयमेव माप्यकारः स्पष्टतरं विवृणेति--योगाङ्न्यष्टावमिधापिष्य- 
माणानि । तेषामतुष्ठानात्‌ पश्वपरवैणो विपयैयस्य अ्ुदिरूपस्य क्षयः नायः) 
तरक्षये सम्य्दरेनस्यािव्यक्तिः दौहिः । `कथमेतद्ववतीलाह-- 
यथा यथा च साधनान्यनुर्ठीयन्ते तथा तथा तनुत्वमश्ुद्धिराप्ते । तथा 
च मनुरमाषिष्-- 


+अक । 


¢ प्राणायमिदेदेदोषान्‌ धारणानिश्च सिल्थिषान्‌ । 
्रत्याहरिण चसर्गान्‌ ध्यानेनानश्वरान्‌ गुणान्‌ ॥” इति । 
यथा यथा चाञ्युद्धिः क्षीयते तथा तथा ततक्षयक्रमानुरेधिनी 
दिवसकरस्येव रिशिराघ्रसनि ज्ञानस्य दीधिर्विवधेते । सा खल्वियं विद्रधिः 
प्रकर्पमतुमवति। किमवततानम्‌ १ तदाह-अ। विवेकख्यातिः । तस्य व्याह्यानम्‌- 
आ गुणपुर्स्वरूपविवेकज्ञानादित्यथैः । स्च पुरषान्यता्यातिपथैवसानैव 
द्धिः ॥ 


साधनपादो द्वितीयः २०९ 
[ भाष्यम्‌ ] 

योगाङ्गानुष्ठानमदयद्धः विषोगकरारणम्‌ । यथा प्ञ्ः उेधस्य । 
विमेकल्यतिस्तु प्रा्िकारणं, यथा धर्मः सुखस्य । नान्यथा करणम्‌ । 
कति चैतानि कारणानि शान्चे भवन्ति ? । नवैवे्ाह । तचथा- 

उतपत्तिस्थियभिग्यक्तिविकासरययाप्षयः । 

वियोगान्यलधृतयः कारणं नवधा स्पृतम्‌ ॥ इति । 

तत्रोसक्तिकारणं, मनो भवति विज्ञानस्य, । स्थितिकारणं, 
मनसः परषायेता, ररीरस्येवाऽऽहार इति । अभिष्यक्तिकारणं 
य(था)दा रूपस्यारोकः तदा दूपन्ञानम्‌ । विक।रकारणं मनसो 
विषयान्तरम्‌ , यथाऽभिः पाक्यस्य । ्रययकारणं धुमक्ञानमभिनज्ञानस्य । 

[ विवरणम्‌ ] 

योगाङ्गानुष्ठानमश्चुदेः क्षयङ्रणं विवेकस्यातेश्च प्रािकारणमिति, 
द्विधेव कारणम्‌ , घभपरजयुद्यस्थानीयमेकमुभयकारणं, नान्यथा मबतीति । 
तत्र कारणप्रसङ्गेन सास््र्रसिद्धानि करनानि व्याचष्ट कति चैतानि 
कारणानि शाश्च भवन्ति ? नवेवेत्याह । तचथ।-- तानि शछेकेनिव कययति-- 

उत्पत्तिस्थिदयमिग्यक्तिकिकासरत्ययाप्तयः । 

वियोगान्यखधृतयः कारणं नवधा स्पृतम्‌ ॥ इति । 

तद््मविरिकार्थमुदाहरणानि प्रस्ताधरिष्यन्ते । तत्रोखत्तिकारणे मनो 
भवति [विज्ञानस्य], मनसो हि इतिः ज्ञानं, यथा जलमूर्धाणाम्‌ ॥ 

स्थितिकारणे स्थितेः कारणम्‌ मनसः पुरुषाथता । मोगापवरगार्थतवेन 
हि मनस्तः स्थितिः । शरीरस्य यथा स्थितिक।रणमाहारः ॥ 

अभिव्यक्तः कारणं सूषस्यारोकरः । तद रूपज्ञानम्‌ । न द्यालेकेनान- 
भिन्यक्ते ख्पेऽवबेोधः ॥ 

विकारस्य कारणं मनसो विषयान्तरम्‌ । विषयान्तरसनिधानेन हि 
मनो विक्रियामाप्तीदति। यथा अभिः पाकस्य । यः पाकस्य विक्रारस्तस्य 
पाकस्य विकारखूपस्यानिः कारण यथा ॥ 

प्रत्ययकाणं धूमज्ञानमन्निज्ञानस्य । प्रत्ययस्य फठ्वतः प्रमाणस्य 
कारणमिध्ययः | पूवत्र तु (भवति विज्ञानस्य ईति ज्ञानस्योपादानकारणं 


विवक्षितम्‌ ॥ 
27 


२१० पातज्ञलयोगसुन्नभाष्यविवरणे 


[ माष्यम्‌ ] 
प्रािकारणं योगाङ्गायुष्ठानं विवेकख्यातिः । बषियोगकारणं तदेवाञ्चुदधेः । 
अन्यतकारणं यथा सुव्णैस्य सुवणैक।रः । एवमेकस्य श्जीप्रल्यस्याविधा 
मूढत्व, दवेषो दुःखले, रागः सुखे, तत्वज्ञानं माध्यस्थ्ये । पतिकारण 
शरीरमिन्द्रियाणाम्‌ । तानि च तस्य । महाभूतानि शयीराणाम्‌ । तानि च 
परस्परम्‌ । सर्वेषां ते्यग्योनमानुषरेवतानि च, परस्पराथस्वादियेवं नव 
कारणानि । 
[ विबरणम्‌ ] 

प्राधिकारणे योगङ्खानुष्ठानं विवेकख्यातेः धप इव इुखस्य । 

तदेवाशुद्धेविंयोगकारणं परड्यति छेषध्य ॥ 


अन्यतकारणं यथा सुवणैकारः पुवर्णस्य । इवर्ण हि भिचख। 
वर्पमानकमन्यं करोति । तथा वर्धमानक भित्वा अन्यदामरणान्तरं करोति । 
तथाऽन्यदिति ॥ 


एवमेकस्य शस्ी इति प्रस्ययस्यापि अविचा कारणं भूढत्वे । 
द्वेषस्तस्थेव स्त्रप्र्ययस्य दुःखत कारणम्‌ । तथा रागः युखतरे । तथा तस्यैव 
माध्यस्थ्ये हेयोपादेयसयून्यतायां विवेकयुक्त ज्ञानं कारणम्‌ । एवमेकः 
तीप्रस्ययः घुवणैवदनेकध। मूढत्वदु ःल्घुखत्वमाप्यस्थ्यादिमेदैर्भिधते ॥ 


धृतेः कारणम्‌ । धारणे धृतिः, तस्थाः कारणं श्रीरमिन्द्रियाणाम्‌ । 
न हि रारीरमप्रयेन्दियाणि धृति कमन्ते । ताति चेन्दियाणि तस्य रारैरस्य 
धृतिकारणं भवन्ति । हइद्धियव्ृत्तिहरेण हि शरिरं धियते ॥ 


तया महामूतान्व।कारादीनि शरीराणां धरतिकारणम्‌ । मह।भूतारन्धानि 
हि दारीराणि ब्रह्म।देस्तम्बावस्तानानि। [तानि च|परस्परम्‌ उपकार्योपकारकतव- 
दरेण पृतिकारणम्‌ ॥ 


तथा सर्वेषां पदानां तैयैग्योनमासुषदेवतानि तिकारणम्‌ । कुतः? 
परस्पराथेत्वात्‌ । तेयैग्योनं मानुषदेवतयोव।हनदोहनदविरादिभिरुपकुवंत्‌ धृति- 
कारणम्‌ ॥ 


मि न्थ = 6. = 


तथा मानुषं इञ्यरक्षणादिमिदेवतेययोनयोः पृतिकरणम्‌ । तथ। 
दैवपरितरयेः रीतोष्णप्रवषं दना धृतिकारणम्‌ ॥ 


साधनपाद्‌ द्वितीयः २११ 


[ माष्यम्‌ ] 
ताति च यथाऽैस॒म्भवं पदार्थान्तरेष्वमि योज्यानि । 
योगाङ्गानुष्ठानं तु दिवैव कारणत्वं कमत इति ॥ २८ ॥ 
तत्र योगाङ्गन्यवधार्यन्ते- 
[ सूत्रम्‌ ] 
यमनियमासनप्राणायामप्रयाहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टा- 
वङ्खानि ॥ २९॥ 
| विवरणम्‌ ] 
एवं वणोश्रमाणामप्यन्येन्वेपकरिण धृतिकारणत्वम्‌ । परस्परोपाश्रयेण 
हि जगदलिलमपि भिये । एवं नवै कारणानि ईति कारणान्तरं प्रतिषेधति । 
तानि च यथाञत्तमबे यो योऽयैसमवः पदाथीन्तरेष्वप्यनुदाहतेषु 
तथा येच्यानि। योगाङ्गानुष्ठानं तु द्विषैव काएणतवं खमते । तथा च 
भव्यास्यातम्‌ ॥ २८ ॥ 
कानि पुनस्तानि योगाङ्गानि? येषामचुष्ठानं हिधा कारणत्वं खमते इति । 
तत्र योगाङ्गान्यवधाथैन्त-यमनियमासनप्राणायामप्रत्यादारपारणाध्वन- 
समाधयोऽष्टवङ्गाति ॥ 
नतु च योगरारान्तरेष्वासनादीन्येव षडङ्गानि । तवथा-षृडन्नो योग 
उच्यते इप्यादि । किश्च-- साक्षादासनादन्यिव समधेश्पकुर्बन्ति, न 


नेर दोषः । यमनियमवतेर्योगाधिकरेपपत्तेः | न हि यथा- 
कामचारिणां योगाधिकारः । भनाविरतो दुश्वरितात्राशचान्तः"' इति श्रुतेः । 
तया-५येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सस्यं भरतिष्ठितम्‌” इप्यादि चाके । तथा 
गीतायाम्‌ अन्रह्यचाखिते ध्थितःः इति । तस्माधमनियमयोरप्यङ्गत्वम्‌ ॥ 

यमनियमयोश्च यमस्य प्रथमोपादाने प्राधान्यस्यापनार्थम्‌ । यमस्य हि 
श्राधान्ये सवैत्र सिद्धम्‌ । यमनियमयुक्तस्याधिकृतस्य योगिन आत्तनाचङ्गाना 
पपू स्थिरपदप्राहस्येत्तरोत्तराुष्ठानं प्रातम्‌ । न हि प्रथमं सोपानमनादद्मो- 
तरमारोदुं शक्यम्‌ ॥ 





1. कटोपनिषत्‌ 2, 24. 
2, प्रश्रोपनिषत्‌ 1. 15. 
३, भगवद्रीता 6. 14, 


२१२ पातञ्चलयोगसूत्रभाष्याविंवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
~ यथाक्रममेषामनु्ठानं स्वदूपं च वक्ष्यामः ॥ २९॥ 
तत्र- 
- सूत्रम्‌ 1 
अदहिसासयास्तेयव्रह्यचयापरिग्रहा यमाः ३० ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 


तत्रार्दिसा पवैथा सरद सर्वमूतानामनाभिद्रोदः । उत्तरे च 
यमनियमास्तन्मूखाः तस्िद्धिपरतयेव तस्प्रतिपादनाय प्रतिपाचन्ते । 
तदवदातरूपकरणयिवोपादीयन्ते । तथा चोक्तम्‌- स खल्वयं ब्राह्मणा 
यथा-यथा त्रतानि बहूनि समादित्सते, तथा तथा प्रमादकृतेभ्यो ईदिस- 
निदनेभ्यो निवतैमानः तामेवावदातरूपामहिसां करोति ॥ 


[ विवरणम्‌ | 
यदन्यत्रोच्यते-- 


^ स्थानासषनविधानाति योगस्य विषयोऽपि बा । 

व्याक्षेपजनकाः सर्वै नते यागस्य देतवः ॥ 

स्वेदोषपरित्यागः समाधिश्ेति तदट्भयम्‌ ॥ 

निणय[यात्‌ ]योगहेतुः स्याद्धवति वान्यन्न वा [भवत्वन्यन्न वा 
मवेत्‌ ] ॥'” ईति । । 

तत्समधिसवदोषपसियागयोः प्राधन्यात्‌ तत्सतुत्यथम्‌ , नाप्तनाबङ्ग- 
प्रतिषेधथेम्‌ । यथाक्रममेषां यमादानामनुष्ठानं स्वरूपं च वक्ष्यमः- 
स्वरूपे हि अनवगते नानुष्ठातुं शक्यमिति ॥ २९ ॥ 

तत्र तेष यमाद्विषु प्रथमे यमा व्याघ्यायन्ते--अर्हिसाप्तव्यास्तेय- 
ब्रह्मचयौपरस्प्रहा यमाः। ततार्दिसा सवथा सर्वांसिना स्वैप्रकररिेण, 
स्वैमूतानामनभिद्रोहः पवैभूतानां स्थावरजङ्गमानां अनभिद्दोऽपीडनम्‌ ॥ 

यमनियमानामरहि्ता प्रघानमूता कायवःङ्मनसैः सवासना करणीयेति 
दरायति--उत्तर च यमाः सत्यादयः तन्मूडाः अदहिंसाप्रयोजनाः अर्हिसाथ।ः 
तस्सिद्धिपरतयेव अदिंसापिद्धितवपरतवन प्रतिपाचन्ते । किमुक्तं भवरतीत्वाद- 
तद्वदात[हूप]करणायोपादीयन्ते अदिसाञचद्धितिपादानयोपदीयन्ते ॥ 

तथा हक्तस्--स् खल्वयं ब्राह्मणो यथा यथा बहूनि त्तानि 
समादित्सते तथा तथा म्रमादकृतेम्यो दिपातिदनेम्यः हिंसामूढेम्यः 
धिसाकारणेम्यः निवतेमानस्तमेवावदतरूपमरदिषां करोति इति ॥ 


साधनपादो हितीयः २१३ 


[ भष्यम्‌ ] 
सलं यथार्थ वाङ्मनसे । यथा चष्ट यथाऽनुमिते तथा वाक्‌ 
मनश्वेति । परत्र स्ववोधक्रन्तये वागुक्ता; सा यदि न व्िता 
भन्ता वा प्रतिपक्तिवन्ध्या वा भवेदिति । एषा सर्वैमूतोपकारार्थं प्रवृत्ता 
न सूतापघ(ताय । यदि चंवमप्यमिषीयमाना भूतपरधतत्तिपरव स्यान्न सल 
भवेत्‌ ; पापमेव मवेत्‌ । तेन पुण्यासेन पुण्यप्रतिह्पकेण कष्टं तमः 
्राप्तुयात्‌ ॥ क 
[ विवरणम्‌ ] [र 
` सत्याथनेकत्रतेपादानात्‌  अन्यषामविरुदधव्रतानां चेोपादनाव्‌ 
दिंसाकारणानिद्र(त्तित्तस्य हिसाकारणादुपंरतपस्स्िरणस्य अर्दिसेवावदाततरा 
कारणाभावदुपजायते | यथा भिक्षादित्रतादुषठाने कृष्पादिदिंसानिदाननिवृत्तिः ॥ 
सस्यं यथा श्ट यथा अनुमितं यथाश्रुतं तथा वाख्नश्चेति। 
तत्सत्यम्‌ । एतदुक्तं मवति-अन्नन्तेः प्रमणिः यथार्यावगमः सन्ञातः, तमवगमं 
तथेव परत्र सक्रमयितुं वाङ्गनसाम्यां तथेव प्रवतेन सत्यमिति ॥ 


तदेवाह - पश्र स्वषाधसंक्र(न्तये वागुक्ता । सा यथाऽवगता्थाऽपि 
य॒दि न वश्चिता | यथा स्व्यमेव परविप्रखम्भना् प्रयुक्तं देराकारवयपेक्षया 
कषचिदनृतायते, यथा युष्ठिरस्य अश्वत्थामा इतः स कुक्नर इति ॥ ` 


भ्रान्ता वा यथा सत्यमिति मन्यमानोऽचृतमेव वदति । प्रतिपत्तिवन्ध्या 
वा--श्रोतुः प्रतिपादनायापयप्ता--यथ। सन्दिग्धं वाक्यमगृह्यमाणप्रकरणादि- 
विशेषम्‌ । कष्टराब्दो व। अजावय इत्यादिः ॥ ह 


तस्मदिवमादिदोषरहिता एषा वाक्‌ छजुमनस्सहचारिणी सर्पभूतोपकारा्थं 
परवत्ता स्यतामास्कन्दति । न॒ भूतोपघाताय प्रदत्ता यथाथबठावानाऽपि _ 
सत्यतामापचते ॥ 


य॒दि चैवमपि उक्तेन प्रकरेण निदोषापि अभिधीयमाना भूतोपधात-" 
परैव स्यात्‌, न स्यं भवेत्‌ , न हि प्रणिषातारम्निन. .वश्ननादिदोषन्नय 
विप्रोभिताऽपि सस्यत्वं प्रतिपद्यते । पापमेत भवेत्‌ ॥ 3 


24“ 


तदेवाह- तेन पुण्यामासेन पण्यप्रतिजि्बकेन सत्यकोरिकभः 
वचनदेरीयेन कष्टं तमः प्राप्नुयात्‌ । तस्मात्‌ परीक्ष्य सवेहितं सत्यःजूयत्‌ी 


२१४ पातञ्जरयो गसुन्रभाष्यविवरणे 


( भष्यम्‌ | 
स्तेयम्‌ अशाखपूवकं द्रव्याणां परतः स्वीकरणं, तसरतिषेषः पुनः 
अस्पहारूपमस्तेयमिति । व्रह्मचर्य॑रुतेन्द्रियस्योपस्यस्य संयमः । 
विषयाणामजैनरक्षणक्षयसङ्गदिंसादोषदरशनादस्वीकरणं अपरिग्रह ईयते 
यमाः ॥ ३० ॥ 
ते तु- 

[ सत्रम्‌ 
जातिदेदाकाङसमयानवच्छिन्नाः सा्भोमा महाव्रतम्‌ ॥३१॥ 
| भाष्यम्‌ ] 
त्राहिसा जालवच्छिन्ना-मरस्यवन्धकस्य मस्स्येष्वेव नान्यत्र दिखा । 
[ चिवरणम्‌ |] 

उक्त च- 

^^ सत्यं ब्रूयात्‌ श्रियं नूयान्न त्रयात्‌ सत्यमग्रियम्‌ । 

प्रियं च नानृतं ब्रुयदेष धेः सनातनः ॥' इति । 

स्तेयं अशाश्चपूवं द्रव्याणां प्रतः स्वीकरणं सृहानिमित्तम्‌ । यत्‌ 
स्तेयं तसपरतिषेषस्तु न षपृहाद्लां सम्मवतीति तस्यैव स्तेयस्य प्रतिषेधस्तु । 
सः अष्पृहारूपमस्तेयमुष्यते ॥ 

ब्रह्मचयं गुपरन्द्ियस्य गुप्तान्येन्दियस्य पुरुषस्य अब्रह्मचरयार्थवाङ्मनसादि- 
दृत्तिदयत्यस्य उपस्थेन्द्रियसंयम इति ॥ 

विषयाणामाजैनरक्षणक्षयसङ्गर्दिसादोषदरेनादस्वीकरणम्‌ अनुप 
दाने अपररह । न पुनरसामस्यैनस्वरीकरणम्‌ । इत्येते यमाः ॥ ३० ॥ 

अन्यधमीणां जातिदेशकालधवच्छेदेनानुष्ठानादिह।पि तथा प्रसङ्ग इति 
तश्परतिषेधाया्--एते सिति । एते चर्दिस्ादयो महप्रतसंज्ञाः सेन्यास्तवतामदुषठा- 
नीयाः । कीदृशास्ते महात्रननामान इति- जातिदेरकाटक्षमयानवच्छिन्नाः 
सावंमौमा महात्रतम्‌ । महश्च तत्‌ व्रतं च महाव्रतम्‌ । महस्त च सार्वमोमलरम्‌ ॥ 

कथं पुनजात्यायनवन्छिनत्वमेषामिति अनवच्छेदप्रतिपादनाय न्यतिरेकेण 
अहिंसामुदाहरति-- तत्र अहिपता जालयवच्छिन्ना मत्स्यबन्धङ़स्य मस्स्येष्वेव 
नान्यत्र मत्स्यजतिर्हिष्ा । सा च महस्यजालवाग्छिना मत्स्यभूमेमनद्नुबाना 
पर्तत इति अतार्वमोम्पेव ॥ 


साधनपादो दितीयः २१५ 


[ माष्यम्‌ ] 
षेव देशावन्छिन्ना-न तीये हनिष्यामीति । सेव काठावच्छिन्ना-न चतुर्दश्या 
न पुण्येऽहनि हनिष्यामीति । सेव त्रिभिर्परतस्य समयावच्छिन्ना. 
देवग्राह्मणा्थं नान्यथा हनिष्यामीति । यथा च क्षलियाणां युद्ध एव 
हिसा नान्यत्रेति । एमिजीतिदेशकालसमयेरनवच्छिन्ना अहिंसादयः 
सर्वैथेव परिपरनीयाः । सर्वभूमिषु सर्वविषयेषु स्ैयेवा विदितव्यमिच।रः 
सावैभोमा महाबतमिद्युच्यन्ते ॥ ३१ ॥ 

[ सूत्रम्‌ ] 
दोचसंतोषतपर्स्वाध्यायेश्वरपरणिधानानि नियमाः ॥ ३२ ॥ 
[ भाष्यम्‌ |] 

तत्र शोच मृजजरादिजनिते मेध्याभ्यवहरणादि च बाह्यम्‌ । 
आभ्यन्तरं चित्तमठानां आक्षाठनम्‌ । संतोषः संतिहितपाधनाश्रसादषि- 

{ विबरणम्‌ ] 

सेवािसा देशावच्छिन्ना कथम्‌ ? न तीर्थ प्रयागदौ हनिष्यामीति । 
तीर्थष्व्हिसा च तीथीदन्वं देशं न व्यश्नुत इति असधरभौमी ॥ 
सेव च कालावच्छिन्ना यथा-न चततुदश्यां न पुण्येऽहनीति। चतुरदर्यादि- 
काठादन्यं काठं न व्यदनुत इति साप्यत्ार्षमैमी ॥ 

त्रिभिः अपि जातिदेशकिः उपरतस्य तस्येव मत्स्यबन्धकस्य 
समयावच्छिन्ना समयः कर्वन्यतानियमः, कथम्‌? देवत्राह्मणार्थं हनिष्यामि 
नान्यथेति, श्राद्धादिसमयमूमिमनद्दुवान। वतत इति साऽपि न सवेमौमी । यथा 
च कषत्रियस्य युद्ध एव दिसा नान्यत्रेति समयावग्छिनस्यैवोदहरणम्‌ ॥ 

ये पुनेरते यमाः जातिदेश्चकारठसमवेरनवच्छिन्ना अर्हिसादयः, 
ते स्येव परिपालनीयाः सर्वभूमिषु जत्यादिषु सर्वविषयेषु स्पराणि 
सवेयेवाविदितन्यभिचाराः विना व्यभिचरिण, ते चेत्यं विशिष्टाः सवंमोमा 
महात्रतमिव्युच्यन्ते ॥ २३१ ॥ 

शोचसन्तोषतपस्स्वाध्यायेशवरप्रणिधानानि नियमाः । तत्र शचं 
मदादिजनितम्‌ अआदिशब्द।दुदकं च । मेध्याम्यवहरणानि च धृतपय- 
भादीनि भक्षणानि । चशब्दात्‌ मेष्यदरंनश्रवणादीनि च । बाद्यमेतच्छौचम्‌ ॥ 

आम्यन्तरमधुनोच्यते--वित्तमलानां कामकोधरादौनां तद्मतिप्षमाव- 
नासचठिडठिः आक्षाठनम्‌ ॥ 


२१६ पातञ्चल्योगसून्नभाष्यविवरणे 


( भाष्यम्‌ ] 

कस्यानुपादिस्सा । तपो हन्दरसहनम्‌ । इन्दाश्च जिषत्सापिपाति; शीताष्णः 
सानासने, काष्ठमोनाकारमने च, व्रतानि चेषां यथायोगे कच्छरचान्द्रायण- 
सान्तपनादीनि । स्वाध्यायो मोक्षशाक्ञाणामध्ययनं प्रणवजपो वा। 
ईृश्रभणिधाने तस्मिन्‌ परमगुरौ सर्वैकमपणम्‌ ॥ 

शपग्यास्ननख्ोऽथ पथि व्रजन्‌ वा खशः परिक्षीणवितकजालः । 

संसारथीजक्षयमीक्षमाणः खान्निययुक्तोऽमृतमोगमागी ॥ 
यत्रद्मुक्तम्‌--“ततः प्र्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायामावश्' इति ॥ ३२॥ 


[ विवरणम्‌ | 
सन्तोषः सक्नार्तसाधनाश्वासात्‌ सीनीहतादाग्रासीनमित्तात्‌ अधिक- 
साधनानुपादित्सा सननिहितमात्रादतृप्तौ सत्यामप्यटंप्रवययः ॥ 


तपो दन्दरसहनम्‌ । दन्द जिषत्सापिपासे । निषत्ता भन्तमिच्छ । 
पातुमिच्छा पिपासता । जिषतसापिपाप्तास्तहनं तपः । सखख्येणेव [वा] ते 
जिषततापिपासे} अल्पीयःपानाशननिमित्ते तपः । शीतोष्णे अप्रतिक्रियमाणे 
त्पप्रतिक्रियि वा तपः: । स्थान।[षने '"तिष्टेदहनि रात्रावाप्तीत' इति 
स्मृतिप्रस्थानम्‌ । काष्ठमूनकाष्मौने । वा्ठमौनं हस्तभ्रयागदिरहितम्‌ । 
अकष्टमैनं हस्तादिप्रयोगयुक्त सम्भाषणादिरहितम्‌ ॥ 


व्रताति चेषां योगिनां यथायोगं यथासम्भवम्‌ | दोमादिविरुद्धधर्मविरुद्- 
प्रतिषेधार्थं ययायोगमित्याह । कानि तानिः कृच्छरादीनि । कृच् प्राजपपप्यादि। त्यं 
प्रातः त्य सायं ज्यहमधाद याचितम्‌ । उपोषणं यदहम्‌" इति । चान्द्रायणं 
यवमध्यपिपीठिकामस्यादि । एकेकं वर्धयत्‌ ग्रासम्‌ 'इत्यदिस्णृतिः। सान्तपनम्‌- 

"गोमूत्रे गोमयं क्षीरं दपि सर्पिः कुशोदकम्‌ । 

क 

एकरत्रापवसश्र कुच्डरः सन्तपनः स्मृतः ॥ ' 

एतान्येव द्रग्याणि त्रिरम्यस्तानि महापान्तपनम्‌ । आदिग्रहणे पराकादि- 
्रदयुपादानायम. । स्वाध्यायो मोक्षशा्ञाध्ययनम्‌ उपनिषदाघष्ययनं 
प्रणवजपो वा । श्रलक्चेतनापिगमेोऽप्यन्तरायाभावश्वेति ॥ ३२ ॥ 





1. गौतमधमंसूत्र प्र 3. अ, 8.सू. 6, 
2. अत्रे मः५ किञ्चित्‌ तरित कांश । 


साधनपादो द्वितीयः २१७ 


५ [ भाष्यम्‌ ] 
एतेषां यमनियमानाम्‌ 
[ सूत्रम्‌ ] 
वितकबाधने प्रतिपक्षभावनम्‌ ॥ ३३ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
यदाऽख ब्राह्मण हिसादयो वितकौ जायेरन्‌ , हनिष्याम्यद्‌- 
मपक्रारिणम्‌ , अनृतमपि वक्ष्यामि, द्रव्यमप्यख सखीकरिष्यामि, दारेषु 
चाल व्यवायी भविष्यामि, परिग्रहेषु चाख खामी भविष्यामीति; 
एवमुन्मारप्रवणवितक्रञ्वरेणातिदीपेन बाध्यमानः तस्रतिपक्षान्‌ मावयेत्‌ । 
घोरेषु संसाराङ्गरषु पच्यमानेन मया शरणपुपागतः स्वमूता- 
मयप्रदानेन योगधर्मः । स खसं लक्ता वितकन्‌ पुनः पुनसतानाददान- 
स्तुल्यः श्ववृत्तनेति भावयेत्‌ । 
[ विवरणम्‌ ] 
तन्न यमनियमानां विरुद्ास्तकीः वितकोौः, तैः वाने सति प्रतिपक्षान्‌ 
मवियेत्‌ अभिधास्यमानेन प्रकरेण । अप्रतिभान्यमाना हि विततकौ योगिनं 
हिसादिषु प्रणिधापयेयुः ॥ 
य॒दा अस्य ब्राह्मणस्य वितर ईिसादयो जायेरन्‌ । तत्राहिसादि- 
वितकौ ये वा हिंसादयस्ति वितकीः कीटदा इति £ ततन्ाहिसाया वितर्कः हिसा 
हनिष्याम्पपकाछिणिमिति । तथा सत्यस्य अनृतं वरिष्यामीति विरुद्धः प्रव्यये। 
वितक॑ः । तयेवास्तेयस्थ वितकः द्रव्यमस्य स्वीकरिष्यामीति । तथा 
ब्रह्मचये्य वितकंः द्रेषु॒चास्य गमिष्यामीति । तथेवापरिप्रहस्य वितर्कः 
प्येष चास्य स्वामी भविष्यामीति ॥ 
अस्येवयेतव्‌ सर्भैत्र॒दहिसादिषु अनुगमप्रतिपादनार्धम्‌ । द्रव्यमस्य 
स्वीकरिष्यामीति परन्यस्यालसंबन्धकरणम्‌ । परिहेषु चास्य खाति 
परसंबन्धिष्वेव द्रव्येषु खयं स्वामीति । यथा कुमारनरपतिस्चिवादीनाम्‌ ॥ 
इत्थमुन्मागहारिणां वितक्षञ्रेण दीपेन बाध्यमानस्तसतिपक्षान्‌ 
भावयेत्‌ ॥ 
कथं भावयेदिति? घोरेषु रंसाराङ्गरषु पच्यमानेन मया 
ररणमम्युपगतः स्वैमूतामयभ्रदानेन योगपरमेः। स॒ खल्वहं यक्ला वितर्कान्‌ 
दिसादीन्‌ पुनस्तानाददानस्तुस्यः शवृत्तनेति । छन इ इत्तं यस्य सः 
शवदृत्तः । श्ववद्रा दृत्तः श्ववृत्तः । ते" तुल्य इति भावयेत्‌ । यथा 
२६ 


२१८ पातञ्जलयो गसूत्रमा्यविवरणे 


यथा श्वा वान्तावरुही तथा क्तख पुनराददान इति । एवमादि 
सूत्रान्तरेऽपि योज्यम्‌ ॥ ३३ ॥ 
सूत्रम्‌ ] 
वितक हिंसादयः छतकारितानुमोदिता लोभकोध- 
मोहपूवैका मरदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफरा इति 
प्रतिपक्षभावनम्‌ ॥ ३४ ॥ 


भाष्यम्‌ | 
तत्र हिसा तावत्‌- कृता कारिता अनुमोदितेति त्रिधा । एकैका 
पुनक्षिषा--ोमेन मां चरमा्थेन, कोपेन अपकृतमनेनेति, मोदेन ष्मो मे 
भविष्यतीति । रसोभक्रोषमोहाः पुनञ्िविधाः- मृहुमध्याभिमात्रा इति । 


[ बिवरणम्‌ | 
शवा वान्तावलेदी तथा यक्तस्य पुनरादाने कुषन्‌ इत्युपस्कारः । तेन पुरुषेण 
तुल्येऽदमिति | तथा कथमहं मेयं, न युक्तमेतदिति भावयेत्‌ ॥ 


इयवमादि सुत्रान्तरेऽपि निय॒मसूत्रेऽपि योञ्यम्‌ । शौचादीनां प्रधिकं 


त्रित दष्टन्याः शौचं न करिष्यामीव्याद्यः । मग्यि तु यमानामिव प्रदंनम्‌ , 
तेामवर्यकतैभ्यलात्‌ , अकरणे च दोषगोरवात्‌ , अत्यादरा्थम्‌ ॥ ३३ ॥ 


वितकौणां खद्प मेदः प्रभवहेतुः फठं च सूब्रेणेव प्रदस्य॑ते- वितकी 
हिंसादय ईति स्वरूपम्‌ । कृतकारितानुमोदिता इति मदः. सोमक्रोषमेद- 
पूवैक। इति प्रमवहेतुः- । मरृदुमध्यापिमात्रा इति मन्दमष्योत्तमदोष्म्‌ । 
दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम्‌ । फठं वा तेनेव व्याख्यायते ॥ 


तत्र हिमेव एका उदाष्ियते सर्वषां प्रदर्शनाय । सा करता कासि 
अनुमोदितति तरिविधा । कृता खव्यपारेण । करिता प्रयोञ्यन्यापरेण । 
मदिता परेषां व्यापरिण मन्ता असुन्ञाता॥ 


एकेका पुनस्िधा। कथम्‌ ? सोमेन, मांसचमौ(खिःर्थी मृगं हिनस्ति। 
५ 


क्रोधेन, अपकरतमनेनेति। महिन, धमा मे भविष्यतीति । एवमेते नव मेदाः । 
एकैक(तेन)स्य एुनस्निधा मेदः । कथम्‌? ठोमक्रोषमोहाः पुनस्तिषा 


साघनपादो द्वितीयः २१९ 


[ भाष्यम्‌ | 

एवं सपर्विशतिर्भदाः मवन्ति हिसायाः । मृदुमध्याधिमात्राः पुनन्िषा- 
मृदुश्दुः, मध्यगः; ती्रृदुः इति । तथा बृदुमध्यो मध्यमध्य 
तीव्रमध्य इति । तथा मृदुतीव्रो मध्यर्तीत्रोऽधिमात्रतीत्र इति । ए- 
मेकाशीतिमेदा रिष भवति। सा पुनर्मियमविकलपसमुचयमेदाद सर्ल्येया, 
प्राणभृद्धेद्याप्सिङ्ख्पेयतादिति । एवमतृतादिष्वपि योज्यम्‌ ॥ 

ते वलखमी वितश्मं दुःखाज्ञानानन्तफडा इति प्रतिपक्षभावनम्‌ । 
दुःखमज्ञानं च अनन्तफठं येषामिति प्रतिपक्षभावनम्‌ । तथा च र्हिसकर- 
स्तावत्‌ प्रथमं वध्यस वीर्यमाक्षिपति । ततश्च शखादिनिपातनेन 
दुःखयति । ततो जीवितादपि मोचयति । ततो वीयाक्षेपादख चेतनाचेतन- 

[ विवरणम्‌ | 

मृदुमध्यार्धमात्ता इति । [एकेकं पुनः] त्रिधा मवति-- मृदुभरदुमध्यग्रदु- 
स्तीत्रमृदुरिति 1 तथा मृदुमध्या मधप्यमध्यस्तीत्रमध्य इति । तथा 
मृदुतीव्रो मध्यतीनरस्तीन्रतीव्र इति । एवं एकारीतिभेदा हिसा भवति ॥ 

सा च पुनः एकाशीतिभेदाऽपि सती निथोगाविकत्पसमुच्चयभेदात्‌ 
जसङ्ख्येया । यथा नियोगमेदः-कशिनियुक्तः सनन्यं नियुङ्के; यथा रज्ञः । स 
चपि नियुक्तः परम्‌, स चापि परमिति। ते च सै नियुक्ताः समुच्चयेन 
विकल्पेन च। हिंसन्ति । तथा मूरनियेकक्तापि नियोओ्यैः संहत्य विकल्प्य च 
दि ्तामनुतिष्ठतीति । वव्यघातकादिश्रागिभेदस्यासङ्ख्येयत्वादिति । एवमन्र 
तादिष्वपि योऽयम्‌ । कृतकार्तिनुमोदितादि योऽयम्‌ ॥ 

ते खल्वमी वितकरां दुःखाज्ञानानन्तफलाः । दुःखं चक्ञानं च 
दुःखज्ञनि, ते एत्रानन्तं फट येषां ते दुः खाज्ञानानन्तफलाः। दुःखमेषामनन्ते 
फलम्‌ । अज्ञाने वचेषामनन्तं फलम्‌ । तस्मदेतान्‌ वितर्कान्‌ मनताऽपि 
नेपेक्षयेदिति प्रतिपक्ष मावयेत्‌ ॥ 

तत्र हिस्यस्य त्रिप्रकारा. पडा प्रतिपाच्ते तद्वेददपेण फल्मेद- 
प्रदर्शनार्थम्‌ । तथा च र्दिप्तको वध्यस्य बकीयंमाक्षिपति । घातकरूपाव- 
रोकनभत्सेनादिना त्रस्तस्य वीयमाक्िप्य शस्त्रादिनिपातनेन दुःखयति । 
ततो जीवितादपि मोचयति । प्रणिभ्यो वियोजयति ॥ 
` 1. अत्र आदर्बकोरो (अनन्तः इयेतदुपरि श्वैर्याग;° इत्यादि अनन 
(.21) पुटे मुद्रिते वाक्यं दयते । तस्यानन्बयात्‌ आदशंकोशचे पुटद्वयन्यवद्ितं “फर? 
दत्यादिवाक्यं योजितम्‌ । 


२२० पातञ्जटयोगसूत्रभाष्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ ] 

मुपकरणं क्षीणवीयं भवति । दुःखोखदान्नरकतिर्यक्पेतादिषएु दुःखमयु- 
भवति, जी वितव्यपरोपणात्‌ प्रतिक्षणं च जीवितालये वर्षमानो मरणमि- 
च्छन्नपि दुःखविपाकद्य नियतविपाक्वेदनीयसात्‌ कथविदेवेच्छुतिति । 
यदि च कथंचित्‌ पुण्यावापगता हिसा भवेत्‌, तत्र सुखप्राप्तौ 
भवेदल्पायुरिति । एवमनृतादिष्वपि योऽयं यथासेमवम्‌ । एवं वितकौणां च 
अमुमेवानुगते विपाकमनिष्टं भावयन्‌ न वितर्केषु मनः प्रणिदधीत ॥ ३४॥ 

भरतिपक्षमावनद्धेतो्ईया वितको यदा च स्युरमसवधर्माणः, तदा 
तककृतमेश्वयं योगिनः सिद्धिसूचकं मवति । तयथा- 

[ विवरणम्‌ ] 
त्स्य वीयौक्षेपादस्य हिंसितः चेतनाचेतनं पशकषेत्रादिकं उपकरणं 

्षीणवीयं भवति ॥ 

रास्रादिनिपातनदुःखोसाद।त्‌ िसविरेषात्‌ नरकतिर्कूपरेतादि षु 
दुःखमनुभवति ॥ 

तथा जीवितव्यप्रोपणात्‌ प्रतिक्षणे च जीवितत्यये वर्ैमानो 
जन्ममरणान्तरे वत्मनि प्रतिक्षणं मरणमिच्छन्नपि दुःखविपाकस्य नियत- 
वेदनीयसात्‌ अवस्यालुमवरितम्यलात्‌ केथेचिदे वेच्छति ॥ 

यदि च कथचिद्युण्यावगमात्‌ प्रभूतपुण्यावापगता अल्पीयसी हिसा 
भवेत्‌, तत्र पुण्यमूम्ना सुखप्राप्तः सन्नपि भवेदल्पायुः आवापगतर्िसादोषेण ॥ 

इत्यमनृतादिष्वमि यथासंभवं हिसायामुक्तं योज्यम्‌ । एवं वितकीणां 
दिसादीनां छायामिवानुगतं विपाकमनिष्टे मावयेत्‌, न वितर्ु मनः 
प्रणिदधीत ॥ ३४ ॥ 

प्रतिपक्षमावनाहेया वितकोः यदा च स्युरप्रसवधर्मिंणः अप्रसवाशच. 
ते धर्मिणक्चेत्यप्रसवधर्भिणः । यदा योगिनो मन्ति नोपवन्ते निकृत्तमूढाः 
सन्तः, तदा तक्रे यमनियमस्थेेकृतम्‌ देश्य योगिनः सिद्धिसुचकम्‌ अर्ि्ा- 
दिफलिद्ि्ञापके जायत इति योग्िद्धिफलमवस्थितमेव । अन्यदपि योगाङ्गस्तु- 
तये रेखधमनुषङ्गजातमुच्यते । कथम्‌ ! एकेकस्याप्यहिंसादीनां सिथि्वलिङ्गमीद्शं 
यज्ञादिधर्मफरैर्यप्तमानं प्र्यक्षत उपलम्यते, किमङ्ग संहतानां योगसिद्िकरत्व- 


९) 
ह ५। 
[+ = 


साधनपादो द्वितीयः 


वि [ सत्रम्‌ | 
अहिं साप्रतिष्ठायां तत्सन्निधो वैरलयागः ॥ ३५ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
सवैप्राणिनां मवति ॥ ३५॥ 
[ सूत्रम्‌ } 
सलप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम्‌ ॥ ३६ ॥ 
[ भष्यम्‌ | 
धार्भिको भूया इति भवति धार्मिकः | खम प्रप्नुहीति खगं 
परा्नेति । अमोषाऽख वाक्‌ भवति ॥ ३६ ॥ 
[ सूत्रम्‌ | 
(५ % ४ क 
अस्तेयप्रतिष्ठायां सवेरत्नापस्थानम्‌ ॥ ३७ । 
| भाष्यम्‌ | 


[९ 


तिष्ठन्तं रतानि ॥ २५७ ॥ 


+ क 


सर्वदिकखानि अस्योप 


[ विवरणम्‌ |] 
मिति । तदेतघ्मतिदशेयति--तचथा--अर्दिसाप्रतिष्डायाम्‌ अर्दिसास्थिरवे 
अवितर्वभ्रादुरमत्रे । तर्ह्निषो वैरलागः । शाश्नतिकव्दिषिणामपि स्नकुल- 
दीनां तस्य अर्हिपकस्य सन्निषौ 1 वैरत्यागो भवति ॥ ३५ ॥ 


सययप्रतिष्ठायां सत्यस्यरये क्रियाफलाश्रयतवं यज्ञादि क्रियाफरन- 
मागमनं प्रात्तिमवति । सव्यत्रादिवाक्यादिति शेषः । कथम्‌ ! अधार्मिकोऽपि धार्भिको 
भूया श्युक्ते तद चनाद्धार्मिक्रो भवति । यथा धर्मेऽस्य रमतां मन इति देवेरुक्त 
कुण्डधारारधी ब्रह्मणो धामिके। बभूव । तया स्वग प्राप्ुद्ाययुक्तः स्व प्रामाति। 


& (4, 


यथा विश्वामित्रेणोक्तः स्वग प्राप्नुहीति त्निरङ्कः स्वग प्राप । किं बहूना | 
अमोधाऽस्य वाक्‌ भवति ॥ ३६ ॥ 


अस्तेयप्रतिष्ठायां अस्पृह्ययाम्‌ । ततः किमस्य भवति ? रन्नोपस्थानं 
मवति सर्वदिकृस्थान्यस्योपतिष्ठन्ते रतनानि आलानं दर्सयन्ति ॥ ३७ ॥ 


भ प 


1. अत्र आदशेकोशे ष्वैरः इव्येतदुपरि “पश्यन्‌ ° इत्यादि अच्र (223) 
पुटे मुद्रितं वाक्ये दृश्यते । तस्यानन्वयात्‌ ; आदशैकोशे पुटत्रयात्‌ पूर्वछिखितं 
शत्यागो भषति" इत्यादिवाक्यं योजितम्‌ । 

- 2. कुण्डधारोपाख्यानं भासे शान्तिपवान्तगतमेोक्षधमेप्वणि 271- }: 
अध्ययि दश्यते । | 


२२२ पातञ्ञलयोगसूत्रभाष्यवि्रणे 


[ सूत्रम्‌ | 
बरह्मचर्यपभ्रतिष्ठायां बीयैङाभः ३८ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
यस्य॒ लामादप्रतिघान्‌ गुणासुत्कषैयति । सिद्धश्च विनेयेषु 
ज्ञानमाधातुं समर्थो भवतीति ॥ ३८ ॥ 


[क 9. ¢, 
अपरिग्रहस्थेयं जन्मकथन्तासम्बाधः ॥ ३९ ॥ 
| भाष्यम्‌ | 


अस्य भवति । कोऽदमासं, कथमहमासं, किंस्विदिदं, कथखिदिदं, 
के वा भविष्यामः, कथं वा मविभ्याम इत्येवमस्य पू्वान्तपरान्त- 
मध्येभ्वासममावजिन्ञासा स्वसूपेणोपावतेते । एता यमस्थेये सिद्धयः ॥३९॥ 


नियमेषु वक्ष्यमः- 
[सूत्रम्‌ ] 
रोचात्‌ स्वाङ्गजुगुप्सा परेरसंसः ४० ॥ 
[ विवरणम्‌ | 


नहयचयेप्रतिष्ठायां वीयेलामः। बरह्यचयैलामादप्रतिषान्‌ गुणावुत्कषै- 
यति | अप्रतिबन्धानातमन उपपादयति । सवेद्यमारथप्रवृत्तिष्वप्रतिबद्धवीर्यो 
भवति । न केनचित्‌ प्रतिघातेन विवध्यत इव्यथः ॥ 


किश्च--विनयेषु शिष्येषु योग्येषु वा साधुषु ज्ञानमाधातुं समर्थो 
भवति यथा मगवान्‌ व्यासः सं(ज्ञये)जज्े ॥ ३८ ॥ 


अपरिप्रहस्येये जन्मकथन्तासम्बोधः । जन्मनः कथंभावबोधोऽस्यं 
मवति । 


किसिदिद्‌(सम)मम जन्मनः र सतम्‌ , कथंस्विदिदं केन प्रकरेण सित्‌ , 
किं भविष्यामः प्रणे[प्रायणोत्तरकटं किंवा न भविष्यामः, मविभ्यन्तो वा 
के मविष्यामः, कथं भविष्यामः, इस्येवम्‌ अस्य पूर्वापरान्तमध्येषु॒भूत- 
मविष्यदरतमनेषु भात्मनिन्ञासा सम्यग्दर्शनस्य पूर्वह्पं स्वरूपेणोपावरैते । 
ब्यपस्िहासङ्घाभावात्‌ स्वासकिषियालोचनमयलेन प्रवतेते ! नन्यिषां 
पर्िहक्षन्तापवितानिततृभं पलेनपि जायते ॥ ३९ ॥ 


साधनपादो हितीयः २२३ 


भ, + य [ 9 - ॥ 
स्वाङ्ग जुगुप्सायां शौचमारभमाणः कायवद्यदर्शी कायानभिष्वङ्गी 


यतिभ्रवति । कि, परैरसंसर्गः । कायस्वमावावलोकी स्वमपि कायं 
जिदासुश्जलादिभिराक्षाल्यन्नपि कायशुद्धिमपश्यन्‌ कथे परका(कीये- 
रत्यन्तमवप्रयतेः सेसृज्येत ॥ ४० ॥ 
किश्च-- 
[ सूत्रम्‌ | 
सत्वशुदिसौमनस्येकाश्रयेन्द्रियजयात्मदरीनयोग्यत्वानि 


च |॥ ४१ ॥ 
{ भाष्यम्‌ |] 
भवन्तीति वाक्यशेषः । शुचेः सत्वशुद्धिः, ततः सोमनध्यं, तत 
एेकाभ्वं, तत इद्दियजयः, ततहचात्मदर्शनयोग्यतं ब्ुदिपस्वस्य 
मवती्येतच्छे चध्येयंदधिगम्यत इति ॥ ४१ ॥ 
सूत्रम्‌ । 
सन्तोषादनुत्तमः सुखलाभः ॥ ४२ ॥ 
[ विबरणम्‌ | 
यमेषु सिद्धय उक्ताः। इदानीं नियमेषु वक्ष्यामः -- यो चात्‌ स्वाङ्ग- 
जुगुप्सा परैरसंसगेः । स्वाद्गजुगुप्पया शोचमारममाणः कायावदयदश्ीं 
दारीरगर्चत्द्ी कायानभिष्वङ्गी यतिभवति । किश्च-प्रेरतसर्गो मवति । 
कायस्वभावावलोकी स्वमपि काये जिहसुप्रू्रादिमिराक्षालयन्नपि 
कायज्ुद्धि सपर्यन्‌ कथे परकयिरस्यन्तमेवाप्रयतै; संसज्यत इति ॥ ४०॥ 
किं चान्यद्रवेति । स्वश्चुद्धिसोमनस्येकाग्रयेन्धियजयात्दरैन- 
योग्यत्वानि चाप्य भवन्ति । पूवस्य पूर्वस्य स्येयादुत्तरस्याविभावः । कथम्‌! 
शुचेः सत््वछदधिः । ततः सोमनस्यम्‌, तत ेकाग्रयम्‌, ततश्रन्धियजयः) 
ततश्वारमदशनयोग्यत्वं बुद्धिसत्वस्य भवतीत्यतः शौचस्थेयीदषिगमभ्यत 
एतत्‌ सर्वम्‌ । ततश्ेयं शोचपिद्धिरेव ॥ ४१ ॥ 
सन्ताष्‌ादनुत्तमः सुखलाभः । सन्तेषवितकानुत्पत्तो अनुत्तमः न 
विधतेऽस्मादन्य उत्तमः । 


४ भ 


1. अत्र आदशेकोशे शुद्धि" इयेतदुपरि “एकः इत्यादि अत्र (219) 
पुटे मुद्धितं वाक्यं दृश्यते । तस्यानन्वयात्‌ , आदशंकोशे पुरद्यभ्यवदितं “मपक्ष्यन्‌ 
इत्यादि वास्यं योजितम्‌ । 


२२४ पातङ्खल्योगसूत्रभाध्यविवरणे 


र [ माष्यम्‌ | 
तथा चोक्तम्‌- 
“ यञ्च कामसुखं लाके यच्च दिव्यं महत्‌ सुखम्‌ । 
तृष्णाक्षयस्ुखस्येते नार्हतः षोडशीं कलाम्‌ ॥'” इति ॥ ४२ ॥ 


_ [ सूत्रम्‌ | | 
कायेन्ियसिद्िरशाद्िक्षयात्‌ तपसः ॥ ४३ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 


निरवस्य॑मानमेव तपो हिनस्त्यञ्ुद्धवावरणमलम्‌ । तदावरणमठपग- 
मात्‌ कायसिद्धिरणिमाचा । तथेन्द्रियसिद्धिदरच्छरूवणदशनावेति ॥ ४३ ॥ 


| सूत्रम्‌ | 
स्वाध्यायादिष्टदेवतासम््रयोगः ॥ ४४ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
देवा ऋषयः सिद्धारच स्वाध्यायशीरस्य दशनं गच्छनिति, कर्ये 
चास्य बतेन्त इति ॥ ४४ ॥ 
[ सुत्रम्‌ ] 
समाधिसिदिरीश्वरप्रणिधानात्‌ ॥ ४५ ॥ 


विवरणम्‌ ] 
तथा चोक्तम्‌-“यञ्च कामसुखं छो, यचैदिकम्‌ । यच्च दिव्यं 
ष _ [ क दि ¶ 
महत्सुखम्‌ । देवादिसम्बन्धि । तृष्णाक्षयसुखस्येते नादैतः षोडशं 
कडाम्‌ " ॥ ४२ ॥ 
कायेद्दरियसिद्दिरशयुदिक्षयात्तपसः । निरवैत्यैमानमेव तपो हिन- 


ल ९4. , म 


स्त्यशुदचावरणम्‌ किमङ्ग निवतितमिध्यमि(मान प्रायः ॥ 


तदावरणमलापगमात्‌ कायापिद्धिरणिमाचा । मातापित्रादिसंबन्धजं 
कायमलं वैज गाम चाहारादिजं च सव तपसा निधातयिष्यते । ततश्वाणिमादि- 
कायसिद्धिः | 


+ क, 


तथा विषयादिप्तम्पक्जमिद्ियाणामधमाचाबरणं मलं तपस्त्लोतस्िनी- 


क्ञोतता क्षाल्यते । तथा इन्द्रियधिद्धिदृरच्टरवणाघा ॥ ४२॥ 


स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः । देवाः ऋषयः सिद्धाश्च य इष्टस्ते 
स्वाध्यायश्चीठख दशनं गच्छन्ति कर्ये चाख उपदेशादिष बतेन्ते ॥०४॥ 


साधनपादो दितीयः २२५ 


॥ भष्यम्‌ ] 
ईंशरार्पितस्रभावस्य समाधिसिद्धिः, यया सवैमीप्षितमवितथं 
जानाति देशान्तरे देहान्तरे कालान्तरे: च । ततोऽस्य प्रज्ञा 
यथाभूतं जानातीति ॥ ४५ ॥ । 
उक्ताः सह सिद्धिभियमनियमाः । आप्तनादीनि वक्ष्यामः । 


तत्र-- 
{ सूत्रम्‌ | 
स्थिरसुखमासनम्‌ ॥ ४६ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 


त्यथा- प्ञ्यासर्ने, भद्रासन; 
[ विवरणम्‌ | 

समावितिद्धिरीश्वप्रनिषानात्‌ । ईशधरापितसैमावसखय समापिः 
तिध्यति । यया समाधि्िदधया सवैमीम्ितमवरितथं जानाति । तथा 
देशान्त कालान्तरे चाख रज्ञा यथमूतं जानाति ॥ ५५॥ 

उक्ताः सह सिद्धिमिर्यमनियमाः । ददन आसनादीनि वक्ष्यामः- 
तत्र॒ स्थिरसुखमासनम्‌ । स्थिरं घुं चासनम्‌ । यस्मिन्नासने स्थितस्य 
मनोगात्राणापुपजायते स्थिरम्‌ , दुखं च येन न मवति तदम्यस्येत्‌ । 
तद्यथा--शारतरान्तससिद्धानि नामानि पद्मासनादीनि प्रदस्चन्ते ॥ 

तत्र॒ ञ्युचौ देवनिल्यगिरिगुहयानदीपुटिनदौ अवलनसछिलास्मपे 
जन्तुविवजिते निर ङ्ग)रमके चिः सम्यगाचम्य, परमेश्वर्मखिलमुवनेकनाथं 
अभिवन्धांश्च योगेश्वरानासगुरूश्च प्रणिप्य, चैराजिनकुशोत्तरमदुःखकरं 
प्राङ्मुख उदङ्पुखो वा विष्टमयिष्ठाय, अन्यतमदेषामासनं निबेभ्रीयात्‌ ॥ 

तत्र पद्मासनं नाम--सव्य पादसुपंहल ` दक्षिणोषटि निदधीत । 
तथैव दक्षिणे सन्यस्योपरि्टात्‌ । कटयुरोग्रीव च विष्टम्य, भू(ग)तसुत्तव- 
नात्तिकाम्रनिहितदष्टिः, समुद्रकवदपिहितोष्ठतम्पुटः, दन्तैदन्ताग्रमपरमरशान्‌ , 
सु्टिमात्रान्तरक्िरक्ृष्टविदुकोर्स्थरः, राजदन्तान्तरनिदितरसनाभ्रः, हस्तौ 
पाष्णोरूपरि कच्छपके ब्रह्मज्ञ छं वा कृता, सकृदास्यापितेत्थंपंस्थानः, पुनः पुनः 
शरीरावयवररीरविन्याप्तविरोषपरिवयक्तप्रयतः सन्‌ येनासीत, तत्‌ पृश्मासनम्‌ ॥ 

एतच्च सप्रमन्येषामाप्तनानामपि तुल्यम्‌ । कश्चिदेव विरोषः ॥ 
तथा दक्षिणे पादं स्यस्योपरि कृता) हस्तं च दक्षिणे सम्यदस्त- 
स्योपरि निधाय, येनस्ते, तत्‌ भद्राषनम्‌ । अन्यत्‌ समानम्‌ ॥ 

२9 


२२६ पातद्धख्योगसूत्रभाष्यविव्रणे 


[ भाष्यम्‌ ] 
. वीरासनं, स्वस्तिकं, - दण्डासनं सोपा्र्य, पथङ्ः केचनिषदनः 
इसितनिषदनं, उष्टूनिषदनं, समसंस्थानं, स्थिरमुखं, यथामुखं च 
इत्येवमादीनि ॥ ४६ ॥ 
ध | सूत्रम्‌ ] 
प्रयलनश्ेधिस्यानन्सयसमापत्तिभ्याम्‌ ॥ ४७ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
भवतीति वाक्यङघेषः । प्रयल्परमात्‌ सिध्यत्यासनं, येन नाज्गमे- 
जयो भवति । अनन्ते वा समापन्ने चित्तमाषनं निवंतेयतीति ॥ ४७ ॥ 


[ विवरणम्‌ | 
तथा वुश्धितान्यतरपादमवनिविन्यस्तापरजायुकं वीरासनम्‌ । उच्यमान 


एव विशेषः सवत्र ॥ 
दक्षिणं पादाङ्गुष्ठं सन्येनोरुजद्धेन परिगृह्याथ कृत्वा, तथा . सन्य 
.पाद्‌।दगृष्ठदक्षिणेनोस्जद्धेनाद्सये परिगृह्य, यथा च पाश्णिम्यां 
बृषणयोरपीडनं तथा येनास्ते, तव्‌ स्वास्तकृमपसनम्‌ ॥ 

समगुल्फौ समादगुषठौ प्रस्तारयन्‌ समजानू पादौ दण्डवचेनोपविोत्‌ 
तत्‌ दण्डासनम्‌ ॥ 

(न)यागपहृस[स्थ]स्तम्माधान्रय वा सपात्रयम्‌ ॥ 

आजानुप्रसास्तिबाहशयनं पयंङ्कासनम्‌ ॥ 


 क्ौश्वनिषृद्नं हत्तिनिषदनं उष्ट्निषदने च कौश्वादिनिषदन- 
तेस्थानसाद्रयादेव द्रव्यम्‌ ॥ 

भूमे न्यस्तोरजद्ं समतस्थितम्‌ ॥ 
। द्थितप्रसतन्धिः । अन्येनापि प्रकरेण स्वयमु स्थितप्रक्षनिः। 
अनायास येन मवति तदप्या्ने स्थितप्रह्न्धिनौम ॥ 
` यथासुखं च-येन रूपरेणापस्रीनस्य खं मवति तत्‌ यथायुखम्‌ । 
आदिशम्दादन्यदपि यथाचयेपदिष्टमासनं द्र्टन्यम्‌ ॥ ४६ ॥ 

, तदासनजयाम्युपाय ददानामुपपाते-- प्रयन्रैयिव्यानन्यसम।- 
पततिम्याम्‌ । भवतीति वाक्यशेषः । आ।सनं दठनिष्पने मवतीप्युपस्कारः । 
प्रयनञेपरमादातनन्धोत्तरकां प्रयत्तकरणादवा तिव्यति । येन नाङ्गमेजयो 
मर्वेति । येन प्रयकतोपसेण । प्रयतेन ङ्गं कम्पयति । येन अचञितासनो 


साधनपादो द्वितीयः ८२७ 


[ सूत्रम्‌ | 
ततो दन्द्रानभिषातः ॥ ४८ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
रासनजयान्नाभिमूयते ॥ ४८ ॥ 
[ सूत्रम्‌ ] 
तस्मिन्‌ सति श्वासप्रशास्योगंतिविच्छेदः प्राणायामः ॥ ४९॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
सत्यासनजये बह्य् वायोचमनं शासः । केोष्टवस्य 


वायोर्तिस्सारणं प्रश्वासः। तयोगंतिविच्छेदः उमयामावः प्राणायामः। ४९॥ 
सतु-- 


[य (~ {~ ९. 
न 


याताश्माददाभ 


[ सत्रम्‌ ] 
बाह्याभ्यन्तरस्तम्भड्त्तिदँशकारसङ्ख्याभिः परिदृषो 
दीधेसूष््मः ॥ ५० ॥ 
विवरणम्‌ | 
मव्रतोखयः । आनन्ये वा समापन्नम्‌ | अनन्तं विश्वम्‌ , अनन्तभाव 
आनन्त्यम्‌ , तत्षिन्‌ समपन्न; व्याप्य विश्वभावं स्थितं चित्तमास्तनं 
निैतेयति द्रढयति .॥ ४७ ॥ [र # 


ततो दृन्द्रानभिधातः । ततः आसनस्थिरीभावात्‌ । ` इदं दष्ट 
मादुषक्गेकम्‌ । यत्‌ शीतोभ्णादि भिद्रदेनमिमूयते ॥ ४८ ॥ 


किश्च-- प्राणायामादियोग्यता च भवति । कथम्‌? तस्मन्‌ सति 
शवासप्रशासयोमेतिविच्छेदः प्राणायामः । सासन च्ठे बाह्यस्य 
वायोराचमनं श्वासः । यथा सन्ततव्वादुदकं नाठेनाङ्ृष्यते, तथा सन्ततत्वात्‌ 
नास्तिकापुटनाङम्यामपानवायुसंबन्धो वहिवायुराङक्ृष्यते, तदाकर्षणे श्वासः । 
तथा कौष्ठय्रायोनिशारणम्‌ । प्राणन्त्तिसम्बन्धो हि कौष्ठथो वायुः । तस्य 
बहिर्निस्तारणं प्रश्वासः । तयोयैतिविच्छेदः । क्रिषुक्ते भवद्यतं आह-- 
उमयामावः प्राणायाम इति ॥ ४९.॥ 

स तु तविषः बाद्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिदशकारपख्याभिः परदे 
दीषेसुक््मः । स॒ बह्यद्त्तिरम्यन्तरबृत्तिः स्तम्भवृत्तिश्च । य॒त्र शासपूर्वको 
गलयमावः स॒ बाह्यव्त्तिः । बाह्यस्य वायोरन्तः प्रवेदनं प्रति बृत्ति; यस्य 
स॒ बह्मवृत्तिः । तस्मात्‌ स॒ बाह्यः । बाद्यमन्ये पूरक (व्याचक्षते ॥ 


२२८ पातञ्जलयोगसूत्रभाष्यांववरणे 


© भ 1 | ©. 

यत्र श्रश्वपपूर्वैको यत्यमावः स बाह्यः । यत्र॒ श्स॒पूतवको 
गत्यभावः स॒ आभ्यन्तरः । तृतीयः स्तम्भव्ृत्तिः; यत्रोभयाभावः 
सङ्गस्यलनाद्धवतिं । यथा तपते न्यस्तमुपले जटं सर्वतः सङ्कोचमपधते, 
तथा द्वयेो्ुगपद्वयमाव इति। प्रयोऽप्येते देशेन परिष, इयानस्य विषयो 
देश इति । कारेन पष्टः, क्षणानामियत्तावधारणनावच्छिन्ना इत्यथैः । 
सङ्ख्याः परिष्टः, एतावाद्धिः शधामप्रधपिः प्रथम उद्वातः, तदत्निगही- 


तस्येतावद्धिदतीयः उद्धातः, एवं तृतीयः। एवं म्दुः;) एव मध्यः, एव तीव्र 
इति सङ्ख्यार्परेदष्टः । स खलत्वयमेवमभ्यस्तो दीषसुक्ष्मः ॥ ५० ॥ 


[ विवरणम्‌ ]] 
यत्र प्रासप्ैको गलयमावः स अभ्यन्तरतः । आ।म्बन्तरस्य 
वायोवहिर्निस्सारणं प्रति वृत्तिर्यस्य स आम्पन्तरदृत्तिः । तस्मात्‌ स 
आभ्यन्तरः । तं स्वकः इष्याचक्षते ॥ 


तृतीयस्तु सतम्मवरृतिः । तत्रोभयामावः आचमननिश्वारणयेरमावः । 
स तु सक्रृखयलञतत्‌ प्रभवति । यथा तप न्यस्तं उपरे जठं सर्वतः 
सको चमाप्यते, तथा सङृभ्रयत्रात्‌ भ्रणादिदृत्तयः संकोचमुपयान्तीवयाद-- 
दयो युगपत्‌ गलयमाव इति ॥ 


त्रयोऽप्येते देरेन पद्टाः इयानस्य देश इति । यथा बदिर्तत- 
रन्तराचम्यमानस्य नाप्तिकग्रप्रश्लयापादाङ्गुष्ठ देशब्यापिः । एवमन्तर्वृत्तरहि- 
निश्वायमाणस्य वायो; पादाङ्गु्प्रश्रलयानासिकाप्र देशग्यापि; । स्तम्भवृत्त 
रामस्तकापादतल्न्याप्तिः । अथ वा बहिरपि वितस््यादिक्रमेण देशव्याप्निरस्यव ॥ 


काठेन परिः, क्षणानामियत्त[वधारणेन इयन्तः क्षणाः प्राणायामे 
नातिवाहित। इति ॥ 


तथा सङ्ल्याभिः पर्ट्िः, -एतावद्धिः श्ासप्रश्वातेः अतीतैः 
परिटृ्टः प्रथम उद्धातः । यथा निरोधक्षुमितानां वायूनां सकृत्‌ मूर्धन- 
मुद्ध नेश्त्तिः प्रथम उद्धतः । स॒ एव भृदुः॥ 


पुनश्च सक्ृदुद्तनिग्रहीतस्य वायाः तावद्भिः प्रश्वसेरतीतेः परि 
दवितीय उद्धातः प्राणायामो मध्यम्‌ इत्युच्यते ॥ 


च क क, 


साधनपादा द्विताय: ॥ २२९ 


[. सूत्रम्‌ | 
बाद्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ॥ ५१ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
देशकारसङ्ख्यामिर्बाद्यविषयपरिदष्ट आक्षिप्तः । तथा आभ्यन्तर्‌- 
विषयपद्िष्ट आक्षिप्तः । उभयथा दीपसुक्ष्मः । तपूषैको भूमिजात्‌ क्रमे- 
णोमयोगैव्यभावश्वतु्ैः प्राणायामः । तृतीयस्तु विषयानारोचितो 
गत्यभावः सक्ृदारन्ध एव देशकालसङ्ख्याभिः परिच्शो दीर्धसुक्ष्मः । 
चतुर्थस्तु श्व।स॒प्रधासयोर्विषयावधारणात्‌ क्रमेण भूमिजयादुमयक्षप- 
पक्र गद्यमावश्वतुथैः प्रणायाम इत्ययं विरेष इति ॥ ५१ ॥ 
[ विवरणम्‌ ] 
तथा तृतीयः, एतवद्धिः अरसिप्रशसतैः पलिष्टः तृतीय उद्वातः। 
स एव च तिरुद्रातः तीव्र इति ॥ 
स खट्वयमेव देशकारपद्ल्यापरिद्टोऽभ्यस्तो दीर्करालत्यापी भवति 
मूमिजयात्‌ । तथा चर्षाणामनेकवर्षव्यापी श्रूयते । ततश्च दीषेः॥ 
तथा वायूनां दार्षमन्द्तवापत्तेः सूक्ष्मं च भवति ॥ ५९ ॥ 
चाह्याभ्यन्तरवरषयाक्षेपी चतुथैः-- बाह्यस्य विप्रयाः पदाद्ष्ठादयुः । 
बाह्यो हि वायुराचम्यमानोऽन्तदशान्‌ व्याप्रोति+ आक्षिपति । आभ्यन्तरस्य विषया 
भूम्यादयः । स च वहिर्निश्वायमाणो भूम्यादीन्‌. देराकारपङ्ल्यापरिद्टन्‌ 
व्याप्नोति, आक्षिपति । स बाह्याभ्यन्तरविषयक्षपी चतुथः प्राणायामः ॥ 
देशकालपङ्ल्याभिवोद्यवस्तुविषयः परिष््ट अक्षिक्षा व्याततः | 
तथा आभ्यन्तरव्रिषयः परिच्छे देरकाठसङ्ख्याभिः आक्षिप्तो व्याप्तः । 
उभयथा द्वसक्ष्मः । बाह्याम्यन्तरविषयक्षेेणोमयथा दीधपूक्षमत्वापनः ॥ 
किमुक्तं भवतीत्याह -- तसपूत्ैकः उमयकिषयक्षिपपूधकः । मूमिजयात्‌ 
उमयवृ्तिवायुमूमिजयक्रमणोभयोः प्राणापानव्रच्योवोघ्चाम्यन्तस्योः गव्यभव्र- 
तुथः ॥ 
तृतीयचतुधयोरुमयदरत्तिसामान्यादविरोषसमारङ्कयाह-तृप्ीयस्तद्विषया- 
नारोचितः सक्रृद।रग्ध एव गत्यमवे देशकालसङ्ख्याभिः प्रच्छि दीष 
सष्षमः । चतुर्थस्तु शापप्रशवापतयोः अतमितोः वरषयावधारणात्‌ क्रमेण 
बा यदूटृत्िमूमिजयकरमेणोमयक्षेपपूरंको गस्यमावश्वतुधैः प्राणायाम इत्ययं 
विशेषः तृतीयचतुर्थयोः ॥ ५१ ॥ 


२३० . परातञ्जलयोगसूत्रभाष्यतवरिचरण 


[ सूत्रम ] 
ततः क्षीयते प्रकादाबरणम्‌ ॥ ५२ ॥ 


[ भाष्यम्‌ ] 
प्रणाय।मानभ्वस्यतोऽस्य योगिनः क्षीयते विवेकन्ञनावरणीय 


कमं । यत्तदाचक्षते-मदामोहमयेनेन्द्रजाठेन प्रकारशीरं सच्मवरव्य 
तदेवाकायं विनियुङ्क्ते इति । तदस्य प्रकाशावरणं कमे संप्ाएनिषन्धनं 
प्राणायामाभ्यासबलात्‌ दुर भवति, प्रतिक्षणं च क्षीयते । तथ चोक्तम्‌ 
तपो न प्रं प्राणायामात्‌ तता वि्ुद्धिमखनां दीष ज्ञानस्य 


इति ॥ ५२ ॥ 
 कि-- 
| सुत्रम्‌ | 
धारणासु च योग्यता मनसः ॥ ५३ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 


प्राणायामाभ्याप्ादेवे ` ।: ्रच्छदनविधारणाभ्यां वा ` प्राणस्य 
इति वेचनात्‌ ॥ ५३॥ ~ 
| [ चिवरणम्‌ | 

ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्‌ । प्रकारा आव्रियते येन तत्‌ प्रकाशावरण 
कर्म । प्राणायामानम्यस्यतो योगिनो विवेकज्ञ।नमात्रिथते येन तत्‌ विवेकङ्ञाना- 
वरणीयं कप । यत्त॒ आचक्षते शाखान्ते “महामोदमयेनेन्द्रनाठेव 
प्रकाशशीटं सच्वमाव्रृ्य तदेवाकार्ये विनियुङ्क्ते” इति ॥ 

यदा त्रियते विप्ययज्ञानमहेन्रनेन तदेव सस्वमाव्ररणकर्मेणा सत्राय 
विनिधुस्यते । तत्‌ प्रणायामाभ्यापस्तादस्य प्रकाशावरणं कमे संसारनिषम्धने 
दषं भवतिः। न केवटं दु भावे एष, प्रतिक्षणं च क्षीयते ॥ 


तथा चोक्तम्‌-श्न प्र प्राणायामात्तपः इति। तस्मात्‌. तत 
प्राणायामात्‌ रजस्तमःकायाणां विद्युद्धिषरनां, दीपश्च ज्ञानप्येति ॥५२॥ 

फ च--भवदयन्यदपि प्राणायामाम्यप्तात्‌ । पारणामु वक्षमाणष्ु 
योग्यता मनष्ठः ्राणायामदिव । 'भरच्छरतविष।रणाम्यां वा प्राणस्य" इति 
वचनात्‌ तार्म्यां हि. मनसः स्थितिंसम्पत्तिरुक्ता ॥ ५३.॥ 


1. यो. सू.षा. 1. चू. 34, 


साधनपादो द्वितीयः ` २३१ 


[ । भाष्यम्‌ ] 
अथं कः प्रत्यादारः- 
[ सूत्रम्‌ | 
नि इबेन्द्रिया , 
स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपाुकार इवेन्द्रियाणां 
प्रत्याहारः ॥ ५४ ॥ 
ताः [ भाष्यम्‌ | 
खाविषयसभ्रयोगाभावे वित्तखरूपानुक।र इवेति । चित्तनिरेषे 
` चित्तवज्निरुद्धानीद्ध्ियाणि नेतरेन्दरियजयवदुपायान्तरमपेक्षन्ते । यथा मघु- 
करराजं मक्षिका उततन्तमनूखतन्ति, निविशमानमनु निविश्चन्ते, 
तयेद्धियाणि चित्तनिरोपे निरद्धानीय्येष प्रत्याहारः ॥ ५४ ॥ 
ततः परमा वदयतेन्द्रियाणाम्‌ ॥ ५५ ॥ 
इति श्रीमहुर्षिपतज्ञखिविरचिते योगसूर 
दवितीयः साधनपादः ॥ 
| विवरणम्‌ | 
अथ कः प्रत्याहारः? प्रत्याहारविरोषममिपिस्तमानः प्रश्षनोपक्रमते । 
स्वविषयादिन्दियाणां प्रघ्याहरणमात्रं परेषां प्रत्याहारः । अत्र पुनर्विंोषवषायुच्यते 
खविषयापभ््रयोगे चित्तस्य खहूपाठुकार इवेन्द्रियाणां प्रस्याहार इति ॥ 
कः । [1 म न [कप 3 न. ७ च ` ` "ष 
स्वैः स्वेद्शाग्दादिभिर्विषयंः इद्धियाणां शोत्रादीनां सेयोगामवि 
विषयदोषदशनात्‌ ध्यायिनां स्वविषयात्‌ निवर्तितानां चिनत्त्वहपालुकारतेव । 
योगिन शित्त यदकारतां भजत तत्‌ चित्तस्वरूपानुकारतेवेति ॥ 
` एतदुक्तं भवति -- चित्तनिरोपै चित्तवर्निरुदयानि नेपायान्तरमपक्षन्त 
जयाम्‌ । चित्तनिरोधदिव तानि निरुष्यत्ते । यथा मधुकरराजानम्‌ 
्रष्यक्षरेतत्‌ । मधु करराजपिव्यथः । मक्षिका उत्पतन्तमनृततन्ति, 
निविश्चमानमनु निविशन्ते । तथेवेन्द्रियागि चित्तनिरोषे निरद्धानीलष 
प्रत्याहारः ॥ ५४ ॥ 
ततः प्रलमाहारस्थर्यात्‌ प्रमा वदयतेन्धियाणां मवति । इतिशब्दः 
समाप्लर्थः । यासां च व्यतानां मघ्ये प्रया्रस्यैयीत्‌ परमा वरयता जायते 
ता उभ्यन्ते-- 


२३२ पातञ्चलयोगसून्नभाष्यविवरणे 


{ भाष्यम्‌ ] 
शभ्दादिष्वव्यसनमिन्द्रियजय इति केचित्‌ । सक्तिन्यसनं, 
व्यस्यलेनं श्रेयस इति । अविसद्धा प्रतिपत्तिवा न्याप्यः शब्दादिः 
सम्प्रयोगः स्वेच्छयेयन्ये । रागदेषामवे सुखदुःखशून्यं शम्दादिज्ञान- 
मिन्द्रियजय इति केचित्‌ । चित्तैकाग्यादगप्रतिपत्तिवेति जेगीषन्यः । 
ततश्च परमा लियं व्यता; यच्धित्तनिरोषे निरद्धानीन्दियाणि 
नेतरेन्दरियजयवत्‌ प्रयलकृतमुपायान्तरमयेक्षन्ते योगिन इति ॥ ५५ ॥ 
इति श्रीपातञ्जटयोगसूत्रभाष्ये श्रीमद्ेदव्यासकृते 
दितीयः साधनपादः ॥ 
[ विवरणम्‌ | 
शब्दादिष्विन््ियजयः अव्यसन पुनः पुनयपरवृत्तिरनासाकतर्वेति 
केचिदाहुः । भ्यसनमिति नितवीति--सक्ति्यस्तनम्‌ । कथम्‌ १ भ्यस्य ति क्षिपति 
ए प्रतिपत्तारं श्रेयसः सकाशादिति व्यसनम्‌ ॥ 
भविरद्धा प्रतिपत्ति । विरुद्धानां वा शब्दाद्‌।नामग्रतिपत्तर्बश्यतेति । 
तस्येव व्याद्यनं-- न्याय्यः शाक्नादुज्ञातः शब्दादिषु संयोगः सखेच्छया | 
े्बकरिरुदधे यदीच्छति प्रवर्तते न वा इत्येवमन्ये मन्वते ॥ 


रागदधेषामवि सुखदुःखभुन्ये दहियेपदियत्वर्जितं शब्दादिना 
वदयतेवयेके । मध्यमायां तु रागद्वेष पद्भावमात्रमपि न वार्यत इतिं विशेषः ॥ 
स्वामिग्रता आस्यायते--पएेकाम्यात्‌ चित्तेकाम्रलानुविधानादिन्वियाणां अप्रति- 
क छ १ हि 
पत्तिरेव शब्दा्दानामिति जैगीषव्यो मन्यते ॥ 


. प्रमा लियं सवैस्सुक्तानामियं परमा वश्यतेन्द्रियाणां, यत्‌ यस्मिन्‌ 
चित्तनिरुद्धानीन्द्रियाणि न इतरेन्द्रियजयवत्‌ पूरेक्ताखिन्धियकश्यताघ 
उपायान्तरमपक्षन्ते जयाथ, अस्यां पुनन प्रयतकृतमुपायान्तरमपे्षन्त 
योगिनः ॥ ५५ ॥ 

इति श्रीगो विन्द्भगवस्पुञ्यपाद्िष्यस्य परमहं सपरित्राजकाचार्यस्य 
श्रीक्षद्कुरभगवतः कृतौ 
भरी पातञ्ञलयोग.शाख)सूत्रभाष्यक्िवरणे ` 
॥ द्वितीयः साधनपादः ॥ 


श्रः 
॥ पातज्ञख्योगसूत्रभाष्यविवरणम्‌ ॥ 
॥ तृतीयः विभूत्तिपाद्ः ॥ 
[ व्यासभाष्यम्‌ ] 
उक्तानि पश्व 'वदिरङ्गसापनानि । धारणा वक्तव्या- 
[ पातञ्जल्योगसुत्रम्‌ ] 
देदावन्धधित्तस्य धारणा ॥ १॥ 
[ भाष्यम्‌ ] 
नाभिचक्रे, हृदयपुण्डरीके, भमूमञ्योतिषि, नािका 
इयेवमारिषुं देशेषु, बद्यपु च विषयेषु, चित्त्य वृत्तिमात्रेण बन 
इति धारणा ॥ १ ॥ 
[ विवरणम्‌ ] 
उक्तानि एच्च बहिरङ्गानि साधनानि सम्प््ञातस्य योगस्य । अघुना 
अन्तरङ्गं धारणाध्यान्षमाधिसमस्यं साधनत्रयं तस्यैवामिधीयते । बहिरङ्गान्त. 
रङ्गत्वमेद।देव हि बहिरङ्घसाधनव्याए्यानेनैव पादः परि्तमापितः । सहव्यकास्तिाच 
साधनत्रयस्य पृथग्वचनम्‌ । बहिरङ्ग साधनाभिधानानन्तरपयंपस्थापितान्तरङ्क- 
सधनप्रतिपादनेन पादसम्बन्धो व्याख्यातः । अरिश्च पादे विभूतयः प्राधन्येन 
प्रदश्ैन्त इति च परथकू(क्तादा)पादारम्भः | एतदेव हि समास्यालमे 
कारणमवादिष ॥ 
धारणा वक्तभ्या । प्रव्याहारानन्तरं क्रमोपनीतसन्निधाना धारणा 
अमिधनीया । देशबन्धश्चित्तस्य धारणा । देरबन्धन देशवन्धः । क्यः 
चित्तस्य ॥ 
स्वयमेव च सवै व्याचष्- नाभिचक्रे नाभिप्रदेशश्चक्रमिव । स्व 
(वायत्र) अत्रयत्रास्तत्र चक्रौ मूता इति नाभिचक्रम्‌ । हृदयं पुण्डरीकाकारम्‌ । 
मूषैञ्योतिषि । मृथनाडोद्वारं प्रमास्वरताञ््योतिरिया्यायते । नासिकाग्र 
जिहूप्रे इव्येवमादिपु देशेषु ब्यषु च विषयेषु चन््रादिल्यादिषु चित्तं बध्यते ॥ 


1. बरहिरङ्गाणि सा, 2. मूर्धि ज्यो. 3. ब्ह्यिवा विषये 
30 


२३४ पातञ्ञलयोगसुत्रमाभयनिवरणे 


[ सूत्रम्‌ ] 
तत्र प्रययेकतानता ध्यानम्‌ ॥ २॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
तास्मच्‌ द्य ध्ववयारम्बनस्य प्रययस्य पक्तचता पद्शग्रवाह्‌ 
भ्रययान्तरणापरप्रष्टा ध्यानम्‌ । २॥ 
[ सूत्रम्‌ | 
तदेवाथ॑मातनिर्मासं खरूपशून्यमिव समाधिः॥ ३॥ 
[ माष्यम्‌ ] 
तदेव ध्यानं ध्येयाकारनिर्मापं प्रययादमकेन सरूपेण शून्यमिव 
यदा भवति ध्ययस्वमाववदात्‌ , तदा सपापारस््युच्यत ॥ ३॥ 
- ( विवरणम्‌ ] 
तस्य चित्तस्य इ्येवमदिष्वप्रचदितसख्येण या वृत्तिः स। धारणेघयुच्यते । 
। वृत्तिमात्रेणेति । तेदेशपरत्ययमत्रिण विक्षपल्यतयः वतत हति ॥ १ ॥ 
तत्र प्रत्ययेकतानता ध्यानम्‌ । तिन्‌ देशे धारणादृत्तिविषये नाभि. 
चक्रादौ । ध्येयारुम्बनस्य ध्येयो देरादिः, तदाछम्बनस्य । प्रयस्य 
[एकतानता)] सदृशप्रवाहः, तंस्यप्रत्ययानां प्रवाह शएकाकारः. प्रत्ययक्षन्तान 
भ्रत्ययान्तरण विजतीपेन अपर म्ृष्ठः अनाकोणः । तत्‌ ध्यानम्‌ ॥ 
धारणा "तु तस्मिनेव ध्येये तदवस्थस्येव चित्तस्य तद्िष्रयविकल्पितैः 
, प्रत्ययन्तरैः परामृष्टाऽपि । यधा सूर्यं घा्॑माणस्य तद्रतपरिमण्डछतीत्रतरदीपिति- 
स्वादिपरप्ययेष्वपि ध।रणैव । वृ्तिमत्रेण तत्रेव व॒तेमानत्वाचित्तस्य । ध्याने पुनः 
न तु तथा । भिन्नजातीयप्रव्ययान्तरापरामृष्टेकप्रत्ययप्रवाह ९ हि ष्यानम्‌ ॥ २॥ 
तदेवाथमात्रनिमासं स्वरूपञयून्यभिव समाधिः । तदेव ध्यानं 
तुल्यप्रव्ययश्रवाह ख्यं स्वमेकरप्रययत्तन्तनतामिव हिता ध्येयकारनिभासिं 
प्येयाकारवदवमाप्तते । प्रत्ययात्मकेन स्वेन प्रहणात्मना स्वह्पंण शून्यमिव । 
यथा स्फाटक्द्रव्यप्रुपधानत्रमसि स्वरूपद्य-प।मवर । यंदा भवात ध्यंयस्व- 
मावारेशात्‌ कारणात्‌ चित्तस्य, तदा तदेव प्यानं समाधिरित्युच्यते ॥ 
ननु च योगः समापिरियङ्गी पूतवपुक्तः । इहाङ्गो योगस्य समाधिरि- 
स्यद््यायते । कः पुनसत्रा्गङ्खिनोभेद इति { उच्यते--योगः समाधिरिति 
चित्तस्थितिविरेषे। विवक्षितः । इह तु प्रत्ययसतन्तान्येत्र प्येयस्वमव्रावेशयात्‌ 
प्येयाकारत्वमङ्ग मिति विरोषः ॥ ३ ॥ 


1. सदशः प्र, 2 ध्यानमेव ध्ये, 


[9 


विभूतिपादः रृतीयः २३५ 


वा [ सूत्रम्‌ ] 
त्रयमेकत्र सयमः ॥ ४ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
तदेतत्‌ धरणाध्यानसमाधित्रयं एकत, सेयमः । एकविषयाणि 
वरीणि साधनानि सेयम इस्युच्यते । तदस्य त्रयस्य तान्निकी परमिषा 
संयमः! इति ॥ ४॥ 
[ सूत्रम्‌ | 
तज्रयात्‌ प्रज्ञाऽऽखाकः ॥ ५ ॥ 
[ भाष्यम्‌ ] 
तध्य सेयमस्य जयात्‌ समाधिप्रज्ञाया भवलयारोकः । यथा यथा 
संयमः सिरपदो भवति, तथा तथा समाधिप्रह्घा 'सिरपदी भवति ॥ ५॥ 
[ सूत्रम्‌ | 
तस्य भूमिषु विनियोगः ॥ ६ ॥ 
[ विवरणम्‌ ] 
तदेतद्धारणाध्यानषमाधित्रयं यद्याख्यातं तत्‌ एकत्र एकसिन्‌ देशे 
परिनिष्पन्नं सत्‌ संयम इत्युच्यते । तदाह-एकाविषय।णि त्रीणि साधनानि 
सेयम इत्युच्यते । तदस्य त्रयस्य इधयक्रमेणामिनिणन्नस्य तान्निकी तन्त्र- 
प्रयोजना प्ररिमाषा । जिज्ञस्िताथ॑साक्नादापादनाय चत्र यत्र॒ संयमः 
श्रूपते जेतम्यजयाय वा तत्र तत्र त्रयमेतत्‌ प्रवेदितम्यमित्यवम्थमेतस्य त्रयध्वाक्षिन्‌ 
शान्ने परिभषियं संयम -इति ॥ 
ह्यति च~-वृर्णिामत्रयसयमादतीतानापतज्ञानम्‌" -्थूलस्वहूप- 
सुष्ष्मन्वयायेवरत्वसंयमादु मूतजयः' इति च ॥ ४॥ 


, तज्जयात्‌ प्रजञाऽऽढाक्रः । तस्य संयमस्य जयात्‌ स्थिरत्रापादनात्‌ 
अभीप्ितायामिष्यञ्चनसमथः प्रदीपाटोकदेरीयः समाधिप्रज्ञाया मवत्याठोकः। 


यथा वध सयम ध्थिरषदो भवात तथा त्या समापरम्रज्ञा 
स्थिरपदी भवति । येन समाधिप्रज्ञा ऽऽलेकेन व्यवहितत्रिपरकृ्टादिवस्तुनिभाप्तन- | 
समर्थन योगिनः करतलकटितपिवामिमतमथमवलो क्रयन्ति ॥ ५ ॥ 


तस्य भूमिषु विनियोगः । तस्य सेयमस्य भूमिषु बह्याध्यालिकेषु 
ध्यानाटम्बनभूताछ य््यमाणाघु परििामत्रयादिष विनियोगः प्रयोगः कर्तब्य: ॥ 





1. विहारदी भव्ति 2. यो.सू.3. 16. 3 यो. सू, 3. 44. 


२३६ पातञ्चख्योगसूत्रभाष्यविवरणे 
[ भाष्यम्‌ | 
तदय सेयमसख, जितमभूमेः या अनन्तरा भूमिः त्त्र; विनियोगः । 
न द्यजिताधमूमिः अनन्तरभूर्मि विरद्ध्य प्रान्तभूमिषु संयम 


ठमते । तदभावाच्च कुतस्तत्र प्रज्ञाऽऽलोकः ?` गजितोत्तरमूमिकस्यः 
नाषरमूमिषु परचिततज्ञानादिषु सेयमो युक्तः । कस्मात्‌ तदर्थस्य 


[ विवरणम्‌ ] - 


तद्भूमिजवसाक्नाप्रयोजनाथिना तस्य संयमस्य, जितमभूमेः जिताया 
भूमेः, यत्र भूमै येगिनः संयता्यां संयमो छ्न्धः, तस्या जिताया भूमे 
अनन्तरा या भूमिस्तत्र संयमस्य पवैभूमिजयानन्तरं विनियोगः करणीयः ॥ 


तथथा--पथिन्पादीनां स्थूटस्वरूपसूक्ष्मान्वयायव्मूमिषु क्रमेण 
जतव्याघु, स्थूलायां भूम सयम कृत्वा, तजयानन्तरं स्वरूप एवानन्तरे संयमो 
विनियाजनीयः । नानन्तरं स्वस्य व्यतिलङ्कथ पूष्ष्मादिमूमिषर सेविदधीत ॥ 


कस्मादेवम्‌ ने द्यजिताधरमूमिरनन्तरां भूमिं विलद्य प्रान्तमूमिषु 
उपरित्नीषु भू^षु सयम रमते ॥ 


यदि चानन्तरां भूमिमजि््वा प्रान्तभूमिषु संयमं विनियुद्कुत, तमेव संयमे 
न ठमते । ततश्च तदलमम एष दोषः । तदलाभाच्च संयमाभावाचच कुतस्तत्र 
सेयमकिषये प्रान्तमूमाकरियर्थः । प्रज्ञाऽ5ऽ ओक्रः । निमित्तामवात्‌ । न द्यति 
तेटवतिञ्चल्नामिसनिपात प्रदीप।लोकः ॥ 


जितोत्तरमूमिकस्य जितोत्तरात्मादिमूमिकस्य योगिनः नाधरभूमिषु 
प्रचित्तक्ञानादिषु संयमो युक्तः । कस्मात्‌ ? तद॑स्य आत्मदेः उत्तर- 
भमेपपङृ्टपरचितज्ञानादिमूमिवैपरीलेन अन्ययैवाषिगतत्रात्‌ । परचित्त 
ज्ञानादिभिः संर्क॑ण अप्तमधिगतविवेकात्मकतवात्‌ । तत्न हि जितोत्तरभमि 
सेयमस्य परक्षीयचित्ताटम्बनले संकी्णचित्ताकारता योगिचित्तस्यापि स्यादिति 
न युक्तः । तत्रातमदिरथस्यान्ययेत्र विविंक्ततयाऽपिगतवात्‌ ॥ 


1. कुतस्तस्य 
ईशवरप्रतादात्‌ जितो 
स्यच 


विभूतिपादः उृतीय २३७ 


[ भाष्यम्‌ || 
अन्यथवाधिगतसखात्‌ । भूमेरस्या इयमनन्तरा भूमिः ईइस्यत्र.याग एव 


उपाध्यायः । कथम्‌? । एवं ह्यक्तम्‌. 
« योगेन योगो ज्ञातव्य योगो योगात्‌ प्रवतैते । 
°अप्रमत्तस्तु योगेन योगे रमते चिरम्‌ ॥" इति ॥ ६ ॥ 
„~ । सतम्‌ } 
त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः ॥ ७ ॥ ~ 
[ भाष्यम्‌ ] 
तदतत्‌ षारणाध्यनसमापत्रयम्‌ अन्तरङ्क सम्प्रज्ञातस्य स्माषः 
पर्वभ्यो यमादिभ्यः प्वम्यः साधनेभ्य इति ॥ ७ ॥ 
 [ विवरणम्‌ ] 
अन्येषां न्यास्यानम्‌--अर्थस्यं परचिनत्तज्ञानादं; | अन्यथेवाबिगत त्वात्‌ 
आलमाद॒त्तरममिसमधिगमनेनैव अधरपराचित्तज्ञानादिममेरयस्य अधिगतवतात्‌ इति ॥ 
अस्मिन्‌ पक्षे अधरममिष्र संयमाऽनथक्र' इति बदितव्यममविष्यत्‌ , 
धन युक्तः" इति । "न युक्त' इव्येतद समीचीनमिव टृइ्यते ॥ | 


भूमेरस्या इयमनन्तरा भूमिः श्यमनन्तरं जयनीयेति कथमवभोष्घ्यत 
इवयाद--तत्र योग एवोपाध्यायः । योगः पूवसूमो सेयमलमः । 
तेनेवानन्तर्यमवगम्यते ॥ 

कथम्‌ £ एवं द्यक्तम्‌- योगेन योगो ज्ञातभ्यः । पृसंयमलमेन 
योगेन अनन्तरो योगविषरयः प्रज्ञानीयः । स च योगः संयमः, योगात्‌ 


(~ (~ 


एव पृततस्तयमख[भादव प्रवतत [वावस्यत ॥ 

यथेव जनुषा अन्धकस्य सेोपानपङ्क्तिमारुरक्षतः प्रथमसोपानप्रति- 
छन्धपदस्पञप्रस्ययेनानन्तरसेपानन्ञानपुपष्ष्यते तथा योगो योगात्‌ प्रवते ॥ 

यत एवं तस्मात्‌ स हत्थं जानन्‌ अप्रमत्तस्तु येगी योगेन युक्तः 
सन्‌ योगेषु योगेशथैफरे रमते? चिरम्‌ इति ॥ ६॥ 

तयमन्तरङ्ं पूर्वभ्यः । धारणाध्यानसमाकत्रयम्‌ अन्तरङ्गं पूर्वभ्य 
प्चचभ्यः साषचभ्यः यमाद्भ्वः सभम्प्रज्ञतस्य पागस्य । तत्रान्तरज्गग्रहण 
पूवसाधन।सम्पत्तावेष्यत्र त्रये आदरः कृर्ण।य इचवमथम्‌ ॥ 


1. अनम्यत एवाधि. 
2. योऽगप्रमत्तस्तु योगेन स योगे रमते चिरम | 


२३८ पातञ्ञलयोगसूत्रभाष्यनिवरणे 


ध , _ - सत्रम्‌ ] 
तदपि बहिरङ्ग निर्बीजस्य ॥ ८ ॥ 
। { मध्यम्‌ ] 
तदपि अन्ताङ्गं साधनत्रयं, निर्बीजस्य योगस्य बदिरज्गं मवति । 
कस्मात्‌ १। तदमावे भावात्‌ इति ॥ ८ ॥ 
अथ निरोधचित्तक्षणेषु, चरुं गुणवृत्तम्‌ इति कीदशस्तदा 
निरोपपछिामः १- 
[ विबरणम्‌ ] ` 
विनापि हि यमादिस्ताधनेपश्चतयस्सम्पादनेन जन्मान्तरविदितसंस्कार- 
वेशवशादेव विदेहभ्रकृतिख्य।नामिव षारणादित्रयसम्पतच्या योग उपकल््यते | 
धारणादित्रयेण विना न योगः सेमवति कस्यचित्‌ । त्यापारनैरन्तय- 
संबादात्मकत्रादधारणादित्रयस्य । योगस्य चित्तप्म्पत्तिरूपत्वात्‌ ॥ 


: यदा तु ज्ञानवैराग्यसम्पत्तिः, तदा न रकिचिद्न्यद्वारणावप्यपेष्यते । 
तथा च मङ्धिपिङ्गलप्र्तीनामनुश्रयते वैरग्यदेव समस्तसिद्धिः । तथा 
चोक्तम--स्थानापनविधानाति इति पूवैतर शछेकद्वयम्‌ ॥ ७ ॥ 


तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य । तदपि एतत्‌ अन्तरङ्गमपि सबीजस्य 
योगस्य, बहिरङ्गं भवति निर्बीजस्य योगस्य । कस्मात्‌ १ तदभावे मावात्‌ । 
तस्य स्बीजान्तरङ्गसाधनत्रयस्याभवेऽपि पुरुषरसच्छविरेषपिक्षय। निर्बाजयोगस्य 
भावात्‌ बहिरङ्गत्वम्‌ ॥ 

केचिदतिस्माचनदशंन। जन्मनैव संस्कारादपरक्ताः । तेषां परवैराग्य- 
विरामप्रययपततरीलनादि समीक्षया निर्बाजः समाधिरुपजनिष्यत एव । न हि 
तेषां धारणादिसमीक्षणम्‌ । तथा वचेोक्तम्‌--“उक्तः समाहितचित्तस्य 
योगः । ब्युलितचित्तोऽपि कथं योगयुक्तः स्यादिलत इदमारभ्यते 
इति । तथा भवप्र्ययो विदेदपरकृतिटयानाम्‌' इति ॥ ८ ॥ 

अथ निरोधचिततक्षणेषु निरोधयुक्तं निरुष्यमानं चित्तं येषु क्षणे 
निरुष्यते ति निरोधचित्तक्षणाः तेषु नियेधकाठे इयः । क्षणेष्विति 
बहवचनं अततानागतवतेमानह्त्तिवगप्रदर्यनाचम्‌ ॥ 





1. चित्तपारेणामः , 
2, यो, (58 [| पा. 2, सुर 1, 
3, यो.सू.पा. 1, बू. 19. 


विभूतिपादः दृतीयः . २३९ 
[ सूत्रम्‌ 
व्युट्थाननिरोधसंस्कारयोरमिभवप्रादुभौवौ निरोध- 


क्षणाचेत्तान्वयो निरोधपरिणामः ॥ ९ ॥ 


| भाष्यम्‌ | 
युत्थानप्तस्करः [चत्तपमा नस प्रययातमक इति प्रययरषिन 


निरुद्धः । निरोषपष्कारोऽपि चित्तधमेः । तयोरमिभवप्रादुमावा । व्युत्थान- 

सेस्कारा हीयन्ते निपेधपंस्कारा आधीयन्ते । निरोधक्षणं चित्तमन्पेति । 

तदेकस्य चित्तख प्रतिक्षणमिदे संस्कारान्यथात्वं निरोधपरिणामः । 
[ विवरणम्‌ ] 

.- . निरोधस्य (त्रिक्षणेःक्षणे हि नितेवधममन्वीयमानं चित्तं निरुध्यते । चलं 
गुणवृत्तं गौणे वित्तं गुणद्त्तं चलम्‌ दूति अवर्धमावी तस्य बाह्यवृत्तिभ्ये 
निरुष्यमानेचित्तस्य परिणामः । न द्यपरिणिममानस्य चित्तस्य पुरुषवत्‌ 
कै।टस्थ्ये निरोध उपकल्पते ¦ ततश्वाह-कीदश्स्तदा निरोषपरिणिाम इति ॥ 

वयुत्थाननिरोधसस्कारयोरमिमवप्रादु मावो निरोधक्षणचित्तान्वयो 
निरोधपरिणामः । व्युत्थानं विविध्ुत्ान चरने प्रत्याकरेण चित्तस्य । 
तदुपजनितः पस्क।रधित्तस्य धामणो धमः । न स प्रययासमकः ॥ 

तथा निरोधजन्मा संस्कारः अप्रल्ययात्कः चित्तस्येव ध्मः । 
स च ब्युस्थानसस्कारोऽप्रययास्मकर इति स प्र्ययनिरोषे न निरुष्यते । 
्युपयानप्र्मयानरोधे नाभिभूतः ॥ 

प्रल्यनिरोधाचच निरोधजः संस्कारः सज्ञायते । तयोः ब्युत्थाननिरोध. 
संस्कारयो; धमिणि चित्ते वतेमानयोः अभिभवप्रादुभौनि भवतः ॥ 

किं तावाविमौवतिरोभावौ अनियमेन ` मवतः? न । कथं तर्हि। 
वयुत्थानसंस्कारा हीयन्ते सवकायंक्षमलमुपार्चुवते । निरोधसंस्कारा 
आधीयन्ते । तौ चाभिभवरपरादुमीव्रौ निरापक्षणं चित्तं धर्मिवेन अन्वेति 
स तयेरमिभवप्रादु मावयेश्चित्तनानुगमो निरोधपरिणामश्चित्तस्य ॥ 

तत्‌ एतदमिहितं मवति-- एकस्य चित्तस्य प्रतिक्षणमिदं 
सप्कारान्यथातं ब्युत्यानसंस्कारामिभवेन निरोधसस्कारपरादुर्भव्रेन संस्कारान्य- 
धत्वम्‌ । ब्यु्थानक्तस्काराणामपि हीयमनठया सव्पि सम्बन्धे ` प्रादुर्भवता 
निरोधेनेव वल्वच्वात्‌ निरोधपरिणाम इति समाद्यातम्‌ ॥ 


1. व्युस्थानसस्काराः चित्तधमांः न ते प्रल्ययात्मकाः -इति प्र्ययनिरोधे न 
निर्द्धाः । नियोधहंस्कारा अपि चित्तधमांः । ड 


२४० पातञ्ञखयो गतसूत्रभाष्यषिवरणे 


{ भाष्यम्‌ | 
तदा सेस्कारशेषं चित्तम्‌ इति मिरेषसमाषो व्याख्यातम्‌ ॥ ९ ॥ 
[ सूत्रम्‌ | 
तस्य प्रशान्तवाहिता सस्कारात्‌ ॥ १० ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 


निरोपमसंस्कारपायवपिक्षा प्रशान्तवाहिता चित्तस्य मवति | 2ते 
संस्कारमारम्य यावत्‌ ब्युत्थानपर्मिणा संस्करण निरोधधनसस्कतिः 
नाभिभूयत इति ॥ १० ॥ 

© 6५ न = ॥ स्म्‌ | [4 
सवोथतेकाग्रतयोः क्षयोदयो चित्तस्य समाधिपरिणामः ॥ ११॥ 
[| विवरणम्‌ | 

[तद्‌।] निरोध्यमानं बाद्यम्यः प्रत्ययेभ्यः सस्कारशेष चित्तमिति 
व्याल्यातम्‌ “विरामप्रव्ययाभ्यापपूप्रैः सेस्काररेषोऽन्यः'' इति ॥ 

किमेतेन, आह--निरोधावसानल्वात्‌ प्रप्ययामावावरस्तानततया परिणामस्य 
निरोधपरिणाम इति ॥ 


सम्प्रज्ञातवस्थायां सन्तोऽपि प्रघ्या न विवक्षिताः | कितु प्रतिक्चषण- 
संस्कारान्यथालमेव विवक्ष्यते । यथा निरुद्धमूमिनि चेतसि विद्यमानोऽपि 
समाधिः न विवक्ष्यते । निरोधमात्र्य विवक्षितत्वात्‌ । तथ। सबीजावस्थायामपि 


संस्कारान्यधात्वमातमेव विवक्षितम्‌ | न प्रत्ययाः समाधिरेकाग्रता चेति ॥ ९॥ 


तस्य चित्तस्य निरोधपरिणाममनुगच्छतः प्रद्ान्तवारिता संस्कारात्‌ । 
निरोधपंस्कारपाटवापृक्षा निरोधसंस्कारस्य पाटवं द्रढिमा तदपेक्षा प्रशान्त- 
वाहिता प्रस्तनता चित्तस्य भवति ॥ 


सा प्रशान्तवाहिता कियन्तं कालमिव्याह--तं संस्कारं निरोधक्तस्कारं 
आरम्य यावत्‌ व्युत्थानधर्भिणां व्युत्थानं धमौ व्युत्थानजनितत्वाधस्य तेन 
सेस्करण निरोधपमसंस्कारो नाभिमूयते, तान्तं काकमस्य प्रशान्तवाहिता | 
निरोध्तस्कारसमुदयादिति ॥ १०॥ 





1. निरोघसंस्काराभ्यासपाट- 
2. तत्तस्कारमान्य ग्युत्था- 
3. रोऽभिभूयते 

4. यो. च. पा, 1, सृ, 18, 


विभूतिपादः दृतीयः २४१ 
| भष्यम्‌ | 
सवोथेता चित्तमः । एकाय्रताऽपि चित्तपर्ैः । सवोयेतायाः क्षयः, 
तिरोभाव इव्यथः । एकाग्रताया उदयः, आविभीव इत्यथः । तयोः 
धिसेन अनुगतं चित्तम्‌ । तदिद चित्तं अपायोपजनयोः स्वात्ममूतयो- 
धर्मयोः 'अतुगमात्‌ समाधीयते । स चित्तस्य समापिपरिणामः ॥ ११॥ 
सूत्रम्‌ ] 
तत्र पुनः शान्तोदितौ वल्यप्रययो चित्तस्येकाग्रता- 
परिणामः ॥ १२ ॥ 
{ भाष्यम्‌ | 
समाहितचित्तस्य पूरैः प्रव्ययः शान्तः । उत्तरः तस्सदश उदितः । 
[ विवरणम्‌ | 
सभयैतेकाय्रतयोः क्षयोदयो चित्तस्य समाधिपरिणामः । 
सर्वाथैत। मोगापरगियोग्यताविचित्रता चित्तधर्मः । वक्ष्यति-गद्रृदयोपरक्तं 
चित्ते सवाथम्‌' इति । एकराग्रताऽपि चित्तस्य धमः शान्तोदितप्रलययोः साम्यं 
समाधीयमानस्य चित्तस्य स्वीर्थतायाः क्षयः मवति । तिरोमावः इव्यथः । 
नहि रविचिदधियमानं विनङ्क्ष्यति । एका्रताया उदयः भर्वति । आविर्भाव 
इत्यथः । न।व्रिधमानमु्पदते ॥ 
तयोः क्षोदययोः धर्भित्वेनानुगतं चित्तम्‌ । पूपरसूत्रादन्वयग्रहण मिहापि 
सजिधीयते । सवोधतायाः क्षयमकाग्रतायश्चोदयं नियमेनान्वीयमानं चित्त 
समाभिप्राधन्येन पिमे । योऽसौ चित्तेन स्ौयतेकाग्रताक्षयोदययेरनुगमः 
स समाधिपरणामः । समावेश्च प्राधान्यमेकाम्रतामूमो ग्यास्यातम्‌ "वस्तलेकभ्र 
चेतसि स भूतमर्थं प्र्योतयति' इति ॥ 
तदेवाह--तदिदं चित्तम्‌, अपायोपजनो स्वार्मभूतो अन्यतिरि्तो 
तयो्प्रयोः सवौतेकात्रतयोः अनु(मवा) गमात्‌ समाधीयते । स चित्तस्य 
समाधिप्राधान्यात्‌ समाधिपारणामः ॥ ११॥ 
तत्र पुनः समापिकार शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ वित्तध्येकग्रता- 
परिणामः । समाहितचित्तस्य निरुद्रवाह्यृततेः पूर्वः प्रत्ययः शान्तः तिरे- 
मतः । उत्तपस्तत्द्श उदितः प्रादुभूतः। समाधिचित्तं समाघानविशेष्ट 
समाघ्यवस्थम्‌ । समाधिचित्तपुमयाः शन्तोदितयेः; प्रत्यययोः अनुगतम्‌ ॥ 


[म 


1. अनुगत. 2, ततः पुनः 3. यो. सू. पा. 4, सू. 23, 
31 





रर पातज्ञलयोगसूत्रभाष्यविवरणे 


[ भाष्यप्‌ | 
समाधिचित्तं उभयोरमुगतम्‌ । पुनस्तथैव भ समाधिग्नेषात्‌ इति । स 
खस्वयं धर्धिणः चित्तस्य एकाग्रतापरिणामः ॥ १२॥ 


[सूत्रम्‌ | 
एतेन भूतेन्द्रियेषु घमेलक्षणावसखापरिणामा व्याख्याताः ॥१३॥ 


। [ भष्यम्‌ ] 

एतेन पूर्वोक्तेन चित्तपर्णामेन पर्मलक्षणावसारूपेण मूतेन्धियेषु 
धर्मपरिणामो लक्षणपरिणामोऽवसापरिणामश्च उक्तो वेदितव्यः । 

॥ [ षिबरणम्‌ 

पुनस्तथैव यथा प्रत्यय आदः शान्त उत्तरस्तःसदरा उपजातः, स च 
शान्तः पुनरन्य उदितः, स शान्तः पुनश्वान्य उदितः, येवं आ समाधिपरेषात्‌ 
व्युत्यानसंस्क)रेण यावत्‌ समाधिः विभ्रंरते ॥ 

स खलयं पर्णः चित्तस्य प्रतिक्षणं सदृराशान्तोदितप्रस्यययो- 
रवुगमः एकग्रतापरिणामः ॥ 
तत्र यावत्‌ नाह्महृत्तिनिरोधादारम्य चित्तस्य संस्कारपरिरिषता, तावत्‌ 
निरोधपरिणामः ॥ 
८ तथा बह्यप्रत्ययनिरोधात प्रभति आ बराक्‌ अरोषप्रत्ययनिरोधात्‌, 
अरोषप्रत्ययनिरोधोत्तरकाठं च एकाग्रतोदयाभव्रात्‌ , तावत्‌ समाधिपरिणामः ॥ 

तथा समाधिपरिणापका एव शान्तोदितयोस्तुल्ययोः संभवदेकाग्रता- 
परिणामः । पूथ्परिगा(जान)मनान्तरीयक्मुत्तरोत्तपरिणामस्येति क्रमेण त्रयेऽपि 
प्रणामा व्याद््याताः ॥ 

किमनेन परियामान्वास्यनिन प्रयोजनम्‌ ? उच्यते--चठं गुणवृत्तं, 
गौणं च समस्तं परिणामधम॑कमनवस्यितमितिं वैराग्यभावना्म्‌ } तथां 
परिणामत्रयक्षयमादतीतानगतज्ञानायं च एतदन्वाख्यानम्‌ ॥ १२ ॥ 

एतेन मूतेन्धियेषु. पर्मठक्षणावस्थापछििमा व्यल्याताः । 
एतेन पू्चौक्तेन चित्तपत्िमेन । पितिशििनि ? धर्भरक्षणावस्यास्पेण 
धभल्पेण लक्षणद्येण अवस्थास्येण च । भूतेन््ियेषु मृतेषु प्रथिवीप्रश्तिषुः 
सथूठेषु, इन्दि च प्रोत्नादिष, येषां तच्वान्तरपरिणामो नाति । पर्भ॑पस्मिमो 
ठक्षणपरिणामोञतरस्यापलििमशोक्तो वेदितव्यः ॥ 


विभूतिपादः ठृतीयः ५४१ 


[ भाष्यम्‌ } 
तत्र ब्यु्थाननिरोधयोः अमिमवप्रादूमिो वर्मन धर्मपरमः । 
रक्षणपर्णिमो' निरोधक्चिलक्षणः त्रिभिरष्वमिगयक्तः । प॒ खलु अनागत- 
ठक्षणमध्वानं गिता षमेखमनतिक्रान्तो उतैमानरक्षणं प्रतिपन्नः यत्राख 
खहूपेण अभिव्यक्तिः । एषोऽध्य दितीयोऽध्वा । 
[ विवरणम्‌ 1 
चित्तस्यानवत्यितलेन गम्यमनिन परिणामेन मृतेद्धियाणां पर्णिमिद्य 
प्रकात्रथयोगिनः चित्तपरिणतिवत्‌ अषुविज्ञानल्रात्‌ अतिदेशः त्रियते ॥ 


ननु च निरोधसमाध्येकामप्रतापरिणामाशित्तस्याभिदिताः । न तु धर्म 
लक्षण्रस्थापस्मिमाः । कुतस्तत्र तिदेश इति, अभिदितत्वमेषां द्रोयति- तत्र 
वयुरेथाननिरोषयोः धर्मयोः अभमिमवप्रादुरमावौ पर्मिमि चित्ते ध्मेपरिणामः ॥ 

एतस्मद्धि धर्मभेदवचनात्‌ ध्मभेदमवद्िष्म । तयोश्च 
धर्मपरिणामयेोः ब्युत्याननिरोषयेरनिमवग्रादु भौववचनात्‌ क्ष्णावस्यापरिणामाबपि 
च अव।दिष्मैव | 


कथम्‌ १ वतेमानलक्षणाद्तीतलक्षणमनिसम्पचमानो धमेऽभिमूयते । 
यश्च॒ अनागतलक्षणात्‌ वतेमानलक्षण्ममि्म्पथमानः स प्रादुरस्ि । 
तदभिमवगप्राहुमाववचनाचच प्रतिक्षणं दुत्रल्पोऽतस्थापरिणाम उक्तो 
मरतीव्याद--रक्षणपरिणामो निरोस्िरक्षण इति ॥ 

चित्ते टक्षणपरिणामः त्रिलक्षणचेन त्रिमिरष्वभिः अतीतानागतवतमतरैः 
युक्तः प्रतिपाथते परिणामिनो द्येफेकस्य तयोऽप्यष्वान एतेऽवरथ॑भाकिनिः । 
यस्थ त्वेते न सन्ति सोऽपरिणमी कूटस्थ इत्युच्यते ॥ 

स खलु निरोधः अनागतलक्षणमध्वानं दहित्वा पमेव निरोष- 
धर्मलं अनतिक्रान्तः अपत्का्यारम्भामातात्‌ । असत्कार्यारम्भे हि त्रिंकाटल्- 
मेकस्य वस्तुनो नोपप्यत (नापि) काटत्रयपल्न्छिवस्य निलक्षणस्याभावात्‌ । 
अत उच्यते--धर्मतमनतिक्रामन्नेव वतमानं रक्षणं प्रतिपन्नः यर यक्षिन्‌ 
वतमाने रन्गे अस्य स्वरूपेणाभिव्यक्तिः एषोऽध्य निरोधस्य अनागताष्व- 
समीक्षया द्वितीयोऽघ्वा ॥ । 





1. -णामश्र नि 
2. -ध्वानं प्रथमं हित्वा 


२४४ पातज्ञलयोगसूत्रभाष्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
नं चातीतानागताभ्यां रक्षणाभ्यां वियुक्तः । तथा ब्मुत्थानं 
व्रिरक्षणं त्रिभिरष्वभिथुक्तं वतैमानरश्णे हिता षमेखमनतिकरान्तं 
अतीतरक्षणं प्रतिपन्नम्‌ । एषोऽस्य 'द्वितीयोऽष्वा। न चानागतवतेमानाम्यां 
लक्षणाभ्यां व्िधुक्तम्‌ । स्युनः व्युधानमुपसम्प्यमानं अनागतलक्षणं 
हिला धर्मलमनतिक्रान्तं वर्तमानरक्षणं प्रतिपन्नम्‌ । यत्रास्य स्वरूपा- 
भिव्यक्तौ सस्यां व्यापारः । एषोऽस्य द्वितीयोऽध्वा । न चातीतानागताभ्यां 
लक्षणाभ्यां विथुक्तं इति ! एवं पुनर्निरेधः, एं पुनब्ुत्थानं इति । 
[ विवरणम्‌ ] 
यदा तु व्युत्थानं वर्तमाने छक्षणमरिक्षति, तदा निरोषोऽतीत- 
लक्षणमध्वानं तृतीयं प्राप्स्यतीति स तृर्तयोऽध्वा भविष्यव्येव । 


स्यदेतत्‌-त्रतैमानरक्षणप्रतिपत्तौ निरोधस्य त्रय्वत्वं नास्तीति, अत 
आद-न च।तीतानागतामभ्भां रक्षणाम्यां वियुक्तः । दतः? येन स 
एवानागतो वतमानो ऽतीतश्वेति ॥ 


तथा ब्युत्थान त्रेटक्षणं तिभिरध्वभिः अतीतानागतवतैमनिः युक्तं 
वतमानलक्षणं हिता धरमस्वमनतिक्रार्तं यथ। भ्यास्याते निरोधे निरोधिनि 
धर्म वतेमानमध्त्रनमभिपतम्प्यमने अतीतरुश्चणं अष्वानं प्रापन्न्‌ ॥ 


एष्‌) ऽस्य व्युत्यानस्य वतमानं प्रथममव्वानमभिसमीकय द्दितीयोऽध्वा । 
द्वितीये तु पर्यपि तृतीय एाष्वा द्वितीयो विष्यति । त चानागतवर्तमानाभ्यां 
रक्षणाभ्यां वियुक्तम्‌ ॥ 


पुनन्युत्थान निसेधसेस्कोरण उपसम्पयमानम्‌ अनागतसरक्षणं अध्वानं 
हिता र्मेखमनतिक्रान्तं वतैमानरक्षणं प्रतिपन्नम्‌ । यत्रास्य खरूपेणाभि- 
व्यक्तो सत्यां व्यापारः स्का्यापादनसाम्यम्‌ | एषोऽस्य अनागतामिसमीक्षया 
द्वितीयोऽध्वा । न चर्तीतानागताम्यां उक्षणाभ्यां वियुक्तम्‌ ॥ 

यया चित्तं व्युत्थाननिरोधघमाम्यां न युज्यते । एवं पुननिरोधः एवं 
पुनः ब्युस्थानभिति एष रक्षणपद्णिामशित्तधर्मयोन्युतयाननिदेधयेः ॥ 





1. -र्य त्रु, 
2. वं पुनः 


विभूतिपादः दृतीयः २४५ 
भाष्यम्‌ ] 


तथा अवस्थपरिणामः । "निरोधक्षणेषु निणेषपंस्ाय बलवन्तो 
वन्ति, दुखा ब्यु्थानसंस्काराः, इयेवं (ष) धमीणामवस्य।परिणामः.॥ 


वर्मिणो घर्मः परिणामो, पपीणां त्यध्वनां रक्षणैः परिणामो 
लक्षणानामपि अवखामिः परिणाम इयेवं पर्मलक्षणाशथापरिणमिः3 
अशून्यलक्षण गुणबत्तमवतिष्ठते । चट” गुणवृत्तम्‌ । गुणस्वामाव्यं तु 
प्रञृत्तिक्रारणपुक्तं गुणायाम्‌ इति ॥ 

एतेन मूतेन्दरियेषु पमेषभिभेदात्‌ तरिविधः परिणामो वेदितव्यः । 

[ विवरणम्‌ | 

तथा अवस्यापरिणामः पर्टिर्यते । कथम्‌? निरोषक्षणेषु निरोधे 
वतमाने निरोधतेस्कारा बरवन्तो भवन्ति । पैस्क।रवल्वसेन निरोध बल्वत्रमपि। 
दुबला ब्यु्ानसंस्काराः, तत एत्र व्युत्यानदु्वख्तमपि । तथा ब्युत्यान- 
लक्षणे व्युत्ानततस्काए्रलीयस्त निरोधतेस्कारदुवै्लम्‌ , इत्येवं प्रतिक्षणं घ्डदुर्व- 
खवत्थाम्यां युउ्यमानानां धर्माणां अवस्थापरणिमः ॥ 

तत्र केन ख्पेण कस्य परिणाम हति दरयति-धर्भणा धं 
परिणामः । यथा चित्तस्य धर्भिणो निरेधन्युत्यानादिधंमः । धम।णां उयध्वनां 
रक्षणैः परशणामः । यथा निरोधादिचित्तघमाणां अनागतादिरुश्षणेः । लक्षणानाः 
मध्यवस्थाभिः पर्णिःमः । यथा वतमानादेलन्षणानां दृदुत्रटलाधवस्पामिः | 
इत्येवं ध्भरक्षणावस्थापरिणामेः अशून्यरक्षणम्‌ अशन्परूपं गुणत्रततमव- 
तिष्ठते ॥ 

चठ गुणवृत्तम्‌ । एतदव तु गुणस्वामाव्यं प्रवृतिक्रारण सकच्न्याप्रार- 
कारणं उक्त गुणानां सखरादीनाम्‌ इति । एतेन चेतसि प्र्िद्धेन 
धर्मउक्षणावस्यापाएिामत्रितयेन भूतेन्द्रियेषु धमर्मिमेदात्‌ त्रित्रिः परिणामो 
वेदितभ्यः॥ 
तत्र नि- 
तन ध- 
-मेः यून्यं न क्षणमपि गु- 
-लं च रु- 


क 


२४६ पातञ्जटखयोगसूत्रभाष्यनियरणे 


1 
प्रमाथंतस्त॒ एक एव परिणामः । पर्मिष्वहूपमत्रो हि धमः। 


धू्मिविकिवेषा धर्मदारा प्रपञ्च्यत इति । तत्र धम॑स्य धर्मिणि व्तेमान- 
स्येव अघ्वयु अतीतानागतवतंमानेषु भावान्यथात्वं भवति, नः द्रव्यान्य- 
यात्वम्‌ । यथा सुवरणेमाजनल भिचा अन्यथा क्रियमागद् भावान्यथात्वं 
मवति न सुव्णान्यथाखम्‌ इति । 

सपर आद-धमोभ्यपिको षमी । पवैतत्तात्‌ मनतिक्रामन्‌ पूत्रपरा- 
वखामेदं अनुपतितः कौरस्थ्यनामि परिवर्तेत यद्न्वयी सात्‌ इति ॥ 

9 कि ॥॥ विवरणम्‌ ॥ [# क, (५ ५ 

परमाथतस्त्वक एव परणामः । क्यम्‌? धानसह्यमात्रा हि धरमः। 
न हि धर्मिपरिदपेण धमो नाम परृया्ति । नापि घमपहिविगिन छक्षणं नाम 
पृथक्‌ भान्यते । नापि लक्षणन्वतिरेकेण अवस्थानां पृथक्त्वे भवति । तेन 
प्मिविक्िविषा पर्मद्ारा पर्मनेददरेण त्रिध। प्रपञ््यते ॥ 

कथं पुनर्धरमित्रिक्रियैतैषा । न पुनरत्यन्तापूर्मोत्पत्तितिनाशाग्रिति ? तत 
आह-तत्र धमैस्य षटदेः धर्णि मृदाख्ये वतैमानर्य अध्वस्वतीतानागत- 
वतैमनेषु मावान्यथात्वमेव प्रत्ययान्ययासवम्‌ , अतीतो घटः) बर्तते, अनागतः) 
इति च धर्विणि वतमानस्थैत्र | स एत्र पर्मस्याविमवितिसेमावान्यथात्वम्‌ । तं 
द्रव्यान्यथात्वं तदेव मृद्द्रव्यं धिं रूपान्तरं च ॥ 

उदाहरणं पदिरयति-- यथा दसुवणभाजनस्य भिखा अन्यधा 
कुण्डलादिभावेन क्रियमाणस्य भावान्यथात्वं स्स्तिककुण्डलाक्कसंस्थानान्यत्वम्‌ | 
न सुवणंद्रव्यान्यथासमिति ॥ 

गप्र आह असक्का्यसमारम्मामिमार्न-- धर्माम्यधिक्रो धर्मेभ्यति- 
र्ति धर्मी, धमश्चाविचमानोऽन्यश्चान्यश्च समुदापिष्यते । न पुनेरको धी 
धर्मेषु मूतभविष्यद्तेभानेषु धमीन्यतिर्कतिऽन्बयीति ॥ 

यधन्वयी धर्मानम्यधिको धमीभ्यतिर्किः पूत्रतसात्‌ पू॑पद्व्यस्व- 
रूपात्‌ अनतिक्रामन्‌ पूद्रापरावखाभेदम्‌ अतीताधवस्यानेदम्‌ अतुपतितः 
अनुगतः स्यात्‌ , ततश्च एष दोषः प्रसजति-स धर्मी तवामिमतः 
कोट्थ्येनामि परित अपरिणापरिते बर्तेत ॥ 





1. नद॒द्र- 
व धमानभ्याधिको धर्मी पूर्वतत्वानविक्रमात्‌ । पूवौपरावस्थाभदमनुपतितः 
क) टस्स्येनेव प्रिवतेत यद्यन्वयी स्यात्‌ इति । 


विभूतिपादः वतीयः. २४७ 


८ [ भष्यम्‌ | 
_ . भयमदोषः । कस्मात्‌ १ 'एकान्तानभ्युपगमात्‌ । तदेतत्‌ प्रेलोक्ये 
न्यक्तेरपेति । निलयसप्रतिषेधात्‌ । अपेतमप्य्ि । विनाराप्रतिषेषात्‌ । 
[[ विवरणप | 
अत्राह--अयमदोषः । कस्मात्‌ ? एकान्तानमभ्युपगमात्‌ अत्यन्त- 
क{टस्थ्यविनाशयोः धर्मिणोऽनम्युपगमात्‌ । यचत्यन्त कूटस्थो धर्मा स्यात्‌ 
आत्मवत्‌ , ततश्च अस्माद्वर्िणो धमणामभेदात्‌ कौटस्थ्यं॑प्रसजयेतेति दोषः 
स्यात्‌ । न तु धर्मिणां गुणानामप्यन्तकौटस्थ्यमम्युपगम्यते । परिणामिनित्यतं 
हि युणानां वदिष्यति ॥ 


अय वा, धरमधर्मिणोः एकान्तमेदामेदानभ्युपगमात्‌ । रएकान्तेन हि 
धर्मम्योऽन्वपिम्यो धर्मणा[जमेदे कौटय्थ्यं प्रप्नुपात्‌ । अव्यन्तमेदे वा 
धमाणां अस्यन्तविनाशः स्यात्‌ । न व्वत्यन्तमेदामेद वभ्युपायिष्येते । तसमात्‌ 
न कौटस्थ्यदोष इति ॥ 

कथं कौटस्ध्यामाव्र इव्याह-- तदेतत्‌ त्रेलोक्ये व्यक्तेरपेति, न 
करटस्यम्‌ । कस्मात्‌ १ निरेयतवप्रतिषेषात्‌ । कायैतवदिव हि निव्यवं प्रतिषिद्धम्‌ । 
अयात्यन्तविनष्टमिति चेदाह --अपेतमप्यस्ति, विनाशप्रतिषेषात्‌ । कारणस्य 
नित्यत्वात्‌ तदभदाच्च कायस्य अत्यन्तविनाशः प्रतिषिद्ध एव ॥ 

ततश्च यदुच्यते कैश्चित्‌-विरुद्वहैतामासोदाहरणमेतदिति, वायं ? यथा- 
(अक्तौ विकते व्यक्तेदेति, नित्यत्वप्रतिषेषात्‌ , अपेतमप्यत्ति; विनाश 
प्रतिषधोत्‌' स्त्र निव्यत्वभतिषेषात्‌ श्यये हेतः 'अपेतोऽि विकारोऽस्तिः 
इत्यनेन सिद्धान्तेन विरुप्यते ॥ 

कथम्‌ ? व्यक्तिरासरामः, अपायः प्रच्युतिः, यवत्मलामात्‌ प्रश्युतो 
विकारोऽस्ति, निस्यलप्रतिक्षधो नोपपद्येत । यत्त॒ व्यक्तेरपेतस्यापि विकारस्या- 
स्तित्वे तत्‌ खदु नित्यत्वमिति ॥ 

निप्यप्रतिषेधो नाम विकारस्यामलमात्‌ प्रच्युतिः । यदामटमात्‌ 
प्रच्यवते तदनिव्यम्‌ । यदस्ति न तदाटामात्‌ प्रच्यवते । अस्तिं 
च आस्मठाभात्‌ प्रच्युतिखेति विरुद्धा्रेतौ धर्मौ सह न सम्भवतः । सोऽयं 
हेतुः य सिद्धन्तमश्रिष्य प्रवतेते तमेव न्याहन्तीति विरुद्धो हेतुरिति ॥ 





1, एकान्तताऽनम्युपगमात्‌ । 


४८ पातञ्ञख्यो गसूत्रभाष्यविवरणे 


नायं दोषः । वस्तूनां व्यक्तान्यक्तवभकत्वाभ्युपगमात्‌ । यथा हि 
धटादिर्विंथमानेऽपि सन्‌ भगरे नोपलभ्यते । न च तावता अप्त नास्तीति 
दाक्यं प्रतिज्ञातुम्‌ । आछरोकोपयेन हि व्यज्यते | तथा इदं त्रेछोक्यं कारणे सघष 
विचमानमेव अनभिव्यक्तासकयुणस्वभावतया) पुरूषाधनिमित्तेनाविष्कियते | 


तथेव च गतिसंस्कारक्षये स्थितिसंस्काराभिव्यक्ते कारणं प्रति ससुञ्यमान 
व्यक्तेरपैति । यथा दीपलिकतियेधनि व्रियमानोऽपि घटादिः सन्तमसावष्टभ्भात्‌ 
वयक्तेरप्तरति, तथ। अत्रापि महदादयो यमा; उयघ्वानः संस्तगविसर्गधर्माणः, 
न तु स्वादयो धर्मेणः ॥ 


ततक्ञेढाक्ये महदादिस्तम्नपर्यवसानं स्ादीनां ध्रभूतम[न]मिष्यक्ति- 
धर्मकं सत्‌ अव्यन्तनिरुद्धसूक्षषधम॑समुदयात्‌ व्यक्तिस्थूटधमख्येण न गृह्यत 
इ्युष्यते-- तदेतत्‌ त्रेडाक्यं व्यक्तेरपेति इति । न पुनः धर्निस्ह्येणापायः | 
तथा च धर्मिस्येण निद्यत्दुच्यते- तद्पेतमप्यस्ति इति ॥ 


तदेवं व्यक्तरूपश्च राक्तिरूपश्वेको धर्मा, व्यक्तिख्यण च तस्यानि्यलं), 
शक्तिर्पेण च निलयत्वमिति कथमेष विरोधः स्यात्‌ । न हि देबदत्तश्वट्नादि- 
व्यापरेण सव॑दा गृह्यमाणश्चलनादिविरामे विरंष्यति । चट्नमेव हि 
तिरोधीयते । तस्मादग्यक्तावस्थायामप्यस्ति धर्भा, व्यक्तावस्यायापुपटम्य- 
मानत्वात्‌ , अन्धतमपावत्यितघट। दिवत्‌ ॥ 


ध्यक्तिरपि स्वकीयधर्मान्तरसमीक्षया धर्मिणी । सा च धल्सेण 


निशया, धमेरूपेणानि्या अभ्युपेयते । एवं निकरे धर्मधमिमेदोऽनवत्ित 
इश्यनवस्याऽपि इष्यत एव ॥ 


तत्र व्यक्तरपति शइलयनेन न व्िरुष्यते, निख्छप्रतिषेधात्‌ इत्ययं 
हेतुः । नापि अपतेमप्यस्िि इव्यनेन विरोधः । उभयो{िन्नविषयत्वात्‌ । न।पि 


तरिनाञ्चप्रतिषेषात्‌ श्यं अपेतमप्यस्ति इलयनन विरष्यते । यथा बःदयद्‌- 
पेतोऽप्यत्तति देषदत्त इति ॥ 


अय मन्वीयाः-- अस्ति इति निद्यत्वमुच्यते, तेन निलय प्रतिषेात्‌ 
इव्यये निल्यल्ठेन त्रिरोधमाशिङ्गतीति । न- अनम्बुपगमात्‌ । न हि व्यक्ते 
निंद्यत्वमम्युपगष्ठेम, तस्या एव निलयं प्रतिषेधेम । शक्तिम्यक्तधकलतवाम्यु- 
पगमादिति हि प्रतिपादितम्‌ ॥ 


विभूतिपादः वतीयः २४९ 
तदेतदनिज्गीय पराभिग्रायं विरेषेदाहरणत्वापादानम्‌ अन्धदपणीयन्गत्तन्त- 


गुद्धा्रयति । यथा किङ कशिदन्धः स्वां अदशनशक्तिं अनवधार्य 
स्वार्थमादज्ञमुपार्जयति तद्रदेतदाभाति ॥ 


अपरि च यथप्येवत्रैव व्यक्तौ शक्तौ वा निव्यत्वमनित्यत्वं च अध्यारोप्य 
त्वे पक्षपिपषाधयिषया ब्ऋवीथाः, एवरमपि विरद्धोदाहरणतवे न सेमतरति; 
्रिपरीता(त)साधनात्‌ । कथम्‌ १ अपेतोऽप्यस्ति हति नियलप्रपिषिधात्‌ 
इवयुच्यते । तिलयत्वप्रतिषेधात्‌ इति अनिव्यत्वादिव्युक्तं भवति । 
अपेत्याप्य पित्वं नित्यमुच्यते । निदयलवस्य विपरीतमनिलयत्वम्‌ | न च 
रक्षस्यनिलत्वस्य अनिदयघं देतुमवति, यो विपरीतं साधयन्‌ निलयं 
व्िरुन्धीत । न द्यनिष्टमसाधयन्‌ विरद्धतामियात्‌ ॥ 


#) 


अथापि निखयवप्रतिषरेधो नाम आत्मलाभात्‌ प्रच्युतिरिति विक(ल्पस्य))ल्प्य 
वावथेथाः--एमप्रि शब्दभेदमात्र(्रात्‌ ) नाथभेदः | आलत्खाभात्‌ प्रच्युतिः, 
अनियतं, इ्येषोऽथः ॥ । 


अयःपि नित्यलवोपपत््यमावादित्यत्ररम्बेधाः-- एवमपि तियतप्रतिषेषात्‌ 
श्य दाब्दः (एकस्यां श्युक्तिकायां) निल्यस््रोपपत्यमावादिव्यस्याथस्य , अ वाचकः || 
[4 = 4 पि ^~ _,_ ^~ £ (न. 
अथापि वाचक इद्यःरोप्य प्रतिमभप्रेत-- एवमपि राक्तिव्यक्तिधमधर्मिमे- 
(दख्येण)दे न निव्यत्मनिध्यघ(लह्ष) चेध्युक्तमेव समाधानम्‌ ॥ 


एतेन व्यक्तः भपत्‌।ऽप्यास्त, विनाक्षप्रतिषेधात्‌ इति विोधोद्धाघ्नं 
म्रत्वा्यातम्‌ ॥ 


एवमवस्थिते व्यक्तेरपेतस्य प्रव्यक्षणानुपटम्यमानस्य कथमस्तित्वम्‌ ? 
यावता, नास्ति, अनुपटम्यमानत्रात्‌ , नमःकुषुमवत्‌ इति ॥ 


अत्रोच्यते--अनुपरङन्धिरसिद्धो हेतुः । अनुमानागमाम्यामुपट्न्धे; । 
यदेतत्‌ व्यक्तं एतत्‌ प्रागुत्पत्तरप्यस्ति, यत॒ उत्यते । असच्चेनोप्पवत, 
रारापिप्राणवदेव ॥ 


किं च--अपतः सचे सतश्चासच्वे सवन न आश्चस्युः । किं च-- 
अनुपटन्भशचेदप्त्वं समुक्तासकारणादीनां च प्रागुपरम्भादृष्नं च अस्तित्वं 


केन ठग्यते ? तथा- 
उट 


२५० पातञ्जखयोगपूत्रभाष्यनिवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 

'सेपगीदस्य सोक्ष्यम्‌ । अतोऽनुपरन्धिः इति । 

लक्षणपरिणामो धमोऽघु वतेमानोऽमीतः, अपीतरश्नणयुक्तः, 
अनागतवतेमानाम्यां दश्रणाम्यां अवियुक्तः । तथा व्पानः, वतैमान- 
ठक्षणयुक्तः, अतीतानागताम्यां लक्षण्यां अवियुक्तः । तथा अनागतः, 
मनागतरक्षणयुक्तः, वतेमानातीताम्धां लक्षणाभ्यां अवियुक्तः इति ॥ 

यथा पुरूषः एक्रस्यां क्वियां रक्तो न शेषाघु विरक्तो मवति इति॥ 

[ विवरणम्‌ ] 

ऽ्नापतो विते मरो नाभावो वियते सतः ।' 

इति आगमः । प्रप्यक्षानुपरन्धिश्च नाप्य कारणम्‌ । अथ 
व्यक्तेरेव विकारो विधमानश्चेत्‌ , कुतो नोपटम्यत इति £ आद--साक्षात्‌ 
कारणे संप्तगौदस्य पोष््यम्‌ , अतोऽनुपभ्िः । न अप्तत्वात्‌ ॥ 

इदानीं भृतिन्दियाणां लक्षणपरिणाम इदमुव्यते- लक्गणपरिणामो 
धर्मो. यथा मृदो घटादिः अध्वसु अरतातादिष वर्वेमानाऽतीतो घमः । 
किमुक्तं मवति? भतीतलक्षणयुक्तः;, न पुनरस॒चमापन्नः | इतराम्ां च 
अनागतवर्ैमान।म्पामविवुक्तः । कारणस्य मृदो वर्तमानत्वात्‌ तत्र संसृष्टस्य 
घटस्य [अ]्रिधमानवेऽपि(नस्यापि) युक्तो वतेमानेन क्षणेन धटः । तथा 
भविष्पनपि घटो मृद एवानागतः सन्‌ मविष्यतील्यनागतटक्षणेनाप्यवियुक्तः 
तथा वतमानः, वतेमानरक्षणयुक्तः, बतीतानागताम्यां रक्षणा- 
म्यामवियुक्तः ॥ 

तथा अनागतः अनागतलक्षणयुक्तः, वतेमानातीताम्यां लक्षणाम्याम- 
रियुक्तः अतीतानागतञ्क्षणयोः गृदाप्मकत्वात्‌ धटस्य व्यवदितेनप्यतीत- 
लक्षणेन।वियोगः॥ । 

कयमेकलक्षणयुक्तो धर्मो छक्षणाम्यामपराम्यामविुक्तं हद्यतरियोगस्य 
दृ्टान्तमाह--यथा पुष एष्या च्ियां स्तो न रेषासु विरक्तो मवति। 
रोप्ाघु तु भूतभपिष्यहठक्षणयुक्त रागः । सतश्वाविनाशादसतश्वानुसत्तरिति हि 


[क । क्र 


प्रतिपादितम्‌ ॥ 


| 





1. सकगाचचास्य 
2 सैौषम्याच्ानुपलन्धिः . 
3. म- गी- 2. 16, 


विभुतिपादः ठृतीयः २५१ 


[ भाष्यम्‌ ] 

अत्र रक्षणपरिणामे सर्व॑स्य स्वैटश्रणयोगात्‌ अष्वतष्करः' पैः 
दोषश्वोद्त इति ॥ 

तस्य परिदारः-- धर्माणां धम॑लं अप्रपाध्यम्‌ । सति च परमस 
ठक्षणमेरोऽपि वाच्यः, न वतैमानपमय एवाः एवंदिन चितं 
रागधर्मक्रम्‌ः । कोधङाङे राग असपरुदाचारात्‌ इति ॥ 

| विवरणम्‌ ] 

यत्र॒ टक्षणपरिणमे सर्वस्य धममस्य सर्वरक्षणयोगादध्वसंकरः 
पदोषश्चोदयते । कथम यो दि भविष्यति स वतेते, भतीतश्च। तेन अतीते | 
वर्वमानमव्रिष्यखम्‌ , वतमाने अतीतमविष्यत्तरम , भविष्यति च अतीतव्रतमानत्वम्‌ । 
इव्येवमन्योन्याष्वसकरः ॥ 

तस्य परिहारः अयमुच्यते-- धर्मिणो मृदाख्यस्य धर्माणां पिण्डषघट- 
कपालानां धर्मत्वं धर्मान्तराच्च भिनत्वम्‌ अप्रसाध्यम्‌ । सतिं च धर्मत्वे 
तद्दे च, ठक्षणमेदोऽपि सिद्धो वाच्यः ॥ 

कथम्‌ ? यथा पिण्डावस्थायां अनगतल्क्षणयुक्तो घटो न वर्तमानो 
नापि अतीतः । यथप्रि मृ्वमविष्यस््रसमैक्षया अतीतवक्त मानाम्य 
अपि.अति]युक्तः ॥ 

तथा वतेमानलक्षणगुक्तो नातीतो नाप्यनागतः । यपि धर्महूपेणपि[वे'- 
कष्यमाणः अतीतानागतलक्षणाम्यां दहीयमानजायमानाम्यां लक्षणाम्या- 
मपि[वि]युक्तः ॥ 

तथा अतीतोऽतीतलक्षणयुक्तः न वषरतमानो नाप्यनागतः | यथपि 
मृष्वानुभूतव्यक्तिसमीक्षया अनागतवतमानाभ्यामव्ियुक्तः ॥ 

तया पिण्डकपाादि¶ योजनीयम्‌ । तस्मादाह- न वर्तमानसमय 
एवास्य एकं ठक्षप ध्मध्य । किं तर्हिं प्रकरिणोक्तन त्रिखक्षणत्वम्‌ | अतो 
नाप्वानः संकीर्यन्ते ॥ 

एवं हि न चित्तं यगधभेकम्‌ इति न चित्ते वि[रागधर्मिणि रागादीनां धर्मत 
तद्भेदे च सिद्धे अवक्तकरः । कस्मात्‌ ? क्रोधकाठे रागस्य अघरमुद।चारात्‌ । 





1. -रः प्राप्नोतीति परः 
2. -स्य धर्मत्वम्‌ | 
3 म्‌ स्यात्‌ । 


२५२ पातञ्जलयोगसूत्रभाष्यविबरणे 


भाष्यम्‌ ] 
चः; त्रयाणां क्षणानां युगपेकयां वत्ता नास्ति सम्भवः। 
मेण तु स्वव्यज्ञकराक्ननस्य भावो भवेत्‌ इति । उक्तं च (ह्पातिशया 
वृत्यातरयाश्च वविरध्यन्त । सामान्यानि तु आतेरयेः सद्‌ प्रतन्तः' । 
तस्मात्‌ असंकरः । यथा रागस्येव कचित्‌ समुदाचार इति न तदानी 
अन्यत्रमावः । तु) केवरं सामान्येन समन्वागत इति अस्ति तद्‌ा3 
तस्थ भावः । तधा रक्षणस्य इति ॥ 
[ विवरणम्‌ |] 
न हि त्रोधकाटे रागः प्क इव समुदाचरति । क्रोधकठे हि रागः 
अतीतोऽनागतो वा | तथा क्रोधोऽपि रागक्राडे । यदि हि वर्तमानस्तमय 
एकं रक्षणं अभविष्यत्‌, क्रोधकालेऽपि रागः सपुदाचरिष्यत्‌ । नपिं वां 
समुद्ाचरिष्यत्‌ । नपे फ्रोधकले नात्ति ॥ 


़ि च~-त्रयाणां रक्षणानां युगपदेकस्यां टक्षणप्य दत्तौ 
विरोधात्‌ नास्ति सम्भवः । क्रमेण लक्षणानां क्रमेण सव्यञ्ञकाज्ञन्य 
घटा दिस्न्यज्चकाञ्चनस्य अन्यतमस्य लक्षणस्य भवेत्‌ सम्भवः ॥ 


उक्त च- रुपातिशयाः वृत्यतिशयाश्च विरुध्यन्ते | वतमानरूप- 
वृ्तिरायेयुक्त घटे च पिण्डदिभ्यक्तिरूपातिङाया विरोधात्‌ न संमवन्ति। 
अत एव॒ अतीतानागतद्या धित्तामान्यानुगतसेनाविरेवाव्‌ अतिशयैः सह 
है भ, 
वतन्ते ॥ 


तस्मात्‌ अध्वनाम्‌ अकरः । यथा रागस्येव कचित्‌ समुदाचार 
इति न तदानीमन्यत्र लषु अभावा रागस्य । किन्तु केवरं सामान्येन 
| चित्तख्येण समन्वागतः अतीतोऽनागतोऽपि कन्‌ इयस्ि तदा तस्य 
रागस्य मावः । तथ टक्षणस्येति ॥ 


ननु च पिण्डकपाल्योरतीतानागतत्वात्‌ घटावस्थायामभावाच्च ताम्ध 
मृदास्यस्य धर्मिणोऽपि अतीतानागतघमिति धर्णि पिण्डकपाल्यारमाव्र 
इति कृता धर्माणां पिण्डकपालादीनामघवत्रयानुपपत्तिरिति परिङ्कमानः 





1, स्यां व्यक्ता 
2 पञ्च्चिखाचापंग- 
3. -दा तत्र तस्य- 


विभूतिपादः वृतीयः २५३ 


{ भाष्यम्‌ ] 

न धमी अध्वा धर्मस्तु अध्वानः | ते रक्षिताः" तांतां अत्रां 
भ्राप्तुवन्तः अन्यसरेन प्रतिनिर्दिद्यन्ते अवस्यान्तरतः, न द्रभ्यान्तरतः। 
यथा एक्रा रेखा ज्ञतस्थने शतं, दशष्याने दश, एका च एकस्माने । 
यथा व्वा एकतेऽपि क्ली, माता चोच्यते दुहिता च स्वस्रा च इति। 


अतरस्थापर्णामे कोरस्थ्यप्रपङ्गदोषः कंित्‌ उक्तः । कथम्‌ ! 
अध्वानः सखव्थापरेण व्यवहिताः । यदा धर्मः स्वव्यापार्‌ न केराति 
तदा अनागतः, यदा करोति तदा वतमानः, यदा कला निवृत्तः 


[ विवरणम्‌ ] 
कथयति--न्‌ धर्मी त्यध्वा | गृदाल्यो हि धम पिण्डक्रपाखातीतानागतघ्रेन 
नातीतेऽन गतो वा । सप्रधःषु मृदमिज्ञाननु्रवत्तेः। किं तर्हि धमौः 
पिण्डादयः उयध्वानः षटकाठे पिण्डकपाटयोरदशनात्‌ । तस्मादष्वत्रयायोगो न 
धर्मानां परिशङ्कनीयः ॥ 


| ते घर्मा लक्षिताः पिण्डादयंः त्रयष्वतेनामिलक्षिताः तां तामवस्थां 
दृददुत्रखलादिकां प्रप्तुवन्तोऽन्यलेन नवै। घटः पुराणश्चेलनेन प्रति- 
निरदि्यन्तेञवस्थान्तरतः । न द्रग्यान्ततः मृदतिरिकतात्‌ ॥ 


यथा एकरा रेला शत्थाने इन्यदयेन तृनीपरस्यनेः श॒तं भरति । 
[> क भ प ^ ०३ न भ 
सव च दशस्थाने एकेन शयन्येन द्वितीयस्थाने दश्च । सैव प्रथमस्थाने एण ॥ 


यथावा एक्रखेऽपि चली माता चोच्यते दुहिता च, सेव अन्यवेक्चया 
स्वसा च । तदेवम्‌ अवस्यान्तरादेव शब्दप्रत्ययादिमदाः । न घधर्मिमेदेन । 


तस्मात्‌ यदुच्यते परैः शब्द्रव्ययलन्नणधर्मक।ल.दिमेदो हेतुः काभ्रकारणभेदे 
इति, सोऽनेनानेकान्तिकः।कृतः ॥ 


अव्रस्थापरिणामे तृत्तीयेऽस्िन्‌ कौटस्थ्यप्रषङ्गदोषः [कैश्चिव्‌ | 
उक्तः| कथं कोटप्थ्य्रपङ्गः १ अध्वानः वर्तमानादयः सन्य(प्रिण व्यवहि- 
(स्थिःताः । कथम्‌? यद्‌ धर्मा घटः पिण्डवस्थायां स्वव्यापारं न करोति 
तद। अनायतः । यदा करति तदा वतमानः अयम्‌ । यदा कृता निवृत्तः 

1. -ताः अलक्षिताः | तत्र रक्षिताः 

2. -भाच यप- 

3. अध्वनः व्यापारेण व्यवहितत्वात्‌ 





२५४ पातञ्चख्योगसूत्रभाष्यविषरणे 


[ भाष्यम्‌ | 

तदा अतीतः, ईयं ` धर्मिणां नियत्वात्‌ धमेरक्षणाऽवस्थानां कश्थ्यं 
प्राप्नाति इति परः दोष उच्यते ॥ 

नासौ दोषः ? कस्मात्‌ । गुणिनिदयेऽपि गुणानां तिमर 
वैचित्यात्‌ ॥ 

यथा संस्थानं आदिमत्‌ धमेमत्रं शब्दादीनां विनाशि 
अविनाशषिनाम्‌, परं रिङ्गं आदिमत्‌ धर्ममात्रं स्वादीनां गणानां 
विनाशि अविनारिनाम्‌। तस्मिन्‌ विकारपन्ञा रति ॥ 

तन्रोदाहरणम्‌ । मृत परमा पिण्डाकारात्‌" आकारान्त उपसमच- 
मानः पमेतः परिणमते षटकार इति । घट[कपेऽनागतं रक्षणं दिखा 

[ विचरणम्‌ । 

तदा अतीतः । तत्र स ख धर्मः कृतः क्रियमाणः करिष्यमाणः 
निजन्याप्रासेपारूढः धर्मिस्वाप्ममूत = एववस्थापितः । न व्यतिर्किरूपः । 
तेन धर्मिणां गुणानां निलयघ्वात्‌ निल्यलान्यतिरेकात्‌ ध्मैलक्षणावस्थनां 
कीरस्थ्यं प्र्भोतीतिं दोष उच्यते ॥ 

नासो दोपः । कस्मात्‌ ? गुणिनित्यतेऽपि गुणानां विमदै- 
वेचित्यात्‌ उद्ध्ाभिमवलविचित्रतया पुरुष्रदेकान्तकूटस्थता नेभ्यते गुणानाम्‌ । 
परणिामाम्युपगमति । न चानवरतपरिण्तीनाण्पि परस्परविमदातिरेङेण दन्यान्तर- 
भावापत्तिरिति न कौटस्थ्यम्‌ ॥ 

कथं विमदैपेचित्रयमिव्याह-यथ। संस्थाने रारोरदिके [आदिमत्‌ 
कारणवत्‌ धमातर कारणस्यातभूतमन्यतिरिक्तं विनाशि तितेमावधर्मकं 
धर्मान्तरसमुदये । केषां संस्यानन्त्यि(म)द--शन्दादरीनामविनारिनाम्‌। एं 
लिङ्गं १दद।स्यं दिमत्‌ कारणवत्‌ घममात्र मिना गुणानामविनाशिनाम्‌ 
अप्मभृतम्‌ । तत्मिन्‌ महदारिधमेमन्रे विक्रारतज्ञा न गुणानां विमद. 
व्रिचितरतय। बिनारिघ गुणस्वस्येण निद्यतरं इति ॥ 

तत्रादाहरणम्‌- प्रत्‌ धर्मी पिण्डाकात पिण्डाकारात्‌ अकाए्न्तरं 
घटे उपसम्पद्यमानो धा; परिणमते ॥ 


= 


धर्मध्भिणोः लश्चणानामवस्थार्नां च को. 
-नां गुणानां बि- 

तत्रेदमुदाहरणम्‌ 

-त्‌ धर्मात्‌ धर्मान्तर 


+ 


विभूतिपादः तीयः २५५ 


[ भाष्यम्‌ | ध ष । 
वर्तमानं रक्षणे प्रतिपद्यत इति रक्षणतः परिणमते । घटो नवपुराणतां 


्रतिक्षणमनुमवन्‌ अवस्थापरिणामं प्रतिपधत इति । धणोऽपि धमान्तं 
सव्या, पर्मखापि लक्षणान्तरं अवस्था, इयेक एष द्रभ्यपरिणामो 
भेदेनोपदररित इति । एषे पदाथौन्तरेष्वपि योज्यमिति । त एते धमे 
टक्षणावस्थापत्णिामाः धरपिस्वहूपमनतिक्रान्ताः इयेकर एव परत्णिमः 
सकौनमून्‌ विशेषान्‌ अभिषुतो । 'यवस्थितख द्रव्यस्य पूप्॑पमंनिवृत्त 
धमौन्तरोसपत्तिः परिणाम इति ॥ १३॥ 

तत्र-- 

^ ~ सभर - ् 
रान्तोदिताग्यपदेश्यधमां नुपाती धम ॥ १४ ॥ 
[ विवरणम्‌ | 

[घशक।रोऽनागते रक्षणे हिता वतेमानरक्षणं प्रतिपत्‌ इति 
लक्षणतः परिणमते ॥ ] 

तथा पटो नवधुराणतां प्रतिक्षणममुमवन्‌ अवस्थ।परिणामं प्रतिपत्‌ 
इति । धर्मिणोऽपि गृददेः धमोन्तरं पिण्डादिकं अवस्था । धर्म पिण्डक- 
पाठादिरूपावस्थामार्तःदति ॥ 

धर्मस्यापि धटदेः टक्षणान्तरं अतीता्षकं अवस्था} सणएदहिषटो 


म ,, ¢, 


धर्मोऽतीतान।गतवतमानावस्थामुप।सेहति ॥ 
तत एक एव परिणामो भेदेनेपदार्धित इति । एवं पदाथोन्रेष्वि 


मृद; अन्येष्वपि रशरेद्धियादिषु योज्यम्‌ । त एते धर्मटक्षणावस्थापार- 
णामा धर्मिस्वह्पमनतिक्रान्ता इत्येक एव घतिणः परिणामः सर्वान्‌ धर्म 
ठक्चषणव्रस्थाणस्णाणान्‌ विशेषानभिपरुवरते | कुतः ? येन अ्रस्थितष्य द्रव्यस्य 
पूत्रधमेनिवृत्तो धम।न्तरोसत्तिः परिणाम इति धौ परिम एवेति शक्य 
प्रतिपत्तुम्‌ ॥ १३॥ 

कः पुनरसौ धम? यस्मिन्‌ अवस्थिते धर्मान्तरविरामे धममन्तरदयः 
परिणाम इति । तत्र श्ान्तोदिताम्यपदेश्यधमीतुपाती धर्मं । चान्तो 
दितान्‌ अव्यपद्रयांश्च धम।ननुपतितु शीलं यस्य सोऽन्वयी भिनष्वमिन्नासा 
ध्माति व्यपदिदयते । धर्मैः नाम योग्यतावच्छिन्ना शक्नोति रशनाङुण्डठादि- 
भावमपृत॒मिति या सुवणेस्य धर्मिणः इण्डललादिक। शक्तिः स एव परमैः ॥ 


1. अथ कोय पारणामः? अवस्थितस्य 


२५६ पातञ्ञख्योगसूत्रमाष्यविवरणे 


| भाष्यप्‌ | 
योग्यतावच्छिन्ना घर्मिणः शक्तिरेव पर्मः । स च 'फरपरषत्र- 
मेदावुमितसद्धवरः एक्रस्य गअन्यश्वान्यश्च । दः तत्र वपैमानः खं 
व्यापारं अनुभवन्‌ धमी घर्मान्तरेभ्यः शान्तेम्यश्च भन्यप्देशम्यश्च भिधते | 
यदातु सामान्येन समन्वागतो भवति, तद्‌ पर्मिष्वरूपमात्रसात्‌ कोऽसौ 
केन भियेत ॥ 

ते खलु धर्मिणो धमौः शान्ताः ये कृवा व्यापारम्‌! उपरताः । 
सव्यापारा: उदिताः । ते च अनागतटक्षणस्य समनन्तरः । वर्तमानस्य 
अनन्तरा अतीताः । किमर्थं अतीतस्य अनन्तरा न भवन्ति वमाना: ? 
पूर्रपशचिमामावात्‌ । 

[ विवरणम्‌ ] 

स च अव्यक्तोऽपि सन्‌ धर्मिणि फञप्रसवमेदानुमितसद्धावः । यथा 
देशान्तरे काछन्तरे च ताटक्कादिकं फं कनकपिण३ः प्रसूयते । तत्फड्प्रप्षत्रमेद - 
दरौनेनान्यानन्यानपि प्रकारानयं प्रसव्रितुं वरिमवतीति तस्मिन्‌ घर्भिणि फटप्रसव- 
मेदानुमितपद्धावः । एकस्य घणः अन्यश्न्यश्च धर्म इयनेनेकस्य धमो 
धर्मासष्यत्माह ॥ 

तत्र यो ष्टः स वतमानः सं व्यापारमुदकाहरणादिक्रं अनुभवन्‌ 
धर्मान्तरभ्यः शान्तेम्यश्चाव्यपदेद्येम्यश्च भिद्यते ॥ 

यदा तु सामान्येन धर्मिख्येण समन्वागतो भवति, अय तद धभिस्वरू- 
पमात्रतरात्‌ धिस्वरूपासमृतव्वात्‌ के।ऽतौ विशेषत; केन बा भिद्येत । 
ध्यापारधिरूटरूपाणामेव भेदो, न कारणसमनुगमनिरीक्षितात्मनामिघ्यथः ॥ 

के पुनः शान्ता उदेता अन्यपदेश्या वा १ ते खलु षरभिंणो धमी; शान्ताः 
ये कृता व्याप्रपुपरताः । सम्यापारा उदिताः । ते चानागतलक्षणस्य 
समनन्तराः । तथा वेतेमानस्यानन्तप अतीताः । किम्थ॑मतीतस्यानन्तरा न 
भवन्ति । न सन्तीलयैः । पूत्रपिभामावात्‌ । यो यस्य पश्चाद्भवति स तस्य 





1, कफकलप्रसवभेदानुाभतः ए- 

2. अन्योऽन्यश्च परिदृष्टः । तत 

3 तत्रये खड्र्मिणो धमः शान्ताः उदिताः अनव्यप्ददयाश्रैति, तत्र शान्ताः 
4, -रान्‌ उ- 

5. अनागतस्य ल- 

6. 


पूरवपश्रिमताया अभावात्‌ 


[ 


विभूतिपादः वृततीयः २५७ 


[ भाष्यम्‌ | 
यथा अनागतवर्तमानयोः पूरैपश्चिमता, नैवं अतीतस्य । 
तस्मात्‌ नातीतस्यास्ति समनन्तरः । तदनागत्‌ एव समनन्तरो मवति 
वतेमानस्य इति ॥ 
अथ अन्यपदेरयाः के ! 
सवं सवीत्मकम्‌ इति । 'तत्रोक्तम्‌-जलठमूम्योः परिणामिकं 
रसादििशवदूप्यं स्थावरेषु द्म्‌ । तथा खावराणां जङ्गमेषु, जङ्गमानां 
खावरषु इ्लेवं जात्यसुच्छेदेन स्वं सवौत्मकम्‌ इति ॥ 
| | विवरणम्‌ | 
पशिमोऽनन्तरः | इतरश्च तदपेक्षया पूरैः । तदिह पि माभावात्‌ एष स्यमपि पूर्वो 
न भवतीति पूथैपश्चिमामावरादतीतस्यानन्तरा न सन्ति| यथा अनागतवतेमानयोः 
पू्ैपश्चिभता नैवमतीतस्य । तस्मात्‌ न[नाती तस्यासि समनन्तरः ॥ 


यस्यै पाठः तदनागत एव समनन्तरीमवति वतैमानस्य ईति, न 
तस्य प्रकृतेन सम्बन्धः । तस्मात्‌ तदनागत एर समनन्तरो भवलयततीतस्य 
इत्ययमेव पाठः । अथोपपत्तेः । कथम्‌ ? यदा व्युत्यानसस्कारो निरोधप्षंस्करिण 
आचोऽमिभूयते, तद्‌। वतमानमप्वाने हित्वा न्युत्थानसंस्करोऽतीतमप्वानमुपप्तम्पय 
पुनरनागतः सन्‌ वतेमानीमवततलि्ठमनन्तरोऽप्यनागत एव समनन्तरीमवत्यती- 
तस्येयुच्यते । अतीतानागतयोरक्षणयोधमाणां धर््रिखरूपमात्रत्िरेषात्‌ ॥ 


अथ अव्यपदेश्याः के ? तदन्यपदेदपामिपरदर्चनार्थमाद-- सर सर्वालसमङं 
इति । कथम्‌ ? ततराक्तम्‌--जटभूम्याः पारिणामिक रसादिवेश्वह्प्यं स्थावरेष 
दृष्टम्‌ । यथा रत एक एव इष्युश्ङ्गिनेरकादिषु मघुरकटुक्रत्वादि वैश्चरूप्य 
प्रतिपचते । तथा, ख्यस्य डुङृष्णत्वादिविचित्ररूपत्वम्‌ । एवं गन्धादिष्वपि। 
तथा स्थावराणां जङ्धमेषु रसदिवेश्वष्प्यम्‌ । स्थावराणुपयुक्तानां जङ्गमेषु 
रसरोहितादिव्िश्भेदः । तथा जङ्गमानां स्थावरेषु उपदुक्तानाम्‌ इक्नायुर्वैद- 
प्रपिद्ध रताद्विश्वस्स्यम्‌ ॥ 

एवं स्यावरा्णां स्थवरेषु, जङ्गमानां च जङ्गमे, इत्येवं जालसुच्छेदन 
सस्वायतिनारेन सवं पव।सकम्‌ । अदङ्कशरिखरे खोकत्रयमप्यस्ति { तथा 


च अङ्गष्टदिचनत्‌ ब्रह्मा रमक्ूषम्य इव्यादिश्रुतिस्मृतिशतप्रस्यानम्‌ ॥ 





1. यन्राक्तम्र 
33 


२५८ पातञ्ञख्योगसूत्रभाष्यविवरणे 


& 9 

देशकाङकरारनिमित्तापवन्धात्‌ न खलु समानकालम्‌ आत्मनाम्‌ 
अभिव्यक्तिः इति । य एतेषु अभिव्यक्तानभिग्यक्तेषु पर्मेषु अतुपाती 
सामान्यविरेष।तमा सोऽन्वयी धर्मी | यस्यतु धर्ममाज्रमेवेदं निरन्वयं 
तस्य भोगामावः । कस्मात्‌ ? अन्येन विज्ञानेन कृतस्य कर्मेण: अन्यत्‌ 
कर्थं भोक्तृत्वेन अधिक्रियत ? । (स्मृल्यमवश्च, नन्दस्य स्मरणम्‌ अन्य- 
स्यास्ति इति । वस्तुप्रयमिज्ञानाच्च सितोऽन्वयी धर्मी, यो षर्मान्यथा- 
त्वमभ्युपगतः प्रयभिज्ञायते । तस्मात्‌ नेदं धर्ममत्र निरन्वयम्‌ इति॥ १४॥ 

[ विवरणम्‌ ] 

यदि स्वं स्रात्मकं, तदा सवै सत्रोपलम्यत, सम्मतव्िप्रयोगजन्मा च 
रोको म। प्र(ति)वतिशव्यदेरुत्तरं पठति--देशकालाकारनिमित्तापवन्धात्‌ 
देशादीनामपवन्ध; अवबन्धः तस्मात्‌, त स॒मानकाठं आस्मनां सप्रवस्तूनां 
अभिव्यक्तिः । कस्य चित्‌ कचिदेव देदो काटे च केन विदवाकारेण तनुश्रतां 
च धमादिनिमित्ताभिसमीक्षया कचिदवाभिन्यक्तिः, यथा रहप्रश्ठतीनाम्‌ | एतेनैव 
सम्मतविग्रयोगनिमित्तरोकादयुपपत्तिः । अत एकैकस्मिन्‌ अतिरद्धितसंख्य- 
गोचरात्‌ धमौ न शक्या ग्यपदेषटुम्‌ ॥ 

य एतेष शान्तेदितग्यपदेदय अभिव्यक्तानमिव्यक्तेषु धर्मेषु अतुपाती 
सामान्यविशेषादमा सचादिशब्दादिरूयेण सोऽन्वयी धर्मी । यस्य तु 
वादिनः धर्मेमात्रमेवेदं निरन्वयं बाह्यमाध्यासिकं च, यस्य च ज्ञानमात्रमेव, 
तस्य घममीणां क्षणप्रणाज्ञेादतीतानागतवतमानपयारेहिणां समानकाठनां च 
भोक्तृ मोग्यलादिसंबन्धानुपपत्तेः मोगामावबेः ॥ 

सम्बन्धामावं दरौयति--कस्मात्‌ ? अन्येन विज्ञानेन कृतस्य करम- 
णाऽन्यत्‌ विक्ञानमकर्वै मविष्यत्‌ कथं भोक्तृखेनाधित्रियेत। कतंश्च फलभि- 
प्रवृत्तेः फलेन सबन्धो युज्यते । अन्यः कतं। फेन चान्यः सम्बध्यत इति विरुष्यते ॥ 

स्मृययमादश्च । कृतकरणीयादिविषयस्मृत्यमावश्च । अन्यदृष्टस्य स्मरण- 
मन्यस्य नास्तीति । नहि चैत्रस्य वघुमित्रः स्मरति । [वस्तुपप्रत्य- 
भिज्ञानाञ्च, यस्मात्‌ तदेवेदमिति वस्तु प्रसयमिजानीमः+ तस्मात्‌ स्थितोऽन्वयी 
धमी धमीन्यथातवं घमेर्यथाववं अभ्युपगतः प्रतिपन्नः । न त॒ घछस्पेणान्य- 
थात्वम्‌ | यथा रचकादिमदानुगतमपि कनकमेवेति प्रत्यभिजनीमः । तस्मात्‌ 
नेदं धर्ममात्रे मिरन्वयमिति ॥ १४॥ 


1. तस्स््रव्यभाविन्च. 





विभूतिपादः तृतीयः २५९ 


[ सूत्रम्‌ | 
क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः ॥ ११ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
एकस पर्भिणः एक एव॒ पस्णिाम इति प्रसक्तेः, क्रमान्यत्व 
परिणामान्यत्वे हेतुः मवति इति ॥ 
त्यथा- चु मृत्‌, पिण्डपृत्‌› वटमूृत्‌ › कपालमृत्‌ › कणमृत्‌ इतिः 
करभः । यो यस्य घमैस्य समनन्तरो ध्मः, स॒ तस्य कमः । 
पिण्डाः घट उपजायत इति ध्मेपरिणामक्रमः । 
[ विवरणम्‌ ] 
इदानी परिणाममेदे देतुरुष्यते- सिद्धे हि भेदे परिणामत्रयस्तयमः प्रयोक्तु- 
रुपकल्पेत । यतः कयाचलिङ्गद्वारा अतीतादिषु मतिरपजनयितु शक्यते, 
नान्यया इति, क्रमान्यत्वं परिणामान्यले हेतुः । एकस्य धर्मणः चित्तादेः एक 
एव परिणाम इति प्र्क्तेः धमादीनां धम्पैमेदादिति, परिणामभेदसिद्धये देतु 
उच्यते-- क्रमान्यस्वम्‌ । कमः अनन्तरभावः तस्यान्यत्वे मेदः ॥ 
त्रयो हि क्रमा अन्योन्यविधमौण उपलक्ष्यन्ते | लक्षणावस्थाक्रमाम्थामन्ये 
धर्मक्रमः । धमवस्याक्रमाभ्यामन्यो लक्षणक्रमः | धर्मलक्षणक्रमाम्यामन्योऽवस्था- 
क्रमः । यच्च तेषामन्यत्वै प्रसिद्धमागमधिरूढे तत्‌ करमकावौणां परिणामान।. 
मनुमापकं अन्यते हेतुः ॥ 
तद्यथा मृत्‌ ध्म चूरणमृत्‌ इति चूणादिभिधर्भैरयुगपत्क।कजन्ममिः 
क्रमवर्तिमिः परिणमते । सतत्र मृदुप्रहणेन धर्मिणो मृदाल्यस्य परस्परलक्ष्यमाण- 
मेदवर्णपिण्डवटकपालकणादिघमानुगपे प्रतिपादयति ॥ 
चूर्णस्यानन्तरः पिण्डः, पिण्डस्यानन्तरो धटः, घटस्यानन्तराणि कप 
खानि; कपालानां कणा अनन्तरा इति धम एव चेत्‌ , पिण्डमृत्‌ , 
घटप्रत्‌, कपाटम्‌ , कणत , इति कमः, धमान्तरस्य क्रमः । न लक्षणं, 
नाप्यवस्या । यथा-यो यस्य धर्मस्य समनन्तरो धर्मैः स॒ तस्य क्रमः । कथम्‌? 
पिण्डो घट उपजायत इति पिण्डरूपा मृत्‌ घटीमवतीत्यथैः । अमेदोपरचोरेण 
पिण्डि धृट उपजायत इध्युव्यते । न पुनः पिण्डो धर्मो घर्मन्तरामतां 





1, -क्तं ऋ. 
2. -ति च 
3. - ण्डः प्रच्यवते घट- 


२६० पातञ्जखयोगसूत्रभाष्यविवरणे 


भाष्यम्‌ | 

ठक्षणपरिणामक्रमः, पटस्य. 'अनागतात्‌ वतंमानभावः क्रमः । 
तथा पिण्डस्य व्वतेमानादतीतमावः क्रमः । नातीतस्यास्ति करमः। कस्मात्‌! 
शू्वापरतायां हि सयां समनन्तरत्रम्‌ । सा तु नासि अतीतस्य । 
तस्मात्‌ द्येरेव रक्षणयोः क्रमः ॥ 

तथा अवस्थापरिणामक्रमोऽपि घटस्य अभिनवस्य प्रान्ते पुराणता 
द्यते । सा च क्षणपरम्पराऽनुपातिना क्रमेण “अभ्यूह्यमाना 

[| विवरणम्‌ | 

प्रतिपधते । पिण्डधर्मकिमर्दनेन तद्धियेधी तदनन्तरं घटास्यो धभ उपजायते ॥ ` 

धर्मपरिणामश्च ह्विविधः; तुल्यपरिणामशवातुल्यपरिणामश्च । यथा पिण्डो 
घट उपजायत इत्यतुल्यपिण्डस्य, षटाद्िधर्षृदाल्यो धौ परिणमते, सः 
अतुर्यधपपरिणामः । यावच्च घटस्य जन्मन; प्रखति आ कपाटापत्तेः तावत्‌ 
धटरूपेणेव परिणमते मृदिति स तुल्पघर्मपरिणमः | 

तथा चित्तमपि निरुद्धद्रत्तिकमेकाम्रतावस्थायां तुल्याम्यां - धरमार्भ्या 
दान्तेदितप्रत्याम्यां परिणमते, ब्युस्याननिरोधाभ्यां धर्माम्याम्‌ अतुल्याम्या प्रणिण- 
५ते, तथा म्युत्थनवेलायां शान्तषघोरमृहट; प्रव्ययधररतुल्यैः परिणामं प्रतिपथते । 
सोऽयं धमेपरिणाक्रम उक्तः ॥ 

इदान लक्षणपरिणामक्रम उच्यत-लक्षणपरिणापक्रमः 
धटस्यानागतात्‌ लक्षणात्‌ वतेमानमावः । तथा पिण्डस्य विरेपिषर्मोदये 
वतेमानादतीत[मा३]; क्रमः । नातीतस्यासिति कमः । धमै हि वर्तमानठक्षणस्य 
समनन्तरं य्छक्षणं स छक्षणक्रमः । न चातीतटक्षणस्य समनन्तरं क्षणमस्ति ॥ 


कस्मात्‌ ? पूवापएतायां हि सां समनन्तरम्‌ । सा चातीतष्य 
नास्ति । तस्मात्‌ दयोरेव अनागतवतैमानयेः लक्षणयोः कमः । अतीतस्य 
नरामामावप्रतिप।दने प्रयोजनम्‌ ऽश्षणतक्रमयोः सयमात्‌ › इत्यत्र भविष्यति ॥ 


तथा अवस्थापरिणामक्रमः षरस्याभिनवस्य प्रान्ते अवसानावस्थायां 
५ [ख्‌ भ [॥* 
पुराणाता दृश्यते । सा च क्षणप्रम्पराञतुपातिना क्रमेमामभ्यूह्यमाना प्रति. 


अनागतमावात्‌ 
वतमानमावात्‌ 

पूवेपरतायां सदां 
अभिन्यम्यमाना 

ये. सू. पा. ३. सू. 52. 


"75 


1 
॥ 


विभूतिपादः वतीयः २६१ 
[ भाष्यम्‌ | 
परां व्यक्तिम्‌ आपादिता इति | धमलक्षणार्भ्यां च विरिशेऽयं तृतीय 
परिणाम इति ॥ 

त एते क्रमाः षर्मधरिभेदे सति प्रतिरुन्धस्वरूपाः । धर्मोऽपि घमीं 
मवति ग्जन्यधमीपक्षया इतिं । यदा तु परमाथतो पर्मिणिः भभेदो- 
पएचरद्रेणाभिषीयते र्मः, तदा अयम्‌ एकलेनेव क्रमः प्रयवभासते ॥ 

चित्तस्य द्ये धमः परि्श्च अपरिद्ष्टाश्च । तत्र प्र्ययासकाः 
परिष्टः, वस्तुमात्राः+ अपरिष्णः । 

| विवरणम्‌ | 
क्षणमभिनवमावपरिमदनेन पुराणता सञ्चनिष्यते । सा च प्रन्तेड्‌ प्रां 
व्यक्तिमापादिता। मध्ये तु सुक्ष्मतया न पिभाव्यते । तेन मघ्यावस्ायां स- 
पि क्रमो न ठक्ष्यते | प्रान्तकाल।भिन्यक्तिलिङ्गेनानुमायिष्यते-येन इयं पुराणता 
परां व्याक्तेमुपभ्रपिता सोऽयं क्रम इति । न हि घटे परिनिष्पनमत्रे प्रतिक्षगण- 
जन्माऽपि पुराणता गृह्यते ॥ 

तया च वदिष्यति णक्षुणप्रतियागी परिणामापरान्तनिर््राह्यः कमः” 
इति । तस्मात्‌ धर्मरक्षणक्रमाभ्यामवस्याक्रमस्यान्यतात्‌ धमैटक्षणपरिणामाम्यां 
विशिष्टऽयं तृतीयः परिणामः ॥ 

त एते क्रमा पर्मपरमिभेद सति प्रतिठन्धस्वरूपाः । विवक्षिति तु 
धर्मधर्मिणोरमेदे तत्न क्रमभेदो न छम्यते। धर्मोऽपि धर्मी भवलन्य- 
धमौपक्षया । गुणेम्योऽन्यत्र धर्मधर्मित्वं नाम न व्यवस्थितम्‌ । महदादीनामन्य- 
विशेषापेक्षया धर्मेलम्‌ । अविेषाणां च विरेषपेक्षया, विशेषाणां च रान्तो- 
दितवेक्षयेति। यदा तु परमार्थतो पर्मिण्यभेदोप्चारद्रिणामिधीयते धर्मः, 
तदाऽयमेकव्वेनेव क्रमः प्रत्यवमापते ॥ 

तत्र चित्तस्य द्वये दिविधाः धमः पिष्टाश्चापरिद्ष्टाश्च उपरन्धा- 


१ 


शानुपल्न्धाश्च । के ते इव्याह- तत्र प्रययास्मकराः रागद्रेषमोष्टादयः 
परिट्ः । वस्तुमात्राः स्वरूपेण विद्यमानाः काययोगिनः अपदः । 





1. आपद्यते. 

2. अन्यधरम॑स्वरू्पापेक्षया, 

3. अमेदोपचारः, तदूदररिण स एवामिधीग्रते 
4. -चत्मिकाः अ- 

5.यो.सू. पा. 4. सु, 33. 


५६ पातञ्चलयोगसूत्रभाष्यविवरणे 


| भाष्यम्‌ | 
ते च सपैव भवन्ति अनुमानेन प्रापितपस्तुमात्रसद्धावाः । 
निरोधपर्मसंस्ाराः परिणामोऽथ जीवनम्‌ । 
चेष्ट! शक्तिश्च चित्तस्य धर्मा दशेनव्जिताः ॥ इति ॥ १५॥ 
एते योगिन उपरत्तिपवंपाधनस्य बुभुस्सितार्थप्रातिपत्तये संयमस्य 
विषय उपक्षिप्यते 
[ सूत्रम्‌ | 
~ परिणामत्रयस्यमात्‌ अतीतानागतज्ञानम्‌ । १६॥ 


[ विवरणम्‌ ] | 
[ते च] स्वविषयवृत्तिसद्भतैः सपैव भवन्ति । ते कथमवगम्यन्त इति? 
अनुमानेन प्रापितवस्तुमात्रसद्धावाः कारय॑रिङ्गेनावगतसद्भावाः । स्वरूपेण 
तु नानीश्वरैरपठम्यन्ते । ततश्चैकेकतेनोच्यन्ते ॥ 


निरोषषर्मसंस्काराः । निरोधः उक्तः । धर्मः इति, - धर्माधर्मौ । 
संस्काराः वासनारूपा: । परिणामः उक्तलक्षणः । अथ जीवनम्‌ इति, 
धमघेक्षया सकछ्करणदृत्तिः प्राणलक्षणा येन चित्तधर्भण मवति, स जीवनम्‌ 
इयुभ्यते । चेष्ठा म्यापारः । शक्तिः साम्य, चित्तस्य धमौः। दशैेनवरजितः 
अग्रलक्षाः । इति एते सप्त निरोधादयशित्तषमा अपरिदष्ट। उच्यन्ते ॥ १५ ॥ 


एते त्रयः परिणामा धर्मरक्षणावस्यरूपाः योगिनः उपत्तिषवंसाधनस्य 
समासादितयमादिसकल्साधनस्य स्थिरतरसंयमस्य, अतीतानागतप्रसयुप्थित- 
बुभुत्सिताथप्रतिपत्तये सेयमस्य विषयः उपक्षिप्यते । त्रयोऽ्येको 
श्रयः संयमस्य ॥ 


परिणामक्षयसंयमादतीतानागतज्ञानम्‌ । परिणामत्रये तवत्‌ सयमः 
करणीयः, यावत्‌ समाधिप्ज्ञाऽऽलोकः । स॒ च यद्विषय उपस्थितः; तं विषयं 
यथाभूतं प्रलक्षतामापादयति । सुद्ष्मे व्यव्रहितमतीतमनागते विप्रकृष्टं ॑वा 
यमुद्दिश्य प्रापणामिप्रयेण सृक्षमादि¶ु सेयमः करियते, तदा सोऽर्थो 





1. अतो यो. | 

2. अत्र आद्कषकोशे इत उपरि “लक्ष्यमाणः दइव्यादिः) अत्र (178) 
पे प्राक्‌ मुद्रितः मन्थः हदयते । तस्यानन्वयात्‌ आद्दौकोशे (14) एुटेभ्यः उपरि 
दिखितः (स्वातिषयश्त्ति' दयादिः म्रन्थः योजितः ॥ 


विभूतिपादः वृतीयः २६३. 


[ भाष्यम्‌ | 
धर्मलक्षणावस्थापरिणामेषु संयमात्‌ योगिनो मवलतीतानागत-. 
ज्ञानम्‌ । धारगाध्यानसमाविल्यं एकत्र सयम उक्तः । तेन परिणामत्रयं 
साक्षाकियमाणम्‌ अत्तीतानागतज्ञानं तेषु सम्पादयति ॥ १६ ॥ 
॥ [ सूत्रम्‌ ॥ 
शाब्दाथेप्रययानाम्‌ इतरेतराध्या सात्‌ सङ्करः, तसवि- 
भागत्तयमात्‌ सवैभूतरतन्ञानम्‌ । १७ ॥ 
[ भाष्यम्‌ । 
तत्र वाङ्‌ वर्णेष्रेव अर्थवती । शरत्रं च ध्वनिपरिणाममात्रविषयम्‌ । 


[ चिषरणम्‌ | 

वरयतां योगिन उपयाति । धर्मरक्षणावस्थापरिणिमेपुं संयमात्‌ योगिनो 
मवलयतीतानागतज्ञानम्‌ धारणाध्यानसमाधित्रयमेकतर सयम उक्तः । 
तेन संयमेन प्रिणामत्रयं साक्षाक्कियमाणमतीतानागतन्ञानं तेषु परिणामे 
सम्पादयति । सकल्पदाथौनां परिणामितात्‌ तेषां चातीतादियोगात्‌ 
कालत्रययुक्तसमस्तपदा्थविषयपरिण मत्रयसंयमेन सव॑ प्रद्यक्षीमवति । तथा 
प्रतिक्षणपरिणामधप्रकमनवस्यितं विश्वमक्षमाणस्य वैराग्यं जायते ॥ १६ ॥ 

अयमन्यः संयमविषयः उपक्षिप्यते सरव॑हाग्दार्थ्रतिपत्यथः शब्दार्थं 
प्र्यानामितेतराध्याप्तात्‌ संकरः तसविभागप्तयमात्‌ सवंभूतरतन्ञानं 
सम्पथते | तत्र कः शाब्दः, कोवा अर्थः, प्रययो वा, सेकरश्च किन्निमित्तः, 
कथे च तेषां प्रविभागः? इति ॥ | 


तत्र फिं वागुचाथः ब्रोत्ग्राह्यः (स) राब्दः, उतार्थान्तरं, किः वागि, 
तद्वयतिस्ति वा, इति तावद्धिचार्थते-- वाक्‌ तावन्न. शब्दः । कस्मात्‌? 
वाक्‌ वुर्भष्वेवाथैवती । वागिति वणामिव्यज्ञकमषटघु स्थने विषक्तमिन्दियं 
व्णामिन्यक्तिमात्रप्रयोजनोपक्षयं+, न तवदयाभिव्यक्ते। शब्दामिव्यक्तौ वां 
व्यापारं करोति ॥ 


तथाश्रत्रं च न स्वयं शब्दः, नापि राब्दविषथम्‌ | कस्मात्‌ ? ष्वनिप्रि- 
णाममात्रविषयं हि तत्‌ । ष्वनिरिति सामान्यं वणौवणैरूपम्‌ | तस्य विशेषः ` 
परिणामः अकार।दिवणालकः, काकादिवाशिःसकश्च मूढकरणव्यज्घपः | 
तत्‌ ध्वनिपण्णिाममत्रप्रकशावसानं श्रोत्रे ना्धरब्दुयो्याप्रियते ॥ 


२६४ पातञ्चख्योगसूत्रभाष्यविकवरणे 


[ माष्यम्‌ | 
१६ पुनः नादानुसंदारबुदिनिग्राह्यम्‌ इति । वणौः एकसमयासम्भविलात्‌ 
परस्परमिरनुग्रहात्मानः । ते पदम्‌ 'अनुपसंस्पृश्य अनुपस्थाप्य आविभूताः 
तिरोमूताश्च इति प्रयकम्‌ अपदस्वरूपा उच्यन्ते ॥ 

[ विचरणम्‌ | 

ननु च श्रेत्रप्राह्य एव शब्दः । न-अथप्रलायकत्वात्‌ । अर्थं 

यः स॒म्प्रत्याययति स शब्दः. । कः पुनरसौ ? प्रदम्‌ । तत्‌ पुरन्नादानुमंहार- 
ुद्धिनिग्रष्यं नादानां ध्वनीनां श्रोत्रविषयभूतानां प्रलक्र प्र्यपिनि तैस्कारमाधाय 
निवतैमानानाम्‌ अन्तेन ध्वनिना या समुपस्थापिता बुद्धिः सा नादानुसंहारवुष्टिः 
प्रथमष्वनिक्रमानुसंहारासदितसंस्कारस्य प्र्ययिनश्चित्तस्य जायते, तयैकया 
ुद्धथा अयं निगृह्यते । तत्‌ पदम्‌ । तच प्रयक्षत्राव्‌ खूपादिवन्ान्य- 
भरमाणापेक्षम्‌ ॥ 


ननु च ““गकारौकारविसरजजनीयाः' इति भगवानुपवर्षः । 
तन्न--अवाचकलत्वात्‌ । कथम्‌ १ समुदायाप्तम्भवात्‌ । समुदायासम्भवश्च 
एकसमयापसम्भवित्वात्‌ । न हि गकारोचारणकाठे ओकारविसजनीयैौ 
नाप्योकारोचारणकराठे गकारविसजनीयौ । नापि विसजनीयग्रहृत्तिवेखयामितरयो 
समवस्थानमिति वणसमुदायाप्षम्भवादव।चक्वम्‌ ॥ 


यथेव बणौनां युगपर्समयानवेस्थानम्‌, एवं संस्काराणाम्‌ स्पृर्तीनां 
च तजनितानामयुगपत्कारत्वादवाचकत्वम्‌ । स्प्रप्युपयोगा्थत्राच्च संस्कार- 
स्यानुभूतविषय एवेपयेोगात्‌ , प्रल्याय्यस्य चपूैत्वःत्‌ ॥ 


अपि च संस्काराणां बाचकःवाम्युपगमे, श्शब्दादर्थप्रतिपत्तिः" 
धूवौपरीमूतं मावमाख्यातेनाचष्टेः "परमस्य शब्दमूरुतखादशन्दमनपेक्षयं 
स्यात्‌ ' इति प्रसिद्धिरपषटूयेत ॥ 


अथापि व्णमावमवित्वेन स्मृतिसस्कारयारपि शब्दत्वमुपचयेत । 
नेतदपि--तद्धावभावित्वं नाम तस्मिन्नेव सति भवलयसद्यभाव एव यत्र, 
तत्र स्यात्‌ । (न च) तच वणौनां शब्दत्वे सिद्धे मवेत्‌ । छोकस्तु शरीरादा- 
वात्माभिमानादविवेकादतसिन्नपि तहुद्धि करोतीति न सैन वस्तुनि्णये 
हेतुर्भवति ॥ 


1. असंष्श्य 


(५ [# 


विभूविपाद्‌ः वतीयः २६९५ 


हि [® 


अपि च, वाकू्रोत्रन्यापार एव सत्यथप्रतिपत्तिरिति तस्याग्यभिचारात्‌ 
तद्भावभाविते शब्दय प्रापनोति । तस्मादन्त्यो वर्णौ न ` वाचकः, ` वणैत्वात्‌ 
आचवर्णवत्‌ । तथा, तस्स्पृतिरसंस्कारा न वाचकाः; स्पृतिस्स्कारत्वात्‌ , 
आधवर्णीरमूतिसंस्कारवत्‌ ॥ | 

यदि चान्त्यो वणः पूरैव्रणजनितसंस्कारसहितः वाचक इत्युष्यते-- 
नैतदेवम्‌ } कस्मात्‌ ? अन्ध्यवर्णोच्वारणमात्रदिवप्रघ्ययप्रसङ्गात्‌ । कथम्‌ ! 
अर्ततदिवक्तोचरस्तिगकारादिव्णाहितसंस्कये . हि पस्मस्तः श्रता । 
तत्रान््यव्णोज्चारणमत्राद्थः प्रतीयेत ¡ अथापि नियमा्थमाद्यवर्णोचरणपिति चेत्‌ 
न--पूषवर्णानां पश्चिमवर्भेनातुल्यकाल्लात्‌ स्राहायकाभवि नियमानुपपत्तिः ॥ 

तवापि वर्णानां पदन्यञ्चकते नियमाय पूरववर्णा उच्ारयितन्या इति 
दोष एतेति, पद्यञ्च कत्वकल्पनातो वणोनामेव वाचकत्वं युक्तमिति चेत्‌, 
न वर्णनां बुद्धौ स्रकीयसंस्काराधानमात्राभ्युपगमात्‌ । उच्चसितिप्रष्वंसमान- 
वर्णस्कारपरपयोपचितायां हि बुद्धौ पदं निर्भासते । एतदेव हि वर्णानां 
पदन्यन्नकतम्‌ | न पदं प्रतिं दीपवत्‌ साक्षात्‌ प्रवतेते ॥ 

न बुद्धे धर्मिद्ारेण संस्काराणमिकाश्रयावस्यानादन्येन्ये।पकार्योपकारक- 
भावः समीचीनतरः । इष्टानिटवरिषयापन्धिस्परतीच्छष्रेषादिवत्‌ । न कदा- 
चिदन्येन वर्णेन पूर्रव्णीनां तदीयस्मृतिसंस्काराणां ब सम्बन्ध उपकल्पते ॥ 

अथ ममपि नियतक्रमवणसम्पादित्तस्कारपरम्परोपचितबरुद्ध श्ुत्पाद कतेनैव 
वणौनां वाचक्रत्मिति चेत्‌-न-अभ्युपेतपखि्न।त्‌ । यदि तावद्र्णानेकरसंस्कार- 
विशिष्टा बुद्धिः अथविधय। वा पदविषया वा ? यच्थविषया, तैव शब्दः प्रापेति। 
अर्थप्रलयायकत्वात्‌ । अथ पदविषया, तथाऽपि पदादर्थप्रतिपत्तिरिति बाग्येत ॥ 

तस्मदिकबुद्धिविषयो वणव्यतिरिक्तः शब्दोऽम्युपगन्तग्यः । तेन पूर्वव. 
जनितंस्कारसहितोऽन्त्यो वर्णः, तस्समृतिः, संस्कारो वा, न वाचकः | 
सस्कारसाहायक पक्षत्वात्‌ , बुद्धिवत्‌ ॥ 

एवं गते कथं वणानामथविषयः पदविषयो वा भ्पापारो नास्तीलाह-वणीः 
एकपतमयास्म्भवितवात्‌ । एककारासम्भवित्वे च वाचः क्रमवर्तितात्‌ । अतः 
परस्परनिरनुग्रहात्मानः कस्यचिदमिसम्बन्धस्याभावादितेरतरनिरुपकाराः । 
ते पदमनुपपृरयातुपस्थाप्य कञ्चन पदे व्यापारमविषाय आकिर्ूताश्च 
तिरो मूत।श् भ्यस्ता वा समस्ता वा न पद्‌सानमपङ्गविकतेपेणपि पराभृशन्ति । 
्रयेकमपदस्वरूपाः युगपदनवस्थानात्‌ समुदाय(सनाऽप्यपदस्वरूपा एव । 


किमङ्घ पुनः प्रव्येकमनयकानामवस्थितानामिति ॥ 


२६६ पातञ्जर्योगसूत्रमाष्यविवरणे 
£ =... ब ^ ^ 0 

वर्णः पुनः एकैकः" सर्वाभिधानरक्तेमचितः सदकारिवणान्तर- 
प्रतियोगिखात्‌ वैशवरूप्यमिवापन्नः उत्तप् पूत्रेण पूत्रश्रोत्ततेण विरेषेऽव- 
स्थापितः, इयेवं बहवो वीः करमादुरोषिनोऽथपङ्कतेन अवच्छिन्नाः इयन्त 
एते सवीमिषानशक्तेपर्च्युताः गकरोकारविसर्जनीयाः साघ्नादै- 
मन्तमर्थ ्योतयन्ति इति । 

तदेषाम्‌ अर्थसङ्केतेन अवच्छिन्नानाम्‌ अअनुगरदीतध्वनिक्रमाणां य 
एको बुद्धिनिर्मातः तत्‌ पदं वाच वाच्यस्य सङ्कयते । तदेकं पदम्‌ 
एकबुद्धिविषयम्‌ एकप्रयत। क्षिपं “अविमागम्‌ अक्रमम्‌ *अवर्णासकम्‌ 
अन्यवर्णप्रययव्यापारोपस्थापितं परत्र प्रतिपिपादयिषया वरव 
अमिषीयमनिः श्रूयमयिश्च श्रोतृभिः अनादिवाग्ब्यवहारवासनाऽयुविद्धया 
लोकब्ुद्धचा सिद्धवत्‌ सम्भतिपस्या प्रतीयते ॥ 

[ वित्ररणम्‌ ] 

वर्णैः पुनरकेकः सर्वामिषानशक्तिभ्रचितः । अभिधीयते यैः तान्यभि- 
धानानि पदानि; तेषां सर्वैषाममिधानानां पदानामभिन्याज्ञेकाभिः शक्तिभिः 
प्रचितः, अरणामेकैक इव नागौ । तयया-- गकारः गोवगभ्चिगगनादिसर्वपदा- 
भिद्योतनसामध्यप्रचितः ॥ 

सहकासिणान्तर्रतिय) गिखात्‌ । यथा नैरिति गकरिकारवि्तजैनीय- 
सद्कारिप्भ्यपेश्षः अभ्िरितीकारप्रतियोगी ¦ तस्मादनेकवरणौन्तरेपाधि्षम्बन्धात्‌ 
प्रतिपदं वैश्वरूप्यमिवपन्नः । उत्तरश्च वर्णः पूत्रैण करिषे पदविशेषभ्रथोतने 
अवस्थ।पितः । पूर्श्ोत्तरेण, मभ्यमोऽपि पूर्वोत्तराम्याम्‌ ॥ 

एवं वहवो वणौःक्रमायुरोधिनः विशिष्टकरम, आनुपूर्वाम्‌ अनुरुष्यमानाः॥ 

अर्थसङ्कतेन अमी भसिनर्थे एतत्कमावलगनिनः इयन्त ` इति सङ्कृतः 
समयः, तेन अ्पङ्केतेन अवच्छिन्ना ॥ 

वर्णङ्कतद्रारेण पदं सङ्कुद्यते । वणंव्यमिचप्तिच।लछिम्‌ असाधारण. 
वर्णक्रमपेक्षितपङ्कतसमयं हि पदम्‌ । वर्णसङ्कुत एव तस्य सङ्केतः । इयन्त एते 
वणी; सवाभिषानशक्तिपरिच्युताः विरिष्टपास्नादिमदथप्रतिपादक)साधारण- 





1. कः पदात्मा स~ 4. अमागं 
2. सर्वाभिधानशक्तिपरिवरताः ५. अवर्णं बौद्धम्‌ अन्त्य 
3. उपसंहृतभ्वनि- 


बिभूक्तिपादः वतीयः २६७ 


पदावमाक्षनन्थापारपरस्रदिव अपरपदान्तरप्रतिपादकरक्लन्तरेम्यः परिच्युताः 
निवृत्ताः इतरेतरविशेषविनियोगपरवराव्रेशादुदापीनपदान्तरप्रकाश्नशक्तयः गका- 
रोकारविसर्जनीयाः सास्नादिमन्तमथमवद्योतयन्ति पदमभिव्यक्नयन्तः ॥ 


तदेषामथैसङ्कतेनाप्च्छिन्नानाम्‌ अभिहितेन न्यायमिण अनुग्रदीत- 
ध्वनिक्रमाणां विश्ि्टातुपस्पिटिषमायोगिनाम्‌ इत्येक्रमव्रिेषक्रमङन्धजन्मनां 
वर्णीनां सम्बन्धः य एको ` बुद्धिनिर्भाषः बुद्ेरनिमातः तत्‌ पदं भूभिः 
(मूमि्मेव) भूमिकेव वाचकं वाच्यस्य न वर्णाः । वर्णद्योरण तु सृङ्कत्यते ॥ 


तत्‌ पदमेकम्‌ एकमपि, यद्वस्तु सावयवं घटदि तदनेकञुद्धिविषये दृष्टे, 
न तु पदं तथा । तत्‌ एकबुद्धिविषयं सवलेकप्रघयक्षम्‌ । बणौः प्रुनरे- 
क्वादगुगपत्काकजन्मानः एकुद्धितिषरयतां न समरप द्नुत्रते । यस्ेवमेकनु द्धि - 


निग्राह्यमनुमानेन निराचिकरीषति, तप्य प्रतयक्षविरोपिनी प्रतिज्ञा स्थात्‌ ॥ 


एवम्‌ एकप्रथताक्षिपं वणक्रमजन्मप्रदयुपनीतसंस्फारनिमित्तुद्धिपपिि।का- 
भिस्तमाक्षिया पश्चिमबुद्धो क्षटिति परिस्फुरितं, अविभागं अवयवञुन्ये, अत ९व 
जक्रममवणौकमन्यव्ेप्रत्ययग्यापारोपस्थापितम्‌ आववर्णन्यापारपरम्परा- 
नुगृहीतपशिमवणंग्रहणमाततप्रदुद्धा्ितम्‌ ॥ 


परत्र परवुद्धिप्रतिषिपादयिषया वर्णरेवामिषीयमानेः अमिधातृभिः, 
श्रूयमागश्च श्रोतुभिः, अनादिवारव्यवहारवासनानुविद्धया लेोकहुद्धधा 
सिद्धवत्‌ संप्रतिप्या प्रतीयते । नपि) अनादि पसारचक्रमण्डञे पतिवर्तते । 
राम्ददिव्रार्यप्रतिपत्तिपूको व्यवहारः) तद्वासतनाव्सितया टोक्रधिया तिद्धवत्‌ 
प्रतीयत इति; लौकिकानां सम्मुग्धकारप्वरतित्वहारमात्रचस्िप्रयोजनानां 


[^ 


आल्मनीव पदे विप्रतिपत्तिः ॥ 


तस्मात्‌ [पदं] व्ीव्यतिरिक्तम्‌ , एकबुद्धिनिम्र्यते सति रव्यायकतात्‌ , 
प्रदीपवत्‌ । अरथप्रतिपत्तो च कारणत्वात्‌ , प्रदीपवत्‌, बुद्धिव्च । न वणी; 
पदम्‌ , एकेन कत्र क्रमेण प्रयुञ्यमानत्वात्‌ , करणवाच्च, वादइक्चादानादिवत्‌ ॥ 


अत्र कश्चित्‌ आह-- 


1. कुमारिलमह्ः लोकवातिके स्फरोरवद 131. 136-शछकैः 


२६८ पातञ्जल्योगसूत्रभाष्यत्रिवरणे 


वणौ वा ध्वनयो वापि स्फोटे न पदवाक्ययोः । 

व्यन्ञन्ति व्यञ्जकत्वेन यथा दीपप्रभादयः ॥ 

स्वात्‌ घटादिव्वेति साधनानि यथारुचि । 

ठो किकव्यतिरेकेण कलिितेऽथे भवन्ति हि ॥ 

नाथस्य वाचकः स्फोटो वर्णेभ्यो व्यति्तः । 

घटादिवन्न दृष्टेन विरोधो धम्प॑पिद्धितः ॥ 

प्रतिषेधेत्तु यो वर्णास्तञ्ज्ञानानन्तरोद्धवात्‌ । 

दृए्टवाधो भवेत्तस्य शिचन्द्रनिषधवत्‌ ॥ 

वर्णोत्था वाऽथैधीरषा तञ्ज्ञनानन्तरोद्धवा | 

याष्री सरा तदुत्था हि धूमादेयि वहिधीः ॥ 

दीपवद्या गकारादिमव देः प्रतिपादकः । 

धुवं प्रतीयमानत्वाततसपूत प्रतिपादनात्‌ ॥'” इति । 

अत्रोच्यते--व्णौ वा ध्वनयो वाऽपि स्फेटं न पदवाश््ययोः इति, 
पदं वाक्यं वां स्वतस्तावत्‌ न प्रतिद्धम्‌ । तत्रास्तति वर्णव्यतिरिकि पदे 
वाक्ये वा, पद्वाक्यये; स्फोटं न व्यज्ञयन्तीति कथं चेतस्विनां वचनावकाशः 
स्यात्‌ । एवं च सति, उदिद्य पदवाक्ययोः स्फोटे प्रतिषेधता पदं वाक्यं 
चाम्युपगतं भवेत्‌ ॥ 


अथापि परामिप्रयिणेच्येत, तथाऽपि सिद्धसाच्यता | न प्रस्य पदवाक्य- 
योर्यः स्फेटो विध्यते, यः प्रतिषिध्येत । पदव।क्ये एव हि तस्य 
स्फोटः ॥ 


@- 


अथापि त्रूयात्‌--अर्थावन्छेदका विरिष्टक्रमोपनिवेशिने। व्णीः पदं 
वाक्यं च प्रतिषिध्यते ईति | तच न युक्तम्‌, स्वतो विरोधात्‌ ॥ 


अथाऽपि ब्रूयत्‌--वर्णव्यतिर्क्ं . पदं वाक्यं वा प्रतिषिध्यते 
इति । तथाऽपि ग्यतिर्क्तिमुदिर्य तस्य व्यञ्चनप्रतिषेधात्‌ ग्यतिरिक्तपदवाक्या- 
म्युपणमः प्रसक्तः ॥ 

1. ““ध्वनिमात्रोपादानि शङ्ख दिष्वनीनां स्फोटाभिव्यजकलत्वस्य परैरनिष्टत्वादशे 
सिद्रषाध्यत्वं स्यात्‌ । तन्मा भूदिति पदवाक्ययेरिति विशेघ्रणम+ पदवाक्ययो- 
सतंमाना वर्णा ध्वनयो वा स्फोटं नाभिग्यज्ञयन्तीत्यन्वयः ? इति -कवार्तिकन्या- 
ख्यायां न्यायरल्लाकरे पाथसारथिमिश्नाः ॥ 


(१ क [१ 


विभूत्तिपाद्‌ः कृतायः ६९ 


अधाऽपि परकल्पितपद वाक्यप्रतिकेधः, एवमपि व्यक्चकादिवयसिद्धो 
हेतुः । कथम्‌ १ स्वासन्यतिरिक्तस्य वा पदस्य व्यञ्ञकवं, अन्यतिरिक्तस्य वा 
व्यश्चकतवं, अर्थस्य वा व्यज्लकघं वणौनामिति त्रयी विकल्पना । यदि 


व्यतिरिक्तस्य व्यज्ञ कलं, तदा स्वतोऽपिद्धः स्यात्‌ ॥ 


अथान्यतिर्किस्य, तथाऽपि परस्यासिद्धः । कि च) व्यञ्जकता 
व्यतिरिप॑स्थेव व्यञ्चकत, नान्यतिच्क्िस्य, प्रदीपदेखि | अन्यभ्यञ्नना्थ॑हि 
व्यज्ञकः प्रदीपादिरुपादीयते, न स्वामन्यञ्ननाय | स्वापत्यक्चयथ चेदुपादास्यते, 
जनुषाऽन्धस्यापि व्यञ्येत ॥ 


अथ व्यतिरिक्तव्यन्नकवे सिद्धे, पदस्य व्यज्ञका भवेयुः, अर्थस्य वा| 
तत्ननेकसष्य यथा रिबिकोदहनादि) तत्‌ अन्यतमेन न दाक्यं अनुष्ठातुं, 
एवरमन्यतमेन बणानामर्थ॑स्य प्रतिपादनमनेकसाष्यत्वादश्चक्यमिति प्रति- 
पादितम्‌ ॥ 

न॒ च कूपखानकन्यायेनापि कंचित्‌ कचित्‌ व्यङ्घथे ` सस्कार- 
माधाय त्रणो निवत॑न्ते इति शक्यं वक्तुम्‌ । अभिषेधस्थेकबुद्धिविषयतरात्‌ ॥ 


यथा च दुगतकृतान्ते प्रष्वंसमानं विज्ञानमुप्पत्स्यमानस्य विज्ञानस्य 
संस्कारमाधातुमपर्यापं, स्थितस्य धर्मिण; कस्यचिदभावात्‌ । एवमन्यन्य- 
सेबन्धामव्रादयुगपत्समयजन्मनां वणौनां पूतस्य पूर्वस्य विमर्यत उत्तरस्योत्तरस्य 
चोपजनिष्यमाणस्य बलधानानुपपत्तिरिति नार्थस्य व्यज्चक्षा वर्णाः ॥ 


परिरोषात्‌ पदस्येव व्यतिरिक्तस्याभिष्यञ्जितारः इति स्थितधपः | 
अस्माकं तु स्थिति धर्मिणि चेतसि पूर्वपू्वर्णप्रदयुपस्थितसंस्कारपरम्परापरि 
पाकविरारदे पश्चिमवणेजन्पवेकायां निरवयवमेकबुद्धिनिग्रीद्यवुद्धिनिभीसास्सकं 
जटति समुन्मिषतीति न संस्कागघानासामर््वदोषप्रसङ्गः ॥ 


कि च, यथपि वणाः स्वबुद्धि व्ज्ञयन्ति | सा बुद्धिरथैप्रतीतिं प्रति 
करणमभूतिवामिन्यज्यते, न तु फठं प्रति वर्णीः करणत्नेन व्याप्रियन्ते । 
करणभृतयुद्ध चत्पादनोपक्षयत्रात्‌ । बुद्धेरेव हि कठं प्रति व्यापारः । 
यस्य हि फलं प्रतिं व्यापारः तत्‌ प्रमाणे, स. शब्दः | ततश्च अरधत्रतीति 
प्रति काएणभृतबुद्धिन्यवहितलात्‌ न व्णौनां वाचकम्‌ । परम्परया तु पदं 
प्रह्युपायत्वे न वर्णानां प्रतिषिष्यते ॥ 


५५ [क ५५ 
५७० पात्तज्जञखयागसत्नमाग्यावकरण 





तस्मदेवमयं छेकः पठितव्यः 

वणां वा ध्वनयो वाऽपि भिन्नमेवाथमासनः ॥ 

ग्यञ्जन्ति व्यञ्चवत्वेन यथा दीपप्रमादयः ॥ 

तथा, घटादीनामध्यधौन्तरप्रत्युपस्वानमात्रलवमभ्युपगम्यत एष । घटादयो 
हि ददीनमान्रण पचनाहरणधारणादियोम्यताघुद्धिम्‌ अन्यद्वा किंचित्‌ 
उपस्थापयन्लेव । तथा वणानां पारम्पर्येण आ्मन्यतिरिक्तपदप्रधयुपस्थापकसं 
सस्थात्‌ घटादिवदिभ्यत एवेति तुल्यमेतदपि ॥ 


स्छाद्टादिवचेति साधनानि यथारुचि । 

= (~ (त ५ अ [क [क 

रोकिकन्यतिरेफेण कलिितेऽरथे भवन्ति हि ॥ 

सतरैथा जातिर्वा बुद्धि मवतु, यतो वा कुतश्चित्‌ उच्चास्तिप्रचस्त- 
वणौनतेमविनो वर्णव्पति्कित्‌ अधप्रतिपत्तिः, स स्फोटः । स च अवक 
वणासेमवित्मात्‌ का्यस्याभ्युपगमनीयः । तथा च- 

नाथस्य वाचकः; स्फोयो वर्णेभ्यो व्यतिरकतः' 

इति वरु्रतोऽम्युपामविरोधः स्यात्‌ । अपि च, वर्णेभ्यो व्यतिरेकतः 
इत्यन्यतरा्िद्धः । स्वतो व्या्परकेस्याैदतात्‌ ॥ 


किं च, नामाघ्यातोपसगौनिपातपदजातिचतुष्टयमभ्युपगच्छत! ज.ति- 
व्यञ्चकं बर्णव्यतित्किम्‌ अन्यदम्युपगन्तम्यम्‌ | न वर्णाः पदजातिमभिग्य्घितुमुत्त- 
हन्ते । वणी हि व्णजातिममिनव्यञ्चयन्ति । न च।चयवेषु भिन्नकालजन्म- 
विनारेष्ववयविजातिन्यञ्जनमुप्रपचते । भ्यव्र्थितेष्वपि नाम तावदवयेवधु न 
पणिपादादयः शरीरादते शधीरत्वममिष्यञ्जयन्ति । कि पुमरनवस्थितेषु ॥ 


किं च, अश्वः अयातमयातमक्ष; भवति; तेन मम वायुवीयुः, इत्यादिषु 
तुल्यस्वस्येषु नामध्वाद्यातघे परस्परविरुद्धजातीये नेक एव वर्णोऽभिग्यनक्ति ॥ 


यदि वा अश्च; इति नामजाद्या अभिव्यज्ञकाः अकाररशकारवकाराकार- 
विसर्जनीयाः अआ्यातजाल्यभिव्यन्चकेभ्यो भिना भवेयुः; तदा उपपचते भिन्नानां 


[द 


मिन्नज।लयमिव्यञ्चकत्वम्‌ | तदेकते नोपपद्यते ॥ 


यद्यपि अथप्रकरणकषब्दान्तरसनिधानादिभिः इदं नाम शदमाखूयातं इति 
पर्किल्ष्येत, तथाऽपि नामास्यातज।लयभिव्यक्तिम्‌ अर्थप्रकरणादिभिरेक एव वर्णो 
न शक्नोति कतुम्‌ | न हि ब्रह्मण एव ब्राह्मणत्वं क्षत्रियत्वं चाभिन्यनक्ति ॥ 


विभूतीपदः दृतीयः २७१ 


तस्मात्‌ भिन्ना अकाराः शकारा वकारादयश्च बहव एषितव्याः । एवं 
गोरब्दादयोऽपिं सिना एव । तथा गोशब्दत्वमश्चराब्दतस च सिद्धम्‌ | एं 
मस्वमालमिलमीतय च सिद्धम्‌ । एवं च सति अकारादयो वणौ अल्वादीन्येव 
सापान्यन्यमिन्यज्नयन्ति । न।श्वादीन्‌ नामास्यातजातिभदानिति ॥ 

तस्मात्‌ वर्णन्यतिर्किं पदल्सामान्यामिव्यञ्चकं पदमभ्युपगन्तव्यम्‌ । 
एवं च सयेष छेक एवं पठितन्यः-- 

्रतिषेषेत्त यः स्फोट वणैधीसमनन्तरम्‌ । 

दृ्ट्ाधो भवेत्तस्य शशि चन्द्रमिषेधवत्‌ ॥ 

वणात्थाऽवणीरेषा तञ्ज्ञानानन्तरोद्धवा । इति ॥ 

करणदुद्धिन्यवदहितव्वादनन्तरोद्धवत्वमतिद्धम्‌ । पाप्पर्येण चेत्‌ सतिद्ध- 
साच्यता । धूमस्यापि न बहिरयं प्रति कारणत्वम्‌ | धूमधियः कारणत्।त्‌ | 
धूमादीनां पारम्पर्यवत्‌ वणादीन।मपि पारम्पर्येणोपक्।रकत्वमिष्यत इत्युक्तम्‌ ॥ 
तस्मादयमपि छक एं पठितव्यः-- 

वर्णोत्था नाथधीरेषा तञज्ञानानन्तरोद्धा । 

येदशी सा तटुस्या न धूमोदणि वहिषीः ॥ 

न च दीपवत्‌ सन्निपत्य गकारौकारौ सास्नादिमदथभ्यञ्नकौ | अर्थव्याक्ति- 
कालानवस्थानादनये््टो व्यभिचारः वि्र्जनीयषयेऽपि समुन्नीयते 
निरवस्थानादि । वर्णाः नार्थव्यक्तिपतमानकालावस्थायिनः, प्रदपस्तु भ्यद्घवकाठेन 
तुल्यकाठावस्थान; करणव प्रतिरमते ॥ । 


तस्मादयगप्येवे शोकः पठितम्यः-- 

दीपवद्रा गकारादिगेवादीनामवाचकः | 

व प्रतीयमानत्वात्‌ तसू प्रतिपादनात्‌ ॥ 

प्रमाणे चात्र मवति-अर्थस्य न वाचकाः) नाप्ययं प्रति प्रमाणं वर्णाः, 
साक्षात्‌ सङ्केतापेक्षघ्वात्‌ , अङ्कप्रतिमादिवत्‌ । यवा डतायङ्क। त्रिष्णुप्रतिमाश्च 
सङ्केतपिश्च। अगममेवावधोतयन्ति । न विष्णुश्ञताचथं प्रति प्रमाणलमुपयान्ति॥ 


यत्त नपक्षते सङ्कत, तत्‌ प्रमाणम्‌ , यथा वाक्य, द्‌पादिजा्यन्तरं च । 
न तया वणं इति प्रतिमवरदेषां अप्रामाण्यमापतितम्‌ । तथा, वणौ अधेप्रतिपादक- 
मालन्यतिरिक्तमभिभ्यज्चयन्ति , साक्षात्‌ सङ्केत पिक्षतवात्‌ , अङ्कविष्युप्रतिमादिवत्‌। 
स्फोटः ततङ्केत न साक्षादपे्षते शइत्यवादिष्म ॥ 


२७२ पातञ्जलयोगसूत्रभा्यांबवरणे 


भष्यम्‌ ] 
तस्य॒ सङ्तवुद्धेतः प्रविमागः, एतावतामेवंजातीयकोऽतुसंहारः 
एतस्याथेस्य वाचक इति । सङ्केतस्तु पदपदार्थयोरितरेतराध्यासरूपः 
'स्मृयास्मा योऽयं शब्दः सोऽयमर्थः, योऽयमथैः सोऽयं शब्दः, यश्च 
प्रययः सोऽथैः सष्दश्चेति ॥ 
एवमितरेतराध्या सरूपः सङ्केतो भवतीति । एमेते शब्दाधैप्रययाः 
इतेतराध्यासात्‌ सङ्खीणः, गोरिति शब्दो, गोसिवर्थो, गोरिति ज्ञानम्‌ । 
य॒ एषां ्रविमागज्ञः, स स्वित्‌ ॥ 
[ विवरणम्‌ | 
तस्मदेवम्‌ अनेकयुक्तिपखिसरद्युपानतबङधानं कः स्फोटम्‌ अपाकर् 
दाक्नोति ॥ 


तदेवे गते माष्यप्रिदानीमुन्यते-तस्य पदस्य सङ्तबुद्धितः प्रविभागः। 
रान्दार्थज्ञानन्यतिभिनल्पा. हि .सङ्केतबुद्धिः । तस्याः सकाशात्‌ पदस्य प्रविभागः 
करणीयः ॥ 


सङ्कतखूपं॑दशयति--एतावतां वर्णानाम्‌ एवंजातीयकरोऽनुसंहर 
एतस्याथेध्य वाचकः इति । यथा अयमङ्कुः शते सहन्त, विध्णुरेषा प्रतिमा 
इति च ॥ । 


© „= 0 


तकेतस्तु पदपदाथयोरितरेतरध्याषष्पः स्मृत्यासा, न प्रमाण. 
भूतः । यथा विप्णुरषा प्रतिमा, एष एव चतुभज इति, तथा प्रत्यय उमय- 
मिदं उभयं नु प्रत्यय इत्यन्योन्याध्यस्तषूपा विष्णुप्रतिमाप्रस्ययाः ॥ 


तथा योऽयं शब्दः सोऽयमर्थः, योऽयमर्थैः स शब्दः, यश्च प्रस्ययः 
सोऽथैः शब्दश्चेति, एवमितेतराध्यापरूषः सेकेतो भवति । एवमेते 
श॒ब्दाथप्र्यया इतेतराध्यापात्‌ संकीणीः । तथा गौरिति शब्दो; 
गौरियर्थो, गौरिति ज्ञानम्‌ इति ॥ 

य॒ एषां शब्दार्थप्रत्ययानां प्रविभागज्ञः, स॒ सवज्ञः। कमात्‌? 
अशक्यत्वात्‌ प्रविभागज्ञानस्य | न द्यप्वेन्ञ; राक्रोति प्रविभागेन तानवगन्तुम्‌ ॥ 





1. स्प्र्यात्मक्रः 


विभूतिपादः तृतीयः २७३ 


3 [ भाष्यम | 

सवपरेषु चास्ति वाक्यशक्तः, वृक्ष इत्युक्तं अतीति गम्यते । 
न सत्तां पदार्थो व्यभिचरतीति । तथा न ्चसाधना क्रिया अस्ति इति। 

[ विवरणम्‌ |] 

सर्वपदेषु चास्ति वाक्यशक्तेः। वृक्ष इत्युक्ते अस्तीति गम्यते । 
न सत्तां पदाथा व्यमिचरतीति ॥ 

करिमथमेतदुच्यते £ इह सवभूनसुतज्ञानोपायः प्रतिप्रिपादयिष्रेन 
सवभूतस्तं च वाक्याथैविषयमेव, न पदार्थविप्रयम्‌ । पदानां केवछार्ना 
वर्णोन।प्रिवानर्थकत्यात्‌ , संम्यवहार।भावाच्च । यथैव वणीनां वणान्तरामिस- 
मोक्षया पदावयोतनप्रयोजनक्छम्‌ , एवं पदानामपि परदान्तरपेक्षया वक्येपस्था- 
पनोपायसम्‌ । एवं सति व।क्यस्येव प्रामाण्ये, केवर्पदप्रयेनेऽर्रतीतेः ॥ 


करि च, केवरं पदभप्रमाण, ताबता निर्णपामावात्‌, एैकचणवत्‌ । 
नापि पदं वाचकम्‌ , सङ्कताथपिक्षतात्‌ , राताधङ्कवत्‌ । नामाद्याते केवटे 
न वाचके, केवलाप्रयोगात्‌ , उपपर्गवत्‌ । यत्रापि केवरं पदं प्रयुयुक्षितं 
तत्रप्यवरयम्‌ , अपति तिष्ठति देवदत्त इत्यादिपदं बुद्धौ विपलिितेत इति न 
केवखप्रयोगसिद्धिः ॥ 


प्रम्बते, पर्यागच्छति, अभ्यागच्छति, इत्यादिषु उपसगकरमभ्रग चनीयानां 
न कश्चिदर्थः | तथा अभिमनायते, घुमनायते, दुमनायते, इत्यादिषु च 
उपप्गाणां योतकते सिद्धम्‌ । तथा, प्रतिष्ठते, अधीत इत्यदिष्वप्युपसर्गाणां 
धोतकलमेव न वाचकलमिति । तथा न ह्यप्राधना क्रिया अति । 
केवल्कमेप्रयोगे किमपरि साधन द्रव्यं गुणो वावगम्यते ॥ 

किं च, प्रकृतिप्रव्ययानामनवास्थितावधिकत्ात्‌ व्यभिचार।दवाचकतम्‌ | 
तथया-दरिदातिः केषाञ्चित्‌ द्भ्यमान्र एव प्यते । दद्धिश्ब्दस्तु निपातो 
पक्स्यानीयः पुनरागच्छति, द्राति, निद्राति, ददिति, हति । तत्र का 
प्रकृतिरिति वक्तव्यम्‌ । फं (्क्खिदं) द्रा, इति) विवा दद्विति 
केषा्चितत दरिलेतावत्‌ पञ्चते । तथा द्रराम्दे।ऽपरि परथगाम्नायते ॥ 

एवमिति सकारमात्रं पठन्ति । वीति च प्रघ्यये कारमागम कुर्वन्ति । 
केचित्त सह कारेण पटिखा (अविति) वीति च प्रत्यये ठोपं कारस्य कुन्ति | 
तत्र का प्रकृतिरिति वक्तव्यम्‌ । न निज्ञायते । प्रकृत्यवधौ प्रत्ययाव्रधौ वा 


्रकृतिभत्ययार्थै शक्यो विवेक्तम्‌ ॥ 
35 


२५४ पातञ्चलूथोगसूत्रभाध्यबिवरणे 


कचिदुपसगे)ऽपि (असप्रामयत यूर" इत्यादिषु प्रकृयेकदेरातामापनः । 
तथा, अततेभः, अः, अस्यापत्यमिः, इयान्‌ , अघुना, ह्यादौ कः प्रक्यर्थमागम्‌ 
असत्यां प्रकृतौ ब्रूधात्‌ । अप्भिचित्‌ , सोमत्‌ , मिद्‌) छिदा, अथो, कति, 
अमा, पच, पठ, इदयादिषु प्रस्ययाथैपसति प्रत्यये को नरूयात्‌ ॥ 

एवमादिषु लक्षितापचाराणां प्रकृतिप्रस्ययनां कः शक्नुयाद्थवच् 
कल्पयितुम्‌ | अत्र भवतु नान्यत्रेति नाधजरतीयै भ्यम्‌ । उद।ल्कपुष्पभञ्जि कापारं 
न पुष्पप्रचायिका, इव्यत्र कः पूथैपदेत्तरपदार्थः? प्रज्ञः; संज्ञ, इत्यादिषु 
प्रतयन्वयोऽपि नास्तीति कस्य कोऽथः १ इति ॥ 

ऋषभो, वृषभो, ब्रषः) उदकं, उदकुम्भः; क्षीरोदः, यावो; यावकः, 
कूपः, सूपः, यूपः; इ्यादिषु कस्य कोऽथ ईतिवक्तन्यम्‌ । दष्यशान, मघ्व्र) 
ह्यादिक, किमवपि किं पदं वाचकम्‌ ? | 

तस्मात्‌ सथैत्र दृष्टापच।राणां वर्णप्रकृतिप्रव्ययपदानाम्‌ अनभकानाम्‌ 
अदृष्टापचरनिए्वयववाक्योपायसमेव । तानि निःसन्धि बन्धनात्‌ निरवयवात्‌ 
मिध्याभूतवणपदस्वनिज्ृतचित्रीभावद्वाक्यादपोद्ूलय व्याकरणीयानि ॥ 


तनि च व्रक्यस्यानवयवभूतानि, उपायत्वात्‌ वा्यावयववदवमासम- 
नानि; यावत्फलम्‌ अत्वत्‌ राताचङ्कवेदव मिध्याभूतानि, अदुचचयैमाणवाक्या- 
वधोतन।थ॑करणसननिपते विरेबेणेोपादाय परिहीयमाणानि, स्वकीयक्रम- 
निप्पत्तिविनिवृत्तिकालादिभेदविचित्रतया वक्यात्मानं क्रमवन्तमिव, निष्पथमान) 
मिव; नितरतमानमिव, दरया तमिव, क।ठवन्त मिव, भेदवन्तमिव, विचित्राकारत।- 
मापादयन्ति ॥ 

एवे च पतति, यदुच्यते शशजषिणादपोदूत्य खरविषाणस्य, किं तदिति 
एतदटीकं, यथेव गृगतृभ्िकातेोयमलीकमपि सत्यादूषरादपे दियते, यथा च 
स्थाणो; पुरूषः, पुरूषाच स्थाणुः, शक्तिकातश्च रजतमपो द्वियते, यथेव च 
मरृगतोयाद वे! यथामू 2 षरादिवसतुप्रतिपत्तिहेतत्रः, तथा वणपदयरकृतिमरत्यया यथ- 
भूतवाक्यायप्रतिपात्िकारणे तस््रतिपत्तौ च।पोद्धियन्ते ॥ 

कचिदयप्राततमपोद्ियते, यथा मृगतोयादिकम्‌ । फचित्त॒ प्रयोजनत्वेन 

वक्षितं, यथा रातादिसङ्घ्यातः ₹शाताधङ्कपोद्धारः क्रियते, यया च 
चिप्यक्षराणि सेङ्केतपेक्षतलात्‌ कृतसमयद्प।णि अकारा दिवर्णादपोदूपरियन्ते । 
अथ च सव।ण्यतानि यधाभूता्थप्रतिपादनोपायवं प्रतिपथन्ते । न च तावता 
मिथ्यात्वे नास्ति । तथा पदादन्यपि ॥ 


2/7 


१, 


(५. (१ 


विभूतिपादः दृतीयः २७५ 


यो हि प्रङतिप्रल्ययपद्व्णानां सेकेतद्ररिणान्योपायानां मिध्यामूतच्िप्य- 
क्षरकल्पानां स्वयमपि स्वसंकेतेन वाक्याथप्रतिपद्युपायमनेकधा निर्माय 
म्यघहश्माणः सलयच्वमेषां मन्यते, नुनमसावभ्रे चन्द्रमसं ॑दिदक्षमाणः चन्द्र 
ददीनेपायभूतमभ्रमपि चन्द्रसेन प्रतिपचत इति ॥ 

यथा च वाक्यमेव सलं, तथा वाक्यार्थस्थेव सद्यघे, न पदानि, पदार्था 
वा केवलाः, सलयत्वमुपयान्ति । सर्वमेव सामान्यविरोषात्मकं वस्तु । नहि 
सामान्यन्याबृत्तो विरोषः, विशेषन्यावर त्तं वा सामान्यमस्ति । गौसियुक्ते अस्तीति 
गम्यते । तेन केवरूपदप्रयोगेऽप्यन्तर्नातिपदान्तरा्थौ वाक्यार्थं॑एव प्रतीयते, 
न केवल्पदाथः ॥ 

एषे च सति 

'पदाथौ गमयन्देतं प्रयेकं सशय प्रति ॥ 

सामस्े निभयोखदात्‌ खाणुमूरधख क्वत्‌ ॥ 

इवयपिद्धमस्माकम्‌ । न हि स्थाणुनीम वाक्यार्थः प्रथक्पदार्थतेन 
प्रसिद्धः । यस्मात्‌ बक्षः सन्‌ स्थाणुः सन्‌ मूधौ सन्‌ काकः सन्‌ मूर्धनि स्थाणोः 
इस्यन्तयीतप्रतीयमानपदान्तरास्थानपेक्षायां स्थाणुमूस्यकाकबुद्धिरेव न स्वात्‌ । 
स॒स्स्ठपि तेषु सदघुद्धिसपुदत्तेः स्पदायन्तरबुद्धिरवश्य॑माविनी ॥ 

तस्मात्‌ वाक्याथ एव प्रसयेकमपि संश्चयात्मक्र इति कुतः पदाथीः 
प्रसेकमस्न्तो वाक्याथ गमयेयुः | तस्मदिषमयै शोकः पठितम्यः- 

वाक्यं तु गमययेनं प्रयेकं संञ्ञये सति ॥ 

सामस्ये निणंयोखादात्‌ स्थाणुपूस्यकाकवत्‌ ॥ 
एवम्‌-- ~ 

वाक्येनेवोच्यते तस्मात्‌ बाक्यार्थोऽन्यैररूपणात्‌ । 

अन्ते चास्तीति बोधा्च पृक्षेणेव च वृक्षता ॥ 

यत्तु--पलाशशब्देन वृक्षता नोच्यते इति, सयमेवमेतत्‌ । न हि 
पठडावाक्येन वृक्षवाक्या्थ॑स्यामभिधानम्‌ । भिन्नविषयत्वात्‌ । अन्यो हि 
पठारावाक्याथः पलशोऽस्ति तिष्ठतीति वा | अन्यो वृक्षवाक्यार्थः । यदा 
च पदव्णीनं निरवयवानां पयगस्तित्वमम्युपगम्यते, तदा निरवयववशपदो- 
पादानं वक्यं सावयवं कथमवकल्पेत । न॒हि करियाकारादिभिः सावयवं 
शक्यमार्युम्‌ । अथ सावयवत्वमभ्युपापिष्यते, तन्नापि दोष एवं 
प्रस्त ॥ 


1, ऋकवािके वास्याधिकरणे शो, 363, 


२७६ पातञ्जरयोगतूत्रभाष्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
'नियमार्थोऽतुवादः कर्तकरणकर्मेणां वचेत्रगिनितण्डुलानाम्‌ इति । ष्टे च 
वाक्याथ पदम्‌ । श्रोत्रियः छन्दोऽषीते, जीवति प्राणान्‌ धारयति इति 
वाक्ये प्दाथभिव्यक्तिः । ततः पदं प्रविमञ्य व्याकरणीयं करियावाचकं 
वा कारकवाचकं बा । अन्यथा भवति, अश्वः, अजापयः, इयवमादिषु 
नाम्‌र्यातसाहप्यादनिज्ञंत कथं क्रियायां कारकं वा व्याक्रियत इति ॥ 
[ विबरणप्‌ | 

सद्धवे प्दवर्णानां भेदो यः परमाणुवत्‌ । 

सवौ मावस्ततश्वेति सेयं चारविभीषिका ॥ 

-परमाणूनां सखादिधर्ममात्रल्ाम्युपगमात्‌ विच्य पुष भाषमदे-- 
सेयं बृदधविमीषिकेति ॥ 

अध केवट्पदप्रयेगे पदार्थान्तरस्यापि संग्रहात्‌ किमनेकपदगप्रथोगेणेति 
चेत्‌, नियमार्थोऽनुवादः कव्रैकरणकर्मेणां चेत्राभितण्डुरानां क्रियाव- 
वचनात्‌ साधननि विदन्त इव्यथैप्रातानां नियमः, चैन एव क्ता, भप्निनैव 
करणेन, तण्डूढनेव करम, इति ॥ 

अपि च नियमाथमन्रि(मन्तरोणानुबादः । दृष्टं च वाक्या केवलं पदम्‌ । 
यथा श्रोत्रियः छन्दोऽषीते इति । साधनवचनमेव केवलश्रोत्रियपदं 
छन्दोऽरधीति इव्यसिमन्‌ ज्रियाक्ताधनसमुदाये वतेते । तथा जीवति इति 
करियापदमाक्षिपक्रियास।धनविरेषम्‌ । (छत्रं) छन्दोऽधीते, प्राणान्‌ धारयति, 
इति वाक्ये प्रोत्रियो जीवतीति च पदाथमिभ्यक्तिः । सर्वथा सर्वपदेषु 
वाक्यशक्तिरिदङ्गीकृतपद।न्तराथौन्येव सर्वाणि पदान येतदुच्यते ॥ 

तस्मात्‌ कचित्‌ क्रियापदेनेव साधनमुपक्षिप्तम्‌ । कचिचच नामपदेनैव 
क्रिया अभिहिता । तस्मात्‌ तेषां विभो दुरवतरोध इति । ततः वाक्यात्‌ 
प्रविभज्य [पद्‌] व्याकर्णाीयं क्रियावाचकं वा जीवती्यादि, कारक- 
वाचक वा श्रोत्रियः क्षत्रियः इव्यादि ॥ 

अन्यथा यदि वक्यात्‌ प्रविभव्य न भ्याक्रियेत, तदा तता 
भवलयश्वोऽजापयः इलयेवमादिषु नामाख्यातरा्प्य।दनिज्ञोतं कथं 
क्रियायां कारे वा व्या्रित्रियेत । मवति निरर्हति सर्वनाश्नः शत्रन्तस्य 
वा स्तम्यां र्पम्‌ । भवति बीजाद ङ्कुर इद्याल्यातम्‌ ॥ 


1. तथा च पचतीप्युक्ते सव॑क्रारकाणामाक्षिपः । नि- 2. परदरचनम्‌। 
3. -ति तत्र वाक्ये 4. शोकवार्तिके बाक्याधिकरणे इला. 150. 


विभूतिपादः दतीयः २७५ 
[ भाष्यम्‌ ] 
तेषां शब्दार्थप्रययानां विभागः । तचथा-्रेतते प्रापाद इति 
क्रियाऽथैः । तः प्रासाद इति कारकार्थः । करियाकारकासाः तदर्थः 
प्रययश्च । कस्मात्‌ १ सोऽयमिखमिप्तम्बन्धात्‌ अमेदाकारप्रययः 
सहत इति ॥ 


यस्तु धेतोऽथः स शब्दभ्रयययेराठभ्बनीमूतः । स दि 
स्वाभिरवस्थाभिः षिकियमाणः न शब्दसहगतो न बुद्धिसदगतः । 


[ विवरणम्‌ | 


अश्वश्चरतीति जातिव।चकम्‌ । अश्वस्त्वं प्राममिति खयतेर्हडन्तस्य 
मध्यमपुसुषेकवचनान्तस्य प्रयोग; । अजापयः; पीयतामिति नामपदम्‌ । 
अजापयस्वं राजानमिति जपतेर्णिजन्तस्य टड्‌ गध्यमपुरुषैकवचनान्तस्य रूपम्‌. 

तेषां शब्दायेगप्रययानां सङ्करं प्रदस्य विभागः प्रतिपाघते-- 
श्वेतते प्रासाद इति क्रियायः । भेतः प्रासाद इति कारकैः । 
क्रियाकारकत्वाद्रस्तुनः श्वेतते श्रेत इति च त्रियार्थेन च क।(रकार्यैन 
चाभिधानम्‌ ॥ । 


यया शब्दः करियाकारकालसमा, यः श्वेतः स श्ेतते यः भरेते स्त श्वेतः 
ह्येव क्रेयाकारका्यतिक्किः एकः शब्दः+ तथा अथः तद्वाच्यः त्रेया 
कारकात्मा । तथा तद्विषयः प्रलयः क्रियाकारकाता | तथा अथः रग्दप्रलययसमा | 
परययोऽपि शब्दाथा । कसमात्‌ १ सोऽयमिल्यमिसम्बन्धात्‌ । योऽथः स 
दाब्दः, यः शब्दः सोऽरः प्र्ययश्च, यः प्रत्यय; सोऽधः शब्दश्च, इयेवं 
अमेदाकास्रययः स्प्रव्यासा सङ्केतः इति] एवं सङ्कररूपतः प्रविभागः कार्यः॥ 

कथम्‌ ? यस्तु शतोऽथैः तगुणः प्रा्तादादिरथैः स शन्दप्रयययोः 
आटम्बनमितः वाच्यत्वेन विधरपतरेत च । सहि स्वामिएठस्याभिः नव- 
पुराणत्रादिभिः विक्रेथमाणः न शग्दसदहभतो न अपि बुद्धिप्दगतः । शब्द- 





1. -ढह्छ 
2, प्काकर एन 


२७८ पातञ्जरयो गसूत्रभाष्यविवरणे 
[ भष्यम्‌ ] 
एवे प्रययः एवं शब्दः नेतरेतरपदगच इति, अन्यथा शब्दः, 
अन्यथा अथः, अन्यथा प्रयः, इति प्रविभागः । 


एवे तलसविमागसंयमात्‌ भागिनः सर्वभूतस्तज्ञाने सम्प्त इति ॥ १ ५ ॥ 


[ सूत्रम्‌ | 
संस्काराक्षात्करणात्‌ पू्ंजातिज्ञानम्‌ , १८ ॥ 
[ भाष्यम्‌ ] 


दये खल्वमी सछाशः-स्मृतिङ्केशहेतवो वासना'ऽमिषानाः, विपाक 
हेतवो धर्मार्मूपाः । ते पूर्वमवामितस्ृताः प्रिणामचष्टानिरोधशक्ते- 
© (क ५ ण [4 [| [कद द 
जीवनधमीः अपराः चित्तधर्मः । तेषु सेयमः सं्ारमसक्षाक्कियये 
© 
समर्थः । 


विवरणम्‌ ] 


परत्ययामव्रेऽपि मात्रात्‌ । एवं प्र्ययः न शन्दसहगतो नाध्यथसहगतः । 
हतरामविऽपरि भावात्‌ । तथा शच्दः अपि, अर्थप्र्ययग्यापिचारात्‌ , इति 
एवं अन्यथा अथः अन्यथा शब्दः अन्यथा प्रत्ययः इति प्रविभागः । एवं च 
[तत्‌] प्रविभागसंयमात्‌ इदं वीः सङ्केतितिः वाक्यामकम्‌ अभिन्यञ्यमानम्‌ 
अयमथः, प्रल्ययश्चार्यः इति प्रविभागेन संयमात्‌ ब्रविभक्तपदपदायंप्रल्ययानां 
स्वेन स्पेण साश्नाक्ररणात्‌ योगिनः स्वभूतर्तज्ञानं समते ॥ १७॥ 


तेस्कारसाक्षाकरणात्‌ पूर्वजातिज्ञानम्‌ । दये खल्वमी ससकायः 
वासनाऽभिषानाः परिदष्टाः अपरिद््टाश्च स्पृतिष्ठराहेतवः । परिष्ठाः (उमयऽपि) 
छेशक्रमिविपाक्रानुभवतिरैर्तिताः चित्तधर्मः धर्माधर्मह्पाः धमीधर्मनिभित्ताः 
दूैमवामिषस्कृताः (ता) अतिकान्तानन्तजन्मनिष्यादिताः परििामचेष्टनिरो- 
धशक्तिजीवनषमीः परैव्याद्याताः अपरिद्टः । तेषु दयेषु सेस्करिषु संयमः 
क्रियमाणः संस्कारपाक्षाक्कियायै समर्थः मवति ॥ 


1. -ख्पाः 
2. -मवद 


विभूतिपादः वतीयः २५९ 


[ भष्यम्‌ ] 

न च देशकालठनिमित्तासुमवेर्विना तेषामस्ति साक्षात्करणम्‌ । 
तदित्थं संस्ारपाक्षाकरणात्‌ पू्वजाविज्ञानमुखचते योगिनः । 
प्रत्राप्येवमेव सेस्कारसाक्षाक्तरणात्‌ परजातिसेवेदनम्‌ ॥ 

अत्रेदमाख्याने श्रयते- भगवतो नेगीषव्य्य सैस्फारसाक्षा- 

त्करणात्‌ दश्षसु मदहापर्मेषु अन्मपरिणाम"मनुपश्यतः विवेकजं ज्ञानं 
प्रादुरमूत्‌ । अथ भगवाम्‌ अवथ्यः तनु [तन्त्र] षरःतषवाच--दशषु 
महासर्गेषु मव्यतात्‌ अनमिमूतबुद्विसक्वेन तया नरकतियेगग- 
मनदुःखं अनुपश्यता देवमनुभ्येषु पुनः पुनः उतचमानेन सुखदुःखय)ः 
किमधिकमुपरन्धम्‌ इति । 
[ विवरणम्‌ }' 

ते च देशकारनिमित्तानुभवविशिष्टतया निवर्तितताव्‌ पान्नाच्करण- 
केऽपि देशादिविशेषणक्रिशिष्ठा एव प्रल्क्षीमवन्ति । तस्मात्‌ न च (ते) 
देशकारनिमित्तातुमवैरविना तेषामसि साक्षाक्करणम्‌ ॥ 


तदित्थं सस्कारसाक्षात्करणात्‌ पवैजातिज्ञानपुखयते योगिनः । 
प्रत्रापि प्राणिषु एवमेव येषां जातिं बुभुत्सते तदीयत्तस्कार्‌ सयमात्‌ 
[ सस्कारसाक्षाकरणात्‌ |] तत्पू्॑जातिज्ञानमुत्पघते ॥ 

तत्र॒ संस्कारसाक्षा्करणफलव्यक्लनाथ इदमास्यानसुपक्षिप्यते-- 
मगवतो जेगीषव्यस्य संस्कारपाक्षाकरणात्‌ दशसु महासर्गेषु अन्म- 
परिणामं असुपर्यतो विवेकजं वैराग्यानिमित्ते ज्ञाने प्रादुरभूत्‌ ॥ 

अथ भगवान्‌ बआवय्यः तन्वधरः तमुव्राच--दरपु महासर्भषु 
[ मन्यत्वात्‌ | अनाभेभूतबुद्धप्तस्वन तया नरकतियग्गमनदुःलमनुपडयता 
देवमनुष्येषु पुनः पुनः उत्पथमानेन सुखदुःखयोः किमुपरम्पमधिकमिति॥ 

मगवन्तमावख्ं जँ्गषत्य उव च-- दशु मदास्गषु मन्यसखात्‌ 
अनभिमृतबुद्धिससेन मय। नरकतिर्थ॑सगमनमनुपदयता देवमनुष्येषु पुनः 
पुनः उखच्मानेन यत्‌ किचित्‌ अमुमृतं तत्‌ सवं दुःखमिति [दुःखमेव] 
प्रयवेमि ॥ 





1, मक्रम 
2, भसम्भवे 
3 (1 स्प श 


२८० पातञ्ञर्योगसूत्रभाष्यचिवरणे 


[ भाष्यम्‌ } 
मगवन्तमावश्ये जेगीष्व्य उवाच- दशमु महापतयषु भन्वत्वात्‌ 
अनभिमूतबुद्धिसेन मया नरकतिर्यग्गमने अतुपरयता द्वमनुरध्यषु 
पुनः पुनः उखचमानेन यक्किबिदनुभूतं तत्‌ सवे दुःखमेव प्रयकेमं ॥ 
मगवान्‌ अवद्य उवाच-यदिदमायु्मतः प्रधानवारेतम्‌ 
अनुत्तमे च सन्तोषसुखं करिमिदमपि दुःखपक्षे निक्षि्ठमिति ॥ 
भगवान्‌ मगीषव्य उवाच--विषयपुखपिक्षयेवेदमुत्तमं सन्ताष- 
सुखं [भ्रपानवरिष्वमुखं च| उक्तम्‌ । केवस्यपुखपपक्षया दुःखभव । 
बुद्धिसत्वस्यायं धर्मैः त्रिगुणः । त्रिगुणश्च प्रया देयपक्षं न्यस्त इति । 
दुःखहूपः तृष्णातन्तुः । (तृष्णासन्तान दःखोप्ञमरूपं तु परषत्नम्‌ “अनाव 
स्वासुदूठं सुखमिदशक्तम्‌ इति ॥ २८ ॥ 
[ सूत्रम्‌ | 
प्रययस्य परचित्तज्ञानम्‌ ॥ १९ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
प्रयये संयमात्‌ प्रयस्य -पाक्षाकरणम्‌ । ततः परचित्त- 
सानम्‌ ॥ १९॥ 
( विवरणम्‌ | ४ 
मगवानावल्य उवाच- यदिदमायुत्मतः प्रधानवश्चैतमनुत्तमं 
च सन्तोषपुखं [किमिदमपि दुःखपक्षे निक्षिठमिति । मगवान्‌ जंगीषभ्य 
उवाच--विषयमुखपिक्षयेषेद मुत्तमं सन्तापरसुखं [प्रधानतररित्षुखं 
च] उक्तम्‌ । कैवस्यसुलपेक्षया दुःखमेव । बुद्धिसच्वस्यायं धर्म 
त्रिगुणः ॥ व्रिगुणश्च प्रययो हेयपक्षे न्यस्त इति । श्रिमपेक्नया पुनरेतत्‌ 
दये षुखं भवतीवयाह--दुःषर्ूपरतृष्णातन्तुः । तृष्णाप्तन्तानदुःखा- 
पशमस्पं तु प्रसन्नमनाबाधं सवादु सुखमिदमुक्त सन्तोषषुखं 
प्रधानजयघ्ुखं च ॥ (८ ॥ 


प्रययस्य परचित्तज्ञानम्‌ । परप्रलयये सेयमात्‌ पर्वस्य 
साक्षाकरणम्‌ । तप्साक्षात्करणे तस्सत्रन्िनः प्रचित्तस्य ज्ञान 
भवति ॥ १९ ॥ । । 
॥ वृष्णाद्रुःखघन्तापपिगमान् 
2 अबाधं 
3, साक्षात्करणात्‌ ततः 


विभूतिपादः दृततीयः २८१ 
 [ सूत्रम ] 
न च 'साम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात्‌ ॥ २० ॥ 


[ भाष्यम्‌ | 
रक्तं प्रययं जनाति । अपुभिन्‌ आरम्बने रक्त इति न जानाति । 
परप्रययस्य यदारम्बनं तत्‌ योगिचित्तन न॒ भआलम्बनीकृतम्‌ । 


अ (न क 


प्रप्रययमत्रे त यागिचत्तस्य अआरम्बन।मूतम्‌ इति ॥ २० ॥ 


[ सूत्रम्‌ 1 
कायरूपसंयमात्‌ तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे वचक्षुप्रका- 
रासम्प्रयोगे अन्तधांनम्‌ ॥ २१ ॥ 


[ भाष्यम्‌ ] 
कायस्य ह्वे संयमात्‌ सूपस्य या ग्र्या शक्तिः ता? प्रतिबध्नाति । 
[ विवरणम्‌ ] 
तत्र॒ परप्रल्ययतक्ष्करणात्‌ तदृदुमःखे दुःखिवं, त्ख सुखि 
च रभोतीलयारङ्कवाह- -न च साटम्बनं तस्य भविपृयीमूतलवात्‌ | 
रक्तं प्रययं जानाति योगी । परस्य अघुम्मिन्‌ आलम्बने रक्तः प्रल्यय 


इति न जानाति । प्रप्रययस्य यदाटम्बनं इवल्यं दुःखदं वा, येन 
षुखी दुःखी वा मवेत्‌ ॥ 


ननु चाटम्यनमस्तज्ञानानः कगममुष्मिन्‌ रक्त इति सन्न नीत इति ? 
उच्यते--रक्तममुभननिति सामान्यं व्रिजानाति | न पुनः सुखविरोषं 
दखिन: प्रलवस्यालम्बनीभूतम।लम्रते । परप्रययमात्रं तु योभिचित्त 
स्यारम्बनामूतम्‌ ॥ २० ॥ 


कायर्पक्तयमात्‌ तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे वचक्षुःका्ासम्प्रयोगे 
अन्तधानम्‌ । यगन अलीयस्य कायस्य सपं कायह्पम्‌ । त्षिन्‌ खपे 
सयमत्‌ तस्य स्पस्य या पर्च्ुग्राह्या शक्तिः तां प्रतिषध्नति 


"~~~ ~--~~-~--~-~-~~-~---~~-~~ ---- ~  -- 





1. नचतेत्‌षता 
2, प्रतिषएट्नति। 
36 


२८२ पातञ्जख्योगसूत्रभाध्यविवरणे 


ग्ा्शक्तिस्तम्भे सति चक्चुष्परकाशासम्प्रयोगे अन्तर्षानमुखथते योगिनः । 
एतेन रशब्दाच्यन्तधानम्‌ उक्तं वेदितन्यम्‌ ॥ २:॥ 
सूत्रम्‌ । 
सोपक्रमं निरुपक्रमं च कम॑ तत्संयमादपरान्तज्ञान- 
मरषटिभ्यो वा ॥ २२॥ 
भाष्यम्‌ | 
आयुिपाकं करम द्धा -- सोपक्रमं निरपकमं च । तत्र यथाऽऽ 
वके वितानितं क्षेषीयसाः कठेन शुष्येत्‌ तथा सोपक्रमम्‌ । यथाच 
तदेव संपिण्डितं चिरेण सेशुष्येदेवं निरपक्रमम्‌ । यथा वा अश्निः गुष्के 
कक्षे भुक्तवति सं"न्ततो नियुक्तः" क्षेपीयसा करिति दहेत्‌ तथा 
{ विवरणम्‌ ] 
निरुणद्धि । ततः परेषां चक्षुःप्रकाशो येगिकायल्येण न सम्प्रयुज्यते । 
ततश्च अन्तनम्‌ । एतेन शब्दा्यन्तधौनयुक्तम्‌ । योगिरन्दस्य या 
प्राह्मशक्तेः तस्यां सेये सति या राब्दस्य म्रा्यशक्तिः सा प्रतिष्टम्यते | 
तेन योगिङन्दं न परः श्रुणोति । तथा स्पर्ादिष्वपिं द्रष्टव्यम्‌ ॥ २१ ॥ 
सोकरमं निरुपकरम च करम तत्संयमादपरान्तक्ञनमरषम्यो बा । 
आयुर्विपाङ्ग कमं द्विधा । कथम्‌ त्वरति निमित्तमादाय फलदं सोपक्रमम्‌ 
उच्यते । यत्तु मन्दभ्रसरं चिरेण फं दस्यति तत्‌ निस्पक्रमम्‌ ॥ 
यथा आ व्च वितानितं विस्ततिं क्षेपीयसा कषिप्रतेरेण कठिन 
शुष्येत , तथा सोपक्रमं कमं श्षिप्रमायुनिपाकत कृता क्षीयते ॥ 
तदेव वल्लं सम्पिण्डिते अवरितानितम्‌ चिरेण शुष्येदेवं निर्पकरमं 
चिरेण आगुः करोति ॥ 
यथा वां अनिः श्ुऽ# कक्षे युक्तवाति अनुकरूलमातरिश्ननि समन्ततो 
नियुक्तः क्षे यक्ता कठेन दहेत्‌, तथा सापिक्रवं कम क्षेपीयतता काठेन 
आयुघक्ष्यति ॥ 





द्विविध 
ठघीयसा 
मुक्तो वातेन 


युक्त १ 


य 


निभूुतिपादः वतीयः २८३ 
( भष्यम्‌ ] 
सोपक्रमम्‌ । यथावा स एवाभिस्तृणराशौ क्रमेण न्यस्तश्चिरण ददेत्‌ 
तथा निरुपक्रमम्‌ । तदेकमविकमायुष्करं कमे द्विवेषम्‌-सापक्रमं 
निरुपक्रमं च । तस्संयमादपरान्तस्य प्रायणस्य ज्ञानम्‌ । 


अर्छिम्यो वेति । त्रिविधमरिषिमाध्यालिकमािमौतिकमापिदेप्रिकं 
चेति । तत्राऽऽध्यासिक्तं, घोषं स्वदेहे पिदहितक्रणौ त शृणोति । ज्योतिषी 
नेत्रेऽवष्म्धे न पयति । तथाऽऽधिमोतिकं, यमपुरषान्‌ परयति, 
पितृनतीतानागतानकस्ात्‌ वेत्ति । तथाऽऽधिदै विकं, अकस्मात्‌ 
¶तिद्धादीन्‌ परयति । विपरीतं वा सवीमति । अनेन वा जानात्यपरान्तमुप- 
स्थितमिति ॥ २२॥ 
[ सूत्रम्‌ } 
मेतयादिषु बलानि ॥ २३॥ 
[ त्रिवरणम्‌ | 
स एवाभिः तृणरा्चौ करमेण न्यस्तश्चिरेण ददेत्‌ , तथा निस्पक्रमं कमै 
तदेतत्‌ द्विविधम्‌ एकमविकरमायुष्करं कम॑ । तत्सयम।दपरान्त 
ज्ञानम्‌ । अप्रान्तस्य परायणस्य आप्मीयस्प ज्ञानम्‌ । तया.प्रकायदिवि- 
धकमतयमात्‌ वरद्प्रायणज्ञ नमपि भवत | प्रयण्ज्ञान च प्रसाजन पुरष्कतन्यर्ता 
प्रतिसमीहनम्‌ ॥ 


अष्टभ्यो वा प्रायणज्ञानम्‌ । त्रिविधमदरिमाध्यासिकमापिमोति- 
कमापिरैविकं च । ततध्यालिकस्पोद।हरणम्‌- घोषं स्वदेहे पिदहितकर्णो 
न श्रुणोति । ज्यातिकौ नेत्रेऽवष्टम्धे न पश्यति ॥ 

तथा आधिमातिक- यमपुरुषान्‌ पश्यति । पितिनतीतानागतान 
कस्माद्रत्ति । आधिदेविकम्‌--अकस्मादेव तिद्धादीन्‌ पयति । विपरीते 
चा चव पत करत च | तत्रादह्ाम।त साक्क ताचादयुक्तिः | एव 
दयाद--विपरीतदरोनं ममासीदरिष्टमिति ॥ २२॥ 





क्रमशाऽवयवेषु 
पश्यति 

स्वर्गं अ 
षिद्धान्‌. वा 


म & ० ~ 


२८४ पातज्ञखयौगसूत्रभाष्यविवरणे 


८ [ भाष्यम्‌ ] 

मत्री करुणा सुदितेति तिक्ञो भावनाः । तत्र मृतेषु सुखितेषु 
मत्री भावयित्वा मेत्रीषरें रमते । दुःखितेषु करुणां मावयिखा 
करुणाचठं टमते । पुण्यशीरेषु मुदितां भ।वयिखा सुदिताबलं ठभते । 
भावनातः समाधयः स सयेमः । ततो बलान्यवन्ध्यवीर्याणि जायन्ते । 
पपशीटपूक्षा ने तु भावना । ततश्च तस्यां नसि समापिरित्यतो न 


बटपुपक्षातः तत्र सरयमामावादिति ॥ २३॥ 
सुत्रम्‌ | 
घटेषु हस्तिबलादीनि ॥ २४ ॥ 


{ भाष्यम्‌ | | 
दस्तिबञे पेयमाद्धस्तिवो मवति । वैनतेये सेयमद्वैनतेयवरो 
भवति । वायुबरे सेमाद्वायुबलो भवति इत्यवमादि ॥ २४॥ 


| सूत्रम्‌ | 

मब्रत्यारोकन्यासाद्‌ सूष्ष्मन्यवहितविप्रकषटज्ञानम्‌ ॥ २५ ॥ 
[ विवरणम्‌ ) 

दिषु बलानि । मत्री करणा मुदितेति तिक्षो भावनाः । तत्र 

भूते षु मेत्रीं भाव्रपिखा मेत्रीषठं रमते । दुःखितेषु कर्णां 


भावयिता करुणाषरं रमते । पुण्यशीलेषु मुदितां भावयिता 
मुदिताबठं ठभते ॥ 

भावनातः मेर्यादिभावरनातः समाधिः सजायते. स, संयमः 
रैत्यादिमावनास्यैयनिगित्तः । ततः संयमात्‌ भैतयादिगतात्‌ योगिनो 
वरन्यवन्ध्यवी्याणि जायन्ते ॥ 

पापशीरेषु तु भस्य उपेक्ना,नतु भावना । ततश्च भावनाया अमावरात्‌ 
तस्याम्‌ उपेक्षायां नासि समाधिरियतो न बरुपुपेक्षातः । तत्र सेयमा- 
भावादिति ॥ २३॥ 

बरु हस्तिबलादीनि । एतैफयादिनिमितेवटेनलरान्‌ योगी हन्त्यादीन 
बदेष्ु सम कृत्वा हस्त्यादित्छो भवति ॥ २४॥ 

्रवृस्यालोकन्यासात्‌ सू्ष्मव्यवहितविप्रकषज्ञानम्‌ -1 या अतो 

पोतिषती प्रवृ्तिषक्ता, तस्यां प्रकाशः अलकः तं प्रकारं योगी 


[क 


विभूतिपादः ठृतीयः २८५. 


[ भष्यम्‌ ] 
उयेतिष्मती प्रवृत्तिरुक्ता मनसस्तस्यां य॒ आलोकः तं या्ी 
सक्षि वा व्यवहिते वा वि्रृष्टे वाऽथ विन्यय तम 
भिगच्छति ॥ २५ ॥ 
, „ [सूघ | 
भुवनज्ञानं सूं सयमात्‌ ॥ २६ ॥ 
[ भाष्यम्‌ ] 
तसस्तारः स लोकाः । तत्रावीचेः प्रमृति मेरुपृष्ठं यावदिव्येवे 
भूर्लोकः । मेरपृष्ठादारम्य--आ ध्रुवात्‌ प्रहनक्षत्रताराविचित्रोऽन्तरिक्ष- 
छोकः । ततः परः स्वर्लोकः पश्वविधो माहेन्द्रसतृ्रीयो लोकः । चतुथः 
प्राजापत्यो मदोलोकः । त्रिविधो ब्राह्मः । त्था - जनल।कस्तपोरकः 
स्यरोफ़ इति ॥ 
°“ब्राह््निभूमिको ठोकः प्राजापस्यस्ततो महान्‌ । 
मादृन्द्रश स्वस्युक्तो दिवि तारा भुत्रि प्रजाः॥" 
इति संग्रहश्छोकः ॥ 
तत्तावीयेसरूपयुपरि निविष्टः पण्महानरकभूमयो षनरिला- 
नलारिखाकादतमःप्रतिष्ठा महाकालम्बरीषरोखमदयिरवक्रारयुतरान्धता- 
मिक्लाः | यत्र स्वकर्मोपार्नितदटुःखवेदनाः प्राणिनः कष्टमायुदीषमाक्षिष्य 
जायन्ते । ततो मदहातटरमातरखातलपुतछतरितरतलातरपातारल्यानि 
सप्त पतालानि । भूमिरियमष्टमी सपषदवीपा वसुमती, यस्याः सुमेरर्मध्ये 
पर्ैतराजः काञ्चनः । तस्य राजततद्षैस्फटिकिदेममणिमयाति श्रङ्गाणि । 
तत्र वैदुर्वप्रमाऽनुरागात्‌ नीखोसटपत्रह्यामो नमो दक्षिणो भाग 
शरेतः पूर्वैः । खच्छः पश्चिमः । कुरण्टकराम उत्तरः । दक्षिणप्े चास्य 
जम्बू : यतोऽयं जम्बुदरीपः । तस्य सुवैपभरचारत्‌ रात्रिदिवं सप्ममिव वतैते । 
तस्य नङ्श्ववशृङ्खवन्त उद।चीनाक्चयः पवता देताहञ्वमाः। 
तदन्तरेषु त्रीणि वषौणि नव नव योजनषादक्तणि रमणकं दिरण्मयसुत्तयः 
कुरव इति । निषषदेमकूटदहिमरेखा दक्षिणतो द्विसादक्ायमाः। 
विवरणम्‌ ] 
सुक्षमे वा व्यवहिते वा विप्रकृष्टे वा अर्थं विन्यस्य स्थपयिवा तमधि 
गच्छति ॥ २५ ॥ 


1. तमथम्‌ 


२८६ पातञ्चटयोगसूत्रभा्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ ] 
तदन्तरेषु त्रीणि वणि नव नवर योजनताषस्ताणि इछि किपुसषं 
भारतमिति । सुमेरोः प्राचीना मद्राश्वमाल्यवरपीमानः । प्रतीचीनः 
भ, क © (५ १ 
केतुमाला गन्धमादनसीमानः । मध्ये वषैमिलादृतम्‌ । तदेतथोजनश्चत- 


कीः [ (प क 


सादत सुमेरोर्दिंशि दिशि तदर्थेन व्यूढम्‌ ॥ 


स॒ख्यं शतसादस्रायामो जम्बूद्वीपः) ततो द्विगुणेन स्वणो- 
दधिना वर्यक्रृतिना वेतः । ततश्च द्विगुणा द्विगुणाः शाकङश- 
को चशालमलगमेष(प्क्षोपुष्कष्दीपाः, समुद्राश्च सषपतथिक्रसाः 
सविचित्ररोखावतक्ा इशुएसदुरापपिदैषिमण्डक्षीरस्वाद्दकाः । सप्त 
समूद्रपसिवषटिता वठयाक्रतयाो लोकरालोकप्षतपरिवाराः -पाञ्चये(जन- 
कोरिपप्सिङ्खल्याताः (तदेतस्सवं॒पुप्रतिष्ठितपंस्थानमण्डमध्ये व्यूढम्‌ । 
अण्डं च प्रधानस्याणुखयवो यथाऽऽकाशे खद्योत इति ॥ 


तत्र॒ पातके जपो पर्वतेष्वेेषु देवनिकाया असुरगन्धवीक्गनर- 
किपुरषयक्षरक्षसमूतप्रेतपिशाचपस्मारकाप्परोनहमपक्षषद्धम्माण्डवरिनायकाः 
[भ्‌ धिः [प [क 
्रतिवसनिि । सषु दीपेषु पुण्यात्मानो देवमनुष्याः ॥ 


सुमेरुः तरिदशानाु्यानमूमिः । तत्र ॒मिश्रवनं नन्दनं चैत्ररथं 
सुमानसमिद्यु्ानानि । सुधमा देवक्षमा । सुदरैनं पुरम्‌ ' वैजयन्तः 
प्रासादः । ग्रहनक्षत्रतारास्तु धुते निवद्धा वायुविक्षेपनियमेनो- 
पलक्षितप्रचाराः सुमेयेरपधुपरि संनिविष्टा दिवि विपरिवतेन्ते ॥ 

माहेन्द्रनिवाषिनः षड्देवनिकरायाः- त्रिदशा भग्रिष्वात्ता 
यामधस्तुिता अपरिनिर्भितवशवर्तिनः परिनिर्मितवरवतिनशेति । 
सव संकल्पसिद्धा अपिमावेशर्योपपन्नाः कल्पाय वृन्दारका; काममोगिन 
भौपपादिकदेह्‌ा उत्तमातुङरामिरप्परोभिः कृतपस्वियः ॥ 


महति लोके राजापये पथव्रिधो देवनिकायः-ऊुएदा ऋमवः 
प्रतदना अज्जनामाः प्रवितामा इति । एते मह।मूतवरिनो ध्यानादाराः 
केत्पसदक्तायुषः । प्रथमे ब्रह्मणो जनलोके चतुर्विधो देवनिकायः 
्रहमपुरोहिताः ब्रह्मकायिकाः त्रहममहाकथिकाः अमरा इति । ते 
मूतेन्दरियवशिनो दिगुणद्विगुणोत्तराुषः ॥ 


विभूतिपादः दतीयः २८७ 


[ भाष्यम्‌ | 

दितीये तपसि ठोके नरिविधो देवनिकायः- आभास्वरा महा- 
मास्वशः सत्यमहामास्वरा इति । ते मूतेन्दरियप्रकृतिवरिना दिगुणद्विगु- 
णोत्तरायुषः सर्वे ध्यानाहारा उध्वरेतस्र उक्वेमप्रतिहतन्ञाना अधर 
मृमिष्वनात्ृतज्ञानविषयाः । तृतीये ब््वणः सव्यलोके चतारो 
देवनिकाया अकृतमवनन्यापाः सख्प्रतिष्ठा उप्ुपरि स्थिताः प्रगनवशिनो 
याव्सगायुषः ॥ 

तत्राच्युनाः सवितकैष्यानसुखाः, श्ुदनिवासाः सविच।रष्यान्‌- 
सुखाः, सव्यामा आनन्रमाव्रध्यानपुखाः, सश्चास्िनश्चास्मितामात्रध्यान- 
सुखाः । तेऽपि त्रेखोक्यमध्ये प्रतितिष्ठन्ति । त एते सप्त ठोकाः सेर्वं एव 
ब्रह्मलोकाः । विदेदप्रकृतिख्यास्तु मेोक्षपदे वतैन्त इति, न छोकमध्ये 
न्यस्ता इति । एतत्‌ योगिना साक्षाक्करणीयं सूरे संयमं ता । 
ततोऽन्यत्रापि एवं तात्रदभ्यसेत्‌ यावदिदं सरव॑च््टमिति ॥ २६ ॥ 


[ सूत्रम्‌ ] 
चन्दे ताराव्यूहज्ञानम्‌ ॥ २७ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
चन्द्र संयमं कृत्वा तराणां ब्पृहं विजानीयात्‌ . ॥ २७ ॥ 
८ [ सूत्रम्‌ | 
धरुवे तद्वतिक्ञनम्‌ ॥ २८ ॥ 
, ( विवरणम्‌ | 


भुवनज्ञानं सूर्यँ यमात्‌ । पूर्य संयमे कृला समस्तं भुवनप्रस्तार 
प्रयक्चकुर्वीत । भाष्य तु गत्ताथ, सर्वपुराणप्रपिद्धवात्‌ ॥ २६ ॥ 

चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम्‌ । सूर्ये सैयमनादूमुवनग्रस्तारं विदिवा, 
तदनन्तर चन्द्रे सेयमं खा ताराणां व्यूहं विजानीयात्‌ । सू्मेसतयमादूमुवन- 
प्रस्तारमात्रे प्रज्ञतम्‌--णएवं प्रस्तीणौः छोका नद्यः समुद्रा गिरयश्वेति । 
न तु तारा इत्यं म्यूहिता अनेन सम्बद्धा इति | चन्द्रपतयमात्तु तारा- 
ग्युहप्रकाराबगतिरिति ॥ २७ ॥ 


रवे तद्वतिज्ञानम्‌ । ततश्च समनन्तरं धरुवे संयमं कृत्वा ताराणां 
गतिं विजानीयात्‌-- अनेन प्रकरेण सन्चरमाणा अनेन विरि्ट इति । अस्मिन्‌ 
काेऽनेन ्रहेण अयं प्रहो विरुष्यते, इत्यमस्तमयः । इत्थमुदयः, तदूदररिण 
प्राणभ्रतां द्चुममञ्चम्‌ चेलादि विजानीयात्‌ ॥ 


२८८ पातञ्चटयो गसूत्रभाष्यविवरणे 


| भाष््रप्‌ | 
ततो ध्वे सेयम कृत्वा ताराणां मतिं विजानीयात्‌ । उध्वं. 
विमनिषु ृतक्तयमस्तानि विजानीयात्‌ ॥ २८ ॥ 
[ सूत्रम्‌ ] 
नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम्‌ ॥ २९ ॥ 
[ भाष्यम्‌ |] 
नामिचक्र संयमं कृता क।यग्यूहं विजानत्‌ । वातपित्त- 
शेष्ाणञ्चया दोषाः । धातवः सप्त तग्टादित 'मांास्थिमेदोमज्ाशुक्राणि । 
पूष पूवमेषां बाह्यमिव्येष विन्यसः ॥ २९॥ 
सूत्रम्‌ ] 
कण्ठकूपे क्षुसिपासानिब्रात्तिः ॥ ३० ॥ 
| भाष्यम्‌ | 
जेह्वाया भधस्तात्तन्तुः, तन्तारषस्तात्‌ कण्ठः । ततोऽधस्तात्‌ कृपः 
तत्र सयमात्‌ श्षुसपास नः प्रतिबाधते ॥ ३० ॥ 
[ सूत्रम्‌ ] 
कूमनाञ्यां स्थेयम्‌ ॥ ३१ ॥ 
[ विवरणम्‌ | 
एवगन्यद्रे चोध्वे विमानेषु सयम कृत्वा तामि त्रिमानानीव्य. 
प्रकाराण्येवेगतानीस्येवमादि सव विजानीयात्‌ ॥ २८ ॥ 
नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम्‌ । नाभिचक्रे सेयमं करता कायब्युहे 
विजानीयात्‌ । वातपित्तश्ठेमाणन्यो दोषाः एतावक्ममाणा एतस्रतिष्ठ 
इत्यादि ज्ञेयम्‌ ॥ 
तथा धातवः सक्च बह्याभ्यन्तरभवेनावस्थिता; । (रसः)तघक्‌ बह्मा 
सवषाम्‌ । तताऽम्वन्तरं सहितं, ततो मां, तताऽखि, ततो मेदः, ततो मञ्ज, 
ततः शुङखं सरवाम्यन्तरमिखेवं पूत पू्ेषां बाह्यम्‌ इयेष विन्यासः । तथा 
नाडनां च व्यूहं विजानीयात्‌ | २९ ॥ 
कण्ठवूे श्चुविपापानिवृत्तिः । जिह्वाया अधस्तात्तन्तुः उनामिकाय। 
जिह्वायां दरयते । तन्तोरषस्तात्‌ कण्ठः । ततोऽधस्तात्‌ कूपः। तत्र संयमात्‌ 
्ुलिपासे न प्रतिबधिते ॥ ३० ॥ 


1. -तस्नथ्वस्थि- 
2. बाधेते 


विभूतिपादः ठृतीयः २८९ 


[ भष्यम्‌ | 
1कूपस्याधस्तात्‌ उरपि ककमा नाम नाडी, तस्यां कृतसंयमः 
त्थिरपदं ठमते । यथा सर्पो गोषा वेति ॥ ३१॥ 
| सुत्रम्‌ | 
मूर्ऽ्योतिषि सिददशनम्‌ ॥ ३२ ॥ 
[ भाष्म | 
धिरटकपाटेऽन्तदद्रं प्रभास्वरं ज्योतिः) तत्र सयम कृता सिद्धानां 
यावापृथिन्योरन्तराखचारिणां दश्चेनम्‌ ॥ ३२ ॥ 
{ सुत्रम्‌ ] 
प्रातिभाद्वा सर्व॑म्‌ ॥ ३३ ॥ 
[ भाष्यम्‌ ] 
प्रातिमं नाम तारकं, तदिविकजस्य ज्ञानस्य पूर्वरूपम्‌ । यथोदये 
प्रमा भाषकरस्य । भ्तस्माहा ^सर्वं॑विजानन्ति योगिनः प्रातिमस्य 
स्ञानस्योश्वादादिति ॥ ३२ ॥ 
~ _ ~ ( सूम्‌ 1 
हृद्य [चत्तसावत्‌ ॥ ३४ ॥ 
[ विवरणम्‌ ] 
कूमेनाञ्यां सेयम्‌ । कूषल्याषसतदुरपि कू नाम नाडी। 
तां कतक्ष्यमः धिरपदं रभते चित्तस्थैर्यं ल्मे । यथा सर्पो मोषा वा 
धारणादुरसा अव्यन्तं स्थिरीमवति ॥ ३१॥ 


म, (न 


मूर्धज्योतिषि िद्धदशैनम्‌ । शिशकपाठेऽन्तरिषद्रं प्रभास्वरतरात्‌ 
ञयोतिः इव्युष्यते । तत्र संयमात्‌ सिद्धानां चवापृथिव्योरन्तरारचालिणां 
दरोनं मवति ॥ ३२ ॥ 

प्रातिमादय सर्व॑म्‌ । भालनि संयमे कुर्वतः, ईर्‌ वा भव्य प्रणिदधनस्य 
योगिनः प्रातिभ तारकं स्वयमुत्यितं मानसं ज्ञानम्‌, तत्‌ वक्ष्यमाणलक्षणस्य 
विवेकजख ज्ञान पूर्हूपम्‌ । यथा उदये प्रभा ओषः विचिदुन्मीढन्ती 
ठोदितायमाना भाक्करख उनिगमिषतः पूर्वरूपम्‌ । तस्माद्वा स विजानन्ति 
योगिनः प्रातिमख ज्ञनखोखाद।दिति ॥ ३३॥ 

1. कूपादध 4. मेनं जानाति योगी 
2. कूर्माकारा ५. प्त्तावि 
3 


तन वा 
37 


२९० पात्तञ्चटयोगसूत्रभाष्यविबरणे 


{ भष्यम्‌ ] 
यदिदमस्मिन्‌ ब्रह्मपुरे दहः पुण्डरीकं वेदम, ततर विज्ञान, तस्मिन्‌ 
सयमा्रत्तसवित्‌ ॥ ३४ ॥ 


[ सूत्रम्‌ | 
सच्छपुरूषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः 
पराथौत्स्वाथत्तयमात्पुरुषक्ञानम्‌ ॥ ३१५ ॥ 


[ भाष्यम | 
बुद्धिस परस्यां समानसत्व)पानिनन्धमे रजस्तमसी 
वशीकृत्य सच्छपुरषान्यत।प्रस्ययेन परिणतम्‌ । तस्माच सात्‌ 
प्रिणामिनोऽ्यन्तविधमी विशुद्धोऽन्यक्ि न्मात्रहूपः पुरषः । 


[ विवरणम्‌ 1 
हृदये चित्तसेवित्‌ । यदिदमस्मिन्‌ ब्रह्मपुरे शरीरे दहरम्‌ अल्प 
पुण्डरीके पुण्डरीकाकारो मांपपिण्डोऽघोमुखः, वेदमवदनेकनाडाुबिरयोगात्‌ 
वेदम । तत्र विज्ञानं चिन्त, तस्िन्‌ उर्सरोिलपरनले पराणोदमनि पुण्डरुके 
सयम। चित्तं सघ संवित्‌ भवति ॥ ३४ ॥ 


सच्वपुरुषयोरलन्तासंकीणयोः प्रयया्रिषेषो भोगः परार्थात्‌ 
स्वाथपंयमात्‌ पुर्पज्ञनम्‌ । सं चित्त, पुरषो भोक्ता, तयोः भत्यन्ता- 
सद्कीणयोः अध्यन्तविलक्षणपेरतीव परृथगभूनये; वृ्तिसारूष्य प्रययाविदयेषः, 
स॒ मोगः पुरुषस्य । परार्थात्‌ सच््रात्‌ पुरुषप्रत्ययेन सङ्कीणीमासात्‌ विव्रिभ्य 
` खार्थे चितिमत्रस्वख्ये संयमात्‌ पुरुषज्ञानं भवति ॥ 

कीटदो तत्‌ पराथ ॒चित्तप्तत्वम्‌? यता विविव्य स्वार्थे पुरुषे संयमः 
क्रियत इति । बुद्धिम प्रस्याश्चीठं समानं सत्वे वस्तुका्यं पुरपराथकरतन्यतया 
समवस्थानम्‌ उपनिबन्धनं यथोस्ते समानस्य पनिबन्धने रजस्तमपी वश्चीकरय 
न्यगमावमापाच सचखुदधान्यताप्र्येन योगिनः परिणतम्‌ ॥ 


तस्माच सात्‌ परिणामिनः त्रियुणादनित्यादञयुद्धात्‌ पराधादचेतनत्‌ 
अलयन्तविधमी विश्ुद्धोऽन्यः अपरिणामी स्वार्थो निवयः चिन्भा्ररूपः पुरषः ॥ 


{, तिमा 


विभूतिपादः तृतीयः २९१ 


[ भाष्यम्‌ |] 

तयोरस्यन्तासंकीणयोः प्रत्ययविशेषो भोगः, पुस्परस्य दर्शितविषथलात्‌ । 
स मोगप्रत्ययः सखस्य पराथंताद्द्ड्यः ॥ ` 

यस्तु तस्मद्विरिष्टञ्चितिमव्रहूपोऽन्यः पौसमेयः प्रत्ययः, तत्र 
सयमादुरषषिषया प्रज्ञा जायते । न. च पुरषप्रस्ययेन बुद्धिसत्ारमना 
पुरुषो दश्यते । पुरुष एव तं प्रसययं 'स्वारम्बनं प्रह्यति । तथा हक्तम्‌- 
“विज्ञातारमरे केन विजानीयात्‌ ” [वड २।४। १४] इति ॥ ३५॥ 

[ विवरणम्‌ | 

तयोरयन्तातङ्गीणयोः प्रययाविरेषो भोगः पुरुष दर्धित- 
विषयात्‌ । स भोगप्रययः । नापरिणामिते सति द्ररितत्रिषयत्वादन्यो भोगः 
सम्भवति । सत्व पराथलात्‌ अविरि्े मोगप्रवे दृश्यः पुरुषेण ॥ 

यस्तु तस्मात्‌ मैणप्रतययात्‌ प्रघ्ययिनश्च विरिष्टथितिमानरूपोऽन्धः 
पौस्षेयः भ्रययः, स्वराथैः पुरुष एव परिणामानुपपत्त प्रलयः । तत्र संयमात्‌ 
पुर्ष विषया प्रज्ञा जायते ॥ 

ननु च यदि पुरुषः प्रव्ययस्य व्रिषयीक्रियते, तेन चत्‌ पुरुषो गृह्यते, 
परार्थः पुरुषः प्राप्रोति । नैष दोषः । न च पुरुषप्र्ययेन पुरुषविश्रयेण प्रत्ययेन 
बुद्धिवच्चात्मना बुद्धिसचधरमेण पुरुषो दृश्यते बुदधर्चैतनतात्‌ ॥ 

पुरुष एव तं प्रययं स्वाम्बने पपुरुपराभपं प्यति 
पुरुष।भाप्तवमेतर प्रत्ययस्य पुसृप्राटम्बनलम्‌ । न प्रलयस्य पुरुषाठम्बनतम्‌ । 
यथय। मुखसननिधौ दण मुलाकरिण परिणमते, तथ। चित्त पुरुषाकरिण परिणतं 
पुरुष।भापं पुरषेण गृह्यते ॥ 

तथा चोक्तम्‌-- “विज्ञातारमरे केन विजानीयात्‌" इति। न 
कस्यचित्‌ पुरुषः कर्मतां प्रतिपद्यत इव्यथः ॥ 

ननु चक्षुणदशैतल्प्रतिहतं प्रतिनिदृल्य यथा मुखस्य प्ाहकं, एवं 
पुरुषोऽपि चित्तस्तघखप्रतिहतः प्रतिनिद्रेय स्वरालानं गृहीषात्‌--न--परिणा- 
मानुपपत्तेः पुरुषध्य । न द्यपरिणामिनधित्तं भरति श्रदृत्तिः प्रतिनिद्ृत्तिव 
साधिमानमुपादनुत्रीत ॥ 

न चापि चक्षुः प्रतिनिवृत्य मुखं प्राहयति । पुखत्य दुरपेणमण्डलषि- 
करणत्वेन अनुभूयमानलात्‌ । न हि छपुखं दपैणापेकरणस्थम्‌ । करि च, 


1. स्वात्मवख 


२९२ पातञ्ञखयोगसूत्रभाष्यविवरणे 


तरम्‌ | 
ततः प्रातिभश्रावणवेदनादशौस्वादवातां जायन्ते ॥ ३६ ॥ 
. [ भाष्यम्‌ | | 
 प्रातिभास्सुक्ष्मव्यवदितविभ्रकृष्टा तीतानागतन्ञानम्‌ । श्रावणाहिन्य- 
दाज्दश्रवणम्‌ । वेदनादिव्यस्पशांधिगमः । आदर्शादिव्यरूपसंवित्‌ । 
जस्वादादिव्यरसत्तवित्‌ । वबातातः सेव्यवहारततवरूपं यथावत्‌ 
अपिगच्छति (टिव्पगन्धविज्ञानमित्पतानि नित्यं जायन्ते) ॥ ३६ ॥ 
सूत्रम्‌ | 
ते समाधाबुपसगां व्युत्थाने सिद्धयः ॥ ३७ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
ते प्रातिभादयः समादितचित्तस्यास्यमाना उपसगौः, तदरीन- 
प्रत्यनीकृतात्‌ । व्युलितचित्तप्योद्यमानाः सिद्धयः ॥ ३७ ॥ 
र [ सूत्रम्‌ 1 
बन्धकारणशेथिस्यातरचारसवेदनाच्च चिचस्य परशरीरा- 
वेशः ॥ ३८ ॥ 
[ विवरणम्‌ ¡ 
आअदरशानुविधान।च । यया खड्गे दीर्षं मुखं दर्थे । न स्वमु दीर्षम्‌ | प्रतिहतेन 
चदुपरुम्यत चक्षुषा (नजपुख, तत्र अददाचुर्वघनमव्रुक्तम्‌ ॥ २५ ॥ 


ततः प्रातिमश्र।वणवेदनादशौस्वादवातीं जायन्ते । ततः सख्यै 
समाधानात्‌ , प्रातिभात्‌ आ्मसेयमजनितात्‌ मानात्‌ ज्ञानात्‌, सूक्ष- 
व्य॒वहितविप्रक्रृष्टातीतानागतज्ञानं सम्प्ते । श्रावणात्‌ दिव्यशचब्दानां 
श्रवणम्‌ । वेदनात्‌ स्पशङ्ञानात्‌ सिद्धादीनां खरं जनाति । आदशीत्‌ 
चाक्षुषात्‌ ज्ञानात्‌" दिव्यं रूपम्‌ अवगच्छति । भा्व!दात्‌ रसनेन्धियज्ञानाव्‌ 
दिग्यरससंवेदनं मवति । वृत्त भव वातं लोकसेन्यवहारन्ञानं, तस्मदिष 
संव्यवहारतखसूपं यथावद धिगच्छति ॥ ३६॥ 

ते समाधाबुपसगौ व्युत्थाने सिद्धयः । ते प्रातिमादयः पुर्षे 
समाहितचित्तस्य उ(स्य समु)खद्यमाना उपसगौः पुरुषदशेन्र्यनीकतवात्‌ । 
व्युलिितचित्तस्योयदयमानाः सिद्धयः । यपि पुरुषे सेयमदुधन्ते, तथापि 
न विरक्तस्य समाहितचित्तस्य जायन्ते ॥ ३७ ॥ 


। 1. अत्र आदशंकोशे इत उपरि (्तदुद्रव्यान्यथा्वेनः इति लिखितमस्ति | 
तस्यानन्वयात्‌ , 4. पुरेभ्यः पश्चात्‌ ङिखितं "दिव्यं" इत्यादि वाकं योजितम्‌ ॥ 


विभूतिपादः ठृतीयः “९३ 


{ भष्यम्‌ } 
ठेरीमूतस्य मनसेऽग्रतिषठस्य शरीरे कमश पयादन्धः प्रतिषठेयथैः। 
तस्य कर्मेणो बन्धकारणस्य शेथिल्य समाधिषल।द्वति । प्रचारसंबेदन 
च चित्तस्य समाधिजमेव । क्मबन्पक्षयात्खाचित्तमचारसवेदनाच्र योगी 
चित्त खश्रीराज्निष्कृष्य शयीरान्तरेषु निक्षिपति । निक्षिप्तं चित्त चेन्धियाण्यनु 
पतन्ति । यथा मधुकरराजानं मक्षिका उदतन्तमनृत्पर्तन्त निविशमानमनु 
निविशन्ते, तथेन्द्रियाणि परशरीरातरेशे चित्तमनु विधीयन्त इति ॥ ३८ ॥ 


| सूत्रम्‌ | 
उदानजयाज्रुपङ्ककण्टकादिष्वसङ्क उत्कान्तिश्च ॥ ३९ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | _, 
समस्तेन्धियत्र्िः प्राणादिरक्षणा जीवनं, तस्य क्रिया पश्चतयी- 
[ विवरणम्‌ `] 


चन्धकारणशेधित्यात्‌ प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः । 
रोरीमूतस्य षण्टाभिषाततुल्यस्य देदीप्यमानाङ्गारराशिदुतिचश्वरुस्य मनसोऽप्र- 
तिषठस्य शरीरे कममाशयाद्रन्धः प्रतष्ठेयर्थः । ररीरमात्रसंको चावस्थानम्‌ ॥ 

तस्य बन्धस्य कमै कारणम्‌ । कारणरौयिल्ये कर्मीरायरियिर्लं 
समापिवलाद्भवति । प्रचारसेवेदमे च चित्त्य समाधिजमेव.। 
कमेबन्धक्षयात्‌ स्वचित्तप्रचासेवेदनाच्च अस्मिन्निमित्ते हृष्यति सुद्यति 
टुम्यति चनेन कारणेन' इ्येवमादिस्वचित्तस्चरणपतच्वरेदनाच योगी चित्तं 
स्वरारारानिष्करष्य दर रान्तरषु क्षप ॥ 

चित्तम्‌ अस्य उत्पतत्‌ इद्धियाणि अनृततन्ति। तस्मादिन्धियबृत्तिलभिात्‌ 
पररारीरेष प्राणादिचृत्तय उत्पयन्ते । यथा मधुकरराजं मक्षिका उस्तन्त- 
मनूततन्ति, निविशमानमनु निविशन्ते, तथेन्द्रियाणि प्रशरीरवेशे 
चित्तमनु विधीयन्ते ॥ ३८ ॥ 

उदानजयात्‌ जल्पङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उक्रान्तिश्च । समस्ते- 
न्दरियधृत्तिः जीवनं सर्वेषमेकादशानामिद्धियाणां वतन जीवनम्‌ । यया 
पञ्ञरगतशकुनिप्श्चठनेन पञ्चरचल्नम्‌ , एवम्‌ अरेष्रकरणानमिकन समूरितेन 
म्यापारेण येन शरीरं धरिपते तजेवनम्‌ । तस्य जीवनस्य पुरुषरा्थकतैम्यता- 
नियमात्‌ प्रचतयी क्रिया प्राणापानव्याने.दानसमानमेदेन प्रस्ती्ेते ॥ 





1, ववद्याद्भ 


२९४ पातञ्चख्योगसूज्रभाष्यविबरणे 


| भाष्यम्‌ |] 
प्राणो मुखनापिक्रागतिशहप यव्ृत्ति । समं नयनात्समानश्चाऽऽन।भिव्रत्तिः। 
अपनयनाद्रपान आपादतलत्रत्तिः । उन्नयनादुदान आचिरावृत्तिः । व्यापी 
व्यानं इति । एषां प्रधानः प्राणः । उर।नजयाज्जरपह्ककण्टकारिष्वसङ्क 
उत्रान्तिश प्रायणक्राढे मवति । तां पवक्ञक्िव्य प्रतिपच ॥ ३९ ॥ ¦ 
सूत्रम्‌ | 
समानजयञ्ञ्विखनम्‌ ॥ ४० ॥ 
पका (ध्व | 
जितसमानस्तेजस उपध्मानं कृता जट्वति ॥ ४० ॥ 
~ वा 
श्रात्राकादायोः संबन्धसयमा देव्यं श्रोत्रम्‌ ॥ ४१ ॥ 
[ माष्यम्‌ | 
#ोत्राणामाक्राद्ये प्रतिष्ठा श्डान्दानां च | 
(किरम | 
तत्र प्राणो मुखनािकागतिरहृद यवृत्तिः । समं नयनात्‌ समानः 
यानाभिवृत्तिः आनामिदेरो वतेते । मू्पुरीषादीनाम्‌ अपनयन।दपानः, 
स च नानिप्रथेति सपादं वते । ऊर्व शरीरस्य नयनादुदानः, 
स च पादतलादारम्य अ।मस्तकवत्तिः । समस्तरारीरग्यापी व्यान इति ॥ 
एतेषां प्रधानः प्राणः | तजयाच्च सर्वेषामपानादीनां तु जयो मवति | 
तेषां तु जयोपाये विस्तरेण दैरण्यगम व्याल्यातः । दह तु मनोजयातुजित- 
त्वात्‌ तेषां जयोपाये न पृथगभिहितः | प्राणायामजयात्तु जीयन्त एव । न प्रथोषां 
जयोपायप्रतिषादनमाद्यमिति फचमात्रमुदाननितेरुच्यते -- 
उदानजयात्‌ जटपङ्ककण्टकरादिषु, आदिना कृपाणघारादिष अभुङ्गः । 
किच, उरकान्तिश् भायणकारे भवति । तां प्रायणकले भवन्तीमुक्ान्ति- 
मुदानजयात्‌ वश्चीक्र् स्वतन्त्रतया प्रतिपद्यते ॥ ३९ ॥ 
समानजय।त्‌ वलनम्‌ । नितसमानः तेजपत उपभ्मानं कृत्वा समानवा- 
सवाप्रयतात्‌ उदानतेजपोः तदुपष्मानकर्मकरारकस्तावचोरगी जाठरं खल्यति॥ ४ ०॥ 
शरोत्राकाशयः सेबन्धसंयमादिय्यं शरात्रम्‌ । कः पुनरसौ संबन्धो यत्र 
संयम इद्याह-सवश्रोत्राणामाक( श प्रतिष्ठा । शब्दानां चाकाशगुणत्वादाकाशमेव 
प्रतिष्ठा | प्राष्यं शाब्दं प्रति श्रोत्रष्य भ्यवधानामावः श्रीत्राकारयोः सम्बन्धः ॥ 


सुवं 





1. विष्वेन | 2. व 


विभूतिपादः ठृतीयः २९५ 


[ भाष्यम्‌ ] 

तथा चेोक्तम्‌- | 
तुल्यदेशश्रवणानामेष्क घ्रुतिलं सर्वैव मवतीति । तचेतदा काशस्य रिङ्गम्‌ । 

अनावरणात्मकं चोक्तम्‌ । तथा" मूरतस्यान्यत्राकाशादावरणदशेना- 
दिभुत्वमपि प्रल्यातम।कराशस्य । शन्दग्रहणातुमिते त॒ श्रोत्रम्‌ । 
बभिरावाषिरयोरकः शब्द गृह्णाध्यपरोन ग्रह्णातीति । तस्मन्छरतमेव 
शब्दविषयम्‌ । श्रोत्राकाशयोः संबन्धे कृतपंयमस्य योगिनो -दिव्यं श्रातं 
प्रवतेते ॥ ४१॥ 

सूत्रम | 
कायाकाशयोः सबन्धसंयमाह्घुतूसमापत्तेधाऽ5- 
काडशगमनम्‌ ॥ ४२ 
[ भाष्यम्‌ ] 

यत्र कायस्तत्राऽऽकार, तस्यावक्राश्चदानात्कायस्य तेन पवन्धःः | 

तत्त कृतस्यमे जिता तत्संबन्धं ठधुषु तूादिष्वा परमाणुभ्य समापतत 
विवरणम्‌ | 

तथा चोक्तम्‌--तुत्यदेशत्रवणानाम्‌ । श्रूयतेऽनेनेति श्रवणम्‌ । 
तल्यदेशानि श्रवणानि येषां ते तुल्यदेशचश्रवणाः । तेषाम्‌ एकश्रुतितवं सर्वेषां 
मवति । तदेकस्मिन्नवकारदायिनि निरावरणाप्मके वस्तुनि सति युञ्यते । 
तचेतदाकाशस्य सचे ठिङ्गम्‌ ॥ | 

तथा अनावरणात्मक्ं चोक्तम्‌ । (कुतः) तथा मूतेस्यान्यत्राकाशचात्‌ 
आकारात्रिलक्षणस्य धटदेः आवरणददनात्‌। अतो यस्य मणिवन्रादिमष्येष्वभ्या- 
वरणं नास्ति, तदाकाशम्‌ । अत एव विभुत्वमपि प्र्यातमाकाश्य ॥ ` 

श्रोत्रस्य लिङ्गमाह -शग्दग्रहणानुभितं तु श्रोत्रम्‌ । यस्मात बधिराबषि- 
रयोरेः शब्दं ग्क्ताति अपरो न गृह्णाति । यनिमित्तमनधिरस्य रब्दप्रहणमित- 
रस्य चप्रहणं तच्छोत्रम्‌ । तस्माच्छरतमेव शब्दविषयम्‌ । बधिरेणाश्रवणात्‌ । 
त्रोत्राकाञ्चयोः संबन्धे कृतसंयमस्य योगिनः दिव्यं भरोत भ्रवतैते ॥ ४१ ॥ 

कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमात्‌ रघुतूरसमापत्तेश्च आकाशगमनम्‌ । 
यत्र कायः तत्र अकिराम्‌ । तस्य अव्रकाशदानात्‌ कायस्य अविनामाव- 
रक्षणः सम्बन्धः तेन आकादोन । तत्र कायाक्रारायोः इतरेतराविनाभावप्राि- 





1 यथोक्तम्‌ 3 चोक्तम्‌ ` ऽ प्राहिस्त्न- ` 5. म्रातिस्तज्न- 
2. केदेदाशरु 4. -अमूतंस्वानाव- 6. चि.ङन्प्वा-ः-:ः 


२९६ पातञ्चलखयोगसूत्रमाष्यादिवरणे 


"श न (0 ध 
जितसंबन्पो लघुभवति । रघुखाच्च जठे पादाभ्यां विहरति । ततस्तु उणेना- 
.भितन्तुमात्रे विस्य रद्िप्रु विहरति । ततो यथेष्टमाक।शगतिरस्य 
भवतीति ॥ ४२॥ 

म्‌ | 


[ सन्न 
बहिरकस्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाज्ञावरणक्षयः॥ ४३ ॥ 
[ - भाष्यम्‌ | 

शरीराद्दहि्मनसो" या वृत्ति, सा विदेहा नाम धारणा । सा यदि 
शरीरपरतिषठस्येव मनसो बदिषत्तिमत्रेण मवति, सा कसिपतेत्युच्यते। या तु 
शरीरनिरपेक्षा बहिभूतस्यव मनसो बदिष्रत्तिः सा खल्वकलििता । तत्र 
कलतया साधयन्त्यकलिपतां महाविरेदामिति । 

` [ विवरणम्‌ ] 

लक्षणसम्बन्धे कृतसंयमो योगी जिता तस्सम्बन्धं तते रुष तूखादिषु आ 
परमाणुम्यः समापत्तः नितप्बन्धः वूलादिवत्‌ लाघवं प्रतिपद्यते ॥ 

जितकायाकाशासम्बन्धः समापन्नः तूलादितुल्यलाघवशीखना्थं॑ जके 
पदाभ्यां विहरति । ततः ऊम्‌ उेनामितन्तुमात्रे विहरति । तत्र 
सज्ञातकोकिरतन्तुसमानल धवः पुनः रदमु विहरति । तता मातस्खिनि । 
ततो यथेष्टम्‌ आक्राशे गतिष्स्य भवति ॥ ४२ ॥ 

वदिरकत्पिता वृ्तिर्हाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः । शरीरात्‌ 
बहिः देशान्तरे विषयविदेषे स्वयमेव समाधिव्रठात्‌ उपजायते य मनपो वृत्तिः सा 
महाविदेहा नाम धारणा । सा यदि रारीरप्रतिषठस्येव मनसो पृ्तिमत्रेण 
धिः विषये मवति, तदानीं क्तिता उच्यते । रारीरस्यमनस्तङ्कल्पपू्ैकतात्‌ । 
या तु समाभरिवरनेमित्तात्‌ रारे बन्धकारणरौयिल्यात्‌ शरीरनिरपेक्षा बहिमूत- 
स्थैव मनसो बहि्र॑ततिः, सा खलु अकसिपता इत्युच्यते । यथेत्र कल्पिताथां 
शारीरावधिंकं एव बहिरत्तिकाभः, एवं नाकस्पतायां रारीराधिषठानावधिसमीक्षा ॥ 

सा चोभय्यपि विदेहैव बहिरूपकलिितघ्ात्‌ । तन्न या इयमञल्पिता 
महाविदेदेति समाख्यायते । तत्र कसितया साधयन्यकसिितां मदा 
विदेदाम्‌ । कल्पनापशीटनपताव्यत्वादकल्पितायाः कल्पितया च संसाधयन्ति 1 





1. इ्तिलाभो 
2. अचर आदरदौकोशे इत उपरि “विवेकजं? इत्यादिः मन्थः छिखितः। 
तस्यानन्वयात्‌ , 18. पुरेभ्यः पश्चात्‌ चिखितः “बृहिः” इत्यादिः न्थ; योजितः ॥ 


षिभूविषादः दृतीयः २९७ 


[ भाष्यम्‌ | 
यया पररशीरण्याविश्चन्ति यागिनः । ततश्च धारणातः 
प्रकाश्ालनो बुद्धिसक््वस्य यदावरणं रकमेविपाकत्रये रजस्तमोमूटं 
तस्य च क्षयो मवति ॥ ४३॥. 


[ सूत्रम्‌ | 
स्थूलस्वरूपसुष्ष्मान्वयाथवत्वसंयमाद्भूतजयः ॥ ४४ ॥ 
[ माष्यम्‌ ] 
तत्र पार्थिवाः" शब्दादयो विशेषाः सहाऽऽकारादिमिषैर्मेः स्पूल- 
शब्देन परिभाषिताः । एतद मतानां प्रथमं रूपम्‌ । 


[ वि्रणम्‌ ] 

यया महाविदेहया प्रशरीराण्याविशन्ति योगिनः । ततश्च धारणातः महाः 
विदेहातः प्रकराश।सनो बुद्धिसचस्य यदावरणं शकमंत्रिपाकरजयं रजस्तमो- 
मूं तस्य च क्षणो मवति ॥ ४३॥ 

स्थूरस्वहूपसृष्ष्मान्वयारथं वच्वसंयमात्‌ भूतजयः। स्थूठं च स्वरूपं च 
सुक्घमं चन्वयश्चावघं चेव्येवमेकै कं भूतं पञ्चात्मकम्‌ । तत्र पार्थिवाः शब्दादयः 
शाब्दस्परौखूपरतगन्धाः विक्ञेषाः पञ्चलक्षणतन्मात्रारन्धघ्वात्‌ प्रथिव्याः । स॒ह 
आकाशदिमिः । पृयिन्यास्तावदाकारादयः-- 

आकारे गौरवं र्यं चेरणं रयेर्यमेव च । 

स्थितिभदः क्षमा कार्ष्ण्यं काटिन्यं सरवमग्यता ॥ इति ॥ 

तथा- स्लहग्रमासैष्स्यमादवगौररक्तापवित्रलसन्धानाद्‌थ ओदक। गुणाः ॥ 

तथा- तैजसाः ऊषवमाक्तपावनतादग्धृत्वपाचकरत्रखाववमास्वरसादयः ॥ 

तथा-वायवोयाः तिर्थग्यानपव्ित्रतक्षिपवलनेदनत्वादयः ॥ 

तया-नामसाः सब्गत्यव्यूहति्म्भाः ॥ 


तदेतैः आक्रागरिभिः सह शब्दादयो विशेषाः स्थूलब्देन संव्यव- 
हारर्थं शाले परिमाषिनाः । एत्रमाप्याश्चत्वारे रसादयो विरोषाः सौक्ष्ादिमिः 
सह, एषं तेजसा रूपादथलयो व्रिरोषा ऊव मक््वारिमिः सह स्थका उच्यन्ते | 
तया वायवीयाः शन्दस्परतिषक्प्रातादयः स्थूला विंरेषाः । एवमाकाशस्य 
सवेगतघ्ादयः स्थूढा विरोषाः । तत्‌ एतत्‌ भृतानां भरथमं स्थूरं रूपं उक्तम्‌ ॥ 


1. वाद्याः 
3ॐ8 





२९८ पातञ्चटखयोगसूत्रभाष्यविषरणे 


[ भाष्यम्‌ | 

दवितीयं रूपं "सामान्यं मूतिंमूमिः सेटो जरं वहिरष्णता वायु 
श्रण।मिखं सवैतागतिराकराश॒इयेतस्स्वरूपशग्दे नोच्यते ॥ 

स्तस्य सामान्यस्य शब्दादयो विशेषाः । तथा बचोक्तम्‌- 
एकजातिपमनिितानामेषां घममेमात्रग्णवृत्तिरिति ॥ 

सामान्यविशेषसपरुदायोऽत्र द्रव्यम्‌ । हिष्ठो हि समूहः प्रयस्तमित- 
मेदावयवः" शरीरं ब्रक्षो यूथं वनमिति ॥ 

रान्देनोपात्तमेदावयवानुगतः समूह उमये देवमनुष्याः । समूहस्य 
देवा एके भागो मनुष्या हितीयो भगस्ताभ्यामेवाभिषीयते समूहः ॥ 

[ विवरणम्‌ ] 

द्वितीयम्‌ अधुना स्वरूपम्‌ उच्यते । तच सामान्यं पर्थि्रषु भिनेष्व- 
भिन्नमनुगते मूर्तिर भृमिः इति । तथा रपादिष्वप्ये्वनुगतं सामान्यं सेह एव 
जलम्‌ इति । तथेवप्रयेद्‌ ल्पादिष्वनुगतं सामान्यं वह्धिरुष्णत्वमेव । तथा स्पशै- 
तिधक्पातादिष्वनुगतं सामान्यं प्रणामिखऽमेव वायुः । तथा शब्दादिष्वनुगतम्‌ 
सामान्य सर्वैतोगतिरे आकाशः, इयेतत्‌ स्वरूपशब्येनोक्त दवितीयं रूपम्‌ ॥ 

तस्य सामान्यस्य र्स्य शब्दादयो विरोषाः । तथा चोक्तम्‌- 
एकजाति्मनिितानां सचखदिगुणपमवुगतानाम्‌ एषां भूतानां प्रयिन्यादीन 
सामान्यानां राब्द्‌ दिधरभमा्रं व्यावतते ॥ 

सामान्यविरेषक्षपुदायो द्रभ्यम्‌ । कस्मात्‌? द्विष्ठो हि समूहः 
राभ्यां प्रकार्य स्थिता द्विष्ठः प्रयस्तमितमेरावयवः व्याबृत्तप्रल्ययद्युः 
इव्यथः । यथा ररर वृक्षा यूथ वनमिति ॥ 

उपात्तमेदात्रय बानुगतः आगृहीतमेदात्रयवानुगतः समूहः उमयशब्दे- 
नोपादीयत । उभये देवमनुष्या इति । तथथा--ममूदश्य देवा एको मागः, 
मनुष्या एको भागः । ताभ्यामेव भागाम्यामागृहयीतययास््मेदानुगताम्याम्‌ 
अभिधीयते पमूहः उभये इति ॥ 





1. स्वसा- 

2. प्रणामी 

3. अस्य 

4. -वानुगतः 

६. अनत्र आदशकोश इत उपरि “गुणाः डुक्लत्वादयःः इत्यादिग्रन्थः 
लिखितः । तस्यानन्वयात्‌ 15. पुरेभ्यः प्राक्‌ लिखितः “मेव वायुः” इत्यादिः 
ग्रन्थः योजितः ॥ 


विभूतिपादः वृतीयः २९९ 
| भाष्यम्‌ | 
' मेद्रामेदो विवक्षितः । अश्राणां वनं ब्रह्मणानां सष आग्जव्रणं 
ब्राह्मण्रव इति ॥ 

स पुनदिविधो युतधिद्धावयवऽगुतसिद्धावयवश्च । युततिद्धवियवः 
समूहो वने संव इति । अयुत्िद्धावयवः संघातः शरीरं वृक्षः 
परमणणुरिति । अयुनपिद्धावयवभेदालुगतः समूहो द्रव्यमिति परतञ्लिः । 
एतस््वरूपमिय्युक्तम्‌ ॥ 

अथ किमेषां सृक्ष्मरूपम्‌ ? तन्मात्रे भूतकारणं, तस्यैकोऽवयवः 
परमाणुः सामान्यविरेषासमाऽदयुतसिद्धावयवभेदानुतः समुदय इयेवं 
सर्वतन्मात्राण्येतत्तृ तीयम्‌ । 

[ विवरणम्‌ | 


मेदो विवक्षितः आम्राणां वनम्‌ इति । आग्राणामिति भेदेन 
तरिवक्षा | वनमिलयमदेन । तम्यां द्वाम्यां मेदामेदाम्याम्‌ आअब्राणां वनमिति 


षष्ठी प्रथमा । तदृष्योर्विवक्षित एकः समूह इति ॥ 


= 
भ 


स॒ पुर्दिविधः समूहः--युतसिद्धव्रयवोऽयुतपिद्धावयवश्च । 
युततिद्धावयवः प्रथक्‌सिद्धावथवः समूहो वने सद्व इति । भयुनसिद्धावयवः 
जष्थक्तिद्धावयवः सङ्घातः सरीरं वृक्षः प्रमा णुरति ॥ 

परमाणु नामपि सावयवं सचरादिकायत्वात्‌ मू्त्राच्च धटादिवदेव । 


अयुतसिद्धावथवमेदातुगतः समूह्यो द्रव्यमिति पतक्नलिः । एतस्खरूप- 
मिद्युक्तं सामान्यविरेषात्मकम्‌ ॥ 


अथ किमेषां सूक्ष्मं रूपम्‌ इति । तन्मात्रं भूतकारणम्‌ । अनेक- 
परमाणुप्रार्यतात्‌ तस्य तन्मतस्य एकोऽवयवः परमाणुः । सोऽपि सामान्य- 
विशेषात्मा अययुततिद्धावयव्रमदानुगतः समुदाय इति । एवं सर्वतन्मात्राणि। 
ततश्च तन्मात्राणि विशोषविनिमुक्तानि तद्व्रयक्राश्च परमाणव इति एतत्‌ भूतानां 
तृतायं सूक्षस्य रूपं संय“ स्य विषय इति । तन्मात्रारन्धसवाच्च सावयवमाकाा- 
मनिदयं च । न च रन्दग्यतिरेकेण आकारे नाम द्रम्यम्‌ उपधं राक्यम्‌ । 
धरममधभिणोरमेदात्‌ ॥ 


1 खच मेदामेद- 


३०० पातञ्जर्यो गसुत्रभाष्यविवरणे 


[ भष्यम्‌ | 
अथ भूतानां चतुथं रूप-ख्यातिकरियास्थितिश्चीखा गुणाः 
कायै स्वरूप।नुपातिनोऽन्वयशब्देनाक्ताः । 


[ विवरणम्‌ । 
ननु च केशादीनां कृष्िमाऽप्येति, शष्ठिमा समुपजायते । तथा च 
अपायोपजनधर्माणः कृष्णिषादयः ते गुणाः । यत्त न कृण्णिमानमनु विनयति 
सु श्चिमानमन्वति, तत्‌ द्रव्यम्‌ । एवम्‌ आकारादीनामपि गुणग्यतिरेकेण सद्रावः, 
दाब्दप्रल्ययादिमेदात्‌ इति ॥ 


न--दृष्टान्तामावात्‌ | ते एव कृष्णाः श्ुष्श्च केराः कृष्णङ्युञ्तादि. 
धः परिणमन्ते | सवं हि सर्वामकमिध्युक्तम्‌ । न खलु कचिदपि कूटस्थे 
आश्रये वगुणाः शुह्ृत्रादयः अपायोपजनवन्त उपटम्यन्ते । न च कृष्णत्व।दि- 
ग्यपनयनेन द्रव्यस्व्पम्‌ । यदपि - दसनस्पश्चनाम्यां यदुपठम्यते तत्‌ द्रव्यम्‌ 
इति, तदप्ययुतसिद्धर्पस्पर्शसमुदायतरादुभाम्यां दरनस्पसेनाम्यां गृद्यत 
इव्यद्‌षः ॥ 

ननु चन ख्यं स्प्ञनेन गृह्यते, नापि दशनेन स्पैः, यदुमाम्यां 
गृह्यने श्यत्‌ पद्यामि तदेव स्पृशामीति तद्द्रव्यम्‌ । यत्तु चक्षुषैव गृह्यते 
स्परनेनेव च गृह्यः स गुण इति ॥ 


(~ 


न-- माषरतिखयवादिभिन्नजातिविमिश्रराङ्रावनेकन्तिकवात्‌ । गृह्यते 
च दर्शानस्पसैनाम्यां राशिः । क्ते च-दरोनस्परोने गुणस्यैव प्राहके, बष्यन्द्िय- 
स्वात्‌ , श्रोत्नवत्‌ । न हि जातिरपि गुणब्पतिरिक्ता विधते भेदेनग्रहणात्‌ ॥ 
किच, घटादादावपि परस्पराध्यासेन दशौनस्पशैनाम्यां रूपस्पशेये।रे 
प्रहणम्‌ । ययेदं ख्य दुशीन्धि षुरमिगन्ि चेति । तस्मादाकाशामपि तन्मात्रा 
रन्धं शब्दव्यतिरेकण।शक्यं प्रतिप्तमिति सावयव्रमनिस्यं च ॥ 
[न „3 क _ क _ (१ ४४ 
अथं भताना चतथ स्पम्‌ । द्याताक्रवास्यतिद्चढ यणाः कर्य 


स्वरूपातुणातिनः काथधमनुयायनः अन्वयरष्नाक्ता;ः । अनुगमत्‌ । 
तदेतद्‌ मूतानां चतुथं खूप संयमस्य गुणान्वयास्यो विषय 





1, सवमभावनु- 
2. अत्र आदर्यकोशे इत उपरि ^मनाशयं” इत्यादिवाक्यं लिखितम्‌ । 
तस्यानन्वयात्‌, 14. पुरेभ्यः पश्चात्‌ छिखितं “गुणाः?” इत्यादि वाक्यं योजितम्‌ ॥ 


[® 


विभू।तपाद्‌ः वृताय ३०१ 


[ भाष्यम्‌ ] 
अथैषां प्रच सूपपथेवद, मोगापरवगधता, गुणेष्वन्वयिनी 
गुणास्तन्मात्रमृनभौतिकेषिति सर्वमर्थवत्‌ । तेषिदानीं भूतेषु पक्वम 
प्स्ेषु सथमात्तप्य तत्य स्षष्य स्वह्ूमर यी जयश्च प्रादुमेवति । 
तत्र पश भनस्रूपाणि जिता भरतजयी मवति । तजजयादस्ानुस्ारिण्य 
इव गावोऽस्य संकतादुव्रिधापिन्यो मतप्रकृ तयो भवन्ति ॥ ४४ ॥ 


[ सूत्रम्‌ | 
ततोऽणिमादिप्रादुभोवः कायसपत्तदमानभिघातश्च ॥ ४५ ॥ 
[ भष्यम्‌ | 


तत्राणिमा-मवयणुः । रषिमा-लघु भवति । महिमा -महान्भवति । 
[ त्रिवरणम्‌ ] 

अथेषां पश्व रूपमथवसम्‌ । अस्य व्यार्यानं मोगापवगौयता । 
सा च गुेष्वन्वयिनी । तत्र या गुगेष्वनुदृत्ता मोगपवगार्ता तदिदं भूतानां 
पञ्चमं सूपं पयमस्याथवछाष््यो विषयः ॥ 

गुणास्तन्मत्रेष भूतेषु भूतविकारेषु चन्वयिनः । एवं तन्मात्र 
सुक्षमख्पं मूनमृतविकरिभ्वनुगतम्‌ । भूतस्वरूपं च स्थूठे$ भूतत्रिकरिष्ुगत- 
मिति सर्वमर्धवत्‌ । गुणानां मेगापवगौ्थवघात्‌ तेशं च सर्वान्वयिवात्‌ 
तद्वेन सर्वं भूतविकराेकम्‌ अर्थत्रत्‌ | 

तेषिदानीं मूतेष पचतु पशरूपेष॒ स्थूलदिषशचस्ये यथाक्रमं सेयमात्‌ 
पूव स्थूठेन संय्म॑ङृतवा तनयपता्षात्करणानन्तरे सद्यक्ेयमं दुर्वी । पूनः 
सुक, पुनश्चन्वये, पुनश्चाथ इयेवं यथाक्रमं संयमात्तप्य तस्य स्थुल- 
दिकस्य दशनं जयश्च यथावत्‌ प्रादुभरवति । तत्र भूतस्वहूपाणि जिखा योगी 
मूतजयीं मवति । तज्जयात्‌ वद्सादुसारिण्य इव गविः (यथा प्रकृति भूता गावः) 
अस्य संकल्पातुविधायिन्यो भूतप्रजृतयो मवन्ति ॥ ४४ ॥ 

(स्व) तयमफठनिदनीमाह--ततेऽणिमादिप्रादुर्माविः कायसम्पत्‌ 
तद्धमानमिघातश्च । तत्राणिमा को भवति इत्याह-अणुः इति। 
सुहम।दपि सूक्मतरो मवतीब्छातः । तेनाणिम्ना स्ेमनुप्रत्िशति वज्नमपि । 
तथा स्ैस्यादृदयो भवति ॥ 

छषिमा- लघुः ट्धुभ्यः वुढदिम्योऽपि च्धुत्ररः भवति | तेन 
निरारम्बनः सवतो गन्तुं परयापनोति । महिमा-- महान्‌ भवति । आकरभपि 


= 


३०२ पातज्ञर्योगसत्रभाष्यविवरणे 


{ भाष्यम्‌ 1 
प्रा्िः-गङ्गुल्यग्रेणापि खृश्चति चन्द्रमसम्‌ । प्राकराम्यम्‌-इच्छनमिषातः। 
भूमादुन्भज्जति निमज्जति यथोदके । वशित्वम्‌-मृतभोति'कवशी मवस्यव्य- 
शान्येषाम्‌ । इशेखम्‌-तेषां प्रमवाप्ययव्यूह।नामीषटे । यत्रकामावपायितवम्‌- 
सलयसंकल्पता, यथा संकसस्तथा मूतप्रक्ृतीनामवस्थानम्‌ । न च शक्तोऽपि 


¦ पदाथेविपयौपे करेति । कस्मात्‌ १ अन्यस्य यत्रकामावत्तापिनः 


पषैिद्धस्य तथा तेषु पकट्पादिति । एतान्नष्टवेश्वयीणि ॥ 

कायपपरक्ष्यमाणा । तद्धनानमिषातश्च- पृथ्वी मूलय न 
निरूणद्धि योगिनः शरीरदिक्रियां, शिलमप्यनुविश्तीति । नाऽऽपः 
किग्धाः दयन्त । नाभिरष्णो दहति । न॒ वायुः प्रणामी 

[ विवरणम्‌ | 

व्याप्नोति । प्रा्िः-रहस्य एव अङ्कु्यग्रणापि सृशति चन्द्रम्‌ । प्राकराम्पं- 
्रचुरकामे यथेष्टकामो भवति दच्छःनमिषातः । भूमादुनमञगेति निमज्जति च 
यथांकामलात्‌ यथोदके ॥ 

वशितरम्‌-सपैलोकशितवम्‌ । भस्य व्याट्याने भून मौ तिकव्ी भवति 
अवश्य चान्येषाम्‌ । ईंशिखम्‌-तेषां भूतानां प्रमवरबयु इप्ययानाम्‌ उ- 
ततिर्थितिग्रल्यानाम्‌ ईष्टे । यल्तकामावप्रावितवम्‌ -यसिन्‌ कामस्तव तदवसानं 
तदन्ते गच्छति । स्॒यसृकसाद्धेतोः यथा संकसः. तथा भूतप्रकरतीना- 
मवस्थानं भवति ॥ 

शक्तोऽपि स योगी न पदार्थविधर्याप्ं करोति । नभ्रिं सीतीकरेति । 
कल्मात्‌ १ अन्यस्य यत्रक्रामावप्तायिनः पूतैपिद्धस्य परमेश्वरस्य. तथा तेषु 
पदर्िषु विपर्यात्िन संकस्पात्‌ । न हि पद््थविपयांपतं चिकीषमाणस्य पतै 
तिद्धं प्रति विना द्ेषरेण तद्विपर्यासो मवति | तदश्ुद्धयमत्रदिव न पदधय- 
विपर्यासं करोति । कल्याणतराचरणो हि स इति । एतान्यष्ट अणिमव- 
शर्याणि मूतजयाद्भवन्ति ॥ 

कायसम्पदक्ष्यमाणा 1 तद्धमानिभिधातः तेषा भूतानां धर्मैः न 
योगिनोऽमिधाते। मवति । पृथिवी सेन घष्ण सूर्या न विरुणद्धि योगिनः 
कारीरादिक्रियाम्‌ । कथम्‌ ? चिर मप्यनुप्रविशति । नाः लिग्धा योगिने 
दूयनिति वर्षसदतव्युदके तिष्ठन्तम्‌ । नाभिरूणे दहति । न वायुः प्रणामी 


ॐ“ 





71 


1, केषु व- 2. भूषु 


विभूतीपादः वतीयः ३०३ 


[ भाष्वम्‌ | 
| ९ क च, 1. $ 
वहति । अनावरणासकेऽप्याकारो भवलावृतःः सिद्धानामधप्यद्श्या 
भवति ॥ ४५॥ 


[ सूत्रम्‌ | 
रूपरावण्यव्रल्वज्जसंहननत्यानि कायं संपत्‌ ॥ ४६ ॥ 
॥ [ भाष्यम्‌ | 
दशैनीयः कान्तिमानतिशचयवरो वञ्जपहननश्वेति ॥ ४६ ॥ 
[ सूत्रम्‌ | 
ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयाथवच्चसंयमादिन्द्रियजयः ॥ ४७॥ 
[ भाष्यम्‌ ] 


सामान्यविकेषासा शब्दाद्दिविषयः। तेधिद्रियाणां वृत्तिग्रहणम्‌ । 
ने च तस्सामान्यमात्रे प्रहणाकारः । कथमनालोचितः -स्वविषयविशेष 
इन्दरियिण मनसाऽतुग्यवपीयेतेति । 
| विवरणम्‌ ] 
वदति । अनावरणास्मक्रेऽपि प्रकटश्यऽपि भवत्याव्रृतः प्रकटो न भवति । 
तिद्धानामप्यदृयो भवति ॥ ४५॥ | 


रूपलावण्यबल्वञ्जपदननताति कायसषम्पत्‌ । रूपवान्‌ दशेनीयः । 
ठवण्यवान्‌ कान्तिमानतिश्चयबलो वज्जक्तटननश्च भति ॥ ४६ ॥ 


ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयायवकच् पयमादिन्द्रियजयः । सरवैमेतद्रत- 
सत्रेण तुल्यभ्या्परानम्‌ 1 अस्मितामात्रे तु विशेषो भूतानामिव तन्मात्राणि | 
सामान्यव्रेरोषासा शन्दादिर्विषयः । तेषिन्द्ियाणां या वृत्तिः विषथ- 
विशेषव्रलोकनासिका। तत्‌ ग्रहणम्‌ । न च तटामान्पमात्रे शब्दादिपा- 
मन्यामासनमत्रे मन्ति प्रहणकरा्ः उप्यते | कथम्‌१ अनालचितः 
स्वत्रिषयविरेष इन्द्रियेण अनिगृहीते निजो विषयविशेषे मनका कथं 
नु नाम अनुव्यवकीयेत । न कथचिदनुःपव्ीयेन तेमिर्कितेमिति- 
यारेुभ्यवसायानवुग्यवप्ताय।म्याम्‌ । तस्मानेन्द्िपणानालोचिते विषये मना 
अनुन्धवप्तायः | तत्रास्यां व्िरेषासिमकायां वत्तौ प्रथमे संयमः कर्तव्यः. ॥ 
॥ 1. -तक्यः 

2. -दिग्राह्यः ] 

3 षबि- 


३०४ पातञ्ञलखयागसूत्रमाष्यतिवश्णे 


[ भाष्यम्‌ | 
स्वरूपं पुनः प्रकाशात्मनो" सामान्य विशेषयोरयुतसिद्धावयव- 
मेदानुगतंः द्रव्यमिन्दियम्‌ । तेषां तृतीये स्मम्ितालक्षणोऽदकारः तस्व 
सामान्यस्येद्धियाणि विशेषाः । चतुथं रूपं व्यवप्तायात्मकाः प्रका्च- 
क्रिवास्थितिशीठा गुणाः, येषागिन्द्रियाणिं साहकाराणि परिणामः । 
पश्वमं ह्पं गुणेषु यदनुगते पुरषायैवत्तमिति । पश्रस्वेतेषिन्ियस्येषु 
यथाक्रमं सेयमः, तत्र तत्र जयं कृता प्ष्मजयादिन्द्रियजयः 
्राुभ॑वति योगिनः ॥ ४७ ॥ 
[ विवरणम्‌ ] 
अथ स्वर्पं पुनः इन्दियणां द्वितीयं रूपम्‌ । प्रकरश्चात्मनोः 
सामास्यतिरीषयोः तिषिपरपिरेषलेचनमिन्धिया्णां विशेषः । यथा प्रदीपस्य 
घटादिपिशेषाकारलोको विशेषः । प्रकारमात्र सामान्यम्‌ | अतः प्तामन्य- 
वरिरोषासकम्‌ अयुतसि द्वावयवमेदातुगतं द्रव्यमिन्द्रियं प्रदीपघ्रत्‌ । यथा 
सामान्यमूतिंधमेः स्थूलादिष्वनुप्रवतेते, तथेन्दिे प्रकाशासकं दन्यव्िशेषामि- 
कायां प्रहणद्ृत्तावनुप्रवर्तते । तदेतक्षिन्‌ द्वितीये इन्दिषाणां स्वरूपे संयमः 
क्रियेत ॥ 
तेषां श्ियाणं तृतीयं रूपमस्मितारश्रणोऽदङ्कारः। तस्य अहङ्कारस्य 
सामान्यष्येद्द्रियाणि अगुततिद्धाव्रयवमेदानुगत।नि प्रहणरूपान्वयीनि विरेषाः। 
तत्र अक्षिता संयमः करणीयः ॥ 


चतुथ ॒रूपं भ्यवसायात्मकाः प्रकाशक्रियाश्चितिशशीडा गुणाः । 
येषामिन्द्रियाणि साहङ्काराणि परििामः । तत्र युणादुगमे सेयमः करतम्यः ॥ 

पश्चमे रूपं गुणेषु यद नुगतं पुरषाथवखम्‌ । अतः सर्वेषामथवत्वमनु- 
गमश्च पूवत ॥ 

एवं एषु प्चसिन्द्रियष्पेषु यथाक्रम क्रमानतिक्रमेण सयमः । तत 
प्रसेकं पश्चघु जयं कृत्वा पञ्चलख्प्रजयं कमत । तस्मात्‌ पतस्वह्पजयादि- 
न्दरियतदि)जये वक्ष्यमाणफञय प्राुभवति योगिनः। यत्त स्ततः परमा वश्य 
तेद्धियाणाम्‌ ' इति, तद्विषयग्रहणदत्तवेशिमात्र विषयाप्रतिपत्तिरूपम्‌ ॥ ४७ ॥ 

1. -नो बुद्धिसत्वस्व 

2. -तः समूहोद्र 

3. यो, सू. 2.55 


विभूतिपादः चृतीयः ३०५ 


[ सूत्रम्‌ ] ` 
ततो मनोजवत्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च ॥ ४८॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
कायस्यानुकत्तमो गतिरामो मनोजवखम्‌ । विदेहानामिन्दरि 
याणाममिप्रेतदेशकाट्विषयपिक्षो वृत्तिलाभो विकरणभावः । सर्वप्रकृतिवि- 
कारवशितवे प्रषानजयः, इयेतास्तिखः पिद्धयो मधुप्रतीका उच्यन्ते । 
एताश्च करणपच्वण््वरूपजयाद पिगम्यन्ते ॥ ४८ ॥ 


| सूत्रम्‌ | । 
सत््वपुरुषान्यताख्यातिमाक्लस्य सवेमावाधिष्टातत्व 


सवज्ञात॒त्वं च ॥ ४९ ॥ 


[ भाष्यम्‌ | 
निधूतरजस्तमोमरख बुद्धिसखस्य परे वैशारवे परस्यां वशीकार- 
सज्ञायां वतैमानस्य सक्वपुरुषान्यताख्यतिमातरह्पभ्रतिषठस्य सवेमावा- 
पिष्ठातृत्वम्‌ । 


| विवरणम्‌ ] 

ततो मनोजवं विकरममावः प्रधानजयश्च ¦ तत इद्धियजयात्‌ 
कायस्यानुत्तमः न विधतेऽस्मादुत्तम शइयनुत्तमः गरतिलामो मनोजवम्‌ । 
विदेदानां ररीरनियेक्षाणां इन्द्रियाणां अभिप्रेतदेशपिक्षोऽभिप्रेतकाठ- 
पक्षोऽमिप्रेतशचब्दादिविषयपिक्षश्च वृत्तिखाभो विकरणमावः । सैग्रकृदि- 
विकारवशिवं अष्टानां प्रकृतीनां तद्विकाराणां च वरिघं प्रधानजय 
इत्येतास्तिल्लः सिद्धयो मधुप्रतीकाः इति उच्यन्ते । ताश्च प्स्वरूप- 
जयादधिगम्पन्ते ॥ ४८ ॥ । 





सतपुरषान्यताद्पातिमात्रस्य स्वैभावायिष्ठातृखं सवज्ातृतं च । 
सर्वप्रकारेण सताधनन तिधूंतरजस्तमोमरस्य सत्वस्य परे वैशारय 
स्वच्छे स्थितिप्रवहि परे वतेमानस्य परस्यां वशी करसंज्ञायां ज्ञानप्रसादमात्र 
निरतिशये वतेमानस्य सत्वपुरषान्यतास्यातिमनिष्पप्रतिष्ठस्य सर्वमावा- 
चिष्ठातृत्वम्‌ । स्॑स्य वस्य जातस्ये्टे ॥ 





1. -जवित्वं 2. -सूप 
39 


१०६ पातश्नरयोगसूत्रभाष्यविवरणे 


५1. 2 [ माभ्यम्‌ । ८० भ त्य 
सर्वात्मना श्ुणाध्यवक्तायालकाः स्वामिनं क्षत्रजं परत्यशेषध्श्या- 
सतवेनोप्थिता इत्यथैः । परजञातृख स्रीसकानां गुणानां श्ञान्तोदि- 
ताव्यपदेद्यधमेखेन व्य्वस्थितानामकरमोपारूदं विवेकजं ज्ञानामित्यथः । 
ह्येषा विशोका नाम सिद्धिर्या प्राप्य योगी सर्व्ञः क्षीणङ्केशन्धनो 
वशी विहरति ॥ ४९ ॥ 
म] 
तदराग्यादपि दोषबीजक्षये केवस्यम्‌ ॥ ५० ॥ 
1 तवेश प्रयये 
 यदाऽप्येवं मवति शकमक्षये सतरध्यायं उकिवेकरी प्रत्ययो परमः 
संच दहेयपक्ष न्यस्तं पुरषश्वपरिणामो . शुद्धोऽन्यः सादिति । 
एवमस्य ततो विग्ज्यमानस्य यानि रवीज।नि दग्धश।लिवीजकलनि 
प्रतवासमथौनि तानि सह मनका प्रयस्तं गच्छनिति । तेषु पर्छनिषु पुरषः 
पुनरिदं तापत्रयं न भुक्ते । 
॥ ॥ [ विवरणम्‌ | 
-सवास्मना सकटप्रकृतिविकारासना गुणाध्यवस्ता्रात्मकराः बुदधयादि- 
कारणुभावपरिगताध्यव्तायात्काः शान्तोदितानव्यपदेद्यधरममातुप्रसरगिणः स्वामिनं 
क्षेत्रजं दशिमात्रे अर्तेषदुणाः ददयसेन मोग्यतलेन अवस्थिताः छम्यन्ते इलर्थः॥ 
सवज्ञातृतं सवौतमक्रानां शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मतेनावद्थितानां 
गुणानां भक्रमोपारूढम्‌ एककालमात्रि विवेकजं ज्ञानमिलय्थः। इयषा सवैवरि- 
तवसर्वज्ञातृत्वङक्षणा विशोका नाम शिद्धिः । यां प्रप्य योगी स््॒ञः 
्षीणङ्केशबन्धनो विहरति वशी ॥ ४९ ॥ 
तदैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम्‌ । यदा अध्यैवं भवति 
सकषकषस्य सर्वभावानपितिष्ठतः छ ्कभेक्षये विवे #ी सत्वश्य प्रत्ययः । कटश ` 
हयह- सत्वं च टदेयपक्ष न्यस्तं परिामिलाश्चुद्रघत्रिुणत्रादिभिः । 
पुरुषश्च सलरविधमो अपरिणामी शुद्धोऽन्यः सखात्‌ शयनेन प्रकरेण ॥ 
ततः अपि सवैज्ञपपमवाध्यक्षत्रत्‌ विरञ्यमानख याति ्ेशथी- 
जानि अविदवासनारूपाणि दग्धशालिबीजकतसानि प्रपवास्तम्थानि ताति 
चरिता्येन प्रखीयमनेन सह आश्रयेण मनषा प्रयस्तं गच्छन्ति । तेषु 
प्रदीनेषु पुरुषः पुनरिदं तापत्रयं आध्यालिञदिलक्षणं-न सुद्धे ॥ 


1. -स्मानो 2. गुणा व्यवसायन्यवसयात्मकाः 3. विवेकर- 


विभूतिपादः ठतीयः ३०७ 


[ भाष्यम्‌ 1 
ऋ 9 + [> क द पि # 
तदेषां गुणानां मनसि कमेङ्करविपाकस्वरूपेणामिव्यक्तानां 
[1 - +" क क, 4 हष | 
चरिताथौनां प्रतिप्रसवे पुरुषस्याऽऽयन्तिको गुणवियोगः केवत्यं, तदा 


क ५ क 


स्वरूपप्रतिष्ठा चितिशाक्तेरेव पुरुष इति ॥ ५० ॥ 
[ सूत्रम्‌ | 
स्थान्युप८नि)मन््रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात ॥५१॥ 
' [ भाष्यम्‌ 1 
चत्वारः खल्वमी योगिनः प्राथमकसिको मधुभूमिकः प्ज्ञाज्यो- 
तिरतिक्रान्तमावनीयश्चेति । तत्राम्याी' प्रवृत्तज्योतिः प्रथमः । ऋतंभरपरज्ञो 
द्वितीयः । भूतेन्द्रियजयी तृतीयः स्वषु मावितेषु मावनीयेषु ऊृतरक्षावन्षः 
कतेण्व्यतासाधनकान । 
विवरणम्‌ ] 
तदेषां गुणानां मनसि शकरममिपाकस्वरूपेणामिव्यक्तानां चसि- 
थौनां प्रतिप्रसवे श्रव्ये पुरूषप्यात्यन्तिको गुणवियोगः कैवस्यम्‌ । तदा 
स्वरूपप्रतिष्ठा चितिशक्तेरेव पुरषः । तत्र तदैराग्यादपि इव्यपिशन्दाद- 
प्रप्तयेगेश्वय्यापि सम्पग्दरानात्‌ कैवस्यमिति ॥ ५० ॥ 


स्थन्युपमन्त्रण सङ्गस्मयाक्रण पुनरनषए्प्रसङ्गत्‌ । खान स्व 
गादक यषान्त स्थानिना दवा इन्ददयः । तः उपमन्तण भा भ इहाष्यताम्‌ 
इत्यादि । तस्मिन्‌ सत्याःमनो हीनवं स्मरतः प्रप्नुतः सङ्गस्य (अर्थादिति) 
तौ च न कतेन्यो । सङ्घस्मयकरणेऽनिष्टं प्रसभ्येत ॥ 

चतवारः खत्वमी योगिनः-प्राथमकसिको मधुभूमिकः परज्ञाज्येत्िः 
अतिकान्तमावनीयश्च । तान्‌ क्रमेण व्याचष्ट तत्राम्यासी अम्यस्तनरीछः 
्रवृत्तञ्योतिः अयोतिषव्यादीनामन्यतम प्रशृत्तिः प्रवृत्ता यस्य स प्रतृत्त- 
ज्योतिः प्रथमः॥ 


ऋतम्भगपरजञो द्विनीयः । भूतेन्द्रियजयी तृतीयः । स त सर्वेषु ` 


मावितेषु मावनीयेषु स्ना्करतेषु जितेषु च कृतरक्षाबन्धः, उपात्तस्य हि 
रक्षा विधानीया, भावनीयेषु साक्षाव्करणीयेषु कर्तंन्यताप्ताधनवांश्च । 
कर्न्यतायाः साधनानि कर्तव्यतासाधनानि अम्यासतवेरग्यादीनि यस्य सः 
कर्तव्यतसाधनवान्‌ ॥ | 





1, प्रदृत्तमात्रञ्यो- 2. व्यसाधनादिमान्‌ 


/ 


३०८ पातञ्जल्योगसुत्रभाष्यविवरणे 


[ भाव्यम्‌ } । 
चतुर्थो यस्सतिक्रान्तभावनीयः तस्य चिनत्तप्रतिसगे एव एकोऽथः । 
सप्तविधा तस्य प्रान्तमूमिभरज्ञा ॥ 


तत्र मधुमतीं भूमिं साक्षत्कुवैतो ब्राह्मणस्य स्थानिनो देवाः 
सत्व विशुद्धिमयुपहयन्तः स्थानेर्पनिमन्त्रयन्ते “भो इदाऽऽस्यतामिह 
रम्यतां कमनीयोऽयं भोगः कमनीयेयं कन्या रसायनमिदं जरामर्यं 
चाधते वेदायसमिदं यानममी कसदुमाः पुण्या मन्दाकिनी सिद्धा 
महषेय उत्तमा अनुकूला अप्सरसो दिव्ये ्रीत्रचक्षुषी वज्रोपमः कायः 
स्वगुणैः स्वैमिद एुपा्ितमायुप्मता प्रतिप्तामिदमक्षयमजरममरस्थानं 
देवानां प्रियम्‌" इति । एवमभिधीयमानः सङ्गदोषान्‌ मावयेद्धोरेषु संसा- 
राङ्गरिषु पच्यमनिन मया जननमरणान्धकरि विपरिवि्तमानेन कथंचिदा- 
सादितः दवेशतिमिरविनसी योगप्रदीपस्तस्य चेते तृष्णायोनयो 
विषयवायवः प्रतिपक्षा: । स खल्वहं छन्धालोकः कथमनया विषयमृग- 
तृष्णया व्चितत्तस्येव पुनः प्रदीपस्य संसाराभनेएसमानमिन्धनीकयौ- 
मिति । स्वति वः स्वभोपमेभ्यः कृपणजनप्रा्थनीयेभ्यो विषयेभ्य 
इदेव निश्चितमतिः समाधिं मावयेत्‌ ॥ 


सङ्गमक्रृता स्मयमपि न कुयौदेवमहं देवानामपि प्राथैनीय 
इति । स्मयादयं सुध्थितेमन्यतया मृ्युना केशेषु गृहीतमिवाऽऽस्मानं 
न॒ भविष्यति । तथा चास्य च्छिद्रान्तरम्क्षी चिलयं यज्ञोपचयैः 
. प्रमादो छन्धविवरः छशातुत्तम्भयिष्यति । ततः पुनरतिषटप्रसङ्कः । एवमस्य 
सङ्गक्मयावकुर्वतो मावितोऽ्थो दृदीमविष्यति । भावनीयश्वाथोऽभिमुखी- 
भविष्यतीति ॥ ५१ ॥ 


[| विवरणम्‌ | 
यस्तरतिक्रान्तभावनीयश्वतुर्थैः तस्य चिततप्रतिस्सगं एव चित्तप्रख्य एव 
एकोऽथेः परिशिष्टः । सप्तविधा तस्य प्रान्तभूमिग्रज्ञा । तत्र मधुमतीं भूमि 
दवितीयामूतम्भरपन्ञामृमि साक्षच्छुवेतां ब्राह्मणस्य स्थानिना दवाः सत्विञ्युद्ध- 
मनुपएयन्तः स्थानेरूपमन्त्रयन्ते । भाः इत्यादि ब्रासद्धय माष्यम्‌ ॥ ५१ ॥ 


विभूतिपादः तृतीयः ३०९ 


, ( सून्रम्‌ ] , 
क्षणतच्कमयोः सयमादहिवकेजं ज्षानम्‌ ॥ ५२ ।, 
[ भाष्यम्‌ ] 
यथापकरषपयन्त द्रव्य परमाणुरक अपक्रषपर्यन्तः काठः श्ण; । 


यावता वा समयेन विचलितः परमाणुः पतरं जद्यदुत्तरदशम-मिसपचत 
स कालः क्षणः । सतस्य प्रवाहाविच्छेदभाविनः आनन्त्यं कमः । क्षणतक्रम- 
योनास्ति वस्तुसमाहार इति । बुद्धिसमाहारात्‌ बुदहतांहीरात्रादयः। 
[ विवरणम्‌ | 

क्षणतच्रमयांः सयमाद्विषेकजं ज्ञानम्‌ । क्षेण क्रम च स्वयमेव 
विस्तरेणाचष्टे -- तत्र अपक्रषेप्यन्तं यतः परमपकी न शाक्यत कतुं तद्द्र 
परमाणुः । खं लेकवुद्धिविकाव्येतादहेरत्ररुक्षणादपकृष्यपाणात्‌ काखादल्पीयः- 
पतिजिघृन्नया यतः प्रम्‌ अपक्रष्टुं न शक्यते सः अपकर्षपर्यन्तः क[टः क्षणः 
वस्तुभूतः ॥ 

यद्या, यावता समयेन विचलितः परमाणुः प्रं देशे जद्यादुत्तरमभि- 
सप्त स+ काठः क्षणः । पप्रथाऽ्यस्ति (सक्षमोक्षण इल्यः ॥ 

तस्य प्रवाहाविच्छेदभाविनः तस्य क्षणस्य प्रवाहः प्रबन्धः अ्रिच्छेदो 
नैरन्त्थ॑ तथा भवितु शीढे यस्य क्षणस्य प्रवाहाविच्छेदभाविनः क्षणस्य यत्‌ 
आनन्तर्मृ सः क्षणस्य क्रमः । तयोश्च क्षणत्मयोनौस्ति वस्तुसमाहारः 
्षेणक्रमस्यावस्तुखात्‌ क्षणस्य चैकत्वात्‌ नास्ति तयोः समाह।रः समूहः ॥ 


ननु चाप्ठति क्षणतच्करमप्तमाहदे कथं मासप्तवल्रादयः प्रवर्तेरन्निति, 
तदथमाह--बुद्धिसमाहारात्‌ बुद्धिपरिकल्पितात्‌ क्षणतत्रमयो; समाहारादा- 
दित्यादिदेशान्तरसेवन्ध।वव्न्धब्ुद्धि्मुद्धावितात्‌ युहूताहोरात्रादयः । ततश्च 
बुद्धिस्यित एष भदः ॥ 

यो हि प्रसनक्तमानप्रव्ययश्रवाहिमानसः एकाध्रमुिप्रिष्ठिचितचक्तस्वः, 
तस्य स्यपि काठानुमवे क्षणयुगसहस्लयेस्तुल्यता । नैवे व्युधितचित्तस्य । तथा 
स्वप्रेऽपि षटिकामात्रेण बुद्धिपरिकिल्पितं योजनसहलमनेकं संवपरेणेव [गन्तव्यं] 
गच्छति । तस्मादयुद्धिमैचिन्यनिर्मित एव्र काठप्तमाहारः | 

1. परमाप- 2. मुपस्षपद्येत 3. तस्मवादाविच्छेदस्वु क्र 


4. अत्र आदशकोओे इत उपरि “्राह्योपरक्तः?” इत्यादि वाक्यं लिखितम्‌ 
तस्यानन्वयात्‌ , 13. पुरेभ्यः पूर्व दिखितं “कालः क्षणः सर्वथा” इत्यादिवाक्यं योजितम्‌॥ 


३१० पातञ्ञखयोगसूत्रमाष्यविवरणे 


१ { ६ क (५ € 
स॒ खल्वयं कालो व्तुदयूःयो' शुद्धिनिमाणः शब्दग्धमानुषाती 
च (५ (| 


किकानां व्युदितदशैनानां वस्तुस्वरूप इवामास्ते ॥ 
क्षणस्तु वस्तुरूपः क्रभावरुम्बी । क्रमश्च क्षणानन्तयासरा । 
[ विवरणम्‌ | 

यस्य तु त्रियाग्यतिरिक्तः काठः निव्यो विमु, तस्य चिरक्षिप्रताधपि 
क्रियामत्रे पर्थवसितत्वात्‌ प्रथक्ताङस्तिति न लिङ्ग घटते । नियतपसिमाणा हि 
क्रिया अनवगतपसिणाया; क्रियाया छन्नणम्‌ । यथा आ गोदोहनं स्वपिति । 
जआ जदनपाकमधीते इति| सण च कालः | न कि नित्यस्य विभोः 
तस्य कूटस्थस्य अप्म्बन्धलात्‌ वस्वन्तरपरिच्छेरकःवं प्रस्थादिबदुपप्ते ॥ 

क्रियावान्‌ कारुः परिच्छेदकः श्रध्थादिवदिति चेत्‌, तस्यापि 
क्रियावच्तरात्‌ क्रियावतश्च परिच्डेदनीयत्रादन्येन क्रियावता पचठिदकेन कठेन 
भवितन्यम्‌ । तस्याप्यन्येनेत्यनवस्थाप्रसङ्ग; | क्रियावखाचानिलयघ्वमपिं प्रसम्येत ॥ 

अथ स्वव्यापरेणेव कारः परिच्छेदनीयकं यायादिति चेत्‌ , अन्येऽपि 
स्वन्यापरिणेव पर्छिधा इति काटप्रृथक्यकंल्पना निरर्थिका । तथा च क्रिय. 
वास्तु काठः ॥ 

अथापि सद्धा्मत्रेण कालः परिच्छेदक इति, पप्रषामपिं सद्भाव 
विंहेषादेवं प्रसक्तम्‌ ॥ 

करियाकारपक्षेऽप्येष त्रिकस्पः प्राप्त इति चेत्‌ -न, क्रियायाः सवप्रसिद्ध- 
त्वात्‌ । परच्छिदकलस्य च आ गोदोहमास्ते इत्यादिषु सिद्धत्व क्रियैव परि- 
च्छेदिका रम्यते, नापरः कारः परिच्छिदक इति | चिरं क्षिप्रमिति च प्रयतन- 
मन्दिमपाटवकृतः प्रत्ययो न व्यतिरिक्तिकाटनिबन्धन इत्याह -- स॒ खत्वयं 
काठः सेबत्सरादिरू ग वस्तुश्यन्थो बुद्धेनिर्मागः बुद्धया निमौपिष्वते ॥ 

शब्दधमनुपाती ब्ुटिनिमेषाहोरात्रादिशब्दविकल्पानुप्रवतीं । ठोकिका- 
नां व्युत्यितदरोनानां वस्तुस्वरूप इवाभाषत । क्षणस्तु वस्तुरूपः वास्तविकः" 
तदुद्रव्यान्यथालेनावुमी पमानः क्रमावरुम्बी । क्रमश्च क्षणानन्तयीसा क्षण- 
प्रवाद।विच्छदु द्धिनिमित्तः ॥ 


1. -न्योऽपि 2. ज्नानानु- 3, वस्तुपतितः 
` 4. अत्र आदर्शकोश्ञे इत उपरि “५अन्तराभावः? इत्यादि वाक्यं छिकितम्‌ | 
तस्यानन्वयात्‌ , 20, पुटेभ्यःपूत् दिखते “"तदुदरर्थान्यथात्वेन"” ईइत्यादिवाक्वं योनितम्‌॥ 


विभूतिपादः तृतीयः ३११ 


[ भाष्यम्‌ ] 

तं कारविदः कार इत्याचक्षते गोमिनः । नच द्रौ क्षणो सह मवतः। 
क्रमश्च न द्योः, सदभुवोरसंभवात्‌ । पूस्मादुत्तरस्य माविनो यदानन्तर्यं 
कणस्य स क्रमः । तस्माद्रतैमान वेकः क्षणो न पूर्जोत्तरक्षणाः सन्तीति । 
तस्मान्नास्ति तत्समाहारः । ये तु मूतमाविनः क्षणास्ते पर्णि 'माक्ितया 
व्याल्येयाः । तेनैकेन क्षणेन कृस्नो रोकः परिणाममनुभवाते । तसक्षणो- 
पाषढाः खलमी स्वे ध्मः । तयोः क्षणतत्तमयोः सेयमात्तयोः पक्षा - 
त्करणम्‌ । ततश्च विषेकजं ज्ञानं प्रादुभवति ॥ ५२॥ 


[ विवरणम्‌ |] 

त क्षणे कालम्िदः काठ इलाचक्षते योगिनः । न च दौ क्षणो सद 
भवतः, ययोः समाहारः कर्प्येत । एकस्मिन्‌ धमिणि सदजन्मनोः क्षणयो- 
रसमव्रात्‌ । जायमाने हि चैत्र एकस्मिन्‌ क्षणे जायते । न तन्न दरो क्षणी सह्‌ 
मवतः। करश्च न द्योः । कस्मात्‌? दयोः क्षणयोः सहभुवोरसम्भवात्‌ ॥ 


पू्समादुत्तरस्य भाव्रिनो यदानन्तर्यं क्षणस्य स क्रमः । यथा 
पिण्डदुत्तरमाविनो घटस्य यदानन्तर्य स क्रमः | न हि चक्रान्तरस्थस्य मृषिण्डस्य 
चक्रान्तरस्यगृधिण्डजनितो घ्रटः क्रमे वतेते । तस्मादर्तमान एवैकः क्षणः । न 
पर्वोत्तरावतीतानागतै स्तः पवोत्तरयार््मिस्वरूपमात्रत्रात्‌ । धर्मा च वर्वमान- 
क्षणाहूढ एव । तस्मान्नास्ति तत्समाहारः क्षणतत्कमसमाहारः ॥ 


ये तु भूतभाङ्िनिः अतीतमविष्यन्तः क्षणाः ते घर्मिणः प्रिणामा- 
सितया धरपिपरिणामविक्षया व्याख्येयाः । तेनैकेन क्षणेन ङस्स्नो ठोकः 
परिणाममनुमवति । तस्षणेपाहढाः वर्वमानक्षणेपारूढाः खल्वमी सवै 
धमाः पवैपदा्थाः | 

यदुक्तमतीतक्षणस्य नास्ति क्रम इति, त्येतत्‌ प्रयोजन, तक्कमक्रम- 
प्रतिषेधः । क्षणक्रमक्रमे हि तति क्षणक्रमस्य वस्तुं प्रपतज्येत । वस्तुनो हि 
करम इति । ततश्च क्रपतस्षणयोः सेयमादिति नोपंकल्पेत । तत्मात्‌ 
एतयोः क्षण[तत्‌ |करमयोः यमात्‌ तयोः साक्षारणम्‌ । ततश्च विवेकजं 
सानम्‌ । क्षणतत्रमा्किता एव हि सवै पदाथा इति तानशेषान्‌ वितिभ्य 
विजानाति ॥ ५२ ॥ 





1. -मान्विता 


३१२ पातञ्ञख्योगसूत्रभाष्यविवरणे 


[| भाष्यम्‌ | 
तस्य विषयविशेष उपक्षिष्यत- 
[ सूत्रम | 


जातिलक्षणदेशेरन्यताऽनवच्छेदात्‌ तुल्ययोस्ततः 
प्रतिपत्तिः ॥ ५३ ॥ 
[ माष्यम्‌ | 
त॒स्ययोदेशलक्षणतारूप्ये जतिभदोऽन्यताया हेतुः, गौरयं वडवे- 
यमिति। तुल्यदेशजातिसे रक्षणमन्य 'त्वावच्छेदकरं, कालाक्षी गौः खस्ि- 
मती गोरिति । द्रयोएमठ्कयोजातिटक्षणसारूप्ये देराभदोऽन्यत्वकरः, 
इदं पू्ैमिदयुत्तरमिति । यदा तु पूर्मामलकमन्यव्यग्रस्य ज्ञातुरुत्रदेश 
उपावरतेते, तदा तुल्यदेशते पूरमेतदुत्तसेतदिति प्रविमागानुपपत्तिः। 
असेदिरषेन च तचन्ञनेन भवितव्यमिलयत्‌ इदयपुक्त, ततः प्रतिपत्तिमिवेकज- 
ज्ञनादिति॥ 
| विवरणम्‌ | 
तस्य विवेकजस्य ज्ञानस्य कटश ज्ञेयमिति तस्य विषयविशेषः 
उपक्षिप्यते--जातिरक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात्‌ तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः । 
[तल्ययेर्दशलक्षणप्तास्प्ये ] जातिभेदः पदाधौनाम्‌ अन्यताय्‌।; अन्यलवावच्छे- 
दस्य हेतुः । यथा- गौरि बडयेयमिति ॥ 
यत्र जात्तिभेदो नास्पेेव जातिः; तत्र तुस्यजातिते रक्षणं लिन्गम्‌ 
अन्यलावच्छेदकरम्‌-कालक्षी गौः, स्व्िमती गोरिति ॥ 
यत्र न जातिभेदे नापि लक्षणभेदस्तत्र देशभेदोऽन्यघरवन्छेदहेतुः । 
यथा--द्रयोरामछकयेजातिरक्षणपररूप्ये देशमेद)ऽन्यखक्ररः इदं पूर्वम्‌ 
आमलकम्‌ इद पुत्तरमिति ॥ 


यद्‌ तु पूषैमापलकम्‌ अन्यव्यत्रस्य समकुलितचित्तप्य ज्ञातुरुत्तरदेशं 
उपावर्तते पषेदेरे चेतर, तदा तुस्यदेशषे पूरैमेतदुत्तरमेतदिति वल्ययोः 
प्रविभागानुपपत्तिः । असन्दिर्धेन तच्छज्ञानेन भवितव्यं, जयस्य 
वरिचमानत्वदेकषूपस्य इयत इदमुक्तं ततः प्रतिपत्तिविंवेकन्ञानादिति । 
क्षणतत्करमस्षयमापादितपिवेकजन्मनो ज्ञानात्‌ प्रतिपत्तिरिति ॥ 





1. -त्वकरं 


विभूतिपादः चृतीयः ३१३ 


[ माष्यम्‌ | 
कथं ? पूर्वामल्कसदक्षणो देश उत्तरामर्कसक्षणादशात्‌ भिन्नः । 


ते चाऽऽमलके स्वदेशक्षणानुभवभिन्ने । 


अन्यदेशक्षणानुभवस्तयोरन्यत्वे हेतुरिति । एतेन दृष्टान्तेन परमाणो- 
स्तुल्यजातिलक्षणदेशस्य पूत्रैपरमाणुरेशसदक्षणपाक्षाककरणादुत्तए्परमाणो- 
स्तद।शापवृतावुत्तरस्य तदेशानुमवभमिन्नः क्षणः । क्षणमेद त्तयोरीश्वरस्य 
योगिनोऽन्यत्वभ्रययो मवतीति ॥ 

अप्रं तु वणेयन्ति-येऽन्ला विशेषास्तेऽन्यतप्रयवं इषेन्तीति । 
तत्रापि देशरक्षणभेदो मूर्तिन्यवषिजातिभेद थान्यस्वे दैेतुः । क्षणमेदस्तु 

[ विवरणम्‌ ] 

तत्‌ कथम्‌ पूर्वामठकपद(र)क्षणो देशः पूवीमक्कसहचरो देशः 
उत्तरामटकसह(ख)क्षणात्‌ उत्तरामल्कसह चरात्‌ देशात्‌ भिन्नः । ते चामलकर 
पूर्वोत्तर(क)श्षणपह चस्ति स्वदेश(क)क्षणातुभवभिन्ने स्वदेरचिद्धभूते यः 
क्षणः तदनुमवापरने स्वेदेश(र)क्षणानुमवचिहिते अन्यदेश(ट)क्षणानु- 
भवस्तयोरन्यते हेतुरिति ॥ 


अनेन दृष्टान्तेन परमाणोरतुल्यजातिरक्षणमेद देशस्य पूपरमाणु- 
देशसद(र)क्षणसाक्षाकरणात्‌ पृवपरमाणुदेशेन सह भूतस्य (ख)श्रणस्य 
साक्षत्करणात्‌ उत्तरपरमाणोस्तदेशापवरतो पूरवदेशगतावपि उत्तरस्य तदेशानु- 
भवमिन्नः क्षणः । क्षणमेद्‌त्तयारौश्वरस्य योगिनोऽन्य(था)तभ्रययः 
भेदावच्छेदे। भवति ॥ 

ञत्रापरे वणेयन्ति- ये अन्त्या विकेषाः परमाणुगता निद्याः, ते एव 
अन्यताप्रत्ययं कुर्वन्तीति कि ततक्षणतत्रमक्तयमेन । यथा षटादिगता विशेषा 
अन्यतप्रल्यये कुर्वन्ति, तथा परमाणुगता ये पिरेषाः त॒ एव तद्भावप्रलय 
स्वकद्भावप्रत्ययं च कुर्वीरन्‌ | आश्रथमेदभ्रल्ययमपि कुन्ति ॥ 


अनोच्यते--देशलक्षणभेदो मूरतिव्यवधिंजातिभेद.शान्यसरे हेतः 


उक्त एव स्थूलेषु (न तु) ननु परमणुप प्रतिक्षणपशगिाप्िात्‌ । अप्रस्थितेषु 


हि विरोपेष्वन्येशर स्यादन्यथा ऽतरधारणम्‌ । न चानवरतपररेणामेडु षठ्ते ॥ 


1. -शानुपपत्ता- 2. -भवो 3. सदक्चणमेदा 
40 


\ ~~ 


३१४ पातञ्ञल्योगसूत्रभाष्याविषरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
योगिबुद्धिगम्य एवेति । अत उक्त- मूर्विव्यवधिजातिमेदामावान्नास्ति 


(~ (न © 


मूटप्रथक्स्वामति कवाषगण्यः ॥ ५३ ॥ 
| सूत्रम्‌ ] 
तारकं सर्वविषयं सम्रथाविषयमकरमं चेति विवेकजं 


[नम्‌ ।॥ ५४ ॥ 
[| भाष्यम्‌ ] 
तारकमिति सख्प्रतिमोद्थमनोपदेशिकमिलय्थः । सर्वविषयं, नास्य 


रवि > [के [4 [क ४ 


कचिदविषयीमूतमिलथंः ॥ 


[ विवरणम्‌ ] 
यदा पूत्रः परमाणुरुत्तदपरमाणुदू्येण परिणमते, पूत्रपरमाणुल्येण 
चोत्तरः) तत्रावस्थितान्त्यविशेष।मावाद्विवेकप्रतिपत्तिरनुपपनना । तत्रावश्यं 
क्षणतत््रमस्तयमजनितविवेक्ञानदेव संप्रतिपत्तिः । अनिलयाश्च परमाणव इति 
श्युक्तम्‌ । तस्मात्‌ क्षणमेदस्तु योगिबुद्धिगम्य एव ॥ 


तया चनिलयवस्य परमाणूनामाचा्य॑न्तरमतप्रतिपादनद्रेण प्र 
दरयति--अत उक्तम्‌-मूरतिव्यवधिजातिभेदामावात्‌ नास्ति मूल(नाति). 
पथक्तमेति व।षेगण्यः | यथा प्रतिक्षत्र प्रधाननुहुखं न्यायविरुद्धं मूर्ति- 
ग्यवधिजातिभेदभावात्‌ प्रधानानां पृथक्लम्‌ एकपुरुषाचंदरथवत्‌ अनुपपन्नम्‌ , खं 
प्ररमाणूनामपि मूते प्रृथक्वं नोपकल्पते । ततश्च एक्रं मूरपिति प्राप्तम्‌ । न 
परमागुभेदो हिं नियो युक्तः । परमाणूनां च मूतत्वात्‌ रूपादिमच्ाचच 
अनिलं षटादेबदेवेति ॥ ५२ ॥ 


तापकं सर्वविषयं सर्वथाविषयम्‌ अक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम्‌ । 
काष्ठप्रा ज्ञानं देवषिगन्धवादानाम्‌ | ' तारकमिति । विवेकजमिदमुच्यते स्वप्रति- 
भोद्थमनौपद शिकमिथेः । नन्यनेपदेष्ट शम्य, नाप्युपदेशनं यथावत्‌ प्रदी 
शाक्यते । यस्मात्‌ तत्‌ सवैवस्तविषयम्‌ । नास्य रंचिदविषयीमूतम्‌ । 


श 


1. अनत्र अदशक्रीशे इत उपरि “पदेव्यं स्पम्‌ 22 इत्यादि वाक्थं 
टिखितम्‌ । तस्यानन्ययात्‌ , 4. पुरेभ्यः पश्चात्‌ लिखित °तारकमिति । विवेकजं” 
त्यादि वास्यं योजितम्‌ ॥ 


विभूतिपादः दृतीयः ३१५ 
| भाष्यम्‌ | 
सवेथावियमतीतानागतप्रस्युखन्ने सवपयोयेः सवधा जानातीययः। 
अक्रममिलेकक्षणोपाद्दं सव सवथा गृह्णतीयथः । 
एतद्विविकजं ज्ञाने परिपूर्णम्‌ । अस्येवांसो यागप्रदीपो मधुमतीं 
मूमेमुपादाय यावदस्य परिसमात्तिरिति ॥ ५४ ॥ 
प्रप्तिवेकजज्ञानस्याप्राप्तिविवेकजज्ञानस्य वा- 
[ सूत्रम्‌ | 
सत्वपुरषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यमिति ॥ ५५ ॥ 
इति श्रीमहूर्षिपतज्ञटिविरचिते योगसूत्र 
तृतीयो विभूतिपादः ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
यदा निधूतरजस्तमामर बुद्धिसत्वं पुरषान्यताप्रययमात्र दगधङ्केथ- 
भीजं मवति, तदा पुरषस्य शुद्धिसारुूप्यमिवाऽऽगन्नं भवति, तदा पुरुषस्यां 
प्रचरितिमोगाभावः शुद्धः । एतस्यामवस्थायां केवलस्य मवतीश्वरखानी- 
[ विवरणम्‌ 1 
सर्वेथाविषयं च सर्वेम्‌ अतीतानागतप्रस्युसन्नं सर्वैपयायैः सवै 
निरोषणेः सर्वैथा सत्रण प्रकरेण जानाति । अक्रमम्‌ एकक्षणोपाहूढम्‌ । 
एकासिमन्‌ क्षणे स्व सवेथा गृह्णाति । नास्मदादिवत्‌ क्रमेण ॥ 
तत्‌ एतद्विवेकजं ज्ञानं परिपणम्‌ , अस्येवं यागप्रदीपः । स एव 
्ानांशो योगश्च प्रदीपश्च. । योगस्य वा प्रदीपो योगप्रदीपः । मधुमतीं 
मूमिमुपादाय आरम्य यावदस्य विवेकजस्य ज्ञानस्य परस्सिम्‌।्ि; तावत्‌ । 
विवेकजज्ञानपरिसमापिपर्यन्तानि ज्ञानानि मनोजव्खादियुक्तानि अस्यैवांशः॥५४॥ 
योगजे ज्ञानैशर्थै अतिक्रान्ते परिसमापिते च । नातः परं योगज्ञानमैश्वय 
च । तद(दु)पक्रमणाच प्रपिन्ननैश्ववस्यैव तद्ैराग्यानन्तरं कैवल्यमिति प्राप्तमिति 
जह-प्रहविवे$न्ञानस्य [अप्राप्तविवेकज्ञानस्य वा] बाद्यदर्राननिदतौ 
केवल्यम्‌ । कथमि ? सपुरुषोः शुद्धिषाम्य केवद्यपिति ॥ 
यद्‌ा तिधूपरजस्तमोमटं पुरूषान्यताप्रस्ययमात्रम्‌ अन्यतामात्नप्रलय- 
वैमवयुक्तं दग्धञ्केशबीजं विनिदृत्ताविय भ्र्यवरातनाल्पं बुद्धिपस्ं भवति, 
तद्‌ा पुरुषस्य युद्धिषाषूप्यामिव।पन्नम्‌ ॥ 


1. -श्रधिकार 





३१६ पातञ्जटयोगसूत्रभाष्यविवरणे 


| भाष्यम्‌ | 
शरस्य वा विवेकजज्ञानमागिन इतर्य वा । न हि दग्धङ्केशवीजस्य ज्ञनि 
पुनसक्षा काचिदस्ति । सक्शुद्धिद्वारेणेतत्समाधिजमैशर्य ज्ञानं चोप- 
न्तम्‌ । परमाथतस्तु ज्ञानाददशेन निवतते, तस्िन्निधृते न सन्द्युत्तरे 
ङेशाः । शामावात्‌ कमेविपाकामावः । चरितिधि काराश्चतस्यामवस्थायां 
गुणा न पुरुषस्य पुनद्दयतेनातिष्ठन्ते । तत्‌ पुरुषस्य केवस्यं, तदा पुरुषः 
स्वरूपमात्रज्योतिरमठः केवलीमवति ॥ ५५ ॥ 
इति श्रीपातञ्जञल्योगसूत्रभाष्ये श्रीमद्वेदव्या सकते 
॥ बिभूतिपादस्तृतीयः ॥ 
| विवरणम्‌ | 

यद्यपि त्रिगुण पुरुषविलक्षण, पुरुषश्च तरिखन्नणः, तथाऽपि पृरुषान्यता- 
परलयपरिणामिलात्‌ शुद्धिारूप्यमिवापन्नम्‌ ह्युच्यते । एतस्यामवस्यायां 
केवत्य भतताश्वरस्यनश्विरस्य वा, वरवकज्ञनभागिनः इतरस्य वा । यस्मादु 
भयोरतिधानिदृत्तिरेव कारणं तस्मात्‌ । नहि द्ग्धङ्केशबीजस्य ज्ञाने काचिदपेक्षा। 
यतः सम्य्द्ं सव त्रिगुणमितिं मन्यते, त्रियुणश्च प्रत्ययो हेय इति, 
मधुमत्या्टज्ञाने तस्य न कदाचिदप्यपेक्षा ॥ 

यत्त॒ येगज्ञानमैशवध॒चेक्तं, तत्‌ सम्य्द्नायीनुक्रान्तसचुद्धि 
पदमार्गेण प्रक्रान्तमानुप्गिकम्‌ । परमाथेतस्तु ज्ञानाददशैनं विनिवतैते। 
तस्मिन्‌ विनिवृत्ते न सन्दयुक्तङ्कशाः असितादयः । तेषामवकषित्रलात्‌ । 
डेशामावाच् कमिपाकामावः ^" ्श्मूढः' कमीशयः"' «सति मू 
ताद्वेप।कः इतिं ह प्रतिपादितम्‌ ॥ 


तस्मात्‌ सम्यण्दशनायपेवेदं शासनम्‌, न ज्ञानैश्वषविभूतिप्रयोजनम्‌ | 
चरिताषिकार।चेतस्यामवस्थायां गुणाः । न पुरुषस्य पुनर॑श्यतेनातिष्ठन्ते। 
तत्‌ पुरुषध्य कैवस्यम्‌ । तदा पुरषः स्वरूपमत्रिञ्यातिः इति अमरः 
केवर्छभवति इति । इतिशब्दः समाप्लयथः ॥ ५५ ॥ 
इति रश्वगो विन्दभगवलपूञ्यपादक्चिष्यस्य परम स्परि्राजक। चा येस्य 
श्रीश्चङ्करभगवतः कृतौ 
पातञ्जल्योगसूत्रभाष्याचवरण 
॥ विभूतिपाद्स्वृतीयः ॥ 


1. यो. सू, 2.12 2. यो, सू, 2-13 


श्रीः 
॥ पातञ्जर्योगसूत्रमाष्यविवरणम्‌ ॥ 
॥ चतुथः केवर्यपादः ॥ 
[ पातञ्जल्योगसूत्रम्‌ ] 
जन्मोषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः ॥ १ ॥ 
[ व्यासभाष्यम्‌ ] 


देहान्तरिता जन्मसिद्धिः। ओषपिभिरसुरमवनर रसायनेनयेवमादिः। 
[ विवरणम्‌ | 

प्रथमे पद्व समाधिः प्राधान्येन निर्दिष्टः । दहितीये तत्साधनानि व्याष्या- 
तानि । तर्तीये तु सम्यग्द्ीना्धयोगाङ्गाुष्ठानानुषङ्गजज्ञानै शच्यनुक्रमणं कृतम्‌| 
तच्च सव॑ दुःखस्येति जेगीपन्याद्यानेन प्रतिपादितम्‌ । दुःखहाने च।घयन्तिक- 
गुणोपरम इवयुक्तम्‌ । तथैव ^“ तद्ैराग्यादपि' दोषबीजक्षये कैवल्यम्‌ ” 
्राप्ठविवेकक्ञानखाप्राप्तविवेकन्ञानखवा “सच्पुरुषयोः शुद्धिसाम्ये 
कैव्रत्यम्‌ '” इ्यनन्तरमुक्तम । तच्च कैवल्यं प्रतिपक्षनिवतैनेन प्रतिपादनीयमि- 
तीदं कैवल्यपादानुक्रमणे क्रियते ॥ 


तथा अनेकजन्मान्तरोपार्जितवाप्तनेच्छेदध्रकाराश्च प्ैवल्याथमेव प्रद- 
नीयाः । तथा कैवल्योपयोगिसम।पिस्िदिस्तुलय्ं पूरतरानुक्तं सिद्धषन्तरं प्रक्रियते । 


{~ (~ (५ 


तुल्यजातीयानामन्यतमनिन्दनेनान्यतमस्तुतिभवति । “तत "ध्यानजमनाशयम्‌? 

'कमशुङ्काङृष्णं योगिनसिविषमितरेषाम्‌"' इमि वक्षयमणिन स्तुलथैता 

आविष्करिध्यते ॥ 
जन्मोपधिमन्तरतपस्समाधिजाः सिद्धयः । देहान्तरिता यथा येगा- 


दिन। देहान्तरेष स्गादिषु जन्मिद्धिः । ओषधिभिरसुरमवनेषु रसायनेन 





३१८ पातञ्ञटयोगसृत्रभाष्यविचरणे 


भाष्यम्‌ | 
मन्यैराकशिगमनाणिमादिराभः। तपसा संकलसिद्धिः, कामरूपी यत्र 
कामगमन इयेवमारिः । समाधिजाः षिद्धया व्याख्याताः ॥ १ ॥ 
तत्र कायन्द्रियाणामन्यजातिपपरिणतानाम्‌-- 
। सूत्रम ] 
जात्यन्तरपरिणामः प्रद्त्यापूरात्‌ ॥ २ ॥ 
[ भाष्वम्‌ | 
पूत्व॑परिणामापाये उत्तपरिणामोपजनस्तेषामपूवीवयवानुप्रवेशेनः 
भवति । कायेन्द्रियकरृतयश्च स्वे स्वं विकरारमनुग्रहन्यापरूण धर्मादि 
निमित्तमवेक्षमाणा इति ॥ २॥ 
( सूत्रम | 
निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकबत्‌॥३॥ 


| [{ विवरणम्‌ | 

सोमामलकादिभक्षणेन पृषदेहानपनयनैव । मन्त्रैः उपनजप्यमनिः आक्ाश्च- 
गमनादि । तपष्ा संकल्सिद्धिः कामहूपी यत्र कामगमन इव्येवमादिः । 
समाजाः [तद्धयः पूवत व्यास्पतिाः॥ ^ ॥ 

तत्र सिद्धिः कायक्ररणानापुत्षेः | जन्मिद्धो तु पतितपूर्वोपार्जित- 
काथकरणस्य रारीरान्तरमुपादातरिष्यत इति नास्ति तत्र संशयः | अपतित- 
दायीरस्य तु जात्यन्तरपर्णिमे कि तदेव का्यकरणमुपादानमुतन्यदपीति-- 
तत्र कायेन्द्रियागामन्यजातिषर्णितानां-जालन्तरपरिणामः प्रकृयापूरात्‌ ॥ 

पु्वैपरिणामापाये समवस्थितानामेव पू्कार्यकरणानाम्‌ उत्तरपरिणामोप- 
जनः अपू्वीवय्रवानुपरवेश्ेन भवति । कस्मात्‌ 2 अल्पपस्मिणस्योषादानस्य 
मह प्रसिमाणक्राय।नुण्पत्तेः । न हि दरपलत्तपनीयप्िण्डादसीतिपडा पत्री 
जनिष्यते ए 

कायन्द्रियप्रकरेनयः स्वस्व विकार कायमेन्धयं वा अनुगृहन्त्या- 
पूरेण षर्मारिनिित्तम्‌ अदिगप्रइणादयभमपि निमित्तम्‌ अपेक्षमागाः ॥ 


+ 


धर्मादिनिमित्तमपेश्रमाण।ः स्वं खं त्रिक्रारमनुगरहन्ति इत्युक्तम्‌ । तत्र 
कि धर्मदिनिवित्तं प्रकृतीनां प्रयोजकं, रिं वा नेति, तदाह- निमित्तमप्रयोजकं 





1. यत्रतत्र 2. जातीय 3, शद्ध 


कैवल्यपादः चतुथः ३१९ 


[ भाष्यम्‌ || 

न हि पर्मादि निमित्तं श्रयोजकं प्रकृतीनां भवति । न क्यिण 
कारणे प्रवर्य॑त इति । कथं तर्हि? वरणभेदस्तु ततः कषेतरिकवत्‌। यथा क्षत्रिकः 
केद।रादपां पृणाक्तेदारान्तरं पिद्ावयिषुः समं निम्नं निघ्नतरं बा नापः 
पाणिनाऽपकरषैति, आवरणं "तु तासां भिनत्ति । तस्मिन्मत्ने स्वयमेवाऽऽपः 
केदारान्तरमाछ्ावयन्ति, तथा धर्मः प्रकृतीनामावरणमधर्म भिनत्ति, 
तस्मिनिभन्ने स्वयमेव प्रकृतयः स्वं स्वं विकारमाघ्मव्यनिति । यथावा स 
एव क्षेत्रिकस्तस्मिन्नेव केदारे न प्रमवत्योदकान्भोमान्वा रसान्धान्य 
मूलान्यनुप्रवरयितु, ॐ तरिं? पुद्तिन्दुकगगवीथुकृह्यामाकादींस्ततोऽ- 
पकरति । अपकृषटेषु तेषु स्वयमेव रसा धान्यमूलान्यनुप्रविदन्ति, 


[ विवरणम्‌ | 


प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्ेतरिकवत्‌ । न दहि पमीदिनिमित्तं प्रयोजकं 
प्ऱतीनाम्‌ । कस्मत्‌? न हि केण धर्मीदिना निमित्तेन कारणं 
कार्यकरणप्रापिख्यं प्रवर्य॑ते ॥ 
कथं तहि १ वरण॑मेदस्तु ततः धममदिनिमित्तात्‌ भवति । क्षेत्रिकवत्‌ । 
यथा क्षत्रिकरः केदारादपां पणात्‌ केदारन्तरं वि्ावयिषुः नापः पाणिना 
[क ॐ = | 


अप्रकषति। आवरणं तु तातां भिनक्ति। तस्मित्‌ भिन्ने स्वयमेव।ऽऽपः 
केद्‌ारान्तरमा्वयन्ति ॥ 


तथा धर्मैः प्रकृतीनामावरणमधद भिनति । धपमधरमऽपि 
मिनस्यात्ररणम्‌ । तकिन्‌ मिन्ने स्वयमेव प्रकृतयः घं स्वं विकारमापरव- 
यन्ति पूरयन्ति ॥ 


यथावा स ए क्षेत्रिरस्तसिमक्नेव केदी न प्रमवदयौदकान्‌ 
म।मान्‌ वा रतान्‌ धान्यमूलान्यनुप्रवशचाथतुम्‌ । कतु मृद्रतिन्दुकगवी 
यु कदधामाक्रादान्‌ तस्मात्‌ धान्यमूढात्‌ अपक्रषेति । अपकृष्ट तेषु स्वयमेव 
रपा षान्यमूलान्यनुपरविश्चन्ति ॥ 


[षि षाक णि न 


1. त्वाशं 2. गवेधुक 


३२० पातञ्जटयोगसूज्रभाष्यविचरणे 


[ भाष्यम्‌ |] 
तथा धरम निवृत्तमात्रे कारणमधर्मस्य, शुद्धयञ्ुघोरलन्तविरोधात्‌, न तु 
प्रकृतिप्रवत्तौ धमो देतुमैवतीति । अत्र नन्दीश्वर्रभृतयः उदाहार्याः । 
विपथयेणाप्यधर्मो पम बाधते । ततश्व्चुद्धिपरिणाम इति । तत्रापि 
नहुषाजगरादय उदाहायीः ॥ ३.॥ 
यदा तु योगी बहून्कायाज्निमिमीते, तदा किमेकमनस्कास्ते भवन्य- 
थनिकमनस्का इति- 
[ सूत्रम्‌ | । 
निमाणचित्तान्यस्मितामाच्रात्‌ ॥ ४ ॥ 
~ . {~ = ~ (> _ न~ 
अस्मितामात्रं चित्तकारणमुपादाय निमौणचित्तानि करोति, ततः 
°सचित्ताः भवन्तीति । ४ ॥ 
ह [. विवरणम्‌ रः 


तथा धर्मां निवरृत्तिमात्रे कारणमधर्मस्य । अधर्मोऽपि धमेस्य | 


प 
॥ 
क अ (०५ चहु) = ०५ र अ (न 


शुद्धवश्ुद्धयोरव्यन्तव्रिरोधात्‌ । न तु प्रकृतिप्तृत्तो घर्मा हेतुरभवतीति ॥ 
सव्र नन्दीष्रप्रमृतय जदाहायाः । मिपर्ययेणा(प्याधरमो धर्ष 
वाधते । ततश्वाङुद्धिपर्णिाम इति । अत्रापि नहूषादय उदाहायीः॥ ३ ॥ 
यदा तु योगी बहून्‌ कायात्निरभिमीते, तदा किमेकमनस्कास्ते भवन्ति, 
अथानेकरमनस्का ईति समाधिपिद्धौ कश्चिदनुक्तो विशेष उच्यते- निमीण- 
चित्तान्यस्मितामातात्‌ । तेऽहंकार चित्तकारणमुपादाय निमीणचित्तानि 
निर्मितानि चित्तानि अप्रकृतानीश्चरचित्तानि नवानि करोति योगी | 
चित्त्रहणमुदाहरणमात्तम्‌ । ईन्द्ियाण्यप्यस्मितामात्रादेव । ततः ते सचित्ताः 
सकरणाश्च भवन्ति ॥ 
चित्तेन्धियाभावे च मृतदेरीयः क्रायो निरथकः स्यात्‌ । एकचित्त 
तु गुणप्रधानभावः प्रवरृत्तिमदेश्च नोपकल्पते । तत्र भिमुत्वदिकक्षन्ज्गत्ेऽपि बहु- 
कायारम्मिलमुपप्ते । गुणप्रधानानेकप्रवृत्तिमदाथं तु करणमेद एषितव्यः ॥ 
केचित्त क्षत्रा अध्यन्ये प्रतिकःयमेद्‌ं भवन्तीति मन्वते | केचिदत्र 
चोदयन्ति अङृताभ्यागमम्‌ । अन्ये तु तदनुरूपोपार्जितकर्माणः सेत्रज्ञा 
मन्तीति परिहारमाह; ॥ ४ ॥ 


1 यदय 2. सन्ित्तानि 


कैवल्यपादः चतुथः ३२१ 


[सूत्रम 
प्रवृत्तिमेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम्‌ ॥ ५॥ 
भाष्यम्‌ | 


बहूनां चित्तानां कथमेकचित्ताभिप्रायपुरःसरा प्रवृत्तिरिति सव- 
चित्ताना -प्रयाजकं चित्तमेक निर्मिमीते, ततः प्रवृरत्तिभदः ॥.५ ॥ 
[ सूत्रम्‌ | 
तत्र ध्यानजमनादरयम्‌ ॥ £ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
पश्चविधं निर्माणाचित्तं जन्मौषधिमन््तपःसमाषिजाः सिद्धय इति। 
तत्र यदेव ध्यानजं चित्तं तदेवानाश्चये, तस्येव नास्तयाशयो रागादिभवत्तिः, 
नातः पुण्यपापामितेषन्धः, क्षीणङ्केशता्योगिन इति । इतरेषां तु विधते 
कमो्चयः। ६ ॥ 


[ विवरणम्‌ | 
यथेतरे कथं बहूनां चित्तानाम्‌ एकचित्तामिप्रायपुरस्सरा प्रवत्तिरिति । 
तत्रोच्यते - प्रवत्तिभद प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम्‌ । प्रवृत्तिभेदे सव्यपि 
सवैवित्तानां प्रयोजक चित्तमेकं फछधिकृतदेसीयं शरीरान्तरे निर्भिभीते ॥ 


तच योगिबुद्धिमनुवतैते । अन्यानि च निर्माणचित्तानि भिन्ननेक- 
्रवृत्तीनि तननायकचित्तानुवर्तानि मवन्ति । ततश्च तेषां प्रवृत्तिः निवृत्ति 
उपेक्षा इलेवमादिप्रवृत्तिभेदः उपपथते । राजप्रकृतिप्र्त्तिभेदवत्‌ । एवमेक- 
चित्तामिप्रायपुरःसरा च प्रव्त्तिरवकल्पते ॥ ५ ॥ 


तत्र ध्यानजमनाशयम्‌ । पश्चविधं निमाणचित्तं जन्मोषधिमन्त्रतपस्स- 
माधिसामथ्यनिमिंतम्‌ । तत्र तेषु यदेव ध्यानजं चित्तं तदेव 'अनाश्यं 
हशकमौशयापव्जितम्‌ । तस्येव नास्याशयः र गदिभरवृत्तिः, अतो न 
पुण्यपापामिप्तवन्धः क्षीणङ्कशत्वा्ोणिनः । !ङेशमूटो हि कर्माशयः! 
इ्यु्म्‌ । तदभावा कर्मादायानुपपत्तिः । अपरेण तु जन्मादिपिद्धानां कमीदयायः 
अक्षीणङकेशत्वाद्वियते ९ ॥ ६ ॥ 

1. अन्न अआदद्चकोशे इत उपरि “वायुस्तथा? हत्यादिवाक्यं लिखितम्‌ । 


तस्यानन्वयात्‌ , 2. पुटाभ्यां पश्चात्‌ लिखित “अनाय” इत्यादि वर्यं योजितम्‌ ॥ 
41 


३२२ पातञ्जख्योगसुत्रभाष्याववरणे 


[ भाष्यम्‌ ] 
यतः- । 
, . [ सम्‌ 1 
कमाशुङ्खाङ्ृष्णं योगिनसिविधमितरेषाम्‌ ॥ ७ ॥ 
भाष्यम्‌ ] 


चतुष्पदी खलियं कर्मजातिः । कृष्णा, शुङखकृष्णा, शद्धा, अशुङ्ाकृष्णा 
[ विवरणम॑ | 

कुत एतथोगिन एव न कमौशयः ? इतरेषां स्तीति । यतः कममाद्ु्।- 
कृष्णं योगिनस्िविधमितरेषाम्‌ । सिद्धासिद्धसामान्यविषयमिदं सूत्रम्‌ ॥ 

ननु च पूर्वसूत्रमपि समान्यविषयमेव । न । समाििद्धिस्तुलयर्थत्वात्‌ । 
सामान्यविषयत्वे त समाधिसिद्धिस्तुतिरनुपपनना स्यात्‌ । सिद्धिपरिसंएयनेन 
तु विशोषविषयलय, तुल्यजातीयजन्मादितिद्धिचतु्टयसावत्वसंकीर्तनात्‌ समाधि- 
सिद्धः स्तुतिरुपपथते ॥ । 

किं च, जन्मादिपिद्धिसाधनानां केवल्याधताप्रतिषेषश्वाथीदिति विशिश- 
विषयमेव पूवैसूत्रम्‌ । हृद तु सामान्यविषयमेव पूर्सत्र तुखेनोपादानात्‌ ॥ 

चतुष्पदी खलियं कमेजातिः । कृष्णा दुरासनां शालमागातिषति- 
दचेतसामशयदधतरा । या त॒ बहिस्साधनमराध्या जायापुत्रपश्चयाजकादि- 
निष्पाथा सा शुञ्कृष्णा । काऽततौ? यत्र [पर्‌]पीडाऽनुग्रदद्रिण कमाशय- 
प्रचयः, सा हशनाहृरकनिष्पादर्मायत्वात्‌ कृष्णा च शुका च ॥ 

ननु अयोतिष्टोमादिकमसाङ्गसमधिगतत्ान कृष्ण, श्ु्कमेव तु तत्‌ । 
अत्रोच्यते-न--कभ्यैरनैकन्तिकत्वात्‌ । तान्येव चार्थानर्थोभयकारणानि । 
अथ. तफरत्य स्व्गदेरमिमतत्वादत्वमेवेति चेन्न--परदाराभिमदनस्यापि 
वान्छितत्वादयतप्रसङ्ग।त्‌ ॥ 

अय परदाराभिसरणादावम्युप्रदोषसम्पातात्‌, म्रतिषिद्धत्वाच्च रगादिनि- 
योगप्रवृत्तेश्चासमानमिति चन्- तत्रापि समनतात्‌ । कामात्मतानिषेषाद- 
निष्टयेगश्च । जन्ममरणयोरम्युप्ररोषभूतयोरवश्यंमावितरादिष्टानिष्टद्रयहेतुत्वमेब । 
स चानिष्टयोगः पर्पडदिसिवसीयते । तव्परतिषेधोपपत्तेः ॥ 

अवद्यं॑हि जन्ममरणद्रयेन विना स्वगौदिकटमुपमोक्तुं न शाभ्यम्‌ । 
तचेदस्ि तस्य दुःखरूपत्वादायातं तदि अोतिष्टोमादीनाघुभयात्मकतम्‌ । भथ 
कर्मान्तरमेव प्रतिषिद्धं जन्ममरणारम्भकारणमिति चेन--तद्भाबभानिव्ाव्‌ । 
तस्षिन्‌ हि सति जम्ममरणभावात्‌ ॥ 


केवल्यपादः चतुथः ३२३ 


अथ तु भवसक्षे निल्यमेव कुर्वीति, न जन्ममरणे प्रवर्तयाताम्‌ । 
कर्मत एव ते भवतो नकुर्बतः । तस्मानिमित्तत्वमबगम्यते । किं च-- येन 
जन्ममरणमासपस्यते स्वगादौ तत्‌ क्म यदि जन्मान्तरगते, तत्रनि्ेक्षप्रपङ्गः । 
काम्यप्रतिषिद्धक्रियायामपि पू्वजन्मक्ृतफठस्याव्यप्रापणीयत्वात्‌ ॥ 

अथ प्राक्तनजन्मकरमक्षयाथीनि निद्यानीति चेत्-तन--नियमानुप- 
पत्तेः । अनिष्टफङन्येवारन्धका्यीणि पूरवैकर्माणि, न विष्टफखनीति [न] 
नियन्तुं शाक्यते । अदृष्टफलेषु हि सपसु निद्यान्येव कुर्वतोऽपि मेोक्षानुपपत्ति 
जन्मारम्भितवं च ॥ 

तत इ्टानामप्युमयहेतुत्वं सिद्धम्‌ । बाह्यसाधनानां कर्मणां पौडानुप्रह- 
रूपत्वात्‌ । न वै खल्वपि निलेन पूवैकृतकर्मणामिष्टानां भ्वेतिष्टोमादीनां 
निदृत्तिरुपकल्पते । विरोधाभावात्‌ । अविरोधश्च भयेर्षां शुद्धिरूपत्वात्‌ । 
तन्त्रपिद्धेश्च ॥ 

अथापि ब्रूयदे[दने]कजन्मारन्धानि कमणि जने(कै)कमारभन्त, 
नानारन्धकार्यमवशिष्यत इति । तथाऽपि प्ैजन्मकर्ण रदानीन्तनजन्भफकदानेन 
्षयङ्गतत्वादधुनातनजन्मनिष्पादितानामभिनवानामिव काम्यानां स्व्गफल्जन्म- 
मरणदुःखरम्मित्वमिति जुहणकृष्णरूपापत्तिः ॥ 

ततश्च जन्ममरणदुःखस्य स्वगीभिधानायाः ग्रतिश्च ददनात्‌ 
तत्कारणस्य दवि रूपल्वमनुमास्यामहे । तथा च क्षिदधे प्रतिषिद्धभूतर्हिसाचरणं 
क्रत्वथमव्यग्रषामीयादो प्रवतमाने कृष्णरूपमिव्यनुमास्यामहे । क्त्वापि सत 
हिसा अनि्टमूतेव तदर्थता प्रतिपचते ॥ 

यदुक्तम्‌-- अविरोषेण यच्छाक्लं शिरोवदिति चोचरमिति, तत्र शिरोषदि- 
येवंजातीयकदृष्टन्तािद्धत्वम्‌ । अविरोषेण यन्छान्ञमिति तु शोमस्वरूपस्य 
विरेषाद्वाध्यवाधकत्वमुपप्ते । हिसायास्तु विशीधामवादुमये्दतुत्वं भोजन. 
स्येव षुखरारीरस्थितिद्रयहतुत्वम्‌ । यथा च तीथंस्नानस्य ह।दद््टर्थतं 
तथा दिस्ताऽ्यनिष्टफत्मपस्यिजन्ती महाफडं क्रतु नैव नाभिनिर्षतयति ॥ 


अथ बाद्यपताधनसाष्यमपि नित्यं केवकं कामत्तयोगामावाच्छु्ृमेवेति 
चेदेवमुव्यते-न-रोषवच्रेन निवयकाम्यानामविरोषात्‌ । यथा कामिनः कम्यनिीति 
कामक्तयोगेन काम्यानां दोषवत्वमेवं कामादिदेतुभूताविघादोषवस्वमविरिष्टमिति 
निव्यानामप्युमयात्मकःवमेन । अविद्य वसव च निदलेषु प्रवृत्तश्य प्रायश्ित्तनिमि- 
तोत्पत्तरवश्यंमावित्वात्‌ ॥ 


३२४ पातञ्ञलखयोगसूत्रभाष्यविवरणे 


वत भाष्यम्‌ | 2 
चेति । ततर कृष्णा दुरासनाम्‌ । शुङ्ककृष्णा बहिःसाधनसाध्या । तत्र 
परपीडानु्रददमरेणेव कर्मशयप्रचयः । शुका तपःस्वाध्यायध्यानवताम्‌ । सा 
हि केवरे मनस्यायत्तत्वादबरहिःसाधनाषनन परान्यीडयित्वा भवति । 
अशुङ्काकृष्णा संन्याघिनां क्षीणङ्कशानां चरमदेदानामिति । तत्राशुङकं योगिन 
एव ॒फरसेन्यासादकृष्णं चादुपादानात्‌ । इतां तु भूतानां पूरषैमिव 
ररिविषमिति ॥ ७ ॥ 
सूत्रम्‌ | 
ततस्तहिपाकाचुशुणानामेवाभिन्यक्तेवासनानाम्‌ ॥ ८ ॥ 
[ विवरणम्‌ | 
अपि चाविदुष एव सर्वै कम । विदुष; कर्मानुत्पत्तः । विद्वान्‌ हि पुरूषः 
स्वरूपावस्थानव्यतिरेकेण एड नाभिमन्यते । स्वरूपमात्रावस्थानं च समस्त. 
म्यापारविरामिण प्रवते । न चैवे विदुषः क्रियाऽनुष्ठानं धटते। न हि 
स्थल्पयेनामिप्रतिष्ठाप्तपाना जर्मागीभिप्रस्यानक्ताधनं नावादिकमयुतिष्ठति ॥ 


ननु (न चनित्यकाम्ययेरिवं सविशेषः स्यात्‌ । अन्रोच्यते-कामितफलढ- 
(तन्मात्रं नि)कमैमत्रनिटृ्िप्रयोजनलानिल्यनामदेषः । यो हि काम्यादवि- 
निवृत्तस्तस्य बहुं कर्मणां कामरहितेन खुद्धेन कनौ कृतववादति्चुद्धफएटवं 
जु्त्ववहुघाच संस्का।राथस्म्‌ । अपि च कामनिव्त्तिरव महत्‌ एठम्‌ ॥ 


किं च, निद कुर्वतः किमथ करोमि, किं वाऽस्य फलं, के वास्याुष्ठनि 
दोषाः, इति सम्यम्दशेनूपः परामर्ो जायत इति निल्यस्यास्ति विरोषः । 


शुङ्ृकृष्णालसमकल्ं सविरिष्टमुमयेषामपि कमेणाम्‌ । बाह्यप्ताधनस।धनीयत्रेन 
परपीडोपपत्तेः । [ईति] तस्मादुच्यते ॥ 


शङ्खा कमेनातिः तपस्स्वाध्यायध्यानवताम्‌ । सा हि. केवछे 
मनस्यायत्तखादबदिस्छाधना बद्यसाधानानपेक्षा न परान्‌ पीडयित्वा 
भवति ॥ 


अशुङ्ककृष्णा सेन्यासिनां क्षीण्ङ्धेशानां चरमदेदानाम्‌ । एषाम्‌ 
आरन्येकरारीराणाम्‌ अश्ुङ्का संन्यासात्‌ अक्रभ्णा च अनुपादानात्‌ अकरणात्‌ । 
नापि जुचकृष्णविमिश्रा; बाह्मसन्यास्ानुपादानाभ्यां हेतुभ्याम्‌ । तथा चोक्तम्‌-- 


1. नाधीना 


कैवल्यपादः चतुथः ३२५ 
[ भाष्यम्‌ ] । 
तत इति त्रिविधात्करमैणः, तद्विपाकानुगुणानापेवेतिं यज्ञातीयस्य 
कर्मणो 'याद्शो विपाकस्तस्यानुगुणा या वापनाः .कर्मविषकमनुशेसे 
तासामेवाभिग्यक्तिः। न हि दैवं कमे विपच्यमानं नारकतिथख्छनुष्य- 
वास्नाभिव्यक्तिनिभित्तं सभवति । वितु देवानुगुणा एवास्य बास्षना 
`अभिन्यज्यन्ते । नारकतिर्यखयुष्येषु चेवं समानश्र्चः ॥ ८ ॥ 
[ विवरणम्‌ ] 
अनिष्टमिष्टं भिश्च च त्रिविधं कर्मणः फठम्‌ ॥ 
भवलय[दयद्यागि्ना योगिनां त्रेय न तु संन्यासिनां कचित्‌ ॥ इति ॥ 


इतरेषां तु भूतानां जनमौप्रधिमन्त्रतपरििदधानपरन्येषां च त्रिविध 
शठ कृष्णे मिश्र च पूवैमिव यचा द्वितीये पदे ‹ ङ्शमूरः"‡ इत्यादौ ॥ ७॥ 

कैवल्यस्य प्रस्तुतत्वात्‌ तस्य च प्रतिबन्धेहेतवः शाः, कर्माणि, 
वासानां, [उ्याघ्यात्याः] । जडानां तु व्यापारः, प्रतिपक्षः, निव्तिश्व 
तेषां, विस्तरेण व्याछ्याताः । एव कमैणामपि वास्तनानां तुल्यव्यापारावस्थान- 
प्रतिपक्षनिब्ृत्तयो निवणेनीया इव्यत उत्तराणि सूत्राण्यारभ्यन्ते--यतस्तनिवृत्तौ 
कैवल्यमुपपद्ते नान्यथा । ततस्तद्विपाकानुगुणानमिवामिव्यक्तिवौ सनानाम्‌ ॥ 


ततः तस्मात्‌ त्रिविधात्‌ उक्तरक्षणात्‌ इष्ण्युक्ृविमिध्ररूपात्‌ कर्मणः 
्रविपच्यमानादधेतुभूतात्‌ तद्विपाकानुगुणानां तस्येव कर्मणो विपाक्रः फलं 
तदनुगुणानां तदवुहूपाणां तादृशीनाम्‌ एव वाप्तनानामभिन्यक्तिः ॥ 

एतदुक्तं भवति--देवतिरयव्मनुष्यविपाकदेत्‌९ कर्मष् मध्ये यज्जाती- 
यस्य कर्मणो यादशो दिपाकः तस्य विपाकस्य अनुगुणा वासनाः तत्‌ 
कर्मविपाकमनुशरेते अनूत्पवन्ते, तासमिवाभिव्यक्तिः । तत्सदरोन कभैवि- 
पाकेन संस्कृतखात्‌ । यथा मतृक्तद्डीं प्रविरोक्य बतसोऽनुधावति । नान्या- 
सामतदनुगुणानामाभिव्याक्तः ॥ 

नदि दैवे कमै विपच्यमानं फएलामिुलीभावमापयमानं नारक- 
तियैच्छतुषवासनामिन्यक्तिनिभित्ते सं]भवति । निमिततनेमित्तिकयेोः प्रतिनि- 
यतानुगुणल्रात्‌ । फ तु दैवानुगुणा एवाध्याभिन्यञ्वन्ते । नारक- 
ति्य्॑ातुषेष्वेषं समानश्च्च॑ः समधिः ॥ | 

1, योवि- 2. व्यज्य- 3. यो. पघू.पा. 2, ब. 12 





३२६ पातञ्जरख्योगसूत्रभाष्यत्रिवरणे 


( सत्रम्‌ ] 
जातिदेक्षकार्व्यवहितानामप्यानन्तयं स्पृतिसंस्कार- 
योरेकरूपत्वात्‌ ॥ ९ ॥ 
[ भाष्य ] 
वृषदंशविपा कादयः श्प्वकर्मग्यज्ञकाघ्चनाः । “यदि जातिरतेन 
वा दर्देश्तया वा कत्पशतेन वा व्यवहिताः पुनश स्वग्यञ्जका्ञ^्नोदयाः 


[ विवरणम्‌ ] 

, नारके कर्मणि विपभ्यमाने ततकमीनुगुणा वास्तनाः प्रादुर्भवन्ति | तथा 
तैर्बग्योनकर्मणि विपन्यमाने तद्विपाकानुदूपा वासना व्यज्यन्ते | तथा मानुषेऽपि 
समानो न्यायः । न हि स्वविपाकसदृशीरनुपादाय वासनास्तस्य तस्य कर्मणो 
विपाकः सेभवति । नापि वासनानामास्रनिष्पादकविपाकारभ्भिकर्मतुल्यसूपाणि 
कमीन्तराणि विपाकाभिप्ुखान्यन्तरेणामिव्यक्तिः । एवं कम॑णां वापतनानां च 
परस्परहेतुहेतुमद्ववोऽनादिभूतः ॥ ८ ॥ 


तन्न॒ वासनानामनेकजातिकार्देरषग्यवधानेन दवीयद्ानामानन्तर्य 
विपन्यमनिन कर्भणा सह नाकि । यथा दवीयपां मिन्रस्वजनादीनाम्‌ । यंधैव 
च नेदीयकसती बसना पटीयक्ठा) न तथा दवीयक्ती पटीयमानमाप्तीदति । 
तस्मान्नास्ति द्वीयसीनामानन्तय॑ वासनानाम्‌ ॥ 


तदमव चाय दोषः प्रपरोति-यथा कल्पशतान्तस्तिः वृषदंशविपाकः 
भप्रिष्यतः ब्रषदराविपाकस्यानन्तरातीनो दैवविपाकः । तत्र नेदीयसी दैववासना 
विरुद्धतात्‌ इषदंदाविपाकाभिव्यक्तिहेतुतां न प्रतिपद्यते । कल्परातम्यवहिताना- 
मपि वषरदं वासनानां विध्रकषै।दनुपादाने इषरदंराषिपाकहेतो; कर्मणो विप।को 
नावकल्पेत । ततश्च कर्मणां वासनानां चनयक्य प्र्त्यतेति ॥ 


अत्रोग्यते-ज।तिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तय स्मृतितस्कार- 
येकरूपसात्‌ । वृषदशविप्रकादयः स्वकरमेव्यज्ञकाज्ञनाः व्यक्चकेन सखेन 
कर्मणा व्यञ्यमानाः यदि जातिक्षतेन वा दुरदेश्तया वा कस्पसदसरेण वा 
व्यविताः ॥ 





1. कोद 4. -स यदि 
2. स्वम्य- 5. -दिताः 
३. -ज्ञनाभिन्यक्तः 6, -नं एवोदियादू 


केवस्यपाद्‌ः चतुथः ३२५ 


[ भाष्यम्‌ | 
द्रागितयेव पर्वानुमृतवृषदंशविपाकामिसंस्कृता बाक्तना उपादाय 'भभिन्य- 
ज्यन्ते । कस्मात्‌ १ यतो व्यवदहितानामप्यासां सष्शं क्मौभिव्यक्चके 
निभिततीमूतमिलयानन्तयैमेव । कुतश्च ? स्पृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात्‌ । 
यथाऽनुमवास्तथा संस्काराः । ते च ग्वासनानुहूपाः । श्यथावासनाः 
“स्मृतयः इति जातिदेशचकारुग्यवदितेभ्यः संस्कारेभ्यः स्प्तयः; । 


[ विवर्णम्‌ ] . 
ननु च जातिभ्यवधनेनैव क।ठविध्रकर्ष उक्तः । किं कार्प्रहणेन ! 
उभ्यते-भूरयांसि जन्मानि दिवसे एकस्मिशपि श्ुद्रजन्तप्रश्तीनां 
केषाचिद्धवन्ति | न तत्रातीतकाटविप्रकर्ष इति क।ठग्रहणम्‌ ॥ 


तेषु दृषदंरापिपाकादयः पूरवेमपि स्वव्यज्ञकनिवर्तिताः सन्तः पुनश 
स्वब्यक्षकाञ्लनोदयाः द्रामियेव क्षिप्रमेव बृषदंशविपाकाभितस्छृता वासना 
उपादायाभिभ्यञ्यन्ते । कस्मात्‌ एवम्‌? यतो व्यवदितानामप्वासां सद 
कमोमिन्यञ्षफं निमित्तीमूतमिति ॥ 


न॒हि वटीवदेविपाकामिन्यक्तिकारणं कम दृषदंरवासनामिन्यक्ति- 
निमित्तं भवति । विस्दरात्वात्‌ । अनुरूपं हि निमित्तममिन्यज्ञकम्‌ । 
जाम्खादिमक्षणदशैने जिह्वा ज्ञवति । तस्मात्‌ आनन्तयेमेव बास्नानाम्‌ । 
यतस्तासां न्यञ्चक तुल्यम्‌ । तथा च सति न वासनानां नेदीयस्ता दवीयस्सा 
वा । समानचित्ताश्रयत्वात्‌ ॥ कुतश्च ? अयमप्यपरो हेतुरानन्तर्थस्य । स्मृति- 
सैस्कारयेरिकरूपखादिति ॥ 


पूवं तुल्यजातीयं कर्माभिव्यञ्चक वासनानन्तवेहेतुरुक्तः । रदानीमय- 
मन्य उभ्यते--यथा अनुमवास्तथा सस्काराः । यायाः प्रययाः तथा 
वासनाः । ते च संस्कारा वाप्तनारूपाः । यथावासनाः स्मृत्य इति । 





न्यञ्येत 
क्मवा- 
यथाच 
-स्तथा स्मतिरि 
स्मृतिः 


^ >> £ $ ~ 


२२८ पातञ्जर्योगसूत्रभाष्यविवरणे 


[ भष्यम्‌ ] 
'स्मृतिम्य श्च पुनः संस्कारा इयेवमेते स्परतिसस्काराः कमौशयवृत्तिसम- 
गवशवेशादभिव्यज्यन्ते । 


अतश्च व्यवहितानामपि निभित्तैमित्तिकमावानुच्छेदादानन्तर्यमेव 
सिद्धमिति ॥ ९॥ 
[ सूत्रम्‌ |] 
तासामनादित्वं चाऽऽरिषो नित्यत्वात्‌ ॥ १० ॥ 


[ भाष्यम्‌ | 
तासां वासनानामाशिषो नियलादनादित्वम्‌। येयमात्माशीः रणैः 
मा तु मत्‌; भूयासमिति सर्वस्य दश्यते, सा न स्वाभाविकी" 


४ [ विवरणम्‌ || 
तथा .. चोक्तम्‌+ श्राह्योपरक्तः भरययो ब्राद्यप्रहणोमयाकारनिमीसः'- 
इ्यादि । जातिदेशकारव्यवहितेभ्यः संस्करेभ्यः स्मृतयः । स्मृतिभ्यश्च 
पुनः संस्कार इयेवभेते स्मृतितस्काराः कमांज्ञयवृत्तिरामवशवेशाद- 
भिन्यज्यन्ते | कर्मीशय्यापि वृत्तिकामो देशदिनिमित्तपक्षयेति प्रतिपादितम्‌ ॥ 

अतश्च :ग्यवहितानामपि निमित्तेमित्तिकभावातुच्छेदादनिन्तर्यमेव +. 
यादृशः. संस्कारस्ताद्री स्मृतिः । प्रतिनियतन्यञ्चकत्वाच्च तयेन विप्रकषषैः: 
करणम्‌ :। यतः कल्पदतन्यवाहताद्‌।प सस्कारादव तुल्यजातीया स्मृतिरिति. 
आसन्तयमेवः सिद्धम्‌ः॥ ९ ॥ ^: 


इदान वासनानामनादिखेन विपाकनिर्तकत्यम॑मिदरदयति- संस्कारस्य 
चानदित्वमकेकस्य चासङ्ख्ययोनिगमनं वैरग्यप्रतिपत्ययै प्रतिपादर्यति-- 
ताप्रामनादितवं -चाऽऽरिषो नियलतत्‌ 1 तासां वसिनानामा-. 
शिषो निलल्वादनादिखम्‌ । येयमात्माशीः "मरणं मा तु भूत्‌ ` -इति;" 
एवमारीका- “ मूयास्तम्‌ः इति सवैस्य दृश्यते । सा न स्वाभाविकी स्वरस ` 
प्रवृत्ताऽपि निखूढाऽपि ॥ छ 

1. स्मृतेश्च 2. वशादन्य ३. मानमूव ` 

4. अत्र आदशयैकोशे इत उपरि ^सव॑याप्यस्ति? इत्यादिवक्यै लिखितम्‌ । 
तस्यानन्वयात्‌ , 13. पुटेम्यः पश्चात्‌ लिखितं “्राह्चोपरक्तः” इदयादि वाक्यं योजितम्‌ ॥ 


-केवल्यपादः कतुथेः ३२९ 


[ भाष्यम्‌ | 
कस्मात्‌ ? जातमात्रस्य जन्तोरनतुभूत'जननमरणधमंकस्य दरेषटुःखापुस्यति- 
निमित्तो मरणत्रासः कथं भवेत्‌ १ न च स्वाभाविकं वस्तु निमित्त पादत्ते | 
ध्यस्मादनादिवापनाुविद्धमिदं चित्तं निमित्तवसात्‌ काश्चिदेव वासनाः 
प्रतिटभ्य पुरषस्य भोगायोपवरत॑त इति ॥ 
घटगर साद प्रदीपकत्पं सकोचविकापि चित्तं शरीरपरिमाणाकार- 
[| विवरणम्‌ | 
कस्मात्‌ ? जातमात्रस्य अननुभूतजननमरणधमेकस्य देषानुस्पृति- 
निमित्तो दुःखानुस्मृतिदेतुको वा मरणत्रासः कथं भवेत्‌ १ न हि कथञ्चन 
दुःखस्मरणादिनिमित्तेपादानं स्वामाव्रिकस्येपपदते । न च स्वाभाविकं वस्तु 
निमित्तमुपादत्त । न हि उवलनस्येष्णघं स्वाभाविकं सद(्मीयकार्य 
निमित्तमीक्षेत ॥ 


न (+ 91 | 


न चाननुभूते विषये स्मृतिरिषिऽनिष्टे वा कस्यचिदुपद्मेष्यते । अनुभूत- 
प्रियाननुस्मरणे, न च तद्िभयवाञ्छा | तया अनुभूताप्रियाननुसमरणे, न तद्विषये 
द्ेषल्रपश्च छेक्रे परिदर्यते । तथा च यो ये जातस्तस्य तस्येह जन्मन्यननु- 
भूतजन्ममरणस्थ जन्मानन्तरमेवात्माशीरभिद्यते । तस्मात्‌ तद।शीनिल्यत्रात्‌ 
पवैजन्ममरणानुभवरोऽनुमीयते । ततः पूर्वस्ततेोऽपि पूर्वं इति, स्मृतितेस्काराणां 
तत्कारणानां च जन्ममरणानुभवानामन।दित्रमनुमिमीमहे ॥ 

तयेव एकैकस्य प्राणभतोऽनेकयोनिगमनप्तिष्टः । एवमेता वासना 
दुरवहाना अविहानीयाः । कुत एवम्‌ यस्मादनादिवासनानुविद्धं चित्तमिदं 
निमित्तवशात्‌ कर्मनिमित्तवरात्‌ काश्चिदेव वासनाः प्रविपच्यमानकरम- 
तुल्यजातीयक्रियाविपाकाभि(न)निष्पदिताः प्रतिरभ्य पुर्षस्य भोगायोपावतैते 
यवदवक्षित।धिकारमिति ॥ 


तदतचचित्तं घटप्रापादग्रदीपकखं संकोचविकापि हस्तिमराकादि- 
शरीरपरिमाणाकरं यया दीपो घटग्रासादादि¶ । तदेवम्‌ अपर प्रतिपन्नाः । 
तत्र च युक्तिमाह--तथा चेति । तथ। च संकोचविकापिते च अन्तराभवः 


1. - तमरण- ४ 2. तस्मा 

3. अतर आदशंकोशे इत उगरे (८अभावाविशेषात्‌ इत्यादि वाक्यं 
टिखितम्‌ । तस्यानन्वग्रात्‌, 13. पुरेभ्यः पूरे लिलते “तथा चेति | तथाच 
सुकोचविकासिसे.च इत्यादिवाक्यं योजितम्‌ ॥ 

42 


३२३० पातञ्नलयोगसूत्रभाऽयविवरणे 


| भाष्वम्‌ ] 
मत्रमियपरे प्रतिपन्नाः । तथा चान्तरामात्ः 'सैसरणश्च युक्तं इति॥ 


क [प | 


वृत्तिरेवास्य विभुनधित्तस्य संकोचषिकासिनीव्चायः; ॥ 


क 


तञ्च धममादिनिमित्तपिक्षम्‌ । निमित्तं च द्विविधषम्‌-बाद्ममाध्या- 
सिके च । शरीरादि साधनपेक्षं बाह्यं स्तुलयभिवादनादि, चित्तमात्राधीनं 
्रद्धाघाध्यास्मिकम्‌ । तथा वोक्तम्‌-ये चेते मेत्यादयो ध्यायिनां 
विदारासते वाद्यपापननिरनुग्रहाःः प्रकृष्ट पर्ममभिनिरमैवयन्ति । 
तयोमौनसं बीयः । कर्थं? ज्ञानवैराग्ये केनातिशय्येते १ दण्डकारण्यं च 

[[ बिवरणम्‌ ] 

मरणादुत्तरकाठं जन्मनश्च प्रगितस्मिन्‌ अन्तरा भवतीव्यन्तराभावः संप्तरणं 
सञ्चरणं येन सश्चरति तदपि शरीरमातिवाहिकं चित्तस्याविभुलरे युक्तरपरिति 
नुषन्ति । वृत्तिरेवास्य विभुनश्चित्तसख सङ्खोचविकासिनी ल।चायीः । जाचा्थ- 
प्रहणम्‌ उपपत्तिमखात्‌ पूजार्थम्‌ । चित्तस्य स्थितिर्गतिश्च प रिगामिलाद्िमुषेऽपी- 
ददिथाणां चोपपयते योगिनां च विकरणभावः सवज्ञत्ं विभुवे षेटते ॥ 


न ॒चेोप्रमोगद्यून्यस्यातिवाहिकरारीरस्य कल्पनायामत्ति प्रमाणम्‌ । 
राराविष्राणवदनुपठम्यमानव्वात्‌ । “नह वै सशरारिस्य सतः प्रियप्रिययो- 
रपहतिरस्ति'” इति श्तेः । तथा ¢ अय यो दैताननन्तानुपास्ते ' इति श्रुतिः 
करणम्यापित्वे स्थापयति ॥ 


तत्च॒सकोचविकासितवं वृत्तेः ध्मीदिनिमित्तपिक्षम्‌ । निमित्तं च दिध 
बाह्ममाध्यासिकं च । शरीरादिसाधनपेक्षं बाह्यं स्तुयमिवादनादि करम । 
कि पुनराध्यासिकम्‌ ? आह--केवर्चित्तमात्राधीनं श्रद्धादि ॥ 


तथ। चोक्तम्‌- ये चेते मेत्यादयो ध्याषिनां विहारः चित्तन्यापाराः 
चेष्टितानि ते बाह्यपाधननिरमुग्रहाः बह्यसाधननियपेक्षाः केवल- 


~ ९.6 


चित्तमात्रनिश्ताः प्रकर पममभिनिवेतेयन्ति ॥ 

तयोः बाह्यध्यामिकयोनिमित्तयोः मानसम्‌ जध्यालिकं केतयादिचित्ताभि- 
निष्पन्नं निमित्तं बटीयः। कथम्‌ इति ? ज्ञानवेराग्ये केनातिशय्येते १ न केना- 
वालयर्थः ¡ यतस्तृतीयपादानुकरान्तविभूतिजातं ज्ञानवेराग्यसाध्यम्‌ | दण्डकारण्यं 





1. संसार युक्त 2. स्नुतिदानामि- 3. -दात्मानः ` 


कैवस्यपाद्‌ः चतुथः ३३१ 


| भाष्यम्‌ ] 
चित्तवलव्यतिरेकेण शारीरेण कर्मणा यूल्यं कः कतुमुव्सदेत १ समुद्रमग- 
स्यवद्रा पिवेत्‌ ॥ १० ॥ 
व सूत्रम्‌ | 
हेतुफटाश्रयाखम्बनैः सगृहीतत्वदेषाममावे तद मावः ॥११॥ 
भाष्यम्‌ | 
हेतुर्षमीस्पुखमषमौद्दुम्खं, सुलानुश्यी "रागो दुःखानुज्घयीः 
द्रषस्ततश्च प्रयलस्तेन मनमा वाचा कायेन वा परिसपन्दमानः परमनुग्रह्णा- 
स्युपहन्ति वा । ततः पुनषर्माधम सुखदुःखे रागद्ेषाविति प्रव्रतमिदं 
षडरं संसारचक्रम्‌ । 
[ विवरणम्‌ | 
चित्तयरव्यतिरेण कः करं शक्नोति ¦ कश्च गिबेत्‌ समुद्रमगस्त्यवत्‌ 
इति । अतो मान्तवरलमेव वम्‌ । न शारीरम्‌ । “तस्मात्‌ मानस्ने परमं 
वदन्तिः" इति श्रतेः । तथा च मगवरानावमप्रे-- 
^“ प्रेयान्‌ द्रव्यमयाचज्ञाज्जञानयन्ञः परन्तप । 
^“ स॒ कर्माखिलं पाथ॑ ज्ञनि परिसमाप्यते '' इति ॥ १० ॥ 


कथं पुनस्तासां वाप्तनानां निवृत्तिः । अन।दिरूढघात्‌ न निव्रत्ति- 
रासतां घटामहेक्ते । न च तन्नित्रत्तिमन्तरेण केवल्योपपत्तिरिित उच्यते- 
हेतुफाश्चयाम्बनैः सेयृहीतत्वादेषामभावे तदमावः । देतुश्च फलं 
चाश्रधश्वाटम्बनं च हैतुफलाश्रयारम्बनानि । तैः संगृहीतत्वादुपम्रथितव्वदिषां 
हेखादीनाममावे तद्भावे वसनानाममभाव; । तस्मादुपपयचते वासनानां निरतः | 


कोऽसौ हेतुः? रद्याह--धमंस्तावद विद्यापिनमितचेतस्ताम्‌ | ततो धर्मात्‌ 
सुखम्‌ । सुखानुशयी रागः । एवरमविचत एव निष्रद्धाचरणत्‌ अधर्मः । ततो 
दुःखम्‌ । दुःखानुशयी द्वेषः । ततः इखेपाजेन दुःखपरिहरे च पूर्वदेव 
भ्रयलः । तन जयत्तन वाचा कायन पास्पन्द्मानः परमनुग्रह्णादयुपहयनत च। 
पुनश्च ततः परानुप्रहपरपीडनाम्यां धमाधमा । ताभ्यां सुखदुःखे । ताम्यां 
च राग्ेषों पूर्वदेव । ततः प्रयत्नः ॥ 


1. सुखाद्रा 
2. दुःखाद्‌- 


३३२ पातञ्ञखयोगसूत्रभाष्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
अस्य च प्रतिक्षणमावतेमानस्याविधा नेत्री मूठ स्ङ्केशानामियेष 
हेतुः । फलं तु यमाश्रिल्य यस्य प्रस्युसन्नता षमीदेः, न ह्यपू्वोपजनः। 
मनस्तु साधिकारमाक्रयो वासनानाम्‌ । न श्यवसिताधिकरे मनति 
निराश्रया वासनाः खातुमुत्सहन्ते । यदभिमुखीमूतं वस्तु यां वासनां 
व्यनक्ति तसयास्तद्‌ारम्बनम्‌ । एवे हेतुफठाश्रयारम्बनरेतेः संग्रहीताः 
सर्वौ वासनाः । एषाममावे तस्यंश्रयाणापपि वासनानाममवः। ११॥ 


| विवरणम्‌ | 
इव्येवमनवरतप्रारन्धपरिभ्रमणं प्रवृत्तमिद्‌ षडरं संसारचक्रम्‌ । भस्य 
च प्रतिक्षणमावत॑मानस्यातरिच्या नेत्री रथचक्रस्य तुरङ्घयुवतिपि ॥ 
सा मूर स््शानामिति यदेतदविवनेतृकं षडरं चक्रम्‌ एष हेतुः 
वासनानाम्‌ । एतचक्रावृ्तिकरेता हि ता; । अविदयायास्वमवे विराणनाभि- 
बन्धनमिव चकः धममदिदहेतुचकमपि षिंरीवैते। तद्विशण च चक्रावृ(ति. 
कृतजन्भनां वाप्तनानामकार्यक्षमत्वम्‌ ॥ 


फरं तु यम्‌ अथम्‌ आश्रि यदय प्रत्युपन्नता तत्‌ तस्य फलम्‌ । 
तदपि वासनानां संप्राहुकम्‌ | तदभवि वासनाभिन्यक्लमावात्‌ । सुख।दिफठध्य 
वाप्तन!धायिखात्‌ । न ह्यपृर्वौपजनः । नाल्न्तमप्तदुप्पधते ॥ 


मनः सापिक्रारं कर्वष्यतावत्‌ न पुरुषाधसुन्यम्‌ | कृतपुरुषा स्वरूपज्ञानं 
विनिवृत्ताविधाकमिति साधिकारमाश्रयो वासनानाम्‌ । तदश्रिय दहि देत. 
चक्रपस्मिषणम्‌ । न॒ ह्यवाकिताधिकारे करणीयपुरषथसयन्ये मनसि 
निराश्राया वासनाः स्थातुमुत्सहन्ते । 


यदभिमुखीभूत वस्तु यां वाप्तनां व्यनक्ति तस्यास्तदारम्बनम्‌ । 
७ क 9 क (1 (५ 9 $ ५ त्व 
एवं हेतुफलाश्रयारम्बनैरेतेः सेगृहीताः सवौ वासनाः । तेषां देवादीनाम्‌ 
अमवे तरेपंश्रयाणामपि वासनानाममावः छत्राभतरे छायानिदृत्तिवत्‌ ॥ 


एषां चाभद्रोपायो द्वितयिपदि भ्याख्यातः । तस्मात्‌ न कासतना 
सम्यब्दरने सति केवल्यग्रतिबन्धिनी । मवयवाव्रियानिवृत्तौ कैवल्यमिति ॥ ११॥ 


केवल्यपादः चतुथः ३३३ 


[ भाष्यम्‌ | 
नास्यसततः समवः, न चास्ति सतो विनाश इति द्र्यस्वेन 
स भवन्यः कथ निव्तिष्यते वासना इति-- 
[च] 
अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वमेदादमीणाम्‌ ॥ १२ 


[ भाष्यम्‌ | 
मविष्यद्धक्तिकमनागतं, मूतव्यक्तिकमतीतं, स्वव्यापारोपारूढं 
वतमाने, अयं चैतदरस्तु ज्ञानख ज्ञेयम्‌ । यदि चेतत्खर्ूपतो नाभविष्यन्नेदे 
निर्विषयं ज्ञानगुदपत्यत । तस्मादतीतानागतं खहूपतोऽस्तीति । किंच 


[ चिवरणम्‌ ] 
ननु चेप्राममवे तदभाव इ्युक्तम्‌ । तथा च पिद्धान्तहानिः । कथम्‌ १ 
एवं हि सिद्धान्तः नास्यस्ततः सम्भवः उत्पत्तिः । न चास्ति पतता विनाश 
इति । अथ पुनः सान्ति वासतनास्तद्‌, द्रव्यत्वेन (स्त॒सतलयः) [सम्मवन्ः 
कथं निवरविष्यन्ते । नैव निवर्तिष्यन्त इव्यथः । तन कथमुक्तमेषाममव्र 
तदभाव इति । कयं वा केवल्यमनिवृत्तापु हेतुकृतजनमघ् वासनासित्यत उत्तर 


पठति-- अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्यध्वभदाद्धमौणाम्‌ ॥ 


एवं वेतत्‌ । अथ वा सिद्धन्तपक्तेणेव नेयं भाष्यम्‌ । कथम्‌? एषामभवे 
तद्‌मावः इति हेादीनां वासनानां च नालन्ताभाव उच्यते । कस्मात्‌? 
नास्यस्ततः सम्भवो न चास्ति सतो विनाश्च इतिं द्रम्यतेन वस्तुतया 
सम्भवन्यः कथं निवर्त्यन्ते वासनाः । शब्दविकल्पिततरे वासना 
नान्तं निवर्तिष्यन्ते । सन्लवातीतस्वरूपेणेय्थः ॥ 


(+ 


भविष्यद्वयक्तिकं भविष्यति व्यक्तिः यस्य तत्‌ भविष्यदधक्तिकम्‌। यथा 
पिण्डावस्यायां घटलूपम्‌ । प्रदृततेतिकत्यतासाघनं तव्‌ अनागतम्‌ । भूतभ्यक्ति- 
कमतीत मूता अतिक्रान्ता व्यक्तिरुपरन्धिर्विषयतवापत्तियस्य । यथा 
प्रभग्नो घटः तदतीतमिच्युच्यते । अन्यङ्गवमभविष्यत्‌ यस्य व्यञ्घने साधनसु- 
पदेयम्‌ । अनतीतव्यक्तिकमभूतम्‌ ¦; किं तर्हि? व्यप्रोपाष्दं तत्‌ 
वतैमानम्‌। यथा घटः स्वक्रियायाः ॥ 


1. तमनुनूत- 


३३४ पातञ्ञलयोगसूत्रभाष्यत्रिवरणे 


. भाष्यम्‌ | 
भोगभागीयख बाऽप्वगेभागीयस्य वा कर्मेण फरुमुखिस्ु यदि निसपास्य- 


[क 


मिति तदुदेशेन तेन निमित्तेन कुशला नुज्ञानं न युज्येत । सतश्च 
[ विवरणम्‌ । 

त्रयं चेतत्‌ अतीतानागतवक्तमनलक्षणकं वतमाने धमिणि वर्तमाने 

धर्म्ूपे वस्तु समस्तटोकविनिश्चितरूपस्यान्यमिचारिणो ज्ञानस्य प्रमाणभूतस्य 


¢+ ~~ 


जेयम्‌ इते साङ्गरामहं ! कस्मात्‌ ? निश्चितज्ञानोच्पत्तिविषयत्रात्‌ ॥ 

यादि चंतदस्त स्वकूपतो नाभविष्यत्‌ नेद्‌ निनिषयं ्ञनधृदपर्स्यत। 
रथा शराविष्राणादि निश्चितज्ञानेत्पत्तिकारण न मवति । न च तथेह 
निश्चितवस्तुज्ञानोत्पत्तिहेतुविषयघ्वं न विधते | सकल्जनानुभवविषयमिदं ज्ञानं 


+ क 


वतेते । घटो मव्रिष्यति घटो भूत इति च । तस्माद्रस्तेव काट्त्रयसम्बम्धि । 


परिनिश्चितज्ञानोसत्तिषिषयत्वात्‌ ॥ 

अथ वा नाव्स्तुत्ि्रयमतीते भविष्यति च घटादौ ज्ञानम्‌ । 
राब्दविकल्पितले सति निश्ितस्येण उत्प्यमानत्वात्‌ , वतेमानधट।- 
दिविषयज्ञानवत्‌ । अन्यभिचाराच । लिङ्गाठमेयत्वाच, धूमेन अग्न्यादिज्ञाचवत्‌ । 
ठिङ्गदरनानन्तरोत्पत्तर्ना ॥ 

यद्वा, अतीतमन।गते च चर्तु सत्‌ स्वरूपेण, लिङ्गद रनानन्तरघुद्धि- 
विषयत्वात्‌ , प्रसिद्धादुमेयवत्‌ । तस्मादतीतानागतं स्वहूपतोऽस्ि ॥ 


2 च-भोगमागीयस्य भोगहितस्य यागदेः, अपवगैभागीयस्य वा 
अपवगेहितस्ये समाध्यदेः कर्मणः फरुपुचित्सु यस्य नास्ति तस्य॒ वादिनः 
तत्‌ निर्पाख्य प्रपषोति राराव्रिषणवत्‌ । न हि राराविषणे भविष्यती. 
व्युपास्यायते । न तयेह । किं तिं यिन स्वर्गो भविष्यति) समाव्यादिना 
मोक्षो भविष्यति इति च कुशैः अतिकटठेोरमतिमिस्पाख्यायते ॥ 

। तस्मात्‌ निरुपाल्यतात्‌ तदुदेशेन फरोदेरेन । निरुपास्यत्वात्‌ 
तेन फटेन तिपित्तेन कुशछानुज्ञानम्‌ इदं करु भविप्यति चानेनादः इति 
स्वयमप्रतिपदयमानाः कुरकाः कथमनुजानीयुः उपदिशेयुवौ । रि च, 
टृष्टमात्रप्रतिपत्तो कुरारक्रुराखाविरेषश्च प्रति । कुशलानां वा मिथ्यप्रतिपत्तिः 
अकुला: समीर्चीनद रोना; इति ॥ 


1. वुष्ठान 


केवल्यपाद्‌ः चतुथः ३३५ 


[ भाष्यम्‌ ] 
फलस निमित्तं वरषमानीकरणे समर्थं नापूर्वोपजनने ¦! सिद्धं निमित्त 
नैमितिकल विशेषानुग्रह" कुरते नापूर्व॑मुखादयतीति ॥ 


धमी चनेकषर्मस्वमावस्तस्य चाध्वमेदेन धर्मः प्रत्यवस्थिताः 
न च यथा वतमाने भ्यक्तिविशेषापन्नं द्रभ्यतोऽस्व्येवमतीतमनागतश्च । किः 
तर्हि ? स्वेनेव व्यङ्गथेन स्वरूपेणानागतमसि । सवेन चानुमूतव्यक्तिकेन 


[ विवरणम्‌ ] 
(4 मि 3 
किं च, अभावन्ञानात्‌ कुदरा अपि फडाय नाभिसमीहेरन्‌ः । 
अभावाविरोषाच्च क।रणनियमो नाकल्पिभ्यत । (न) सवैतो वा सत्रमुद्पत्स्यत । 
नापि कारणपरुपादस्यत । उपादाने वा तेखाथी सेकतमध्युपाद।स्यत # तिङेरने- 
कायासनिष्पयिः । अत्यन्तासदपूवै चेदमजनिभ्यत । न चैतद्‌ दृष्टम्‌ ॥ 


तस्मात्तद्धेगभागीयमपवरभागीयं वा कमे निमित्त कारणं विधमान- 
स्यैव तस्य फलस्य वतेमानीकरणे समर्थं ॑नापूरवपजने । सिद्धं हि 
स्वेनाल्मना निमित्तं स्थाली क्षीरघर्मीतश्नादि दध्यादिकस्य नैमित्तिकस्य 
करकैशतरमावाधमिन्यक्तिद्ररेण विशेषानुप्रहं ऊुसते-न।पूर्ेमेव द षि उसाद- 
यति तथेह मेगभागीयादिकम ॥ 


किच, धर्मी चनिकधर्मस्वभावोऽनेकधम॑प्ना | यथा कनकपिण्डः 
शान्तोदितान्यपदेयरुचकङ्ण्डलादिधरमासकः । तस्य धर्मिणः अध्वमेदेन 
अतीतादिलक्षणमेदेन धमः प्रयवस्थितराः ॥ 


यथा वतमानं वस्तु व्यक्तिविशेषापन्ने इण्८दिन्यक्तिप्रप्ं द्रव्यतः 
कार्यरूपतः अस्ति व्यापाराधिरूढतया, नैवमतीतमनागतं च । कि तर्हि! 
स्वेतैव व्यज्गयेन स्वस्पेण मविष्यत। अनागतमति । सखेन चानुभूत- 
व्यक्तेकेन अतिकान्तोपरन्धिकेन अतीतमस्ति ॥ 


1, णं 

2. कथ 

3. अत्र आदशेकोश्चे इत उपरि 'व्रहिरदेशान्तरे” इत्यादि वाक्यं लिखितम्‌ 
तस्यानन्वयात्‌ , 9. पुटेम्यः पश्चात्‌ लिखित ““अमावाविशषाचः इत्यादि वाक्यं 
योजितम्‌ ॥ 


३३६ पातञ्जखयोगसूत्रभाष्यविचरणे 


[ भाष्यम्‌ ] 
स्वषूपेणातीतमिति । वतेमानस्यवाध्वनः स्वहूपश्यक्तिरिति नसा 
भवत्यतीतानागतयोरध्वनाः । एकस्य चाध्वनः समये द्वध्वानौ 
धर्भिसमन्वागते [न] भवत एवेति नामूखा मावस्लयाणामध्वनामिति ॥ १२॥ 
[ विवरणम्‌ ] 

वतेमानस्येव सध्वनः स्वरूपतो व्यक्तिरिति न सा व्यक्तिः 
भवलतीतानागतयोरध्वनोः । एकस्य चाध्वनः समये कटिद्वावध्वानौ 
धर्मिसमन्वागातो परिरोधातच्‌ म भवत एवेति । तथा चोक्तोऽच्वसेकरपरिहारः ॥ 

यस्य पुनरतीतमनागतं च रक्षणे स्वरूपेण. नास्ति, तस्य धर्माणाम 
ध्वभेदो न प्राप्रोति । कथम्‌ श्न हि तस्य धटो मधिष्यन्नतीतो वा विद्यते. | 
न हि कपाङानि पिण्डि वा घटः । इद्येकस्य वतमानस्यैवाष्वनः समये 
त्रयाणामध्वनीं घमखेन समागमः स्यात्‌ । अतश्च वतमान एव षटोऽतीतोऽ- 
नागत इति चोष्येत पिण्डकपाल्योरघट्त्वाव मृदि च घटस्यामावाद्रविभ्यति 
घटो ऽतीतो घट इति च प्रिण्डक्पाठे निरश्च्येयाताम्‌ । तथा चः विवक्षतो 
नोरप्यश्च इति स्यादश्चोऽपि गौरिति ॥ 

अथेव्येत) घटस्य प्रगमावध्रष्वस्ामावावतीतानागतत्ेनामिधीयते इति 
ततोऽप्येष पापीयानभ्युपरमः । तत्र युक्तमपि गौरश्च इति वस्तुव्रदेतयोः | 
नवह वस्तुवाचिना शब्देन धटोऽतीतोऽनागत इति चाभावरस्यामिधानं 
युज्यते स[व्य]त्ववादिनाम्‌ ॥ 

नपि . नियम उपपथते । षटेनैव ग्यपदिर्यते, घटोऽतीतो घटे 
भविष्यतीति च । न पुनः कुखलादिभिरपदिश्यते कुरखखादयोऽतीता 
भविभ्यन्ति वेति ॥ 

अथ घटस्येव तत्रायुपटम्यमानघादिति चेत-न-हस्तिशादंखदीनामपि 
तत्रानुपलम्मे व्यपदेशप्रसङ्गात्‌ । अथेप्न्धपूर्स्येव व्यपदेश इति चेत्‌-न- 
धघटक्रियादिष्वपिं प्रसङ्गात्‌ ॥ 

अथ घटस्य तेन क्रिया्माव इति चेत्‌--न--अभावस्य सम्बन्ध 
विरोषानुपपत्तेः । न हि समवायलक्षणः प्राक्तिलक्षणौ वा सम्बन्धो मावाभाव- 
योरवकृल्पते । येनासौ घटस्य अमावो न पुनः क्रियादीनाम्‌। अन्यतरसम्बन्धे च 
अभावस्य वस्तुतप्रसङ्गः । अथ वस्लेवेति चेत्‌, सिद्धस्तहिं मविष्यननतीतश्च 
पदाथः ॥ । 


कैवल्यपादः चतुथः ३३७ 


द | सूत्रम्‌ । 
ते व्यक्तसृक्ष्मा गुणात्मानः ॥ १३ ॥ 
| माष्यम्‌ | 
ते खल्वमी त्यध्वानो घमा वतमाना व्यक्तासमानोऽतीतानागताः 
सुक्ष्मासमानः षडविरेषरूपाः। = ` 
[| विवरणम्‌ | 
अधापच।रात्‌ सिद्धकपारवस्य। अव्रयवा भविष्यति घटे भूतो धट इति 
चापदिर्येरन्‌ सम्बन्धात्‌ , तयथा-अनन प्राणा इति, अत्रापि यथा कुकालचक्रदण्ड- 
सूत्रादिषु घटो नास्ति, तथा पिण्डकपटेष्वपीतिं तद मावा च कपिश 
घटे[ऽर्त।त इति व्यपदेशो न कुखाल्।दिथिति नियमानुपपत्तिः ॥ 


न चापि विधानानां साधनानां घटादिनिष्पादिनामप्यविद्यमानैरुत्पायै- 
घटादिभिः सम्बन्ध उपप्यते । न चासति सम्बन्पे घटेत्पादनाभिप्रायेण 
कारकप्रबरत्तिः ॥ 


अथायुतसिद्धः समवायलक्षणः सम्बन्धो उन्यानां कारणानां च न 
प्रतिषिध्यत इति चेत्‌-न-युतपिद्धायुतस्िद्धप्स्य समानकाङ्माविनां वस्तूनां 
दर्शनात्‌ । न मवामत्रयोः कचचिदपि युतसिद्धव्वमथुतसिद्धसं वा दृस्यते ॥ 


क 


तस्माजन्यजनकाना्मपि सम्बन्धाम्युपगमाद्विवमानत्वमेवेति, उपपत्तेः 
प्रामू्वं च वियते कावेम्‌ , वस्वन्तरसम्बन्धात्‌ , प्रपिद्वधटादिषवत्‌ । उपर्प्स्य- 
मानत्वादुपरन्धत्वाच, अपवरकस्थघटदिवत्‌ । उदिदिय कतर प्राप्यल्वात्‌ , 
देरान्तरवत्‌ । तया कवृव्यापारप्राप्यताचेति ॥ 

किं च, न लौकिका अतीतानागतश्चब्द्‌म्यां गणनकमलिनावद विधमानमथ 
प्रतियन्ति प्रतिपादयन्ति वा । तस्मादतीतमनागतं च पठरूपतो त्रेत ए। 
नामूत्वा मावस््रयाणामध्वनाम्‌ । किं तिं? विदमानानामेवामिभ्यक्तिः ॥ 


4 0 _ 


तस्मार्याक्तख्पेण वासनानामलन्तविनिद्ृत्तिः । गुणरूपेण तु सतीनामपि 
कायासमर्थलानन केवल्यामावदेोषः । नापि सिद्धान्ततिरेधः ॥ १२ ॥ 


अतीतानागतवतमानधमौः केन पुना ख्येण सन्तीति तस्प्रतिपादना्- 
माह-ते व्यक्तसु्ष्मा गुणात्मानः । ते खल्वमी त्यध्वानः अतीतानागतवतै- 
मानाष्वत्रयोपारूढाः धमाः वतमानाः वर्वेमानरुक्षणेपारूढाः व्यक्तात्मनः 
44 


३३८ पातञ्जख्योगसूत्रभाष्यविवरणे 


| भाष्यम्‌ | 
सवेमिदं गुणानां सेनिवेशविशेषमात्रमिति परमाथतो गुणाटमानः । 
तथा च शाञ्चनुशासनम्‌- 


^ गुणानां परमं रूपं न दिप पृच्छति । 
यत्तु दृष्टिपथं प्राप्तं तन्मायेव सुतुच्छकम्‌ "' इति ॥ १३ ॥ 


यदा तु सर्वे गुणाः, कथमेकः शन्द एकमिन्दरियमिति-- 


[ सूत्रम्‌ ] 
परिणामेकत्वादह.स्व॒तच्म्‌ ॥ १४ ॥ 


[ विवरणम्‌ | | 
टोकप्रस्ययविषयीभूतस्वमावाः । अतीतानागताः सृक्ष्मात्मानः लोकप्र्यय- 
विषयमावमप्रापताः षृडविशेषस्वरूपाः अस्मितदिस्वभावा; । ततश्च व्यक्तातमानः 
षोडशविंकाराः कार्यकरणलक्षणा; ॥ 


स्व॑मिदम्‌ आध्यामिकं कार्यकारणषूपं ग्यक्तात्मकं, यच्च सूष्ममविशेष- 
लक्षणमस्मितादि, यच्च लिङ्गमात्रं सृक्ष्मलाविरेष्त्‌ , सर्वमिदं जगत्‌ गुणानां 


स्वरजस्तमतां प्रस्याप्रृत्तिस्थितिशीकानां सत्निवेशविशेषमात्रमिति परमाथेता 
गणाम्‌ः गुणस्वभावाः ॥ 


तथा च शास्त्ानुशासनम्‌- गुणानां परमं रूपं सं परमायर्पमनपायो- 
पजनात्मकमेकेकस्य । तच न र्टिपिथमूृच्छति । न दृष्टिगोचरीमवति । यत्त॒ 
दृष्टिपथं प्रापि युणाप्िर्देन विधमभावकृतसननिवेशलक्षणे, तन्ायेव न ठ 
मायेव, अपतार्वातत्‌ मायावदिति । सुतुच्छकम्‌ अ्यल्पमकद शाम त्रपरिणामलवात्‌ 
साम्यावस्थनां गुणानाम्‌ ॥ १२ ॥ 


यदा सर्वे गुणाः प्रषिन्यादयः, तदा कथमेकः शब्दः शाक्ादिजनितः। 
एकमिन्द्ियं शरोत्रादिकमियेकबुद्धवाटम्बनलं मेत्‌। न खदु मवितन्यम्‌ | त्रिगुण- . 
स्वन हि कारणेन त्रघ इति प्रययः स्यात्‌ । एवरमिद्धियाणां च प्रयेकं त्रितम्‌ | 
तथा च नियमो न प्रातिति । न हि ग्रह्यस्मेकस्येतर शब्दस्य, प्राहकत्वं चेकस्य 
श्रोत्रस्य, इति नियम उपकल्पते । तथा सञ्चीदिषु, खमिन्दियादिषु च योज्यम्‌ । ` 
नियमश्च दृते । कारणं तत्र वचनीयमिल्याह --परिणामेकखा्रस्तुतस्वम्‌ ॥ 


कैवल्यपादः चतुथः ३३९ 
[ माष्यम्‌ | 


(५ [र >| 


प्रया 'प्रचतिस्थितिशीखानां युगानां ग्रहणात्मकानां करणभविनेक 
परिणामः श्रोत्रेगन्द्रियं, प्राह्यात्मकरानां शशब्दम।वनैकः परिणामः शब्दो 
विषय इति । राब्दादीनां मूतिप्रमानजातीयानामेकः परिणामः परथि- 
वीपरमाणुप्तन्माव्रावयवस्तेषां चैकः परिणामः परथिवी ग््रक्षः पेत 
दयेवमादिमूतान्तरेष्वपि सेदोष्ण्यप्रणामितावकाशदानान्यु रदाय सामा- 
न्यमेकविकारारम्भः समाेयः॥ 

[ विवरणम्‌ | 

प्रल्याप्रवृत्तिध्थितिशीलानां गुणानां प्रहणात्मक्रानां सचप्राधान्यात्‌ 
मोधासनामस्तित्तस्थानानां करणमावनैकः परिणामः श्रोचेन्द्रियम्‌ । यथा 
विरुद्धानां तैर्वातितेजसां प्रदीपः । तथा खगादीन्धियेषु पुरुष यतिकरणीये 


५ (म 


ग्रयुक्तानम्त,क।पन्द्रय प(रणाम इतं चाज्यम्‌ ॥ 


तथा ग्रह्यासमकानां गुणानां तमःप्रधानानां शब्द भवितैकः परिणामः 
शब्दो विषयः । तथा शब्दादीनां मूर्तिसमनिजातीयानां समानाम्‌ एकः 
गन्धतन्मात्रावयवः परिणामः प्रथित्रीपरमाणुः । तेषां परमाणूनाम्‌ एकः 
परियिमः परथिवी मोक्षः पवैत इयेवमादिः ॥ 

भूतान्तरेष्वपि योग्यम्‌ । रशब्दस्प्रूपरसानां स्नेहसूमानजातीयानाम्‌ 
[एकः परिणामः रसतन्मात्रावयवः जल्परमाणुः । तेषां परमाणूनामेकः परिणामे 
जलम्‌ ] ॥ । 

राब्दस्पदरूपाणासुष्णलप्तमानजातीयानानेकः परिणामो दूपतन्मात्रावयवः 
तेजःपरमाणुः । तेषां परमाणूनमिकः परिणामा वह्निः सटिटेन्धनो 
दारुराकचर्दौपनश्च ॥ 

तथा रशब्दस्प्ययोः प्रणापितस्तमानजातीययोः स्पर्यतन्पात्रावयवः बायु- 
परमाणुरेकः परिणामः । तेषां परमाणूमामेकः परिणामः वायुः सप्त मस्द्रणाश्च ॥ 

तथा शब्दतन्मात्रावयवानामनाबरतत्वस्तमानजतीयानमिकः परिणाम 
आकाशः । इव्येवभुक्तेन मर्ण स्नेहोष्यप्रणामितादयुपादाय सामान्यमेक- 
विकारारम्भः समाधेयः. योज्यः । तस्म द्हूनामप्येकपरिणामित्वादेकविषयतवं, 
मरह्य्रहणनियमश्च सर्वमुपपद्यते ॥ 





1. क्रियास्थि- 2 -जमि- 3. शम्दतन्मान्‌ 


३४० पातज्ञलयोगसूत्रभाष्याविवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
नास्लर्थो विज्ञानविसह चरः, अस्ति तु विज्ञानम्थविसहचरं खमभादौ 
कलिपितमिल 'मुया दिञ्चा ये वस्तुखरूपमपहवते ज्ञानपरिकर्पनामात्रं वस्तु 
सखभविषयोपमं न परमार्थतोऽस्तीति य आहुस्ते तथेति प्रद्युपयित- 


विवरणम्‌ | 

ननु च नास्सेवापतौ एकप्रत्ययक्रेषयः शब्दादिः । एतत्त स्व॑ विन्ञान- 
परिजम्भितमेव, विज्ञानभावभावितात्‌ । कथं तद्धावमावितवमित्याह-- नास्त्यर्थो 
विज्ञानविपह चरः पएरथगिज्ञान।दुपटन्धः पृथग्भावी वा । विन्ञानम्थविसहचरं 
प्थक्तेनपरन्धं प्रथगमावि वा अस्ति । तस्माद्यो व्िज्ञानन्यतिरेकेण नास्तीति 
प्रतिजानीमहे ॥ 

प्रमाणमप्यत्र मवति -- विज्ञानग्यतिरेकेण नास्ति ग्राह्यं वस्तु, विन्ञान- 
यतिर्केणानुषरम्यमानघात्‌ , विक्ञानखस्यवत्‌ । - वह्या्थदून्यानि जप्रदवि- 
ज्ञानानि, विक्ञानतरात्‌, स्वप्तमयव्िन्ञानव्रत्‌ । विज्ञानपरिकल्पिता वा ज्र 
दविषया;, व्रिषयत्वात्‌ ; स्वप्नविषथवत्‌ । विज्ञानं वा विषयन्पतिरेकिं, 
निज्ञानत्वात्‌ , स्वमविज्ञानवदिति ॥ 

यदेवं स्यात्‌ किं नरछिन्नं स्यात्‌ £ पुरुषष्य दृद्यव्रियोयात्‌ कैवल्यं 
प्रस्तुते न प्िद्धं स्यात्‌ ॥ 

यथा उपलभ्यमानस्य स्तम्मदेरमाव्रः एवमुपरम्यमानत्वाद्विज्ञानस्यप्य- 
मावः । तदमवि च लिङ्गामवादुपलच्धुर्यमावः प्राप्तुयादिति, क्य कैवल्यम्‌ ? 
केन दर॑येन वियोगः स्थात्‌ ? केन सम्प्रयोगे वा बन्धः प्रतिज्ञयेत १ बन्धाभावे 
च.भ्युदयनिःप्रयताधप्रदीत्तफडता न प्रसज्यत ॥ 

वि चान्यत्‌-विक्ञानव्धातिरेकेणा् नास्तीति त्रुवता विज्ञानमथ इति 
चैकः पदार्थोऽभ्युपगतो भर्वति, यथा--अग्निरनल इति । एवं च सति विज्ञानं 
प्राह प्राहकम्‌ , अथः प्रह्मो प्राहकश्चेति नाममात्रे विप्रतिपत्तिः; न पुनरेकस्य 
प्राह्यप्राहकमावः प्रयद्यायते । तथा च सति पुरुषस्यापि ग्राह्यप्राहकभावः 


(+ (५ 


प्राप्तः । तथाप विभ्रमद्घानवक्द्ट6;) इयवमादया भूयात्ता दषाः ब्राल्तुवनन्त ॥ 


तस्मात्‌ अपरया दिशा अनेन न्यायामास्त्रङेन ये वस्तुस्वहूपमपडवते 
जञानपर्किसनापात्रे वस्तु स्वप्नविषयोपमम्‌ ;, न तु प्रमाथतोऽस्तीति, 





1. -नया 


` कैवल्यपादः चतुथः २४९१ 
१ ध [ भाष्यम्‌ ] . 
मिदं खम।हास््येन वस्तु कथमप्रमाणास्मकेन विकल्पन्ञानवरेन वस्तु 
'खयमुपयद्य तदेवापटपन्तः श्रद्धेयवचनाः स्युः ॥ १४ ॥ 
कुतश्चेतदन्याय्यम्‌-- 
५ _ ~ ( सूजभ्‌ 
वस्तुसाम्ये चित्तभेदाच्यो विविक्तः पन्थाः ॥ १५॥ 
[ विचरणम्‌ | | 
ते स्य तथेति अभ्युपगम्य स्वमाहास्मयेन प्रदयुपस्थितं वस्तु कथम- 
प्माणात्मकेन विकरलज्ञानबलन वस्तु स्वयमुपग्रह्य अभ्युपगम्य तदेष 
अन्युपगत अपठपन्तः इदमिदयभ्युपद्य इदं नस्तीलपुवानाः श्रद्धेयवचनाः 
स्युः । न हि स्वादुभतरप्रल्यारूपापिनः श्रद्धानीयवचनविस्तारा भवितुमर्हन्ति ॥ 


क ज क 


तत्र विज्ञानव्यतिरेकेणाथी नास्तीति प्रयक्षवरिसेधिनी प्रतिज्ञा | सवेद 
नीकारकं विज्ञानं प्रतीयामः । प्रथुबुध्नायाकारमथं प्रतिप्यमहि । प्राहकं च 
विज्ञानमवभासके, अवमासनीयश्वथः । स्लक्षणमेदेनाथज्ञानयोरुपरम्यमान- 
त्वानान्थतिरेकगन्धोऽपि । ततश्च व्यतिरेकेणानुपरम्यमान्ादिलसिद्धो 
हेतुस्तव ॥ 


न च ज्ञानस्यैव प्रथुवुव्ना्ाकारता । ज्ञानस्यैकस्यावमास्यावभापकलानु- 
पपत्तः -प्रदीपस्येव केवर्स्य । भिन्नयोः प्रदीपयोः प्रकादयप्रकारकलतानुपरम्भा- 
देकस्य च स्वासनि प्राप्तयस्तम्भवात्‌ , एवं ज्ञानस्य ॥ 

अपिचानेकान्तिकश्च बुद्धेन प्रतिपरक्षवादिना च। न चासो नास्तीति 
शक्यं प्रतिज्ञातु, यं प्रति स्तिपाधयिषरसि, स चेत्तद्विज्ञानभ्यतिरिक्तः) तथा 
घटादिरपि सिध्यति ॥ 


स्वप्लज्ञानमपरि उपठन्धाधविषयत्वात्‌ न निरारबनम्‌ । प्रतिज्ञाया; 
प्रयक्षविरोधो खोकविरोधश्च | सवं॑ज्ञानं सारम्बनं, ज्ञानघात्‌ , प्रतिव।- 
दिदुष्टवक्यज्ञानवत्‌ » स्ववाक्यगुणज्ञानव्च । ततश्च ज्ञानत्रादीनां निरा. 
वनत्वहेतूनमिवमादिमिरनै कान्तिकत। ॥ १४ ॥ 
| ( ( स्तं [क 9१ [कप 
कुतश्चेतदन्याय्यं गृह्यमाणे वस्तु नास्तीति ? वस्तुप्ताम्ये चित्तेमदात्त- 


[ क [क [4) = 


योर्विंविक्तः पन्थाः । बहुचित्ताठम्बनीमूतं अनेकचित्तविषरयी भूतं एकं वस्तु 


1. स्वरूपमुत्यञ्य 2. विभक्तः 





३४२ पातज्ञख्यगसूत्रभाष्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ ] 

वहुचित्तारम्बनीभूतमेकं वस्तु साधारणं, तत्खलु नैकचित्तपरि- 
कलिपतं, नाप्यनेकचित्तपखिस्पितं, किं तु 'खर्ूपप्रतिषठम्‌ । कथम्‌! 
वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्‌ | 

घमोपेक्षंचित्तख वस्तुमाम्ये ऽपिं सुखज्ञानं मवति । अषर्मपक्ष 
तत एष दुःखज्ञानम्‌ । अविदयपिक्षं तत एव मूढज्ञानम्‌ । सम्यग्द्शनपिक्षं 
तत एव॒ माध्यस्थ्यज्ञानपिति । कष्य तच्चित्तेन परिल्पितम्‌ । 
न चान्यचित्तपरिकिलिपदेनार्थेनान्यस्य चित्तोपरागो युक्तः । तस्माद्स्तु- 
ज्ञानये ग्री्यग्रहणमेर भिन्नया विभक्तः पन्थाः । नानयोः संकरगन्धोऽ- 
प्यस्तीति ॥ 

[ विक्षरणम्‌ [| 

पुत्रादिकं स्राधारणं समानम्‌ । तत्‌ खलु नेकचित्ततन्त्रं भवति । एकचित्त- 
तन्त्रत्वामावाद्रनेक्रवित्तपरिकिल्पितमपि न मवति ॥ 

किन्तु स्वरुपप्रति्ठ चित्तनियेकष स्वतन्त्रतया व्यवस्यितम्‌ । कथम्‌ ? 
व्रतुषाम्ये वस्तुनः पुत्रदेरेकसरे चित्तभेदात्‌ एकस्मिन्‌ पुत्रादिविष्रये विषयि- 
णां ज्ञानानामनकलात्‌ ॥ 


कथं चित्तभेद इव्याह--पमपेश्ं चित्तस्य वस्तुसाम्येऽपि यथा पुत्रत 
एव मातापित्रोः. सुखनज्नाने मवति । तत एव पुत्रदेः अधमपेक्षं अहितानां 
दुःखेज्ञानं उपजनिष्यते ॥ 

तस्मोदवाविद्यपिक्षं कापुकानां मूढन्ञानम्‌ । तत॒ एव॒ पुत्रदिः 
सम्यम्ज्ञानपिक्षं योगिनां माध्यस्थ्यनज्ञाने हेयोषदियद्युन्यपुतचते । कौरे- 
यादीनां तत एव लखोमपिक्षया भक्ष्यज्ञानम्‌ । तत एव पूत्रदिर्विर्कस्य दुणपादि- 
ज्ञानम्‌ ॥ 

यदि कस्य्चिचत्तन पारिकल्पितममव्रिष्यत्‌ (न) अन्यचित्तपरकित्पिते- 
नान्येषां चित्तमुपारष्यत । नैतचुक्त, अव्यन्तातम्बद्वान।मदरानात्‌ । यदि चान्य- 
परकिल्ितेनप्यन्यचित्तोपरागो ऽमविष्यत्‌ , तदा सर्मेऽपि सज समक्ञास्यन्त | न 
चेदं दृष्टम्‌ । तस्मात्‌ न चित्तप्किलिपतं वस्ति, वस्तुज्ञानयोः ग्राह्यग्रहण- 
मेदाद्धिज्नयोर्विविक्तः पन्थाः । नानयोः सङ्करगन्धोऽप्यस्ि ॥ 


1. स्वर 


कैवल्यपादः चतुथः ३४३ 


| भाष्यम्‌ ] 
साङ्ख्यपक्षे पुनवस्तु त्रिगुणं चट च गुणवृत्तमिति धमोदि- 


निमित्तापिक्षं चित्तेरमिसंवध्यते । निमित्तातुरूपस्य च प्रस्ययस्योतचमानष्य 
भ > = = € _ (= ५ ^ न वि च व 
तन ॒तेनाऽसमना हेतुमति । केचिदाहुः जानसहमूरवाथ मोग्य- 
त्वात्‌ घुखादिवदिति । त एतया दारा साधाए्णखं बाधमानाः पूरवोत्तिर- 
्षणघु वस्तुरूपमेवापहउत ॥ १५ ॥ 


[ विवरणम्‌ | 

एखज्ञानालम्बर्न भूतं पुत्रादिवस्तु न तज्ज्ञानपरिकल्पितम्‌ , तद्धिरुद्धनिक- 
चेत्तोपरञ्जक्वात्‌ , वादिभ्रतिवदिप्रतिज्ञागुणदे।षतदामासवत्‌ । वादिप्रतिादि- 
प्रतीनामपिं विन्ञानमात्रवे साव्यसताध्रनादिव्यवहारविलोपः स्यात्‌ ॥ 

अथ स्ववि्ञानव्यतिरेकेण तेषां ज्ञानरूपाणामेव प्रथक्छमिति चत्‌-अस्तु | 
तदेव ॒वप्तु ज्ञानान्तरविष्रयघ।दथन्तर सिद्धम्‌ । सङ्गामत्रे विप्रतिपत्तिः | 
कविषपिकिषयभदस्तु न साध्यः | तस्मान्नानयोः संकरगन्धोऽपीति ॥ 

अथ वस्तुनि स्वख्यप्रतिष्टेऽपि पुखादिमिनप्रययारम्बनता न समाची- 
नरूपेति वेत्--अत्रेच्यते-- वस्तु पुनस्तिगुणं चरं गुणवृत्तमिति 
धर्मादिनिमित्तं चक्षय चित्तः घुखदुःखादिमेदख्ेपण अमिततवध्यते 
परि.।मित्ादनकशक्तेवाच ॥ 

धगीदिनिमित्तानुरूपस्य चोत्पचयमानस्य प्रययण्य तेन तेन निमित्तेन 
आसना हेतुमंवति । स्राप्मना धम।दिनिमित्तपेक्षंपुत्रादिवस्तु एुखहेतुभवति । 
रजअत्मना = तधमनिमित्तपिशं दुःखहेतुभेवति । तमआसना वतव्रिवपिक्षं 
तदेव वस्तु मोहदेतुभवति । सुत्तामात्रात्मना सम्यग्दशनपेक्षं तद 
माध्यस्थ्यज्ञ नहे तुभवति ॥ 

केचिदाहुः एषमिव वैद्धानामन्यतमे वाह्यमर्मभ्युपगच्छन्त आहुः-- 
ज्ञानपहमूरवा्थैः, यथा विज्ञाने प्रतिक्षणं धर्िद्यून्यै उत्ते विनर्यति च, 
तथा सहेव ज्ञानेन विज्ञायते विनङ्यति च, भोग्यलात्‌, सुखादिवत्‌ । 
तचधां--घुखदुःखादिरूपं भोग्ये विज्ञानसहोप्पत्तिविनाशमसाध(रणम्‌ , एवं 
घटादिरथेऽपि विज्ञानपमानसमयजन्मविनाद एव, मोग्यत्वादिति ॥ 

तेऽपि तथैव विक्ञानवादिवत्‌ साधारणस्वं अनेकषुखारिचित्ताकम्बनलं 
बाधमानाः पूर्वोत्तरक्षणेषु स्कीयक्रिज्ञानेपत्त;ः पौरस्य क्षणेषु पश्वायेष्र च 
बस्तु नास्तीति वस्तुस्वरूपमेवपहूवते ॥ 


३४४ पातञ्ञल्योगसूत्रभाष्यविवरणे 


[ सूत्रम्‌ | 

न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात्‌ ॥ १६ ॥ 
[ भाष्यप्‌ | 

एकवित्ततन्त्ं चेदस्तु स्यात्तदा "तचत्त व्यग्रे निरुद्धे वाऽखरूप- 


[ विवरणम्‌ | 

तस्मात्‌ न हि वस्तुनः स्व्यं विज्ञानसहमावि, तदेवेदमिति 
प्रल्यभिन्ञानात्‌ । नाचिरजन्मप्रख्य तदेधदमिति प्रल्यमिज्ञयेत,) यथा विज्ञानम्‌ | 
नहि तदेवारो मे विज्ञानमिति भर्वति | वस्तु पुनस्तदेषेदमिति प्रत्यभिज्ञायते | 
अथन्ञानयोरेकपमयभविलेऽप्येक[पद्दिषः]विशेष; स्यात्‌ ॥ 

नपि साद्दषात्‌ प्रसभिनज्ञानम्‌ । ्राह्यप्राहकयोयुगपदु्पातिविनाराव- 
सात्‌ । भ्यवस्थिते हि वस्खन्तरद्ये अन्यतत्सदटरवस्तुदरनेन साद्स्य- 
पर्ययः । एवे तत्पदं वा द््यामीदुत्तराभिखषः | न हि तदहन॑श्चितमरणस्या- 
परेदयुरथदरनाकांक्षा जायते । नापि मस्सद्डा रक्षिष्यत इल्यमिट्षति । न 
चैवे दृष्टम्‌ । स्रो हि स्वाथमीहते । भिननक्तन्ततिष्वद शनात्‌ ॥ 


तस्मादिदानीतनोऽथः नेदानीन्तनज्ञानसह भूरेवेति, म्राह्यत्वात्‌ , 
अतीताथवत्‌ । अतीतो वा नातीतज्ञानसहनाजन्मा, ग्राह्यत्वात्‌ , इदानीन्त- 
नार्थवत्‌ । मूतभविष्यञ्ज्ञानम्राह्ा अथा अधुनाऽपि सन्ति, ग्रह्य्ात्‌ , अघुनातन- 
प्रत्ययग्राह्यपत्‌ । इदानीन्तनमपिं बस्तु पूर्वात्तरक्षणेष तथत्र ॥ 

अध एुखदुःखन्ञानादेभेरनेकान्तिकमिति चेत्‌-न--अतीतानागतं 
स्वरूपतोऽत्तीति साधितत्वात्‌ 1 एवं च सति षुखादीनां च स्वरूपेण सद्वावात्‌ 
युखादिवदिति साध्यसमानो दृष्टान्तः ॥ 

अथ वतमानरूपविरेबेणातीतानागतलक्षणयोर्थस्य घुखादिवदभाव 
इति चेत्‌ , सिद्धसाष्यता | न हि कुमारमाव एव वद्धे वियते ॥ १५ ॥ 

इतश्च ॒चित्ततन्त्रता वस्तुनो नावकल्पते । एकचित्ततन्त्रे वा वस्तु 
भवेदनेकचित्ततन्त्रं वा एकचित्ततन्तरवे त्रृमः--न चैकाचित्ततन्त्रं वस्तु 
तदप्रमाणकं तदा 9 स्यात्‌ ? न तावदेकचित्ततन््, एक्रचितततन्ते चेद्रसतु 
सात्‌ यदि चेदमुच्यते, तच्चित्ते यचित्ततन्त्रे वस्तु तरिमित्ते व्ये परा्तक्ते 





५. 


1. चित्ते 


केवल्यपाद्‌ः चतुथः ३४५ 


[ भाष्यम्‌ | 
मेव तेनापशमृष्टमन्यस्याविषर्याभूतमप्रमाणकमगरदी तस्वभावकं केनचित्तदानीं 
किं तस्स्यात्‌ । सेबध्यमाने' व। पुनश्चि्ेन कुत उयेत । ये चाखानु- 
परिता भागास्ते चस्य न स्युः । एवं नास्ति पृष्ठमिदयुदरमपि गन खादेव । 
{ विवरणम्‌ ] 
निरुद्धे वा विनष्टे वा तेन प्रमाणचित्तेन अप्रमृष्टं च अन्यस्प चाविषयीमूतं 
एकचित्ततन्त्रतयेव, तदा तत्‌ वस्तु अप्रमाणकमगृहीतस्वभावं प्रमाणाचित्त- 
निरोधादेव तदानीं किं तत्‌ रयात्‌ । न हि किचिदपि स्यात्‌ । चित्तप्रमाणकं 
तत्‌ , तदमात्रे न तेन मवितन्यम्‌ ॥ 


[> 


ननु च यथा तद्प्माणचित्तं निरुध्यत, तयैव तदपि क्षणिकतान्नि- 
रुद्धमेव । कि तत्राभिधःनीयं स्यात्‌ । उच्यते-न- व्थवहारविलपानिय- 
मादुपपत्तेश्च । अग्निरयं मस्परक्षीः, इमे गृहाण, अद्‌; प्रदेहीति व्यवहारो 
व्रिदटुप्येत । एकचित्तसहक्षयसराद सुनः ॥ 


*4 {५ (५ 


तस्सन्ततिजमव्यन्तसदृसं व्यवहारप्रतिपत्ये भवेदिति चेत्‌--अत्रापि 
तत्सन्तानादेव तत्समनिनन्यिनानुमवनीये पर्रमाणस्य च तद्विप्रयभूतमिति 
को नियच्छेत्‌ | न हि नियमहेतुरस्ति ॥ 


अपि च एकचित्ततन्त्रत्वाद्रथवह।रवेखायामन्यत(न)रेदप्रल्ययविषया- 
लम्बनो नान्यत(न)पप्रल्ययो युज्यते । न हि खल्वपि वहूुचित्ततन्त्रं वस्तु । 
ततश्च गृहयणिदं प्रयच्छाद इति कथं भ्यवहरेमहि ॥ 

नाप्येवंदरनश्चाटिनिः शशिष्याचारयोपदेशप्रदानादिभिरन्योन्यं भ्यवहेररन्‌ | 
तस्मान्न चकचित्ततन्त्र वस्तु । प्रमाणचित्तविनारो तद्रधप्रमवे वां अनवधृत- 
स्वभावतादरस्तुनः ॥ 

संबध्यमानं वा वस्तु पुनधित्तेन कुत उसधेत । न कुतश्चिदुतत्ति- 
रुपपध्ते तसन्तानादिति हि प्रल्वोचाम ॥ 

विच, अस्य वस्तुनः अनुपध्थिताः एकस्य प्रसयस्याविषरयीभूता[ये ] 
मागाक्ञेचास्य न स्युः| एको हि वस्तुभागो विषयीभूतश्चित्ततन््ो नान्य; 
इति । नासि पृष्ठमिति उदरमपि अभिमुखीमूतं न खादेव ॥ 





1. चं 
2. न गद्यत | 
44 


३४६ पातञ्चख्यागसूत्रभाष्यविवरण 


[ भाष्यम्‌ | 
तस्मात्‌ खतन्त्रोऽथः सवपुरषपाधारणः स्वतन्त्राणि च चित्तानि प्रतिपुरुषं 
परवतैन्ते । तयोः सेबन्धादुपलन्धिः पुरुषस मोग इति ॥ १६ ॥ 


., [स्म्‌ | 
तदुपरागापे क्षत्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम्‌ ॥ १७॥ 


[ भष्यम्‌ | 
अयस्कान्तमणिकस्ा विषया अयःसधर्मफ चित्तमथित्तवध्यो- 
परज्ञयन्ति । येन च व्िषयेणोपरक्तं चित्त स विषयो ज्ञातः ततोऽन्यः 


~ न 


पुनरज्ञतः । वस्तुनो ज्ञताज्ञातखहूपतात्‌ परिणामि चित्तम्‌ ॥ १७॥ 


[ विवरणम्‌ | 
अग्रापि काकतालीयन्ययिन भूति चित्तानि युगपदुत्पद्चरन्‌ तद्विषय 
च वस्तु तत्समानकाटमुन्मजत्तीति, तदेतेनैव पृष्ठेदराभावनिदशनेन प्रल्या- 
द्यापि । नापि काकताकयच्रत्तान्तेनानादिसमयाधीनो भ्यवह्‌रसागर्‌ उत्तीयैते | 
स्वै च व्ज्ञनदरीनशछधिष् दोषा इहापि समाना एव ॥ 


तस्मात्‌ आह--खतन्त्रोऽ्ः सर्वपुरुषस्‌।धारणः यस्मिनवस्थिते 
समस्तरेकन्धवहार उपकल्पिष्यते । स्वतन्त्राणि च चित्तानि प्रतिपुरुषं 
प्रवर्तन्ते । तयोश्च अभचित्तयोः सम्बन्धादुपलभ्धिः पुरषस भोगः । 
तस्माद्भोक्ता पुरुषः चित्तं करणम्‌ अर्थो व्रिषथः कर्मभूत दयेतेषां मोक्तृकरण- 
कर्मणां विविक्तः पन्थाः ॥ १६ ॥ 


कथे चित्ततद्विष्ययोः सम्बन्धात्‌ पुरुषस्य भोग इव्याह -- यद्वा, यस्य 
चित्तव्यतिरेपरेण वस्तु नास्ति, चित्ततन्त्रमेत्र वा वस्तु, तस्य ज्ञाताज्ञातक्रिषयल- 
मलुपयन्नमिलयाह - तदु पराग पेक्षताचित्तय वस्तु ज्ञाताज्ञातम्‌ । तेन 
व्रिषयण चिनत्तस्ोपरागः ते प्रति अपेक्षा यस्य [तत्‌ ] वित्तं तदुपरागपिश्चम्‌ , 
तस्य भावः तदुपरागषिक्नखं तस्मात्‌ तदुपरागापृक्षखाचित्तखय वस्तु 
ज तिर्ञातम्‌ ॥ । 





1, -क्ित्वा- 


कैवल्यपादः चवृथः ३४७ 


क्‌ [ माष्यम्‌ |] 
यस्य तु तदेव चित्तं विषयस्तस्य-- 


[ सूत्रम्‌ | . 
सदा ज्ञाताधित्तबृत्तयस्तसमोः पुरुषस्यापरिणा- 


मित्रात्‌ ॥ १८ ॥ 
[ विवरणम्‌ | 

येन वस्तुना चित्तमुपरञ्यते तत्‌ ज्ञात, येन च नापरञ्यते तत्‌ 
अज्ञातम्‌ । स चेोपरागश्चित्तपरिणामपिक्षः । इईन्दरियमारीण चित्तं बाह्याकारेण 
परिणममानं हि सम्बध्यते ॥ 

किं पुनश्चित्तपरिणामनिमित्तमिव्याह -- अयस्कान्तमणिकल्पा अय- 
स्कान्तसमानाः विषयाः, अयस्सवमैकं चित्तम्‌--अयस्सधर्मकलसे च विषय- 
सनिधनि विक्रियत इति । विषश्राणामप्ययस्कान्तमणिक्ल्पघं सन्निधिमत्रेण 
चित्तविकरियापादनमामध्यात्‌ । अते विषया आलाक)रण परिणतं चित्तम्‌ 
अभिसुबध्योपरन्नयन्ति ॥ 

येन च षिषयेणोपरक्तं चित्तं स विषयो ज्ञानः । ततोऽन्यः (इन्र) पुनः 
अनुपरज्ञको (काेतरिषयः(या)अज्ञातः (ताः) । तस्मात्‌ वस्तुनो ज।ताज्ञातस्वरूप- 
(विषय)तरात्‌ परिणामि चित्तम्‌ । अथ पुनशित्ततन्त्र एव विषरथश्चित्तमेव वा विष्यः, 
तस्य वादिनः सव्रै्रिषधक्ञत्वमविषयक्ञघ्वं वा भेत्‌ । अज्ञातस्य चित्तस्या- 
भावात्‌ । न चेदं दृश्यते | फिं तहिं ? ज्ञाताज्ञातविषयत्वमेव चित्तस्य प्रति- 
पयामहे । तशचेतत्‌ स्थिरावस्थानानां विषयाणां प्राप्यमावादन्यथा च संबन्धानव- 
कल्पनाद्चित्तपरिणामपक्षमेवेति परिणामितम्‌ ॥ १७ ॥ 

यस्यतु स्वामिनो भोक्तुः तदेव ज्ञाताक्ञातविषपं चित्तं बृत्तिर्पण 
विषयः न हिं निरुद्ृत्तिनशवेतसो विषयमिति, तद पुरुषस्य पदा 
जात।धित्तवृत्तय :[तस्रभोः पुरषखापरिणपिखात्‌ ] । तासां प्रलक्षल्वात्‌ 
सदा ज्ञातेतिषयल्वमप्रसाध्यम्‌ ॥ 

यद्रा प्रलन्षगम्याि त्तदृत्तयः, उपटरग्धलेन राब्दटिङ्ग।नयेक्षं स्म्ममाण- 
त्वात्‌, प्रयक्षोपरब्धघटधत्‌ । निश्चितदूपघाच्च तयेव । संशय व्रिषयताचच | 
यदि दहि सदैवाप्रयक्षाशित्तदृत्तयः, ता वायत्रिषयवत्‌ संरायिता अपि 
कदचित्‌ कश्चन मवेयुः । न हि काश्चन कदाचन संरायमारमसतपातिन्यो 
दृष्टाः | 


३४८ पातज्ञकयो गसूत्रभाष्यविषरणे 


( भाष्यम्‌ | 
, यदि चित्तवस्प्भुरमि पुरषः परिणमेत्‌ ततस्तद्विषयाश्वत्तवृत्तयः 
शब्दादि विषयवज्ज्ञाताज्ञाताः स्युः । सदाज्ातत्वं तु मनसस्तस्रभोः 
पुरुषस्यापरिणामितमतुमापयति ॥ १८ ॥ 
। [[ विवरणम्‌ | 
अपि च, भवति हि कदाचिञ््ञातः सनर्थो ज्ञात इति [प्रतीयमानः] । 
चित्तब्राति्रलक्षा्राद्यतरे [तत्‌] नोपपधते । न च फल्द्ररेणानुमातुं तत्र 
शक्यत । फलस्यानवधारणात्‌ ॥ 


तस्पात्‌ संशयस्य चाविषयलात्‌ , प्रथक्‌ च विषया्धित्तदृत्तीनां 
स्वरूपमत्रेणैव स्मयैमाणत्वात्‌ , सप्रदा सनौ; प्रलक्षाश्चित्तवृत्तयः । तथा 
प्रतिपत्तरवम।सकसात्‌ , करणत्वात्‌, अभिन्यज्ञकत्वाच; प्रदीपादिवत्‌ । 
न तु चक्षुरादिभिरमेकान्तिकल्म्‌ । तत्रापि प्रयक्षम्राह्यत्वात्‌ | यथा प्रदीपाचा- 
लरोकविरिष्टा घटादयो गृह्यन्ते, तथा प्रो्तादिखारेकविशिष्टा एव शब्दादयो 
गृह्यन्ते |] 

न च विविच्याग्रहणादप्रल्क्षच्वमिति शक्यं वक्तुम्‌ । यथा प्रदीपयोः 
परस्परव्यतिभिन्ना रमयः, न चास्यायं रदिमिरस्य चायमिति विषिच्यते, न चं 
तावता तेष्राम्रलक्षत्वम्‌ , [एर] इहापि चक्षुरादीनां तुल्यजातीयवराह्यारेकादि- 
घ्यतिषङ्गद्विविच्यग्रहणम्‌ | न च तावन्मात्रेण तेषरमग्रलयक्षघरम्‌ | यो हि प्र्क्षा- 
वस।यमानचित्तवृच्यपकपं केति, नूनमत्ता्रासानमप्यपस्येदिति सर्वोपकन्भे- 
शित्तवृच्यर्धीनलात्‌ रूपोपर्न्धेखिलोक(ध्रघ्यायकं तच्छम्‌ ) प्रल्ययार्धीनत्वम्‌ । 
तस्मादाह-- सद्‌ ज्ञाताधित्तवरृत्तयः पुरुषस्येति ॥ 

यच्चैतत्‌ सद्‌ा ज्ञातविषयत्यम., तस्रभोः पुरषस्यापणिामिस्वात्‌ । 
निवयोपलन्धृस्वर्पप्रयुक्तं॑हि तदिति । यदि चित्तवत्‌ प्रभुरपि पुरषः 
परिणमेत, ततस्तद्विषयाश्चत्तवृत्तयः चित्तस्येव शब्दादिविषयाः) 
ज्ञाता अज्ञाता अपिस्युः॥ 

यत्तु छचाताज्ञातं शब्दादिविप्रयजाते, तत्‌ परिणामिनश्चित्तस्य परिणामा- 
पक्षं॒॑द्रष्टन्यम्‌ । तथेव्ेद्धियाणामपि परिणामपिक्षमेव ज्ञातान्ञातविषरयं 
दृइयते ¡ न च तथा चित्तत्रत्तैनामन्यतमाप्तामपि ज्ञातत्वमन्ञ।तत्वे च । नित्यत- 
स्तज्ज्ञाता एव चित्तवृत्तयः । तस्मायदृवृत्तिख्येण सदा ज्ञातत्वं मनप्तः तत्‌ 
प्रमोः पुर्षस्यापरिणामिलमतुमापयति ॥ 


केवस्यपादः चतृथः ३४९ 


¡ भष्यम्‌ ] 
स्यादाश्ङ्- चित्तमेव स्वामासं विषयाभापं च भविष्यती. 
लखभरेवत्‌-- 
[ सूत्रम्‌ | 
न तत्स्वामासं दृश्यत्वात्‌ ॥ १९ ॥ 
[ भाषम्‌ | 
यथतराणीन््रियाणि शब्दादयश्च ददयतवान्न" स्वाभासानि, तथा 
मनोऽपि प्रयेतव्यम्‌ । | 
[ विवरणम्‌ ] 
अपरिणामी पुरूष इति प्रतिज्ञा । सदा ज्ञातविष्रयघ।दिति 
हेतुः । वैधरम्धण चित्तमिन्दियाणि च दृष्ठान्तः । उपरर्भ्धुश्च विषयिणः प्रकृत- 
त्वात्‌ सदा ज्ञातव्िषयतभ्रतिदवेध।य मुक्तामवदिति दृष्टान्तो नोपपचत । मुक्तस्यावि- 
धयित्वात्‌ ॥ १८ ॥ 


स्यादारशाङ्का- चित्तमेव स्वामापं विषयामापत च भविष्यतीति । 
परह्य प्राहकं चेति । स्वक्तविदिताकारा एष हि वृत्तयः | यथा प्रदीपः प्रकाशयति 
घटादीन।सानं च । कि पुसप्रण चित्तच्रच्युपठम्मिना चित्तव्यतिरिक्तेन 
कल्पितेनेति ॥ 

अत्रोच्यत-न तत्‌ खामाधं दृश्यात्‌ । यथेतराणीन्दरियाणि 
्रेत्रादीनि विषयाश्च शब्दादयः न स्वामासानि इन्दियाणि । नापि स्वामत्ताः 
राब्द।दयः । दृदयस्वात्‌ । तथा मनोऽपि प्रयतव्यम्‌ । न स्वाभासं चित्तं 
ट्दयत्वादिति प्रतिपत्तव्यम्‌ ॥ 


ननु च अग्निदेव स्वामासत्वं त्रिषयामाप्तसखं च भवतु, 
यथैव घटादयः प्रकादयाः सवरूपेपटम्भनाथमालोकान्तरमपेक्षन्ते, न तथा 
प्रदीपः । यथा प्रदीपः स्वाभासो विषयामासश्च | तथा मनोऽप्यवमास्तकत्वदिवं 
भवतु किमासना१ न हि प्रदीपप्रतिपत्तये श्रदीपान्तरमाददते टोकिकाः ॥ 
यदि चोपादीयिरन्‌ अनवध्येव स्यात्‌ । एवं विज्ञानस्यापि व्यतिरिक्तेन 
प्राह्मत्रे तस्य चान्येन ग्रहणं तस्य चन्यनेयेवं प्रस्तभ्येत । कि च विज्ञानस्याव- 
माप्तामकलवात्‌ प्राहकस्याप्यवभ।परूपलतरात्‌ न परस्परोपकारयोपक।रकमभावः | 
५ 


त्था प्रद्पियेर््रयोः । तस्मात्‌ कल्पितेऽपि विज्ञानस्य प्रहता अनथक इति, 
भवतु ज्ञानं स्वाभासं परामाप्तं चेति ॥ 


३५० पातञ्जखयोगसूत्रभाध्यतिवरणे 


[ भाष्यम्‌ ) 
न चाभ्िरत्र ष्ण्ान्तः । न द्य्चिरालसस्वकू्पमप्रकार प्रकाशयति । 
प्रकाशश्वायं प्रकारयप्रकाशकरसंयोगे दृष्टः । न च स्वरूपमत्रेऽस्ति संयोगः | 


ध [ विवरणम्‌ | 
अत्रोच्यते-तदेतदृद््टान्तपरादावष्टम्भेन सकर्लाकग्रिद्धमर्गोपारेहिण 


आत्मनो निराकरणमराक्यम्‌ । कस्मात्‌? न चा्िरत्र चष्टन्तः। न द्यभ्भि- 
रात्मस्वहूपमप्रकारं भकाशचयति, यदि चाभनिशपरकाशः सन्‌ आत्मनैव पट 
दिवत्‌ प्राकारापिष्यत, तत उपापसस्यत दृष्टान्तः । न तेवरम्‌ । न हि कंदा- 
चिद्िरप्रकाराः ॥ 


प्रकारश्चायम्‌ । स च प्रकाश्यप्रकशिकर्सयोगे दष्टः । न च 
स्वहूपमात्रेऽस्ति संयोगः । येहि संयोगः । नासति संयोगे स्वख्पावमाप्- 
कतम्‌ ॥ 

यदप्युच्यते -- घटादिवत्‌ प्रकाशान्तरं नाग्नियेक्षत इति । तत्‌ प्रकार्य- 
रूपाभावात्‌ । न तु तस्य घटादिवत्‌ प्रकाइ्य रूपमस्ति ] न तावत। व्यतिरिक्ता 
परह्यत्वम्‌ । चक्षुरा तुत्यव्यातिर्क्िन गृह्यत ए ॥ 


प्रकास्यस्य घटदेरवतमपतिरस्काराय प्रकारा उप।दापिष्यते । न लभप्रका- 
र्यल्पल्वात्‌। अग्नेधलोकान्तरानाकाज्खणं तु मवतेवराभिहितं-द्रयोः भ्रदौपयोन।स्ति 
परस्परेपक्रार इति । यत्र नाम भेदेऽपि दयोः प्रदीपयोन।स्वयप्रकाद्यखूपलादन्यो. 
न्योपकारः, किमुत अप्तति भेदेऽतर प्रकाशान्तरमेव नेक्षते इति ॥ 


न तु व्यतिरिक्तग्रह्यलं ष्यभिचरति, प्रदीपयेदरयाद्रटादिवत्‌ । एतेन 
व्य्िरिक्तग्राह्यतवं ज्ञानस्य दृरयत्वात्‌ प्रदीपादिवत्‌ सिद्धं भवति । प्रदीपादिवच्च 
ज्ञानस्य प्रकाशस्वरूपघात्‌ करणान्तरानपेन्नापि सिद्धा । तथा च अनवस्था- 
दोषगन्धो न विते ॥ | 

यदप्युष्यते-ज्ञानस्यावमाप्तत्मकलात्‌ तदुप्राहकस्याप्यव्मासरूपलात्‌ न 
परस्परोपकाये।पकास्कमावः प्रदीपयेरिव द्रयोरिति । नान्तो दोषः । चक्षुः 
प्रदीपवदात्मक्ञानयो जलयन्तरतात्‌ ॥ 

नतु चाहंप्रलमयेन चित्तं प्रययि गृह्यत ईति विषयरिषयितमेकस्यैव | 
नेष दोषः । त्रिगुणलाचित्तस्य | यत्तत्र तमःश्रधानं चित्तं तदन्यया. 


भ रै 
केवख्यपादः चतुथः ३५१ 


[ भाष्यम्‌ ] 
फ च स्वामासं चित्तमियग्राह्यमेव ।चित्तं स्यादिति शब्दाथैः । तद्यथा 
स्वास्मप्रतिष्ठमाक्राशम्‌ अप्रतिष्ठम्‌ इयथः । स्वबुद्धिप्रचारपरतिसवेष्नात्‌ 
सत्वानां प्रवृत्तिदश्यत--क्रुद्धोऽहं मीतोऽहममुत्र मे रागोऽपुत्र मे 
करो इति । एतच्छबुदेसखहणे न युक्तमिति ॥ १९॥ 

~ ~ [ स्म] 
एक्समय चामयानवधारणम्‌ ॥ २० ॥ 

| विवरणम्‌ | 
सस्वातिकया इच्या समालम्ब्य, हस्तेनेव दारीरं कण्डूयमानम्‌ । तत्राघ्युपलमग्धा 
विषयी भिन एव पुरुषः । एतेन ज।व्यन्तरग्र ह्यप्राहकत्वेन निरवयवत्वेन पुरुषश्च 
स्वयमेव प्राह्यः प्राहकश्वेदयेतत्‌ प्रव्यवोचाम ॥ 


न, १ 4 


र च-स्वामासं चित्तामिति उच्यमनेि च अग्राद्यमेव चित्तं सादिति! 
एवं शब्दाय; । स्वामास्षमिति हयुक्ते अन्येन नावभास्यते न गृह्यत इव्यथः | 
न तु स्वयमालान गृहणातीद्युष्यते । एवमादिशन्दप्रयागष्र शन्दस्य विपरी- 
तार्थवम्‌ ॥ 

त्था- स्वासमप्रतिष्ठमाकाशम्‌, अ्रतिष्ठामिति शब्दाः | तथा 
स्वस्थो देवदत्त इति, नीरोग इल्यः) न तु स्वात्मनि स्थित इनि । तत्र दरयघ्वा- 
दिति हेतोर्यसेद्धिमाचन्नाणस्य प्रयक्षत्रिरोधो खोकविरोधो भ्यवह।रविलोपश्वेव्याह- 
स्वबुद्धिपरच।रप्रतिप्तवेदनात्‌ स्वानां प्राणिनां प्रतृत्तद्शयते ॥ 

करुद्धोऽहं मीतोऽहममुत्र मे रागोऽमुत्र मे क्रोधं इति स्वां स्वा 
युद्धिमेवं चरन्ती प्रतिसेत्रच दष्टा क्रोधलोमादिपरिराय विवेकवतां प्रृत्तिर्प- 
खम्यते । तथा प्रसन्नै मे चित्ते कदुरितं मूटमिति च। तत्‌ एतत्‌ 
स्वब्रुदधरग्रहण, न युक्तमिति । न हि निशाम्य परिप्पन्दिनीं बुद्धिरद्येति 
युक्तं वक्तुम्‌ ॥ १९ ॥ 

अम्युपगम्थ वादोऽयम्‌-- यद्यपि स्वामासं विषयाभात्तं च मने मवतु । 
तत्र दूषणम्‌ एकसमये चोभयानवधारणम्‌ । विषयपरिच्छद कते, नानाक्षणत्वा- 
दात्मपर्च्छिदो न युज्यते । अथ पुनरा्मानमवधारयति, न तदा विषयाभिमुखं, 
स््ामपर््छिदकपसे नानाक्षणल्ात्‌ ॥ 


1. कस्यचिदि- 
2 न परप्रति- 


३५२ पातञ्ञल्योगसूत्रभाष्यविचरणे 


| भाष्यम्‌ | 
न चैकस्मिन्‌ क्षणे 'स्वपरोमयावधारणं युक्तं, शक्षणवादिनो यद्धवनं 
सेव क्रिया, तदेव च कारकमिलम्युपगमः ॥ २० ॥ 
स्यान्मतिः- स्वरसनिसद्धं॒चित्तं चित्तान्तरेण समनन्तरेण यृषद्यत 
इति- 
सूत्रम्‌ 1 
चितान्तरहद्ये बुदिवुरेरतिप्रसङ्ः स्मृतिसंकरश्च ॥ २१॥ 
{ भाष््रम्‌ | 
अथ चित्तं चेचित्तान्पेण यद्येत, बुद्िबुदधिः केन गृह्यते, 
स।ऽप्यन्यया साऽप्यन्ययेलयतिप्रसङ्गः । स्मृतिसंकरथ, यावन्तो बुद्धिबुद्धी- 
[ विवरणम्‌ ] 
भथोभयपरिच्छि्तिरकेत्रेति चेन, निरवयवत्वात्‌ परिच्छित्तेः। न हि 
निरवयवायाश्चित्तवत्तः प्रदीपवदनेकावमाप्तकसे युक्तम । अवयवमदात्तु प्रदी- 
पस्यनेकप्रकाशकवं संमर्राति | न तु ज्ञानस्य सावयवत्वं परेरभ्युपेयते ॥ 
` क्रि च, ज्ञानमेकमेकस्मिन्‌ क्षणे उभयमवधारयर्तीति चाम्युपरगमे 
करियाकारकमेदप्रपङ्गः । यदुभववधारणं स्ता करिया । यदवधारयति तत्‌ 
कारकम्‌ । न चैकस्िन्‌ क्षणे स्वपरोभयावषारणं क्षणवादिनो युक्तम्‌ । 
कस्मात्‌ ? उक्तं हि क्षणिकलिद्धये यद्धवनम्‌ उयत्तिः सेव क्रिया तदेष च 
कारकमिलम्युपगमः । क्रियाकारकमेदे च क्षणमङ्गमङ्गः स्यात्‌ । कारकेण 
हि क्रियाक्षणमवस्थानीयम्‌ ॥ २० ॥ 
स्यान्मतिः कस्यपि--स्वरससत्निरुद्धं चित्तं चित्तान्तेण गृह्यते 
इति मवेन विनष्ट म्करतरं चित्तं चित्तान्तरेण समनन्तरेण संजायमनेन 
गृह्यत इति, अथापि निद्यावरध्थितपुरुषषारेकल्पन। निर्रीयकैव | अत्रोच्यते-- 
चिततान्तरद्ये बुदधिबुद्धरतिप्रङ्गः स्मृतिधङ्कर ॥ 
यदि चित्ते चित्तान्तरेण खरसनिरुद्धं पौरस्य पाश्चायेन जायमानेन 
समनन्तरेण गृह्येत, बुद्धिदुद्धिः षटविषया बुद्धिः बुद्धिरुच्यते, तद्विषया तु 
बुदविबुद्धिः, सा केन गद्यते व्यबस्थितग्राहकामवात्‌ । साऽप्यन्यया प्रहत्य 
साऽप्यन्ययेटतिप्रसङ्ः ॥ 
1. स्वपरल्पा 
2. क्षणिक 


केवस्यपाद्‌ः चतुथः ३५३ 


[ भाष्यम्‌ ] 
नामनुभवास्तावलः स्मृतयः प्राप्नुवन्ति । तस्संकरवेकस्मृयनवधारणं च 
स्यादियेवं बुद्धिमतिसवेदिनं पुरुषमपर्पदविर्ैनाशिकिः स्वैमेवाऽऽकुरटी- 
कतम्‌ । ते तु मोक्तृ्वषूपं यत्र कचन कतस्पयन्तो न न्यायेन संगच्छन्ते । 
केचित्तु सस्वमात्रमवि परिर्य, असि स सत्वो य एतान्‌ पञ्च स्कन्धान्‌ 
निक्षिप्यान्यां श्च प्रतिसदधातीद्युक्ला;, तत एव पुनन्चस्यनित | 


[ विवरणम्‌ ] 
न चागृहीताघ्ु बुद्धिबुद्धिषु संम्यवहरो घटते स्मृतिसस्कारानुपपत्तेः । 
तत्रैकजादीयानेव षटनुद्धिबुद्धानां दाशतयी माला स्यादनवस्थित।, न षटबुद्धिः। 
परिसिमातती च धटबुद्धिवुद्धीनां अकप्थां कथं षटादिबुद्धिरुपतिषठेत ॥ 


अयं चापते दोषः स्पृतिसकरश्च इति । घुद्धिबुद्धीनां तत्तस्काराणां 
चेवारूपत्वात्‌ स्मृतिसक८ प्रापेति । यावन्तो बुद्धिबुद्धीनाममुमवास्तावयः 
स्मृतयः संकीणौः प्राप्नुवन्ति । तत्सङ्कराद्‌ स्पृतिसङ्करातव्‌ स्मूयनवधारणं 
इयमस्या बुद्धेः स्पृतिरिव्यनवधारयन्तः कथं व्यवरेमहि । तथा च सरूपत्रात्‌ 
स्मृतिसंकरः प्रभोति ॥ 

यावन्तो वुद्धिबुद्धौनां विदानाः स्वबुद्धिस्पृतिपूषञ्यवहारासम्भवात्‌ स 
संमोहेन सङ्गच्छेमहि । यदि चानवस्य।परिनेह।सया कचित्‌ बुद्धधन्तरे सम- 
वतिषठेमहि, तमेव बुद्धिप्रतिवेदिने बुद्धिपरतिसेवेदनटिङ्गेन स्पष्टतरमपि 
पुरुषमपठपदरैनाशिकैराकलीक्रतं जगदिति ॥ 

ननु चाटयविज्ञानकल्पनयाऽनवस्थादोष्र परिहरेमहि । तथा चात्मकल्प- 
नामपच्येमहीलेवं ते भोक्तृस्वरूपे यत्र॒ कचन कल्पयन्तो न न्यायेन 
सङ्गच्छन्ते । तस्यप्याल्यवि्ञ(नस्य प्राह्मतरादनवस्थितत्वचाभिदहितसकल- 
दोषसुषङ्खः ॥ 


केचित्‌ वैनारिकविरेषाः सखमात्रमपि शब्दान्तरेण स्वमात्रं मोक्त्‌- 
स्वरूपं पएररिल्य अस्ति स सत्वो य॒ एतान्‌ प्च स्कन्धान्‌ 
खूपवेदनासंज्ञासंस्कारविज्ञानलक्षणान्‌ निक्षिप्य परियिञ्य अन्यांश्च स्कन्धान्‌ प्रति- 
सन्दधाति गरहति इत्युक्ता तत एव भूतानागतस्कन्धग्रतिसन्धात्रेकसत््वपरि- 


कल्पनातः तरस्यानित ॥ 
4 


३५४ पातञ्जटयोगसूत्रभाष्यविवरणे 


| भाष्यम्‌ ] 
तथा. स्कन्ना महाममवदवयि वद्यायुादाय प्र्यानतय गुरारान्तकं 
मद्य चर्य च।रभ्वमिद्युक्ता पचस्व पुनः पच्वमवापहवत । तार्ल्यया- 
गृदयस्तु ब्रतादाः स्वशन्दन परषमव स्वापे [चत्तस्य माक्तार 
मुपयन्तीति॥ २१॥ 


कथम्‌ 
इ [ सूत्रम ] 
चितेरप्रतिसक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम्‌ ॥ २२॥ 
[ भष्यम्‌ ] 


अपरिणामिनी हि मोक्तृशक्तिरमतिसेक्रमा च परिणाभिन्यथ 

प्रतिसंक्रान्तेव तद्वृत्तिमनुपतन्ती' । 
ए ध [ चिचरणम्‌ | | र 

तथा तेषामन्या विरुद्धकल्पना- स्कन्धानां महानिवैदाय विरागा- 
यानुखादाय प्रशान्तये गुरोरन्तिके त्रह्चर्यं चरमीद्युक्ला पुनस्तमेवाम्युगतं 
सच्वस्य सस्व (साव्यसाधनसम्बन्ध)मपहवते । विज्ञानमाते क्षणिकं शल्य चेति 
आ{लमानमपल्पनत | (नममितन्दधीमहि । तदेवं) साट्ल्ययोगादयस्तु प्रवादाः । 
स्वशब्देन पुरुषमेव स्वामिनं चित्तस्य भोक्तारमभ्युपयन्ति इति ॥ २१॥ 


कथं मोक्तारं स्वशब्देनैवाम्युपयन्ति 2 यतः चितरप्रतिसक्रमायास्तदा- 
कारापतेो प्या स्वबुद्धिसंवेदनं भवति । चितिः चेतन्यं पुरुष इयथः सा चा- 
परिणामिलात्‌ अप्रतिसंक्रमा । तस्याः अप्रातिसं्रमायाः अपि सल्याशितेः 
तदाकारापर्तिः । तदिति प्रकृतं चित्तं प्रसाम्नायते तस्याकारार्पात्तस्तदाकारा- 
पत्तिः । तस्याश्ितेस्तदाक।रापतों सत्यां स्ववुद्धिसंबेदने भवति । सखस्य 
बौद्धस्य प्रस्मयस्योपलन्धिभेवति । तदथमेव हि सा बुद्धिः खब्दादिग्र्ययस्मेण 
परणिमते ॥ 


[क 9 


तदेतत्‌ प्रातेपादयतिप्रतौलय)- अपरिणामिनी दि मोक्तृशक्ति 
दकुरक्तिः ययाभ्यल्याता । अप्रतिसंक्रमा च सती पएरिणामिन्यरथं बेद्धप्रलये 
प्रतिसंक्रान्तेव प्रद्यायेव्रिषयलात्‌ तदरत्तिमयुपतन्तीवानुपतन्ती द्टतरदुपड- 
ममाना । बैद्धः प्र्ययो जायमान एव तस्याः कर्मतामापयते । तं बौद्धं प्रव्ययं 
वृत्तिमनुपतन्दयुपरममाना मोक्तृराक्तिः ॥ 


1. -तति। 


ॐ _ ५ 
कवस्यपाद्‌ः चतुथः २५५ 


ध ४ भाष्यम्‌ |] ति 
तस्याश्च प्राप्तचेतन्योपर्रदस्वरूपाया बुद्धिवृत्तरनुकारमातरतय। 
बुद्धिघ्रच्यविशिष्टाः हि "जवृत्तिगरयास्य।यते । तथा चोक्तम्‌- 
«न षाताटं नोः विवरं गिरीणां 
नैवान्पच्कारः कक्षयो नोदधीनाम्‌। 
गहा, यस्यां निहिते ्रह्च शाभतं 
बद्धिघरृ्तिमदिश्ि्टं कवयो वेदयन्ते ॥” इति ॥ २२ ॥ 
मतरेतदग्युपगम्यते-- 
, „ (सूम्‌ 
द्धृदश्योपरक्तं चित्तं सवाथम्‌ ॥ २३ ॥ 
[| विषरणम्‌ | 
तस्याश्च प्राप्रचेतन्योपग्रह[स्व]ूपायाः प्रतत चैतन्येपग्रहर्पे पुरुषोप- 
प्रहख्पं यथा बुद्धिदच्या समासादितप।वकोपग्रहरूपतप्तरोहपिण्डवत्‌ दरिकम- 
तदेव अनुकारमात्रतया;, बुद्धिनरत्तिस्ारूप्यमात्रतया । बुद्धिवस्यविशिष्टा 
वृत्तिरिति । ज्ञ पएवेपरन्धिरेव वृत्तिरिति अख्यायते । ृत्तिपतारुप्य- 


मितसत्र' इति दिं व्याल्यातम्‌ । तथा 'श्रययाविशेषो भोगः, इति 
प्रस्यापितम्‌ ॥ 


मोकतृमोग्यमेदे च सति चित्ताकारापत्तिरूपपधथते । न चाप्तति 
व्यतिरिक्ते भोक्तरि चित्तत्येव दधृदस्थोभयामासस्मकस्मादुपकल्पते । तस्मात्‌ 
एष्यते ' पाङ्ख्ययागादय एव पुरूष स्वशब्देनाम्युपयन्ति ' इति । 
प्‌ 


अन्ये तु शब्दान्तरेणोपयन्तोऽपि तत एव तिम्यति ॥ 


तथा चोक्तम्‌- बुद्धिब्रच्ययुकारमात्रतया बुद्धावेव ज्ञव्ृत्तिरुपम्यते, 
नान्यत्रेति । न परतिठं नो विवरं गिरीणां नैवान्धकारः क्षयो 
नोदधीनाम्‌ , एवमादीनि न गुहा । यस्यां गुहायां निहितं त्रश्च शाश्वतं 
सा गुहा; न पतन्छदीने । कस्यां पुनगुहायां निदहितमिस्याह--बुद्धविव 
गुहायां तिम्‌ अपास्या ब्रह्माल्याम्‌ अविशिष्टाम्‌ अप्रथगभूतां बुद्धिवरच्यविरिशं 


वेदयन्ते विवेकिनः ॥ २२ ॥ 


1. जान । 4 कारं 
2. रख्या 5. यो. सू. 1-4. 
3. नच 6. यो. सू. 3-35. 


३५६ पातञ्जलयोगसून्चभाष्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
मनोऽभिमन्तव्येनार्थेनापरक्तं; स्वयः च विषयतवद्विषयिणा 
पुरषेणाऽऽमीयया व्रत्याऽभिसंबद्धं, तदेतचचित्तमेवं दरष्द्श्योपरक्तं 
विषयदिषयिनिभासं चतनाचतनस्वरूपापन्नं विषयात्मकमिवाचेतनं 
चेतनमिव स्फटिकमणिकसपं सवौधमिस्युच्यते ॥ 
तदनेन वचित्तपारुप्येण भ्रान्ताः केचित्‌ तदेव चेतनमित्याहु; 1 
[ विवरणम्‌ ] ि । 
कमात्‌ पुनः कारणात्‌ पुरुषस्य [चत्ताकारापत्तिः । तस्यां चार्घ्यं 
स्ववुद्धिसत्रेदनम्‌ । कुतो वैनाशिकानां चित्तमेव प्रादय ग्राहक चेति ्नानितरियाह-- 
दरधद्स्योपरक्त चित्तं सवाथम्‌ । द्रष्ट प्ररो दृदयं शब्दादि ताभ्याम्‌ 
उपरक्त [चत्त पवां पुरुषस्य भागापवगाय मवति । मन।ऽभभमन्तव्यंनाथन 
अयस्कान्तमणिदेशीयेन विषयेण उप्रक्तं स्वये च विषयतात्‌ पुरुषस्य 


(५ क 


विषयिणा पुरषण सन्निहितेन आसमीयया वृत्या मानसेन प्र्ययेन विषयतया 
अभिस्म्बद्धम्‌ ॥ 

तदे तचित्तम्‌ आलद्त्तिदरेण पुरुषेण सम्बन्धादुदरष्टुः खरूपोपरक्तं 
रा्दादिना च -मन्तव्येनोपरतमिति द्षटुद्योपरक्तं चित्तमेव न पुरुषः । 
्रषृट्दयेपरक्तम्‌ इत्यस्य व्यास्यानं करोति-विषयविषयिनिर्मासं चेतनाचेतन- 


स्वरूपापज्नस्‌ ॥ 
कथं पुन; स्वयमचेतनं सन्चेतनस्वरूपापन्नमिति 2 नेष दोप्रः-- पुरषेण 


निदयक्तनिधानाच्वेतनमिव । तदेवाविवेकिभिश्चतनमिद्युच्यते । न तथा विषयाः | 
नियमचेतनात्मका हि ते । स्वतस्तु चित्तमचेतनमेवेति चेतनाचेतनस्वहूपापन्न 
इप्युच्त ॥ 

विषयालमकमिव शब्दादिखर्पमात्रमिव चेयर्थः । अचेतनं चेतनमिव 
पुरुषस्वरूपापनमिव चद्यथः । स्फटेकमाणक्रल्प यथा स्फटेकमणिरल्क्तकादि- 

न्निधौ तद्‌।कारतां विमति, तथव तत्‌ सवार्थं ।चत्तम्‌ उच्यत्‌ ॥ 

तस्मात्‌ अनेन चित्तस।हूप्येण भ्रान्ताः केचित्‌ । एतत्तु चित्तसरूप्य 
वैरोषिकाणां प्रमोहकारणम्‌ । वेरोभरिकादयस्तु चित्तसारूप्यमहेन्द्रनाक्ग्यामोहित- 
चतस्तः तदेव चित्तं चेतनभिलयाहूुः । कथ. £ यस्मान्मनःपुरुषरतयोगजं चतन्य 
गुणः उच्छेदनीय इति मन्यन्ते । वेनाशिकेभ्यस्वयं िडषः--स्थिरमेकं 
धर्भिणमिच्छन्तीति ॥ 


1. मनोदिम- 2. त्स्वयं 3. कमप्यविष्रयात्पक्रमि 


केवल्यपादः चतुथः ३५७ 


| [ भाष्यम्‌ | 
अपरे चित्तमात्रमेवेदं सर्वं नास्ति खश्वयं गवादिषंटादिश्च "स्वाकारेण रोक 
इति । अनुकम्पनीयास्ते । कस्मात्‌ ? असि हि तेषां ्रानििषीजे सर्वरूप- 
कारनि्मासं चित्तमिति । समाधिप्रज्ञायां प्रजयोऽथैः प्रतिनिम्बीभूतः "तस्या- 
माठम्बनीमूतत्वादन्यः । स वचेदर्थथित्तमात्रं स्यात्‌, कथं प्रज्ञयेव 
प्रज्ञाङूपमवधार्येत । तस्मात्‌ प्रतिविम्बीमूतोऽथः प्रज्ञायां येनावधायेते, 
स पुरषः । इयेवं ग्रदीतृग्रहणग्रादयस्वरूपचित्तमेदात्‌ त्रयमप्यतज्ञातितः 
प्रविभजन्ते ते सम्यग्दरिनस्तेरथिगतः पुरषः ॥ २३ ॥ 

ष (०... 

अपरं बद्धाः चित्तमात्रमेवेदं सवम्‌, नास्ति गवादिषयादिश् 
स्वाकारेण विशिष्टः सर्वषां प्रल्ययस्य साधारणो लोकः इति स्वानुभवमप्यपल- 
पन्ति । ते खं भ्रन्ताः घुकरुमारतरबुद्धयो वैनाशिका अनुकम्पनीयाः ॥ 

कस्मात्‌ ? अस्ति हि तेशं आआानितिवीजे सवैरूपाकारनिभास चित्त 
मिति। सनिमित्ता हि तेषां श्रान्तिः न लोकायतिकानां शून्यवादिनामिव निर्बीजा | 
केवजगद्रच्नार्थप्रबृत्तलात्त॒ नैतिष्नुकम्पा कतैन्या । तस्मायक्तमुक्तं तेषां 
वराकाणां सवीजभ्रन्तचतसामनुकम्पनीपमिति ॥ 


के पुनरभान्ता इल्य!ह-- समाधिप्रजञायामिति । समाधिग्रजञाग्रहणम- 
शरान्तचित्तम्रहणाथम्‌। विक्षिप्तचेतसो हि न्ताः । समाधिप्रज्ञायाम्‌ अश्रान्ताया 
विदयुद्धायां विवेकवस्यां श्रसनगम्भीरतरा्यां प्रज्ञेयोऽथः प्रतिविम्बीमूतः 
निर्मलदपंणमण्डल इव तस्यां समाधिप्रज्ञायां करणभूतायाम्‌ आटम्बनी- 
मूतत्वादन्यः प्रज्ञातः सकाश्चाजातिस्वरूपक्रियादिमिरन्यः॥ 

स चेत्‌ अन्यः चित्तमाते स्यात्‌ कथं प्रज्ञयेव प्रजञारूपमवभार्येत । 
स्वाप्मनि क्रियाविरोधात्‌ न हि कथञ्चिदवधार्थत । तस्मात्‌ प्रज्ञायाः 
अन्योऽपसावयेः सः, यस्या ज्ञायां प्रतिविम्बीमूतोऽर्थों येनावधारयैते सः तस्याः 
्रजञाया आटम्बनीमूताच्चायीदन्यः क्वैकारकमभूतः । स॒ पुरुषः ॥ 

इयेवं ये ्रदीतृग्रहणग्राह्यस्वरूपभेदात्‌ क्तैकरणकरममेदोपपत्तेः, न हि 
निर्वयवमेकमेवैकसिन्‌ क्षणे वस्तु कत च कमे च भवति, ततो ये त्रयमप्येतत्‌ 
जारिः प्रविमजन्ते, ते सम्यर्दर्डिनः तैरधिगतः पुरषः, प्राक्त इलयथः । 
साम्यात ज्ञात इति गम्यते ॥ २२ ॥ 


1. सकारणो 2. तस्याऽऽछ 


३५८ पातञ्चलयोगसूत्रभाष्यविषरणे 


भाष्यम्‌ ] 
कृतश्च- | 
सूत्रम्‌ 1, | 
तदसङ्ख्येयवास'नाचित्रमपि पराथ संहत्यकारित्वात्‌ ॥२४॥ 
[ भाष्यम्‌ |] 


तदेतचित्तमसड्स्येयामि्वीसनाभिरेव चित्रीछतमपि परार्थं परस्य 
भोगप्वगार्थ, न स्वाथ संहयकरारिलाद्‌ हवत्‌ । सहकारिणा चित्तेन न 
सवार्न मवितव्यम्‌। न हि सुखचित्त सुखार्थ, न ज्ञानचितत शानां, उमय- 
मप्येतत्पराथेम्‌ । यश्च भोगेनापवर्गेण चार्थनाथेवान्‌ पुरषः, सएवपरोन 
परसामान्यमात्रम्‌ । 

[ चिवरणप ] 

कुतश्च अस्ति पुरुषशित्तव्यतिरिक्तः ? पूर्वं चित्तस्य दइयघ्रेन व्यतिरिक्त- 
पुरुष्रसिद्धिरापादिता । तस्यैव तु चित्तस्य संषटव्यकारिविनाधुना स्वामििद्धधय- 
माह-तदसङ्लेययवासना चित्रमपि पराथ सदयकास्तिात्‌ ॥ 


यपि तदेव चित्तमसंख्येयाभिवसनाभिः अनादित्तमयामिः 
चित्रीक्तं भ्रान्तिकारणठुक्त, तथापि परार्थं परस्य मोगार्थमेवेति प्रतिज्ञायते । 
संहलयकार्तिात्‌ कायैकरणविषयादिन्यापारपेक्षमधप्ताधकलात्‌ संहल्यकारितम्‌ + 
अतः संहलकारितात्‌ गृहादिवत्‌ इति पाराध्यं चित्तस्य । न हि किचन छोके 
सहव्यकारि दष्टं साधम्‌ 


तस्मात्‌ संह्कारिणा चित्तेन न सख्ार्थेन भवितव्यम्‌ । न दहि 

[ [> © (= [अ 
सुखवित्तं सुखा इखचित्ता्थ वा । नापि ज्ञानचित्तं ज्ञानार्थं वा 
्ञानचित्ताय वा । कि तर्हि? घुखचित्त ज्ञानचित्तमपि एतदुमयं परार्थम्‌ ॥ 


यश्च भोगेन सुखचित्तेन ज्ञानचित्तेन च अपवर्गणार्थेनार्थेवान्‌ पुरुषः 
स एव परः| न प्रपामान्यमात्रं शरीरमिद्धियाणि विषया वा| नहि वैनाशिकः 
सुखचित्तं हारीरेन्दियविषयाथमिच्छति । तथा चेच्छन्नभ्युपगतं विरुन्धीत । 
विज्ञानस्येव हि घुखापवर्गम्यामर्थितमभिमन्यते । तस्मात्‌ य॒ एव शरैरेन्धय- 
वरिषयन्धतिरिकिः पुरूषो भोगापवगौम्यामर्थवानन्यो विज्ञनादभ्युपगमनीयः ॥ 





1. माभिशि 2. ज्ञान . 


केवल्यपादः चतुथः ३५९ 


यदि यक्िचित्‌ परसामान्यमात्रम्‌ उदादरेदवैनाशिकः, यदित 
वैनाश्चिकः संहव्यकारिणां गृहादीनां देवदत्तादितहतपगर्थलमिति न्यामोहादभि- 
मन्यमानः कचन विशिष्ट न परमिच्छेत्‌ , एवं चेन्मन्वीत, स इदं वक्तव्यः--यः 
पररः शरीरेन्दरियवरिषयप्रव्ययानां सामान्यम्‌ , उत सवे एतेति, किमेषरामन्यतमः, 
किंवा कश्चिदेवेतेम्ये। मिन्नजातीय इति ॥ 


न तात्रत्‌ सामान्यम्‌ | न हि मेगापवरगर्थनार्थ स्तामान्यवस्तु वेनाश्चिकोऽ- 
म्युपैति, स्वसमयविरोचात्‌ । नापि रारीरादीनि समस्तानि मोगापवर्गीभ्या- 
मर्थानीति वाञ्छति । विज्ञानसन्ततेरेव भोगापवगीर्िलाभिमानात्‌ ॥ 

न॒ चापि ज्ञानप्तन्ततिरिवेकं वस्तु(सन्ततेः क्षणिकत्वम्‌ |) न चापि 
सन्तानस्यावस्तुतया रृडाविषाणकल्पस्य भोगापवगम्यामर्थित्वम्‌ । नापि 
रारीरेन्दियादीनामन्यतमत्वपिच्छति । विज्ञानव्यतिस्किनाम्‌ आस्मायसमये 
भोगापएवगा्िलानम्युपगमात्‌ ॥ 


नपि शरीरेन्धियाणां सद्वातो नाम वस्तुतो भवतो विधते, येन चित्तं 
सहतपरा्थ प्राथयेधाः । अवस्तुनो हि कथमर्थितम्‌ । नपि रारििद्धियादि- 
भ्योऽन्यं संटूतभिन्नजातीये प्रतिजार्नप्रि । यदि भिन्नजातीये मोगापवग।- 
म्यापरथवन्तमदृषटं परिकिल्पयेयाः, स एवासमाभिरक्तः पर इति । तस्य च सहतवे 
परत्वं दृष्टानात्मवमेपकल्पते । पर्िषात्त॒ असेहतो मोगापवगाम्यामर्थी 
पर इति ॥ 


कि चान्यत्‌--संहतपराथ चित्तमिति साधयतोऽ्थिनः संहतस्यान्य- 
स्यानुपपत्तेः स्वाधमेव चित्तमिव्युक्त भवति । तथा च सति भवतो टृ्टान्ता- 
भावोऽम्युपगमविरोधश्च । तथा मन्वानस्यान्यद्ाचि हृदये चान्यदनिशम्य- 
कारित चापतति । येन चक्षुरादिपरायेव्वसाधनेन विरुद्धतादोषः 
परह्याष्यायि । तेषां विज्ञानपरा्थत्मिति चेदिज्ञानस्यापि संहतत्वात्‌ पराधंघव 
्रस्ताधितम्‌ । अथ विज्ञानस्यापि क्षणिकल्वादसंहतत्वमिति चेत्‌ न-- तस्य 
व्यतिच्किद्द्यल्ात्‌ , धर्ममात्रानम्युपगमाच्च क्षणिकल्वानभ्युपगमानच्रेद्येतदपि 
ग्रलवोचाम ॥ 


९६० पातञ्जख्योगसूत्रभाष्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
यत्त॒कंचिसरसामान्यमात्रं स्वसूपेणोदाहरेदेनाशिकः'स सर्वः 
संहयकारित्वात्‌ पराथ ॑च्एव स्यात्‌, यस्त्वसो परर विदेषः सनं 
सदयकारी पुरुष इति ॥ २४ ॥ 
[ सूत्रम्‌ | 
विशेषदरहिन आत्मभावमावनानिवृरितिः ॥ २५ ॥ 
| भष्यम्‌ | 
यथा प्रावृषि तृणाद्कुरस्योद्रेदेन तद्वीजसत्ताऽनुमीयते, तथा 
मोक्षमार्भश्रवणेन यश्य रोमहर्षीश्रुपातो दश्यते, तत्ाप्यसिि विशेषदशन- 
वीजमपवगेमागीयं कमोौमिनिवैर्तितमित्यतुमीयते । तस्याऽऽतमभावमावनां 
[ विवरणम्‌ ] 
तस्मादुच्यते--यक्िवित्‌ परसामान्यमात्रं स्व्पेणोदादरेदैनाशिकः 
स सर्वः संहयकारिखात्‌ पराथ एव स्यात्‌ । न देवदनत्तादिसंहतार्थतम्‌ । 
उभाम्यामावाम्यामनम्युपगमात्‌ । तमपि विह्ानम्यतिरेकेण नान्यमभ्युपषि | 
वयमपि पुरषव्यतिरेकेण नान्यार्थत्वममिवाञ्छमः । विज्ञानमात्रं च नोपपथत 
इत्युक्तम्‌ । अतो यस्तप परो विशेषः स न संहयकारी पुरपः सवायै इति 
सिद्धः । तस्मादस्ति भोक्ता तस्य स्वाथस्य स्वेन दृरयेन परार्थन य्निमित्तः 
संयोगः । तद्ियोग।त्‌ कैवल्यमुपकट्पते ॥ २४ ॥ 


गुणपुरूषयोगस्याविचा निमित्तमुक्तम्‌ | सा च विरोषदरिन आसमान 
विजिज्ञासमानस्य विनिवतेते । तनिदृत्ते च लिङ्गमाह--विदयेषदर्िन 
आत्ममावमावनानिवृत्तिः । व्यक्ताव्यक्तसामान्यादिरिष्टः (पुरुषः) असाधारणो 
विशेषः । तं॑विरेषे व्यक्ताव्यक्तसामान्यात्‌ प्रविव्रि्य द्रष्टु शीरं यस्य ॒स 
विशेषदशीं । तस्य आत्ममावमावना निवतेते । सा च सम्यग्दरोनामिसुखा 


५ ¢ (^ (^ 


कैवल्यप्रापिकमेनिमित्ता ॥ 


कथं पुनरात्मभावभावेना अस्यास्तीति विज्ञायत इत्याह--यथा प्रावुषिं 
तृणस्याङ्कुरोद्धदेन रिनगेन तद्वीजसद्धावोऽनुमीय(गम्य)ते, तथा मोक्षमागं- 
श्रवणेन यस्य॒ रोमदृषौ्रुपातो दृदयते, तत्राप्यस्ति विशेषदशेन- 
बीजमपव्ममागीयं कर्माभिनि्वैतितमिति रेमहषीश्ुपातारिण्ड्धिन 
अनुमीयते ॥ 


1. तत्सर्व 2. -मेव 


कैवस्यपादः चतुः ३६१ 


[ भाष्यम्‌ | 
स्वामाविकी प्रवते । तस्यामावादिदमुक्तं ग्छखमावदोषादेषां 
पुषैपक्षे रचिर्भवलयर्ुदिश्च निर्णये भवति । तत्राऽऽत्मभावमावना 
कोऽहमासं कथमहमासे किंस्विदिदं कर्थस्विदिद के भविष्यामः कथं 
वा मविष्यामः' इति । सा तु विशेषदशिनो निवर्ते । कुतः ? चित्तस्थेवेष 
विचित्रः परिणामः, पुरुषस्त्वसत्यामव्रिचायां शुद्धशित्तधर्मेपरामृष्ट इति । 
भ्तस्याऽऽस्मावमावना कुशस्य निवतत इति ॥ २५ ॥ 


। । सूत्रम्‌ | 
तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम्‌ ॥ २६ । 
[ भाष्यम्‌ | 


तदार्नी यदस्य चित्तं +अज्ञानप्रारभारं शविषयनिस्नमापीत्तदस्यान्यथा 

भवति कैवल्यप्राग्भारं विवेक ननिम्नमिति ॥ २६ ॥ 
{ विवरणम्‌ ] 

तस्य॒ विशेषदरिनः आत्मभावभावना कैवल्यभागीयकर्मनिमित्ता 
साभाविकरी जन्मान्तरवमनिपित्ता इहजन्मापस्िहस्येर्थक्रारणा वा । पता द्याचार्यो- 
पदेशानपेश्ष स्वामाविकरी प्रवतेते । तस्य क्मणस्तादृशस्य अभावात्‌ इदमुक्तम्‌ 
स्वमावदोषात्‌ अशुदधकर्मयोगात्‌ एषां पू्ैपक्षे सम्यण्दनतदुपःयवरिपरयय 
रुचिभेवति, अद्कचिश्च निणेये पसम्यग्ददाने ॥ 

तत्रासमावमावना का पुनरियह-- कोऽहमासं, कथमहमातत, 
खिदिद, कथखिदिदं, के भविष्यामः, कथं मक्रिष्यामः, इति । सा तु 
विशेषद दिनो निवतैते । यद्विषया हि जिज्ञासा, तस्मिन्नधिगते तद्धिषय। जिज्ञासा 
्रिनिवर्तते । कुतः एतदेवम्‌ ? यतः चित्तसथेवेषः के भप्रिष्याम इ्यादिः चित्रः 
परिणामः न पुरुषस्य पुर्षस्त्वसव्यामविधायां शुद्धधित्तषमैरपराशृष्ट इति। 
यस्मादेवमत एवं विशेषदरचिनः तस्यासभावमावना कुशस्य निवतते ॥ २५॥ 


यदा] च विरेषदरनमुदपादि, तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्रागारं 
चित्तम्‌ । यदस्य चित्तं विषयनिश्नं व्रिषयत्रवणम्‌ भन्ञानप्रागमारम्‌ अज्ञाननिष्ठ, 
ससारामिभुलम्‌ आसीत्‌ , तदस्य विशेषदरिनः तदानीमन्यथा भवति, 
कैवल्यप्राग्भारं विवेकनिश्नम्‌ इति प्रतिश्लोतोदृत्तिङ्ञायते ॥ २६ ॥ 





1. यस्या- 4. विषयं 

2. स्वभावं मुत्वा दो्रयेषां 5. अशान 

3. ततेाऽस्या55 6. बिवेकजज्ञान 
46 


३६२ पातञ्ञखयोगसूत्रभाष्यविचरणे 


[ सूष्म्‌ ] 
तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि सस्कारेभ्यः ॥ २७ ॥ 
ट [ भाष्यम्‌ | 


'विवेकनिम्नस्य सत्छपुरषान्यताख्यातिश्रवादाधिरोदिणश्वित्तस्य 
तच्छिद्रेषु प्रत्यय।न्त्राण्यस्मीति वा ममेति वा। कुतः ? क्षीयमाणबीजस्य 
पूर्वसेस्करिभ्य इति ॥ २७ ॥ 

धा 
हानमेषां दरुरवदुक्तम्‌ ॥ २८ ॥ 
[ माष्यम्‌ | . 

यथा ङ्श दग्धवीजमावा न प्ररोदसम्थौ भवन्ति, तथा जानाना 
दग्धवीजमावः पूर्सस्कारो न प्रव्ययप्रसुभवति । ज्ञानस॑स्कारास्तु 
चित्ताभरिकारसमाततिमनु शेरत इति न चिन्त्यन्ते ॥ २८ ॥ 

ध "वत | 

तच्छिद्रेषु प्रययान्तरापि सस्करिभ्यः। विवेकनिम्नस्य उत्तरोत्तर 
विवेकप्रवणचेतस्तः पुरुषस्य ज्ञानिनः अन्यताख्यातिप्रवाहाधिरोहिणः 
स्वपुरुषान्यता्ोतःपएत्रिनः चित्तस्य तच्छिद्रेषु विपरकप्रत्ययप्रवाहान्तराठेु 
प्रययान्तराणि विपयैयलक्षणानि अस्मीति वा ममेति वा । कुतः तानि 
मवन्तीव्याह--क्षीयमाणङ्केरादिवै जस्य चित्तस्य पूर्वेपवितविपदीतततस्कारेभ्यः 
प्रत्ययान्तराणि जायन्ते | २७ ॥ 

हानमेषां हेशवदुक्तम्‌ । यथा शा दग्धबीजभावा न प्ररोदसम्थी 
भवन्ति इति «ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः, श्व्यत्रेक्तम्‌ , एवं ्ञनामिदग्ध- 
चीजमावाः असि मते्यादिप्रययपेस्कारा न प्ररोहपमथौ भवन्ति । दग्धशाशि- 
बीजवत्‌ पृद्तस्कारो न प्रययप्रसुम॑वतीलयथेः ॥ 

ज्ञानसैस्कारास्तु॒ कथमप्रतिपक्षा; सन्तशित्तमधिकररे न(विज)यो- 
जयिष्यन्तीति ते तु सम्यग्दरेनसस्कारधित्ताधिकारपर्सिमाक्तिमनुशेरते । 
संहैवाश्रयेणावितप्रयोजनेन चित्तेन प्रीयन्ते । न पुनश्चित्तमधिकरप्रबणं 
ुर्वन्ति । अधिकारहेतोरतिधायाः प्रतिपक्षलाञ््ञानस्य । तत्र निष्फर्तातु न 
विनयन्ते । न हि स्वयं पततः पतनहेतुरनपेषणीयः ॥ २८ ॥ 





1. प्रत्ययविवेकर 4. तब्रीजभ्यः 
2. मात्रप्रवार्हिणः 9; यो. सू भ 2.10, 
3 वा जानामीति वा न जानामीति वा | 


केवस्यपादः चतुथः ३६३ 


[ सूत्रम्‌ | 
प्रसङ्ख्यानेऽप्यकुसीदस्य सवेथाविवेकख्यातेधेम॑मेघः 
समाधिः ॥ ९९ ॥ 
[ भाष्यम्‌ | 
यदाऽयं ब्राह्मणः प्रसङ्ल्यनेऽप्यककुसीदस्ततोऽपि न किचित्‌ 
प्राथैयते । तत्रापि बिरक्तः' सर्वथाविवेकख्यातिरेव भवतीति संस्कारबी- 
जक्षयान्नास्य प्रव्ययान्तपण्युखचन्ते । तदाऽस्य प्मेषो नाम 
पमािमैवति ॥ २९॥ 
[ सूत्रम | 
् © क 
ततः कदाकमनिवृत्तिः ॥ ३० ॥ 
[| भाष्यम्‌ | 
तद्वाभादविादयः शाः समूटकराषे कषिता भवन्ति । कुशला- 
कुंशङाश्च कर्माशयाः समूरपतं हता भवन्ति । 
[[ विवरणम्‌ |] 
विवरकस्यातिप्रवणान्तःकरणस्य ब्रह्मणस्य प्रप्यानेऽप्य्ुसीदस्य 
सथाविवेकष्यतिरषभमेषः समाधिः । स यदा अयं ब्राह्मणः प्रसंख्यनि 
विेकदर्चन्ौल्तिऽप्यकरुसीदः अद्धि. भवति, ततोऽपि प्रह्यानप्रसाद- 
वरिरोषादधिकं न चित्‌ प्राथैयते । अपिशब्दात्‌ प्रसंस्यनेऽपि न प्राधना | 
तत्रापि प्रसंस्यने विरक्तः | सेधा सर्वण प्रकारेण व्रिकल्यातिर्यस्य स 
सव॑थाविवेकस्यातिरेव भवति ॥ 


कृेरासंस्कारबीजक्षयात्‌ नास्य शरीरादौ यून्ययेदमनीव असि ममेति 
वा ्ञानप्रसादमन्रिकायतनस्थ प्रल्यान्तराण्युखचन्ते । तदाऽस्य ब्रह्मणस्य 
सर्वथाविवेकस्यातिः धर्मैमेषो नाम समाधिर्भवति । कैवल्यस्य परं धम्‌ 
वर्षतीति धर्ममेघ; इति संज्ञा ॥ २९. ॥ 

ततः छदकमनिवृत्तिः । तस्य धर्ममेधनाम्नः तमे; सम्यग्दर्शन 
पाकामिरूपस्य [ लाभात्‌ ] मावात्‌ अविद्यादयः इशाः समूरकाषं कषिताः 
वापनामिः सह समस्ताः प्रलीनाः भवन्ति । कुशङ्शरश्च कर्माश्चयाः 
समूलघातं हता वन्ति । मूः छेरौः सहोच्छिना भवन्ति ॥ 


1. क्तस्य 


३६४ पातञ्ञख्योगसुत्रमाष्यविवरणे 


[ भाष्यम्‌ |] 
कशक्मनिवृत्तो जीवन्नेव विद्वान्‌ विमुक्तो भवति । कस्मात्‌! 


यस्माद्धिपर्ययो भवस्य कारणम्‌ । न हि क्षीणविपययः कथित्‌ 
केनचित्कयिञ्ज।तो दृडयत इति ॥ ३० ॥ 


| | सूत्रम्‌ | 
तदा सवीवरणमरूपितस्य ज्ञानस्याऽऽनन्त्याञ्जञेय- 


मट्पम्‌ ॥ ३१ ॥ 
[ माष्यम्‌ | 
सर्वैः केरकमीवरणे विमुक्तस्य ज्ञानस्याऽऽनन्त्यं भवति । आवरकेण 
- तमसाऽभिभूतमावृतमनन्तं ज्ञानससं कविदेव रजता प्रवतितमुद्ाभितं 
ग्रहणतमर्थं मवति । तत्र यदा सर्वैरावरणमंलेरपगतं भवति, तदा 
भवलस्याऽऽनन्यम्‌ । ज्ञानस्या ऽऽनन्याञ्जञेयमसं सप्ते । यथाऽऽकाशे 
खद्योतः | 
[ विवरणम्‌ । 
ेशकर्मनिगत्तौ जीवन्नेव विद्वान्‌ युक्तो भवति । कस्मात्‌ एवम्‌ ? 
यतो विपर्ययः पिथ्यज्ञानं भवस्य जन्मनः कारणम्‌ । न हि क्षीणविपयथयः 


9 


कथित्‌ कचिज्जातो ष्यते ॥ ३०॥ 


तदा सवावरणमटलपतस्य ज्ञानस्याञऽऽनन्यात्‌ सेयमलसम्‌। तदा 
धममेघसमाधिसमये, सर्वैः इरकमावरणेः रजस्तमीजन्ममिः विमुक्तस्य, ज्ञानस्य 
सपुरुष्रान्यताख्यातिमात्रस्य भवलयानन्यम्‌। तत्‌ कथमिति ? तमसा(न)ऽभि- 
भूतमनन्तं ज्ञानस्, तस्य॒ तिरस्कृतरमोमलस्यानन्तस्य निस्तरङ्गमष्ोदधि- 
देशीयस्य निरहितस्याविक्रियस्य कथं तदृम्रहणसामथ्यमिदयाह-- कचिद्रजसा 
प्रवर्तितं चित्तसत्वम्‌ उद्वाधितिं वायुनेव महापयेदमण्डलमाहतं सूचितं 
ग्रहणश्षमर्थं भवति । स्तः सच्छस्याप्रवर्तनात्‌ रजसो हि प्रवृत्तिसामध्यमिति ॥ 


तदाऽस्य चित्तस्य भवल्यानन्यम्‌ , अशषक्ञेयविषयत्वमम्बरतलमध्यवर्तिनो 
जख्धरनिरोधनिर्गतस्य सखेखि । तस्य ॒ज्ञानस्यनन्यात्‌ भरोषविषयत्वात्‌ 
ज्ेयमल्पं सम्पयते । यथा आकशे खद्योतः इति । यथा आकाडपेश्षया 
खधोतो न र्विचिदेवमेतजञ्ज्ञानामिसमीक्षया ज्ञेयं न किंचिदिति ॥ 


कैवल्यपादः चतुर्थः ३६५ 


[ भाष्यम्‌ | 
यत्रेदमुक्तम्‌-- 
५ अन्धो मणिमविध्यत्तमनङ्गुटिरावयत्‌ । 
अग्रीवस्तं प्रयमुश्चत्तमजिहोऽभ्यपूजयत्‌ 1" इति ॥ ३१ ॥ 


| सूत्रम्‌ ] 
ततः कृतार्थानां परिणाम'क्रमपरिसमापि्ुणानाम्‌ ॥ ३२॥ 
[ भाष्यम्‌ | 


तस्य ॒धर्ममेषध्यादयात्‌ कृतार्थानां गुणानां परिणामक्रमः पर 
समाप्यते । नहि कृतमोगपव्वगौथौः परिसमाप्तक्रमाः क्षणमप्यवस्थातु- 
मुत्सदन्ते ३२ ॥ 

अथ कोऽयं क्रमो नामेति- 

ध [ सूत्रम्‌ ] 
क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिग्राह्यः कमः ॥ ३३ ॥ 
[ विवरणम्‌ | 

परमार्थज्ञानावस्थायामश्ञेषविपर्ययतिरोधाने सवपुरुषाथदुल्यता चेले- 
तस्दरनाथमुदाहरणमाईह--यत्रेदुक्तम्‌--अन्धो मपिमविन्दत्‌ (ध्यत्‌) 
तमनङ्गुटिरावयत्‌। अग्रीवः[तेप्रयपु्त्‌ तमिह ऽभ्यपूजयत्‌ ॥ इति । 
यथा अन्धादीनां मणिवेधदिकमपम्मवदपि विपर्यपेणन्धो मणिमविष्यदितिं 
व्यवहियते, तथा ज्ञानज्ञेयपंन्पवहारोऽपि विपर्ययावस्थायमिव । विंपर्ययामत्र 
तु सर्वपुरषाधसुन्था एव गुणाः सम्पन्त इति ॥ ३१ ॥ 


तततः कृतायौनां पररिणामक्रमपारसमाक्िबणानाम्‌ । ततः धमेष- 
समाधिपतमुदयात्‌ कतायाच्चित्तगुणाः सम्पचन्ते । चित्ताधीनत्वाच कये- 
करणारम्भिणोऽपि सक्वादयः कृताथौ मवन्ति । प्मस्तस्य पुरुषार्थस्य 
कृततात्‌ । एषां कृताथोनां गुणानां जन्ममरणत्र(मवोवाहरूपः परिणामक्रमः 
परिसमाप्यते । न हि कृतमोगापवगींथीः क्षणमपि प्रयोजनाभावात्‌ 
अवस्थातुमुरसहन्ते ॥ ३२ ॥ 


परिणामक्रमपर्तिम पिचियुक्तम्‌ । अथ कोऽयं युणक्रमो नाम? 
यस्य प्रिसमाठिरुपवर्णिता । तस्यायमधिगमोपाय उच्यते--क्षणप्रतियोगी 
परिणामापरान्तनिर््राद्यः क्रमः । क्षणं प्रति युज्यत इति क्षणप्रतियोगी । 





1. क्रमसमा- 2. -वग( 


३६६ पातञ्जट्यो गसूत्रमाध्यविवरणे 


© [क - ६ ध ् प्‌ 

क्षणनन्तयात्मा परिणामस्यापरान्तेनावस्तानेन निगद्यते क्रमः । 

न ह्यननुमूतक्रमाः पुराणता वश्चस्यान्ते मवति । निर्येषु च क्रमो ष्टः ॥ 
` द्वयी चेयं नित्यता कूटस्थनित्यता परिणामनित्यता च । तत्र 
कूटस्थनियता पुरषस्य । परिणामनिव्यता गुणानाम्‌ । यस्षिन्‌ परिणममाने 
त्वं न विहन्यते तन्नित्यम्‌ । उभयत्र च (च्वस्याविपातात्नित्यस्वम्‌ । 
[ विवरणम्‌ ] । 

क्षणानन्तयौस्मा क्षणस्यानन्तरता क्षणानन्तर्यं तदासा तत्स्वभावः | क्षणानन्तर्थमेव 
“शक्षणतत्रमयोः' इति व्याख्यातम्‌ ॥ 

किं पुनरस्य प्रहणे लिङ्गमिव्याह-- प्रिणामस्यापरान्तेन विनाशा- 
वस्थाख्यण अवसानेन लिङ्गन निगृह्यते सः क्रमः । कथपरान्तेन निभरहण- 
मिति ? उच्यते--न दह्यनंनु मृतक्रमा क्रममनवटम्बमाना क्षणे क्षणे पुराणता 
व्लस्यान्त्‌ विनारकठे भवतिं इति । न हि कदाचिद्‌ भूतमात्रस्यैव वज्ञस्य 
पुराणता दृद्यते । तस्मात्‌ पुरानताभिन्यक्तेलिद्गेनाम्यूह्यते--येनेयं पुराणता 
वक्षस्याभिग्यक्तिपुपसंप्रापिता स क्रमः ॥ 

तत्र यदि ठन्धावपतानत्वमरग्धावसानत्वे च क्रमस्य स्यात्‌ , ततो युक्तं 
कृता्थौनां परिणामक्रमपरिसमिगुणानाम्‌ इति वक्तुम्‌ ! तच्च लन्धारब्धाव- 
सानलं क्रमस्य निद्यानिव्यत्रे घटते । तत्रानिव्येषु वस्त्रादिषु क्रमे दष्टः, नतु 
निखेषु । ततश्च गुणानां नित्यानां परिणापक्रमपरिसमापिरयुक्ता स्यादिप्याशङ्कमान 
आह- निलेषु च क्रमो दष्टः । किं सर्वत्र नेवयाह--द्विविषेयं नियता, 
परिणामनि्यत्‌ा गुणाना, कूटयनियता पुरुषस्येति ॥ 

ननु परिणापिनां गुणानां कथं नित्यता स्यादिति त्रवीति-- यस्मिन्‌ 
प्रिणममाने तं न विहन्यते । यस्य यदू प्रमणेनोपब्धं, तस्य 
तत्‌ तच्छम्‌। तस्मिन्‌ न विहन्यते न न्पभिचरति, तदपि नित्यम्‌ । गुणानामपि 
एखदुःखमेहात्मत। प्रकादाक्रियार्थितिदी(कता च त्य न विहन्यते | तस्मदेतेऽपि 
परिणामनिव्याः । उभयत्र च गुणयुरुषेद तच्वस्याविधातन्नियत्वम्‌ । 
ततो गुणेष्वपि नव्येषु परिणामो दृष्ट इति छनम्पारन्यपयंवरस्तानल्व 
स्थितम्‌ ॥ 

1. गह्यते 4. तस्वानभि 


2. मक्षणा 5. यो. सू. 3.52. 
3, स्यच 


[१ ५ द 
केवल्यपादः चतुथः ३६७ 


[ भाष्यम्‌ ] 

तत्र गुणधर्म महदादिषु परिणामापरान्तनिग्राह्यः क्रमो टब्धपयैवसानो 
निव्येषु धर्मिषु गुणेष्वरुग्धपयवसानः। कूटस्थनिसयेषु स्वरूपमात्नप्रतिष्ेषु 
मुक्तपुरेषु स्वरूपास्तिता क्रमेभेवानुमूयत इति तत्राप्यरुग्पर्यवसनः 
शग्दपृष्ेनास्तिक्रियायुपादाय विकलित इति ॥ 

अथाऽघ्य सेसारस्य स्थित्या गत्या च गुणेषु वतेमानस्यस्ि 
कमसमापिने वेति १ । अवचनीयमेतत्‌ । कथम्‌ १ असति प्रश्न एकरन्तवच- 
नीयः सर्वो जातो मर्ष्यितीति । ॐ मो इति ॥ 

अथ सर्वँ प्रतवा जनिष्यत इति ? विभजञ्यवचनीयमेतत्‌ । प्रव्यु- 
दितस्यातिः क्षीणतृष्णः कुररो न जनिष्यते, इतरस्तु जनिष्यते । तथा, 

[ विवरणमर | 

तत्र॒ गुणधमैषु मदहदादिषु परिणामापरान्तनिग्राह्यः क्रमो 
ठन्धपर्यवस्तानः शरीरादिषिव । नयेषु तु गुणेषु पर्मिष्वलन्धपरयवस्तानः 
निव्यत्वदेषाम्‌ । कूटखनिलेषु स्वरूपमात्रप्रतिष्ठेषु सुक्तपुस्षेषु स्वरूपास्तिता 
क्रमेणेवानुभूयते । तेन मुक्तपुरुषष्वसनप्यनुभवद्ररिण, शब्दपृष्ठेनास्ति- 
क्रियाम्रुपादाय विकलिितः “इति अरुन्धपयेवक्षान एव । परमार्थतः 
पुरुषेष्वपरििामितानास्ति क्रम्‌ इव्यथः ॥ 

अथास्य सेसरस्य स्थला प्रधानरूपेण, गया विकारना, दयं च 
गुणास्मकमिति गुणेषु च वतेमानस्य भसि क्रमपरिसमातिः न वेति? 
अवचनीयमेतत्‌ । अस्तयेवेव्यवधारणं न शक्यं कुम्‌ । नापि नास्वयेवेति । 
कि तु विभञ्य, कस्यचिदस्ति कस्यापि नास्तीति वचनीयमेव ॥ 

कथम्‌ ? अस्ति प्रन्न एकन्तवचनीयः अप्रविभञ्यापि | यथा स्वौ 
जातो मरिष्यति अज्ञानी इति । नयु ज्ञानवानपि मरिष्यवयेव । उनच्यते- 
अज्ञस्य हि मरणमित्यभिमानः, न ज्ञानिनः । तथा चोक्तम्‌--ममिथ्येतदाहू- 
प्रियतीति मूढाः" इति ॥ 

अथ सर्वो म्रूखा जनिष्यत इति? विभञ्य वचनीयमेतत्‌ 
एकान्तानुपपत्तेः । कथम्‌ १ प्रस्युदितल्यातिः क्षीणतृष्णः कुशलो न 
जनिष्यते, इतरः अज्ञः जनिष्यते ॥ 

1. इद्ध्वा 


३६८ पातज्ञलयोगसूत्रभाष्यविचरणे 


[ भाष्यम्‌ | 
मनुभ्यजातिः भरेयपी न वा न्रेयसीयेवं परिपृष्टे, विभज्य वचनीयः प्रश्नः- 
पद्यूनधिक्रय श्रेयसी, देवानृषींश्राभिकृत्य नेति । अयं स्ववचनीयः 
प्रभः-सुसारोऽयमन्तवानथानन्तः १ इति । कुशचरस्यास्ति ससार'चक्र- 
समापिर्ेतरस्येति अन्यतरावधारणे दोषः । तस्माष्दग्यकरणीय एवाय 
प्रक्ष इति ॥ २३३॥ 
गुणापिकारपसरिसिमातो केवस्ययुक्तम्‌ । तत्स्वहूपमवधायते- 
[ सूत्रम्‌ | 
¢ + $ . # 
पुरुषा्थशून्यानां गुणानां प्रतिभ्रसंबः कैवल्यं 
स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति ॥ ३४ ॥ 
॥ इति श्रीमहषिपतज्ञङिविराचेते योगसूत्र 
चतुर्थः केबल्यपाद्‌ः ॥ 
[ बिवरणम्‌ ] 
तथा मदुष्यजातिः श्रेयसी एव नैव वेयवचनीयः प्रश्नः । 
प्रविभज्य तु वचनीय एव । कथम्‌? पञ्चूनुदिश्य श्रयस्री भवति । देवानृषी- 
श्वापिक्ृय न रेयक्ती मवति ॥ 
अयं त्ववचनीय एव अप्रविमज्य सामन्येन प्र्नः--यथा संसारेऽय- 
मन्तवानेषेति अनन्त एवेति वा । बन्धमेक्षानुपपत्तः । प्रविभञ्य तु वचनीय 
एव । यथ। कुशरुस्यापति सेसारचक्रपरिसिमाधिनैतरस्येति ॥ 


अन्यतरावधारणे दोषः । संसारोऽन्तवानेवानन्त एवेति वान्यतराव- 
धारणे दोप्रः । तस्मादव्याकरणीय एवायं स्ामान्येनाप्रविमज्य प्रश्नः+ 
यथा-स्वं मृत्वा जनिष्यते इति, एवं मनुष्यजातिः श्रैयस्येवेति च । तस्माच्‌ 


= (५ 


षटं कृताथौनां परिणामक्मपरिपमातिगुंणानामिति विरेषणम्‌. ॥ ३३ ॥ 


गुणाषिका्पत्सिमाप्तो केवल्यमुक्तम्‌ । तस्स्वदूपमवधायैते । कैवल्ये 
प्रति विग्रतिपत्तेः | केपंचिद्विज्ञानसन्तानस्याव्यन्तेपरामः कैवल्यम्‌ । केषा. 
चित्त नवानामात्मगुणानां बुद्धाच्छद्रेष्रयत्तषुखदु :लधमाघमसस्काराणप॒च्छेदेना- 
चेतनस्य द्रव्यमात्रस्य पुरुपरस्यवस्थानम्‌ । केषाचिदीश्वरसायुञ्यम्‌ । केषांचित्‌ 
सर्वज्गत्रादीश्चरतुल्यधमेवप्रातिः केवल्यमिति भिना मतिः ॥ 


1, क्रमस- 2, द्रथाक 3. क्रमस्त 


केवस्यपाद्‌ः चतुथः ३६५ 


| भाष्पम्‌ 1 
कृतभोगापवगौणां पुरुषार्थशल्यानां यः प्रतिप्रसवः काय॑ 
करणासकानां गुणानां तत्‌ कैवल्य, सखरूपप्रतिष्ठा पुनदचुद्धिसखानभि- 
"सेबन्धिनी पुरुषस्य चितिशक्तिरेव केवला, तस्याः सदा तथेवावस्थानं 
कैवल्यम्‌ ओमिति ॥ ३४ ॥ 


इति श्रीपातज्ञलयो गसूत्रभाष्ये श्रीमदेदथ्य्रा सक्ते 
॥ चतुथः केवस्यपादः ॥ 


[ विवरणम्‌ ] 
इहापि विग्रतिपत्तिप्रणोदाय केवल्यस्वरूपमव्रधायेते-पुरुषाथेश्ून्यानां 
गुणानां यः प्रतिप्रसवः प्रतिसंपगः स्वकारणे प्र्यस्तमय इव्यथः, कथय. 
करणादकतया पटिणतानाम्‌ › तत्‌ केवट पुरुषस्य केवल्तं गुणिरमिश्रीमाव 
इत्यथः ॥ 


स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति । बुद्धिसरवानमिसवन्धिनी या 
५ क क [प ५, क 
पुरुषस्य चितिशक्तिः अमिश्रा केव तस्याः सदा तथैव अवस्थानं 
ष २ 
केवलायाः भावः कव्यम्‌ ॥ 


नतु कैत्रल्यस्येकले कथं विकल्पः ? क्रियायां हि विकल्पो न तु वस्तुनि। 
वस्तुस्वहूपस्य भेद्‌ातुपपत्तेः । केतरल्यमपि वस्तु, कथं तदविकलप्यत इति | नेष दोषः । 
निमित्तनेमित्तिकयोः प्रभेदोपपत्तेः । निमित्तनैमित्तिकमेदे।पचरितोऽपि विकल्पे 
न वेस्तुस््रह्पमेदकृतः । या तु गुणानां परिणामिता पुरप्रस्य त्रिमिश्चता वृत्तिस- 
खूपता, सा कायैकरणालकानां पुरुपाथ्ूल्यानां गुणानां प्रतिक्तस्गानिमित्ता- 
दपगच्छतीति निपमित्तेव प्रतिप्रपवास्यं केवल्यश्न्देनेपर्चरेत पूतम्‌ ॥ 


दवितीयं तु गुणप्रतिप्र सवनिमित्तभावि यत्‌ स्वरूपावस्यानं पुरूषस्य गुणेर- 
मिश्रिततया, तत्‌ कैवल्यमिति विषः । गुणपुरुषान्तरस्रूपतखनिधरणेन 


(क (~ 9 (५ 


तन्त्रान्तरीयतघस्वरूपनिराकरणेन च कैवल्यान्तराणि निवेदितन्यानि ॥ 
तत्रोङ्ारो मङ्गलाथः प्रयुक्तः पसेश्ररनामाद्कितमस्तकतया तन्तरप्रचया्य 
दान्त्यथं वा वेद्‌रण्यक्षदिति ओम्‌ इति ॥ 


1, संबन्धात्पु- 
47 


३७० पातञ्चलयोगसूत्रभाभ्यचिषरण 


ओङ्कारो यस्य वक्ता समचरत फः कमम यस्मादरोषं 
निभ्कर्मङ्ेरापाको घटयति स्कर यः फठेन क्रियाणाम्‌ । 
इ्यानामीश्वरो यः स्थितिमवनिधनप्रक्रियाणां विधाता 
ध्यायन्नः डुष्धिमानं व्यपनुदतु तगं कृणििमाने स कृष्णः ॥ 
यात्राकृतस्रिनगतां यदचिन्यशक्ति- 
ठेरान्‌ दशादि मीनपुखावतारान्‌ । 
ङयोद्धवत्रिविधतापपरम्परातीः 
तं नागनायदायनं ङारण व्रजामः ॥ 
फणरननोषविचोति [ प्रथिव ] युनभोष्टे । 
योरगन्द्राय फणीन्दाय तस्पतञ्जल्ये नमः ॥ 


येगन चित्तस्य पदेन वाचां म दारीरस्य तु वैकेन । 
योऽपाकयेत्त प्रवरं मुनीनां पतज्ञरि प्राज्लछिरानतोऽसि ॥ 


स जयति परतञ्जटिमुनिः येन प्रेयोऽ्थि्ा्थप्तस्यानाम्‌ । 
व्रिहितो हर्षस्तापत्रितयहता धमभमेषेन ॥ 

यस्ततान भवमार्गख्च्धिनां ऊेशाकर्ममयघर्मनुत्तये । 
धर्ममेधपुखयोगतोयदम्‌ [तं पतन्नटिगरषरं प्रणतोऽस्मि] ॥ 
1वद्नाहितःूणचन्द्रवं गुरुमीरानममूतिभूषणम्‌ । 
प्रणमाम्यभुजङ्गसद्प्रहं भगवत्पादमपूत्राङ्करम्‌ ॥ 


(५ म (५ 


इति श्रीगो यिन्द्भगवत्पूञयपादृक्चिष्यस्य परमहं सपरित्राजका चार्यस्य 
श्रीशङ्करभगवतः कृतौ 
पातञ्जलख्योगसूत्र(शाद्च)माष्यनिवरणे 
चतुथं: कैवल्यपादः ॥ 


॥ समाप्तं चेदं विवरणम्‌ ॥ 





1. अयं कस्यचित्‌ भगव्पादरिष्वस्य गुर्प्रणामरूपः शोकः अन्ते निवेशितः 
लेखक्रेन । अथवा सिष्यप्रा्थ॑नया तत्परीयग्॑ भगवत्पादिरेव शिष्यक्ृतस्वस्ठतिरूपोऽय 
छोकः ग्न्थन्ति निवद्धः स्यात्‌ । यश्रा मामव्यां मिश्रशिष्यस्य सनातननागम्नः 
कृतेः मिश्रस्वुतिरूपप्यध्य ग्रन्थ निवेश इति, वेदन्तकस्पतरो चदुर्थाध्यायारम्भे 
८४आचार्यस्य दिष्य सनातननामा, तच्ृतां व्वुतिं तस्रीलयय प्रवन्धमधिरोपयति-भशङ्कः 
इति 1” इति वाक्येनोक्तम्‌ । श्रीवेष्णववग्रन्येषु अन्थोपक्रम एव ईहश्ती रीति; बहुलं 
दशदष्यते | तदवलोकिनं नैतद्विस्मयकरम्‌-कथं स्वस्येव स्वेनैव स्तुतिः क्रियेत ९ इति ॥ 


॥ अथ पातज्ञल्योगसून्नाणां वणोनुक्रमसूची ॥ 


अ 
अतीतानागते सखरूपतेऽस्त्यध्व्रमेदाद्धमोणाम्‌ 
अथ येगानुक्षासनम्‌ 
अनिलयाद्चचिदुःखानात्ममु नियद्ुचिसुखाप्मख्याति- 

रषिया 
अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः 
अपरिप्रहस्थर्य जन्मकथतासबोधः 
अभावप्रययाटम्बना वृत्तिर्निद्रा 
अभ्यासवैराग्याभ्यां चन्निरोषः 
अविद्याऽस्मितारागद्रेषाभिनिवेशाः शाः 
अविद्या क्षत्रथुत्तरेषां प्रसुत्रतनुविच्छिन्नोदाराणाम्‌ 
अस्तेयप्रतिष्ठायां सवैरत्नोपस्थानम्‌ 
अर्हिसाप्रतिष्ठायां तस्सनिधो वैरत्यागः 
अर्हिसासयास्तेयत्रह्मचय।परिष्हा यमाः 


दर्‌ 
देरप्रणिधानादहा 

उ 
उद्‌ानजयाजललपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उतक्रान्तिश्व 

न 
ऋतेभरा तत्र प्रज्ञे 

ए 


एकसमये चोभयानवधारणम्‌ 
एतयैव सविचारा निर्विचारा च सृक्ष्मविषया 
व्याख्याता 
एतेन भूतेन्द्रियेषु ध्मेलक्षणावस्थापरिणामा 
व्याख्याताः 
कै 
कण्ठकूपे क्षुसिपासानिडृत्निः 
कमाद्ुङ्काहृष्ण योगिनस्िविधमितरषाम्‌. 


पादद्काःसृत्रङ्कप्रषठाङ्ाः 
1 ५८२ २३३ 
१ १ १ 
म्‌ ५ . १३२ 
९ १९ ३९ 
म्‌ २९ २९ 
१ १० ३८ 
१ १२ म्‌ 
र्‌ ३ १२५ 
म [1 १२५ 
२ ३७ २२१ 
२ ३५ २२९ 
म्‌ ३० २१२ 
१ २३२ ५२ 
३ ३९ २९३ 
१ ४८ ११४ 
४ २० २३५१ 
१ 21 ९१९१० 
३ १३ ग्वर्‌ 
\ द० ५८८ 
ध ७ नन्‌ 


३७२ पातञ्जख्योगसूत्राणाम्‌ 


कायरूपसयमाततदूप्रा्यशक्तिप्तम्भे चक्चुष्परकाश- 
संप्रयागेऽन्तधानम्‌ 
कायाकाशयोः सबन्धसयमालधुतूखसमापत्त- 
श्वाऽऽकाश्चगमनम्‌ 
कायेन्द्रियासद्धिरशुद्धिक्चयात्तपसः 
कूमेनाडधां स्थेयम्‌ 
कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्ट तद्न्यसाधारणस्वात्‌ 
क्रमान्यत्तरं परिणामान्यत्वे हेतुः 
छशक्मविपाकाश्षयेरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः 
डेशमूलः कमाशयो दृषटादृष्टजन्मवेदनीयः 
क्षणतक्तरमयोः सयमाद्िवेकज ज्ञानम्‌ 
क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर््ाह्यः क्रमः 
क्षीणवृत्तरभिजातस्येव मगेग्रदहीवृप्रहणग्राद्यपु तस्स्य- 
तदञ्जनता समापत्तिः 
ग 
म्रहणरवरूपारिमतान्वययाथेवत्वसंयमादिन्द्रयजयः 
। नव 
चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम्‌ 
चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिवुद्धेरतिप्रसङ्गः रमूतिसकरश्च 
चितेरप्रततिसक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम्‌ 
जं 
जन्मोषयिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः 
जातिदेशकाङव्यवहितानामप्यानन्तयं स्मृतिसंस्कार- 
योरेकरूपत्वात्‌ 


३ 


श) ४ 


०५ ५ ~ -< +^! €} ८५ 


[^+ या 


1 


जातिदेकशकालसमयानवच्छिन्नाः सावभोमा महान्तम्‌ २ 
जातिलक्षणेशैरन्यताऽनवच्छेदात्तस्ययेस्ततःप्रतिपत्तिः३ 


जायन्तरपारेणामः प्रकृयापूरात्‌ 

त 
तच्छिद्रेषु प्रययान्तराणि संस्कारेभ्यः 
तज्जपस्तद््थभावनम्‌ 
तजजयात्‌ प्रक्ञाऽऽलोकः 
तजः संस्कारोऽन्यसंस्कारभरतिवन्धी 
ततः कृताथानां परिणामक्रमपरिसमात्निमणानाम्‌ 


४ 


२९ 


धर्‌ 
४३ 
३१ 
२२ 
१५ 
२४ 
१२ 
५२ 
२३ 


%६ 
श $ 
२५७५ 


२१ 
५. 


पादङ्कुःसूत्राङ्काःप्र्ठाङ्काः 


२८१ 


२९५ 
२२९४ 
२८८ 
१९४ 
२५९ 

५३ 
१४३ 
३०९ 
३६५ 


९७ 


३०३ 


२८५७ 
३५२ 
२५४ 


२१७ 


३२६ 
२१४ 
२१२ 
३१८ 


२६२ 

७९ 
२३५ 
११६ 
२६५. 


वणोनुक्रमसूची ३७३ 
पाद्‌ङ्काःसूत्रङ्कप्पृष्ठाद्भाः 
ततः छशकमेनिवृत्तिः 1 ३० ३६३ 
ततः परमा वरयतेन्द्रियाणाम्‌ २ ५५ २३९१ 
ततः प्रयक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभाव्रश्च २९ ८० 
ततः प्रातिभश्राचणवेद्‌नादशोष्वादवातौ जायन्ते ३ २६ २५२ 
ततस्तद्धिपाकायुशुणानामेवाभिन्यक्तिवांसनानाम्‌ ् ८ ३२४ 
ततः क्षीयते प्रकारावरणम्‌ २ ५२ २३० 
ततोऽणिमादिप्रादुभोवः कायसंपत्तद्धमानभिघातश्च ३ ४५ ३०१ 
ततो दन्द्रानभिघातः 1 ४८ २२७ 
ततो मनोजव विकरणभावः प्रधानजयश्च ३ ४८ ३०५ 
तःपरं पुरुषख्यातेगुणतैतृष्ण्यम्‌ ` १ १६ ४४ 
तस्रतिपेघाथमेकतच्छाभ्यासः १ ३२ ८३ 
तन्न पुनः शान्तोदितौ तुस्यप्रययो चिन्तस्येकाग्रता- 
परिणामः | ६४२५ २४१ 
तत्र प्रययेकतानता ध्यानम्‌ ३ २ २३४ 
तन्न ध्यानजमनाशयम्‌ ४ £ ३९१ 
तत्र निरतिक्षय सवंज्ञवीजम्‌ { २५ ५७ 
तच्र शब्दराथेज्ञानविकस्पैः सकीणौ सवितकौ समापत्तिः? ४२ १०२ 
तत्र स्थितो यत्नोऽभ्यासः १ {३ ४२ 
तदथ एव ट दयस्याऽऽस्मा र ५१ ५९३ 
तद्पि बहिरद्क निर्बीजस्य ३ ८ २३८ 
तदभावात्‌ संयोगाभावो हानं तदु दृशेः कैवल्यम्‌ २ २५ २०३ 
तदस्ङ्ख्येयवासनाचिन्नमपि पराथ सहलयकारित्वात्‌ ४ २४ ३५८ 
तद्‌ द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्‌ १ ३ १३ 
तदा विवेकनिन्नं केस्यप्रागभार चित्तम्‌ २६ ३६९१ 
तदा सत्रौवरणमलापेतस्य ज्ञानस्याऽऽनन्याञ््ञयमपम्‌ ४ १ ३६४ 
तदुपरागापेश्रत्वाचित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम्‌ 1 १७ ३४६ 
तदेवाथमात्रनिभांस स्वरूपशून्यमिव समाधिः ३ ३ २३४ 
तद्रेराग्यादपि दोषबीजक्षये केवस्यम्‌ ३ ५० ३०६ 
तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः र १ १२१ 
ताक्मिन्‌ सति शआासप्रध्वासयोगेतिविच्छदः प्राणायामः २ ४९ २२५ 
तस्य प्रश्चान्तवाहिता संस्कारात्‌ ३ १० २४० 
तस्य भूमिषु विनियोगः ३ ६ २३५ 
तस्य वाचकः प्रणतः १ २७ ५७६ 
तस्य स्रधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा २ २७ २०५ 


३७४ पातञ्जङयोगसूत्राणाम्‌ 


तस्य हेतुरबिया 

तस्यापि निरोधे सवनिरोधन्निर्बीजः समाधिरिति 

ता एव सचाजः समाधिः 

तारकं स्वविषयं सवंथाचिषयमक्रम चेति त्रिवेकज 
ज्ञानम्‌ 

तासामनादित्वं चाऽऽक्चिषा निदयस्वात्‌ 

तीत्रपवेगानामासन्नः 

ते प्रतिप्रसवहेयाः सुक्ष्माः 

ते हादृपरितापकखाः पुण्यापुण्यहतुत्वात्‌ 

ते उयक्तसृक्ष्मा गुणात्मानः 

ते समाधावुपसगां व्युत्थाने सिद्धयः 

त्रयमन्तरङ्गं पूर्वभ्यः 

त्रयमेकत्र सयमः 


2? ^ 


दुःखदोमनस्याङ्गमजयस्वश्वासमप्रशचासा 
दुःखानुजन्मा देषः 
दग्दरोनक्षक्योरेकारमतेवास्मितां 


दृशानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वक्षीकारसंज्ञा वैराग्यम्‌ 


देशवन्धश्ित्तस्य धारणा 
दर दशिमात्रः ञुद्धोऽपि प्रययानुपरयः 
द्र्टदृश्ययोः सयोगो हेयहेतुः 


्रदरथो पर्त चित्त स्वाथेम्‌ 
प्‌ 
धारणाय च योग्यत्ता मनसः 
ध्यानहेयास्तदु धृत्तयः 
धरषे तद्रतिज्ञानम्‌ 
स्‌ 


न च सालम्बन तस्य्राविषयीभूतस्वात्‌ 

न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तद्प्रमाणकं तदा ङि स्यात्‌ 
न तत्स्वाभासं टरइयलात्‌ 

नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम्‌ 


क्षेपसहभुवः 


निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः कषत्रिकवत्‌ ४ 


निमाण वित्तान्यस्मितामात्रात्‌ 
निर्निवारतेकशारथेऽध्याद्मप्रसाष्‌। 


पावाङ्काःसूत्राङ्क।:प्रष्ठाङ्काः 
य्‌ भथ ०० 
१ ५१ ११७ 
१ ६ {१९१३ 
३ ५४ ३१४ 
1 {9 २२८ 
१ २५ ५५२ 
२ १० १४२ 
र १४ १५८ 
% १३ २३३७ 
३ ३७ २९ 
द्‌ ५9 २३५७ 
>, २८३२५ 
(4 ३५ ८२ 
२ ८ १४० 
२ ६ १३७ 
१ ५५५ ४३२ 
२ १ २३३ 
र्‌ १० १८८ 
र्‌ १७ १७२ 
1 २३ २५५ 
२ ५३ ३० 
म्‌ ५१ १४२ 
३ ९८ ८७ 
३ २० २८१ 
1 १६ २४४ 
ठ १९ ३४९ 
३ २५ २८८ 
\ २१८ 

ध र ३२० 
१ ४५ १६१३ 


वणोनुक्रमसुची ३७५ 
पादाट्ाःसूजङ्काप्र्ठाद्काः 
प 
परमाणुपरममहन्वान्तोऽस्य वक्ीकारः १ ० ५७ 
परिणामतापसस्कारदुःखेुणड़त्तिविरोधान्च दुःखमेव 
स्वे विवेकिनः य्‌ १५ १५९ 
परिणामत्रयस्यमादतीतानागतज्ञानम ३ १६ २६२ 
परिणमेकस्वादस्तुतच्म्‌ र १४ ३३८ 
पुरुषाथेशचुन्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्य स्वरूप- 
प्रतिष्ठा घा चितिशक्तिरिति % ३४ ३६८ 
पूर्व॑षामपि गुरुः कषटिनानवच्छेदात्‌ ५१ २६ ७४ 
भकराशक्रेयास्थितिश्षीरं मूर्तेन्द्रयात्मकं भोगापवगोर्थं 
रडयम्‌ २ १८ १५६ 
प्रच्छदनविधारणाभ्यां बा प्राणस्य १ ३४ ९२ 
प्रस्यक्नानुमानागमाः प्रमाणानि ६ ७ १८ 
प्रययस्य पर्याचत्तज्ञानम्‌ ३ १५ २८० 
प्रमाणविपयेयविकरपनिद्रास््रतयः १ ६ १८ 
भ्रयल्नक्षेथिस्यनन्यसमापत्तिभ्याम्‌ २ ४७ २२६ 
प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमकमनेकेषाम्‌ १ ५ ३२१ 
्रवृ्यारकन्यरासात्‌ सुष्ष्मव्यव्रहितविप्रकरृषज्ञानम्‌ ३ २५ २८४ 
प्रसङ्ख्यनिऽप्यकुसीदरस्य सवथाविवेकख्यातेगेममेषः 
समाधिः ; २९ ३६३ 
प्रातिभाद्वा सवम्‌ ३ ३३ २८९ 
#। 
वन्धकारणङेधित्यात्‌ प्रचारसंबेदनाच चित्तस्य 
परश्चरीरावेशः ३ ८ २५२ 
बरह्म चंगेप्रतिष्ठायां बौयेटाभः २ ३८ २२२ 
टेषु हस्तिबलादीनि ३ रै २८४ 
बहिरकल्पिता बरत्तिमहाविदेहा ततः प्रकाश्ावरणश्रयः ३ ४३ २९६ 
बाह्य।भ्यन्तरवि पयाक्षुपी चतुथः र्‌ ५१ २२९ 
बाह्याम्यन्तरस्तम्भवृ्तिदंशकारसङ्ख्याभिः परिष्टो 
दीषेसूक्ष्म ‡ २ ० २२७ 
भम 
भवप्रत्ययो बिदेहभरकृतिखयानाम्‌ १ १९ ५० 
भुवनज्ञाने सूरय संयमात्‌ ३ २६ २८५ 


३७६ पतञ्ञलयोगसूत्राणाम्‌ 


मूधं्योतिषि सिद्धदशनम्‌ 


मदु मध्य्रायिमान्रस्वात्ततोऽपि विशेषः 
भेत्रीकरुणामुदिनोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्य- 
विषयाणां भावनातश्ित्तप्रसादनम्‌ 


मेश्यादिषु बलानि 


यथाभिमतध्य्रानाद्रा 


य्‌ त 


यमनियमा सनप्राणायामप्रत्याहारघारणाध्यान- 


समाधयोऽष्टावरद्भानि 
योगश्चित्तव्ृत्तिनिरोधः 


योगङ्खानुष्ठनादश्ुद्धक्षये ज्ञानदीपिरा विवेकर्यतिः 


च 


र्पलावण्यबरखवज्रसहननत्वानि कायसपत्‌ 
व 
वस्तुसाम्ये चित्तमदात्तयो्ीविक्तः पन्थाः 


वितकैवाधने प्रतिपक्षभावनम्‌ 


(५ 


(+ ४७ 


वितकौ हिंसादयः ृतकारितानुमोदिता लेभक्रोध- 


| ट 


वितकेषिचारानन्द्‌ास्मितारूपानुगमात्‌ संप्रज्ञातः 


पादाद्धाःसृत्रङ्काःप्रष्ठाङ्क( 
३ ३२ २८९ 
१ ९२ ९५२ 
१ ३३ ९१९ 
३ २३ ` २८३ 
१ २९ ९६ 
२ २९ २१९१ 
९ ए ५ 
२ ८ ५०५७ 
३ ४६ ३०२ 
1 १५ ३४१ 
म्‌ २३३ २१७ 
१ १७ ७ 


मोहपृवका मदुमध्यामात्रा दुःखाज्ञानानन्तकला 


क, (क 


दात प्रतिपक्षमाकव्नन्र्‌ 


व्रिपयेयो भिथ्याज्ञानमतदरूपपतिष्ठम्‌ 
विरामप्रययाभ्यासपूत्रः सस्कारशेषोऽन्यः 
विवेकख्यातिरविपुत्रा हानोपायः 


[कके [५१ 
विशषद्‌ शन आत्मभविभावन 


निब्रात्तिः 


विक्षेषाविज्ेषलिङ्धमात्रालिङ्घा गुणपवोणः 


(^ = (५ [१३ 
विश्चाका वा उ्यातष्मर्ता 


विषयवती वा प्रवृत्तिरत्पन्न मनसः स्थितिनिबन्धनी 


वीतरागविषये वा चित्तम्‌ 

वृत्तयः पद्वतय्यः इिष्टाङ्धिष्टाः 

वृत्तिसाङरूप्यमितरत्र 

व्याधिस्यानसक्यप्रमादाट्स्या 
रब्धभूमिकत्वानवस्थितत्व 
न्तरायाः 


{क [न 


विरति ्रान्तिदशेना- 


नि चित्त 


, 


(५ 


विक्षेपास्ति- 


९1 


~+ 3 = = = 8? € ~€ ~^ ~ 


३५ 


१० 


२१८ 
३३ 
४८ 

२०४ 

२६० 

१८२ 
९४ 
५ 
९५ 


१४ 


८१ 


व्णानुक्रमसूची 


३९.७५ 


पादाह्नाः सुत्रङ्ाः प्राङा 


व्युस्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुभोवौ निरोधक्षण- 
चित्तान्वयो निरोधपरिणामः ३ 
र 
शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः १ 
शब्दाथप्रययानामितरेतराध्यासात्‌ संकरस्तस्रवि- 
भागसयमात्‌ सवेभूतसरुतज्ञानम्‌ 
शान्तोदिताव्यपदेदयधमोसुपातीं धर्मी 
शोचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः 
शो चात्‌ स्वाङ्गजुगुप्सा पररैरससगैः 
्रद्धाचीयस्ट्रतिसमाधिप्रज्ञपूतवेक इतरेषाम्‌ 
श्रताजुमानभ्रज्ञाभ्यामन्यविषया विक्चेषाथेत्वात्‌ 
भ्रोत्राकाश्चयोः सबन्धसंयमादिव्यं श्रोत्रम्‌ 
स 


५ 5 -+3 .९) द) .र५ द 


सति मूले तद्विपाको जायायुर्मोगाः 

स तु दीधकार्नैरन्तयैसस्कारासेवितो दृढभूमिः 

सदयप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयस्वम्‌ 

सत्त्वपुरुषयोरयन्तासंकीणेयोः प्रययाविश्चेषो भोगः 
पराथात्‌ स्वाथेसयमान्‌ पुरुषज्ञानम्‌ 

सत्छवपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवस्यमिति 

सचवपुरुषान्यताख्यातिमाच्रस्य सवभावाधिष्ठावृखं 
सवेज्ञातृत्वं च र 

सन्त्वश्ुद्धिसोमनस्थेकाग्येन्द्रियजयात्मदसेनयोग्य- 
त्वानि च 

सदा ज्ञाता्ित्तदृत्तयस्तस्भोः पुरुषस्यापरिणामिखात्‌ 

समाधिभाव्रनाथेः छक्षतनुरुरणायेश्च 

समाधिसिद्धिरीखरभणिधानात्‌ 

समानजयाज्ज्वलनम्‌ 

सतेषादनुत्तमः युखराभः 

सस्कारसाक्षार्करणात्‌ पवेजातिज्ञानम्‌ 

सवोथतेकामरतयोः क्चयोदथो चित्तस्य समाधिपरिणामः 

सुखानुजन्मा रागः 

सृक्ष्मषिषयत्व चाङिङ्गपयवसानम्‌ 

सोपक्रमं निरुपक्रमं च कमे तत्सयम।दपरान्तज्ञान- 
मर्ष्टिभ्यो वा ३ 

48 


९ ~ ^ 


[, स, । 


3 4) ८५ ५४ ~) ५७ ९) ९) ०८ ~) 


१३ 
१४ 
३९६ 


२५ 
९५ ५ 


४९ 


४९ 
१८ 


४५ 


३९ 


२५ 


२६३ 
२५५ 
२१५ 
२२२ 

५१ 
११५ 
२९४ 


१४६ 
४३ 
२२१ 


२९० 
२१५ 


०५ 


२९३ 
२३४५७ 
१२४ 
२२१४ 
२९४ 
रर 
२७८ 
१४० 
१२३९ 
१११